आदित्य शुक्ल की रचनाएँ

पश्चिमांचल 

धीरे धीरे सूर्य अब
पश्चिमांचल की ओर बढ़ चला है
उसने दिन का काम निपटा लिया है
उसका माथा ठंडा है अब
मुझे सूर्य की परछाइयां मिली हैं
एक-आध, इधर-उधर, छिटकी-बिखरी
मुझे तलाश है सूर्य की
सूर्य ठीक पश्चिम ढलान से उतर जाएगा
अनंत में
मैंने भी अपना काम निपटा लिया है
सूर्य की परछाईयां पकड़कर दौड़ूंगा मैं
ठीक पश्चिम ढ़लान की ओर
लिखकर रख दिया है एक पत्रनुमा किताब में
अपनी जिंदगी के रहस्य-वृत्तांत
किसी अनजान पथिक के लिए
मैं सूर्य से पहले पहुंचूंगा पश्चिम के ढ़लान
और हम एक साथ उतर जाएंगे
अतल अनंत में
किसी प्रपात की तरह.

ठीक है, ग़ालिब

ठीक है
तुम जा बसे न पहाड़ों में
सुफेद बर्फीले गांव में
शहर में अकेला छोड़कर मुझे।
ठीक है।
यहां अब भी बारिश होती है
कालोनी के गेट पर लग जाता है पानी
तुम थे तो उस पानी में जगह जगह रख देते ईंट
अब वहां बड़े-बड़े पत्थर रखवा दिये हैं किसी ने
बारिश का पानी दब जाता है पत्थरों के नीचे
अमलतास पर खूब पत्ते खिले हैं इस फागुन, ग़ालिब
तुम चले गए पहाड़ों पर
तुमने अपना नाम लिख दिया था वहां गेट पर
एक छोटी सी शायरी के साथ
‘हम बयांबान में हैं, घर में बहार आई है’
तब क्या सच में तुम्हारे घर में बहार आई थी ग़ालिब?
अब मैं एक-एक कर तुम्हारे नज़्म पढ़ता हूं
तब नहीं पढ़ता था
तुम यहीं थे जब
तुम्हारे साथ चाय-सिगरेट का जब रिश्ता था
अब गेट पर ठिठक जाता हूं आफिस जाते वक्त
जब बारिश होती है तब ख़ास
मुझे वहां अक्सर गेट पर अहसास होता है
तुम्हें अकेले जाना न था
पहाड़ों पर वहां
शहर में बहुत अकेलापन है
लेकिन ठीक है, ग़ालिब
मन मारकर कह पड़ता हूं हर बार
ठीक ही है
बयाबान तो नहीं होगा पहाड़ों पर।

निषेध

ऊबकर कहता हूं मैं
पियोगे क्या चाय
सहमति में अपना जरा सा सिर हिला देते हो तुम
चाय बनाना किचन में आग न लगा देना
कहते हो तुम चिढ़कर
मन ही मन गालियां देते हो
कहते हो
निषेध, निषेध
नेति, नेति!!
कहते हो मैं इस सभ्यता का
ईश्वर का
क्रांतियों का बहिष्कार करता हूं
तभी नौकरी-तनख्वाह आदि को लेकर
तुम्हारा सिर चनक उठता है
तुम चिल्लाते हो
और तुम्हारे मां की सूरत तुम्हारे आंखों में चमक जाती है
चाय बनने से पहले पहले
तुम फूंक डालते हो पांच सिगरेट
कहते हो
निषेध, निषेध
नेति, नेति!
और घुटने टेक देते हो
इसी जंजाल के सामने
जिसके लिए इतनी बार
हम सड़को-चौराहों पर घूम घूम
नेति,नेति करते रहे!

आबरा का डाबरा 

छत, छाता, जादू
कुछ भी नहीं बचा है जादूगर के पास अब।
सुबह होते
धूप निकलते
चार दीवारों पर ढ़क्कन सी रखी छत
सरक कर
दीवारों के ढ़ांचे को बना देती है खंडहर
दिन भर के लिए।
जादूगर अब भी कभी कभी
घुमाता है जादू की छड़ी
‘आबरा का डाबरा’
बोलता है और रूमाल से
उड़ती निकल आती हैं तितलियां।
तितलियां
काली/लाल तितलियां
जर्जर छातों पर बैठ
घूरती हैं
दीवार/आसमान/सड़क
मगर छत
जस की तस।
खुली रहती है दिन भर
दीवारों के बीच का ढ़ांचा बना रहता है खंडहर!

मुझे, ये चींटियाँ

अंधेरे का एक कोई दीवार
चौकोर,
चार तीखे कोनों वाला
और ये चींटियां
बारिश रिसे दीवारों पर।
चींटियां,
अंधेरा तोड़ तोड़ ले आती हैं
उनमें अपने घर बनाती
गहरे, बहुत गहरे सुराख कर
दो दुनिया के रास्ते तय कर लेतीं
ये चींटियां
छोटी छोटी।
मुझे ये
मेरे चारों तरफ
घेर लेतीं
किसी रात के उजाले में
रखे होते जहां अंधेरे अनाज के टुकड़े,
मुझे ये चींटियां
मरी हुई लाश समझकर
कभी कभी मुझपर
उजाले उगल देतीं।
मुझे ये चींटियां कभी कभी
महीने-साल का राशन दे जातीं,
अंधेरी जमीन को खोद
कहीं उस पार
अगली बारिश तक के लिए चलीं जातीं।
मुझे ये चींटियां फिर अक्सर याद आतीं!

मेरे अंदर मरा हुआ

मेरे अन्दर एक मरा हुआ काफ्का है
जो,
शाम को लिखने की टेबल पर बैठ अपनी गर्दन खुजाता है ..
सोचता है कि खाना क्या है आज शाम
और यह भी बहन के स्कूल की फीस कैसे भरी जायेगी अगले महीने.
सुबह बेतरतीब उठता है ये मेरे अन्दर का काफ्का
बिस्तर छोड़ना ही नहीं चाहता कमबख्त.
और मेरे अन्दर एक पेसोआ भी है
अपने द्वीप महाद्वीप में विचरता है.
चश्मा टिकाता है नाक पर,
छड़ी के सहारे किसी तरह चढ़ जाता है पांचवी मंजिल पर.
चाय पीते वक़्त सोचता है प्रेयसी के बारे में
लिखता है बेचैनी की कवितायें
मेरे अन्दर फिर तीसरा भी है.
मार्केज़ भी है.
जादूगर होना चाहिए था जिसे.
मार्केज़ ने पाले हैं मेरे दिल के भीतर कुछ सौ सफ़ेद हाथी
जिन्हें वो श्रीलंका से पकड़ लाया था.
वह सपनों में जीता है हरदम
नीले पहाड़ों के स्वप्न पहली बार मार्केज़ ही ने उगाये थे हमारे अवचेतन में
लाल मोर पर उसी ने की पहली फोटोग्राफी.
उसका एक अपना तोता भी है
जिसे बूढ़े कर्नल को दे दिया मैंने और उसने.
मेरे अन्दर ये तीन हैं और, और भी हैं शायद.
ये मुझे धीरे धीरे खा रहे हैं
चाट रहे हैं दीमक की तरह.

जब मैं नदी था

जैसे, जब मैं पर्वतों पर था
हरे पेड़, रंगहीन पत्थरों के बीच
मैंने कल्पना की एक निर्मल नदी की
नदी जो हलांकि
पहाड़ की चोटियों से उतर पत्थरों से लड़-टकरा
मेरे सामने से बह निकल रही थी
मैंने तब उसी नदी की कल्पना की
जिसमें मेरी अंधी आंखों के सामने श्रद्धालु लोग नहा रहे थे।
नदी जो तब वर्तमान थी, वहीँ मेरे आंखों के सामने
असल में तब वह नदी मेरे भविष्य का हिस्सा थी
जिसमें मैं बह रहा था….
जब मैं पठारों से होकर गुजरा
पठारों पर तब सफेद बर्फ(!) की बर्फबारी हुई
यह बर्फबारी जो हुई तो तब, मगर आने वाले भविष्य का हिस्सा थी

जब मैं समुद्र तट
रेत पर लिख रहा था अपने प्रेयसी का नाम
हिंसक लहरें जिसे मिटा मिटा देती
मुझे फिर फिर लिखने को विवश कर
तब उस वर्तमान में
बादलों के बीच होकर गुजरा एक जहाज
अतीत के फ्लैशबैक की मानिंद।
जहाज के नीचे समुद्र में तमाम समुद्री जहाज
सामानांतर लकीरें बनाते जा रहे होते थे कहीं ..
तब मैं अपने उस तमाम वर्तमान में
अतीत की तरह घटित हुआ
जिसे भविष्य मान लिया गया ..

मान लो, प्रेम

मान लो,
प्रेम अगर नहीं रहा प्रेम अब
जैसे सुबह का बासी गुलाब नहीं रहता है गुलाब शाम तक,
जैसे चहक कर निकल गई चिड़िया
हवाओं में धब्बे सी बची रही चहक उसकी,
बरसों पुरानी कोई सिहरन नहीं रही सिहरन अब,
छुवन हाथों में पड़ा रहा फिर बाद में
जैसे बच्चा बड़ा हो गया
चलने फिरने लगा तो नहीं रहा बच्चा अब
प्रेम, प्रेम नहीं रहा सच में!
मगर,
बच्चा चलने फिरने लगा और उसके दिल में तड़पता बचा रहा बचपन
गुलाब सूख गया
मगर उसकी गुलाबियत बची रही सूखी पंखुड़ियों में,
सिहरन बची रही रोंगटों में
चहक की जरूरत बची रही चिड़िया को
ठीक ऐसे ही प्रेम भी बचा रहा टेबल पर बचे कप के धब्बे-सा…

अद्भुत

बहुत दूर
बहुत दूर हूँ अद्भुत से
वो अद्भुत उस पार क्षितिज पर नज़र आता है
इस लम्बी/गहरी/चौड़ी खाई के पार का क्षितिज
सूरज जहाँ अविराम जी रहा है
खूबसूरत झील घर में रह रहा है
वह उस पार का अद्भुत है मेरा पहला और आखिरी लक्ष्य
मैं खाई में भर रहा हूँ पानी
भर जाए तो तैर कर जाऊं सूरज के घर
खाई भर पानी तो भर रहा हूँ
दिन ब दिन पानी हुआ जाता हूँ खुद ब खुद अद्भुत की इस यात्रा में.

ईश्वर-निरीश्वर

ये जो ईश्वर की बात करती हो तुम
और मैं निरीश्वर की
ये असल में हमारी अपनी-अपनी शरण-स्थलियाँ हैं,

ये जो झगड़ा है प्रेम-अप्रेम का,
असल मे
हमारे थके-हारे दिलों का आरामगाह है.
कहो कि हमारी आँखें अब भी एक-दूसरे के लिए तड़पती हैं
कहो कि हमारे अपने-अपने हाथ
हमारे एक दूसरे की नरम आंखों के लिए अब भी तरसते हैं…..

ये जो ईश्वर की बात करती हो तुम
और मैं निरीश्वर की,
हमारे अपने अपने डर भय हैं
हमारे अपने अपने दिलों का अंधेरा-उजाला है बस.

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