अली सरदार जाफ़री की रचनाएँ

तरान-ए-उर्दू 

हमारी प्यारी ज़बान उर्दू
हमारे नग़्मों की जान उर्दू
हसीन दिलकश जवान उर्दू
यह वह ज़बाँ है कि जिसको गंगा के जल से पाकीज़गी मिली है
अवध की ठण्डी हवा के झोंकों में जिसके दिल की कली खिली है
जो शे’रो-नग़मा के खुल्दज़ारों मे आज कोयल-सी कूकती है
हमारी प्यारी ज़बान उर्दू
हमारे नग़्मों की जान उर्दू
हसीन दिलकश जवान उर्दू
इसी ज़बाँ में हमारे बचपन ने माँओं से लोरियाँ सुनी हैं
जवान होकर इसी ज़बाँ में कहानियाँ इश्क़ ने कही हैं
इसी ज़बाँ के चमकते हीरों से इल्म की झोलियाँ भरी हैं
हमारी प्यारी ज़बान उर्दू
हमारे नग़्मों की जान उर्दू
हसीन दिलकश जवान उर्दू
यह वह ज़बाँ है कि जिसने ज़िन्दाँ की तीरगी में दिये जलाये
यह वह ज़बाँ है कि जिसके शो’लों से जल गये फाँसियों के साये
फ़राज़े-दारो-रसन[1] से भी हमने सरफ़रोशी के गीत गाये
हमारी प्यारी ज़बान उर्दू
हमारे नग़्मों की जान उर्दू
हसीन दिलकश जवान उर्दू
चले हैं गंगो-जमन की वादी से हम हवाए-बहार बनकर
हिमालया से उतर रहे हैं तरान-ए-आबशार[2]
बनकर
रवाँ हैं हिन्दोस्ताँ की रग-रग में ख़ून की सुर्ख़ घार बनकर
हमारी प्यारी ज़बान उर्दू
हमारे नग़्मों की जान उर्दू
हसीन दिलकश जवान उर्दू

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें सूली की रस्सी की ऊँचाई
  2. ऊपर जायें झरना

हाथों का तराना

इन हाथों की ताज़ीम[1] करो
इन हाथों की तकरीम[2] करो
दुनिया को चलाने वाले हैं
इन हाथों को तस्लीम[3] करो

तारीख़ के और मशीनों के, पहियों की रवानी इनसे है
तहज़ीब की और तमद्दुन की, भरपूर जवानी इनसे है
दुनिया का फ़साना इनसे है, इन्साँ की कहानी इनसे है
इन हाथों की ताज़ीम[4] करो

सदियों से गुज़र कर आये हैं, ये नेक और बद को जानते हैं
ये दोस्त हैं सारे आलम के, पर दुश्मन को पहचानते हैं
खुद शक्ति का अवतार हैं ये, कब गैर की शक्ति मानते हैं
इन हाथों की ताज़ीम करो

है ज़ख़्म हमारे हाथों के, ये फूल जो हैं गुलदानों में
सूखे हुए प्यासे चुल्लू थे, जो जाम हैं अब मयख़ानों में
टूटी हुई सौ अँगडा़इयों की, मेहराबें[5] हैं ऐवानों[6] में
इन हाथों की ताज़ीम करो

राहों की सुनहरी रौशनियाँ, बिजली के जो फैले दामन हैं
फ़ानूस हसीं ऐवानों के, जो रंग और नूर के ख़िरमन[7] हैं
ये हाथ हमारे जलते हैं, यह हाथ हमारे रौशन हैं
इन हाथों की ताज़ीम करो

खा़मोश हैं ये, खा़मोशी से, सौ बर्बत-ओ-चंग[8] बनाते हैं
तारों में राग सुलाते हैं, तबलों में बोल छुपाते हैं
जब साज़ में जुम्बिश होती है, तब हाथ हमारे गाते हैं
इन हाथों की ताज़ीम करो

एजाज़[9] है ये इन हाथों का, रेशम को छुएँ तो आँचल है
पत्थर को छुएँ तो बुत कर दें, कालिख को छुएँ तो काजल है
मिट्टी को छुएँ तो सोना है, चाँदी को छुएँ तो पायल है
इन हाथों की ताज़ीम करो

बहती हुई बिजली की लहरें, सिमटे हुए गंगा के धारे
धरती के मुक़द्दर के मालिक, मेहनत के उफ़क[10] के सय्यारे[11]
यह चारागराने-दर्दे-जहाँ, सदियों से मगर ख़ुद बेचारे
इन हाथों की ताज़ीम करो

तख़्लीक़[12] यह सोज़े-मेहनत की, और फ़ितरत के शहकार भी हैं
मैदाने-अमल में लेकिन खु़द, ये खा़लिक़ भी मे’मार भी हैं
फूलों से भरे ये शाख़ भी हैं और चलती हुई तलवार भी हैं
इन हाथों की ताज़ीम करो

ये हाथ न हों तो मुहमल[13] सब, तहरीरें और तक़रीरें हैं
ये हाथ न हों तो बेमानी, इन्सानों की तक़दीरें हैं
सब हिकमतो-दानिश, इल्मो-हुनर, इन हाथों की तफ़सीरें[14] हैं
इन हाथों की ताज़ीम करो

ये कितने सबुक और नाज़ुक हैं, ये कितने सुडौल और अच्छे हैं
चालाकी में उस्ताद हैं ये, और भोलेपन में बच्चे हैं
इस झुठ की गन्दी दुनिया में, बस हाथ हमारे सच्चे हैं
इन हाथों की ताज़ीम करो

यह सरहद-सरहद जुड़ते हैं और मुल्कों-मुल्कों जाते हैं
बाँहों में बाँहें डालते हैं और दिल को दिल से मिलाते हैं
फिर ज़ुल्मो-सितम के पैरों की ज़ंजीरे-गराँ[15] बन जाते हैं
इन हाथों की ताज़ीम करो

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायेंसम्मान
  2. ऊपर जायेंआदर-सत्कार
  3. ऊपर जायेंस्वीकार
  4. ऊपर जायेंआदर
  5. ऊपर जायेंदीवार में चीजें रखने के लिए बनी जगह
  6. ऊपर जायेंमहलों में
  7. ऊपर जायेंपैदावर
  8. ऊपर जायेंएक तरह का बाजा
  9. ऊपर जायेंचमत्कार
  10. ऊपर जायेंक्षितिज
  11. ऊपर जायेंक्षितिज पर घूमने वाले तारे
  12. ऊपर जायेंसृष्टि
  13. ऊपर जायेंअर्थहीन
  14. ऊपर जायेंटिप्पणी
  15. ऊपर जायेंभारी ज़ंजीरें

पत्थर की दीवार

क्या कहूँ भयानक है
या हसीं है यह मंज़र
ख़्वाब है कि बेदारी
कुछ पता नहीं चलता
फूल भी है साये भी
खा़क भी है पानी भी
आदमी भी मेहनत भी
गीत भी हैं आँसू भी
फिर भी एक ख़ामोशी
रूहो-दिल की तनहाई
इक तवील [1]सन्नाटा
जैसे साँप लहराये
माहो-साल आते हैं
और दिन निकलते हैं
जैसे दिल की बस्ती से
अजनबी गुज़र जाए

चीख़ती हुई घडि़याँ
ज़ख्म-ख़ुर्दा ताइर[2] हैं
नर्मरौ२[3] सबुक[4] लमहे[5]
मुंजमिद सितारे हैं
रेंगती हैं तारीख़ें
रोज़ो-शब की राहों पर
ढँढ़ते हैं चश्मो-दिल
नक़्शे-पा नहीं मिलते
ज़िन्दगी के गुलदस्ते
ज़ेबे-ताके़-निस्याँ [6]हैं

पत्तियों की पलकों पर
ओस जगमाती है
इमलियों के पेडो़ पर
घूप पर सुखाती है
आफ़ताब हाँसता है
मुस्कराते हैं तारे
चाँद के कटोरे से
चाँदनी छलकती है
जेल की फ़ज़ाओं में
फिर भी इक अँधेरा है
जैसे रेत में गिर कर
दूध जज़्ब हो जाए
रौशनी के गालों पर
तीरगी के नाख़ुन की
सैकड़ों ख़राशें हैं

पत्थर की दीवारें

बारिकों की तामीरें
अज़दहों [7] के पैकर[8] हैं
जो नये असीरों[9] को
रात-दिन निगलते हैं
उनके पेट की दोज़ख़
कोई भर नहीं सकता

पत्थर की दीवारें

भूक का भयानक रूप
चक्कियों के भद्दे राग
रोटियों के दाँतों में
रेत और कंकर हैं
दाल के पियालों में
ज़र्द-ज़र्द पानी है
चावलों की सूरत पर
मुफ़लिसी बरसती है
सब्ज़ियों के ज़ख़्मों से
पीप-सी टपकती है

पत्थर की दीवारें

दर्दो-ग़म के परों में
आँसुओं की ज़ंजीरें
बेबसी की महफ़िल में
हसरतों की तक़रीरें
रस्सियों की गाँठों में
बाज़ुओं की गोलाई
नींम-जान क़दमों में
बेड़ियों की शहनाई
हथकड़ी के हल्कों[10] में
हाथ कसमसाते हैं
फाँसियों के फन्दों में
गरदनें तड़पती हैं

पत्थर की दीवारें

जो कभी नहीं रोतीं
जो कभी नहीं हँसतीं
उनके सख़्त चेहरे पर
रंग है न गा़ज़ा है
खुरदरे लबों पर सिर्फ़
बेहिसी की मुहरें हैं

पत्थर की दीवारें

पत्थरों के फ़र्श और छत
पत्थरों की मेहराबें
पत्थरों की पेशानी
पत्थरों की आँखें हैं
पत्थरों के दरवाज़े
पत्थरों की अँगड़ाई
पत्थरों के पंजों में
आहनी[11]सलाख़ें हैं

और इन सलाख़ों में
हसरतें तमन्नाएँ
आरज़ुएँ उम्मीदें
ख़्वाब और ताबीरें
अश्क फूल और शबनम
चाँद की जवाँ नज़रें
धूप की सुनहरी ज़ुल्फ़
बादलों की परछाई
सुब्‌हो-शाम की परियाँ
मौसमों की लैलाएँ
सूलियों पे चढ़ती हैं

और इस अँधेरे में
सूलियों के साये में
इन्क़िलाब पलता है
तीरगी[12] के काँटों पर
आफ़ताब चलता है
पत्थरों के सीने से
सुर्ख हाथ उगते हैं
हाथ हैं कि तलवारें
रात के अँधेरे में
जैसे शम्‌अ़ जलती है
उँगलियाँ फिरोज़ाँ हैं
बारिकों के कोनों से
साजिशें निकलती हैं
ख़ामुशी की नब्ज़ों में
घण्टियाँ-सी बजती हैं

जाने कैसे क़ैदी हैं
किस जहाँ से आये हैं
नाख़ुनों में कीलें हैं
हड्डियाँ शिकस्ता हैं
नौजवान जिस्मों पर
पैरहन[13]हैं ज़ख्मों के
जगमगाते माथों पर
ख़ून की लकीरें हैं
अश्क आग के क़तरे
साँस तुन्द[14] आँधी है
बात है कि तूफ़ाँ है
अबरुओं की जुम्बिश में
अ़ज़्म[15]मुस्कराते हैं
और निगह की लरज़िश में
हौसले मचलते हैं
त्योरियों की शिकनों में
नक़्शे-पा बग़ावत के

जितना ज़ुल्म सहते हैं
और मुस्कराते हैं
जितना दुःख उठाते हैं
और गीत गाते हैं
जब्र और बढ़ता है
ज़ह्र और चढ़ता है
ज़ालिमों की शिद्दत पर
ज़ुल्म चीख़ उठता है।
उनके लब नहीं हिलते
उनके सर नहीं झुकते
दिल से आह के बदले
इक सदा निकलती है
‘इन्क़िलाब ज़िन्दाबाद’

ख़ाके-पाक[16]के बेटे
खेतियों के रखवाले
हाथ कारख़ानों के
इन्क़िलाब के शहपर
कोहसार के शाहीं
पत्थरों की कोरों पर
आँधियों की राहों पर
बिजलियों की बारिश में
गोलियों के तूफ़ाँ में
सर उठाये बैठे हैं

इन्क़िलाब-सामाँ है
हिन्द की फ़ज़ा सारी
नज़्‌अ़ के है आलम में
यह निज़ामे-ज़रदारी
वक़्त के महल में है
जश्ने-नौ की तैयारी
जश्ने-आम जुम्हूरी
इक़्तिदारे-मज़दूरी
ग़र्के़-आतिशो-आहन
बेबसी-ओ-मजबूरी
मुफ़लिसी-ओ-नादारी
तीरगी के बादल से
जुगनुओं की बारिश है
रक़्स में शरारे हैं
हर तरफ़ अँधेरा है
और इस अँधेरे में
हर तरफ़ शरारे हैं
कोई कह नहीं सकता
कौन-सा शरारा कब
बेक़रार हो जाए
शो’लाबार हो जाए
इन्क़िलाब आ जाए

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें लम्बा
  2. ऊपर जायें घाव खाया हुआ पक्षी
  3. ऊपर जायें मन्दगति
  4. ऊपर जायें द्रुतगति
  5. ऊपर जायें क्षण
  6. ऊपर जायें विस्मृति के आले में सजे हुए हैं
  7. ऊपर जायें अजगरों
  8. ऊपर जायें शरीर
  9. ऊपर जायें क़ैदियों
  10. ऊपर जायें गोलाइयाँ
  11. ऊपर जायें लोहे की
  12. ऊपर जायें अँधेरे
  13. ऊपर जायें वस्त्र
  14. ऊपर जायें प्रचण्ड
  15. ऊपर जायें संकल्प
  16. ऊपर जायें पवित्र

अनाज 

मेरी आशिक़ हैं किसानों की हसीं कन्याएँ
जिनके आँचल ने मुहब्बत से उठाया मुझको
खेत को साफ़ किया, नर्म किया मिट्टी को
और फिर कोख़ में धरती की सुलाया मुझको
ख़ाक-दर-ख़ाक हर-इक तह में टटोला लेकिन
मौत के ढूँढ़ते हाथों ने न पाया मुझको
ख़ाक से लेके उठा मुझको मिरा ज़ौके़-नुमू[1]
सब्ज़ कोंपल ने हथेली में छुपाया मुझको
मौत से दूर मगर मौत की इक नींद के बाद
जुम्बिशे-बादे-बहारी ने जगाया मुझको
बालियाँ फूलीं तो खेतों पे जवानी आयी
उन परीज़ादों ने बालों में सजाया मुझको
मेरे सीने में भरा सुर्ख़ किरन ने सोना
अपने झूले में हवाओं ने झुलाय मुझको
मैं रकाबी में, प्यालों में महक सकता हूँ
चाहिए बस लबो-रुख़सार[2] का साया मुझको

मेरी आ़शिक़ हैं किसानों की हसीं कन्याएँ
गोद से उनकी कोई छीन के लाया मुझको
हवसे-ज़र ने मुझे आग में फूँका है कभी
कभी बाज़ार में नीलाम चढ़ाया मुझको
कैद रखा कभी लोहे में कभी पत्थर में
कभी गोदामों की क़ब्रों में दबाया मुझको
सी के बोरों में मुझे फेंका है तहख़ानों में
चोर बाज़ार कभी रास न आया मुझको
वो तरसते हैं मुझे और मैं तरसता हूँ उन्हें
जिनके हाथों की हरारत ने उगाया मुझको
क्या हुए आज मेरे नाज़ उठानेवाले
है कहाँ क़ैदे-गुलामी से छुड़ानेवाले

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें विकसित होने का आनन्द
  2. ऊपर जायें होंठ और गाल

लम्हों के चिराग़ 

वो नींद की तरह नर्म सब्ज़ा
ख़्वाबों की तरह रमीदा१ शबनम
फूलों की तरह शिगुफ़्ता चेहरे
खुशबू की तरह लतीफ़ बातें
किरनों की तरह जवाँ तबस्सुम
शो’ले की तरह दहकती ख़्वाहिश
तारों की तरह चमकती आग़ोश
साग़र की तरह छलकते सीने
सब क़ाफ़िला-ए-अदम२ के राही
वादि-ए-अदम में चल रहे हैं
तारीकियों कि खुले हैं परचम
लम्हों के चिराग़ जल रहे हैं
हर लम्हा हसीं और जवाँ है
हर लम्हा फ़रोग़े-जिस्मों-जाँ है
हर लम्हा अज़ीमो-जाविदाँ है


१.भागा हुआ २.परलोक जानेवाला क़ाफ़िला ३. शरीर और प्राण का प्रकाश ४.महान और शाश्वत।

बहुत क़रीब हो तुम 

बहुत करीब हो तुम, फिर भी मुझसे कितनी दूर
कि दिल कहीं है, नज़र है कहीं, कहीं तुम हो
वो जिसको पी न सकी मेरी शो’ला-आशामी१
वो कूज़ः-ए-शकर-ओ-जामे-अंगबीं२ तुम हो

मिरे मिज़ाज में आशुफ़्तगी३ सबा४ की है
मिली कली की अदा, गुल की तम्कनत५ तुमको
सबा की गोद में, फिर भी सबा से बेगाना
तमाम हुस्नो-हकी़क़त, तमाम अफ़साना

वफ़ा भी जिस पे है नाज़ाँ वो बेवफ़ा तुम हो
जो खो गयी है मिरे दिल की वो सदा तुम हो

बहुत क़रीब हो तुम, फिर भी मुझसे कितनी दूर
हिजाबे-जिस्म६ अभी है, हिजाबे-रूह७ अभी
अभी तो मंज़िले-सद-मिह्रो-माह८ बाक़ी है
हिजाबे-फ़ासिला-हाए-निगाह९ बाक़ी है
विसाले-यार अभी तक है आरज़ू का फ़रेब


१.अग्निज्वाला पीने की इच्छा २.मिठास से भरा प्याला और शहद से भरा प्याला ३.उद्विग्नता ४.समीर ५.अभिमान ६.शरीर की दूरी ७.आत्मा की दूरी ८.सैकड़ों सूर्य और चंद्रमाओं की मंज़िल ९.निगाहों की दूरियों का संकोच।

नसीम तेरी क़बा

नसीम तेरी क़बा[1], बूए-गुल[2] है पैराहन[3]
हया[4] का रंग रिदाए-बहार[5] उढ़ाता है
तेरे बदन का चमन ऐसे जगमगाता है
कि जैसे सैले-सहत, जैसे नूर का दामन
सितारे डूबते हैं चाँद झिलमिलाता है

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें चोली
  2. ऊपर जायें फूल की महक
  3. ऊपर जायें वस्त्र
  4. ऊपर जायें लज्जा
  5. ऊपर जायें बहार की चादर

लू के मौसम में बहारों की हवा माँगते हैं

लू के मौसम में बहारों की हवा माँगते हैं
हम क़फ़े-दस्ते-ख़िज़ाँ पर भी हिना माँगते हैं

हमनशीं सादादिली-हाए-तमन्ना[1] मत पूछ
बेवफ़ाओं से वफ़ाओं का सिला माँगते हैं

काश कर लेते कभी काबा-ए-दिल का भी तवाफ़
वो जो पत्थर के मकानों से ख़ुदा माँगते हैं

जिसमें हो सतवते-शाहीन की परवाज़ का रंग
लबे-शाइर से वो बुलबुल की नवा माँगते हैं

ताकि दुनिया पे खुले उनका फ़रेबे-इंसाफ़
बेख़ता होके ख़ताओं की सज़ा माँगते हैं

तीरगी जितनी बढ़े हुस्न हो अफ़ज़ूँ तेरा
कहकशाँ माँग में, माथे पे ज़िया माँगते हैं

यह है वारफ़्तगिए-शौक़[2] का आलम ‘सरदार’
बारिशे-संग[3] है और बादे-सबा माँगते हैं

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें इच्छा की सरलताएँ
  2. ऊपर जायें प्रेम की बेसुधी
  3. ऊपर जायें पत्थरों की बारिश

करिश्मा

करिश्मा

मिरे लहू में जो तौरैत[1] का तरन्नुम है
मिरी रगों में जो यह ज़मज़मः ज़ुबूर[2] का है
यह सब यहूदो-नसारा के ख़ूँ की लहरें हैं
मचल रही हैं, जो मेरे लहू की गंगा में

मैं साँस लेता हूँ जिन फेफड़ों की जुम्बिश से
किसी मुगन्नि-ए-आतश-नफ़स[3] ने बख़्शे हैं
ज़वाँ है मुसहफ़े-यज़दाँ का लह्‌ने-दाऊदी

किसी की नर्गिसी आँखों का नर्गिसी पर्दा
मिरी नज़र को अता कर रहा है बीनाई
निगाहे-शौक़ की है बेकरारियाँ क्या-क्या
तुलूए-मिह्र की हैं नक़्शकारियाँ क्या-क्या
महो-नुजूम की हैं ज़ल्वः-बारियाँ क्या-क्या
ज़मीं से ता-ब-फ़लक रक़्स में हैं लैलाएँ
शिगुफ़्ता सूरते-गुल, हर तरफ़ तमन्नाएँ

ख़ुदा का शुक्र अदा जब ज़बान करती है
तो दिल तड़पता है इक ऐसी क़ाफ़िरा के लिए
खु़दा भी मेरी तरह, जिस को प्यार करता है
वो जिस्मे-नाज़, युहिब्बुल-ज़माल का नग़्मा
वो सर से पाँव तलक माहो-साल का नग़्मा
जलाले-हिज्रो-शिकोहे-विसाल का नग़्मा
जहाने-इश्क़ में, तफ़रीके-इस्मो-ज़ात[4] नहीं
जहाने-हुस्न में तक़सीमे-हिन्द-ओ-पाक नहीं
सिवा गुलों के गिरीबाँ किसी का चाक नहीं
यह आलमे-बशरी, एहतिराम का आलम
तमामतर है दुरूद-ओ-सलाम का आलम
नफ़स-नफ़स में मिरे ज़मज़मः महब्बत का
मिरा वुजूद, क़सीदा बशर की अज़्मत का
ये सब करिश्मा है, इन्सानियत की वहदत[5] का

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें हज़रत मूसा पर नाज़िल होनेवाली आस्मानी किताब
  2. ऊपर जायें हज़रत दाऊद पर नाज़िल होनेवाली आस्मानी किताब
  3. ऊपर जायें अग्निवत स्वरोंवाला गायक
  4. ऊपर जायें नस्ल व जात-पाँत का भेदभाव
  5. ऊपर जायें एकत्व

माँ है रेशम के कारख़ाने में

माँ है रेशम के कारख़ाने में
बाप मसरूफ़ सूती मिल में है
कोख से माँ की जब से निकला है
बच्चा खोली के काले दिल में है

जब यहाँ से निकल के जाएगा
कारख़ानों के काम आएगा
अपने मजबूर पेट की ख़ातिर
भूक सरमाये की बढ़ाएगा

हाथ सोने के फूल उगलेंगे
जिस्म चान्दी का धन लुटाएगा
खिड़कियाँ होंगी बैंक की रौशन
खून इसका दिये जलाएगा

यह जो नन्हा है भोला-भाला है
खूनी सरमाये का निवाला है
पूछती है यह, इसकी ख़ामोशी
कोई मुझको बचाने वाला है !

आगे बढ़ेंगे

वो बिजली-सी चमकी, वो टूटा सितारा,
वो शोला-सा लपका, वो तड़पा शरारा,
जुनूने-बग़ावत ने दिल को उभारा,
बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!

गरजती हैं तोपें, गरजने दो इनको
दुहुल बज रहे हैं, तो बजने दो इनको,
जो हथियार सजते हैं, सजने दो इनको
बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!

कुदालों के फल, दोस्तों, तेज़ कर लो,
मुहब्बत के साग़र को लबरेज़ कर लो,
ज़रा और हिम्मत को महमेज़ कर लो,
बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!

विज़ारत की मंज़िल हमारी नहीं है,
ये आंधी है, बादे-बहारी नहीं है,
जिरह हमने तन से उतारी नहीं है,
बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!

हुकूमत के पिंदार को तोड़ना है,
असीरो-गिरफ़्तार को छोड़ना है,
जमाने की रफ्तार को मोड़ना है,
बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!

चट्टानों में राहें बनानी पड़ंेगी,
अभी कितनी कड़ियां उठानी पड़ेंगी,
हज़ारों कमानें झुकानी पड़ेंगी,
बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!

हदें हो चुकीं ख़त्म बीमो-रजा की,
मुसाफ़त से अब अज़्मे-सब्रआज़मां की,
ज़माने के माथे पे है ताबनाकी,
बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!

उफ़क़ के किनारे हुए हैं गुलाबी,
सहर की निगाहों में हैं बर्क़ताबी,
क़दम चूमने आई है कामयाबी,
बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!

मसाइब की दुनिया को पामाल करके,
जवानी के शोलों में तप के, निखर के,
ज़रा नज़्मे-गीती से ऊंचे उभर के,
बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!

महकते हुए मर्ग़ज़ारों से आगे,
लचकते हुए आबशारों से आगे,
बहिश्ते-बरीं की बहारों से आगे,
बढ़ेंगे, अभी और आगे बढ़ेंगे!

एलान-ए-जंग 

गांधी जी जंग का एलान कर दिया
बातिल से हक़ को दस्त-ओ-गरीबान कर दिया

हिन्दुस्तान में इक नयी रूह फूंककर
आज़ादी-ए-हयात का सामान कर दिया

शेख़ और बिरहमन में बढ़ाया इत्तिहाद
गोया उन्हें दो कालिब-ओ-यकजान कर दिया

ज़ुल्मो-सितम की नाव डुबोने के वास्ते
क़तरे को आंखों-आंखों में तूफ़ान कर दिया

फिर वही माँगे हुए लम्हे 

फिर वही माँगे हुए लम्हे, फिर वही जाम-ए-शराब
फिर वही तारीक रातों में ख़याल-ए-माहताब
फिर वही तारों की पेशानी पे रंग-ए-लाज़वाल
फिर वही भूली हुई बातों का धुंधला सा ख़याल
फिर वो आँखें भीगी भीगी दामन-ए-शब में उदास
फिर वो उम्मीदों के मदफ़न ज़िन्दगी के आस-पास
फिर वही फ़र्दा की बातें फिर वही मीठे सराब
फिर वही बेदार आँखें फिर वही बेदार ख़्वाब
फिर वही वारफ़्तगी तनहाई अफ़सानों का खेल
फिर वही रुख़्सार वो आग़ोश वो ज़ुल्फ़-ए-सियाह
फिर वही शहर-ए-तमन्ना फिर वही तारीक राह
ज़िन्दगी की बेबसी उफ़्फ़ वक़्त के तारीक जाल
दर्द भी छिनने लगा उम्मीद भी छिनने लगी
मुझ से मेरी आरज़ू-ए-दीद भी छिनने लगी
फिर वही तारीक माज़ी फिर वही बेकैफ़ हाल
फिर वही बेसोज़ लम्हें फिर वही जाम-ए-शराब
फिर वही तारीक रातों में ख़याल-ए-माहताब

सिर्फ़ लहरा के रह गया आँचल

सिर्फ़ लहरा के रह गया आँचल
रंग बन कर बिखर गया कोई

गर्दिश-ए-ख़ूं रगों में तेज़ हुई
दिल को छूकर गुज़र गया कोई

फूल से खिल गये तसव्वुर में
दामन-ए-शौक़ भर गया कोई

जब नहीं आए थे तुम, तब भी तो तुम आए थे

जब नहीं आए थे तुम, तब भी तो तुम आए थे
आँख में नूर की और दिल में लहू की सूरत
याद की तरह धड़कते हुए दिल की सूरत

तुम नहीं आए अभी, फिर भी तो तुम आए हो
रात के सीने में महताब के खंज़र की तरह
सुब्‍हो के हाथ में ख़ुर्शीद के सागर की तरह

तुम नहीं आओगे जब, ​फिर भी तो तुम आओगे
ज़ुल्‍फ़ दर ज़ुल्‍फ़ ​बिखर जाएगा, ​फिर रात का रंग
शब–ए–तन्‍हाई में भी लुत्‍फ़–ए–मुलाक़ात का रंग

आओ आने की करें बात, कि तुम आए हो
अब तुम आए हो तो मैं कौन सी शै नज़र करूँ
के मेरे पास सिवा मेहर–ओ–वफ़ा कुछ भी नहीं

एक दिल एक तमन्ना के सिवा कुछ भी नहीं

हम भी शराबी, तुम भी शराबी /

हम भी शराबी, तुम भी शराबी
छलके गुलाबी, छलके गुलाबी
तक़्दीर दिल कि ख़ाना ख़राबी
जब तक है जीना खुश हो के जी लें
जब तक है पीना जी भर के पी लें
हरत न कोइ रह जाये बाक़ी
कल सुबह के दामन में, तुम होगे न हुम होंगे
बस रेत के सीने पर कुछ नक्श क़दम होंगे
बस रात भर के मेहमान हम हैं
ज़ुल्फ़ों में शब के थोडे से कम हैं
बाक़ी रहेगा सागर न साक़ी

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