आर. चेतनक्रांति की रचनाएँ

पैसे के बारे में एक महत्त्वाकांक्षी कविता के लिए नोट्स 

मैं पैसे नहीं कमाता
जब बहुत खुश होता हूँ, तब भी
कोई योजना नहीं बनाता
बस तृप्तिजी के पास जाकर कुछ शुरूवाती बातें करता हॅँू
जो अरसा हो गया, शुरुआत से आगे नहीं बढ़ी

पैसा कमाना एक अद्भूत बात हैं
न कमाना उससे भी ज्यादा
आप अगर पैसे नहीं कमाते तो
यह कुछ ऐसा है
कि आप जेम्स वाट हैं
और रेल का इंजन नहीं बना रहे हैं
ये दुनिया से विश्वासघात जैसी कोई चीज़ है

अक्सर नहीं
लगभग हमेशा मैं पैसों के बारे में सोचता हॅँू
और इस इस सोचने में और भी कई चीजें साथ-साथ सोची जाती रहती हैं
मसलन, पैसे न कमाना
या थोड़े से पैसे कमाना और उन्हें खाने बैठ जाना, आगे और न कमाना
पुराने, जिनका शरीर आदी है, ऐसे कपड़े पहनकर किसी पुरानी,
जो होते-होते घर जैसी हो गयी है, ऐसी सार्वजनिक जगह पर निकल जाना
एक शहर में बरसों रहते हुए भी राशनकार्ड न बनवाना, फोन न लगवाना
सालों पुराने दोस्तों से बार-बार ऐसे मिलना ज्यों आज ही मिले हैं
और यॅँू विदा होना ज्यों फिर मिलना बाकी रह गया हो
औरतों को देखकर मिलट जाना, खुलेआम जनाना होना
हिंसा का उचक-उचककर प्रदर्शन न करना, मर्दानगी पर शर्म खाना
अश्लील चुटकुलों पर खिसिया जाना,
उनका फेमिनिस्ट विश्लेषण करना,
राजनीतिवालों पर, उनके घोटालों पर बहस न करना
गम्भीर, उलटपलट कर देनेवाली मुद्राओं पर ठठाकर हँस पड़ना
और खूबसूरत कमाऊ आदमी के पाद पर आनन्दित हो उठना,
लगता है, ये सारी चीजें एक साथ होती हैं
पैसे न कमाना इन सबसे मिलकर बनता है

कभी कभी यूँ भी सोचता हॅूँ
कि बस पैसे ही कमाना एक काम रहता
तो कितना सुख होता
चलते चलते अचानक भय से न घिर जाते
चौराहों पर खड़े रास्ते ही न पूछते रहते
अपने साथ लम्बी-लम्बी बैठकों में अपने ही ऊपर मुकदमे न चलाते
अच्छे-बुरे और सही-गलत की माथापच्ची न होती
कैसे भी बनिए के साथ ठाठ से रह लेते, यूँ मिनट मिनट पर सिहर न उठते
सुन्दर लड़कियों के लिए सड़कों और पार्को की खाक न छानते फिरते
झोंपड़-पट्टियों में झाँक-झाँककर न देखते, कि क्या चल रहा है
बड़े नितम्बवाले मर्दों को देख बेकली न होती,
फसक्कडा मार कहीं भी बैठ जाते
और मजे से गोश्त के फूलने का इन्तजार करते
दुनिया में पायदारी आती
और धन्नों का पाँव धमक-धमक उठता
एक दिन देखा कि सारे विचार और सारी धाराएँ
तमाम महान उद्देश्य और सारे मुक्तिकारी दर्शन
दिल्ली के बॉर्डर पर खड़े हैं
यूँ कि जैसे ढेर सारे बिहारी और पहाड़ी और अगड़म-सगड़म मद्रासी
हाजत की फरागत में पैसा-पैसा बतियाते हों
तब तो जिगर को मुट्ठी में कसकर सोचा
कि शुरू से ही पैसा कमाने में लग जाते
तो आज इस सीन से भी बचते

लेकिन हाय, सोचने से पैसे को कुछ नहीं होता
न वह बनता है, न बिगड़ता है
कितने ही सोचते बैठे रहे और सोचते सोचते ही उठकर चले गये
हमारे पूज्य पिताजी के पूज्य पिताजी कहा करते थे
कि उनके पूज्य पिताजी ने उन्हें बताया था
कि पैसे को ऐसी बेकली चाहिए
जैसी लैला के लिए मजनूँ और शीरीं के लिए फरहाद को थी
लेकिन इधर हमारे छोटू ने बताना शुरू किया है कि नहीं
इसके लिए, जैसाकि शिवखेड़ा
और दीपक चोपड़ा बताते है, मन और आत्मा की शान्ति चाहिए
और उसमें योगा बहुत मुफीद है
उसका कहना है
सोचना पैसे को रूकावट देता है
और इस रूकावट के लिए भी आपको खेद होना चाहिए
क्योंकि आप अगर सोचने से खारिज हो जाएँ
तो फिर सारा सोचना पैसा खुद ही कर ले
कि उसके घर सोचने की एक स्वचालित मशीन है

और पीढ़ियों के इस टकराव में, जिसमें मेरी कोई ’से’ नहीं
इधर कुछ ऐसा भी सुनने में आया है
कि जिनके पास पैसा है, दरअसल उनके पास इतना पैसा है
कि कुछ दिनों बाद वे उसे बाँटते फिरेंगे
कि जिस तरह आज हम गैरपैसा लोग
अपनी बहानेबाज़ियों और चकमों चालाकियों से दुनिया की नाक में
दम रखते है
उसी तरह वे जरा-जरा सी बात पर
बेसिर-पैर बहानों के सहारे
बोरा-बोरा-भर पैसा आपके ऊपर पटक भाग जाया करेंगे
कि जिस तरह हमारे चोर पैसे की बेकली में रात-दिन मारे-मारे फिरते हैं
उसी तरह वे चोरी-चोरी आएँगे और आपकी रसोई में पैसे फेंककर
गायब हो जाएँगे

मैं कहता हूँ कि हाय,तब तो पैसे कमाना कोई काम ही न होगा
तो वे बताते हैं कि नहीं भाया,
तब हमें खर्च करने में जुटना होगा
और उसके लिए भी वैसी ही बेकली चाहिए
जैसी मजनँू को लैला के लिए और फरहाद को शीरीं के लिए थी
(और हाँ, जिस दिन मैं यह कविता पूरी लिखूंगा
अपने पिता के बारे में भी लिखूंगा
जिनका जाने कितना तो कर्ज
मुझे ही चुकता करना है!)

परदे के पीछे शायद कोई आंख हो 

उससे कहा गया कि सबसे पहले तुम्हें खुद को बचाना है उसके बाद दुनिया को
अगर समय रहा तो , पूरी ट्रेनिंग का सार बस यही था
कि जब जरुरत हो प्रेम दिखाना मुकर जाना अगर कोई याद दिलाये
कि तुम अपनेपन से मुस्कराये थे जब बेचने आये थे
मॉल बिकने के बाद तुम सिर्फ कम्पनी के हो कम्पनी के मॉल की तरह
और इसी तरह तुम्हें दिखना है, इसे जीवन शैली समझो
यह सिर्फ ड्यूटी कि बात नहीं है

और फिर हम उन्हें देखते हैं , नये बाजारों में
टीवी के परदों पर सड़कों के सिरहानों पर सजे चमकपटों पर
मूर्तियों सी शांत सुसज्जित लड़कियां
जिनकी त्वचा उनसे बेगानी कर दी गई
मुँह खोलने से पहले जो
हथेलिओं से थामतीं हैं कृत्रिम रासायनिक सौंदर्य को
जो दरअसल सम्पत्ति है पे मास्टर की
बुतों कि तरह ठस खड़े जोधा लड़के
जिनके बदन की मचलियाँ बींध दी गयीं हैं भव्य आतंक से
और जो हंसने से पहले जाने किससे इजाजत मांगते हैं
शायद दीवार में कोई आंख हो
शायद परदे के पीछे कोई डोरियां फंसाये बैठा हो …

बच्ची और एक बूढ़ा पेड़

एक पानी की पुडि़या मिली है / माथे पर बांधे फिरता हूँ / बूंद-बूंद टपकती है / कभी आँख से / कभी रूह पर

शुभा के लिये

बच्ची एक ख़ूबसूरत चिडि़या का नाम था
जिसने एक बूढ़े और खोखले पेड़ के दिल में घोंसला बना लिया था
पेड़ बहुत पुराना था
और उसने अपनी पुख़्तगी को तार-तार होते देखा था
ज़र्रा-ज़र्रा उसे याद था जो उसके वजूद से फिसलकर
वक़्त की नदी में चला गया था

बच्ची अभी-अभी दुनिया में आई थी
और उसे मालूम भी नहीं था
कि जहाँ उसने डेरा डाला है उस खोखल में कितने प्रेत रहते हैं
उसे ज्ञान-पिपासा नहीं थी
वह इस दुनिया को उसी रूप में देखना चाहती थी
जिस रूप में वह दिखती थी

वह यह भी नहीं चाहती थी कि उसे विश्वास हो
विश्वास और आस्था उसके लिए
पेड़ की पत्तियों जैसे थे जो होते हैं
अगर पेड़ होता है

इसलिए पेड़ भयभीत रहता था
हवा उसे हिलाती
तो वह झुंझलाता
जंगल उसे पुकारता
तो वह एक गमगीन ‘हूँ’ करता
जो कहती थी
कि मुझे मत पुकारो मैं नहीं बोल सकूंगा बच्ची डर जाएगी
कि मेरी आवाज़ में डरावने मुर्दे चीखते हैं
गालियाँ बकते हैं असंतुष्ट बूढ़े और अतृप्त बुढि़याएँ

गुस्सा झींकता है अपनी बेबसी को
और इच्छा रोती है अपने वैधव्य को
और बच्ची यह भी नहीं जानना चाहती थी
कि इस पेड़ का नाम क्या है
यह कहाँ से आया है
और यहाँ से कहाँ जाएगा

उसका उस पाप से कोई वास्ता नहीं था
जो उसे घेरे हुए था

फिर एक दिन यूँ गुज़रा
कि जंगल में एक नियम आया
उसने कहा कि प्रेम की बात हम नहीं करते
हम सिर्फ़ इतना जानते हैं
कि पुकारा जाए तो आप हाजिर हों
जवाब दें जब सवाल सामने हो
उठकर सलाम बजाएँ जब सवारी गुज़रे
हरकत में दिखें जब तैयारियाँ चल रही हों युद्ध की

और प्रेम मर गया

पेड़ ने अपनी तमाम हिंसा और तमाम क्रोध को गूँथा
और तीर चलाये ज़हरीले

लेकिन चिडि़या जो मरी वह तीर से नहीं
तीर की मौजूदगी से मरी
पेड़ जंगल से उठा
सब तरफ शांति थी
एक भी मुर्दा साँस नहीं ले रहा था
न पेड़ के भीतर न पेड़ के बाहर
पल गुज़रे जैसे शापित ग्रह गज़रते होंगे
अंतरिक्ष में चुपचाप

और फिर एक आर्त्तनाद सुना गया
पूरे जंगल में जैसा कभी किसी ने
किसी ज़िंदा या मुर्दा काठ के भीतर से नहीं सुना था।

बच्ची लेकिन मरी नहीं थी
उसकी पारदर्शी त्वचा के भीतर
एक पूरी दुनिया आबाद थी
जीवन की जो बाहर से नहीं दिखती थी

पेड़ ने आँसू नहीं पोंछे थे
जब वह शहर में आया शहर उसे पानी की
एक झिलमिल चादर में उतराता दिखाई दिया

लोग तलवारें भाँजते इधर-उधर बह रहे थे
पानी में पालथी मार वे रेत के किले बनाते
और एक-दूसरे पर टूट पड़ते और इस तरह
सभ्यता को जारी रखते

बच्ची के पंखों से धुली नई आँखों से
पेड़ ने फिर शहर को देखा
और काँपता हाथ बढ़ाकर एक बनिये से
एक पुडि़या मांगी अंतिम निराशा की
ताकि लौटकर न आना पड़े
ताकि वह चला जाए
नदी में बैठकर नाव की तरह
अज्ञात के समुद्र में
जहाँ बच्ची और प्रेम चले गए थे

पेड़ को नहीं पता था
कि बच्ची मरी नहीं थी
कि उसके भीतर अपनी ही निष्पाप जिजीविषा की
एक पूरी दुनिया आबाद थी
जिसे कोई नहीं मार सकता था
क्योंकि वह जीने के कारणों पर निर्भर नहीं थी।

पर पेड़ एक पुराना स्वभाव था
उसने पीड़ा को नहीं रोका
गोंद की तरह भरने दिया उसे
अपनी पपडि़यों,खोखलों और रंध्रों के भीतर
ताकि उसका अन्दर और बाहर एक हो जाए
कि जब वह चले उसके पैरों के दोनों निशान
एक जैसे हों
कि लड़खड़ाहट का कोई तीसरा क़दम
पीछे आनेवालों को बेभरोसा ना करे
कि पेड़ एक अरसे से सच्चे दुख की खोज में था
जो उसके कलुष और द्वैत को धो दे
और बच्ची के जाने पर वह उसके सामने था

दुख वह जिसमें न कोई फाँक थी न झिर्री
न जिससे हवा आती थी न आवाज़
वह एक सपाट मैदान था जहां बैठकर पेड़
बच्ची से वो सारी बातें करता
जो उसने नहीं की थीं
जब बच्ची होती थी

उसे मालूम नहीं था, क्‍योंकि वह मालूमियत की हदों मे क़ैद था
कि बच्ची मरी नहीं है
क्योंकि बच्ची के रेशों में जीने की हिंस्र प्रतिज्ञा नहीं छिपी थी
वह रूई की तरह थी जितनी धुनी जाती
उतनी ही निखरती जितनी मरती
उससे ज़्यादा जी उठती

पेड़ उसकी तस्वीर से बातें करता
जो तस्वीर नहीं थी
तस्वीर की तस्वीर की तस्वीर थी
जो मरने और जीने के पर्दों से छनकर
पानी की फुहार की तरह उसके बूढ़े चेहरे पर गिरती थी

वह चलता और चलते-चलते बैठ जाता
सोचने लगता और सोचते-सोचते
आँसुओं की झील पर जा निकलता
मुँह धोता नहाता और साफ-सुथरा होकर
वापस बातों की पगडंडी पर आ जाता

राह के ठूँठ, पत्थर और घायल परिंदे
उसके हाल-चाल पूछते और हर बार नई हर बार
निखरी उसकी आवाज़ से चकित रह जाते
वे देखते कि वह बदल रहा है
जैसे पथ्वी बदलती रहती है अपनी आंच से
भीतर-भीतर वह दुख से बदल रहा था

वह किसी से मिलता बातें करता और ऐसा होता
कि सहसा भीतर की घू घू में सब-कुछ डूब जाता
वह पूछता– मैं क्या कह रहा था और आप
चलिए शुरू से शुरू करिए
क्‍योंकि आप तो कर सकते हैं
तब एक दिन उसे संदेश मिला झील में तैरता हुआ दो पत्ते पर
कि बच्ची कमजोरी नहीं ताकत बनना चाहती है

यह एक उद्घाटन था पेड़ को लगा
कि बच्ची उतनी इकहरी नहीं जितनी दिखती थी
और उसे निर्भरता महसूस हुई जो उसके तने के नीचे
राख की तरह पड़ी रहती थी
और तलब
वह जला
और कई दिन झील में पाँव डाले बैठा रहा
यह शक उसे बाद में हुआ कि बच्ची ज़िंदा है

फिर उस दिन उसने बच्ची को देखा
आँसुओं की उस दुनिया जितनी बड़ी झील के उस तरफ
वह एक सफ़ेद पत्थर पर बैठी थी
आधी डूबी हुई ख़ुशी में आधी उबरी हुई दुख में
वह डरी
और चली
अपने द्वीप पर दो क़दम अंदर दो क़दम बाहर
और उड़ने से पहले
पेड़ की तरफ पीठ करके एक बार हिचकी में हिली
पेड़ को लगा जैसे झील हिली
जैसे जंगल हिला
जैसे पथ्वी हिली
जैसे कोई पाप-जर्जर शरीर हिलता है
अवसान के पहले की आखिरी खाँसी में
ऐसे हिली दुनिया


एक घर होता है रेत का बच्चे जिसे
खेल-खेल में बनाकर घर चले जाते हैं
फिर वह ढह जाता है
पेड़ ऐसे ढ़हा जब चिडि़या उड़ी
उसने शन्य को देखा
जो दुनिया के चमचमाते कंगूरों के बीच
हमेशा फैला रहता है
पर जिसे हम छू नहीं पाते
पेड़ ने उसे छुआ

फिर शक्ति को छूने के लिए हाथ बढ़ाया
एक अस्थिर , निराकार और बेचेहरा लपट
जो झील की छाती से उठ रही थी

नातवानी का ये आलम था कि उठते न बने
और यूँ ख़ूब था बारे जहाँ, कि जाए क्यों।

तुम्हारा क्या नहीं है, सिवा राम के 

ओ लंका के धर्म रक्षको !
सारे मृत्यु मंत्र
तुम्हारे पास पड़े हैं
यम के सारे दूत
श्रद्धावान ये सब हत्यारे
ये मृत्युपूजक
मानस पूत तुम्हारे
तैयार खड़े हैं ।

तो जब तक आएँ राम
बजे हत्या का डंका
ख़ून की प्यासी
रह न जाए
सोने की लंका
तिलक रक्त का चढ़ा
पहन कर असुरों का उत्साह
है मेरा शाप तुम्हें
तुम जाओ ताक़तवर की राह ।

औसत के राजमार्ग पर 

सर्कस जैसा कुछ था
चमत्कार की चमकार में रंग-बिरंगा
`हय-हय-हैरानी´ में नंगा
एक बौने के ऊपर
संरक्षणार्थ
या
हायरार्की के सुप्रसिद्ध कानून के हितार्थ
और, इसलिए भी कि ब्रह्मांड की सिकुड़ती नली में पृथ्वी सुरक्षित रहे
एक और बौना तैनात था
कहते थे उलझे-उलझे शब्दों में
कि राजा नहीं, प्रजा नहीं, भगवान नहीं, भक्त नहीं
कि फाज़िल नहीं, ज़ाहिल नहीं, आसान नहीं, सख़्त नहीं
सिर्फ मीडियोकर ही दुनिया को बचाएगा
कि कृष्ण का, कि राम का, कि अभीष्ट का
कि वेस्ट का और, कि ईस्ट का
मिला-जुला ख़ुदा एक आएगा
वह होगा प्रतिभा-सम्पन्न अनुगामी
सत्ता-तक-जा-पहुँचों का अन्तर्यामी
उसे कोई नहीं रोक पाएगा
जब वह रास्ते के बीच के रास्ते के भी बीच के रास्ते से
ठस खड़ी किंकर्त्तव्यविमूढ़ों की भीड़ से
सुई की तरह निकल जाएगा
और मंच पर जाकर गाएगा
एक हज़ारवीं बार मीडियोक्रेसी का राष्ट्रीय गीत
और आत्मा में अवरुद्ध–ठूँस-ठूँसकर प्रबुद्ध
टुक-टुक असमंजस में èा¡सी भीड़
हल्की और मुक्त होकर तालियाँ बजाएगी
और पहले ही रेले के साथ सारी-की-सारी चली जाएगी
जहाँ होगा सबका साझा स्वर्ग
थोड़ा मीठा, थोड़ा नमकीन, थोड़ा कुरकुरा
मèयम का।

छटपटाकर जगह बदलना 

मैंने जब साधुता से कहा–विदा
और घूमकर दुर्जनता की बाँह गही

वह कोई आम-सा दिन था
खूब सारी ख़ूबियों की ख़ूब सारी गलियों में
आवाजाही तेज़ थी
मिन्दर के चबूतरे पर
एक चिन्तित आदमी
सिर झुकाए, आँखें मूंदे
भूखों को भोजन बाँट रहा था
वह इतना डर गया था
कि भूखे के हाथ काँपते तो पत्तल मुँह पे दे मारता

बैठे-बैठे
एक लम्बा अरसा बीत गया था
मेरे गुस्से की नोकें एक-एक कर डूबती जा रही थीं
असहमत होने की इच्छा पिलपिली हो गई थी
दिल ज़रा-ज़रा-सी बात पर उछल पड़ता था
और ख़ुदयकीनी पिघले गुड़ की तरह नसों में भर गई थी

चलते-चलते भीतर कुछ कौंधता था
और खो जाता था
वक़्त की पाबन्दी
बुजुर्गों का सम्मान/सफ़ेद चीज़ों का दबदबा
दफ़्तर की ईमानदारी
एक अच्छे देश का नागरिक होने की ज़िम्मेदारी
और दोहरे-तिहरे अर्थोंवाली अर्थगर्भा कविताएँ
पिचकारी में पानी की तरह
हर जगह मेरे भीतर भर गई थीं
कोई ज़रा-सा कहीं दबाता
तो अच्छाई अच्छों की पीक की तरह
या प्राणप्यारी कुंठा के फोड़े की मवाद की तरह
फक् से फुदक पड़ती

लोग मुझसे खुश थे
और अपना स्नेहभाजन बनाने को देखते ही टूट पड़ते
पालतुओं को पालने का शौक आम था
जंगलियों के लिए चिड़ि़याघर थे
बस एक वीरप्पन था जो जंगल में बना हुआ था

तभी बस शरारतन,
और थोड़ा ऊब की प्रेरणा से
और इसलिए भी डरकर, कि कहीं भगवान ही न हो जाऊ¡
मैंने
भलमनसाहत की दमघोंटू अगरबत्तियों से
गोश्त की भूरी झालरों में सजी बैठी मनुष्यता से
सफ़ेद फालतू माँस से लदे अमीर बच्चे की आतंकवादी सुन्दरता से
छुटकारा पाना शुरू किया
पवित्रता के बौने दरवाज़ों की मर्यादा से निर्भय हो
मैं धड़धड़ाकर चला
जैसे सुन्दर कारों के बीच ट्रक जाता है
और कम्युनिटी सेंटर से बाहर हो गया, जहाँ
`बिगब्रांड´ कूल्हों और
अच्छाई के भरोसे दुर्भाग्य से लापरवाह
चेहरों की सभा थी
और दरवाजे में वह मरघिल्ला चौकीदार
ईमान-की-हवा-में-तराश-दी-गई-मूर्ति-सा
अपने तबके के अहिंò बेईमानों की जामातलाशी कर रहा था
नोटिसबोर्ड पर लिखा था
कि देवताओं की पहरेदारी नहीं करता जो
वो हर कमज़ोर चोर होता है

सड़क पर मैंने
बदबूदार खुली-आम हवा में
लम्बी साँस भरी और देखा
धर्मग्रन्थों और कानून की क़िताबों की पोशाकें पहने
अच्छाई के पहरेदारों का जुलूस चला जाता था

बीचोंबीच अच्छाई थी
लम्बा बुर्का पहने
ताकत को कमज़ोर बुरे लोगों की नज़रों से बचाती
सिंहासन की ओर बढ़ी जाती
फट्-फट् फूटते गुब्बारों
और पटाखों के अच्छे, अलंघ्य शोर में सुरक्षित
स्वच्छ शामियानों से गुजरती
चांदनियों पर जमा-जमाकर पैर धरती
शक्ति के साथ
आमंत्रित करती

लेकिन मैं बाफ़ैसला
कोढ़िन कमज़ोरी के जर्जर आँचल में हटता हुआ पीछे
लड़ता मन में अच्छाई के ज्वार से
ताकत के भड़कते बुखार से
करता ही गया विदा उन्हें एक-एक कर
जो जाते थे
अच्छेपन की रौशन दुनिया में
अच्छाई के राजदण्ड से शासन करने।

आगे के बारे में एक ईर्ष्यासूत कविता 

वे तो बढ़े ही चले जा रहे थे
आगे, और आगे
और आगे के बारे में उनकी राय तय हो चुकी थी
कि जहाँ पीछेवालों की इच्छाएँ जाकर पसर जाएँ
कि जहाँ आप दयनीयता पर क्रोध करने को स्वतन्त्रा हों
कि जहाँ जमाने-भर की ईर्ष्याएँ
आपका रास्ता बुहारें
उस जगह को आगे कहते हैं
वे आगे वहाँ
दुनिया-भर की ईर्ष्या पर मुटिया रहे थे
और बीच-बीच में फोन करके पूछते थे,
हैलो, अरे तुम कहाँ ठहरे हुए हो ?
रास्ता उन्हें अध्यात्म की तरह लगता था
जैसे किसी को धर्म का डर लग जाता है
कि लीक छोड़कर
चाय की दूकान तक भी जाते
तो ‘चलूँ-चलूँ’ से छका मारते
एक किसी भी दिन
वे उतरते नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर
और शहर के सबसे स्मार्ट रिक्शावाले को
रास्ता बताते हुए शहर पार करने लगते
कि जैसे बरसों से इसे जानते हों
वे अपने भीतर और शहर में
एक खाली कुआँ तलाश करते
जो उन्हें मिल जाता
वे एक मकसद का आविष्कार करते
जो पिछले एक करोड़ साल से इस दुनिया में नहीं था
वे किराए के पहले कमरे की कुँआरी दीवार की तरह
मुँह करके खड़े होते, और कहतेदृ
कि जो जा चुके हैं आगे, उन्हें मेरा सलाम भेजो
कि मैं आ गया हूँ
कि यह लकीर जिसे तुम रास्ता कहती हो
अब बढ़ती ही जाएगी, बढ़ती ही जाएगी मेरे पैरों के लिए
कि मैं रुकने के लिए नहीं हूँ
चलो, नीविबन्ध खोलो, झुको और खिड़की बन जाओ
और ऊँचाइयों पर खुदाई शुरू कर देते
कि कुँओं को पाटना तो पहला काम था
कुएँ जो लालसा के थे
यूँ एक करोड़ साल बाद
राजधानी दिल्ली में एक और सृष्टि का निर्माण शुरू होता
एक बौना आदमी
आसमान के इस कोने से उस कोने तक तार बाँध देता
कि यहाँ मेरे कपड़े सूखेंगे
भीड़ के मस्तक को खोखला कर एक अहाता निकाल देता
कि यहाँ मेरा स्कूटर, मेरी कार खड़े होंगे
दुनिया के सारे आदमियों को
एक-के-ऊपर-एक चिपकाकर अन्तरिक्ष तक पहुँचा देता
कि इस सीढ़ी से कभी-कभी मैं इन्द्रलोक
जाया करूँगा जस्ट फॉर ए चेंज

और इन्द्रलोक पहुँचकर अकसर वह फोन करता,
पूछता, हैलो, अरे तुम कहाँ अटक गए ?
इस तरह इन छवियों से छन-छनकर
जो आगे आता था
वह लगभग-लगभग दिव्य था
लगभग-लगभग एक तिलिस्म
कि हर गली के हर मोड़ से उसके लिए रास्ता जाता था
लेकिन सबके लिए नहीं
कि वह दुकानों-दुकानों बिकता था पुड़िया में
पर सबके लिए नहीं
कि वह कभी-कभी सन्तई हाँक लगाता था
खड़ा हो बीच बजार
लेकिन वह भी सबके लिए नहीं
रहस्य यही था
कि वह सबका था
लेकिन सबके लिए नहीं था
ऐसे उस आगे की आँत में उतरे जाते थे कुछ–
अंग्रेजी दवाई-सेदृतेज़ और रंगीन
और कुछ अटक गए थे, ठीक मुहाने पर आकर कब्ज की तरह
और सुनते थे कभी-कभी
पब्लिक बूथ पर हवा में लटके
चोंगे से रिसती हुई एक हँसती-सी आवाज़
कि, हैलोऽऽ, अरे तुम कहाँ फँसे हो जानी !

परिभाषित के दरबार में 

सभी जाग्रत जीव
जिनकी रगों के घोड़े
मांद पर बंधे ध्यानरत खाते होंगे सन्तुलित-पुष्ट घास
विचार करेंगे
उन सभी पशुओं की नियति पर
जिनके खुर नहीं आते उनके वश में

वे ईश्वर को सलाह देंगे
कि ये बैल, ये भैंस, ये कुत्ता, ये बिल्ली
ये चूहा, ये हिरन, ये लोमड़ी
ये सब दरअसल जंगल के जानवर हैं
कि इनके विकास के लिए कोई विज्ञान रचा जाए

वे सब–
परिस्थितियाँ और मनस्थितियाँ होंगी जिनकी चेरी
जिन्होंने किए होंगे सारे कोर्स
और शानदार ढंग से पाई होगी शिक्षा

कि कैसे रखें काबू में कच्ची ऊर्जाओं को
कि कैसे निबटें ठाँठे मारती इस पशु ताकत से
जो हुक्म देती भी नहीं, हुक्म लेती भी नहीं
इसे उत्पादन में कैसे जोतें
वे सब एक दिन वहाँ बैठेंगे सिर जोड़कर
और ईश्वर को सलाह देंगे
कि थोड़ी छूट देकर देखें
कि विज्ञान यह भी कहता है
कि थोड़ी आज़ादी दो तो जानवर आसान हो जाता है

एक दिन
जब समाज में रहने की शर्त
सिर्फ हाजिरजवाबी कह दी जाएगी
अख़बारों और टी.वी. के सारे नायक
बादलों की तरह घिर आएंगे
और चिड़ियाघर के सब जानवरों को
रेल की नंगी पटरी पर दौड़ाएंगे
और असहमतों, हिजड़ों, समलैंगिकों और बिलों में रहनेवाले कीड़ों को
खींच-खींचकर बाहर निकालेंगे
और आख़िरी बयान मांगेंगे

कहेंगे कि चुप नहीं रहना
कितनी भी झूठी हो, मगर भाषा में कहना
ऐसी कोई बात जिससे होड़ निखरे
जान आए मैदान में
–अपनी सबसे प्रेरक ईर्ष्या के बारे में बताओ
–अपना सबसे हसीन चुटकुला सुनाओ

हवा में घुला हुआ गैंडा
एक दिन उतरेगा रेत पर
और वोटरलिस्ट से नाम काटता जाएगा
पागलों के, भिखारियों के, और पुलों के नीचे रहनेवाले असंख्यकों के
और जाकर बताएगा ईश्वर को
कि सरकारें चुनने का हक भी हो उसी को
जो बीचोंबीच रह सकता हो
न गुम हो जाता हो
अपनी ही नसों के जंगल में
न डूब जाता हो अपने ही ख़ून के ज्वार में

एक दिन वे बैठेंगे वहाँ और दुनिया की सफाई पर विचार करेंगे।

वे तुम्हें मज़बूर करेंगे

वे तुम्हें मज़बूर करेंगे
कि तुम्हारा भी एक रूप हो निश्चित
कि तुम्हारा भी हो एक दावा
कि हो तुम्हारा भी एक वादा

कि तुम्हारा भी एक स्टैण्ड हो
कि तुम्हारी भी हो कोई `से´

वे तुम्हें मज़बूर करेंगे
कि रुको
और, कि या तो हाँ कहो या ना
कि चुप मत रहो
कि कुछ भी बोलो–अगर झूठ है तो वही सही
वे तुम्हें मज़बूर करेंगे
कभी गालियों से
कभी प्यार से
कभी गुस्से से
कभी मार से
कभी ठंडी उदासीनता से तुम्हें तुम्हारे कोने में अकेला छोड़
दीवार पीछे खड़े हो इन्तज़ार करेंगे
वे तुम्हें अपने धैर्य से मज़बूर करेंगे

वे तुम्हें मज़बूर करेंगे
कभी कहेंगे कि तुम फ़ालतू हो,
कि ऐसा है तो तुम्हें मर जाना चाहिए
वे तुम्हें अपने ठोस फैसलों से मज़बूर करेंगे
वे तुम्हारे सामने एक शीशा रख देंगे
और कहेंगे कि इससे डरो जो तुम्हें इसमें दिख रहा है

वे तुम्हें मज़बूर करेंगे अपनी कल्पना से
और कल्पना की प्लानिंग से
वे कहेंगे कि तुम ईश्वर हो
बल्कि उससे भी ज्यादा ताकतवर
आओ और हम पर राज करो

वे तुम्हें मज़बूर करेंगे अपने समर्पण से।

श्रद्धावादी वक़्त में 

श्रद्धा का सूर्य शिखर पर था
सबसे ठंडे मौसम में भी जो गर्माती रहती थी भीतर ही भीतर
चपल चापलूसी की चलायमान चांदी गुफ़ा में दहकती थी जो सतत,
ठंडी अपराजेय वह आग
अपनी नीली लपटों से झुलसाती सृष्टि को

कि पिघल बह गया शरीर
शरीर के डबरे में भर गया
बची बस एक आँख तैरती
पूछती
बोल-बोलकर–
कि श्रद्धा से लबालब इस महागार में है कोई सीट खाली
बैठकर हिलने के लिए
दमकते वक्तृत्व की ताल पर
झमाझम व्यक्तित्व की चाल पर !

कि हम अपने पहलों से थोड़े छोटे
हम चाहते हैं कि
पहले से छोटी हमारी आज की दुनिया में
हमें हमारी जगह मिले

कि कल हम भी
आज के मंच से छोटे
एक मंच के मालिक होंगे
श्रद्धा उपजाने की मशीन से
कातेंगे वहाँ बैठ अपनी नाप से छोटे कपड़े
अपने बादवालों के लिए

जितनी मेहनत हमने की
उससे कम मेहनत करने की सुविधा देंगे
अपने अनुजों को
सिखाएंगे उन्हें इससे भी घोर अनुकरण
और मनीषा जिसके जेबी संस्करण
श्रद्धेय ने हमें दिए
उन्हें हम आनेवाले उन जिज्ञासुओं की
उंगलियों पर बटन बनाकर धर देंगे
कि वे जब चाहें
पा लें अपने पापों के तर्क

सो, हे मानवी मेधा के साकार पुरुष
अपने असंख्य खम्भों वाले इस छोटे से दालान में
हमें बताइए, कि अपनी इन योजनाओं के साथ हम कहाँ बैठें!

हमें अभिनय करना पड़ता है परवाह का
बीच बाजार, जब हम पकड़े जाते हैं,
अपने अगलों को हम देंगे खूब सारा अंधेरा
कि सुस्थ, बाइत्मीनान बैठ वे सोच सकें
सबसे बकवास किसी मसले पर,
मसलन मसला मालिक के मूड का
फसलन फसला फालिक के फूड का
हमसे भी ज्यादा सुलभ तुक उन्हें मिले
हर जंग वे जीतें और अंग भी न हिले

आपने हमें दी सूक्तियाँ
हम उन्हें दें कूक्तियाँ।

ख़ुशी के अन्तहीन सागर में

खुशी खत्म ही नहीं होती
कुछ ऐसी मस्ती छाई है
कि रात-भर नींद नहीं आई है
फिर भी सुबह चकाचक है
हिृतिक रौशन प्यारा-प्यारा
मुन्नी की आँखों का तारा
सेवानिवृत्त दद्दू कर्नल जगदीश
बाल्कनी में जा¯गग करते-करते हुलसे–
नायकहीन अँधेरे वक्तों का उजियारा
आमलेट के मोटे पर्दे के पीछे से
बैंक मनीजर कुक्कू ने मुस्कान उठाई–
वह देवता है खुशियों का
सुन्दर सुबहों को जगानेवाला परीजाद
देखो, मछलियाँ उसकी देह की क्या कहती हैं–
लिपिस्टिक बहू
बाथरूम के दरवाजे पर विजयपताका-सी लहराई
पर्दे के इस कोने से उस कोने तक दरिया-सी बहती हैं–
मम्मू बोलीं
साठ साल की उजले दाँतोंवाली मम्मू
नए दौर का नया ककहरा सीख रही हैं–
क ख ग घ च छ ट ठ, मेरी घटती उम्र का घटना
उसके ही शुभ-शिशु-आनन के दरशन का परताप
मुझे यह मेरे खेल-खिलौने दिन वापस देता है
इसके वह कई करोड़ लेता हैदृ
ज्ञानी मुन्ना बाबा ने खुशियों-भरी सभा में अपनी पोथी खोली
‘स्टारडस्ट के पण्डित’, चुप करदृदद्दू कड़के
कीमत का मत जिक्र चला, ओ निर्धन माथे
कीमत का जिक्र अशुभ होता है
तुझसे कभी किसी ने
किसी चीज की कीमत पूछी, बोल
कीमत तो है शगुन
असल चीज है खुशी
खुशी जो खत्म न हो–
डाक्यूमेंट्री फिल्मों के निर्माता
निशाचर
पापा
घर के मुखिया
खुशियों के कालीन पै पग धरते ही चहके
खुशी ही रचे उन्हें
जो करते लीड जमाने को
पिछले हफ्ते नहीं सुने थे वचन
गुरु खुशदीप कमल सिंहानीजी के ?
खुशी ने ही तो उसे रचा है
उस मुस्काते, उस उम्र घटानेवाले जादूगर नायक को
और हमें भी तो
रचा खुशी ने ही–
बेडरूम से पर्दा फाड़
भैया बड़े कृष्ण भक्त
पोप्पर्टी डीलर, बोले–
खुशी की गागर धरो सहेज
शेष कृष्णा पर छोड़ो
आँखें मूँदोदृअन्तर के संगीत में नाचो
खुशी के अन्तहीन सागर के तल पर
हृदय से झरते जल पर डोलो
(धूम धाम धाम धूम धमक धमक धन्न)
कृष्ण हरे बोलो।

भूखे बच्चों के सप्ताह में

वह भूखे बच्चों का हफ़्ता था
जैसे कहा करते हैं
कि फलाँ साल दुर्घटनाओं का था
या जैसे कोई दिन सुन्दर लड़कियों का होता है
कि सुबह घर से निकले तो एक दिखी
और फिर शाम तक जब भी कहीं से पिटकर निकले
बाहर खड़ी एक मिली

वे लोग
–जैसाकि दफ्तर जाते हुए लोग उन्हें कहा करते हैं
पूरे सप्ताह मुझे यहाँ-वहाँ मिलते रहे
अर्थशास्त्र पर लेक्चर सुनकर निकला
तो बाहर एक खड़ा था

साम्प्रदायिकता पर नाटक देखकर बाहर आया
तो एक खड़ा दिखा

बस से उतरा और दफ्तर की तरफ़ चार क़दम चला
तो देखा एक पीछे-पीछे आ रहा है
जैसे कोई आवाज़ हो

दुकान में गया
और जब बाहर आया तो देखा एक खम्भे से लगा खड़ा था
मुझे ऐसे देख रहा था
जैसे वह पुलिस हो, मैं चोर

शनिवार को अम्बेडकर पार्क गया
जहाँ हिन्दू युवकों को लाठी सिखाई जाती है
और जब झुटपुटा गिरे निकला
तो देखा दीवार से सटे दो बैठे हैं
मुझे देखकर कसमसाए
जैसे मैं नरेन्द्र मोदी और वे मुसलमान हों

मैं क्या कर सकता था
यह हफ्ता ही दरअसल उनका था
जैसे यू० एन० ओ० बच्चों के दिन और साल मनाती है
ऐसे ही भूखे बच्चों की भी कोई यू०एन०ओ० होगी

आगे इतवार था
उस दिन भी एक दिखा
कड़ाके की सर्दी में सिर्फ़ कच्छा पहने था
और एक ख़ुशपोश आदमी को नंगा करने पर लगा हुआ था
मैंने टोका तो बोला
मेरे थे पाँच रुपए। गिर गए थे। इन्होंने उठा लिए। दिलवाओ
आदमी बोला — भाई साहब
आप जानते नहीं इन्हें। ये लोग ऐसे ही करते हैं
मैं सुन ही रहा था
कि वह सुनकर लौट पड़ा
मैंने उसे कोहरे में जाते देखा
जैसे सिल की बेकारी से ऊबकर बट्टा जा रहा हो
चुप ही रहते हुए मैंने सोचा
हो सकता है सचमुच अब ये ऐसे ही करने लगे हों। फिर सोचा
हो सकता है अगला हफ्ता इनके ऐसे करने का हो।

कि जैसे रिक्शेवाले ने प्रेम किया हो

दिल्ली-बम्बई की औरतों ने
नन्हे-मुन्ने कपड़े पहनने से पहले
देश के ग़रीबों की राय नहीं ली
यह पहली ग़लती थी

उसके बाद तो
क्योंकि ग़लतियों से ग़लतियाँ जन्म लेती हैं
हर सुबह ग़लती की तरह होने लगी
यूँ कि रोज़ सुबह सूरज निकलता
और छूटते ही कहता–धत् तुम्हारी ऐसी तैसी, और सिर झुकाकर बैठ जाता

यह प्रेम के तरीकों पर शोध का दौर था
देह के देवत्व पर रात-दिन काम चल रहा था
वात्स्यायन की एक टीका रोज़ बाज़ार में आती थी
और प्रेम प्रीतिभोज में कड़ाहों की तरह जगह-जगह चढ़ा हुआ था
खौल रहा था – पक रहा था

पर रिक्शेवाले इसमें शामिल न थे
वे अस्फुट स्वर में गालियाँ देते जाने किसे
जब लैला उनके पास से गुज़रती – जैसे मन्त्र बुदबुदाते हों
वे रिक्शे को खड़ंजे पर वहशियाना दौड़ाते
कि जैसे लैला लकड़ी की हो
या कि उसे लकड़ी कर देना हो
वे पैडल पर सीधे खड़े होकर तूफ़ानी मोड़ मुड़ते
और दुनिया की तमाम अप्राप्य औरतों की शान में कुछ कहते जिसे समझना मुश्किल होता

और घर जाकर
अपनी मैली बिसाँधती औरतों को
कोहनियों से कूटते
कि जैसे उनके लिए प्रेम को असम्भव कर देने की गलती भी उन्हीं की हो

काग़ज़ों से खेलती सभ्यता
उन्हें यूँ लगती
कि जैसे नामर्दों का मन्दिर सजता हो
वे अपनी मर्दानगी पर अडिग थे
और रह-रहकर कहा करते थे
कि बस एक रात इसे मुझे दे दो
फिर देखो कैसे खिलती है यह कली

वे लेटे रहते थे
रिक्शों के छज्जे ताने
सोसाइटियों की कुशादा, गर्म सड़कों के किनारे
कि जैसे समन्दर में तूफ़ान हो
और वे कुदरत के इशारे का इन्तज़ार कर रहे हों
और कतरते रहते
फ़िल्मी कतरनें
जिन्हें पहनकर उतरती थी धीरे-धीरे-धीरे परी
चौथे-पाँचवें या जाने कौन से आसमान से
वे हँसते रहते
बुडि्ढयों के पजामों और बुड्ढों के निक्करों पर
और नजाकत पर जो जाने कैसी-कैसी नौटंकियाँ करती फिरती थी

वे डरते नहीं थे
उनके पास रिक्शा था
और हुशियारी की लम्बी ग्रामीण परम्परा
जो उन्हें अकाट्य लगती थी। और ह्यूमर जिसमें हिंसा और करुणा गड्ड-मड्ड रहती थी। और आँच जो आग से उनकी हिफाजत करती थी (हालाँकि वे फूल नहीं थे)

लेकिन वे रह जाते थे
मुँहबाए फूल की ही तरह
जब चिलचिलाती। अपने ही ताप से काँपती। सफेद टीन-सी धूप में
जैसे सट ही जाती हो आकर परी
कि जैसे आग की एक लपट ने ही पहन लिए हों फूल
और कहती हो कि चलो वक़्त है वापसी का

और तब अचानक
सैकड़ों सालों के इन्तज़ार के बाद
दुनिया बदलना शुरू होती
कि जैसे कोलतार के गगनचुम्बी खम्भे
पिघल-पिघल जज्ब होते हों रेत में
कि जैसे दुखों और उदासियों के
खुदरा बुराइयों और शिशु बदमाशियों के
आड़े-टेढ़े पत्तर आँधियों में उड़ जाएँ
कि जैसे सारी धरती के दरख़्त
लाइन बनाकर बैण्ड बजाते चारों ओर से घिर आएँ
कुदरत सारी `हैराँ-हैराँ´ हो जाए

तब वे हाथ मारते
एक पराई दुनिया की पराई हवा मेंं किसी भाषा के एक शब्द के लिए
जो या तो उनके दिल को बोल दे
गर नहीं तो इस इन्द्रजाल की जादू-गाँठ खोल दे
कि इस हार के मुँह से
वे नहीं दिखना चाहते थे ऐसे कि कोई देखकर कहे
कि देखो रिक्शेवाले ने भी प्रेम किया।

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