इस्मत ज़ैदी की रचनाएँ

तमन्ना-ए-चराग़-ए-दीवाली

मैं चाहता हूँ जलूँ देश की हिफ़ाज़त में
मैं चाहता हूँ जलूँ इल्म की रेयाज़त में
मैं चाहता हूँ जलूँ अह्द की सदाक़त में
मैं चाहता हूँ जलूँ क़ौम की रेफ़ाक़त में

ये चाहता नहीं बैठूँ मैं शाहराहों पर
ये चाहता नहीं पहुँचूँ मैं ख़ानक़ाहों पर
मैं रौशनी जो बिखेरूँ तो ऐसी राहों पर
जहाँ से जाते सिपाही हों हक़ की राहों पर

मेरी ज़िया से हर इक सिम्त में उजाला हो
कि झूठ कोई नहीं सच का बोलबाला हो
मेरा वजूद ग़रीबों के घर का हाला हो
मेरी वो रौशनी पाए कि जो जियाला हो

मैं उन को रौशनी दूँ जो पढ़ें चराग़ों में
उन्हें दिखाऊँ ज़िया जो पले गुनाहों में
मैं इक मिसाल बनूँ ग़ैर के दयारों में
बसी हो प्रेम की बस्ती मेरे शरारों में

है अब यक़ीन कि पूरे करूँगा ये अरमाँ
बदलती फ़िक्र ने मंज़िल के दे दिए हैं निशां
मैं उन को याद दिलाऊँगा देश के एहसाँ
जो कर चुके हैं फ़रामोश अपनी धरती माँ

वो इक ज़िया ही नहीं 

दरीचे ज़हनों के खुलने की इब्तिदा ही नहीं
जो उट्ठे हक़ की हिमायत में वो सदा ही नहीं

ज़मीर शर्म से ख़ाली हैं, दिल मुहब्बत से
हम इरतेक़ा जिसे कहते हैं, इरतेक़ा ही नहीं

तख़य्युलात की परवाज़ कौन रोक सका
परिंद जब ये उड़ा फिर कहीं रुका ही नहीं

ग़म ए जहां पे नज़र की तो ये हुआ मालूम
जफ़ा जो हम ने सही, वो कोई जफ़ा ही नहीं

बग़ैर इल्म के ज़ुलमत कदा है ज़ह्न मेरा
जो कर दे फ़िक्र को रौशन, वो इक ज़िया ही नहीं

तेरी वफ़ाओं का शीराज़ा मुंतशिर हो कर
बता रहा है हक़ीक़त में ये वफ़ा ही नहीं

जब आया आख़री लम्हात में मसीहा वो
न शिकवा कोई ‘शेफ़ा’ और कोई गिला ही नहीं

ख़ुश्बू-ए-गुल भी आज है अपने चमन से दूर

ख़ुश्बू ए गुल भी आज है अपने चमन से दूर
दरिया में चाँद उतरा है चर्ख़ ए कुहन से दूर

मेरा वजूद ऐसे बियाबाँ में खो गया
ग़ुरबत में जैसे कोई मुसाफ़िर वतन से दूर

थीं शफ़क़तें जहान की अपनों के दरमियाँ
मैं ख़ाली हाथ रह गया आ कर वतन से दूर

माँ की दुआएँ बाप का साया हो गर नसीब
हो ज़िंदगी बलाओं से ,रंज ओ मेहन से दूर

मुझ को ज़रूरियात ने आवाज़ दी बहुत
लेकिन न जा सका कभी गंग ओ जमन से दूर

तू दोस्ती के वास्ते जाँ भी निसार कर
रहना मगर बख़ील से, वादा शिकन से दूर

दरिया के पास आ के भी प्यासा पलट गया
पानी नहीं था क़ब्ज़ ए तश्ना दहन से दूर

कोशिश ये थी शिकस्ता दिलों को सँभाल ले
लेकिन ‘शेफ़ा’ ही रह न सकी इस चुभन से दूर

न डालो बोझ ज़हनों पर कि बचपन टूट जाते हैं 

न डालो बोझ ज़हनों पर कि बचपन टूट जाते हैं
सिरे नाज़ुक हैं बंधन के जो अक्सर छूट जाते हैं

नहीं दहशत गरों का कोई मज़हब या कोई ईमाँ
ये वो शैताँ हैं, जो मासूम ख़ुशियाँ लूट जाते हैं

हमारे हौसलों का रेग ए सहरा पर असर देखो
अगर ठोकर लगा दें हम, तो चश्मे फूट जाते हैं

नहीं दीवार तुम कोई उठाना अपने आँगन में
कि संग ओ ख़िश्त रह जाते हैं, अपने छूट जाते हैं

न रख रिश्तों की बुनियादों में कोई झूट का पत्थर
लहर जब तेज़ आती है, घरौंदे टूट जाते हैं

’शेफ़ा’ आँखें हैं मेरी नम, ये लम्हा बार है मुझ पर
बहुत तकलीफ़ होती है जो मसकन छूट जाते हैं

बीती बातें फिर दोहराने बैठ गए

बीती बातें फिर दोहराने बैठ गए
क्यों ख़ुद को ही ज़ख़्म लगाने बैठ गए

अभी-अभी तो लब पे तबस्सुम बिखरा था
अभी-अभी फिर अश्क बहाने बैठ गए?

जाने कैसा दर्द छुपा था आहों में
थाम के दिल हम उस के सरहाने बैठ गए

उस ने बस हमदर्दी के दो बोल कहे
दुनिया वाले बात बनाने बैठ गए

वो नज़रें थीं या कि तिलिस्म ए होश रुबा
हम तो नाज़ुक ख़्वाब सजाने बैठ गए

हम ने तो इक सीधी सच्ची बात कही
और वो फिर मन्तिक़ समझाने बैठ गए

उन का मक़सद सिर्फ़ सियासत, छोड़ो भी
क्यों उन को रूदाद सुनाने बैठ गए

’शेफ़ा’ न जब सह पाए हम बेगानापन
ग़लती उस की थी प मनाने बैठ गए

मेरे मालिक ख़यालों को मेरे पाकीज़गी दे दे 

मेरे मालिक ख़यालों को मेरे
पाकीज़गी दे दे ,
मेरे जज़्बों को शिद्दत दे ,
मेरी फ़िकरों को वुस’अत दे,
मेरे एह्सास उस के हों ,
मेरे जज़बात उस के हों ,
जियूँ मैं जिस की ख़ातिर ,
बस वफ़ाएँ भी उसी की हों,

मेरे मा’बूद मुझ को,
ऐसी नज़रें तू अता कर दे
कि जब भी आँख ये उठे,
ख़ुलूस ओ प्यार ही छलके,
जिसे अपना कहा मैंने
उसे अपना बना भी लूँ,
मैं उस के सारे ग़म ले कर,
उसे ख़ुशियाँ ही ख़ुशियाँ दूँ,

मेरे अल्लाह मुझ को ,
दौलत ओ ज़र की नहीं ख़्वाहिश,
नहीं अरमान मुझ को
रुत्ब ए आली के पाने का
अता कर ऐसी दौलत
जिस के ज़रिये, मैं
तेरे बंदों के काम आऊँ
मुझे ज़रिया बना कर
उन के अरमानों को पूरा कर
करम ये मुझ पे तू कर दे
मुझे तौफ़ीक़ ऐसी दे
कि तेरी राह पर चल कर
मैं मंज़िल तक पहुँच पाऊँ

हो यक़ीं मोहकम, बहुत दुशवार है 

हो यक़ीं मोहकम, बहुत दुशवार है
अब भी उस के हाथ में तलवार है,

जो किसी के काम ही आए नहीं
हैफ़ ऐसी ज़िंदगी बेकार है,

क़त्ल ओ ग़ारत ,ख़ौफ़ ओ दहशत के लिए
भूक ताक़त की ही ज़िम्मेदार है

हँस के मेरे सारे ग़म वो ले गई
तो बस इक मां का ही किरदार है

मुन्हसिर इस बात पर है फ़ैसला
किस की कश्ती, किस की ये पतवार है

कल तलक जो सर की ज़ीनत थी तेरे
आज मेरे सर पे वो दस्तार है

रहज़नी ,आतिश्ज़नी और ख़ुदकुशी
बस यही अब हासिल ए अख़बार है

भूल जाए गर ’शेफ़ा’ एख़्लाक़ियात
फिर तो तेरी ज़हनियत बीमार है

धरती की पुकार

मैं, पावन धरती का बेटा,
इसके आँचल में मैं खेला,
अन्नपूर्ण है ये मेरी,
नर्म बिछौना इस की गोदी ।

बापू को देखा करता था,
भोर में उठ कर खेत को जाना,
अम्माँ का खाना ले जाना ,
साथ बैठ कर भोजन खाना ।
गाँव की ऐसी स्वच्छ हवाएँ,
कुँए का पानी, घिरी घटाएँ,
चारों ओर बिछी हरियाली,
कभी हुआ न पनघट खाली ।

पर ये बातें हुईं पुरानी,
जैसे हो परियों की कहानी,
कहने को तो पात्र वही हैं,
दृश्य परन्तु बदल गए हैं ।
नगरों की इस चकाचौंध ने,
सोंधी मिटटी को रौंदा है,
ऊँची-ऊँची इमारतों से,
खेतों का अधिकार छीना है ।

युवकों की जिज्ञासु आँखें,
सपने शहरों के बुनती हैं,
गाँवों की पावन धरती से,
जुड़ने को बंधन कहती हैं
खेती को वे तुच्छ जानकर,
शहरों को भागे जाते हैं,
निश्छल मन और शुद्ध पवन को,
महत्वहीन दूषित पाते हें ।

भारत की बढ़ती आबादी,
कल को भूखी रह जायेगी ,
कृषि बिना क्या केवल मुद्रा,
पेट की आग बुझा पाएगी?
धरती आज जो सोना उगले,
कल को ईंट और गारा देगी,
महलों की ऊँची दीवारें,
भूख तो देंगी अन्न न देंगी ।
क्या महत्व खेती का समझो,
वरना हम अपने बच्चों को,
भूखा प्यासा भारत देंगे,
तब वे हम से प्रश्न करेंगे ।

आपने पाया था जो भारत,
धन-धान्य से परिपूर्ण था,
आपने कैसा फ़र्ज़ निभाया ?
हम ने भूखा भारत पाया ।

एक आत्मा की फ़रियाद

ये कविता उस स्थिति को ध्यान में रख कर लिखी गई जब एक अल्ट्रासाउंड की रिपोर्ट ये तय कर देती है कि आने वाले जीवन को कन्या होने के नाते जीने का अधिकार ही नहीं है, ईश्वर ने एक शरीर में आत्मा डाली और उसे बताया कि तुम कन्या बन कर संसार में जाओगी, ये सुन कर वो आत्मा सिहर उठती है और ईश्वर से जो फ़रियाद करती है वो कविता के माध्यम से आप तक पहुँचाने का प्रयास किया है ।

हे भगवन ये क्या कहते हो ?
क्या धरती पर जाना होगा?
नहीं नहीं मुझ को मत भेजो
जाते ही तो आना होगा

हे ईश्वर मैं तो हूँ कन्या
जिस भी कुल में मैं जाऊँगी
पता नहीं वो कैसा होगा
जीवित क्या मैं रह पाऊँगी ?

ऐसा ना हो पापा-मम्मी
दे न सकें मुझ को सम्मान
भैया का तो होवे आदर
मिले मुझे ना जीवन-दान

मालिक मुझे तो डर लगता है
जीवन शायद प्यार को तरसे
शिक्षा से वंचित रह जाऊँ
कह न सकूँ कुछ भी मैं डर से

माना सब कुछ मिल भी गया तो
भाई-बहन का आदर मान
माँ-पापा का प्यार दुलार
और ज्ञान का भी वरदान

तो भी क्या मैं बच पाऊँगी ?
पति के घर में तेल भी होगा
माचिस की तीली भी होगी
हाथ मेरा पर ख़ाली होगा

तुम तो विघ्नविनाशक हो
ज़ुल्मों के संहारक हो
अपनी धरती के लोगों को
मानवता का पाठ पढ़ाओ

फिर मैं धरती पर जाऊँगी
ज़हरा, मरियम और सीता के
पावन पदचिन्हों पर चल कर
इक दिन सब को दिखलाऊँगी

आजकल मुल्क में बिकते तो हैं अख़बार बहुत 

आजकल मुल्क में बिकते तो हैं अख़बार बहुत
कुछ ख़ुशी देते हैं कुछ देते हैं आज़ार बहुत

ये अलग बात है इक फूल न खिल पाया वहाँ
यूँ तो उगने लगे सहरा में भी अश्जार बहुत

उम्र भर देता रहा कुछ न किसी से माँगा
इस ग़रीबी में भी वो शख्स था ख़ुद्दार बहुत

चल सकोगे मेरे हमराह कि मैं हक़ पर हूँ ?
और हैं रास्ते सच्चाई के पुरखार बहुत

सब कहाँ कोई नतीजा हमें दे पाते हैं
मुख्तलिफ़ ज़हनों में पलते तो हैं अफ़कार बहुत

शुक्र मौला कि कटा वक़्त सलीक़े से मेरा
वर्ना कुछ वक़्त तलक जीना था दुशवार बहुत

सब जहाँ मिल के रहें घर करो ऐसा तामीर
यूँ मकाँ के लिए मिल जाते हैं मेमार बहुत

मेरे मालिक मुझे तौफ़ीक़ दे सच लिखने की
और ‘शेफ़ा’ लिखे तेरी हम्द के अश’आर बहुत

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