अरविन्द पासवान की रचनाएँ

नए सपन सुंदर जोड़ेंगे

ख़ूब बढ़ेंगे
शृंग चढ़ेंगे
रोके-से हम नहीं रुकेंगे

ख़ूब खिलेंगे
ख़ूब फलेंगे
बाधाओं से नहीं झुकेंगे

ख़ूब पढ़ेंगे
ख़ूब लिखेंगे
अंधकार के गढ़ तोड़ेंगे

हमी रचेंगे
हमी बचेंगे
नए सपन सुंदर जोड़ेंगे

नन्ही-सी चिड़िया कागज़ की 

रचे गए
वेद
त्रि-पिटक
कल्प-सूत्र
जेंद-अवेस्ता
बाइबिल
कुरान
गुरु-ग्रंथ साहिब
और बहुत कुछ

मगर सुनो मेरे देश
मैं रच रहा हूँ नन्ही-सी चिड़िया
कागज़ की
जो उड़े एक दिन
और सुना आए दुनिया को
प्रेम का संदेश

पानी 

सब लोग हैं लगे हुए
कुछ मुकम्मल तराशने में

मैंने सोचा
चलो खुरचें पानी को ही

जो पानी गायब है इन दिनों
लोगों के ही चेहरे से

रिश्ते

खून के रिश्तों का
हो रहा है खून

भाव के रिश्तों में
लग रहे हैं घाव

बादल जाते हैं अक्सर

रिश्ते वैचारिक

रिश्ते प्रेम और अभाव के
रहते हैं साथ
सदा के लिए

देखना

दुनिया को
दुनिया के लोगों को
उनके चश्मों से नहीं
अपनी नंगी आँखों से देखो
निगाहें डालकर
उनके भीतर
दिखेगा तल में कचरा कहीं ज़रूर
जिसमें
गुलाब भी खिलते हैं

रूप

जो
गला फाड़कर चिल्ला रहे थे
सबसे ज्यादा

यज्ञ
अजान और
अरदास में

वही

गलियों
नुक्कड़ों व
चौक-चौराहों पर
दिख जाते
कंस, कसाई या कमीने के रूप में

नदियाँ 

सोख जाएँगे नदियों का जल हम ही
हम ही
भर देंगे कचरे के ढेर से उन्हें
आनेवाली पीढ़ियों के लिए छोड़ जाएँगे नदियों को
चित्रों में

लीची गाछ 

एक शाम टहलते हुए अपने गाँव में
हम पहुँच गए जानी-पहचानी जगह पर
जो बड़ी मुश्किल से पहचानी जा रही थी
वह खींच रही थी अपनी स्मृति में हमें… और हम उसे
स्मृति की यादों में डूबते हुए
याद आया– लीची गाछ; याद आए रामजी दा, बच्चे
और बचपन के दिन

लीची गाछ
जिसे अगोरते थे रामजी दा
न केवल जेठ की दुपहरी में, बल्कि
पूस की रात में भी बड़े अरमान से

और बच्चे
जिस लीची गाछ की लच-लच डाल पर
खेलते थे डोलपात, उछल-कूद करते थे बानरों की तरह|

मैं उनसे करता सवाल–
कि रामजी दा
जब नही है लीची का सीजन
क्यों जान देते हो मुफ़्त में
इस कड़ाके की ठंड में!

उनका सहज जवाब होता–
जिंदगी केवल लाभ-हानि से नही चलती
चलती है प्रेम से, स्नेह से
नेह की सासों से
धरती के सजीवों-निर्जीवों के सहयोग-साहचर्य से
इसलिए
फलों से ज्यादा ज़रूरी है पेड़ों को बचना

क्योंकि
जब पूस, माघ की गहन ठंड में
लगती है गरीबों के पेट में आग
तो वे
पेट की आग सह जाते हैं खुदा की देन समझकर
लेकिन
उनके तन-बदन लगते हैं गलने
बर्फ़ीली हवा से
जो असहनीय होता है उनके लिए

फिर
गहन ठंड से लड़ते-जूझते
वे निकाल पड़ते हैं अपने झोपड़ियों, तम्बूओं और सिरकियों से
अपने अस्तित्व को बचाने
और काट डालते हैं
अपने ही जीवन की सासों को

यानी गाछों को!

इसलिए
जीवन के अस्तित्व के लिए
ज़रूरी है गाछों को बचाना

ज़रूरी है इसलिए भी कि
बच्चे खेलें लच-लच डाल पर
डोलपात|

और आज
मन कुहक उठता है
उस जगह को देखकर
कि अब न लीची गाछ रहा
न रहे रामजी दा

अब यहाँ केवल
कंक्रीट के जंगल का घना अंधकार और सन्नाटा पसरा है

फिर मैं रेत होता हूँ 

सोख लेता हूँ लहर नफ़रतों के
फिर मैं रेत होता हूँ

अलक्षित, उपेक्षित किनारे पर
दुनिया से दूर होता हूँ

वसंत में ठंड

इस वर्ष
वसंत में वसंत नहीं
लौट आयी है फिर से
ठंड
हाड़ कंपकंपाने वाली
बूढ़े बरगदों को जड़ों से हिलाने वाली

कभी-कभी शाप बनकर लौटती है लहरें
समुद्र की

दुखों के सागर
जीवन में

तड़प प्रेम की
अनायास

कभी-कभी
लौट आती है शाम पहले

सुबह से

मुक्ति के गीत 

कुछ दिन हुए
शामिल होने की ललक में
मैं भी सपरिवार शामिल हो गया हूँ
राजधानी की भीड़ में

जहाँ बसते हैं
कवि, कलाकार, रचनाकार
अनेक विद्वान और कॉमरेड
जो
जीवन की मुक्ति के गीत गाते हैं

राजधानी का एक चौराहा

जहाँ से अक्सर गुज़रते हैं लोकशाह
वहीं चौराहे के बीच
पोल से बँधी एक बकरी
न जाने कब से
अपनी मुक्ति के गीत गा रही है

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