अमिता प्रजापति की रचनाएँ

बच्चे जल्दी बड़े हो रहे हैं

बच्चे जल्दी बड़े हो रहे हैं
सम्भाल रहे हैं अपने बस्ते में रखी
ढेर सारी कॉपियाँ, क़िताबें और दिया गया होमवर्क
सम्भाले हुए हैं अपनी-अपनी फ़ीस
अपनी छोटी जेबों में जो घरों से ले आए हैं अपने

बच्चे सम्भाल रहे हैं
स्कूल से आकर अपने मिजे अपने छोटे-छोटे जूतों में
अपना खाली हुआ लंच बॉक्स
बर्तन मांजने की जगह पर रख रहे हैं
अपनी यूनिफ़ार्म का टूट गया बटन भी
सम्भाल कर ला रहे हैं वे घर

घर में बिखरे खिलौनों को समेटते सम्भालते
मालूम नहीं कब वे बैठक को भी
तरतीब से सम्भालने लगे हैं

बड़ी अब सम्भालने लगी है छोटे को
और कभी छोटा बड़ी को सम्भालता है
कि आज दीदी को थोड़ा बुखार है
उन्हें पता है घर में कहाँ कॉटन रखी है और कहाँ डिटॉल
और ज़रूरत पड़ जाए किस अलमारी के पेपर के नीचे
रखे हैं खुल्ले पैसे

उन्हें आ गया है अपनी आँखों को
नींद आने पर ख़ुद सुला लेना
और अपने नन्हें-नन्हें आँसुओं को पोंछना
जो रोकते-रोकते भी बह निकलते हैं

ये बच्चे अपने आपको ऎसे सम्भालने लगे हैं
जैसे ये अपने छोटे से पपी को सम्भाले फिरते हैं
ये बच्चे, जिन्हें पता है कि
माँ और पापा ऑफ़िस गए हैं
और शाम को लौटते हुए उन्हें देर हो सकती है
वे अपने सपनों के गेंद बनाकर खेला करते हैं कि
संडे आएगा और हम माँ-पापा के साथ होंगे

ये बच्चे
जल्दी बड़े हो रहे हैं
ये सीख रहे हैं अपनी छोटी आँखों में
सपनों को सम्भाल कर बड़ा करना
ये अपने नन्हें क़दमों से
बड़ी राह पर चलने की तैयारी कर रहे हैं।

पूरब और पश्चिम 

कल लड़े थे हम
दुश्मनी के साक्षात प्रतीक बन
खड़े थे हम
आज प्यार किया हमने
नए बने प्रेमियों की तरह
ये दुश्मनी और ये प्रेम
घर में बने दो दरवाज़े हैं
सरसराया करते हैं हम
जिनमें हवाओं की तरह…।

स्त्री और पुरुष

वह संस्कृति और परम्पराओं की
मोटी-मोटी क़िताबों से
प्रश्न पत्र की तरह निकलते हैं- अकड़ते
तटस्थ, अनिवार्य, सीमा बाँधते
अलग-अलग होते हुए भी एक समान
और तुम उत्तर-पुस्तिका-सी
एक ही प्रश्न को
अलग-अलग तरीकों से हल करतीं
पृष्ठ दर पृष्ठ खुलतीं
फिर भी अपर्याप्त
होतीं अधूरी-सी समाप्त

दो सिरे

ज़िन्दगी की कमीज़ के
दोनों सिरों पर लगे

काज और बटन की तरह हैं हम

वक़्त को
जब झुरझुरी आती है
इस कमीज़ को ढूंढ़ कर
पहन लेता है

प्रेम और स्पर्श 

प्रेम और स्पर्श
मेरे दो बच्चे हैं

स्पर्श कुछ अधिक चंचल है
दौड़ता है दूर-दूर तक
पूछ-पूछ कर
परेशान रखता है अधिकांश

दूसरा-
प्रेम ज़रा गम्भीर है
बहुत संकट में ही माँ पुकारता है
और अधिकतर समय
ख़ुद ही
अपनी माँ बना रहता है।

रमना नींद में और ज़िन्दगी में

जैसे नींद
रम जाती है शरीर में
रमना है ऎसे मुझे ज़िन्दगी में
जैसे रोशनी खिड़कियों से आकर
अलग कर देती है
नींद को शरीर से
ऎसे ही अलग होना है
मुझे ज़िन्दगी से…

धूप-सी नहीं खिल पाती देह

देह के राग
कितने मुश्किल
कितने कठिन
विचार जब गुँथे हों
झाड़ियों की तरह
देह का खिलना कितना मुश्किल
झाड़ियों के अंधेरे में
धूप-सी नहीं खिल पाती देह

मेरा प्रेम ताजमहल है 

मेरा प्रेम ताजमहल है
जिसे दूर-दूर से
लोग देखने आते हैं
और कौतुक करते हैं
इसके चारों तरफ़ घूम कर देखते हैं
इसके अन्दर और बाहर होते हैं
इसकी नक़्क़ाशी से
इसके समय की समृद्धि का
कयास लगाते हैं
इसके बग़ीचे में खड़े होकर
बैठकर हाथ टिका कर
लेटते हुए फ़ोटो खिंचाते हैं
इस पर दिख रही दरारों पर उंगलियाँ उठाते हैं
और इन्हें भर दिए जाने पर
मन ही मन चकित होते हैं
यह ताजमहल साल-दर-साल
शरद पूर्णिमाओं से गुज़र रहा है

मन (चार कविताएँ) 

1.

जैसे सुन्दर वन में अकेले
खड़ा हो हिरन
कभी-कभी ऎसे अकेले
होता है मन

2.

सच कभी
आता है हम तक ऎसे
गिरा हो बदन पर
ठंडा पानी
ठंडों में

3.

कमल की पंखुरी-सा मन
पड़ा है दुख
जिस पर
पानी की बूंद-सा
मोती-सा

4.

कल एक हंस उतरा
आसमान से
बहुत सारी
सफ़ेदी लिए, निर्मलता लिए
अपने पूरे पंखों से समेटता रहा मुझे
लगता है अब भी वह मुझे उड़ाए
ले जा रहा है…

चिल्लर

वे लड़कियों को
चिल्लर की तरह
अपनी गुल्लक में
इकट्ठा करना चाहते हैं
बंधे नोट से अटकता है
उनका खर्चा पानी
क्योंकि बंधा नोट वे
बांध कर रखना चाहते हैं
अपनी जेब में
और लड़कियां रेजगारी की ही तरह
गुल्लक फोड़कर
बढ़ जाती हैं आगे
एक बंधा नोट बनने के लिए!

नीलू मत हो उदास

नीलू मत हो उदास कि हमारी पुरखिन मांओ ने
नहीं सिखाया उन्हें
कैसे हुआ जाता है एक खिला हुआ पुरुष
हमारी माएं ज़्यादा मगन रहीं
स्त्रियां रचने में शायद
जो रची गईं तो ऐसी कि
समय-दर-समय खुलती चली गई
बिखर गई सुगन्ध की तरह
पुरुष तो जैसे बंद हो चला
कस गया अपने में इतना कि
ज़रा बजाने पर ही बज उठे टक-टक
गिरा ज़रा तो लुढ़कता चला जाए दूर तक
और बांध लें कहीं लटका रहे बोझ-सा
नीलू मत हो निराश कि चूक हुई है
हमारी पुरखिन मांओं से
नहीं बना पाईं वे ऐसे पुरुष
कि घुलें…बहें
हवाओं में हल्के होकर…

वे हमारे पुरखे पिता
जो खुद कसे हुए घोड़ों की तरह अपनी टापें
हमारी छाती पर रखा करते थे
भाई पिता पति और प्रेमी होकर
ओ नीलू मत हो निराश कि
हम बना लेंगे ऐसे पुरुष
जो घर से आकाश तक बहें
हवाओं की तरह…
आने वाली स्त्रियों के लिए गढ़ने होंगे नए पुरुष
अपने गर्भ घरों में
जो घरों में उठने वाली खुशबुओं को दूर तक महका सकें!

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