उर्फी आफ़ाक़ी की रचनाएँ

फिर क्या जो फूट फूट के ख़ल्वत में रोइए

फिर क्या जो फूट फूट के ख़ल्वत में रोइए
यकसर जहान ही को न जब तक डुबोइए

दीवाना-वार नाचिये हँसिए गुलों के साथ
काँटे अगर मिलें तो जिगर में चुभोइए

आँसू जहाँ भी जिस की भी आँखों में देखिए
मोती समझ के रिष्ता-ए-जाँ में पिरोइए

हर सुब्ह इक ज़जीरा-ए-नौ की तलाश में
साहिल से दूर शोरिश-ए-तूफ़ाँ के होइए

बस्ता-लब था वो मगर सारे बदन से बोलता था 

बस्ता-लब था वो मगर सारे बदन से बोलता था
भेद गहरे पानियों के चुपके चुपके खोलता था

था अजब कुछ सेहर-सामयाँ ये भी अचरज हम ने देखा
छानता था ख़ाक-ए-सहरा और मोती रोलता था

रच रहा था धीरे-धीरे मुझ में नशा तीरगी का
कौन था जो मेरे पैमाने में रातें घोलता था

डर के मारे लोग थे दुबके हुए अपने घरों में
एक बादल सा धुएँ का बस्ती बस्ती डोलता था

काँप काँप उठता था मेरा मैं ही ख़ुद मेरे मुक़ाबिल
मैं नहीं तो फिर वो किस पर कौन ख़ंजर तौलता था

रवाँ दवाँ सू-ए-मंज़िल है क़ाफ़िला कि जो था

रवाँ दवाँ सू-ए-मंज़िल है क़ाफ़िला कि जो था
वही हनूज़ है यक-दश्त़ फ़ासला कि जो था

निशात-ए-गोश सही जल-तरंग की आवाज़
नफ़स नफ़स है इक आशोब-ए-कर्बला कि जो था

गया भी क़ाफ़िला और तुझ को है वही अब तक
ख़याल-ए-ज़ाद-ए-सफ़र फ़िक्र-ए-राहिला कि जो था

वो आए जाता है कब से पर घर आ नहीं जाता
वही सदा-ए-क़दम का है सिलसिला कि जो था

वो ध्यान की राहों में जहाँ हम को मिलेगा

वो ध्यान की राहों में जहाँ हम को मिलेगा
बस एक छलावे सा कोई दम को मिलेगा

अनजानी ज़मीनों से मुझे देगा सदा वो
नैरंग-ए-नवा-शौक़ की सरगम को मिलेगा

मैं अजनबी हो जाऊँगा ख़ुद अपनी नज़र में
जिस दम वो मिरे दीदा-ए-पुर-नम को मिलेगा

जो नक़्श कि अर्ज़ंग-ए-ज़माना में नहीं है
उस दिल के धड़कते हुए अल्बम को मिलेगा

रूत वस्त की आएगी चली जाएगी लेकिन
कुछ रंग तो यूँ हिज्र के मौसम को मिलेगा

ये दिल कि है ठुकराया हुआ सारे जहाँ का
घर एक यही है जो तिरे गम को मिलेगा

पत्थर है तो ठोकर में रहे पा-ए-तलब की
दिल है तो उसी तुर्रा-ए-पुर-ख़म को मिलेगा

गर शीशा-ए-मय है तो हो औरों को मुबारक
है जाम-ए-जहाँ-बीं तो फ़क़त जम को मिलेगा

लहराते रहेंगे चमनिस्ताँ में शरारे
ख़ार ओ ख़स ओ ख़ाशाक ही आलम को मिलेगा

मालूम है ‘उर्फ़ी’ जो है क़िस्मत में हमारी
सहरा ही कोई गिर्या-ए-शबनम को मिलेगा

सबा से आती है कुछ बू-ए-आश्ना मुझ को

सबा से आती है कुछ बू-ए-आश्ना मुझ को
बुला रहा है मिरी ख़ूँ का ज़ाइका मुझ को

हनूज़ सफ़्हा-ए-हस्ती पे हूँ मैं हर्फ़-ए-ग़लत
कोई हनूज़ है लिख लिख के काटता मुझ को

हज़ार चेहरा तिलिस्म-ए-गुरेज़-पा हूँ मैं
असीर कर न सका कोई आइना मुझ को

चला ही जाऊँ मैं परछाइयों के देस को और
पुकारता रहे किरनों का काफ़िला मुझ को

यही हैं रत-जगे जब से खुलीं मिरी आँखें
न था वो ख़्वाब मिरा इक अज़ाब था मुझ को

चला था मैं तो समुंदर की तिश्नगी ले कर
मिला ये कैसा सराबों का सिलसिला मुझ को

ये बात किस से कहूँ आह इक गुल-ए-ख़ूबी
बड़े ही प्यार से काँटा चुभो गया मुझ को

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