अश्वनी शर्मा की रचनाएँ

रिश्ता और रेगिस्तान

रिश्ता एक खेजड़ी है
जो चाहे छांग दी जाये
कितनी बार
पनप आती है हर बार
दुगुने जोश से
पनप जाता है सब कुछ जिस के साये में।
रिश्ता नहीं होता रोहिड़ा
जो अंगारे से गंधहीन फूल लिये
खिला रहता है बियाबान में
कुछ भी नहीं पनपता जिस के साये में
रिश्ता आक भी नहीं है
जो उड़ा देता है
बीजों को रूई-सा
पूरे माहौल में
चिपचिपे दूध सा चिपक जाता है
अपनी जहरीली तासीर लिये
रेत जानती है रिश्तों को
चिपक जाती है तन पर प्यार से
हट जाती है उतनी ही आसानी से
पूरा मौका देती है
पनपने का खुलने का
रेत हक नहीं जताती
मालिकाना भी नहीं
रेत सिर्फ ढलना जानती है
आप की सहूलियत के अनुसार
रिस जाती है बंद मुट्ठी से भी
बिना किसी शिकायत के
अगर रिसने दिया जाये तो
रेत नहीं जानती
रिश्ते को कोई नाम देना भी
बस एक नामालूम-सी
उपस्थिति बनी रहती है
जेहन से शरीर तक
रिश्ता न जहरीला चिपचिपा दूध है
न अंगार रंग का
गंध रहित फूल
वो है खेजड़ी-सा
जो पनपती है पनपाती है
देती है लूंग, सांगरी
जल लेती है चूल्हे में भी

वो है रेत सा
जो आपकी जिंदगी में
है भी और नहीं भी

रिश्ता जीता है
रेत में खेजड़ी में
रेगिस्तान के आदमी में।

फोग की जड़ सा मन

फोग की जडें
धंस जाती हैं टीलों में
कैसे भी आंकी बांकी
बिना किसी तय स्वरूप के
बढ़ जाती है किधर भी
अंगड़ाई लेती
अल्हड़ युवती सी

वैसे ही जैसे
चल देता है
आदमी का मन
कहीं भी किधर भी

कभी होता है
चांदनी रात में बांसुरी की तान
पिघल कर/फैल जाता है
दर्द का मीठा अहसास बन कर
रेत के टीलों पर/मीलों तक

कभी होता है
मेमने के कोमल रोओं-सा
नर्म, नाजुक, मखमली
कोमल अहसास-सा
हल्का-हल्का
कीमती सपने की तरह

कभी चालाक लोमड़ी-सा
दुबका होता घात लगा कर
तेज कांटे-सा
कहीं भी चुभने को तैयार

कभी होता है
लपलपाती जीभ से टपकती
जुगुप्सित लार-सा
महज एक
आदिम नग्न लालसा

नित नये खेल खेलता
आदमी का मन
कहीं भी धंस जाता है
फैल जाता है
बाँध लेता है
भरे-पूरे आदमी को
वैसे ही जैसे
फोग की जड़
बांध लेती है
एक भरपूर टीले को।

बरसात, रेत और जिंदगी 

टूट कर बरसी बरसात के बाद
इन टीलों पर
बहुत आसान होता है
रेत को किसी भी रूप में ढालना

मेरे पांव पर
रेत को थपक-थपक कर
तुम ने जो इग्लुनुमा
रचना बनाई थी
कहा था उसे घर

मैं भी बहुत तल्लीनता से
इकटठ्े कर रहा था
उसे सजाने के सामान
कोई तिनका, कंकर, कांटा
किसी झाड़ी की डाली
कोई यूं ही सा
जंगली फूल
चिकनी मिट्टी के ढेले

तुमने सबको
कोई नाम कोई अर्थ
दे दिया था
अगले दिन जब
हम वहां पहुंचे
तो कुछ नहीं था
एक आंधी उड़ा ले गयी थी
सब कुछ

रेत ने
महसूस किये थे
हमारे वो
सूखे आंसू
रूंधे गले
सीने में उठती पीर
और पेट में
उड़ती तितलियां

तब हम कितनी शिद्दत से
महसूस करते थे
छोटे-छोटे सुख-दुःख

कहां जानता था तब मैं
जिन्दगी ऐसे ही
घरौंदे बनाने
और सुख-दुःख सहेजने का नाम है।

रेगिस्तान की पहली बूंद

जब भी पडे़गी पहली बूंद
महक उठेगा रेगिस्तान
दिव्य गंध से
कोई उपमा नहीं
कोई सानी नहीं
इस दिव्य गंध का

मिलती हो शायद
गाय दुहते समय उठती
दूध की बाल्टी की गंध से
गेंहू की कच्ची बाली के दूध की गंध से
कुचली गयी खींप के रस की गंध से

साम्य चाहे कोई न हो
किन्तु जब भी उठती है ये गंध
दिव्य होते हुए भी
उतनी ही मानवी होती है
सिहरा देती है तन
हरखा जाती है मन
भर जाती है सपनो में रंग

याद दिला जाती है
हल, बीज, भरी बुखारी
और भरी बुखारी पर बंधे
पचरंगे साफे का ठसका।

तापमापी और रेत

तापमापी के पारे पर
कसा जाता है रेत का धैर्य
ऊपर नीचे होते पारे को
रेत ताकती है
मॉनिटर पर चलते
हृदय की धड़कन के
ग्राफ की तरफ
ग्राफ बता सकता है
हृदय की धड़कन की गति
लेकिन नहीं नाप सकता
हृदय के भाव, कल्पनाएं, उड़ान

वैसे ही पारा जानता है
रेत का ताप
लेकिन नहीं जान सकता
रेत की गहराई
रेत का दर्द

कैसे बन जाते हैं
समुद्र की लहरों से
एक के बाद एक
रेत के सम रूपाकार
छुपे-छुपे हैं रेत के राज
किसी स्त्री मन की तरह
मन की गांठो-सी
फोग की जडे

ताप से त्रस्त
छांह ढूंढती कोई
खींप, बुई
उदास बेवा-सा
सेवण का बूटा
सबको सहेज रही है रेत
बरसों से

सारा दिन तप कर भी
गाना नहीं भूली है
चांदनी रात के साथ

नहीं माप पायेगा तापमापी
कभी भी कि रेत
क्यों गाती है चांदनी रात में
क्यों हरख जाती है
पहली बरसात में
क्यों अलसाती है
पूस कि रात में
क्यों चुपचाप होती है
जेठ कि दुपहरी में

क्यों बन जाती है
काली-कराली आंधी
चक्रवात, प्रभंजन
असहनीय हो जाता है जब ताप।

तप्त रेत का प्रेम

महायोगी सूरज रोज तपता है
उदय से अस्त तक
योगी सूरज के इस प्रताप को
समझती रेत
समझदार शिष्या की तरह
पंचाग्नि तापती योगिनी-सी
तपती है दिन भर

तप्त रेत तापती है
सूरज की आग चुपचाप
बिना किसी शिकायत के
किसी भी चने को
भून देने में सक्षम
भाड़ बनी रेत
सिर्फ धमका देती है
अपने बच्चोें को
दुबक रहो कहीं भी
जहां भी मिल सके थोड़ी सी छांह

प्रेमी चाँद की दुलार भरी
रात की थपकियों से
तीसरे प्रहर तक
कठिनाई से सहज हुई रेत
प्रेम में सराबोर
मृदुल होने का
प्रयास कर रही होती है
शीतल हुई रेत
भूल जाये शायद
नित्य प्रति का पंचाग्नि तप

तभी सूरज वापिस आने का
संकेत देने लगता है
लाल हुई दिशाएं
दुन्दुभी बजाने लगती है
सूचना देती हैं
योगिराज केे आगमन की

रेत चाँद का हाथ झटक
पुनः तैयार हो रहीं है
गुरू योगिराज के साथ तपने के लिए

योग और प्रेम दोनों को जीती रेत
हमेशा सहज भाव से
दोनों को स्वीकार कर लेती है
दोनों को पूरे मनोयोग से जीती है

लेकिन रेत पगला जाती है
हवा के झोंको से
चंचला हुई उड़ती फिरती है

हवा क्या है
जो भ्रष्ट करती है
योग और प्रेम दोनों को।

रेगिस्तान में जेठ की दोपहर

रेगिस्तान में जेठ की दोपहर
किसी अमावस की रात से भी अधिक
भयावह, सुनसान और सम्मोहक होती है

आंतकवादी सूरज के समक्ष मौन है
आदमी, पेड़, चिड़िया, पशु
कोई प्रतिकार नहीं बस
ढूंढते हैं मुट्ठीभर छांह
आवाज के नाम पर
जीभ निकाले लगातार
हांफ रहे कुत्तों की आवाजें सुनाई देती हैं
सन्नाटा गूंजता है चारों ओर

गलती से बाहर निकले आदमी को
लू थप्पड़ मारकर बरज देती है
प्याज और राबड़ी खाकर भी
झेल नहीं पाता आदमी

छलकते पूर्ण यौवन के अल्हड़ उन्माद में स्वछंद दुपहरी
किसी भी राह चलते से खिलवाड़ करती है

धूप सूरज और लू की त्रिवेणी
करवाती है अग्नि स्नान
रेत और उसके जायों को
इस नग्न आंतक से त्रस्त
छांह भी मांगती है पनाह।

रेत आषाढ़ में 

आषाढ़ में या सावन में
जब भी उठेगी तीतरपंखी बादली
चलेगी पुरवाई
थकने लगी होगी
पगलाई डोलती रेत

तब
अनंत के आशीष-सी
मां के दुलार सी
कुंआरे प्यार-सी
पड़ेगी पहली बूंद

रेत पी जायेगी
उसे चुपचाप
बिना किसी को बताये
बूंद कोई मोती बन जायेगी

उठेगी दिव्य गंध
कपूर या लोबान-सी
महक उठेगा रेगिस्तान
श्रम-क्लांत युवती के
सद्य स्न्नात शरीर-सा
रेत की खुशबू
फैल जायेगी दिगदिगंत
रेत की थिरकन महसूस होगी
आदमी के मन में
गायेगा-नाचेगा
मना लेगा गोठ

लद जायेगा नीम निंबोलियों से
झूले पर टंगी
जवान छोरियों की हंसी-ठिठोली
याद कर मुस्कुरायेगा

खिलखिलाती जवानी
शायद भर जाय
उसकी बूढ़ी नसों में
कोई हरारत

यदि बेवफा रहा बादल
तो रेत का दुःख दिखेगा
धरती के गाल पर
अधबहे परनाले के रूप में

बादल हुआ अगर पागल प्रेमी
तो हरख-हरख गायेगी रेत
पगलायी धरती उगा देगी कुछ भी
जगह-जगह, यहां वहां
हरा, गुलाबी, नीला, पीला
काम का, बिना काम का
कंटीला, मखमली, सजीला
या जहरीला भी

धूसर रेत पर चलेंगे हल
हरी हो जायेगी
धरती की कोख

रेत माघ में 

रजाई में दुबका सूरज
जब देर से उठेगा
तब बर्फ-सी हुई रेत भी
अलसाई पड़ी रहेगी, अकारण
बस आलस्य ओढे हुए

सीली रेत
सिमट आयेगी मुट्ठी में
संवेदन शून्य
ऑपरेशन टेबल पर पड़े
मरीज-सी

कोहरा कर रहा होगा
गुप्त मंत्रणा
विश्वस्त सिपहसालारों से
साम्राज्य विस्तार की

ऊंट या भेड़
के बालो को कतरकर
चारों ओर से चुभने वाले
कंबलनुमा टुकड़े को ओढ़े
कुनमुना रहा होगा बचपन
खंखार रहा होगा बुढ़ापा
पड़े होंगे जवान शरीर चिपककर
परस्पर ऊष्मा का
आदन-प्रदान करते हुए

दुबकी होंगी भेड़ें
ऊन की बोरी बनी
कोई कुत्ता नहीं भौंकेगा
अकेला टिमटिमा रहा होगा
भोर का तारा

बस मस्ताया ऊंट
जीभ लटकाकर
निकाल रहा होगा विचित्र आवाजें
कर रह होगा प्रणय निवेदन

बूढ़ी दादी राम के नाम के साथ
बहुओं के नाम का जाप भी
कर रही होगी मन ही मन

माघ की अलस भोर में
सुन्न पड़ा होगा रेगिस्तान
बर्फ में डुबोई
अंगुली-सा।

यक्ष प्रश्न

क्या है आश्चर्य
कभी किया था प्रश्न यक्ष ने
धर्मराज से
आज भी वो
शाश्वत आश्चर्य
साथ है मेरे
लेकिन मैं जानता हूं
कि एक दिन
हो जाने वाली है ये देह
सिर्फ मिट्टी
मेरे अपने
संस्कारित बच्चे
कर देंगे अंतिम संस्कार भी
रेत से शुरू हुआ ये सफर
खत्म हो जायेगा
एक दिन रेत पर ही

किंतु
मैं ढूंढता हूं जब
आश्चर्य क्या ?
क्या ये/कि/मैं नहीं जानता
मैं हो जाने वाला हूं रेत
रेत के इस अनन्त विस्तार में
शायद हो कोई टीला
मेरे नाम का भी
जैसे होते हैं तारे आसमान में
जो पहचानता है अपना टीला
और जानता है
अपना उद्गम और अंत
वो ही पाता है/पार इस रेत के
वरना
उड़ा ले जाती है आंधियां कहीं भी
धराशायी कर देती है विशाल वृक्षों को भी

तो क्या रेत से रेत तक की
इस यात्रा में
कुछ भी ऐसा नहीं जो किया जा सके
क्या सिर्फ डरा जाये?
बैठा जाये निरूदेश्य?
या गुजर जाने दिया जाये
समय को
जो नहीं रूका कभी भी
जो हर पल बनता जाता है अतीत

रेत के मौन को जीते हुए
मैं जब भी हुआ हूं
मौन प्रज्ञा
तभी मैंने जाना है
आदि और अंत के बीच ही
होता है नाटक
नाटक के पात्रों को
जी लिया जिसने
मनोयोग से
वो ही जीता है
नाटक में अनेकों पात्र
नही होते सभी नायक
लेकिन नायक से कम नहीं
कोई भी पात्र
जो जी गया अपनी
भूमिका मनोयोग से
वो ही लड़ पाता है

जान पाता है
तिलिस्म रेत का
रेत फिर उद्घाटित करती है
अपने राज
फिर आंधियां हो
या बगूले
रेत और आदमी का
संबंध अटूट होता है

रेत की जिजीविषा
रेत का हक़ीरपन
रेत का गौरव
और रेत की
शाश्वतता
जान ली जाती है जब

फिर रेत बता जाती है
तेरी यात्रा
मुझ से शुरू और मुझी पे खत्म
ये जान ले
मत भूल ये
और जी जिन्दगी भरपूर।

अकेली होती रेत

एक बगूला बैठा देता है
आसमान पर रेत को
हवा के हिंडोले में
हिचकोले खाती रेत
छूती है अनजान ऊंचाईयां
आश्चर्य से देखती है
जड़ पड़े उन टीलों को
जिनका अंशभूत ही है वो स्वयं

ऊंचाइयों के सम्मोहन में उलझी रेत
बड़ी आर्द्र्र हो देखती है
अभी भी नीचे पड़े टीलोें को

फिर अचानक
रो उठती है दहाड़े मारकर
कितनी अकेली हो जाती है रेत
टीलों से अलग होते ही

ऊंचाईयां, न सम्मान है न राहत
बस अकेलापन है।

मरीचिका

रेगिस्तान में पानी बहुत गहरा होता है
धरातल पर होती है
सिर्फ मरीचिका
मृग और मानुष दोनों ही
दौड़ते रहते हैं मरने तक
उस पानी की तलाश में
जो कहीं है ही नहीं

रेत को हमेशा दया आती है
इन दोनों की ऐसी
अज्ञानी और भोली मौत पर

रेत देती रहती है
पानी न होने के प्रमाण बार-बार
आंखों में रड़ककर
नहीं चेतते पर
मानुष या मृग

पानी की लुभावनी सम्मोहक
प्रतिछवि खींचती है लगातार
नहीं छोड़ पाते इस आकर्षण का
मानुष या मृग
पानी जीवन है
पानी अर्थपूर्ण है
पानी सम्मोहक है
पानी आकर्षण है
लेकिन पानी की प्रतिछवि दरअसल मौत है
ये नहीं जान पाता आदमी

आभास को पानी समझकर
रेगिस्तान में पानी के पीछे दौड़ता आदमी
ऐसे ही छला जाता है बार-बार

जीवन की चाह
सिर्फ मौत देती है

मरीचिका हंसती है
रेत विमूढ़ देखती है
कहती है
तू ढूंढ़ता रहा पानी

ये जानते हुए भी
कि रेगिस्तान में सच केवल रेत है
पानी हमेशा ही मरीचिका है।

पानी और रेत 

रेत पानी से मिलते ही आर्द्र हो उठती है
तैयार हो जाती है
किसी भी रूप में ढलने के लिये

ताल मिलाती है
नन्हे-नन्हे बच्चों की विचित्र कल्पनाओं से
घर से लेकर आलू की चिप्स तक
कुछ भी बनने के लिये तैयार

अपने नन्हे साथियों के साथ
खुश-खुश खेलती है रेत
झूठ-मूठ कुछ भी बन जाती है
कुछ देर के लिये
जैसे तुतला रही हो मां अपने बच्चों के साथ

कितनी आर्द्र हो ले रेत
सूख जाती है फिर
हो जाती है दर-ब-दर
पगलाई डोलती है

ढूंढती रहती है फिर मिले कहीं
वही आर्द्रता
और नन्हे हाथों का स्पर्श।

जोहड़ की सपाट कथा 

तीन तरफ टीलों से घिरी
चिकनी मिटट्ी की डेरी में
बसा होगा कभी ये कस्बा

चिकनी मिटट्ी में खोदे गये जोहड़ ने
बरसों बुझाई है प्यास इस कस्बे की
बहुत से रंग देखे जोहड़ ने
जोहड़ बहुत खुश भी था
इस बात से कि इसके छोटे प्रतिरूप
कुंड भी बने थे घर-घर

लोगों को पता थी
एक घड़े पानी की कीमत
तब पानी, पानी नहीं था
घड़ा भर या कुंडभर प्रेम था
जो मांगा जाता था अधिकारपूर्वक
और दिया जाता था प्रेमपूर्वक

बंट गया पानी का साझापन एक दिन
घर-घर पहुंच गये नल
जोहड़ में एक साथ डूबते घड़ों की
डब-डब का लयबद्ध संगीत
खाली नलकों की सूंसाट में खो गया
पानी का साझापन क्या बंटा
कस्बे का साझापन ही बंट गया

भूल गये लोग
पानी की कीमत
जिस कस्बे में कीचड़
की संभावना ही नहीं थी
उस कस्बे में कीचड़ ही कीचड़ हो गया

जोहड़ का गला घोंट दिया
नित नये बनते मकानों ने
अधमरे जोहड़ को मारने के लिये
खोल दिये गये गंदे नाले जोहड़ में

जोहड़ सपाट शब्दों में मुझे सुनाता है ये कथा
क्या वास्तव मे जोहड़ का ये दुख इतना
सपाट है!
क्या जोहड़ का मरना एक यूं ही सी घटना है ?

जिप्सम के ढेले

जेसीबी खोद रही है
जिप्सम के ढेले
रेत के नीचे दबे
जिप्सम को खोद-खोदकर
मिटा दिया जायेगा नामोनिशान रेत का

उड़ जायेंगे टीले
नई मंजिल की ओर
रेगिस्तान बढ़ता नहीं है
बस जगह बदलता है

जमीन का मालिक
ट्रकों में भर देगा बड़े-बड़े ढेले
बिखेर दी जायेगी जिप्सम
उन खेतों में जो सोना उगलते हैं
सोने पर सुहागा बन जायेगा जिप्सम

सिर्फ खेतों में ही सोना नही उगायेगा
बल्कि खोदे जाने से लेकर
खेत मे बिखेरे जाने तक
लगने वाले हर हाथ पर
कुछ न कुछ धर देगा
दातार जिप्सम।

सूर्यास्त होने को है

सूर्यास्त होने को है
इन सुनहरे टीलों के पार
टीलों की रौंदतें सैलानी
ऊंट और ऊंट गाड़ों को दौड़ा रहे हैं
सैलानियों में उत्साह चरम पर है

कई सैलानी तलाश रहे हैं
संभावना क्या ऊंट गाड़ों की जगह
लाया जा सकता है कोई डेजर्ट व्हीकल
साजिशन फुसफुसा रहे है कानों में
इशारों में समझ रहे हैं टीलों को लूट लेने के गुर
सुनहरी रेत उनकी आंखों में
शुद्ध सोने-सी चमक रही है
ऊंट उन्हें इस किले का आखिरी रक्षक लगता है
जिसका अस्तित्व ये शीघ्र ही खत्म कर देंगे

उधर कैमरे तैयार हो रहे हैं
सूरज की लाल गेंद के
धीरे-धीरे डूबने वाले दृश्य को
अपनी याद में संजो लेने के लिये

रेगिस्तान में सूर्यास्त
देखने ही क्यों आते हैं सैलानी
क्या रेगिस्तान में सूर्योदय नही होता ।

हिमालय ही नहीं

हिमालय ही नहीं
ये थार भी
सदा से रहा है
हमारी सीमाओं का सजग प्रहरी
शक, हूण, मुगल, गौरी, गजनवी
किसी की भी हिम्मत नहीं हो पाई
इस रेत के समंदर को लांघने की

हजारोें मील की
यात्रा का दर्प
कंधे पर लादे हुए
आक्रान्ता कभी भी
नहीं झेल पाये दर्प
इस
गौरवशाली
स्वाभिमानी धरा के
आत्म गौरव का

आक्रान्ताओं का दर्प
चूर-चूर कर
आत्मसम्मान से
अड़ा रहा है
रेगिस्तान शताब्दियों से
मुट्ठीभर बाजरे का
स्वाभिमान सदैव ही
बना रहा है रक्षक
गंगा औ जमुना की गोद में
पल रहे उस विशाल भू-भाग का
जिसमें सदैव सोना निपजता रहा

चाहे कभी नहीं दिया गया गौरव
इसे उस हिमालय-सा
फिर भी बिना किसी
प्रशंसा के अड़ा रहा है
हर आक्रान्ता की राह का रोड़ा बनकर

रेत और रेत के जायों ने
भूखे रहकर भी
सदा जिया है स्वाभिमान
दांत खटट्े किये
आतताइयों के
कीमत अदा की
सदा ही सिर ऊंचा रखने की
सिर कटाकर।

कब बैठ पाये हम सुकून से 

कब बैठ पाये हम सुकून से
इस झोपड़ी की छांह में

कब देख पाये हम डूबता या उगता सूरज
यूं ही कभी अलसाये से बैठकर
टीलों की गोद में

कब रख पाया मैं सर तुम्हारी गोद में
या हाथ में हाथ डाले घूम पाये हम
उस तस्वीरों वाली किताब की तरह

हम तो उलझे रहे, लड़ते रहे
आधी से ज्यादा जिंदगी
अकाल से

एक घड़े पानी की कीमत
जो तुम्हरा सिर और पिंडलियां जानती हैं
उतना ही मेरा मन भी जानता है

तपती रेत पर उम्र भर चलते-चलते
पसीना भी शर्माता है अब
नहीं बचा पानी आंख में भी
हां बचा है शायद कहीं
तुम्हारे और मेरे मन में
बस इस पानी को सहेज पायें हम
ये रहा तो हम लड़ लेंगे
अकाल, दुकाल या त्रिकाल किसी से भी

अपनी ये लड़ाई अकाल से नहीं
साक्षात् काल से ही है
हमसे पहले भी हमारे बाद भी
हमारे पूर्वज भी हमारी संतति भी
जीते रहे हैं, जियेंगे ये अभिशप्त जीवन

दो बूंद पानी और मुटठ्ीभर बाजरा
काफी है जिंदाभर रहने को
रूठा ही रहता है राम हमसे

हम शायद उस परमात्मा के
बेमन से गढ़े गये खिलौने हैं
जिन्हैं भेज दिया उसने
बूंद-बूंद पानी को तरसने के लिये

राम चाहे रूठा हो हमसे हम नहीं रूठे हैं राम से
हमारी आस्था जिंदा है राम में
इक-दूजे में
जिंदा रहने में

कोई भी काल या अकाल तोड़ नहीं पायेगा
हमारी ये अटूट आस्था
कि हम पैदा हुए हैं तो

जीना हमारा धर्म है
निबाहेंगे हम
अंतिम सांस तक।

पिछले कई साल से

पिछले कई साल से
कोई बारात नहीं आई
इस गांव में

पैदा ही नहीं होने दिया गया
बेटियों को
आज उन
जन्मी, अधजन्मी, अजन्मी बेटियों
से अभिशप्त गांव
तरसता है
बहुओं के लिये भी

गांव की एकमात्र दाई
आज दहाड़े मारकर रोती है
अकेली झोपड़ी में
कोसती हुई अपने बेटों को जिन्होने
निकाल बाहर किया
बुढ़ापे में
उस मकान से
जहां आई थी कभी वो ब्याह कर।

सोचो कैसे 

कैसे पता चलता है
टिडिड्यों को
अब की बार हरा-भरा है रेगिस्तान

बारिश बरसेगी और
धूसर से हरा होगा रेगिस्तान
तो टिडिड्यां भी आयेंगी ही
सुदूर अफगानिस्तान से
आती है शायद
कहीं से भी आती हो
लेकिन
हर दिन चाट जाती है
एक गांव की हरियाली

हरियाली ही नहीं
खुशहाली तथा
कितने ही हसीन सपने
चाट जाती है
मां-बाप की दवाई
बनिये का उधार
बच्चों की फीस
बीवी की दवाई
ये अजनबी आफत
जब आती है
तो रोके नहीं रूकती
रोज बढ़ती जाती है

दस साल में एक बार होने वाली
इस सपनों की फसल
पर तुषारापात करने
आ ही जाती हैं ये
अवांछित मेहमान

इस धरती को चाटने
इस धरती पर
पैदा होने और मरने

या तो अकाल
या फिर टिडिड्यां
फिर भी बचा रहता है आदमी
सोचो कैसे ?

पधारो म्हारे देस 

पधाऽऽऽरो म्हारे देऽऽस
सदैव निमंत्रण पत्र-सी
बिछी रहती है रेत
किसी के भी स्वागत को तैयार
पावण कोई भी हो
मनुहार हमारा धर्म है

रेत दिल पर
छाप लेती है
पावणों के पद्चिन्ह
ले जाती है फिर गहरे कहीं
पावणों की निजता की रक्षा
का धर्म निबाहते हुए

नहीं देखने देती
किसी को भी
वो पदचिन्ह पुनः

रेत भेजती है
प्रेम पाती
बादलों कोे भी
उजाड़ सूने टीलों से
उठती रहती है आवाज
साजन के स्वागत में
मोती भरे थालों पर
नैन सजाकर
प्रतीक्षारत मरवण
रेत

ताकती रहती है
सूने आसमान में
कोई बादल तो होगा
जो जानता होगा
टूटकर बरसना

जो आ गया पावणा
उसकी मनुहार
कर लेगी रेत पर
वो बादल कब आयेगा
जो जानता है
टूटकर बरसना।

प्रतीक्षा 

इस साल भी रब्बुड़ी
नहीं जायेगी मायके
इस साल भी सूना रहेगा नीम
नहीं डलेगा कोई झूला

इस साल भी दिसावर ही रहेगा
मरवण का साहबा

इस साल भी रब्बुड़ी
इंतजार करेगी काग का
और मरवण मनुहार करेगी
कुरजां की

रेगिस्तान
एक अनंत प्रतीक्षा है।

इतना वीरान नहीं रेगिस्तान

चौकड़ी भरेगा हरिण
बालू रेत पर सरसरयेंगे
बांडी, पैणे
सांडा और गोह भी

दिखे जाये शायद
गोडावण भी

दौड़ जायेगी लोमड़ी सामने से
खरगोश, तीतर
दुबके होंगे जान बचा कर
सेहली डरा रही होगी
अपने नुकीले कांटों से

शायद दिख जाये
बाज का झपटट्ा भी
इतना वीरान भी
नहीं होता रेगिस्तान।

इन्द्रधनुष

कितना मुश्किल है
रेगिस्तान में चटख हरा रंग देख पाना
धूसर टीलों के बीच
मटियाला या कलिहाया हरा रंग ले
खेजड़ी खड़ी है
वीतराग संन्यासिन-सी

दूर तक फैले
धूसर मटियाले विस्तार
की एक रूप
उदासी को
कहीं-कहीं
तोड़ता है
कोई रोहिड़ा
लाल नारंगी फूलों से

जब प्रकृति उदास, धूसर, ऊदे
रंगों में लिपटी हो
तभी मानवी जिजीविषा
होती है रंग-बिरंगी
रेत के उदास रंग
नहीं तोड़ पाते
आदमी की रंगीन चाहों को
धूसर रंगों की उदासी
कितना ही उदास कर ले
माहौल को
लाख कोशिशों के बाद भी
नहीं प्रवेश कर पाती
आदमी के मन में

वो भरता है रंग पंचरगे साफे में
सतरंगी ओढ़नी में
या फिर गूंथ लेता है
अनगिनत रंगों का गोरबंद

छोटे-छोटे सितारों जैसे कांच
जड़ देता है बिछौने में
रंग फिर झिलमिलाते हैं
छोटे छोटे सितारों में हजार गुना होकर
लगता है जैसे बिखर गया है सूरज
खंड-खंड होकर
झिलमिला रहे है
हजारों इन्द्रधनुष
आदमी की चाहत के

कितना ही उदास हो
रेगिस्तान का रंग
आदमी का रंग
कभी उदास नहीं होगा
चाहतें ऐसे ही झिलमिलायेंगी
हजारों इन्द्रधनुष-सी

चांदनी रात और रेगिस्तान

चांदनी रात में
रेगिस्तान खोलता है अपने राज

उन्नत वक्ष से टीले एक के बाद एक
भिन्न रूपाकारों में
मांसल गोलाइयों से
अनावृत पसरे हैं रति-श्रम से थके
या बेसुध सुरापान कर
या अम्मल डकार कर
या आत्म केन्द्रित रूप गर्विता से

सम्मोहक गहराइयां
विवश करती हैं
मुंह छुपा इस मांसल सौन्दर्य को
छूकर महसूस करने को

ये अप्रतिम, अनंत
अनगढ़, आदिम सौन्दर्य-राशि
फैली है मूक आमंत्रण-सी
सभी दिशाओं में
आकंठ उब-डूब करती हुई
चाँद भी देखता है
ठगा-सा
वैसे ही जैसे
कभी रह गया होगा
ठगा सा
गौतम-पत्नी अहिल्या को देखकर

शापित अहिल्या की रूप-राशि का कोई हिस्सा
प्रस्तर न बन कर
बन गया था यह रेत-राशि
चाँद आज भी
सम्मोहित देखता रहता है
जड़, निः शब्द
गौतम के शाप के बावजूद

यह अप्रतिम अनपढ़
आदिम
सौंदर्य-विस्तार
ऐन्द्रजालिक
सम्मोहक भ्रमजाल सा
पसरा रहेगा यूं ही
लुभाता रहेगा
बिखरे पारे सा
मोहेगा
पर हाथ नहीं आयेगा।

कैसी होती है रेत 

सिहर उठता हूं मैं
यह सोचकर
अगर किसी दिन मेरी पोती ने पूछ लिया
क्या होता है?
फोग, खींप, बुई
आक, सत्यानाशी, जंगल जलेबी
कागारोटी, इमली, निम्बोली, बरबंटा
सेवण, धामन, कांस, सरकडा

क्या होता है?
कागडोड, कमेड़ी
सियार, लोमड़ी
मोर, कबूतर, कौव्वा, गिद्ध
गोह, गोयरा, सांप, सलेटिया
बघेरा, तेंदुआ, नाहर

क्या होता है?
आंगन, सेहन, तिबारा,
टोडी, छन्जा, चौबारा,
मालिया, दुछती, गुभारिया

अगर उसने पूछ ही लिया किसी दिन
अगर उसने पूछ ही लिया किसी दिन
क्या होती है गाय
कैसी होती है रेत
तब मेरे पास शायद न हो इनके फोटो भी।

रेत की एक अमूर्त छाप

रेत की एक अमूर्त्त छाप
किसने आंक दी है
मेरे बहुत अंदर तक

रेत का अनन्त विस्तार
फैला है
कोई खेजड़ी, कैर
या कहीं-कहीं आक
और
सेवण तथा बेर के
पीले पड़े झुरमुट
मुझमें सिमटे हैं
किसी विशाल ग्रंथ के
पॉकेटबुक
संस्करण से

कितनी बार
चाहा मैंने
मुंह घुमाकर
निकल जाऊं
लेकिन हर मोड़ पर
आ खड़ा होता है
एक विशाल टीला

जिस पर
लुढ़कता रहा था
मेरा बचपन
और
लोट-पोट होने के बाद
कितनी बार मां के चांटे
का स्वाद चखा
लेकिन
मुझे सम्मोहित करता रहा
वो विशाल टीला

जिसके समक्ष
बहुत बौना होता था
मेरा वजूद
फिर भी अपने छोटे-छोटे पैरों
से हर बार
नाप लेता था मैं
उसकी ऊंचाई
वापिस लोट-पोट होकर
नीचे पहुंच जाने के लिये

कितनी बार टीले पर
यूं ही बैठे-बैठै
उदास शामें गुजारी
डूबते सूरज के साथ
कितनी बार डूबा वो सूरज
बाहर नहीं
मेेेरे अंदर
लेकिन नहीं डूबा कभी भी ऐसे
कि न उगा हो
अगली सुबह
यूं ही कितने दिन या साल
बीत गये
डूबते-उगते
सूरज के साथ
हां याद है वो तारा
जो उग आता है
झुटपुटा होते ही
मेरा पक्का दोस्त
आज भी
ढूंढता हूं उसे
मैं ही छोड़ आया हूं उसे
छूट गया
मेरा एक हिस्साा
बतियाता है उससे
जो शायद बैठा है
उसी टीले पर आज भी
पहली बरसात की
खुशबू में मदहोश
मैं बनाता रहा
कितने घरौंदे
टूटते, जुड़ते, उड़ते
कई घरौंदे
साथ हो लिये मेरे
जिन्दगीभर के लिये
इन घरौंदांे में
टुकड़े-टुकडे़ जीता हुआ मैं
आज भी जीता हूं
उस पहले घरौंदे के साथ
जो अनगढ़-सा बनाया था
मैंने अपने नन्हे हाथों से
जिसके लिये मैं
फूट-फूट कर रोया था
जब नहीं रहा था वो

सुनसान दुपहरी में
जब बरस रही होती थी आग
आसमान से
मैं चुपचाप पीता रहा
वो सन्नाटा
जो आज पैठ गया है
कहीं अंदर तक
जब भी साथ होता है मेरे
मैं नहीं होता
बस गूंजता है यह सन्नाटा

आंधियों ने कितनी बार
गुम कर दी
पगडंडियां
रास्त भूला
मेरा बचपन
आज त
नहीं पकड़ पाया
सीधी राह

जीवन यात्रा के पड़ावों में
सुस्ताते हुए
हर बार पहुंच गया मैं
उसी टीले पर
चित्त लेटकर
निरभ्र आकाश को ताकते हुए
किसी दिन कोई
बदली आये
यह रहा अहसास मन में कभी-कभी
ताकता रहा
पर मैं वैसे ही
निरूद्देश्य
उस रेत के धूसर विस्तार पर
चित्त पड़ा
अनन्त तक फैला वो
नीला विस्तार
महसूस करता रहा
मेरे वजूद को एकाकार होते हुए
उस नीले और धूसर विस्तार के साथ

बहुत दूर निकल आया हूं
रेत के साये से
आज नहीं दिखता
वो सब जो कभी था
मेरी जिंदगी का हिस्सा
लेकिन कब कट पाया
उससे चाहे काट दी जाती हो
गर्भनाल पैदा होते ही
लेकिन कब छूट पाता है आदमी
गर्भनाल के संबंध से

रेत पर लिखी इबारत

कितना जीवन होता है
रेत पर लिखी किसी भी इबारत का
रेत को यूं ही सी समझकर
लिख जाते हैं हम
बड़ी-बड़ी बातें कई बार
जैसे कोई फकीर मौज में
कह जाता है दार्शनिक बात
सरल से शब्दों में

सीधी सादी दीखती बात
की गहराई का जब पता चलता है
तब रह जाते हैं हम स्तब्ध
ठगे से

वैसे ही रेत पर
लिखी इबारत
अल्पजीवी होते हुए भी
इशारा कर देती है
टीलों के बीच से
निकलती आंकी-बांकी
पगडंडियों की ओर
उपनिषदों के सूत्र वाक्य-सी

दिशाबोध हीन हम बढ़ जाते हैं
इन पगडंडियों पर
ये न जानते हुए कि आखिर जा कहां रहे हैं हम
ये पगडंडियां कभी खत्म नहीं होती
बस खत्म हो जाता है
रेगिस्तान में चलते हुए
एकमात्र संबल
साथ रखा पानी

रेत की इबारत ही नहीं
अल्पजीवी है सबकुछ
आदमी,राष्ट्र,सभ्यता
वैभव, पराक्रम, सम्मान

सच केवल उतना ही है
जितनी देर रहती है इबारत
रेत पर
या अंतहीन पगडंडियां।

पीला सोना/काला सोना

कौन जानता था
इस रेत के पीले सोने के नीचे
दबा है काला सोना

जबसे पता लगा है काले सोने का
काले सफेद साहबों की आवाजाही
बढ़ गई है थार में

बाड़मेर जो कभी
काला पानी कहाता था
सरकारी कारिन्दों की
पसंदीदा जगह बन गई हैं।

इस काले सोने को जगह देने
बेदखल होना पड़ेगा
कई माटी के जायों को

तरक्की-तरक्की की
रामधुन गुनगुनाते
छुटभैये नेताओं,अफसरांे
कम्पनी के साहबों और
दलालों की फौज घुस आई है थार में

ये फौज नहीं जानती
आदमी सिर्फ जमीन से बेदखल नहीं होता
हो जाता है जिंदगी से

माटी के जाये डोलते रहते हैं
तहसील और कम्पनी के दफ्तरों में
किसकी जमीन जायेगी किसकी बचेगी
इसके साथ थार में आये हैं
कुछ अजनबी शब्द
जिनको नहीं सुना गया था कभी

भू अवाप्ति, अवार्ड, भूमाफिया
मुख्त्यारनामा, इकरारनामा,
मेहनताना, बयाना, नजराना,
गोली, गैंगवार, टपकाना

रेत की कीमत बढ़ गई रातों रात
साहबों के साथ-साथ
कुछ रेत के जाये भी हो गये
वातानुकूलित रातों रात।

बालू रेत

बालू रेत की तासीर
कुछ अलग होती है
भुरभुरी मिटट्ी से
बालू रेत चिपकती नहीं तन पर
पर बैठ जाती है
छुपकर मन के किसी कोने में

खींच लाती है वापस
रोटी की खोज में गये
दिसावरियों को
हर साल किसी बहाने से
जात-जड़ूले, मेले-ठेले, गोठ-घूघरी

कसकती रहती है
कहीं मन में
उम्र भर।

स्वर्ण नगरी जैसलमेर

सोने-सी रेत
सोने-सा पत्थर
सोने-सी जिजीविषा
सोने-सा अहसास
सोने-सी सुबह
सोने-सी शाम
सोने-सी सच्चाई
सोने-से राग
सोने-सी आग
सोने-से ऊंट
सोने-सी भेड़
सोने-सा किला
सोने-से लोग
तभी तो है ये
स्वर्णनगरी
जैसलमेर।

है परत दर परत क्या बना आदमी 

है परत-दर-परत क्या बना आदमी
जैसे कोहरे का साया घना आदमी।

जब मुकाबिल खड़ा अक्स खुद का हुआ
कर न पाया कभी सामना आदमी।

चाशनी में मुहब्बत की सर तक पगा
और अगले ही पल कटखना आदमी।

ना रहो मन जले, गर रहो तन जले
जैसे है इका मकां अधबना आदमी।

इस अलस भोर में आधा जागा हुआ
आधा सोता हुआ अनमना आदमी।

ख़्वाहिशें, बंदिशें, साजिशें लाख हों,
भूल पाया नहीं धड़कना आदमी।

एक पाकीजगी है जो कायम रही
यूं गलाज़त में कितना सना आदमी।

वक़्त हांडी पे चढ़ाया चाहिये

वक्त हांडी पे चढ़ाया चाहीये
ख़्वाब इक रंगीं पकाया चाहीये।

हाल-ए-दुनिया देख लेंगे एक दिन
फुर्सती लम्हा निभाया चाहीये।

जो दुआ सा ज़िन्दगी में आ गया
ज़िन्दगी में, बस, बसाया चाहीये।

ये जो बारिश है, करम अल्लाह का
है करम तो, बस, नहाया चाहीये।

है कोई जन्नत अगर उस पार तो
मौज में इक बार जाया चाहीये।

नींद तारी हो गयी माहौल पर
ये गज़र अब तो बजाया चाहीये।

शेर ये, खरगोश खुद को मानता
आईना इसको दिखाया चाहीये।

खोट का सिक्का चलेगा एक दिन
एक दिन वो आज लाया चाहीये।

एक आसन, इस मुसल्ला जल गये
तम्बुओं को अब उठाया चाहीये।

मुझको पानी सा कर गया पानी

मुझको पानी सा कर गया पानी
जब भी आंखों में भर गया पानी।

राज जग जीतने के बतलाते
जिनकी आंखों का मर गया पानी।

बात महफिल में हक की होती है
जाने किस का उतर गया पानी।

कल जो सैलाब था जमाने पर
अब समंदर के घर गया पानी।

दौर के तौर को बदल देगा
जब भी सर से गुज़र गया पानी।

कैसी हमवार कर गया दुनिया
अब तो जाने किधर गया पानी।

अब भला क्या हिसाब करना है
राह होगी जिधर गया पानी।

हंसते-गाते, खाते-पीते, नये-पुराने लोग

हंसते-गाते, खाते-पीते, नये-पुराने लोग
महफिल में अब आ बैठे हैं, कई सयाने लोग।

कई अनाड़ी हाथों में बंदूकें हैं फिर भी
तुक्के में ही साध रहे हैं सही निशाने लोग।

जैसी हो औकात मिलेगा वैसा निश्चित है
कैसे-कैसे ले आते हैं राज बहाने लोग।

जीने की है शर्त बेचना, बेच, बेच कुछ बेच
बाजारों में सजा रहे हैं कई दुकानें लोग।

सपनों के नक्शों को पढ़कर चलते जाते हैं
सपनों की शक्लों में बदले बस दीवाने लोग।

एक ज़िस्म के पार रूह की जब बाते होंगी
जाने-पहचाने लगते हैं, सब अनजाने लोग।

चैपालों की काया कम होती जाती है

चौपालों की काया कम होती जाती है
हुक्के की गर्माहट भी खोती जाती है।

हिकमतअमली आदम की ही काम आयेगी
ये धरती कब बैलों से जोती जाती है।

इक जमीन का टुकड़ा क्या बेचा है मैंने
कई बहाने लेकर मां रोती जाती है।

इन्द्रधनुष की रंगीनी है आसमान में
घर की दीवारों पर कब पोती जाती है।

सुबह नीम की कड़वाहट मुंह भर जाती है
मगर रात है कि सपने बोती जाती है।

बोझ इकट्ठा होता जाता है सीने में
बेबस कमर मगर इसको ढोती जाती है।

शब्द कहां बेमानी होंगे 

शब्द कहां बेमानी होंगे
बस अनकही कहानी होगे।

वक्त हमें जितना घिस देगा
हम उतने लासानी होंगे।

रस्मों को तोड़ा गर मैंने
जुमले कई जुबानी होंगे।

घर की नींव हिली गर थोड़ी
दावे कुछ दीवानी होंगे।

जश्न कटे नाखूनों का कर
लोग कई बलिदानी होंगे।

तिल का ताड़ बना सकते जो
लोग वही कुछ ज्ञानी होंगे।

वही मशालें ढो पायेंगे
जो थोड़े दरम्यानी होंगे।

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