ओम व्यास की रचनाएँ

परिभाषाएँ

जीवन
प्रसव की भूमिका
जन्म
प्रस्तवाना
मौत
उपसंहार
मानव
क्षणिक सुख से उपजी
एक अर्थहीन अस्तित्व हीन
रचना।
समय
ताउम्र जोड़ीदार
कभी हंसाता / कभी रुलाता
मौत
मानव नामक व्यंग्यलेख का
पूर्ण विराम।
समाज
आदर्शों का
लबादा ओढ़े
आलोचको का समूह
प्यार
अमन की चाह में
मन की
श्रेष्ठतम कृति
कल्पनाएँ
समुद्र तट पर
फैली सीपों को
नन्हें बालक की हथेलियों में
भर लेने की
अकिंचन कोशिश

आस्था

प्रेम की बहुत छोटी बूंद का विस्तार है
‘आस्था’
जो नहीं मिलती है बाज़ारों में
छीना भी नहीं जा सकता जिसे
प्राथना पर किसने पाया है इसे?
‘आस्था’
प्रेम का गाढ़ा रंग है
यह जब चढ़ जाता है
‘मनुज’ पर तब वह
‘देव’ होने की प्रक्रिया में बढ़ जाता है।
‘देव’
जो भावना स्नेह विश्वाश समर्पण
के सतम्भों पर आश्रित है
और
सबके लिए ज़रूरी है आस्था कि जमीन।

युद्ध मकान का कोपल 

जबसब बच्चे मैले कपड़ों में
धूल से सने हुए
कंचे / भवरें / पतंगों
की लड़ाई लड़ते थे
तब मैंने
एक छत को खड़ी रखने
के लिए या ज़िन्दगी को धूप से बचाने के लिए
अपने
बचपन सपने / भँवरे कंचे पतंग
सबगहरे उतार दिए
उस मकान की नींव में
जिसे मैं ‘घर’ बनाना चाहता था,
अपनी बचकानी कल्पनाएँ संजोकर।
आज
बरसों बाद
मन की बंजर जमीन पर
प्रस्फुटित हुई एक “कोपल”
आस्था और नेह से,
देने को
सघन आत्मीयता कि छाया
और अब
देखता हूँ मैं
प्रतिवाद
मजबूती से खड़ी
मकान की छत का
कमजोर कोपल के खिलाफ
सब कुछ सर जमीन कर
कमजोर कंधों पर टीके रहे
‘मकान’ का आत्मविश्वास
आक्रोश की भाषा
क्यों बोल रहा है?
शायद अनुभवों का बस्ता
एक नवानुभव की परत
खोल रहा है।
और मैं।
मुक जी रहा हूँ…
एक अन्तद्रन्द

भ्रम 

तुम
जब नहीं हो,
आसपास मेरे कहीं भी
भ्रम का एक टुकड़ा
चीरकर वर्तमान को मन में गहरे तक उतर जाता है
और
पूछता है प्रश्न वर्तमान से कि
वह सब जो भूत हो गया है
भविष्य में अंकुरित होगा?
अनुत्तरित ‘मैं’ मन ही मन
तौल रहा हूँ, भू वर्तमान भविष्य
से जुड़े भ्रम के उस टुकड़े कि ताकत
जो
तीनों को पल भर में
पीला देता है पानी
एक ही घाट पर
और
रोप जाता है
मेरी बंजर जमीन पर
कल्पनाओं के पौधे
जबकि यह
बिलकुल सच है कि
पावस कि तरह
तुम
अब नहीं हो पास मेरे
कहीं भी!

इनडोर प्लांट

मेरे घर की
बैठक में
रखे है कई गमले
लगे है कई
इनडोर प्लांटस
जिनमें फूल नहीं खिलते
फल भी नहीं आते
और खुशबू भी नहीं दे पाते है
बेचारे
पर फिर भी वे सब प्याररे है मुझे।
जिन्दगी के मकान में,
दिल की बैठक में
मैंने भी रखा है एक गमला
लगाया है जिसमें
स्नेह का एक इनडोर प्लांट
यह जानते हुए कि वह
फल फूल नहीं देता
पर प्रेम की खुशबू का स्वाद
मुझे जिजीविषा देता है
और मैं! तुम्हारी प्रतिज्ञा में
स्नेह सहित सींचता हूँ
सपनों की बगिया को

स्वार्थ 

स्वार्थ
अब भी मौजूद है, दुनिया में
तेजाब की तरह
अब भी
बूढ़े माँ बाप अच्छे लगते हैं,
बेटे बहू को जब होते है
उनकी गोद में बच्चे
अब भी
कमाते पुत्र के दुर्गुण
नहीं दिखते है
माँ बाप कों।
अब भी
सुहागन होने की गरज में
शराबी पति से पिटती है
उसकी ‘औरत’ ।
अब भी कमाऊ कुआंरी
लड़की शादी का प्रयास
नहीं करते घरवाले।
अब भी
नींद में खलल डालने वाली,
बाप की खांसी,
चौकीदार हो जाती है,
सूने पड़े मकान में।
क्योंकि,
समाज में
स्वार्थ का तेजाब
अभी बाकी है

यहाँ मिले सभी हंसने वाले

जितने आँसू पोछे जग के,
उतने आँसू मैं रोया हूँ
हँसा हँसा कर, खून जलाया
और बना मैं वह ‘खोया’ हूँ
यहाँ मिले सभी हंसने वाले
रुके, हँसे और चले गये
सबको नींद सलोनी आई
जाग जागकर मैं सोया हूँ।

भाग्य का पत्थर 

वो कहते हैं
कि, भाग्य पर पत्थर
पड़े हैं
मेरा सवाल है
अंगुली लेकर पत्थर
कि दुकान पर क्यों
खड़े हैं?

पापा हार गए

रात ठंड की
बिस्तर पर
पड़ी रजाइयाँ को
अखाडा बनाता है
मेरा छोटा बेटा॥
पाँच बरस का।
अकसर कहता
‘पापा’ ढिशुम ढिशुम खेलें,
और उसकी नन्ही मुट्ठियों के
वार से मैं गिर पड़ता हूँ धड़ाम
वह खिल खिलाकर खुश होकर
कहता है पापा हार गए औ पापा हार गए।
तब मुखे
“बेटे ले हारने” का सुख महसूस होता है।
आज मेरा वह बेटा जवान होकर,
ऑफिस से लौटता है फिर
बहू की शिकायत पर मुझे फटकारता है
मुझ पर खीझता है,
तब मैं विवश होकर मौन हो जाता हूँ
अब मैं बेटे से हारने का सुख नहीं,
जीवन से हारने का दुख अनुभूत करता हूँ
ज्यादा सावधान होकर, शब्दों से डरता हूँ
सच तो यह है कि
मैं हर एक झिड़की पर तिल तिल मरता हूँ।
बेटा फिर भी जीत जाता है
समय अपना गीता गाता है
“मुन्ना बड़ा प्यारा
आँखों का दुरारा
कोई कहे चाँद,
कोई आँख का तारा”।

इंतज़ार 

समुद्र कि किनारे
सुखी रेत
अंगुलियों से बनी रेखाओं सा
मेरा जीवन
कह रहा है इंतजार
हादसे के किन्ही नए पैरों का।

प्रेरणा 

दीपक!
तुम मर्यादा में रहकर
बाती के साथ पूरी पूरी रात
तिमिर से लड़ते रहे
तेज हवाओं में अड़ते रहे,
संकल्प की मुट्टी ताने।
सच है!
‘मशाल’ होने से अच्छा है,
‘दीपक’ होना।
छोटा मगर मिट्टी से जुड़ा,
तुम्हारे लघु सार्थक जीवन को प्रणाम
नहीं है किसी और के हाथों तुम्हारी लगाम…

नदी प्यास देती है

अंधेरी रात ज़िंदगी में उजास देती है
दोस्त बनकर मुझे खुद नदी प्यास देती है

उसको सोचा जब कभी अकेले में
अजनबी रास्तों में नई तलाश देती है।

उसको देखा तो फागुन लौट आया
मन में होलोई ढेरों पलाश देती है।

उसका जाना बसन्त लगता है
खबर आने की नई सुवास देती है।

उसका हंसना फूलों का झरना
मुझको ऊर्जा प्रकाश देती है।

खत्म होना ही है इस कहानी को
बात सोचो भी तो अजब त्रास देती है।

रंग आस्था का इतना गहरा है
मन में उमंग और विश्वास देती है।

माँ

दुनिया संचालित
करने वाले संचालक
प्रश्न करता है मेरा मन
छोटे बच्चों की कोमलता पर
तूने बहुत रहम खाकर
दे दी एक ‘माँ’ की गोद
माँ का दूध
माँ का स्पर्श
ये तेरा सुकोमल व्यक्तित्व
उस दिन निष्ठुर और क्रूर
क्यों हो जाता है?
जब एक ही झटके में
छीन न लेता है तू
अबोध बच्चे से माँ का स्तन
माँ का स्पर्श
होकर बड़ा सोचता होगा वह अबोध
और करता होगा मलाल
जिसके ‘कारण’ सब कुछ देख रहा है
उसे नहीं देख पाया
जिसे सब ‘माँ’ कहते है।

धन हो गया मन खो गया

तब
मेरे पास नहीं था ‘धन’
पर बचा रखा था मैंने अपना मन’
और ‘मन’ में भी तुम्हारी ढेर सारी बातें / आदतें
तुम्हारी चुबुलाहट / खिलखिलाहट
शरमाना / दाँतों के बीच अंगुली दबाना
रूठना / मनाना
इंतजार करवाना / जल्दी जाना
अंगुली में दुपट्टा लपेटना
पैर के अंगूठे से मिट्टी कुरेदना
घर कि छत पर तारों वाली रात
तुमसे दूर होकर भी
मैं तुम्हारे सबसे करीब होता था,
तब मैं ‘मन’ से अमीर ‘धन’ से गरीब होता था।
अब मैंने बचा रखा है कुछ धन’
खोकर अपना ‘मन’
मन में कुछ भी नहीं है शेष
कुछ धुंधली स्मृतियाँ
यादों की खुशबू
और दूर तक पसरा ‘ सन्नाटा।

जिन्दगी और याद

जिन्दगी
से पीछे छूटती तारीखें
गीली रेत पर पैरों के निशान सी
छोड़ देती है कुछ यादें।
यादें…
जो बिसरती जाती है कुछ

समय चक्र के चलते,
कुछ
बड़ी घटनाओं के तले,
और कुछ
मजबूरन मिटा देता है
आदमी
अंजाम न दे पाने पर
पर फिर भी
चहरे की झुरियों को बटोरे
गठरी सा पड़ा होता है वह
चारपाई पर जब
एक पहाड़ का
अहसास करता है,
छोटी बड़ी, खट्टी मीठी
यादों का पहाड़
जिन्दगी का पूरा सफ़र
यादों का काफिला
संग संग
शुरूआत से खात्मे तक

तपन

चल रहा हूँ
मंजिल की तलाश में,
यादों की पगडंडी के सहारे,
प्यार के दरख्त की छाँव में,
जब कभी सुस्ताना चाहता हूँ,
झड़ जाया करते हैं पत्ते
मिलती है
फिर वही जुड़ाई की तपन।

पाषाण पूजा

सदियों से
पूजते रहे पाषाण
ईश्वर के भ्रम में
और हो गये पत्थर दिल
हम।
आज भी पत्थरो के लिए
लड़ रहे निरंतर
पत्थरों से हम
और हो गये भाव शून्य मूक जड़वत
भगवान दर्शक बन देख रहा है।
पत्थर दिल दिमागों की
पत्थर के लिए
पत्थर से लड़ाई चलती रहेगी जो सदियों तक
और पूजते रहेंगे
हम
पत्थर के देवता।

रिश्ते और खोज स्नेह 

हर परिचय में
ढूँढता है
आदमी रिश्ते
और
रिश्तों में ढूँढता है
नेह का
एक टुकड़ा।
दुर्लभ सा हो गया है
वह
जिसे ढूँढता है आदमी,
पर
नकार कर वह सतत खोजता है
हर युग में हर समय
रिश्त जो पैदा होते है
नित नये ढंग से
और
कितनी ही बार
मर जाते है
पैदा होने से पहले ही।
स्नेह…
जो आवश्यक नहीं।
अनुबंध भी नहीं
रिश्तों के साथ
असीमित है
वह रेल के सहयात्री से।
पशुओं तक
सहज
पर फिर भी
खोजता है
आदमी
एक टुकड़ा प्यार का
रिश्तों में
निरन्तर।

अतीत

कलम भी लगती है बहकने
सुखने लगती है स्याही
लगती है भदरंगी
कागज भी मानों प्रतिकार करता हो
शब्द लगते है रुख से
जब भी कभी
कोशिश करता हूँ
अतीत को लिखने को

बेटा

यूं तो बहुत सताता बेटा,
याद बहुत पर आता बेटा,
अर्थ का बदल देता जब,
तुतलाकर वह गाता बेटा।
गलती खुद की खुद रोता भी,
भैया नाम बताता बेटा।
पापा के हाथों में टॉफी,
लाड़ बहुत जतलाता बेटा,
आधा ऊपर आधा मुंह में,
खाने को जब खाता बेटा,
पैया-पैया पापा देखी,
कितनी खुशियाँ पाता बेटा,
सर्दी खांसी या बुखार में,
सोकर ना सो पाता बेटा,
मम्मी जागी पापा भागे,
चिंताएँ दे जाता बेटा।

सड़कों ने लील ली है पगडंडी 

चमक दमक
सड़कों की देख
भाग रहे हैं पगडंडियों को छोड़कर
हम।
पगडंडियाँ
नहीं देती सुविधाएँ,
न बनावटी रोशनी में लंबी दिखती परछाइयाँ
न वायुगति से वाहनों पर तैरते लोग
नहीं दिखते कहीं किनारे खड़े भावशून्य खंबे
सड़कें
पेट्रोल की खुशबू में
सटकर चल रहें हैं लोग अपरिचित
शोर ही शोर
और
लील गई हैं सड़कें
पगडंडियों को।
बीच गया है जाल
चारों तरफ कोलतार का
और हम भाग रहे हैं।

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