अलका सर्वत मिश्रा की रचनाएँ

ज़िन्दगी जीने की कला 

ज़िन्दगी जीने की
कला सिखाना
भूल गए मुझे
मेरे बुजुर्ग।
मैंने देखा
लोगों ने बिछाए फूल
मेरी राहों में,
प्रफुल्लित थी मैं !
पहला क़दम रखते ही
फूलों के नीचे
दहकते शोले मिले ,
क़दम वापस खींचना
मेरे स्वाभिमान को गँवारा नहीं था
इस एक क़दम ने
खींच दी तस्वीर यथार्थ की
दे दी ऎसी शक्ति
मेरी आँखों में
जो अब देख लेती हैं
परदे के पीछे का सच
हर क़दम पर
लगता है
आ गया है चक्रव्यूह का साँतवा द्वार
जिसे नहीं सिखाया तोड़ना
मेरे बुजुर्गों ने मुझे
और हार जाऊँगी अब !
किन्तु
वाह रे स्वाभिमान
जो हिम्मत नहीं हारता
जो नहीं स्वीकारता
कि मैं चक्रव्यूह में फँसी
अभिमन्यु हूँ।
जिस पर वार करते हुए
सातों महारथी
भूल जाएँगे युद्ध का धर्म
एक बार पुनः
ललकारने लगता है
मेरे अन्दर का कृष्ण ,मुझे
कि उठो ,
युद्ध करो !और जीत लो !!
ज़िन्दगी का महाभारत .
पुनः आँखों में ज्वाला भरे
आगे बढ़ते क़दमों के साथ
सोचती हूँ मैं
कि ज़िन्दगी जीने की
कला सिखाना
भूल गए मुझे….

ये दो फूल

ये दो फूल
जिनमें खो जाते हैं हम अक्सर
हमें इस कदर लुभाते हैं
कि हम भूल जाते हैं,
इन्हें मिल जाना है
मिट्टी में ही

ये खिलेंगे मगर
उपवन में ही
हम कितना भी कर लें जतन
समर्पित कर दें अपना जीवन
तन-मन-धन
और गृह वन
सिर्फ़ इनकी एक मुस्कान के लिए
किन्तु
परन्तु
व्यर्थ है सारी लगन
सूना ही लगता है अपना आँगन
और
तरसते हैं हमारे कर्ण
इनकी खिलखिलाहट के लिए

आती हुई हवाएँ 

आती हुई हवाएँ
मायूस होने लगी थीं
ख़ुशबू की तलाश में !
दुर्गन्ध का साम्राज्य था
हर तरफ फैला हुआ
आदमी तो आदमी
दिमाग तक सड़ा हुआ!!

भटकती ही रह गई
अंधेरी राहों पर
रोशनी की तलाश में !!

ज़िंदा आदमी की भी
बेनूर सी आँखें !

हवाओं को शंका हुई
अपने ही क़दम पर
कहीं ग़लत तो नहीं आई वे
ये धरती ही है न !!!

मैं पेड़ नहीं शहर हूँ 

मैं पेड़ नहीं
शहर हूँ मैं
एक भरा पूरा शहर।

हज़ारों घर हैं परिंदों के,
इनकी चहचहाहट के सप्तम सुर भी।
हजारों कोटर हैं
गिलहरियों के,
इनकी चिक-चिक की मद्धम लय भी।
केचुओं और कीटों की
लाखों बांबियाँ
मेरी जड़ों में
और आठ-दस झूले
अल्हड नवयौवनाओं के।

अब समझे
पेड़ नहीं,
शहर हूँ मैं,
जहाँ चलती है
बस एक ही सत्ता
प्रकृति की,
मेरी लाखों शाखाएँ
अरबों पत्ते,
संरक्षित व सुरक्षित करते हैं
लाखों-करोड़ों जीवन
पलते हैं अनगिनत सपने
मेरी शाखों पर,
फलती-फूलती हैं कई-कई पीढ़ियाँ
मेरी आगोश में।

मूक साक्षी हूँ मैं
पीढ़ियों के प्रेम-व्यापार का,
शर्म से झुकती पलकों का
पत्ते बरसा कर सम्मान करता हूँ मैं।

मानसिक द्वंद से थका हुआ प्राणी
विश्राम पाता है मेरी छाया तले,
उसकी आँखों में चलता हुआ
भूत और वर्तमान का चलचित्र
जाने क्यों मुझे द्रवित करता है।

आकांक्षाओं व इच्छाओं का मूक दर्शक हूँ मैं,
पक्षियों के सुर संगीत व अपनी शीतल हवा
वार देता हूँ उन पर मैं
उनका दुःख हर कर
नवजीवन संचार का

आख़िर मैं भी तो
एक अंग हूँ
प्रकृति का।
भले ही शहर / गाँव / देश हूँ मैं।

कलम की दादागिरी

बहुत दिनों के बाद
अब उठने लगी है कलम
देखिए क्या गुल खिलाती है ?

इसके मन में क्या है
अब ये क्या लिखने वाली है,
एक क्षण पहले तक भी
नहीं बताती है !

यह नए शब्द गढ़ती है
नए अर्थ ले आती है
मुश्किलों के वक्त मुझे
विदुर नीति समझाती है.

कहती है –
कण-कण में चेतना है
‘जड़’ केवल तेरी बुद्धि है
जो नहीं समझती है
प्रकृति का इशारा,
हवा-पानी-मिट्टी की,
कीमत नहीं जानती है
बेहद शक्तिशाली हैं ये
हारेंगे नहीं तेरे किसी आविष्कार से,
एक ही क्षण लगेगा
उस आविष्कार को मिट्टी होते.

कहती है-
सदियों से लिखती आई हूँ
शिलापट मैं
लाखों करोड़ों इबारतें
सब कुछ ख़त्म होते गये
सिर्फ ये लेख ही बचे हैं.

जाने कितने जीव-जंतु
जाने कैसे- कैसे पेड़-पौधे
किले, इमारतें, महल
सब कुछ मिल जाता है
इसी प्रकृति में
सबसे शक्तिशाली है ये

तुम इसकी रक्षा करो
ये तुम्हें संरक्षित करेगी
पहले भी लिख चुकी हूँ मैं
धर्मो रक्षति रक्षतः
क्यों नहीं आता समझ में, तुम्हें
पढ़ डाली अलमारी भर-भर किताबें
अनगिनत रिसाले
पर तेरी जड़ बुद्धि में
नहीं घुसा अभी तक
कि-
कुदरत उसी की सुरक्षा करती है
जो कुदरत की रक्षा करता है।

न्यायाधीश

मैं तो भूल गयी थी
यह मूक प्रकृति
सुनती है मेरी पीड़ा
समझती है मेरी व्यथा
यह सहलाती है मुझे
समझाती है मुझे
ध्यान रखती है मेरा
और रक्खेगी भी!!
मैं भूल गयी थी,
अब याद आया.
कि ईश्वर की लाठी बेआवाज होती है

ये सारे वाक्य नहीं हैं
केवल खुद को दिलासा देने के लिए
विज्ञान तो कहता ही है
क्रिया की प्रतिक्रिया होती है
क्रिया तो हो चुकी
अब इंतज़ार कीजिए
प्रतिक्रिया का
हम उद्वेलित होकर
तुरंत न्याय चाहते हैं
किन्तु प्रतिक्रिया तलाशती है
साधन
खुद को व्यक्त करने के लिए
वह भी यथोचित हो
ताकि सहज ही लगे
प्रतिक्रिया भी
प्रकृति की

.यही सनातन सत्य है
चला आ रहा है
चलता रहेगा
प्रकृति ही
न्याय करती है

प्रकृति न्याय करती है

लो
मैं तो भूल ही गई थी
कि
यह मूक प्रकृति
सुनती है मेरी पीड़ा
समझती है मेरी व्यथा
समझाती भी है मुझे
यह जवाब भी देती है
ध्यान रखती है मेरा
और रक्खेगी भी!!
मैं भूल्गई थी
अब याद आया
कि ईश्वर की लाठी बेआवाज होती है.

ये सारे वाक्य नहीं हैं
केवल खुद को दिलासा देने के लिए
विज्ञान तो कहता ही है–
क्रिया की प्रतिक्रिया होती है
क्रिया तो हो चुकी
अब इन्तजार कीजिए
प्रतिक्रिया का .

हम उद्वेलित होकर
तुरंत न्याय चाहते हैं
किन्तु प्रतिक्रिया तलाशती है
साधन
खुद को, व्यक्त करने के लिए
वह भी
यथोचित हो
ताकि
सहज ही लगे
प्रतिक्रिया भी प्रकृति की.

यही सनातन सत्य है
सदियों से
चला आ रहा है
चलता रहेगा
प्रकृति ही
न्याय करती है.

तुम्हारी कोशिश् 

ये है
मुझे पददलित करने की
तुम्हारी एक और कोशिश
पर ये कामयाब नहीं होगी

बहुत झेले हैं
बरसों से
तुम्हारी बातें, तुम्हारी चालें
तमाम सरकारी आश्वासनों जैसे
तुम्हारे नुस्खे

दबने की एक सीमा होती है
जब दबाव ज्यादा हो जाए
तो फट जाता है
ज्वालामुखी
और समेट लेता है
अपनी आग में
हजारों बस्तियों को
हजारों शहरों को

और फिर
बस राख बचती है
जश्न मनाने के लिए .

मेरी मदद करो

भाइयों! बहनों!!
मातृ-पितृ गण
दादाओं! चाचाओं!!
बेटे-बेटियों
थोड़ी मेरी मदद करो…..

एक नारी हूँ मैं
मेरे पास
दया भी है, ममता भी
प्यार भी है
एहसास भी
मगर ज्यों लिखना चाहती हूँ
एक प्रेम भरी कविता;
ये मेरी कलम पता नहीं क्यों
आग उगलने लगती है.

कलमें बदल कर देख लीं
स्याहियों के रंग बदल लिए
कागजों को भी देख लिया
बदल-बदल के
बैठाने की जगह बदलने की भी
कोशिश कर ली
घर, कमरे, पार्क, छत
ट्रेन, आफिस, बसें
मगर नहीं बदल सकी मैं
कविताओं में आग उगलने की आदत

क्या करूँ?
सच कहूँ
मैं लिखना चाहती हूँ
एक प्रेम भरी कविता
जिसमें स्वर्ग का अक्स हो
फूलों की महक हो
शब्द प्रेम उड़ेलें
मात्राएँ ममता बिखेरें
पर कैसे…?

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