इला कुमार की रचनाएँ

कहा था मैंने 

कहा था मैंने
लौटकर
कभी न कभी अवश्य आऊंगी

किसी गर्म उमस भरी दुपहरिया में
ठसाठस भरी बस से उतरकर
अपने शहर की मोहग्रस्त धरती पर

छूट गया समय
एक बारगी हिलक उठता है

दूर गुलमोहर के पीछे
आकाश के विस्तार में छिपी है
दो आकुल आँखों में भरी प्रतीक्षा

सम्पूर्ण सिहरते वजूद का यह वाष्पित दाब

जब अमृत बरसा

उछलती, मदमाती आई,
चंचल, अल्हड़ इक धारा,
सहसा, टूटकर, बिखर गई,
उस ऊँचे पत्थर के ऊपर,
वक्र हूई दृष्टी,
हुआ कुपित चट्टान,
निर्जन वन में, थामे खड़ा मैं, ज्यों सातों आसमान,
जड़ें मेरी पाताल को हैं जातीँ,
कंधों पर ठहर ठहर जाते बादल,
किसनें ? किसने भिगोयी मेरी, ये वज्र सी छाती,
रुकी नहीं, थमी नहीं, चंचल धारा,
बह चली, पत्थर दर पत्थर,
बोली, सहसा पलट
हां बिखेरी मैंने, अंजुरी भर भर
शीतल धारा,
यूं रचा मैंने, तेरे गुहार में,
मुट्ठी भर जमीं,
होगा कभी अंकुरित यहाँ,
बरस बीते,
इक नन्हा सा, दूर देश का बीज
पिरो देगा वह कण-कण
पतले अंखुआये नन्हें कोंपल,
दिखोगे तुम स्रष्टा
कहलाओगे पालनकर्ता
विहंसा चट्टान,
शिला सी उसकी मुस्कान
पिघल गई धारा के साथ

झुके हुए दरख्तों के पार 

झुके हुए दरख़्तों के पार झाँकती है एक किरण
बुझी-सी अनमनी-सी
पुरते सपनों के हर रंग को
डुबो-डुबो जाता है गाढ़ा अंधेरा

अनिश्चित को चाहते हुए असमंजस की दीवारों से घिर जाती हूँ
तो
पर्त-सी खुलती है
कि
चांद तो दूर कहीं दूर
आंधियों के पार घिर, जा चुका

रेतीले चक्रवातों के बीच
डगमगाती खड़ी हूँ
किसी नए क्षितिज कि तलाश में

दौड़ जाने दो क्षण भर

आपकी स्नेह भरी छाँव को झुठलाती मैं
नन्हीं चिड़िया सी घर में इधर-उधर फुदक जाती मैं

पर
उसी छाँव के सहारे पलती बढती
जाने कब हुई घने वृक्ष जैसी बड़ी मैं
पता नहीं बीते कितने बरस
भूल गए सारे के सारे, पुराने पल
इस क्षण ऊँचे लोहे के जालीदार गेट को देख
मन क्यों अकुलाया
एक बार झूलने को हुआ तत्पर

मुड़कर पीछे देखने पर ज्यों
निहारता है मुझे मीठी निगाहों से
कोई जादूगर
ना, रोको नहीं मुझे
अभी क्षणांश में लौट आऊंगी
पर इस पल दौड़ जाने दो मुझे बाँहें फैलाए
फूली फ्राक के घेरे के संग-संग
बचपन कि कच्ची-पक्की गलियों में क्षण-भर

आधी रात 

महावृक्ष की क्रोड़ में जागा हुआ पक्षी
बेचैन हो निकल आता है
खुले आसमान में
बादलों की तनी चादर के ऊपर
वहाँ

एक नीली नदी क्षितिज की खाई से निकलकर
अचानक बह निकलती है
उस नदी तट पर

बादलों के श्वेत पुष्प जमघट की शक्ल में बतेरतीब छितरे हुए
वहाँ
अपने डैनों को उर्ध्वता में फैलाये
महापक्षी
आकाश के शून्य में मंडराता है

सारे परिदृश्यों के बीच
अपनी चोंच अपने पंखों के झकोरों से शून्य को टहोके देता हुआ

वह दृष्टि के द्रष्टा को खोजता है
श्रुति के श्रोता को सुनता है
मति के मन्ता का मनन करता है
विज्ञति के विज्ञाता को तलाशता है

उसे सर्वान्तर का पता-ठिकाना चाहिए
पक्षी जो आकाशदेव के राज्य में मंडराता है
उसे कुहासे की तनी चद्दर
बादलों के शफ्फाफ़ पुष्प
गहरी नीली झील से पसरे आसमानी समुद्र
धुवें के बीच बैठे बादल गण
नहीं लुभा पाते

इन सबकी नहीं
उसे
सिर्फ अपनी तलाश है

तलाश जारी है

ठहरा हुआ एहसास. 

एक एक बीता हुआ क्षण
हाँ
पलों मे फासला तय करके वर्षो का
सिमट आता है सिहरनो में
बंध जाना ज़ंजीरों से मृदुल धागों में
सिर्फ़ इक जगमगाहट,

कितनी ज़्यादा तेज सौ मर्करी की रोशनियों से
कि
हर वाक्य को पढ़ना ही नहीं सुनना भी आसान
कितनी बरसातें आकर गई

अभी तक मिटा नहीं नंगे पावों का एक भी निशान
क्या इतने दिनों में किसी ने छुआ नहीं
बैठा भी नहीं कोई?

अभी भी दूब
वही दबी है जहाँ टिकाई थी,
हथेलियाँ, हमने.

अश्रांत आविर्भाव 

सड़क की खुरदरी सतह हो
या सुचिक्कन प्रासाद का प्रवेशद्वार
कोई बढ़ता चलता है
हर पल पर साथ साथ

निर्जन वनों में
ऊंचे पहाड़ों तले फैली विस्तृत चरागाहों में
शांत उदास सडकों पर
किसी भी अमूर्त से पलांश में

अचानक अवतरित हो उठता है पाशर्व में
भरमाता-सा
अपनी उदार बाहों में भर चौंका देता है
एक दिलासा
मैं हूँ
हर पल तुम्हारे साथ
हर पग को थामता

सूर्य का यह अश्रांत आविर्भाव

दृक्-दृश्यौ 

तय था
किसी एक दिन
ओसों की टप् टप् सुनते हुए

जाऐंगे हम पहाड़ों के पैरों तले
जहाँ दूर तक बिछी है गहरी हरी घास की चादर

रख देंगे किसी अनचीन्ही सतह पर
कुछ सपने
उद्वेलित मन प्राणों की सेंध से झांकते
अकुलाते ह्रदय की शांति

प्रतीक्षारत हैं वे

ऊँचे कन्धों पर आकाशों की
खुली खुली सी घेरती बाहें दुलारती मंद बयार
छलछलाती झरने की दूधिया धार

मीलों लंबे कालखंडों के पार

यह मन गहरे स्वप्नों के बाद
अकेला बैठा उकेरता है समाधिस्थ योगी सा
विलीन होने लगता है द्वैत और द्वैती का भाव
अखिल महाभाव में
सपने
अनदेखी मान्यताएं

अंत में बच रहते हैं
त्वं तत् और
झुके बादलों के पार का आकाश
जहाँ प्रतिबिम्बित हो उठता है
शून्याभास का नितांत निजी संसार

दिग्भ्रमित बयार 

उस रात
रचा गया
दूर से दिख सकने वाले दृश्य की
अनगढ़ कल्पना का द्वार
हवा ठकठकाती रही
हलकी सी टिकी सांकल की धकेल कर

भीतर घुस आने का साहस
वह नहीं जुटा पाई थी
सिर्फ़ अपने झनकते स्पर्श से
डरती बुझाती रही हमें

आसपास बिखरे
सत्यों को स्वीकारने का साहस
उस दिग्भ्रमित बयार में नहीं था

तुम कहो

तुम कहो

एक बार
वही बात
जो मैंने कही नहीं है
तुमने सुनी है
बार बार

वही बात
तुम कहो

जिद मछली की

समुद्र के रास्ते से आता है सूरज

सूर्य
जो उदित होता है सीना चीरकर
बादलों का
धप्प् से गिर जाता है सागर की गोद में

गोद भी कैसी
आर न पार कहीं ओर छोर दिखता नहीं

एक सुबह अल्ल्सबेरे जागी हुयी
छोटी सी मछली
मचल गई देखेगी वह
सूरज का आना
तकती रही रह रह कर

दुऽप्प….! दुऽप्प….! सतह से ऊपर
बार बार

जान नहीं पाई
कब और कैसे सूरज उग पड़ा

जिद मछली की
जरुर देखेगी वह जाना सूरज का
आख़िर
घूम फिरकर आएगा थककर
खुली खुली अगोरती बाहों में
सागर के

शाम की लाली तले एक बार फिर
दप्प से कूद गया सूरज
समंदर की अतल गहराइयों में
न जाने कितने कालखंडों से तैर रही है
वही मछली
दिग्भ्रमित
युग युगंतारों अतल तल को
अपने डैनों से कचोटती

क्या जान पायेगी कभी
ख़ुद ही है
वह सूरज और सागर भी

बादलों के पार स्थित
निर्द्वन्द आकाश में उद्भूत
अनन्य महाभाव भी

तुम्हारा नाम

लिखा, मिटाया
फिर लिखा, फिर मिटाया,
पता नहीं कितनी बार

नंगी चट्टान की इस रुखी कठोर छाती पर
तुम्हारा नाम
वही नाम

जो हमारे बीच के स्वप्निल पलों के बीच पला,
संबंधों के गुलाबी दायरों के बीच दौड़ा
आंखो के जादू में समाया समाया,
आखिर एक दिन

किसी नाजुक से समय में मेरे होठों से फिसल पड़ा था,
और तुमने सदा-सदा के लिए उसे अपने लिए सहेज लिया था

वही नाम
जो आज तुम्हारे लिए है,
शायद इसलिए ही इतना प्यारा है

मेरा सपना

बड़े ऊँचे से उस पहाड़ के शिखर पर
वो हल्का नीला, बताओ तो मकान है किसका
मुझे पता है…
वो मकान है जिसका…

बड़े प्यार से उसने देखा था इक सपना
सहेजा उसे हथेलियों के बीच
ज्यों तूफानी रातों में, मोमबत्ती की लौ को बचाए कोई
हर ईट खुद से रखवाई
हर दीवार उसने रंगवाई
बड़े दुलार से
कि, जब बड़ी होगी उसकी लाड़ली
हवाएं उसे सहलायेंगी, घटाएं दुलारेंगी
जवानी की देहलीज में वो जब प्यार से कदम रक्खेगी

लंबे-लंबे बालों को लहराकर
सुनहरी बाहों को फैलाकर
कब वो गुनगुनाएगी
तो
शायद यहाँ स्वर्ग ही उतर आए
किन्ही आँखों में
हां,
आज जब कोमल कली-सी
अपनी बाहें फैलाती है बादलों को थामने के लिए…
ममा पपा मानों लहरों को तौलते हैं आंखो में अपने

काश,
पुरे हो सभी के सपने यूं
झुलाए बाहों में परियां हमें ज्यूं

वह सोचती है 

एक स्त्री कुछ खोजती हुई-सी आती है
कंधे पर झोला लटकाए हुए
खोज के पीछे-पीछे उसकी आकांक्षाएँ
ईर्ष्या, द्वेष, तीक्ष्ण दृष्टि
सभी कुछ चले आते है

अ-आकारित, पंरतु पूर्ण सजग
असतर्क, नर्म, बेपरवाह सतहों में आग लगाने को तत्पर

वह अपने व्यक्तित्व के समस्त आयामों के साथ
कुछ समय व्यतीत करती है
अर्धपरिचित परिचिता के संग
वह बिताती है कुछ समय

बीतता हुआ वक़्त ढलती धूप के संग मिलकर
किसी एक अनजाने खेल को रच डालता है

कौतुकवश

धूप अपनी अदृश्य रश्मियों के जादुई ज़ोर से
स्त्री के पीछे चलते समस्त दुर्गन्धित
भावनाओं का हरण कर लेती है

सोख लेती है वह ईर्ष्या, द्वेष, तीक्ष्ण दृष्टि
सभी कुछ
चुपचाप

स्त्री के व्यक्तित्व के संग एक स्वच्छ पारदर्शिता बिलम जाती है
नई-नई परिचित दो स्त्रियाँ
आपस में बोलती-बतियातीं हैं
हँसती-खिलखिलातीं हैं
मायूस भी होती हैं कई मुद्दों पर
घर और समाज में उपस्थित कँटीले दबावों को याद करके

मुलाक़ात का वक़्त बीत चुका है
वापस लौटती हुई स्त्री का झोला खाली-खाली सा है

मन भरा-भरा हुआ

उसे नहीं पता है
उसके तमाम अवगुण
उस श्वेत गोल टेबल की सतह तक
उसके संग चलकर गए थे

जहाँ रक्खे गए थे तरल पेय भरे गिलास
और
शुभ्र-धवल बटर-मिल्क भी

उसके तत्काल बाद ही गवाक्ष से पैठती हुई
सूर्य रश्मियों ने कौतुक रचा था
तमोगुणी तत्वों को सोख डालने का कौतुक

वापसी के रास्ते
कुछ ढूँढ़ती-टटोलती सी जाती हुई वह स्त्री
बार-बार डगमगाते विचारों में निमग्न होती है
वह सोचती है…

ऊपर उठी शाखाओं के पीछे

ऊपर उठी शाखाओं के पीछे है
शाम का आसमान
लम्बी पूँछ वाली चिड़िया एक एक शाख
नीचे उतरती है
उसकी भंगिमा में है थोड़ी हिचकिचाहट
थोड़ा संकोच

वह धीमे से झुककर पत्तों के बीच
थोड़ा रस पीने की चेष्टा करती है
उसके पंखों की छुअन में छिपी है कोमलता
ख़ूब सारी कोमलता

इच्छा होती है कि आए वह यहाँ
कार की खिड़की के अन्दर
आकर बैठ जाए यहीं कहीं

छू लेने दे अपनी कोमल हिचकिची भंगिमा
मन की आकांक्षा आकाश की सतह पर
स्वयं को अंकित करने बढ़ चलती है।

एक पेड़ 

एक पेड़
गैरेज के पार्श्व में बड़ा होता है
महलनुमा गृह के अहाते में

घर की माँ
उसे काजू-वृक्ष समझकर खरीद लाई थी
दूर देश के मेले से

हर वर्ष बसंत-पतझड़ के दिनों को गिनता हुआ
साल-दर-साल
बाल्टी-बाल्टी पानी सोखता हुआ

वह तथाकथित काजू का वृक्ष
बढ़ता जाता है
पत्तियों का मुकुट संभाल, दरख़्ती पत्तों की बाहें फैलाए

डालियों से डाल
डाल से डालियों को बार-बार पसारता हुआ
सालों-साल गुजरने के बीच

कई बार घर के मालिकनुमा बेटे की नज़रों में
वह पेड़ खुभ जाता है
घूरती निगाहों से वृक्ष को चेतावनी
-इस साल न फले
तो कटवा दिए जाओगे!

आह!

धमकियों के बीच फिर भी वह पेड़ बढ़ता है
सालों के बाद बसंत में
घर की माँ आशान्वित नजरों से
उसकी कोख पर गहरी नजर डालती है

आख़िरकार
एक सुंदर सलोने समय के बीच
पेड़ की शाखों पर, डालियों पर
नवे अंकुर झूम आए
वृक्ष ने स्वयं को रच डाला
नन्हीं फलियों को काजू जैसी मुरकनी झोपी में सजा

वह बादाम के स्वादवाली फलियों के संग
जग के सामने प्रस्तुत हुआ

वे फल
फल तो थे
लेकिन वे फल काजू न थे

घर की नन्हीं बिटिया को
अचरज है
दुःख से भरकर वह सोचती है

फला-फूला हुआ
वह फलदार दरख़्त
आखिर क्यों कटवा दिया गया

एक औरत

एक औरत
झेलती है अपनी रीतती हुए उम्र की सलवटों को
पीछे चलते बच्चों के संग

अपने शरीर के पहरुओं को भूली हुई
जो उससे खुद उसी की पहचान मांगते
अन्य रिश्तों के बीच ठिठके हुए

रह-रह कर एक हिंसा कौंधती
दयामयी की अनगिनत माफियों पर

अतृप्ति के असली जनक को
वे खूब पहचानते हैं
वे नहीं जान पाते कि
औरत
अपनी अतृप्ति को हर हमेशा
बच्चों की खुशफहमियों से झांप लिया करती है!

देशी खीज

ढोलक की थापों से निर्लिप्त
बड़ी बहू
बातों के पार छिपे अदृश्य सुख को
तलाशती है

शादी की चहल-पहल से
उसे
क्या लेना-देना
हां नेग में मिले कंगन की झिलमिलाहट
सुच्चे मोतियों के बीच
मोहती तो है

रह-रहकर वह उचकती है
एड़ियों के बल
पास खड़े सुदर्शन पुरुष की ओर

लुभावनी अदा का दांव
अनचटके ही मोह लेता है
किशोरियों के झुण्ड को

दरी पर बैठी औरतों की निगाहों में भरी हसरत
पर्दे तक छलक उठती है
कोई नहीं देख पाता

भरी-पूरी देह-यष्टि में सुलगते अभाव को
ठिगने पति के बगल में
पीठ झुकाकर खड़े रहना
हर पल
कितना त्रासद है
वह भी विदेश में…

अपूर्व शिखर 

वह अपनी बेटी को जनम देती है
मातृत्व की विलक्षण अनुभूतियों के बीच मृदुलता का
जादू जाग उठता है
संतान के मानस को हिंसा के विष झकारों से दूर
रखने के प्रण के साथ वह
कई सालों तक सुनहली वीथियों के बीच सुगंध की
तरह विचरती है

पूरे बारह वर्षों के बाद लड़की एक सांझ खुले
आसमानों के नीचे आ खड़ी होती है
तनी हुई बाहों की शाखों पर गुलाबी रंगत के नाखून
मासूमी से मुस्कराते हुए
अंगुलियों की पोरों पर नीले चंदोवे को
महसूसने के लिए वह
अपनी बाहें
दूर आकाश की तरफ तान देना चाहती है
एक पैर घुमा कर सारी धरा को घेरते हुए नृत्य मुद्रा
की खास भंगिमा बनाना चाहती है

आने वाले बेतरतीव वर्षों में
उसका परिचय
संसार में बिखरी हिंसाओं से होता है

सहेली के बोलों में घुली हिंसा
पति की सांसों में रची-बची हिंसा
सास-ननद के कटाक्षों में बिंधी हिंसा

कई वर्षों के बाद एक उमगती शाम में वह
अपने अंतर से उन्मुख होती है
वहां तमाम खाली जगहों में भरी
हिंसाओं को देखकर आश्चर्यचकित होती है
कसे हुए तानो-बानों के बीच उमड़ती सड़ांध
उसे एक बड़ी झील की तलाश है

तमाम जमी हुई हिंसाओं को घेरने वाले वलयों के
सिरों को वह तोड़ेगी

सारा विष बहते पानी में बहा देगी
उसे मातृत्व के उस निर्मल शिखर की तलाश है
जहां बैठकर मां अपनी संतान के लिए
एक हिंसामुक्त संसार का स्वप्न देखती है

उस अपूर्व शिखर पर जाने का ख्याल
खुद को संवारने का ख्याल
पूरी पृथ्वी के आसपास मंडराता है!

ताश की मेज

गोल मेज पर बिखरी हुईं
ताश की रंगीन पत्तियां
तीन काली बीबियों की बगल में
ठिठका ललमुंहा राज चुप है

जोकर के सिर के पास
नृत्य की भंगिमा में
सच का जोकर कांपता है

मद्धम रोशनी के घेरे
अभिजात्यिक भंगिमा में दबी कोमल आवाजें

ऐसा नहीं कि ईर्ष्या और पराजित होने की बात
वे भूल गये हैं
नये मंगलसूत्र की मोटी चेन
अव्यक्त दाह सिरजती तो है
बेअसर है बरसों के साथी की गैर-मौजूदगी

सबके ऊपर
ऊब की ठंडी धार
अंदर ही अंदर रंगों को खखोरती है!

किन्हीं रात्रियों मे

किन्हीं रात्रियों में
जब हवा का वेग किसी ख़ास पग्ध्वनि के बीच लरज़
उठता है
और मैं पोर्टिको के बगल वाली चोटी दीवार पर बैठी होती हूँ
मोटे खम्भे से पीठ टिकाए हुए
बगल की क्यारियों की बैंगनी और गुलाबी पंखारियाँ
फरफराती हैं
जर्बेरा का मद्धम श्वेत पुष्प अपना मुँह पृथ्वी की ओर थोड़ा झुका
लेता है
मानो शर्म से
उसी समय
मेरे अन्तर से जनमती हुई आकाँक्षा मुझे घेर लेती है
जानती हूँ तुम्हे ये कान सुन नहीं पायेंगे
इन आंखों की दृष्टि से परे हो तुम
तुम
मेरी समस्त इन्द्रियों के महसूस से दूर हो जैसे

ठीक इसी समय
वह आकाँक्षा साँप की तरह फहर कर लहरा उठती है
तानकर खड़ी हो जाती है
घास की नर्म हरी परत के ऊपर से लेकर
वहाँ आद्रा स्वाती नक्षत्रों के बीच तक
तुम्हे देखने महसूस कर पाने की अदम्य आकांक्षा

अपने समस्त सुंदर कोमल भावों के साथ
मैं
यहाँ
तुम्हारी प्रतीक्षा में
तुम्हारा आना महसूस करने की यह स्वप्रतीक्षा बेला
मुझे आमंत्रित करती है

तुम दृष्टि से दृष्टव्य नहीं
कानों से श्रोतव्य नहीं
त्वचा के स्पर्श के घेरे से दूर हो तुम
फिर भी
कैसे
किस भाँति
तुम मेरे अन्दर हो
बाहर भी
इस अनाम गंध से पूरित वायु की भाँति
तुम मुझे चारों ओर से घेर लेते हो

उसके बाद

बिना भाषा
बिना शब्दों के कहते हो
यह मैं हूँ
हाँ
यही हूँ मैं

कितनी देर और 

आँख जो
आकाश के आरपार निहारती है
सम्पूर्ण सृष्टि को

सत् का असत् और असत् का सत्
दोनों चुप हैं

मौन है वायु में निहित प्राण
समूची पृथ्वी अपने पगों से विरच
अदृष्ट दृष्ट वैश्नावर
यही कहीं डिसोल्व होता हुआ

कालखंड के बीच से झरता हुआ समय प्रवाह

अभी और कितनी देर

कितनी देर और?

जाना तय है

शाम होते ही लौट आई हूँ
चिडियों से होड़ लगाकर

वहां खाना और पानी नहीं है
बुभु क्षा या तितीर्षा का नामोनिशान नहीं

आकाश न जाने किसकी छाया के अन्दर उनींदा रहता है
उख की अदम्य लालसा अनवरत खीचती हुई
उतनी दूर जाकर सुख कहाँ पाऊँगी

निर्धूम ज्योति अभी भी अनंत कालखंडों की दुरी पर
हजारों साल पहले वेफ प्रतिबिम्बों टेल दबी हुई

बीच का समय शुन्य में मिला हुआ

जाना तय है

एक दिन 

एक दिन वह अकेला बैठा
रचता था आकाशों के बीच अवस्थित
अपने संसार के तंतुओं को

हलकी सुन गुनाहट ओ के बीच
कौंधती है आवाज निशब्द बहसों की
कौन?

कौन कहता है ऐसी अद्भुत कथा
संबंधो के प्रयाग की

वीरोचित चंदन की तह के भीतर से उठती हैं आकुल आवाजें
पत्थर की खुचरन सी ठंडी और बेजान

जल की धारा थम गई
नकार दिया उसने बहते जाने का गुण
पूर्ण चैतन्य हवा की संजीवनी लहर वहीँ थिर गई

आकाश ने त्याग दिया
अपने विस्तृतता के एकात्म लयित गुण को
कण-कण में वेष्ठित आकाश
सघन अभेद्यता के पार टिका रह गया
निश्चल पड़ा रहा वायु का महमहाता झकोरा

थमी हुई नदी की
कठोर अबेधता के पार
रुके रहे रीते पात्र
पंचभूतों के धैर्यित गुणों पर हावी
इस अनिश्चित घबड़ाहट और व्यथा से अब

रचनी है एक निर्द्वान्दता

सीने के अन्दर हिलती रही एक साँस

माँ की तस्वीर 

मम्मी माँ मम्मा अम्मा, मइया माई
जब जैसे पुकारा, माँ अवश्य आई
कहा सब ने माँ ऐसी होती है माँ वैसी होती है
पर सच में, माँ कैसी होती है
सुबह सवेरे, नहा धोकर, ठाकुर को दिया जलातीं
हमारी शरारतों पर भी थोड़ा मुस्काती
फिर से झुक कर पाठ के श्लोक उच्चारती
माँ की यह तस्वीर कितनी पवित्र होती है
शाम ढले, चूल्हा की लपकती कौंध से जगमगाता मुखड़ा
सने हाथों से अगली रोटी के, आटे का टुकड़ा
गीली हथेली की पीठ से, उलझे बालों की लट को सरकाती
माँ की यह भंगिमा क्या ग़रीब होती है?
रोज-रोज, पहले मिनिट में पराँठा सेंकती
दूसरे क्षण, नाश्ते की तश्तरी भरती
तेज क़दमों से, सारे घर में, फिरकनी सी घूमती
साथ-साथ, अधखाई रोटी, जल्दी-जल्दी अपने मुँह में ठूसती
माँ की यह तस्वीर क्या इतनी व्यस्त होती है?
इन सब से परे, हमारे मानस में रची बसी
सभी संवेदनाओं के कण-कण में घुली मिली
हमारे व्यक्तित्व के रेशे से हर पल झाँकती
हम सब की माँ, कुछ कुछ ऐसी ही होती है।

नन्हें पावों का बन्धन

बरस बीते कि सरक गया था युग
मुस्काया नहीं था चांद खिड़कियों के पार
एक शरद भीनी रात
सहसा कौंधी किरणें दूर, पेड़ों के पार
लुभाती मुझे भरमाती कण‍-कण को
केले के पत्तों की ओट से झाँक गई
लुक-छिप ज्यों वार किया सहलाती मुझे
फैलाई नरम चादर नभ से अबर तक
पूछा चुपके से खिड़की की सलाखों के पार
“आओगी क्या हमारे साथ?”
पलटे बीते पन्ने युगों के सपने, बने अपने
तन-मन में संचित अमृत
बह चली मैं
लौट आई पहली छुअन मोगरे की
तभी
मुन्ने से बदली करवट
दबा मेरा आँचल नन्हे पाँवों में लिपट
पलकें झुका कहा मैंने” आऊंगी” अगली पूर्णिमा!”

वासंती चांद

डालियों के बीच उलझा हुआ ये वासन्ती चांद,
रेशे-रेशे खोल जाता यादों के किवाड़
अभी भी, मन, भटकता है,
उन्हीं वीथियों में,
थमकर, जहाँ तुमने संवारी थी झुकी लट,
पेशानी की

अब भी, ज्यों, झनझना जाती
शरद भींगी रात
जब कभी ऊपर से उड़ी बगुलों की धवल पांत
रूक गयी, वहीँ मैं
देखा, थमकर पीछे,
नहीं,

नहीं आता कोई दबे पांव सधे क़दमों से,
डराने को मुझे शरद भींगी रातों में
बादाम के पत्तों के पीछे छिपे झुके
रेशमी उलझनों को सुलझाने,

बीतकर भी बीता नहीं ज्यों,

जब कभी उलझ जाता चाँद,
नरम कोंपलों भरी शाखों के बीच
वहीं उलझने थाम लेतीं हैं मेरी हलचलों को सिहरनों
को,
आ जाती वही
सुर्ख, सेमल फूलों की बरसात,

बरस बीते कि दिन
बदलता नहीं ये हिया
पुकारता ज्यों “पिया, पिया, पिया”

जगदगुरु

विस्तृत खोखल पर
अपने पद चिन्हों को उकेरते
ओ दिव्य पुरुष,
तुझे नमस्कार!

सैकडों योजन लंबी रश्मियों की ये बाहें
आओ,
छू लो मुझे
मेरे चेहरे को, वजूद को
घेर मुझे अपरिवर्तित अवगुंठन के जादू से,
सारे परिवेश को रौशन कर दो
नई आशाओं के प्रवाह से
भर दो मेरे मन में सपनीली किरणों का जाल

उन्मीलित हो उठे स्वप्नों का छंद खिले उठे दबी
ढंकी कामना
तुमने जैसे पाया अद्भुतचरित का संधान
बताओ
जगद्गुरु !
मुझे
उसी पथ की बात
कैसे करना होगा स्वयं अपने से ही
इस ‘स्व’ का परित्राण

फूल, चाँद और रात

अब कोई नहीं लिखता
कविता फूलों की सुगन्ध भरी
रात नहाई हो निमिष भर भी
चांदनी में
फूलों के संग
पर कोई नहीं कहता
उस निर्विद्ध निमिष की बात
जो अब भी टिका है
पावस की चम्पई भोर के किनारे

चांदनी की बात
झरते हुए हारसिंगार तले
बैठकर रचे गए विश्वरूप
श्रंगार की बात
अभी अभी साथ की सड़क पर गुजरा है
मां के साथ
मृग के छौने सरीखा
रह रहकर किलकता हुआ बालक

चलता है वह नन्हे पग भरता
बीच बीच में फुदकना
उसकी प्रकृति है
कोई नहीं करता प्रकृति की बात
फूल चांद और रात की बात।

नन्हीं चिड़िया

पीले परों वाली
सलेटी नन्ही चिड़िया
मुलायम रोऔं से ढकी है तुम्हारी छाती
दाना चुगने के क्रम में
तुम
मेरे कितने पास आ गयी हो
फिर भी
नहीं गया है तुम्हारा डर
मेरे प्रति यह वेवजह आशंका
आखिर क्यों है?
चुगती हो कुछ दाने
जाती हो ऊपर
उस पेड़ पर बने अपने घोंसले में
रुकती हो वहां कुछ क्षण
नन्ही चोंच में डालकर वे कण
वापस आती हो
चुगती हो अगला दाना
मैं भी तो बीनती हूँ दाल
बच्चों की रसोई के लिए

आओ मेरे पास
समझो मैं
नहीं जानती मेरी भाषा
मैं कहां समझ पाती हूँ
मन की सात तहों के भीतर बैठा
हमारे चेतन का स्वामी
एक ही है अदृश्य अगोचर
वह जो रचयिता है इस मैं उस तुम का
आओ बैठो मेरी कुर्सी के हत्थे पर
खा लो कुछ दाने इसी थाली से
ले जाओ
चोंच में भरकर कुछ और दाने

नन्ही चिड़िया !

कार्तिक का पहला गुलाब

कार्तिक का पहला गुलाब
सुर्ख पंखरियाँ सुबह की धूप में
तमाम पृथ्वी को अपनी चमक से आंदोलित करती हुई
तहों की बंद परत के बीच से सुगंध भाप की तरह ऊपर उठती है

वह मात्र सुगंध है गुलाब नहीं
वह रंग
वह गंध
वह पंखिरयों के वर्तुल रूपक में लिपटा
कोमलता, सुकुवांर्ता, सौंदर्य प्रतीक

दृष्टी दूर तक स्वयं के संग जाना चाहती है
कार के शीशे चढ़ाती गिराती भंगिमाओं के बीच
मालिकाना भाव से पोषित तत्व को सम्पूर्णता में परख लेना चाहती है

मान्यताओं की स्थापना के बीच
वक्त बीतता हुआ
अचानक दम लेने को ठमक जाता है

अनवरतता

जंगल के सिरे पर गूँजती है मुर्गे की बांग
नदी की धार अर्ध आलोकित
क्रोड़ में दुबका चिड़िया का बच्चा जग पड़ा है
मानुष छौने से सदृश्य दबी-दबी सी चहचहाट
रस घोल जाती है
वन प्रान्तर के अदेखे लोक में

ममत्व की
अनवरतता

दिग्दिगांतर आप्लावित

जहाँ शब्द होते हैं 

जहाँ शब्द होते हैं
और
देह नहीं जादू
वहाँ जाने की इच्छा लिए
वह लम्बे सफ़र पर निकल पडती है

हाथ में
लाठी-गठरी
कुछ भी नहीं

दूर के सफ़र के वास्ते
उसने शरीर को भी गिरवी रख दिया है
पृथ्वी के पास !!

सागर की अनझिप पलको की कोर

सागर की अनझिप पलको की कोर
काँपती है
इस शिला की उदग्र उठी हुई नाल के अन्दर
एक कमल दण्ड है
मानों स्वर्ग से आयातित कर
उसे देवताओ ने यहाँ छिपा दिया है
जिस दिन
शब्द आकर ठहरेंगे यहाँ
वे अपूर्णन की परिभाषा को मिटा डालेंगे
तब पृथ्वी उसकी खोज में भटका करेगी ।

अच्छा है कि मैं अकेली नहीं

अच्छा है कि मैं अकेली नहीं
मेरे साथ हैं
चेतना के कुहरे में टिमटिमाते
नए पुराने कितने ही अक्स

चौखट के भीतर चुप बैठे माँ-पिता की बरसों पुरानी भंगिमा
तिमंजिले की मुण्डेर से झाँकते मौसेरे भाई-बहनों के चेहरे
चाचा-चाची, मामा-मामी, मौसी, बुआ और ममेरी फुफेरी बहनों की कथाएँ
अनगिनत क़िस्से मेरे साथ चलते हैं
जहाँ कहीं भी मैं गई
विभिन्न वजूदो के कण मेरे आगे-पीछे चले
उनके बीच घर के नौकर-नौकरानियों की अम्लान छवि

जाड़े की रातों में मालिश के तेल की कटोरी लिए
बिस्तर के बगल में बैठी दाई
शुरूआती कालेजी दिनों की सुबहों में
चाय के गर्म कप के लिए
रसोईघर में पण्डित से डाँट सुनता छोटा भाई
जाने अनजाने रस्तों पर ये सभी मेरे साथ चल पडते हैं

नव जागरित व्यक्तियों की जमात जब
अपने आसपास के लोगो की उपस्थिति को नकार
विदेशी अकेलेपन का स्वांग भरती है
स्वांग रचते-रचते अभिनेता स्वयं पात्र में परिवर्तित हो जाते हैं

विलायती उच्छिष्ट के दवाब तले थरथराती हुई
नई सदी की दहलीज पर उगे दीमको की बस्ती के बीच दिग्भ्रमित
मन दहल जाता है
यह कैसी विरासत

कितना अच्छा है
कि
मैं अकेली नहीं हूँ !!!

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