अशोक लव की रचनाएँ

कैसे- कैसे पल

डगमगाते पग
नन्हें शिशु
तुतलाती ध्वनियाँ
स्नेह भरी कल-कल बहती नदी
अंतर्मन में समा-समा जाती
निश्छल मुस्कानें!

उफ़!
खो गए तुतलाते स्वर

सूख गई नदी
तार-तार अंतर्मन
न सहने
न कहने की स्थिति.

तुतलाते स्वरों ने सीख लिए
शब्द
बोलते हैं अनवरत धारा प्रवाह
सिखाया था उन्हें ठीक-ठीक बोलना
अब वे बात-बात पर
सिखाते हैं.

नदी आँगन छोड़
कहीं ओर बहने लगी है
किन्हीं अन्य गलियों को
सजाने लगी है.

मुस्कानें
अपनी परिभाषा भूल गई हैं
मुस्कराने के प्रयास में
सूखे अधरों पर जमी
पपड़ियाँ फट जाती हैं
अधरों तक आते-आते
मुस्कानें रुक जाती हैं.

पसरा एकांत
बांय-बांय करता
घर-आँगन को लीलता
पल-पल
पैर फैलाए बढ़ता जाता है
कोना-कोना
लीलता जाता है.

कैसे – कैसे दिन
कैसे- कैसे पल उतर आते हैं
कैसे-कैसे रंग छितर जाते हैं !

प्यासे जीवनों के पनघट !

कतारों की कतारें
अभावों से बोझिल क़दमों के संग
सूखे होठों की पपड़ियों को
सूखी जीभ से गीलेपन का अहसास दिलाते
प्यासी आँखों में पानी के सपने लिए
कुएँ को घेरे
प्रतीक्षारत !
कुएँ में झाँकती
प्यासी आशाएँ
कुएँ की दीवारों से टकराते
झनझनाते खाली बर्तन.
बिखरती आशाओं
प्यासे जीवनों के पनघट !
असहाय ताकते
जनसमूह
शायद..शायद ..होठों को तर करके
हलक से नीचे तक उतर जाए
पानी !!

तुमने कुछ नहीं कहा

तुम्हारे चले जाने से पूर्व
तुमसे कितनी-कितनी बातें करनी थीं
कितना कुछ जानना था ।

हमारे मध्य विवशता विद्यमान थी
तुम बोलने में असमर्थ थी
और मैं
वर्षों संग जिए क्षणों को जी लेना चाहता था
मृत्यु तुम्हारे सिरहाने मंडरा रही थी
मैं तुम्हें बताना चाहता था
पर बताने की सामर्थ्य कहाँ थी !
बता भी देता तो क्या होता !
विदा के क्षण और पीड़ामय हो जाते।

झूठे आश्वासनों को तुम सुनती थी
और मैं प्रतिदिन आश्वासन देता चला जाता था।
तुम्हारे सिर पर हाथ फेरते हुए
तुम्हारे अश्रु-कणों को पोंछते हुए
देखता था –
तुम्हारी आँखों में
फिर से मेरे साथ जीने की ललक के स्वप्न,
मेरे हाथों पर अभी भी है
तुम्हारे हाथों के कसाव की गर्माहट
पर विवशता थी
तुम्हें अकेले छोड़ने की
अस्पताल के अपरिचित डाक्टरों – नर्सों के पास।

कितने-कितने वर्षों के चित्र
आँखों के समक्ष तैरते
बेंच पर अकेले बैठे
अश्रुकणों के अविरल प्रवाहों के संग
तुम तैरती रहती मेरी स्मृतियों में।

एक-एक दिन आता
मैं हर पल मरता जाता
और जिस क्षण तुमने अंतिम श्वास लिए
और तुम्हारे हाथ का कसाव ढीला पड़ गया
तुम्हारे संग ही
मेरा संसार भी मर गया।

बस यही कसक लिए जीने की विवशता है
तुमने जाने से पूर्व कुछ नहीं कहा
कहती भी कैसे –
मुख पर लगी ट्यूब्स ने
तुम्हें बोलने ही नहीं दिया।
किसी के बिना कैसे जीवित रहा जा सकता है
किसी पुस्तक में नहीं लिखा है
तुम बोल सकती तो बता जाती।

कुछ छिन रहा है 

घबराहट है
वेदना है
छटपटाहट है
छिन रहा है
बहुत-बहुत प्रिय।

और विवशता है कि
असहाय हैं
मूक दर्शक हैं
न रोक पाने की सामर्थ्य है
न हठ करने का साहस
बस निवेदन और निवेदन
प्रार्थनाएँ ही प्रार्थनाएँ !

कितना असहाय हो जाता है
मनुष्य
और नियति को स्वीकार करने को
हो जाता है बाध्य।

रंगहीन

हिल गए सब रंग
रंग-बिरंगी रोशनियाँ बिखर गईं
बिखरती चली गईं।

रंगहीन
उत्साहहीन
सुबह-शाम।

क्षितिज के छोर अंधियाले
किसी के न आने की
संभावनाएँ।

बिखरन और सिर्फ़ बिखरन
मुट्ठियों से सरकते
पल-पल ।

न आहट
न दस्तक
बस
बंद किवाड़ों के पीछे
पसरा ज़िंदगी का रंगहीन कैनवस।

लड़कियाँ होती हैं लड़कियाँ

पींगों पर झूलती
झुलाती लड़कियाँ
पांवों में घुँघरू बजाती
छनछनाती लड़कियाँ
गीतों को स्वर देती
गुनगुनाती लड़कियाँ
घर-आँगन बुहारती
संवारती लड़कियाँ .

मर्यादाओं की परिभाषा
होती हैं लड़कियाँ
संस्कारों को जीती
जगाती हैं लड़कियाँ
पैरों में आसमान
झुकाती हैं लड़कियाँ.

डांगला पर बैठी शांति 

डांगला पर बैठी है भील लड़की शांति
किताबें खोले
पढ़ रही है
कर रही है स्कूल से मिला होम वर्क |

नीचे झोपड़ी में माँ है
छोटे भाई रामफल और डानी हैं
चाचा की बेटियाँ दनीषा और झूमरी हैं |
दोनों बहुत झगड़ती हैं
दोनों बहुत चिल्लाती हैं
उसकी किताबें उठाकर भाग जाती हैं |
छोटा भाई रामफल
उसकी कापियाँ छीन लेता है
कापियों के पन्नों पर खींच देता है
आड़ी-तिरछी लकीरें |

इन सबसे बचकर
आ बैठी है शांन्ति पढ़ने
नीम के पेड़ से सटे डांगला पर
बापू ने बार-बार कहने पर
ला दी हैं दो कापियां
दस-दस रुपयों वाली |

शांति देखती है
खुली कापियों-किताबों में
बड़े-बड़े सपने
दूर-दूर तक फैले
विन्ध्य पर्वत के पार की दुनिया के
और उस दुनिया में जाने के सपने

डूंगर गावँ की पुआल और खपरैल की झोपड़ियों से दूर
बसे हैं शहर दिल्ली, मुंबई
वह देखती है इन्ही किताबों में बने नक्शों पर
छूती है उन्हें अपने छोटे-छोटे हाथों से
वह रखना चाहती है उन पर
अपने पावँ |

सातवीं कक्षा में पढ़ने वाली शांति
बाँसों पर टिके
पुआल बिछे
दांगला पर बैठकर
उड़ना चाहती है
वह छूना चाहती है आसमान
इसलिए खूब पढ़ती है |

वह जाती है रोज़ाना स्कूल
चलकर चार किलोमीटर
वह लौटती स्कूल से रोज़ाना
चार किलोमीटर चलकर |

गावँ से दूर है झाबुआ शहर
वह पार करती है ऊबड़-खाबड़ रास्ते
और जाती है स्कूल
वह जानती है
यही ऊबड़-खाबड़ रास्ता
ले जायेगा एक दिन
उसके सपनों की दुनिया में
इसलिए खूब पढ़ती है शांति
मन लगाकर पढ़ती है शांति |

उड़-उड़ जाते पक्षी

पक्षी नहीं रहते सदा
एक ही स्थान पर
मौसम बदलते ही बदल लेते हैं
अपने स्थान

सर्दियों में गिरती है जब बर्फ
छोड़ देते हैं घर-आँगन
उड़ते हैं
पार करते हैं हजारों-हज़ार किलोमीटर
और तलाशते हैं
नया स्थान
सुख-सुविधाओं से पूर्ण
अनुकूल परिस्थितियों का स्थान

सूरज जब खूब तपने लगता है
धरती जब आग उगलने लगती है
सूख जाते हैं तालाब
नदियाँ बन जाती हैं क्षीण जलधाराएँ
फिर उड़ जाते हैं पक्षी
शीतल हवाओं की तलाश में
फिर उड़ते हैं पक्षी हजारों-हज़ार किलोमीटर
फिर तलाशते हैं नया स्थान
और बनाते हैं उसे अपना घर

ऋतुएं होती रहती हैं परिवर्तरित
पक्षी करते रहते हैं परिवर्तरित स्थान
पक्षियों के उड़ जाते ही
छा जाता है सन्नाटा
पंखों में नाचने वाली हवा
उदास होकर बहती है खामोशियों की गलियों में

वेदानाओं से व्यथित वृक्ष हो जाते हैं पत्थर
शापित अहल्या के समान
खिखिलाते पत्तों की हंसी को
लील जाती है काली नज़र
बन जाती है इतिहास
पक्षियों की जल-क्रीड़ाएं
उदास लहरें लेती रहती हैं
ओढ़कर निराशा की चादरें

पुनः होती है परिवर्तरित
पुनः आ जाते हैं पक्षी
हवाएँ गाने लगती हैं स्वागत गीत
चहकती हैं
अल्हड़ युवती-सी उछलती-कूदती हैं
झूमाती-झूलाती टहनी-टहनी पत्ते-पत्ते
बजने लगते हैं लहरों के घूँघरू
लौट आते हैं त्योहारों के दिन
वृक्षों, झाड़ियों नदी किनारों पर

एक तीस-सी बनी रहती है फिर भी
आशंकित रहते हैं सब
उड़ जायेंगे पुनः पक्षी एक दिन

प्रवासी पुत्र-पुत्रियाँ 

जन्म लेते हैं पुत्र
जन्म लेती हैं पुत्रियाँ
पलते हैं घर आँगन में
गूँजती हैं किलकारियाँ

पढ़ाते लिखाते
खीजती हैं माँ,खीजते हैं पिता
और देखते ही देखते
दरवाज़े की चौखट छूने लगते हैं पुत्र
माँ जितनी लम्बी दिखने लगती हैं पुत्रियाँ
घिर आती हैं पिता के मुख पर चिंताएं
पुत्रियों के विवाह की
पुत्रों को पैरों पर खड़ा करने की

पुत्रियाँ होती हैं जिम्मेदारियां
‘जितना जल्दी निपट जाएँ जिम्मेदारियां
अच्छा रहता है-‘वर्षों से हर पीढ़ी सुनती आती है
यह वाक्य
इसलिए जल्दी ब्याह दी जाती हैं पुत्रियाँ
जल्दी घर छोड़ जाती हैं पुत्रियाँ
विदा होती हैं ढेरों आशीषों के साथ
वर्षों से सहेजे कमाए धन से खरीदी वस्तुओं के साथ

मन में सपनों के इन्द्रधनुष संजोये
सुदूर चले जाते हैं पुत्र
नौकरियाँ करने
और दो चार वर्षों बाद ही कर देते हैं
माता-पिता उनका विवाह

यूं हो जाते हैं
घर आँगन से विदा
पुत्र-पुत्रियाँ और
छोड़ जाते हैं जानलेवा सन्नाटा

चुपके चुपके आता है बुढ़ापा
लीलता चला जाता है माता-पिता की देह की उर्जा
संग लाता है
घुटनों के दर्द
कमर दर्द
उच्च रक्तचाप,मधुमेह
उतर आता है आँखों में मोतियाबिंद
बढ़ता जाता है चश्मे का नंबर
सजने लगती हैं मेज़ पर किस्म-किस्म की दवाईयां

नहीं रहती
बच्चों की तरह तरह की तरकारियाँ बनाने की सिफारिशें
नहीं रहते
नए कपड़े सिलवाने,खरीदने की हठ
मेले तमाशे दिखने के अनुरोध
नहीं होती
भाई बहनों की नोक-झोंक
नहीं खरीदी जाती राखियाँ
नहीं रहती भाइयों से रुपये पाने की चाह
नहीं उड़ते होली के रंग
नहीं सजती दीपकों की पंक्तियाँ
नहीं फूटते दीपावली के अनार
नहीं घूमती चक्रियाँ,फुलझड़ियाँ

बच्चों को लेकर
कैसे कैसे सजाते हैं स्वप्न माता-पिता
और हिस्से में आ जाते हैं
उदासियों के ढेर!

आ जाते हैं जब तब बच्चों के फोन
पूछते हैं हाल चाल
करते हैं अपनी पानी गृहस्थी की बातें
अपनी अपनी व्यस्तताओं की बातें
न आ सकने की विवशताओं की बातें
माता-पिता सुनते हैं चुपचाप
बस करते हैं हूँ! हाँ!
फोन रखते ही लेते हैं ठंडी सांस
और मूँद लेते हैं,उदासियों के संग आँखें

माँ ममता के हाथों से छूना चाहती थी पुत्री को
हवा में लहराते रह जाते हैं हाथ
माँ ने सिखाया था बाल संवारना,चोटियाँ बनाना
आते में बराबर पानी मिलाना
तरकारियाँ काटना, बनाना
माँ सूनी आँखों से ताकती है
पुत्री नहीं सन्नाटा दिखाता है,पसरा हुआ
बढ़ता चला जाता है

माँ तलाशती है उधम मचाते पुत्र को
जिसकी हठ पर पकाए थे कितने कितने पकवान
खीर भरे चमचों के संग उढ़ेला था उसने
स्नेह्पूरण ममता को

पिता शुरू से ही कम बोलते थे
नहीं दिखते थे
ह्रदय में उमंगित स्नेह निर्झरों का प्रवाह
अब तो हो गए हैं एकदम खामोश
उनकी आँखों में बना लिया है सूनेपन ने
स्थायी बसेरा

प्रवासी पक्षियों के सामान
जब तब आ जाते हैं पुत्र-पुत्रियाँ
उनके आते ही आ जाते हैं
होली-दीपावली के पर्व
जगमगाने लगता है दीपकों का प्रकाश
जलने बुझने लगते हैं रंग-बिरंगे बल्ब
करने लगते हैं पटाखे शोर
चुन्धियाँ देती हैं आतिशबाज़ियाँ
चीर देती है सन्नाटा
गूँजने लगता है कोना कोना

प्रवासी पक्षी मौसम बदलते ही उड़ जाते हैं
चले जाते हैं प्रवासी पुत्र-पुत्रियाँ
रहकर दो-चार दिन!

आकाश में कतारों की कतारों में उड़ते हैं
जब-जब प्रवासी पक्षी
माता-पिता की उदास आँखों में उतर आती हैं आशाएँ
आते होंगे पुत्र
आती होंगी पुत्रियाँ

लड़कियाँ छूना चाहती हैं आसमान

लड़कियाँ छूना चाहती हैं आसमान
परन्तु उनके पंखों पर बाँध दिए गए हैं
परम्पराओं के पत्थर
ताकि वे उड़ान ना भर सकें
और कहीं छू ना लें आसमान

लड़कियों की छोटी छोटी ऑंखें
देखती हैं बड़े बड़े स्वप्न
वे देखती हैं आसमान को
आँखों ही आँखों में
नापती हैं उसकी ऊँचाइयों को

जन्म लेते ही
परिवार में जगह बनाने के लिए
हो जाता है शुरू उनका संघर्ष
और हो जाती है ज्यों ज्यों बड़ी
उनके संघर्ष का संसार बड़ता जाता है

गावों की लड़कियाँ
कस्बों-तहसीलों की लड़कियाँ
नगरों महानगरों की लड़कियाँ
लड़कियाँ तो लड़कियाँ ही होती है
उनके के लिए जंजीरों के नाप
एक जैसे ही होते हैं

लड़कियाँ पुरुषों की माद में घुसकर
उन्हें ललकारना चाहती हैं
वे उन्हें अंगड़ाई लेते समय से
परिचित कराना चाहती हैं

पुरुष उनके हर कदम के आगे
खींच देते हैं लक्ष्मण रेखाएं
लड़कियाँ जान गयीं हैं
पुरुषों के रावणत्व को
इसलिए वे
अपाहिज बन नहीं रहना चाहती बंदी
लक्ष्मण रेखाओं में
वे उन समस्त क्षेत्रों के चक्रव्यूह को भेदना
सीख रही हैं
जिनके रहस्य समेट रखे थे पुरुषों ने

वे गावों की गलियों से लेकर
संसद के गलिरायों तक की यात्रा करने लगीं हैं
उनके हृदयों में लहराने लगा है
समुद्र उत्साह
अंधड़ों की गति से
वे मार्ग कि बाधाओं को उड़ाने में
होती जा रही हैं सक्षम

वे आगे बढ़ना चाहती हैं
इसलिए पढ़ना चाहती हैं
गावों कि गलियों से निकल
स्कूलों कि ओ़र जाती लड़कियों कि कतारों कि कतारे
सडकों पर साईकिलों की घंटियाँ बजाती
लड़कियों की कतारों की कतारे
बसों में बैठी
लड़कियों की कतारों की कतारे
लिख रही हैं नया इतिहास

लोकल ट्रेनों बसों से
कालेज दफ्तरों की ओ़र जाती लड़कियाँ
समय के पंखों पर सवार होकर
बढ़ रहीं हैं छूने आसमान

उन्होंने सीख लिया है-
पुरुष्पक्षीय परम्परों के चीथड़े -चीथड़े करना
उन्होंने कर लिया है निश्चय
बदलने का अर्थों को
उन तमाम ग्रंथों में रचित लड़कियों विरोधी गीतों का
जिन्हें रचा था पुरुषों ने
अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए

लडकियाँ
अपने रक्त से लिख रही हैं
नए गीत
वे पसीने की स्याही में डुबाकर देहें
रच रही हैं
नए ग्रन्थ

वे खूब नाच चुकी हैं
पुरुषों के हाथों की कठपुतलियाँ बनकर
पुरुषों ने कहा था-लेटो
वे लेट जाती थीं
पुरुषों ने कहा था-उठो
वे उठ जाती थीं
पुरुषों के कहा था-झूमो
वे झूम जाती थीं

अब लड़कियों ने थाम लिए हैं
कठपुतलियाँ नचाते
पुरुषों के हाथ
वे अब उनके इशारों पर
ना लेटती हैं
ना उठती हैं
ना घूमती हैं
ना झूमती हैं
वे पुरुषों के एकाधिकार के तमाम क्षेत्रों में
करने लगी हैं प्रवेश
लहराने लगी हैं उन तमाम क्षेत्रों में
अपनी सफलताओं के धव्ज
गावों-कस्बों,नगरों-महानगरों की लड़कियों का
यही है अरमान
वे अब छू ही लेंगी आसमान

तुम्हारे आगमन के पश्चात

||एक||

यूँ ही रख दिया
चांदनी बयार ने अपना हाथ
अमलतास के कन्धों पर
पीले फूलों से भर गया अमलतास
महक उठा चन्दन-सा
कल तक उदास था
आज खिल उठा अमलतास

||दो||

अँधेरे जंगलों में
रूखा-सूखा खड़ा था बांस
बढ़े दो हाथ
तराशा-संवारा
अधरों से लगाया
बज उठे बांस

||तीन||

पुस्तकों के पृष्ठों में
बंदी थे शब्द
कोमल उँगलियों ने खोल दी जंजीरें
पुस्तकों से निकल आये शब्द
अधरों ने गुनगुनाये
गीत बन गूँज उठे शब्द

लहरों के कामना दीप

लहरों को सौंप दिया है कामना दीप
जहाँ चाहे ले जाएँ
उन्ही पर आश्रित हैं अब तो
कामना दीप का अस्तित्व

हथेलियों में रख कर सौंपा था
लहरों को कामना दीप
बहाकर ले जाने के लिए अपने संग
मंद मंद हिचकोले खाता
बढ़ता जाता है लहरों के संग

कामना दीप का भविष्य होता है
लहरों के हाथ
ज़रा सा प्रवाह तेज़ होते ही
डोलने लगता है
और अंततः समां जाता है लहरों में

कामना दीप सा समा जाना चाहता हूँ
सदा सदा के लिए
तुम्हारे ह्रदय की स्नेहिल लहरों में

आशिर्वादों की कामधेनु 

माँ!
जीवनदायिनी, पालनकत्री, कष्टहरणी ,संकटमोचिनी
स्नेह की कलकल बहती पावन गंगा

माँ!
ममता का सागर
लेता हिलोरें निशिवासर
भर देती निराश हृदयों में
आशाओं के इन्द्रधनुष

माँ!
उर्जावान प्रकाशमय सूर्य-सी
रखती आलोकित दुर्गम पथ
करती संचरित हृदयों में
लक्ष्यों तक पहुँचने की उर्जा

माँ!
धैर्या, सहनशीलता
हिमालय-सी विशालता समेटे
अविरल सशक्त्वान बनाने में निमग्न

माँ!
आश्रयस्थली
पोंछ देती नयनों के छलछलाते अश्रु
भर देती अधरों पर मुस्काने

माँ!
सर्दियों की कोसी-कोसी धूप
भर देती ताप
शीतल हृदयों में
खिलखिला देती घर-आँगन

माँ!
आशीर्वादों की कामधेनु
इश्वर की प्रतिरूपा
निष्कंटक कर देती जीवन-पथ

घायल हवा

थरथराती हवा
चीखती रही रात भर
खटखटाती रही दरवाज़ों कि सांकलें
रात भर

पूरा गाँव
दरवाज़ों से चिपका
बहरा बना
जागते हुए सोया रहा

रात का अँधेरा चीरता रहा
हवा का सीना
दरवाज़ों तक आकर
लौट जाती रही सिसकियाँ हवा की

दिन चढ़ा
हर दरवाज़े के बाहर
टंगी थी
लहूलुहान हवा

चिराग नहीं जलते 

हुए हस्ताक्षर
मिलाए नेताओं ने हाथ
विभाजित हो गया काग़ज़़ के टुकड़े पर
इतना बड़ा देश
लोगों से पूछा तक नहीं गया ।

विभाजित हो गए लोग
बँट गए गली-मोहल्ले, गावँ-शहर, घर-आँगन !
मर गए रिश्ते
मर गई इंसानियत
जी भरकर भोगा कामांध दरिंदों ने लड़कियों-औरतों को
तलवारों के वार से करते गए
सिर धड़ से अलग
फूँक डाले मोहल्ले के मोहल्ले
हो गए भस्म हिंसा की आग में
खानदान के खानदान ।

इस पार के
और उस पार के
राजनेताओं के हुए राज्याभिषेक
जगमगाए उनके भवनों पर रंग-बिरंगे बल्ब
नहीं जल पाए चिराग आज तक
उन घरों में
बुझ गए थे जो सन सैंतालीस में ।

खूब नचाती है राजनीति 

नशा है राजनीति
वेश्या के साथ सोने जैसा
एक के बाद दूसरी
दूसरी के बाद तीसरी
तीसरी के बाद चौथी
न ख़त्म होने का सिलसिला

जानते हैं
वेश्याओं के साथ सोने से हो सकते हैं
जानलेवा रोग
फिर भी स्खलित होने के आनंद में सोते हैं
सैंकड़ों-हज़ारों के संग सो चुकी वेश्या के साथ
कामी पुरुष

न काम की चिंता
न अपमान की चिंता
न दैहिक रोग से ग्रसित हो
तिल-तिल सड़ने की चिंता
बस दिखती है लिजलिजी देह
देहानंद के नशे में
कुछ नहीं सूझता पुरुष को

राजनीति भी ख़ूब नशीली होती है
राजनीति के नशे में दीखता है
सत्तानंद
एक बार सत्ता का सुख लग जाता है
तो मृत्युपर्यंत लगा रहता है
वेश्यागमन के सामान

राजनीति ख़ूब नचाती है
कुर्सी दिखा-दिखाकर कराती है
घोरतम अपराध
हत्याएँ, बलात्कार, भ्रष्टाचार, असत्य संभाषण,
पहनवाती हैं पाखंडी चोला
जन-जन को बरगलाने के मंत्र फूँकती है
अमर्यादित आचरण को मर्यादित सिद्ध करना चाहती है

कामी पुरुष जाता है वेश्याओं के पास
देह सुख और आनंद के लिए
और देहिक रोगों से ग्रसित हो सड़-सड़कर मर जाता है
राजनीति भी कराती है समस्त अमर्यादित आचरण
सत्ता कि गलियारों में खूब घुमाती है,दीवाना बनाती है
हँसते-हँसते भोगते हैं कारावास सत्ता के लोभी
और प्रसन्न होते हैं
दिखने, न दिखने वाले रोगों से ग्रस्त करके
सत्ता-सुख लोभियों को को चूस डालती है राजनीति
और मार देती है

वेश्यागामियों के नाम कोई स्मरण नहीं रखता
परिवार में भी कोई नाम नहीं लेना चाहता उनका
राजनीति भी जिन्हें नचाती है
उन्हें भी कोई याद नहीं रखता

आओ आगे बढ़ें 

आओ भर लें ह्रदय में
अग्नि की दाहकता
आँधियों की प्रचंडता
सागर की गहनता

शिशुओं की मधुर मुस्कानों से
धो डालें
उदासियों की परतें

सूर्य के प्रकाश से आलोकित कर लें
ह्रदय के कोनों में बस गए
अंधेरों को

यही हमारे आसपास ही है सब कुछ
जो-जो चाहिए
ले लें
केवल बढ़ाने हैं हमें, हाथ
दृढ़ करनी है
संकल्प-शक्ति

यूँ निकला सूरज

रात की काली चादर उतारकर
भागती भोर
सूरज से जा टकराई
बिखर गए सूरज के हाथों के रंग

छितरा गए आकाश पर
पर्वतों पर, झरनों पर नदी पर
नदी की लहेरों पर
धरती के वस्त्र पर, रंग

छू न सका सूरज भोर को
डांट न सका सूरज भोर को
और
आकाश पर निकल आया

देवालय की घंटियाँ

नील नभ
छा गए श्यामल मेघ
नर्तकी के घुंघरुओं-सी
बजने लगी बूँदें
हुआ आरम्भ जल-नृत्य

स्मृतियों के आकाश पर
बजने लगे घुंघुरू
हुआ था यूँ ही जल नृत्य
कौंधी थी चपला
तुम्हारा रूप बन
प्रकाशमय हो गया था जीवन
हुआ शंखनाद जैसे
बज उठी घंटियाँ देवालय की
हुई थी पूरी साध
अतृप्त मन की

चल पड़ा करने उद्यापन मन
हुए थे फलीभूत व्रत
प्रश्नों के गावं छूट गए थे पीछे
बिछ गई थी दंडवत देह
देव सम्मुख/अंजुरी में गिर गया था
आशीष पुष्प
ह्रदय में भर गई थी गंध
हुई चिर साध पूरी
जल-नृत्य किया था मन ने उस दिन

बस स्टाप पर द्रौपदी

बस – स्टॉप पर खड़ी थी
अधेड़ औरत।

एक के बाद एक बसें आतीं भीड़ भरीं
वह चढ़ नहीं पाती
बस के दरवाज़े से उलटे पाँव लौट आती
कंधे से लटकता झोला संभालती।

‘ इस बार आई बस में वह ज़रूर चढ़ेगी ‘
उसने निर्णय कर लिया ,
दरवाज़े तक लटकी भीड़ में डाल दिया उसने हाथ
हैंडल हाथ में नहीं आया
ड्राईवर ने चला दी बस
गिर गई औरत
छिल गई कुहनियाँ
झोले से दूर जा गिरा
टिफ़िन-बॉक्स ।

झटका लगते ही खुल गया
टिफ़िन-बॉक्स
सड़क पर जा गिरीं –
दो सूखी चपातियाँ
एक फांक अचार ,
झट से उठा लीं चपातियाँ
झट से उठा लिया अचार
पोंछकर करने लगी बंद उन्हें
टिफ़िन-बॉक्स में ।

भरे बस-स्टॉप पर
अधेड़ औरत
द्रौपदी बनी खड़ी थी ।

विवश वृक्ष

नदी की लहरों ने
अपने स्पर्शों से
किनारे खड़े वृक्ष में भर दिए
प्राण,
पुनर्जीवित हो उठा वृक्ष
हरे हो गए पत्ते
चहकने लगी टहनियाँ

लहरों की प्रतीक्षा में
अपलक निहारता है दूर-दूर तक
मौन तपस्वी सा,
संबल बनी नदी
बदल ना ले मार्ग अपना
सोच सोच
कांप कांप उठता है वृक्ष

उछलती कूदती आती हैं नदी की लहरें
छूकर भाग जाती हैं नदी की लहरें
वृक्ष भी चल पाता
तो चलता दूर तक नदी के संग
विवश वृक्ष केवल सुनता रहता है
लौटती नदी की पदचापें

नवागमन

गूंजी एक किलकारी
गर्भाशय से निकल
ताकने लगा नवजात शिशु
छत, दीवारें, मानव देहें

प्रसव पीड़ा भूल
मुस्कुरा उठी माँ
सजीव हो उठे
पिता के स्वपन

बंधी संबंधों की नई डोर
तीन प्राणियों के मध्य
हुई पूर्णता
नारी और पुरुष के वैवाहिक संबंधो की

नन्हे शिशु के संग जागी
आशाएँ

पुनः तैरने लगे
नारी और पुरुष के मध्य
नए-नए स्वपन
नवजात शिशु को लेकर

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