अली अकबर नातिक़ की रचनाएँ

बे यक़ीन बस्तियाँ

वो इक मुसाफ़िर था जा चुका है
बता गया था कि बे-यक़ीनों की बस्तियों में कभी न रहना
कभी न रहना कि उन पे इतने अज़ाब उतरेंगे जिन की गिनती अदद से बाहर
वो अपने मुर्दे तुम्हारे काँधों पे रख के तुम को जुदा करेंगे
तुम अन जनाज़ों को क़र्या क़र्या लिए फिरोगे
फ़लक भी जिन से ना-आश्ना है जिन्हें ज़मीनें भी रद करेंगी
वो कह गया था हमेशा ज़िल्लत से दूर रहना
कि बद-नसीबों का रिज़्क़-ए-अव्वल उन्हीं ज़मीनों से पैदा होता है
जिन ज़मीनों पे भूरी गिद्धों की नोची हड्डी के रेज़े बिखरीं
तुम अपनी राय को इस्तक़ामत की आब देना
जिसे पहाड़ों की ख़ुश्क संगीं बुलंदियों से ख़िराज भेजें
ग़ुलाम ज़ेहनों पे ऐसी लानत की रस्म रखना
जो तेरी नस्लों फिर उन की नस्लों फिर उन की नस्लों तलक भी जाए
तुम्हें ख़बर हो शरीफ़ लोगों की ऊँची गर्दन लचक से ऐसे ही बे-ख़बर है
सवाद-ए-ग़ुर्बत में ख़ेमा-गाहों की जैसे गाड़ी हों ख़ुश्क चोबें
कभी न शाने झुका के चलना
कि पस्त-क़ामत तुम्हारे क़दमों से अपने क़दमों को जोड़ देंगे
वही नहूसत तुम्हें ख़राबियों की पासबानी अता करेगी
सराब-आँखों के रास्तों से तुम्हारे गुर्दों में रेत फेंकेंगे और सीने को काट देंगे
वो कहा गया था वही इल्लत के मारे वहशी हैं जिन की अपनी ज़बाँ नहीं है
ये झाग उड़ाते हैं अपने जबड़ों से लजलजे का तो गड़-गड़ाहट का शोर उठता है
और बदबू बिखेरता है
यही वो बद-बख़्त बे-हुनर और बे-यक़ीं हैं कि जिन की दय्यत न ख़ूँ बहा है
सो इन की क़ुर्बत से दूर रहना नजात-ए-दिल का सबब बनेगा
वो इक मुसाफ़िर था कह गया है

चरवाहे का जवाब

आग बराबर फेंक रहा था सूरज धरती वालों पर
तपती ज़मीं पर लू के बगूले ख़ाक उड़ाते फिरते थे
नहर किनारे उजड़े उजड़े पेड़ खड़े थे कीकर के
जिन पर धूप हँसा करती है वैसे उन के साए थे
इक चरवाहा भेड़ें ले कर जिन के नीचे बैठा था
सर पर मैला साफ़ा था और कुल्हाड़ी थी हाथों में
चलते चलते चरवाहे से मैं ने इतना पूछ लिया
ऐ भेड़ों के रखवाले क्या लोग यहाँ के दाना हैं
क्या से सच है याँ का हाकिम नेक बहुत और आदिल है
सर को झफका कर धुँदली आँखों वाला धीमे से बोला
बादल कम कम आते हैं और बारिश कब से रूठी है
नहरें बंद पड़ी हैं जब से सारी धरती सूखी है
कुछ सालों से कीकर पर भी फल्लियाँ कम ही लगती हैं
मेरी भेड़ें प्यासी भी हैं मेरी भेड़ें भूकी हैं

हुजूम-ए-गिरिया 

हमें भी रो ले हुजूम-ए-गिर्या कि फिर न आएँगे ग़म के मौसम
हमें भी रो ले कि हम वही हैं
जो आफ़्ताबों की बस्तियों से सुराग़ लाए थे उन सवेरों का जिन को शबनम के पहले क़तरों ने ग़ुस्ल बख़्शा
सफ़ेद रंगों से नूर-ए-मअ’नी निकाल लेते थे और चाँदी उजालते थे
शफ़क़ पे ठहरे सुनहरे बादल से ज़र्द सोने को ढालते थे
ख़ुनुक हवाओं में ख़ुशबुओं को मिला के उन को उड़ाने वाले
सबा की परतों पे शेर लिख कर अदम की शक्लें बनाने वाले
दिमाग़ रखते थे लफ़्ज़-टो-मअ’नी का और दस्त-ए-हुनर के मालिक
वक़ार-ए-नूर-ए-चराग़ हम थे
हमें भी रो ले हुजूम-ए-गिर्या
हमें भी रो ले कि हम वही हैं
जो तेज़ आँधी में साफ़ चेहरों को देख लेते थे और साँसों को भाँपते थे
फ़लक-नशीनों से गुफ़्तुगूएँ थीं और परियों से खेलते थे
करीम लोगों की सोहबतों में कुशादा कू-ए-सख़ा को देखा
कभी न रोका था हम को सूरज के चोबदारों ने क़स्र-ए-बैज़ा के दाख़िले से
वही तो हम हैं
वही तो हम हैं जो लुट चुके हैं हफ़ीज राहों पे लुटने वाले
उसी फ़लक की सियह-ज़मीं पर जहाँ ले लर्ज़ां हैं शोर-ए-नाला से आदिलों की सुनहरी कड़ियाँ
हमें भी रो ले हुजूम-ए-गिर्या
हमें भी रो ले कि इन दिनों में हमारी पुश्तों पे बार होता है ज़ख़्म-ए-ताज़ा के सुर्ख़ फूलों का और गर्दन में सर्द आहन की कोहना लड़ियाँ
हमारी ज़िद में सफ़ेद नाख़ुन क़लम बनाने में दस्त-ए-क़ातिल का साथ देते हैं और नेज़े उछालते हैं
हवा की लहरों ने रेग-ए-सहरा की तेज़ धारों से रिश्ते जोड़े
शरीर हाथों से कंकरों की सियाह-बारिश के राब्ते हैं
हमारी ज़िद में ही मुल्कों मुल्कों के शहरयारों ने अहद बाँधे
सही कि हम को धुएँ से बाँधें और अब धुएँ से बंध हुए हैं
सो हम पे रोने के नौहा करने के दिन यहीं हैं हुजूम-ए-गिर्या
कि मुस्तैद हैं हमारे मातम को गहरे सायों की सर्द शामें
ख़िजाँ-रसीदा तवील शामें
हमें भी रो ले हुजूम-ए-गिर्या कि फिर न आएँगें ग़म के मौसम

लोहार जानता नहीं 

हमारे गाँव लुहार अब दरांतियाँ बना के बेचता नहीं
तो जानता है फस्ल काटने का वक्त कट गया सरों का काटने के शक्ल में
शरल में वो जानता है बाँझ हो गई जमीन जब से ले गए नकाब पोश गाँव के मवेशियों को शहर में जो बरमाला सदाएँ के खुश्क खून बेचते है बे-यकीन बस्तियो के दरमियाँ
उदास दिल खमोश और बे-जबाँ कबाड़ के हिसार में सियाह कोयलों से गुफ़्तुगू
तमाम दिन गुज़ारता है सोचता है कोई बात रूह के सराब में
कुरेदता है ख़ाक और ढूँढता है चुप की वादियों से सुर्ख़ आग पर वो ज़र्ब
जिस के शोर से लुहार की समाअतें क़रीब थीं
बजाए आग की लपक के सर्द राख उड़ रही है धूँकनी के मुँह से
राख जिस को फाँकती है झोंपड़ी की ख़स्तगी
सियाह-छत के ना-तवाँ सुतून अपने आँकड़ों समेत पीटते है ंसर
हरारतों की भीक माँगते हैं झोंपड़ी के बाम ओ दर
जो भट्टियों की आग के हरीस थे
धुएँ के दाएरों से खेंचते थे ज़िंदगी
मगर अजीब बात है हमारे गाँव का लुहार जानता नहीं
वो जानता नहीं कि बढ़ गई हैं सख़्त और तेज़ धार ख़ंज़रों की क़ीमतें
सो जल्द भट्टियों का पेट भर दे सुर्ख़ आग से

नाम-ओ-नसब 

ऐ मिरा नाम ओ नसब पूछने वाले सुन ले

मेरे अज्दाद की क़ब्रों के पुराने कत्बे
जिन की तहरीर मह ओ साल के फ़ित्नों की नक़ीब
जिन को बोसीदा सिलें सीम-ज़दा शोर-ज़दा
और आसेब ज़माने के रहे जिन का नसीब

पुश्त-दर-पुश्त बिला फ़स्ल वो अज्दाद मिरे
अपने आक़ाओं की मंशा थी मशिय्यत उन की
गर वो ज़िंदा थे तो ज़िंदों में वो शामिल कब थे
और मरने पे फ़क़त बोझ थी मय्यत उन की

जिन को मक्तब से लगाओ था न मक़्तल की ख़बर
जो न ज़ालिम थे न ज़ालिम के मुक़ाबिल आए
जिन की मसनद पे नज़र थी न ही ज़िंदाँ का सफ़र

ऐ मिरा नाम ओ नसब पूछने वाले सुन ले
ऐसे बे-दाम ग़ुलामों की निशानी मैं हूँ

रहज़नी ख़ूब नहीं ख़्वाजा-सराओं के लिए

रहज़नी ख़ूब नहीं ख़्वाजा-सराओं के लिए
शोर पायल का सर-ए-राह न रूस्वा कर दे
हाथ उठेंगे तो कंगन की सदा आएगी

तीरगी फ़ित्ना-ए-शहवत को हवा देती है
चाँदनी रक़्स पे मजबूर किया करती है

नर्म रेशम से बुने शोख़ दुपट्टों की क़सम
लोग लुटने को सर-ए-राह चले आएँगे
इक क़दर आएँगे भर जाएगा फिर रात का दिल

सख़्त लहजा गुल-ए-नग़्मा में बदल जाएगा
ख़ूँ बहाने के एवज़ इत्र-फ़िशानी होगी

होश आएगा तो बिखरे पड़ें होंगे घुँगरू
सुब्ह फिर चाक लिबासों का तमाशा होगा
रहज़नी ख़ूब नहीं ख़्वाजा-सराओं के लिए

सुरमा हो तो यारा 

दर्द की लज़्ज़त से ना-वाक़िफ ख़ुशबू से मानूस न था
मेरे घर की मिट्टी से वो शख़्स बहुत बेगाना था
तारे चुनते चुनते जिस ने फूल नज़र-अंदाज़ किए

ख़्वाब किसे मालूम नहीं हैं लम्स किसे महबूब नहीं
लेकिन जो ताबीर न जाने उस को ऊँघ भी लेना ऐब
रात की क़ीमत हिज्र में समझी जिस ने आँसू नूर बने
ज़ख़्म से उठने वाली टीसें ओस की ठंडक पीती हैं
आज न पूछो दुखने लगी है सुरमे से क्यूँ उस की आँख
जिस को सुनहरे दिन का सूरज किरनें बाँटने आता था
पत्थर आख़िर पत्थर होगा सुर्मा हो या तारा हो

उठेंगे मौत से पहले 

उठेंगे मौत से पहले उसी सफ़र के लिए
जिसे हयात के सदमों ने मुल्तवी न किया
वो हम कि फूल की लौ को फ़रेब देते थे
क़रीब-ए-शाम सितारों की रहगुज़र पे चले
वो हम की ताज़ा जहाँ के नक़ीब-ए-ज़न थे नए
सबा की चाल से आगे हमारी चाल रही
मगर गुमान के क़दमों ने उस को तय न किया
वही सफ़र जो हमारे और उस के बीच रहा
जिसे हयात के सदमों ने मुल्तवी न किया

उठा के हाथ में नेज़े पिला के आब-ए-सराब
कमीन-गाह-ए-हवस से निशाने दिल के लिए
तमाम सम्त से आई शहाबियों की सिपाह
हमारी ज़ात को घेरा मिसाल-ए-लश्कर-ए-शाम

हज़ार बार उलझ के फटा लिबास-ए-यक़ीं
मगर टली न कभी उस मुबाहिसे से ज़बाँ
जो साकिनान-ए-ज़मीं और हमारे बीच हुआ
रह-ए-वक़ार पे बैठे थे आइने ले कर
जिन्हें सबात पे कोई भी इख़्तियार न था
थमा के हाथ में ग़म के बुराक़-ए-दिल की अनाँ
निकल गए न रूके रूह की हदों से इधर
फ़लक के कोहना दरीचे सलाम करते रहे

मगर चराग़ का साया अभी वजूद में है
ज़रूर अपने हिसारों में लेगा नूर-ए-दिमाग़
सहर के वक़्त बढ़ेगा ग़ुनूदगी का असर
दराज़ होगा वहीं दर्द के शबाब का क़द
मिला ग़ुबार की सूरत जहाँ नसीब का फल
जहाँ शिकार हुआ है मिरी ज़बाँ का हुनर
वहीं से ढूँढ लाएँगे आदमी की ख़बर
उठेंगे मौत से पहले उसी सफ़र के लिए

प्यासा ऊँट

जिस वक़्त महार उठाई थी मेरा ऊँट भी प्यासा था
मश्कीज़े में ख़ून भरा था आँख में सहरा फैला था
ख़ुश्क बबूलों की शाख़ों पर साँप ने हल्क़े डाले थे
जिन की सुर्ख़ ज़बानों से पत्तों ने ज़हरी कशीद किया
काली गर्दन पीली आँखों वाली बन की एक चुड़ैल
नीले पंजों वाले नाख़ुन जिन के अंदर चिकना मैल
एक चटोरा ख़ुश्क लहू का उस में लाखों रेंगते बिच्छू
हम दोनों ने तेज़ किए थे ऊपर नीचे वाले दाँत
ख़ुश्क लहू को काट के खाया और पिया फिर मश्कीज़ा
उस के बाद अचानक देखा सहरा ख़ून का दरिया था
मैं और डाएन साँप और बिच्छू सब कुछ उस में डूब रहे थे
लेकिन ऊँट वो प्यासा मेरा हम से डर कर भाग गया

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