अवधेश कुमार की रचनाएँ

मिलो दोस्त, जल्दी मिलो 

सुबह–एक हल्की-सी चीख़ की तरह
बहुत पीली और उदास धरती की करवट में
पूरब की तरफ़ एक जमुहाई की तरह
मनहूस दिन की शुरुआत में खिल पड़ी ।

मैं ग़रीब, मेरी जेब ग़रीब पर इरादे ग़रम
लू के थपेड़ों से झुलसती हुई आँखों में
दावानल की तरह सुलगती उम्मीद ।

गुमशुदा होकर इस शहर की भीड़ को
ठेंगा दिखाते हुए न जाने कितने नौजवान
कब कहाँ चढ़े बसों में ओर कहाँ उतरे
जाकर : यह कोई नहीं जानता ।

कल मेरे पास कुछ पैसे होंगे
बसों में भीड़ कम होगी
संसद की छुट्टी रहेगी
सप्ताह-भर के हादसों का निपटारा
हो चुकेगा सुबह-सुबह
अख़बारों की भगोड़ी पीठ पर लिखा हुआ ।

सड़कें ख़ाली होने की हद तक बहुत कम
भरी होंगी : पूरी तरह भरी होगी दोपहर
जलाती हुई इस शहर का कलेजा ।

और किस-किस का कलेजा नहीं जलाती हुई ।
यह दोपहर आदमी को नाकामयाब करने की
हद तक डराती हुई उसके शरीर के चारों तरफ़ ।

मिलो दोस्त, जल्दी मिलो
मैं ग़रीब, तुम ग़रीब
पर हमारे इरादे ग़रम ।

फ़ोन

नौमंज़िला इमारत चढ़ने में लगता है समय
जितना कि नौमंज़िला कविता लिखने में नहीं लगता ।

नौ मंज़िल चढ़कर मिला मैं जिस आदमी से
उससे मिला था मैं ज़मीन पर अपने बचपन में ।
वहीं पर उससे दोस्ती हुई थी।

इतनी दूर-
और नौ मंज़िल ऊपर
नहीं मिल पाता जब मैं उस दोस्त से, वह मुझे
जब बहुत दिनों बाद मिलता है
तो पूछता है कि
क्यों नहीं कर लिया मैंने उसको फ़ोन ?

बच्चा 

बच्चा अपने आपसे कम से कम क्या मांग सकता है ?

एक चांद
एक शेर
किसी परीकथा में अपनी हिस्सेदारी
या आपका जूता !

आप उसे ज़्यादा से ज़्यादा क्या दे सकते हैं ?

आप उसे दे सकते हैं केवल एक चीज़ –
अपना जूता : बाक़ी तीन
चीज़ें आप क़िताब के हवाले कर देते हैं ।

कि फिर वह बच्चा ज़िन्दगी भर सोचता रह जाता है
कि अपना पैर किस में डाले
उस क़िताब में या आपके जूते में !

लड़ाई 

अपने हाथ काटे,
उन्हें फैला कर कुर्सी के हत्थों पर रखा
और सभासदों से कहा–
“लो, बांधो इन्हें ।”

अपने पैर काटे,
रास्ते पर उन्हें जूतों समेत टिकाया
और लोगों से कहा–
“चलाओ इन्हें ।”

अपना सिर काटा,
एक थाली में सजा कर रख आया उसे
अपने एक पड़ोसी के दरवाज़े पर : काग़ज़ की
एक पुर्जी लिखकर–
“लो, निबटो इससे ।”

समूचा मुझे कोई नहीं नोचता
समूचा मुझसे कोई नहीं टकराना चाहता।
उन्हें चाहिए मेरा कोई अंश
उनके अपने मतलब का : वह भी
अप्रत्यक्ष रूप में उपलब्ध ।
उसके लिए मुझे
किसी न किसी माध्यम का सहारा लेना पड़ता है।

तब मैं अपने धड़ को मैदान में रख देता हूँ
और आवाज़ लगाता हूँ–
“आओ दोस्तो,
अपने-अपने निर्णय सुनाओ इसे ।”

बाँस के तहख़ाने

रगड़ खाते हैं बाँस :
आपस में ही
क्या वे शत्रु हैं ?
अपने ही ।

या अपने भारी हो आए, कठोर
पैरों को, गहराई तक धँसी पीड़ा की
जकड़न से छुड़ाना चाहते हैं ।

हवा,
किसी आग लगी फिरकन्नी की तरह
उनके बाज़ुओं और कानों के पास
सरसराती : जैसे
किसी आवाज़ को छीलती हो ।

एक हल्ला-सा है, आपस में ही
लिपटते, रगड़ खाते जंगली बाँसों में ।

वे कहीं भी हों, शहर के किसी कोने में
किसी चौराहे पर या रास्ते के
किनारे, कुछ छुपे हुए से : आग
लगती है हमेशा, हर परिस्थिति में
जब वे झूमते हैं, और
एक दूसरे से लिपटते हैं ।

सम्बन्ध छिलते हैं
आवाज़ होती है; क्या
सँघर्ष यही है।

फिर आग बुझती भी है,
काली पड़ जाती है ।

नए बाँस अपने पूर्वजों की गाँठों से
उगते हैं, बड़े होते हैं और
एक-दूसरे से कस कर लिपट जाते हैं ।

आग का संस्कार एक है
और इतिहास भी नहीं बदलता ।

हवा,
इन्हीं के पास आकर
आवाज़ों को छीलती है ।

पूरी तरह बाँस खोखले नहीं होते
उनके भीतर ख़ालीपन ज़रूर होता है,
वे अपने पोर-पोर शरीर को
आपस में जोड़ते
उनमें से पोर-पोर
उगाते, ऊपर बढ़ते हैं ।

पोरों के भीतर के खोखलेपन का
शायद हवा को पता चल जाता है : वह
पहले बाँस को ठोक बजाकर देखती है
और तब उसके जिस्म को
छीलती हुई उसमें घुस जाना चाहती है ।

हल्ला वहीं पर होता है
आवाज़ तभी आती है ׃ एक खोखलेपन
को बाँट कर दूसरा या तीसरा
ख़ालीपन बसाती है ।

आवाज़ सरसराने की नहीं
झींकने की, फिर नफ़रत की
और फिर तब वही आग ।

क्या बाँस यह सब जानते हैं ?
और अपनी-अपनी गाँठ को खोलकर
अपने खोखलेपन को
उसी तरह उजागर कर देना चाहते हैं ।

हवा छीलती है आवाज़ को
और किर्ची हुई हवा बाँस की गाँठ के नीचे
हर खोखले तहख़ाने में
आग लगा देती है ।

इतिहास जलता है : पर समय
वह बाँस के तहख़ानों में
फिर से जा समाया है ।

रगड़ खाते हैं बाँस, क्या इसीलिए
कि वे अपने खण्ड-खण्ड समय के
इन तहख़ानों को खोल कर देखें ।

समय क्यों बार-बार और बराबर
उनके भीतर घुसता चला जाता है ।

वह अपने को
इस तरह छुपाने की यह नाकाम कोशिश
क्यों करता है, जबकि वह
समूचा का समूचा बाहर छूट गया है ।

हर जगह, हर वक़्त
समय को महसूस किया जाता है
बाहर हवा क्यों चीख़ती है ?
बाँस क्यों जल जाते हैं ?

वे शत्रु हैं किसके : ज़मीन के
हवा के या कायर समय के
और तहख़ानों में दबे इतिहास के
या अपनी विवशता को
वे एक-दूसरे के कन्धे दबा कर
सहज करना चाहते हैं : वे ठीक
करते हैं : आग लगती है तो
ठीक होता है : सब कुछ एक बार
जल जाता है ।

लेकिन अफ़सोस, ये नए बाँस
वे फिर से वैसे के वैसे ही
रह जाते हैं ।

इतिहास
अपने खोखले तहख़ाने
बना लेता है ।

वक़्त
उनकी गाँठों का सिरा
पकड़ लेता है, और
हवा अपने दाँत चबाने लगती है ।

रगड़ खाते हैं बाँस :
आपस में ही
क्या वे शत्रु हैं ?
अपने ही ।

उग रही है घास

उग रही है घास
मौक़ा है जहाँ
चुपचाप

जहाँ मिट्टी में जरा-सी जान है
जहाँ पानी का जरा-सा नाम है
जहाँ इच्छा है जरा-सी धूप में
हवा का भी बस जरा-सा काम

बन रहा आवास
मौक़ा है जहाँ
चुपचाप

पेड़-सी ऊँची नहीं ये बात है
एक तिनका है बहुत छोटा
बाढ़ में सब जल सहित उखड़े
एक तिनका ये नहीं टूटा

पल रहा विश्वास
मौक़ा है जहाँ
चुपचाप

जितने सूरज उतनी ही छायाएँ 

जितने सूरज उतनी ही छायाएँ
मैं हूँ उन सब छायाओं का जोड़
सूरज के भीतर का हूँ अँधियारा
छोटे-छोटे अंधियारों का जोड़

नंगे पाँव चली आहट उन्माद की
पार जिसे करनी घाटी अवसाद की
एक द्वन्द्व का भँवर समय की कोख में
नाव जहाँ डूबी है यह सम्वाद की

जितने द्वन्द्व कि उतनी ही भाषाएँ
मैं हूँ उन सब भाषाओँ का जोड़
जितने सूरज उतनी ….

फूल काँच मुर्गा वगैरह

डाली से टूटने के बाद यह फूल
इतने दिन तक खिला रहा ।
टूटने के बाद ज़रा भी नहीं खिला मैं ।

काँच के ऊपर इतनी धूल जमने के बाद भी
चमक ज्यों की त्यों बनी रही काँच पर

अपनी धूल झाड़ने के बाद भी मैं रद्दी हो गया।

गर्दन कट जाने के बाद भी मुर्गा दौड़ता रहा
अकड़ के साथ ख़ून के फौव्वारे छोड़ता हुआ
इस बन्द कमरे में।

लिखे जाने से पहले शब्द कितने स्वतन्त्र थे
लिखे जाने के तुरन्त बाद वे मेरी बात की मृत्यु हो गए ।

चुपचाप मैं कोशिश करने लगा बनने की फूल
काँच, मुर्गा और शब्द वगैरह : कोई मरी हुई
चीज़ ताज़ी ; आज़ाद रहे बहुत देर तक

रहे बहुत देर तक मरने के बाद भी ।

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