कमलेश द्विवेदी की रचनाएँ

तेरे द्वारे बैठे हैं 

दिल वालों की बस्ती में दिल के मारे बैठे हैं
हमने सबका दिल जीता अपना हारे बैठे हैं

होगी रात अमावस की लेकिन कितनी रौशन है,
तेरी यादों के जुगनू साथ हमारे बैठे हैं.

मेरी आँखों के घर के भीतर आकर देखो तो,
अब तक जाने कितने ही ख्वाब कुँवारे बैठे हैं.

जिससे कल तुम गुज़रे थे उस रस्ते पर लौटोगे,
उस पर आँख बिछाये हम बाँह पसारे बैठे हैं.

कहने को सब अपने हैं लेकिन अपना कौन यहाँ,
लेकर कितनी उम्मीदें लेकर तेरे द्वारे बैठे हैं.

गजले-मीर रहेगी 

जब तक दिल में पीर रहेगी.
गजलों की जागीर रहेगी.

मीठी नहीं, नमकीन बना दो,
तो फिर क्या वो खीर रहेगी ?

राँझे तब तक पैदा होंगे,
जब तक कोई हीर रहेगी.

बँटवारे में सब कुछ ले लो,
मेरे सँग तकदीर रहेगी.

दिल में इमारत बन जाये तो,
होकर वो तामीर रहेगी.

महँगी मढ़ने से क्या हरदम,
ज्यों की त्यों तस्वीर रहेगी ?

हम न रहेंगे तो भी क्या है,
अपनी एक नजीर रहेगी.

कल भी अदब की बातें होंगी,
कल भी गजले-मीर रहेगी.

रिश्ता तोड़ दिया

उसने वादा तोड़ दिया.
मुझको कितना तोड़ दिया.

जिसमें देख सँवरता था,
वो आईना तोड़ दिया.

अपने सपनों में खोया,
मेरा सपना तोड़ दिया.

बच्चा कैसे खुश होगा,
उसका खिलौना तोड़ दिया.

ख्वाब दिखाकर महलों के,
एक घरौंदा तोड़ दिया.

अच्छा रिश्ता पाया तो,
सच्चा रिश्ता तोड़ दिया.

तेरा यार आ गया

करने को अपनी जान वो निसार आ गया.
पहलू में तेरे फिर से तेरा यार आ गया.

फूलों पे उसने हाथ अपना बस रखा ही था,
हाथों में जाने कैसे उसके खार आ गया.

जब उसने अपनी जान दे दी सच के वास्ते,
तब उसके सच पे सबको ऐतबार आ गया.

खुद पे किया यकीन तो मैं डूबने लगा,
उस पे किया यकीन तो मैं पार आ गया.

अच्छा हुआ जो आपने दीं ठोकरें मुझे,
मेरी गजल में देखिये निखार आ गया.

हमदम को भूल गया 

अपनी खुशियों में यों खोया मेरे गम को भूल गया.
वो “मैं” में डूबा है जबसे तबसे “हम” को भूल गया.

डूबे-उतरे-तैरे अब वो नदिया के सँग-सँग खेले,
पर वो नदिया आई जहाँ से उस उद्गम को भूल गया.

चारों ओर फसल लहराती दिखती उसके खेतों में,
जिसने इन खेतों को सींचा उस मौसम को भूल गया.

गंगा-यमुना की महिमा को गाता फिरता है सबसे,
लेकिन इन दोनों के पावन संगम को वो भूल गया.

मेरा कितना दम भरता था वो अपनी हर महफिल में,
हमदम-हमदम कहता था वो अब हमदम को भूल गया.

अब तो यह भी याद नहीं 

कबसे अपने बीच सहज सा हो पाया संवाद नहीं.
कब संवाद हुआ था पहले अब तो यह भी याद नहीं.

माना इक-दूजे को अब भी हम दोनों दिल से चाहें,
पर अपनी चाहत में अब क्यों पहले सा उन्माद नहीं.

जो कुछ भी महसूस किया है हमने तुमसे कह डाला,
इसमें कोई गिला-शिकवा या कोई भी फरियाद नहीं.

तुम भी जो चाहो वो कह दो हम न बुरा मानेंगे पर,
हमने हाले-दिल बतलाया छेड़ा वाद-विवाद नहीं.

कबसे गीतों-गजलों में हम गाते अपनी पीड़ायें,
पर उनका हो पाया अब तक शतप्रतिशत अनुवाद नहीं.

तू ही तेरी ताकत है 

खुद से आज बगावत है.
क्यों बदली हर आदत है.

तू जैसा था वैसा रह,
बाकी तेरी किस्मत है.

मन से सहमत हो न सका,
फिर तन से क्यों सहमत है.

तिल-तिल कर मरता है क्यों,
जब जीने की चाहत है.

दिल की खुशियों से बढ़कर,
क्या कोई भी दौलत है.

खुद को मत कमजोर समझ,
तू ही तेरी ताकत है.

जीवन की सच्चाई है

माँ गीता के श्लोक सरीखी मानस की चौपाई है.
माँ की ममता की समता में पर्वत लगता राई है.

घर की कितनी जिम्मेदारी थी बेटी के कंधों पर,
आज विदा की बेटी तब यह बात समझ में आई है.

लक्ष्मण जैसा दिखने वाला भाई विभीषण हो जाये,
फिर दिल को कैसे समझायें-भाई आखिर भाई है.

क्या होती है बहना कोई ऐसे भाई से पूछे,
त्यौहारों पर सूना जिसका माथा और कलाई है.

तन्हाई थी शादी की फिर इक प्यारा परिवार बना,
फिर बच्चों की शादी कर दी फिर से वो तन्हाई है.

आज मिली है पेन्शन मे बस यादों की मोटी अलबम,
यों तो पिता ने जीवन भर की लाखों-लाख कमाई है.

मैंने सोचा था-तुम मेरे दिल की हालत समझोगे,
तुमने भी मेरे अश्कों की कीमत आज लगाई है.

रिश्ते देते हैं मुस्कानें रिश्ते आँसू भी देते,
है तो ग़ज़ल ये रिश्तों की पर जीवन की सच्चाई है.

अच्छा होगा

फिक्र करें क्यों-कल क्या होगा.
सब उसकी मर्जी का होगा.

वो अन्याय नहीं करता है,
जो भी होगा,अच्छा होगा.

तेरे साथ हँसे-रोये वो,
तुझसे कुछ तो रिश्ता होगा.

वो हर बात सुनेगा लेकिन,
सच्चे दिल से कहना होगा.

खुश हो या नाराज रहे पर.
जो अपना है,अपना होगा.

उसका तो अंदाज अलग है,
जो बोलेगा,चर्चा होगा.

बेटी को आने दो जग में,
बिन बेटी क्या बेटा होगा?

हमको वो मिल ही जायेगा,
जो भी हमको मिलना होगा.

मुझको वो सुनाता है 

इस तरह से वो मुझको रोज आजमाता है.
पास मेरे आता है दूर मुझसे जाता है.

रूठता हूँ मैं उससे तो मुझे मनाता है,
मैं अगर न मानूँ तो वो भी रूठ जाता है.

जाने क्यों वो अक्सर ही यों मुझे सताता है,
जो मैं गुनगुनाता हूँ वो भी गुनगुनाता है.

पूछता हूँ मैं-तेरे दिल में है बता दे क्या,
कहता है-बता दूँगा पर नहीं बताता है.

मेरे सारे गीतों में कितना है दखल उसका,
तब मैं गीत कहता हूँ जब वो मुस्कुराता है.

शेर दोनों के दिल से खुद-ब-खुद निकलते हैं,
उसको मैं सुनाता हूँ मुझको वो सुनाता है.

खुशी मिलेगी 

जब भी कोई नदी मिलेगी.
सागर को जिंदगी मिलेगी.

सूरज में रोशनी रही तो,
चंदा को चाँदनी मिलेगी.

नेकी करके ये न सोचना,
नेकी या फिर बदी मिलेगी.

मीठे सपने नमी आँख में,
रहने दो, चाशनी मिलेगी.

मन खुश हो तो खुशी तभी है,
तुमसे मिलकर खुशी मिलेगी

जीने का हौसला गया 

लगता आज समय के हाथों मैं हूँ फिर से छला गया,
ठोकर मारी “साॅरी-साॅरी” कहकर फिर वो चला गया.

सोच रहा था कसमें खाकर सच को सच मनवा लूँगा,
पर मेरी कसमों के सँग-सँग बढ़ता हर फासला गया.

नदिया को मिलना होता है इक दिन अपने सागर से,
पर क्यों बाँध बनाया ऐसा मिलने का सिलसिला गया.

उसकी मौत हुई है लेकिन सबको क्यों विश्वास नहीं,
पूछ रहे सब कल तक वो था कितना अच्छा-भला गया?

दर्पण के हर टुकड़े में क्यों अक्स उसी का दिखता है,
जिसने बिन कुछ सोचे-समझे दर्पण तोड़ा, चला गया.

दिल टूटा तो क्या-क्या टूटा कोई कैसे समझेगा,
चाहत-हसरत-आदत के सँग जीने का हौसला गया.

सौ बार लिखें 

फूल लिखें या खार लिखें?
बोलो क्या इस बार लिखें?

तुम बिन जीना मुश्किल है,
क्या खुद को लाचार लिखें?

जीत तुम्हारी चाहें तो,
पर क्या अपनी हार लिखें?

गम में भी जो साथ न दे,
उसको क्यों परिवार लिखें?

नाव डुबोना चाहे वो,
हम उसको पतवार लिखें?

जब हर खिड़की बन्द हुई,
क्यों न उसे दीवार लिखें?

दिन भर दौड़े छुट्टी में,
इसको क्यों इतवार लिखें?

खबरों की न खबर जिसको,
उसको भी अखबार लिखें?

पहले कोई भूल करें,
तब तो भूल-सुधार लिखें.

गलती हो तो हम “माफी”,
एक नहीं, सौ बार लिखें.

माँ का आँचल है वो 

तेरे प्यार में घायल है वो.
कैसे कह दूँ पागल है वो.

उसकी चमक मे फँस मत जाना,
सोना नहीं है पीतल है वो.

काला होकर भी अच्छा है,
सुरमा है वो काजल है वो.

किसके घर हैं उस बस्ती में,
सब कहते हैं जंगल है वो.

एक जगह ठहरेगा कैसे,
जब आवारा बादल है वो.

तुम कहते हो दिल्ली जिसको,
मुझसे पूछो-चम्बल है वो.

जिसको ओढ़ सुकूँ मिलता है,
केवल माँ का आँचल है वो.

बिना आवाज़ की बातें 

कभी कुछ राज की बातें कभी एतराज की बातें,
हमारे यार की बातें अलग अंदाज की बातें.

भले वो कैद में है पर अभी हिम्मत नहीं हारा,
करे वो आसमाँ की तो कभी परवाज की बातें.

मुहब्बत की जो बातें हैं महज़ बातें नहीं होतीं,
वो होतीं गीत-गजलों की सुरों की साज की बातें.

अगर हम राज की बातें बता देते किसी को भी,
नहीं फिर राज रहती हैं कभी भी राज की बातें.

जरूरत ही नहीं लफ्जों की होती है मुहब्बत में,
दो दिल आपस में कर लेते बिना आवाज की बातें.

मेरा अपना है वो 

आईने में दिखता है वो.
बिलकुल मेरे जैसा है वो.

मेरे रोने पर रोता है,
मैं हँसता हूँ हँसता है वो.

मैं जो बुरा तो वो भी बुरा है,
मैं अच्छा तो अच्छा है वो.

मेरा दिल आईने जैसा,
जिसमे हरदम रहता है वो.

उसको अलग कैसे मानूँ,
अक्स ही मेरा अपना है वो.

हालात समझ लें 

दुश्मन की हर घात समझ लें.
अपनी भी औकात समझ लें.

आखिर तक जाना ही तो फिर,
कैसी है शुरुआत समझ लें.

अपनी ही बातों जी ज़िद क्यों,
उसकी भी तो बात समझ लें.

दिन को चाहें रात कहें पर,
क्या होते दिन-रात्त समझ लें.

खेल शुरू होने से पहले,
क्या शह है क्या मात समझ लें.

सच कहना अच्छा है लेकिन,
कैसे हैं हालात समझ लें.

घूँघट सरकते हुये

दिख गया आज घूँघट सरकते हुये.
चाँद बदली से निकला चमकते हुये.

बात कोई तो होगी ही खुशियों भरी,
मैंने देखा है उसको थिरकते हुये.

राज़ उसने छिपाया तो भरसक मगर
कह दिया चूड़ियों ने खनकते हुये.

गाँव से उसके होकर इधर आ रहीं,
आ रहीं हैं हवायें महकते हुये.

उसकी बातों पे मैं क्यों न करता यकीं,
कह रहा था वो रोते-सिसकते हुये.

शाम को घर जो पहुँचा सवेरा लगा,
घर में बच्चे मिले जब चहकते हुये.
मेरे कहने पे “हाँ” उसने कह तो दिया,
पर कहा मुझसे थोड़ा झिझकते हुये.

उसका पीना तो कितनो को यों भी खला,
कितने सच कह गया वो बहकते हुये.

उसको देखा तो महसूस ऐसा हुआ,
मिल गयी जैसे मंज़िल भटकते हुये.

कह रही थी ज़ुबाँ और कुछ पर ये दिल,
और कुछ कह रहा था धड़कते हुये.

भरपूर दुआ दो 

जीने की भरपूर दुआ दो,
या तो सजाये मौत सुना दो.

मेरे गीतों को स्वर दे दो,
या मेरी आवाज़ दबा दो.

सारी रात जगाओ मुझको,
या तुम गाकर गीत सुला दो.

अपने सिर-माथे बैठाओ,
या मुझको नज़रों से गिरा दो.

मुझसे कह दो घर मत आना,
या फिर अपने घर का पता दो.

तुम शमशीर चलाओ मुझ पर,
या नज़रों के तीर चला दो.

माँझी मेरी नाव डुबो दो,
या दरिया के पर लगा दो.

मीरा बनाती है 

कभी मीठा बनाती है कभी तीखा बनाती है.
मगर माँ जो बनाती है सदा अच्छा बनाती है.

भले कितनी मुसीबत हो उसी के पार हो मंजिल,
मगर हिम्मत वहाँ तक के लिये रस्ता बनाती है.

खुदा तो एक जैसा ही बनाता है सभी को पर,
हमारी सोच ही हमको बड़ा-छोटा बनाती है.

जगे नफरत तो खारापन पनपता दिल में सागर सा,
मुहब्बत दिल को दरिया की तरह मीठा बनाती है.

किसी का काम कर देना तो अच्छी बात है लेकिन,
हमेशा ही उसे कहना हमें हल्का बनाती है.

बड़ी सबसे है बीमारी गरीबी नाम है जिसका,
जिसे लगती है जीते जी उसे मुर्दा बनाती है.

हमें मालूम होता है-भला क्या है,बुरा क्या है,
मगर जो स्वार्थपरता है हमें अंधा बनाती है.

भले दो लोग सँग पढ़ते बड़े होते मगर किस्मत,
किसी को क्या बनाती है किसी को क्या बनाती है.

ये दुनिया कैसी बदली है यकीं झूठों पे अब करती,
जो सच्ची बात कहता है उसे झूठा बनाती है.

मुहब्बत की चरम सीमा हो तो राधा बना देती,
अगर वो हो समर्पण की तो फिर मीरा बनाती है.

तुझको याद करूँ मैं 

जब-जब तुझको याद करूँ मैं.
तनहा दिल आबाद करूँ मै.

बंधन है पर चाहत का है,
क्यों खुद को आजाद करूँ मैं.

तेरी प्रिय भाषा में अपने,
भावों का अनुवाद करूँ मैं.

सपनों की दुनिया में अक्सर,
तुझसे ही संवाद करूँ मैं.

जो चाहूँ वो तू दे देता,
क्यों कोई फरियाद करूँ मैं.

तुझको देख भुला दूँ खुद को,
फिर क्या उसके बाद करूँ मैं.

चाह तुम्हारी 

मुझको कितनी चाह तुम्हारी.
हर पल देखूँ राह तुम्हारी.

मन करता है गीत सुनाऊँ,
और सुनूँ मैं वाह तुम्हारी.

आहत दिल को कितनी राहत,
देती एक निगाह तुम्हारी.

भूल न पाऊँ याद कभी भी,
आह तुम्हारी आह तुम्हारी.

सागर गहरा या तुम गहरे,
कैसे पाऊँ थाह तुम्हारी.

आओ-देखो-जानो मुझको,
कितनी है परवाह तुम्हारी.

सोच हमारी समझ तुम्हारी 

कितने ही गुल खिलवाएगी-सोच हमारी समझ तुम्हारी.
पूरा गुलशन महकाएगी-सोच हमारी समझ तुम्हारी.

जो न कभी हो पाया तुम बिन,वो भी अब लगता है मुमकिन,
सब कुछ करके दिखलाएगी-सोच हमारी समझ तुम्हारी.

माना दूर बहुत है मंज़िल,उसकी राह बहुत है मुश्किल,
फिर भी हमको पहुंचाएगी-सोच हमारी समझ तुम्हारी.

जो न कभी सोचा है हमने,जो न कभी सोचा है तुमने,
ऐसा भी कुछ लिखवाएगी-सोच हमारी समझ तुम्हारी.

सम्बन्धों का सूत्र यही था,पर हमको मालूम नहीं था,
हमको-तुमको मिलवाएगी-सोच हमारी समझ तुम्हारी.

हम थे मौन बने तुम भाषा,फिर जीवन में जागी आशा,
अब तो सबको ही भाएगी-सोच हमारी समझ तुम्हारी.

बच्चा हो जाता हूँ 

जब भी तुझमें खो जाता हूँ.
बिलकुल बच्चा हो जाता हूँ.

तेरी गोदी में सर रखकर,
कितने सुख से सो जाता हूँ.

निंदिया रानी भोर हुई है,
दरवाजे खोलो जाता हूँ.

बादल कहता-जो सँग रहता,
उसको रोज भिगो जाता हूँ.

पालो-पोसो,बढने दो तुम,
मैं जो सपने बो जाता हूँ.

जब बोलो-आता हूँ बोलो,
मुझसे मत बोलो-जाता हूँ.

पिता

माँ के हैं श्रृंगार पिता.
बच्चों के संसार पिता.

माँ आँगन की तुलसी है,
घर के वंदनवार पिता.

घर की नीव सरीखी माँ,
घर की छत-दीवार पिता.

माँ कर्तव्य बताती है,
देते है अधिकार पिता.

बच्चों की पालक है माँ,
घर के पालनहार पिता.

माँ सपने बुनती रहती,
करते है साकार पिता.

आज विदा करके बेटी,
रोये पहली बार पिता.

बच्चों की हर बाधा से,
लड़ने को तैयार पिता.

बच्चे खुशियां पायें तो,
कर दें जान निसार पिता.

घर को जोड़े रखने में,
टूटे कितनी बार पिता.

घर का भार उठाते थे,
अब हैं घर के भार पिता.

बंटवारे ने बाँट दिए
बूढ़ी माँ-लाचार पिता.

दास्ताने-ज़िन्दगी 

कह रहा हूँ दास्ताने-ज़िन्दगी.
ग़म-ख़ुशी हैं दरमियाने-ज़िन्दगी.

मौत की क्यों फ़िक्र वो तो आएगी,
आओ गायें हम तराने-ज़िन्दगी,

खट्टे-मीठे कितने अनुभव रोज़ ही,
मिलते हैं हमको बहाने-ज़िन्दगी.

है जहाँ पर प्यार सँग सब्रो-सुकूं,
है वहाँ पर आशियाने-ज़िन्दगी.

ख़ुदकुशी को जा रहा था कोई जब,
आ गया कोई बचाने ज़िन्दगी.

बाँटिये मुस्कान औरों को सदा,
फिर लगेगी मुस्कुराने ज़िन्दगी.

दरिया पार न करना 

तुम सबसे इजहार न करना.
रिश्तों को अखबार न करना.

माना प्यार है दिल की दौलत,
पर इससे व्यापार न करना.

कर्जे-इश्क चुकाना पूरा,
इसमें कोई उधार न करना.

लेना राय भले ही सबकी,
काम उनके अनुसार न करना.

अपनी ही उँगली कट जाये,
चाकू पर यों धार न करना.

सैलाबों से डर लगता हो,
तो फिर दरिया पार न करना.

चौपाइयों के साथ

कोई रहे ज्यों भीड़ में तन्हाइयों के साथ.
रहता हूँ यों ही मैं भी मेरे भाइयों के साथ.

ऊंचाइयों पे कितनी कहाँ आ गए हैं हम,
एहसास इसका होता है गहराइयों के साथ.

उसकी हर एक बात पे हमको यकीन है,
वो बोलता है झूठ भी सच्चाइयों के साथ.

गम की करो न फिक्र हैं खुशियां भी साथ ही,
जैसे मिलें पहाड़ हमें खाइयों के साथ.

मैं लाख सोचूं फिर भी समझ पाता हूँ नहीं,
जीता है कैसे कोई भी परछाइयों के साथ.

वो दोस्त है तो है भले ही चाहे जैसा हो,
मंज़ूर है अच्छाइयों-बुराइयों के साथ.

दंगा कराया किसने पता ये नहीं मगर,
कुछ दिख रहे थे अपने भी दंगाइयों के साथ.

अच्छी लगे जो बात तो मज़हब का फर्क क्या,
पढता है वो कुरान भी चौपाइयों के साथ.

रोये कोई 

दर्द किसी का रोये कोई.
बोझ किसी का ढोये कोई.

जागे कोई बस इस गम में-
सेज किसी की सोये कोई.

कितना मुश्किल है ये सहना-
खेत किसी का बोये कोई.

ऐसे रिश्ते को क्या कहिये-
दाग किसी का धोये कोई.

सोचो ऐसा क्यों होता है-
याद किसी की खोये कोई.

सर ये झुकाया नहीं गया

माना सवाल हमसे उठाया नहीं गया.
लेकिन जवाब कोई छिपाया नहीं गया.

लोगों ने तो सताया बहुत बारहा हमें,
हमसे किसी का दिल भी दुखाया नहीं गया.

इस मामले में इतना गिला हमको है ज़रूर,
हमसे जुड़ा था हमको बताया नहीं गया.

प्रवचन तो रोज़ सुनने गये बाबा जी के हम,
दिल से अभी भी अपना-पराया नहीं गया.

रिश्तों को ऐसे समझें कि जो दिन में साथ था,
रातों में अपने साथ वो साया नहीं गया.

उसने लिखा था-सबको बता देना मेरा हाल,
खत पढ़ के उसका दर्द बताया नहीं गया.

सर को झुका के पगड़ी पहन लेते हम भी पर,
पगड़ी को हमसे सर ये झुकाया नहीं गया.

समझो ना

सिर्फ नहीं लफ्ज़ “मुहब्बत”,समझो ना.
क्या है मेरे दिल की हालत, समझो ना.

तुमको अपना माना अपना दर्द कहा,
इसको मेरी कोई शिकायत समझो ना.

तुमने जो देखा है वो भी झूठ नहीं,
पर उसके पीछे की हक़ीक़त, समझो ना.

मुझको पता है उसकी नीयत कैसी है,
उसने किया जो,उसकी शराफत समझो ना.

तुमने कुछ चाहा था पर कुछ और हुआ,
इसको तुम उसकी ही चाहत, समझो ना.

माँ के पैरों के नीचे ही जन्नत है,
पर उस जन्नत को तुम जन्नत, समझो ना.

सच्चाई सच्चाई है 

आज मुकाबिल भाई है.
तब गीता याद आई है.

अपनों से लड़ना होगा,
अपने हक़ की लड़ाई है.

सच को सच वो माना नहीं,
मैंने क़सम भी खाई है.

उसके संग सब लोग मगर,
मेरे साथ खुदाई है.

जंग ये मैं ही जीतूंगा,
सच्चाई सच्चाई है.

रिश्ता है क्या 

मेरा-उसका रिश्ता है क्या.
कोई इसको समझा है क्या.

मुझसे तो बस इतना पूछो-
कोई उससे अच्छा है क्या.

जिससे-जिससे हम मिलते हैं,
उन सबसे दिल मिलता है क्या.

देखो उसकी आँखें देखो,
सागर उनसे गहरा है क्या.

तू इतना मुस्काता है क्यों,
तेरा भी दिल टूटा है क्या.

हमेशा रहता है 

मुस्कानों के साथ हमेशा रहता है.
दीवानों के साथ हमेशा रहता है.

जिसके दिल में सिर्फ मुहब्बत रहती है,
अफसानों के साथ हमेशा रहता है.

जो भी शमा सा लहराता-बलखाता है,
परवानों के साथ हमेशा रहता है.

जिसको मस्ती रास हमेशा आती है,
मस्तानों के साथ हमेशा रहता है.

दिलवालों सँग कुछ दिन रहकर देख ज़रा,
धनवानों के साथ हमेशा रहता है.

मेरा साथ देता है 

काट वो मेरी बात देता है.
दिल से पर मेरा साथ देता है.

रोज़ करता है मुझको मैसेज वो,
पर न हाथों में हाथ देता है.

क्या बताऊँ वो कितना अच्छा है,
अच्छे-अच्छों को मात देता है.

दिन वो दे चाहे बदलियों वाले,
मुझको पूनम की रात देता है.

जब भी लिखता हूँ उसको लिखता हूँ,
वो कलम वो दवात देता है.

क्या देता है वो 

चाहता हूँ क्या मैं उससे और क्या देता है वो.
जब भी दिल की बात बोलूँ मुस्कुरा देता है वो.

मेरे दिल में जल रही है आग उसके प्यार की,
मुस्कुराकर आग को अक्सर हवा देता है वो.

कोई उसको अच्छा बोले चाहे कोई कुछ बुरा,
जाने कैसा शख्स है सबको दुआ देता है वो.

आज जब हर कोई आगे खुद ही बढ़ना चाहता,
आगे बढ़ने का सभी को हौसला देता है वो.

करना ही पड़ता है मुझको उसकी बातों पर यकीं,
हर दफा कोई गवाही ऐसी ला देता है वो.

कोसता है वो अँधेरे को न औरों की तरह,
रौशनी के वास्ते दीपक जला देता है वो.

एक दुनिया प्यार की है दूसरी नफरत की है,
प्यार की दुनिया बसा नफरत मिटा देता है वो.

जब कभी कहता हूँ उससे-फँस गया मझधार में,
मेरी कश्ती को किनारे पर लगा देता है वो।।

जो भी उसने कल देखा

सोच रहा है वो बेहतर था जो भी उसने कल देखा.
जंगल से बस्ती में आया और बड़ा जंगल देखा.

कुछ पल चंदा को ढक लेता ऐसा भी बादल देखा,
पर बादल के हटते ही फिर चन्दा स्वच्छ-धवल देखा.

जब-जब धूप बढ़ी जीवन की याद उसे आया बचपन,
नीलगगन में उसने माँ का लहराता आँचल देखा.

इसको उससे इश्क है लेकिन उसको कुछ मालूम नहीं,
प्यार में कोई हो सकता है इतना भी पागल देखा.

जो न कभी भी आहत होता था अस्त्रों से शस्त्रों से,
शब्दों के बाणों से होता उसको भी घायल देखा.

मरने के भी बाद मुहब्बत बरसों जिंदा रह सकती,
झूठ नहीं कहता हूँ यारों मैंने ताजमहल देखा.

देखा है विश्वास तो तब-तब अंतिम साँसें लेते हुये,
जब-जब अपनों को अपनों से करते मैंने छल देखा.

यों तो सुना है अक्सर कीचड़ होता खूब सियासत में,
पर न वहाँ पर अब तक मैंने खिलता कोई कमल देखा.

जैसी जिसकी फितरत होती वो वैसा ही करता है,
क्या देखा है तपता चन्दा या सूरज शीतल देखा.

प्रश्न कठिन लगता था जब तक सोचा उसके बारे में,
पर कितना आसान लगा जब करके उसको हल देखा.

कैसा आज ज़माना आया किस पर किस पर दाग लगे,
गंगाजलियों को नालों से लेते मैंने जल देखा.

आदतों में शामिल है

तू तो अब आदतों में शामिल है.
छोड़ दूँ तुझको ये तो मुश्किल है.

मेरा उठने का मन नहीं करता,
तेरी यादों की ऐसी महफ़िल है.

पार मझधार कर लिया मैंने,
अब तो बस पास में ही साहिल है.

कोई इस दिल को कैसे समझाये,
मानता कब किसी की ये दिल है.

“तेरे काबिल हूँ” ये न जानूँ मैं,
पर तू हर तरह मेरे काबिल है.

हाथ रच मेंहदी या लहू से तू,
जो भी चाहे वो तुझको हासिल है.

साथ वो है तो कौन रोकेगा,
अब तो बस मैं हूँ-मेरी मंज़िल है.

क्या सब इन्सान जगे हैं

दिल में फिर अरमान जगे हैं.
सोये थे मेहमान जगे हैं.

गाँवों में सूरज से पहले,
खेत जगे खलिहान जगे हैं.

उनके दोष छिपाने खातिर,
दीन-धरम-ईमान जगे हैं.

कृष्ण अभी पैदा हों कैसे,
जेलों के दरबान जगे हैं.

जब-जब आँख तरेरी उसने,
बस्ती के शमशान जगे हैं.

जगते तो दिखते हैं सारे,
पर क्या सब इन्सान जगे हैं.

तुझमें भी है मुझमें भी

फूलों से तो प्यार-मुहब्बत तुझमें भी है मुझमें भी.
पर थोड़ी खुशबू की चाहत तुझमें भी है मुझमें भी.

मिलना शायद ही हो पाए हम दोनों का आपस में,
फिर भी तो मिलने की हसरत तुझमें भी है मुझमें भी.

प्यार करेंगे पर रुसवाई हम न कभी होने देंगे,
कुछ भी हो पर इतनी शराफत तुझमें भी है मुझमें भी.

राह कठिन है इस जीवन की तू जाने मैं भी जानूँ
पर आगे बढ़ने की हिम्मत तुझमें भी है मुझमें भी.

सच कड़वा होता है अक्सर सबसे कहना ठीक नहीं,
यों तो सच कहने की आदत तुझमें भी है मुझमें भी.

दिल में इक अहसास जियें 

आओ हम दोनों ही लेकर दिल में इक अहसास जियें.
दूर भले हैं इक-दूजे से फिर भी रहकर पास जियें.

तुम न हमारा दिल तोड़ोगे हम न तुम्हारा तोड़ेंगे,
अपने-अपने दिल में रखकर ऐसा ही विश्वास जियें.

जिसको हम न रचा पाये थे अपनी इक मजबूरी से,
साथ अगर दो आज हमारा रचकर वो इतिहास जियें.

प्यासे रहकर जीना हो तो कब तक हम जी पायेंगे,
तृप्ति बना लें खुद को हम-तुम फिर कोई भी प्यास जियें.

मन में फूल खिलें हैं तितली फूलीं पर मँडराती है,
तुम ही बोलो ऐसे में अब कैसे हम सन्यास जियें.

फिर वरदानों की साज़िश है लेकिन उसमे फँस करके,
तुम कोई वनवास जियो ना हम कोई वनवास जियें.

पतझर बनकर जीना भी क्या कोई जीना होता है,
जितने दिन तक भी जीना है बनकर हम मधुमास जियें.

इसकी खातिर-उसकी खातिर अब तक जीते आये हम,
आओ-बैठो दो पल अपनी खातिर भी अब खास जियें.

याद तुम्हारी आई है 

याद तुम्हारी आई है.
कैसे कहूँ तनहाई है.

“प्यार है तुमसे “कह न सका,
लेकिन ये सच्चाई है.

दिल मेरा है पर इसमें,
तेरी प्रीति समाई है.

तोड़ दो तुम ये ख़ामोशी,
जान पे अब बन आई है.

अब तुमने “हाँ”बोला है,
अब किस्मत रँग लाई है.

तुम क्या जानो ये भी ग़ज़ल,
तुमने ही लिखवाई है.

तुम्हीं से पाया है

मैंने इतना प्यार तुम्हीं से पाया है.
खुशियों का संसार तुम्हीं से पाया है.

मीठा दर्द सुनहरे सपने आज मिले,
ये सब पहली बार तुम्हीं से पाया है.

दिल का कारोबार चलाने की खातिर,
जो कुछ है दरकार तुम्हीं से पाया है.

कहने को तो मैं लिखता हूँ कवितायेँ,
लेकिन यह उपहार तुम्हीं से पाया है.

“कौन है मेरा”दिल से पूछा करता था,
उत्तर आखिकार तुम्हीं से पाया है.

जो कुछ भी पाया है मैंने जीवन में,
मैं हूँ शुक्रगुज़ार,तुम्हीं से पाया है.

बरसात न दोगे

क्या हाथों में हाथ न दोगे?
जीने के जज़्बात न दोगे?

मात अगर अबकी भी खा लूं,
आगे से फिर मात न दोगे?

जिसमे हम दोनों ही भीगें,
वो बरसाती रात न दोगे?

यादों के संग ही रह लूं मैं,
इतना भी संग-साथ न दोगे?

दिल न दिया है दर्द ही दे दो,
कोई भी सौगात न दोगे?

अच्छा बस ये वादा कर लो-
आँखों को बरसात न दोगे.

सँभलकर कर पहुँचा

गिरकर और सँभलकर कर पहुँचा.
वो मंज़िल तक चलकर पहुँचा.

कितनी आवभगत की उसने,
जब मैं वेश बदलकर पहुँचा.

जिसको छू न सका कोशिश कर,
उसके पास फिसलकर पहुँचा.

इतनी आँच बढ़ाई क्यों थी,
बाहर दूध उबलकर पहुँचा.

रिश्ते जोड़ दिए बच्चे ने,
माँ के पास मचलकर पहुँचा.

आग-हवा-नभ-मिटटी-पानी,
इन सबमें वो जलकर पहुँचा.

वो पहुँचा अपनों से आगे,
पर अपनों को छलकर पहुँचा.

आज किसी के होठों तक मैं,
गीत-ग़ज़ल में ढलकर पहुँचा.

शिवाला गया है

उसे सिर्फ कह-कह के टाला गया है.
कहाँ उसके मुंह में निवाला गया है.

न हारा न जीता वो अब तक किसी से,
उसे सिक्के जैसा उछाला गया है.

जिया तो न चादर मिली पर मरा तो,
उसी को ओढ़ाया दुशाला गया है.

जिसे माँ ने छोड़ा सड़क पर अकेला,
यतीमों के द्वारा वो पाला गया है.

जो कहते थे-हम रोशनी ला रहे है,
उन्हीं के घरों कुल उजाला गया है.

जिन्होंने बनाया-बसाया था घर को,
उन्हें आज घर से निकाला गया है.

मुहब्बत का पर्चा बहुत ही है मुश्किल,
वफ़ा का ही पहला सवाल आ गया है.

पिता को खुशी माँ को चिंता बहुत है,
वो पहली दफा पाठशाला गया है.

सफाई कई बार घर की हुई पर,
न मकड़ी गई है न जाला गया है.

किया काम जिसने है कोई अनोखा,
दिया बस उसी का हवाला गया है.

पुराणों ने जिसको अगोचर बताया,
उसे मूर्ति में कैसे ढाला गया है.

ख़ुदा को न पाया न ईश्वर को पाया,
वो मस्जिद गया है,शिवाला गया है.

मुझको दुआओं में रखना

किसी को भी अपनी निगाहों में रखना.
मगर याद मुझको दुआओं में रखना.

मुहब्बत का मतलब यही है अभी भी,
दिये को जलाकर हवाओं में रखना.

बरसना कहीं भी ओ बादल मगर जल,
ज़रा मेरी खातिर घटाओं में रखना.

बताओ कहाँ से ये सीखा है तुमने,
लुभाने का जादू अदाओं में रखना.

रिहाई कभी भी न हो पाये जिनसे,
मुझे प्यार की उन दफ़ाओं में रखना.

आऊँ कैसे 

अपना हाल बताऊँ कैसे.
दिल का दर्द दिखाऊँ कैसे.

तेरी खातिर गीत लिखा है,
उसको तनहा गाऊँ कैसे.

तू नदिया मैं तेरा साहिल,
और कहीं फिर जाऊँ कैसे.

तेरी राह निहारें आखें,
इनकी प्यास बुझाऊँ कैसे.

तू तो खुद को समझा लेगा,
मैं खुद को समझाऊँ कैसे.

रूठा चाँद छिपा बादल में,
उसको आज मनाऊँ कैसे.

मन तो है तुझसे मिलने का,
तेरी “हाँ”बिन आऊँ कैसे.

मोबाइल नेटवर्क नहीं है,
तुझको कॉल लगाऊँ कैसे.

कविता अच्छी है 

दिल की बात कही कविता में वो बोला-कविता अच्छी है.
लेकिन दिल की बात न समझा कैसे कह दूँ-हाँ अच्छी है.

धूप अच्छी है बारिश अच्छी ठंडी-ठंडी हवा अच्छी है.
मन का मौसम अच्छा है तो लगता सारी फ़िज़ा अच्छी है.

वे बोले-कुछ और बढ़ो तो रिश्ता तय करवा दूँगा मैं,
बात जहाँ तक बिटिया की है तो भाई बिटिया अच्छी है.

पति के बारे में अक्सर ही वो सोचा करती है ऐसे-
वो अच्छे तो कंगन-पायल-बेंदी-नथ-बिंदिया अच्छी है.

नींद सुकूँ की गर आ जाये तो फिर क्या करना है या

सागर से मिलने के पहले तक मीठी रहती है नदिया,
खारा-खारा सागर अच्छा या मीठी नदिया अच्छी है.

ये दुनिया तो जैसी कल थी आज भी है कल भी यों होगी,
सोच हमारी अच्छी है तो ये समझो दुनिया अच्छी है.

निर्वासित सीता ने पाया जाकर जिस कुटिया में आश्रय,
राजमहल की तुलना में तो वो ऋषि की कुटिया अच्छी है.

राधा को कान्हा से अच्छा कोई नहीं लगता है लेकिन,
कान्हा हरदम ये कहता है-मुझसे तो राधा अच्छी है.

दाम खिलौने का सुन उसने पापा को देखा फिर बोली-
घर में जो रक्खी है गुड़िया वो इससे ज़्यादा अच्छी है.

कुछ और है 

कह रही तेरी ज़ुबाँ कुछ और है.
पर नज़र करती बयाँ कुछ और है.

तुम कहानी कह रहे हो और कुछ,
चोट का कहता निशाँ कुछ और है.

कह रहा है वो जो अपनी दास्ताँ,
उसके पीछे दास्ताँ कुछ और है.

ये सही है बोलता अक्सर न वो,
पर नहीं वो बेज़ुबाँ, कुछ और है.

चाहे तू मुझसे कहे या ना कहे,
तेरे-उसके दरमियाँ कुछ और है.

किस तरह उस पर यकीं कोई करे,
जो यहाँ कुछ है, वहाँ कुछ और है.

लाठियां-बन्दूक-खंज़र सब लिए,
ये नहीं है कारवाँ, कुछ और है.

कौन मानेगा तुझे सच्चा वहाँ,
मायने सच का जहाँ कुछ और है.

वो किसी की यों मदद करता नहीं,
वो नहीं है मेहरबाँ, कुछ और है.

जो बचा जिंदा कहाँ जिंदा है वो,
दर्द का ये इम्तहाँ कुछ और है.

नफरतें जो बाँटते उनसे कहो-
प्यार से बढ़कर कहाँ कुछ और है.

कब तलक पानी पिलाओगे हमें,
ये बताओ क्या मियाँ कुछ और है.

बहुत अच्छा लगा

वो न था तो कब बहुत अच्छा लगा.
वो मिला तो सब बहुत अच्छा लगा.

चैन लेकर ख्वाब मुझको दे गया,
उसका ये करतब बहुत अच्छा लगा.

जब भी मेरे घर वो आया उससे मैं,
कह न पाया तब -“बहुत अच्छा लगा.”

माफ़ कर दीं उसकी सारी ग़लतियाँ,
मुझको वो बेढब बहुत अच्छा लगा.

उसका हँसना-बोलना-चलना सभी,
क्या कहें,मतलब बहुत अच्छा लगा.

सोचता था जो भी मैं वो हो गया,
आज दिल को रब बहुत अच्छा लगा.

दूर मुझसे हो गया वो जाने क्यों,
कोई मुझको जब बहुत अच्छा लगा.

याद करता है अभी भी वो मुझे,
ये सुना तो अब बहुत अच्छा लगा.

कोई ग्राहक होता है

झूठ भले बोले कोई भी दिल तो धक-धक होता है.
ज़्यादा सफ़ाई देता है जो उस पर भी शक होता है.

यों तो हम सोचा करते हैं-ऐसा हो फिर वैसा हो,
लेकिन जो होना होता है वो तो अचानक होता है.

पहला-पहला प्यार कभी भी भूल नहीं पाता कोई,
वो यादों में जीवन की अंतिम साँसों तक होता है.

सब कुछ उसके वश में हैं तेरे वश में है कुछ भी नहीं,
फिर तू परेशाँ इसकी-उसकी ख़ातिर नाहक होता है.

हक़ की बातें करता है तू फ़र्ज़ कभी सोचा है क्या,
जितना फ़र्ज़ निभाता कोई उतना ही हक़ होता है.

उसका सर ऊँचा रहता है हरदम दुनिया के आगे,
जो भी बड़ों के आगे आदर से नतमस्तक होता है.

पत्थर आपस में टकरायें कोई बात नहीं होती,
आग तभी पैदा होती जब पत्थर “चकमक” होता है.

पैसे की क़ीमत तो कोई ऐसे बच्चे से पूछे,
जिसको खिलौनों से भी प्यारा अपना गुल्लक होता है.

सच पूछो ये सारी दुनिया है बाजार सरीखी ही,
कोई होता है विक्रेता कोई ग्राहक होता है.

एक प्यारी ग़ज़ल

देख तुमको कही एक प्यारी ग़ज़ल.
छू रही है दिलों को हमारी ग़ज़ल.

लोग तारीफ हमसे हमारी करें,
जबकि सच है कि है ये तुम्हारी ग़ज़ल.

सोते-जगते तुम्हीं याद आते रहे,
ऐसे तुमने सजायी-सँवारी ग़ज़ल.

इक ग़ज़ल पर ग़ज़ल हमने कह दी ज़रा,
सबको लगने लगी सबसे न्यारी ग़ज़ल.

शुक्रिया उस ख़ुदा का करें किस तरह,
जिसने धरती पर ऐसी उतारी ग़ज़ल.

दिल के साथ जिया

जिसने ज़्यादा सोचा-समझा वो मुश्किल के साथ जिया.
मैं तो भाई हर मुश्किल में अपने दिल के साथ जिया.

आँधी या तूफाँ हो कोई रोक न पायेगा उसको,
जो दरिया के बीच रहा फिर भी साहिल के साथ जिया.

मत दो ऐसा दर्द किसी को जो दिल में ही बस जाये,
कौन यहाँ पर ज़्यादा दिन तक दर्दे-दिल के साथ जिया.

बोझ न समझ तनहाई को जिसने उससे यारी की,
सच मानो वो तनहाई में भी महफ़िल के साथ जिया.

सोते-जगते हरदम रक्खो मंज़िल अपनी आँखों में,
मंज़िल उसने ही पायी है जो मंज़िल के साथ जिया.

होशियार दुश्मन अच्छा है जाहिल दोस्त नहीं अच्छा,
जाने कैसे इतने दिन तक वो जाहिल के साथ जिया.

क़ातिल कोई और था लेकिन झूठी एक गवाही से,
मुजरिम बन ताउम्र बेचारा वो क़ातिल के साथ जिया.

दुनियादारी रख 

रख दुश्मन से यारी रख.
फिर भी कुछ तैयारी रख.

दिल में नरमी रख लेकिन,
तेवर में खुद्दारी रख.

बाहर राख लपेटे रह,
भीतर इक चिन्गारी रख.

हार-जीत की फिक्र न कर,
अपनी लड़ाई जारी रख.

चुप रहना है चुप रह जा,
बात अगर रख भारी रख.

जब तक है इस दुनिया में,
कुछ तो दुनियादारी रख.

आइना

झूठ कहता है कब आइना.
हमको लगता है रब आइना.

कोई देखे भले ना उसे,
देख लेता है सब आइना.

क्या कहोगे बताओ ज़रा,
सामने होगा जब आइना.

जो मैं तुमसे नहीं कह सका,
वो भी कह देगा अब आइना.

झूठ का कोई पत्थर चले,
टूट जाता है तब आइना.

ठहरो क़र्ज़ चुकाना है 

जीवन एक चदरिया सुख-दुःख इसका ताना-बाना है.
हँसकर काटो चाहे रोकर जीवन यार बिताना है.

लालच हो तो पड़ जाता है पर्दा सबकी आँखों पर,
पंछी को भी जाल न दिखता केवल दिखता दाना है.

हमने जो पाया है जीवन उसका कोई मकसद है,
क्या फूलों का मकसद केवल खिलना है-मुरझाना है.

यों तो चारों ओर दिखेंगी कमियाँ ही कमियाँ लेकिन,
तुम जंगल में मंगल रच दो फिर कैसा वीराना है.

अच्छा और बुरा है जो भी सब है उसके हाथों में,
हारे को जितवाना है या जीते को हरवाना है.

क्यों पड़ते हो भाई अपने-बेगाने के चक्कर में,
ना तो कोई अपना है ना ही कोई बेगाना है.

क़र्ज़ नहीं उतरा करता है माँ का हो या धरती का,
अंतिम सांसें भी कहती हैं-ठहरो क़र्ज़ चुकाना है.

दीवाने को फिक्र हमेशा अपने सनम की रहती है,
फिक्र जिसे हो खुद की हरदम वो कैसा दीवाना है.

पूछे है 

रोज़ कितने सवाल पूछे है.
पर न वो मेरा हाल पूछे है.

क्यों न मिलती हो तुम कभी मुझसे,
एक नदिया से ताल पूछे है.

दर्द बिछुड़न का होगा तुमको भी,
टूटे पत्तों से डाल पूछे है.

मेरा महबूब मुझसे अक्सर ही,
क्यों है वो बेमिसाल पूछे है.

जान की फिक्र क्यों नहीं तुझको,
एक मछली से जाल पूछे है.

पूछना तो न चाहे कुछ भी वो,
कुछ न कुछ बहरहाल पूछे है.

खेल में किस तरह वो जीतेगा,
जो कि हर एक चाल पूछे है.

गाओ ना

इतनी कसमें खाओ ना.
सच्ची बात बताओ ना.

क़ीमत समझो अश्क़ों की,
इनको यों छलकाओ ना.

वो सब कुछ दे सकता है,
दामन तो फैलाओ ना.

अँधियारे से लड़ना है,
कोई दीप जलाओ ना.

कहते हो सब कर लोगे,
कुछ करके दिखलाओ ना.

जो कहना है है साफ़ कहो,
बातों में उलझाओ ना.

जब-तब जाने धमकी,
जाते हो तो जाओ ना.

आज ग़ज़ल मेरी कोई,
अपने सुर में गाओ ना.

दिल तक पहुँचें 

दिल की बातें दिल तक पहुँचें.
यानी वो मंज़िल तक पहुँचें.

दरिया में जो साथ हमारे,
सब के सब साहिल तक पहुँचें.

क़त्ल हुए हैं ख्वाब किसी के,
कैसे हम क़ातिल तक पहुँचें.

जिनकी राह निहारे महफ़िल,
वो भी तो महफ़िल तक पहुँचें.

आसानी से हल कर लें हम,
मसले क्यों मुश्किल तक पहुँचें.

नहीं पहचाना क्या

मुझको नहीं पहचाना क्या.
भूल गए याराना क्या.

इतनी जल्दी जाते हो,
इसको कहेंगे आना क्या.

दिल की बात न कह पाए,
ऐसा भी शरमाना क्या.

जब कहनी है सच्चाई,
तो फिर कोई बहाना क्या.

प्यार में डूबा वो बोला-
मै क्या है मैखाना क्या.

दर्द जो समझे उससे कहो,
सबसे रोना-गाना क्या.

पत्थर बोला-जाओ भी,
शीशे से टकराना क्या.

जलती नहीं जब कोई शमा,
आएगा परवाना क्या.

वो तो गिरा है नज़रों से,
उसको यार उठाना क्या.

दिल टूटे या ख्वाब कभी,
मुमकिन है जुड़ पाना क्या.

ज़रूरी बहुत है

नदी से समन्दर की दूरी बहुत है.
मगर इनका मिलना ज़रूरी बहुत है.

हुई बात सूरज से है कोई गुपचुप,
तभी शाम दिखती सिंदूरी बहुत है.

अंधेरों में सँग मेरे यादें तुम्हारी,
जो यादों का चेहरा है, नूरी बहुत है.

हमारी कहानी में सब कुछ है लेकिन,
तुम्हारे बिना ये अधूरी बहुत है.

मिलोगे- मिलोगे-मिलोगे कभी तुम,
यकीं भी है दिल को सबूरी बहुत है.

वो किसान को मार गया

बाप मरा बेटे के सर पर आ अब कितना भार गया.
लापरवाह बहुत था बेटा अब हो ज़िम्मेदार गया.

जिसको यकीं था खुद पर ज़्यादा वो तूफाँ से हार गया.
जिसने “उस” पर छोड़ दिया सब उसका बेड़ा पार गया.

उसके मरने का गम किसको सोचें सारे घरवाले-
कितने दिन से था बिस्तर पर,अच्छा है बीमार गया.

पत्नी की लम्बी बीमारी ने उसको यों तोड़ दिया,
इक दिन मंगलसूत्र उतारा खुद लेकर बाजार गया.

चाल भले धीमी थी उसकी पर न रुका पल भर भी वो,
इस कारण खरगोश के आगे कछुआ बाजी मार गया.

किसने किसकी इज्ज़त लूटी सिर्फ पता था कुछ को ही,
लेकिन आज बताने सबको घर-घर में अख़बार गया.

सूखा-बाढ़-महाजन-मौसम-भूख -गरीबी और लगान,
जिसने जब भी मौका पाया वो किसान को मार गया.

कुछ कहता तो 

थोड़े दिन सँग रहता तो.
वो मुझसे कुछ कहता तो.

मेरे आगे बर्फ़ रहा,
पानी था तो बहता तो.

वो कुंदन बन सकता था,
लेकिन आग में दहता तो.

इतनी जल्दी टूट गया.
बोझ ज़रा सा सहता तो.

जब खुद ही दीवार बना,
तो पहले वो ढहता तो.

मज़िल तक पहुँचाता मैं,
हाथ वो मेरा गहता तो.

याद जो आई तो

उसकी याद जो आई तो.
डसने लगी तनहाई तो.

जिसकी क़समें खाते हो,
उसने क़सम ना खाई तो.

उससे बिछड़ कर रह लोगे,
पर जो चली पुरवाई तो.

नींद की गोली खाकर भी,
तुमको नींद न आई तो.

वो मूरत खजुराहो की,
उसने ली अँगड़ाई तो.

माना कुछ न कहोगे तुम,
आँख मगर भर आई तो.

हम न पिघलने वाले हैं 

उनके भाषण आग उगलने वाले हैं.
फिर बस्ती के कुछ घर जलने वाले है.

जबसे पड़े वे ज्योतिषियों के चक्कर में,
कहते है हालात बदलने वाले है.

जो हिंसा से लड़ने बैठे अनशन पर,
उन पर लाठी-डंडे चलने वाले है.

ध्यान लगाकर सुनता उड़ने की बातें,
लगता उसके पंख निकलने वाले हैं.

आज पिता ने इतना पीटा बच्चों को,
सहमे बच्चे अब न मचलने वाले हैं.

यों तो कितने जलने वाले दुनिया में,
दीपक जैसे कितने जलने वाले हैं.

उन पर क्यों विश्वास करेगा कोई भी,
हर मौके पर बात बदलने वाले हैं.

आप बड़े हैं जो कहते हैं ठीक है पर,
साबुत मक्खी हम न निगलने वाले हैं.

मोम न समझो हमको हम तो पत्थर हैं,
लाख तपाओ हम न पिघलने वाले हैं.

रोक लेता है 

मैं कैसे छोड़कर जाऊँ मुझे घर रोक लेता है.
नदी का रास्ता जैसे समंदर रोक लेता है.

कभी नाराज़ होकर वो उठा लेता है जब खंज़र,
झुका देता हूँ मैं गर्दन वो खंज़र रोक लेता है.

ग़लत हो काम कोई तो कभी मैं कर नहीं सकता,
कभी दिल रोक लेता है कभी डर रोक लेता है.

मुकद्दर ही कभी आगे बढ़ाता है किसी को तो,
किसी को आगे बढ़ने से मुकद्दर रोक लेता है.

पराया देश है उसको वहाँ अच्छा नहीं लगता,
मगर है बोझ कर्जे का जो सर पर, रोक लेता है.

न जाओ छोड़कर मुझको मैं ज़िंदा रह न पाऊंगा,
सदा मुझको वो इतनी बात कहकर रोक लेता है.

लिखा था नाम हम दोनों ने बचपन में कभी जिस पर,
इधर से जब गुज़रता हूँ वो पत्थर रोक लेता है.

कैसे छाँटा जाये 

हर खाई को पाटा जाये.
हर इक का ग़म बाँटा जाये.

वो ग़लती हम भी कर सकते,
बच्चों को क्यों डाँटा जाये.

सोच मुनाफ़ा औरों का तो,
तेरा भी सब घाटा जाये.

शाखायें ही काटें-छांटें,
पेड़ न जड़ से काटा जाये.

आओ हम सब मिलकर बैठें,
बस्ती से सन्नाटा जाये.

इक डाली का होकर भी क्या,
फूलों के सँग काँटा जाये.

जबसे घर टूटा है तबसे,
क्या-क्या टूटा-टाटा जाये.

माँ बीमार पड़ी है, बेटा
करने सैर-सपाटा जाये.

अच्छे और बुरे इक जैसे,
सोचो कैसे छाँटा जाये.

जनाब हो तुम

हमारे दिल की किताब हो तुम.
सवाल हो तुम जवाब हो तुम.

है सँग तुम्हारा सुकूँ हमारा,
हमारी नींदें हो ख़्वाब हो तुम.

तुम्हारी खुशबू है फैली हर सू,
हो रातरानी गुलाब हो तुम.

जो तुमको जाने वो हमको माने,
हमारी हस्ती-रुआब हो तुम.

बचेगा कैसे कोई नशे से,
तुम्हीं ही साकी शराब हो तुम.

करीब आओ सितम न ढाओ,
हुज़ूर हो तुम जनाब हो तुम.

मुस्कान तो है

होठों पर मुस्कान तो है.
जीने का अरमान तो है.

आलीशान भले ना हो,
अपना एक मकान तो है.

माना वो भगवान नहीं,
पर अच्छा इन्सान तो है.

कल ग़ुल भी आ जायेंगे,
घर में इक गुलदान तो है.

दूर भले है तुझसे वो,
रखता तेरा ध्यान तो है.

बाहर दिखता हो या नहीं,
भीतर इक तूफान तो है.

छोड़ो चिंता खिड़की की,
खोलो रौशनदान तो है.

क्या है अच्छा और बुरा,
तुमको इसका ज्ञान तो है.

क़र्ज़ न हो सर पर तो क्या,
बेटी एक जवान तो है.

कैसा भी हो पर रिश्ता,
दोनों के दरम्यान तो है.

उसका सहारा काफ़ी है

वो चाहे तो सब मिल जाये एक इशारा काफ़ी है.
दुनिया से क्यों माँगूँ कुछ मैं, उसका सहारा काफ़ी है.

बेटे तेरे बँगले में हैं रहने की सब सुविधायें,
फिर भी मेरी ख़ातिर मेरा घर-चौबारा काफ़ी है.

किस्मत में लिक्खा है बचना तो शोलों से डरना क्या,
और अगर है जलना तो फिर एक शरारा काफ़ी है.

मन के साथ न जा पाये तो बद्रीनाथ भी जाना,
मन भी साथ रहे तो घर का ठाकुरद्वारा काफ़ी है.

भाई ये अम्मा-बाबू हैं घर-खेती-दूकान नहीं,
पहले ही जो बाँट चुके हो वो बँटवारा काफ़ी है.

पूछ रहा है 

इक बेवफ़ा से कोई पता पूछ रहा है.
किस ओर है ये राहे-वफ़ा वफ़ा पूछ रहा है.

अच्छा न इक मरीज़ हुआ जिससे कभी भी,
उस डॉक्टर से अपनी दवा पूछ रहा है.

पूछा न उसने कुछ भी कभी पास रहा जब,
अब दूर हूँ तो हाल मेरा पूछ रहा है.

क़ातिल के क़त्ल करने का देखें तो सलीका,
मक़्तूल से वो उसकी रज़ा पूछ रहा है.

जिस बात को छुपाना अभी चाह रहा हूँ,
वो बस उसी के पीछे पड़ा पूछ रहा है.

इक बार भी न पूछा कि माँ कैसे मरी पर,
बक्से में उसके क्या-क्या मिला पूछ रहा है.

क्या वो जाप होता है 

कभी कुछ पुण्य होता है कभी कुछ पाप होता है.
कराता जो वो करते हम क्या अपने आप होता है.

हमारे दिल में जो आता उसे हम कह दिया करते,
कभी इस बात का हमको न पश्चाताप होता है.

मुहब्बत शब्द है ऐसा न इसकी कोई परिभाषा,
न इसकी कोई भाषा है न इसका माप होता है.

कभी अभिशाप भी होता किसी वरदान के जैसा,
कभी वरदान भी कोई कि ज्यों अभिशाप होता है.

भले ही फेरिये माला सुबह से शाम तक लेकिन,
न जब तक नाम लें दिल से तो क्या वो जाप होता है.

सम्बल देते हैं 

कुछ आते हैं चल देते हैं.
कुछ रुककर सम्बल देते हैं.

कुछ तो प्रश्न कठिन कर देते,
कुछ प्रश्नों के हल देते हैं.

पुरखे क्या-क्या देकर जाते,
हम उनको बस जल देते हैं.

पानी-फसलें-झूले-कजली,
क्या-क्या ये बादल देते हैं.

पेड़ों की सजन्नता देखो,
पत्थर मारो फल देते हैं.

हम आँगन में तुलसी चाहें,
वे लगवा पीपल देते हैं.

गमलों इतना मत इतराओ,
हरियाली जंगल देते हैं.

उनके कहने का क्या कहना,
सारे अर्थ बदल देते हैं.

यों ही नैन कटरी लगते,
क्यों इनमें काजल देते हैं.

हम साधन की राह न देखें,
हम पैदल ही चल देते हैं.

कहानी बदल दे

वो चाहे तो पूरी कहानी बदल दे.
बुढ़ापा बदल दे जवानी बदल दे.

वो कह दे तो सूरज छिपे बादलों में,
वो कह दे तो दरिया रवानी बदल दे.

कभी दे ज़मीं आसमां दे कभी वो,
वो जब चाहे तब जिंदगानी बदल दे.

नदी खारी कर दे वो सागर को मीठा,
वो जिसकी भी चाहे निशानी बदल दे.

हमेशा नहीं कुछ भी रहता किसी का,
वो राजा बदल दे वो रानी बदल दे.

मेरे हमसफर देखिये 

देखिये-देखिये इक नजर देखिये.
कब से बैठा हूँ मैं भी इधर देखिये.

आपसे मेरे दिल की गुज़ारिश यही-
आपका दिल न चाहे मगर देखिये.

मेरी नजरों से नजरें मिला लीजिये,
फिर इधर देखिये या उधर देखिये.

आपके वास्ते जैसे मैं सोचता,
आप भी तो कभी सोचकर देखिये.

आपको जो भी कहना हो कहिये मगर,
कौन होने लगा चश्मेतर देखिये.

बात दिल की कहूँ किस तरह आपसे,
थरथराने लगे हैं अधर देखिये.

आपकी राह आसान हो जायेगी,
आप बनकर मेरे हमसफर देखिये.

प्यार ही प्यार मैंने कमाया सदा,
कितना होगा मेरा आयकर देखिये.

पहले नज़र देखिये

किसकी कैसी है पहले नज़र देखिये.
आदमी देखिये फिर हुनर देखिये.

खूब औरों के घर ताकिये-झाँकिये,
पर कभी आप अपना भी घर देखिये.

ख़्वाब है गर बुरा तो भुला दीजिये,
वो है अच्छा तो साकार कर देखिये.

दाँव पर रखना औरों को आसान है,
ख़ुद को रखकर कभी दाँव पर देखिये.

कैसा लगता है बेटी को करके विदा,
उसके माँ-बाप से पूछ कर देखिये.

की अभी तक दवा तो असर क्या हुआ,
आज की है दुआ तो असर देखिये.

क्या हैं अख़बार में हादसे ही छपे,
देखिये कोई अच्छी ख़बर देखिये.

आपको जो भी कहना था वो कह चुके,
अब जो कहता हूँ सुनिये इधर देखिये.

पहले तो शेर में देखिये शेरियत,
बाद में क़ाफ़िया या बहर देखिये.

डगर आपकी है

गली आपकी है डगर आपकी है.
चले कोई मर्जी मगर आपकी है.

कहे कोई कैसे वो कागज़ गलत है,
लगी जिसपे साहब मुहर आपकी है.

जो मर्जी से अपनी बहाओ तो जाने,
नदी आपकी है लहर आपकी है.

वो सच्ची या झूठी है खुद ही बतायें,
जो अखबार में है खबर आपकी है.

कोई खूबसूरत है कोई नहीं है,
ये सच पूछिये तो नजर आपकी है.

मुहब्बत में हालत इधर जो हमारी,
बताओ हमें क्या उधर आपकी है?

भले ही गजल तो ये हमने कही है,
जमीं आपकी है बहर आपकी है.

हार कभी स्वीकार न करना

मुझसे दूरी यार न करना.
मेरे दिल पर वार न करना.

दिल में कुछ भी रखना लेकिन,
होठों से इनकार न करना.

दिल के बदले दर्द मिले तो,
दिल का कारोबार न करना.

साहिल तक लाकर कहते हो-
देखो,दरिया पर न करना.

लाख गुज़रना बाज़ारों से,
पर ख़ुद को बाज़ार न करना.

काँटों से डरते हो इतना,
तुम फूलों से प्यार न करना.

आज नहीं तो कल जीतोगे
हार कभी स्वीकार न करना.

सही दो-चार बोलेंगे 

जो हैं हालात घर के वो दरो-दीवार बोलेंगे.
छुपाओ लाख सच्चाई मगर अख़बार बोलेंगे.

तुम्हारे पास है चाकू ज़ुबाँ तुम काट सकते हो,
हमारे पास है जब तक ज़ुबाँ सौ बार बोलेंगे.

जहाँ हैं फूल गुलशन में वहीँ कुछ खार भी तो हैं,
कभी कुछ फूल बोलेंगे कभी कुछ खार बोलेंगे.

हम अपने प्ले के बारे में कहें क्या आप से कुछ भी,
हमें जो कुछ भी कहना है वो सब किरदार बोलेंगे.

न कोई बात सुनता है कभी माँ-बाप की भी वो,
तो उसके मामले में आप क्यों बेकार बोलेंगे.

हमें लगता है चुप रहना ज़रूरी है तभी चुप हैं,
बता दो बोलने का एक भी आधार,बोलेंगे.

अभी इस उम्र में ही जब ज़ुबाँ यों तेज़ चलती है,
बड़े होंगे तो क्या-क्या और बरखुरदार बोलेंगे.

ज़माना झूठ का है पर ज़रा सच बोलकर देखें,
अभी भी आपके हक़ में सही दो-चार बोलेंगे.

एक ज़माना था 

वो भी एक ज़माना था.
दिल उसका दीवाना था.

दूर बहुत था उसका घर,
फिर भी आना-जाना था.

डूबा रहता था अक्सर,
आँखें क्या, मैख़ाना था.

कुछ मुस्कानें पाया मैं,
उसके पास खज़ाना था.

राह मुड़ी सँग छोड़ गया,
उसको साथ निभाना था.

तब लगता था-अपना है,
अब लगता-बेगाना था.

हम मिलते हैं

खुशियाँ मिलतीं ग़म मिलते हैं.
सबसे हँसकर हम मिलते हैं.

अच्छे तो हैं इस दुनिया में,
पर ढूँढो तो कम मिलते हैं.

बीते दिन की अलमारी में,
यादों के अलबम मिलते हैं.

हमराही मिलते हैं कितने,
पर कितने हमदम मिलते हैं.

उससे मिलकर लगता ऐसा,
जैसे ख़ुद से हम मिलते हैं.

प्यार करे है

छुप-छुप कर दीदार करे है.
क्या वो मुझसे प्यार करे है.

आँखों से तो लगता-चाहे,
होटों से इनकार करे है.

शर्मो-हया की लक्ष्मण-रेखा,
वो न कभी भी पार करे है.

हर वादा पूरा करने का,
वादा वो हर बार करे है.

सच बोले या झूठ कहे वो,
दिल उस पर एतबार करे है.

दिल नुकसान-नफ़ा क्या जाने,
दिल क्या कारोबार करे है.

अपनापन दिखता है 

अपना तो जन-जन दिखता है.
किसमें अपनापन दिखता है.

बारिश तो आती है पर क्या,
सावन में सावन दिखता है.

बच्चे तो दिखते हैं काफ़ी,
कितनों में बचपन दिखता है.

बिल्डिंग में कमरे ही कमरे,
गायब घर-आँगन दिखता है.

भीतर हैं गाँठें ही गाँठें,
बाहर गठबन्धन दिखता है.

साथ अपनी ग़ज़ल के बैठेँगे

घर से बाहर निकल के बैठेंगे
साथ अपनी ग़ज़ल के बैठेँगे.

शोरगुल है यहाँ बहुत ज़्यादा,
हम कहीं दूर चल के बैठेँगे.

जाम छलकेंगे उसकी आँखों से,
कब तलक हम सँभल के बैठेँगे.

मान लेता है ज़िद हमारी वो,
आज हम फिर मचल के बैठेँगे.

उसके दर पे हम आके बैठे हैं,
अब कहाँ और टल के बैठेँगे.

खोज लेगा ही खोजने वाला,
वेश कितने बदल के बैठेँगे.

दिल से पुकार लेते हैं

ज़मीं पे चाँद को हम यों निहार लेते हैं.
हम अपनी ग़ज़लों में तुमको उतार लेते हैं.

बगैर सोचे हमें दे दो प्यार की दौलत,
चुका ही देते हैं जो भी उधार लेते हैं.

किसी के साथ बिता करके कुछ हसीं लम्हे,
हम अपनी ज़िन्दगी पूरी सँवार लेते हैं.

तुम्हारे बिन तो है मुश्किल गुज़ारना पल भर,
तुम्हारी याद में वर्षों गुज़ार लेते हैं.

हमारी नाव कभी जब भँवर में फँसती है,
तुम्हारे नाम को दिल से पुकार लेते हैं.

सारे शिकवे-गिले जायेंगे 

थोड़ा-थोड़ा अगर हम जायेंगे.
जायेंगे,सारे शिकवे-गिले जायेंगे.

सोचते हैं कि धीरज धागों से हम,
कब तलक जख़्म दिल के सिले जायेंगे.

आप चाहे न जायें मेरे सँग मगर,
आपकी यादों के काफ़िले जायेंगे.

दूरियाँ-दूरियाँ-दूरियाँ-दूरियाँ,
तोड़िये,टूट ये सिलसिले जायेंगे.

एक ही अर्ज़ है- मुस्कुराते रहें,
मेरे गुलशन के ग़ुल भी खिले जायेंगे.

सच जब तक खामोश रहेगा 

अच्छा तब तक जोश रहेगा.
जब तक हमको होश रहेगा.

पीने की आदत है जिसकी,
वो हरदम मदहोश रहेगा.

थोड़ा-थोड़ा जोड़ेंगे तो,
कब तक खाली कोश रहेगा.

कोई माफी मांग अगर ले,
क्या उस पर आक्रोश रहेगा.

सोयेगा तो अब भी पीछे,
कछुये से खरगोश रहेगा.

तू हर इक मंजिल पा लेगा,
यदि साहस-संतोष रहेगा.

झूठ तभी तक चिल्लायेगा,
सच जब तक खामोश रहेगा.

तेरी तस्वीर के पास

एक ग़ज़ल ग़ालिब के सँग थी एक ग़ज़ल थी मेरे के पास.
एक ग़ज़ल मैंने भी पायी है तेरी तस्वीर के पास.

कोई काला जादू लगता तेरी काली ज़ुल्फ़ों में,
बँध जाता है जो आता है ज़ुल्फ़ों की जंज़ीर के पास.

तेरे नयनों की तेज़ी की तुलना किससे की जाये,
जो तेज़ी है इनमें वो है किस बरछी किस तीर के पास.

जब भी तेरे पास पहुँचता मुझको ऐसा लगता है-
जैसे कोई राँझा पहुँचा हो फिर अपनी हीर के पास.

जब से तूने मेरी ख़्वाहिश को अपनी मंज़ूरी दी,
ऐसा लगता-मेरे सपने जा पहुँचे ताबीर के पास.

तुझको पाकर कितना खुश हूँ कैसे तुझको बतलाऊँ,
सोच रहा हूँ-कितनी खुशियाँ हैं मेरी तक़दीर के पास.

कोई भी तस्वीर जो देखूँ खो जाऊँ मैं यादों में,
कितनी-कितनी यादें होती हैं इक-इक तस्वीर के पास.

दौलत, दौलत होती है पर दौलत सब कुछ होती तो,
कोई दौलतवाला फिर क्यों जाता पीर-फ़कीर पास.

ताक़त तो होती है उसमें जो हथियार चलाता है,
वरना कितनी ताक़त होती भाला-बरछी-तीर के पास.

सदियाँ गुज़रीं फिर भी अब तक वो ज़िंदा हैं जन-जन में,
कुछ तो ऐसा होगा तुलसी-मीरा-सूर-कबीर के पास.

इतना हौसला देना

कोई जो गिरे उसको जाके तुम उठा देना.
या वो उठ सके खुद ही इतना हौसला देना.

प्यार करने वालों को है ग़लत सजा देना,
प्यार उनको देना या प्यार की दुआ देना.

राज़ अपने दिल का तुम हर किसी मत कहना,
दिल किसी से मिल जाये उसको सब बता देना.

जोड़ना अगर हो तो जोड़ देना रिश्तों को,
हो अगर घटाना तो दूरियाँ घटा देना.

जा रहे हो तो जाओ मैं न तुमको रोकूँगा,
पर कहाँ मिलोगे अब कुछ अता-पता देना.

आग दिल में चाहत की मैंने तो लगा ली है,
चाहे तुम बुझा देना या इसे हवा देना.

कल तुम्हारे सँग भी तो ऐसा कुछ भी सकता,
सोचकर-समझकर ही कोई फ़ैसला देना.

देना या न देना कुछ मैं बुरा न मानूँगा,
ख़्वाब में भी पर मुझको तुम नहीं दग़ा देना.

अब अँधियारे बोलें

दो नैना कजरारे बोलें.
‘आओ पास हमारे बोलें”.

होंठ नहीं कह पायें जो भी,
वो हर बात इशारे बोलें.

“प्यारी नदिया थोड़ा रुक जा”,
उससे रोज़ किनारे बोलें.

ग़म के मारों से अपना ग़म,
खुलकर ग़म के मारे बोलें.

हम तो कम बोलें पर हमसे,
ज़्यादा काम हमारे बोलें.

लेकर आज मशाल चले हम,
आयें अब अँधियारे बोलें.

प्रेम तराना गाये

मेरा दिल दीवाना गाये.
गाये प्रेम तराना गाये.

अफ़साना लिख जाये कोई,
फिर कोई अफ़साना गाये.

उसके गीत सुनूँ तो लगता-
स्वर जाना-पहचाना गाये.

संग शमा के जलते-जलते,
जाने क्या परवाना गाये.

तीर चले नैनों के जब-जब,
घायल हो दीवाना गाये.

गाते-गाते वो शर्माये,
तो उसका शर्माना गाये.

प्यार भरा प्याला जो पी ले,
जीवन भर मस्ताना गाये.

जो-जो रास रचाये उसने,
वृन्दावन-बरसाना गाये.

मेरी गज़लें ऐसी ग़ज़लें,
मेरे साथ ज़माना गाये.

दिल से साथ रहे

सँग तो हम दिन-रात रहे.
क्या हम दिल से साथ रहे.

मन की बात न कह पाये,
करते कितनी बात रहे.

खुद पर क़ाबू क्या पाते,
बेक़ाबू जज़्बात रहे.

तुम दोषी ना हम दोषी,
दोषी तो हालात रहे.

उम्मीदें थीं मरहम की,
पर मिलते आघात रहे.

अंत भला हो या मालिक,
कैसी भी शुरुआत रहे.

दुख न लगे दुख, जब सुख का
उससे अधिक अनुपात रहे.

रौशन है

वो आया घर रोशन है.
दीवारो-दर रौशन है.

उसको देख लगे जैसे-
चाँद ज़मीं पर रौशन है.

उसके ख़त का क्या कहना-
अक्षर-अक्षर रौशन है.

रात अमावस वाली है,
गाँव-गली-घर रौशन है.

प्यार का दीपक ताजमहल,
पत्थर-पत्थर रौशन है.

जब अपना दिल रौशन हो,
तो दुनिया भर रौशन है.

मेरे गीत समर्पित उसको (गीत) 

मेरे गीत समर्पित उसको जिसने ये लिखवाये हैं।
शब्द उसी से अर्थ उसी से भाव उसी से पाये हैं।

मैंने ऐसा कब सोचा था-
गीत कभी लिख पाऊँगा मैं।
स्वर भी ऐसा नहीं मिला था
जो कि सोचता गाऊँगा मैं।
मेरे स्वर में गीत उसी ने गाये और सुनाये हैं।
मेरे गीत समर्पित उसको जिसने ये लिखवाये हैं।

मैं तो एक माध्यम भर हूँ
वरना इनमें क्या है मेरा।
अगर न सूरज करे रोशनी
क्या हो सकता कभी सवेरा।
ये उसने ही किये प्रकाशित जन-जन तक पहुँचाये हैं।
मेरे गीत समर्पित उसको जिसने ये लिखवाये हैं।

जो प्रवाह सौंपा है उसने
वैसा ही अब रहे निरंतर।
गीतों की यह पावन धारा
गंगा जैसी बहे निरंतर।
मैं भी सबको भाऊँ ज्यों ये गीत सभी को भाये हैं।
मेरे गीत समर्पित उसको जिसने ये लिखवाये हैं

तुझसे विनती करूँ लेखनी

तुझसे विनती करूँ लेखनी ऐसा गीत बना दे।
जिसके द्वारा जन-जन को तू मेरा मीत बना दे।
अक्षर-अक्षर की जननी तू
शब्द-शब्द हैं तेरे।
सारे वाक्य दिये हैं तूने
जो कहलाते मेरे।
करके कृपा सफलता मेरी आशातीत बना दे।
तुझसे विनती करूँ लेखनी ऐसा गीत बना दे।

तुलसी-सूर-कबीरा सबको
तूने धन्य किया है।
मैंने भी अब तेरे द्वारे
रक्खा एक दिया है।
मेरे मन के भावों को भी परम पुनीत बना दे।
तुझसे विनती करूँ लेखनी ऐसा गीत बना दे।

कभी न मेरा साहस टूटे
कभी न मैं घबराऊँ।
अपना बुरा चाहने वालों
का भी बुरा न चाहूँ।
अगर कभी मैं लगूँ हारने उसको जीत बना दे।
तुझसे विनती करूँ लेखनी ऐसा गीत बना दे।

माँ का प्यार नहीं है

यहाँ सभी सुख-सुविधायें हैं लेकिन सुख का सार नहीं है।
मिला शहर में आकर सब कुछ लेकिन माँ का प्यार नहीं है।

घर में खायें या होटल में
मिल जाती है पूरी थाली।
लेकिन यहाँ नहीं मिल पाती
रोटी माँ के हाथों वाली।
तन का सुख है पर मन वाला वह सुखमय संसार नहीं है।
मिला शहर में आकर सब कुछ लेकिन माँ का प्यार नहीं है।

अक्सर सपने में दिख जाते
माँ के पाँव बिंवाई वाले।
धान कूटने में पड़ जाने
वाले वे हाथों के छाले।
फिर भी घर के काम-काज से माँ ने मानी हार नहीं है।
मिला शहर में आकर सब कुछ लेकिन माँ का प्यार नहीं है।

हम सब होली पर रँग खेलें
दीवाली पर दीप जलायें।
बच्चों के सँग हँसी-ख़ुशी से
घर के सब त्योहार मनायें।
पर सच पूछो तो माँ के बिन कोई भी त्योहार नहीं है।
मिला शहर में आकर सब कुछ लेकिन माँ का प्यार नहीं है।

बच्चों के सुख की ख़ातिर माँ
जाने क्या-क्या सह लेती है।
हम रहते परिवार साथ ले
पर माँ तनहा रह लेती है।
माँ के धीरज की धरती का कोई पारावार नहीं है।
मिला शहर में आकर सब कुछ लेकिन माँ का प्यार नहीं है।

अपने लिए नहीं जीती माँ
सबके लिए ज़िया करती है।
घर को जोड़े रखने में वो
पुल का काम किया करती है।
माँ के बिना कल्पना घर की करना सही विचार नहीं है।
मिला शहर में आकर सब कुछ लेकिन माँ का प्यार नहीं है।

जो गीत तुम्हारे लिए लिखे

जो गीत तुम्हारे लिए लिखे वे कितना साथ निभाते हैं।
जो कभी रिझाते थे तुमको वे घर का ख़र्च चलाते हैं।

बच्चों के खाने-कपड़े से
लेकर उनकी सब इच्छायें।
पूरी करते हैं गीत यही
यह राज़ तुम्हें हम बतलाये।
जो गीत तुम्हें दुलराते थे बच्चों की फीस चुकाते हैं।
जो गीत तुम्हारे लिए लिखे वे कितना साथ निभाते हैं।

यों तो पत्नी के तन पर कुछ
सोने-चाँदी के गहने हैं।
लेकिन सच पूछो तो उसने
कुछ गीत हमारे पहने हैं।
जो गीत तुम्हें सुख देते थे वे उसको सुख पहुँचाते हैं।
जो गीत तुम्हारे लिए लिखे वे कितना साथ निभाते हैं।
घर में कोई बीमार पड़े
ये गीत दवा लाकर देते।
कितना भी गहन अँधेरा हो
ये गीत उजाला कर देते।
जिनको तुम छुपकर गाते थे उनको हम खुलकर गाते है।
जो गीत तुम्हारे लिए लिखे वे कितना साथ निभाते हैं।

ये गीत हमारी बिटिया के
हाथों को पीला कर देंगे।
जो इतना सब कुछ देते हैं
हर सपना पूरा कर देंगे।
जो गीत तुम्हारी आशा थे कितना विश्वास जगाते हैं।
जो गीत तुम्हारे लिए लिखे वे कितना साथ निभाते हैं।

तुम ही तुम हो लाखों में

चारों तरफ़ तुम्हीं तुम दिखते तुम ही तुम हो आँखों में।
भीड़ भले है लाखों की पर तुम ही तुम हो लाखों में।

साँसों में अब बसे तुम्हीं तुम
तुम ही तुम हो आसों में।
ख़ुद पर फिर विश्वास जगा है
तुम जागे विश्वासों में।
फिर उड़ने का मन करता है तुम हो मन की पाँखों में।
भीड़ भले है लाखों की पर तुम ही तुम हो लाखों में।

फूल खिले हैं गुलशन-गुलशन
भौंरे उनसे आन मिले।
लगता है जैसे दोनों को
जीने के सामान मिले।
तुम फूलों में ख़ुशबू जैसे तुम्हीं खिले हो शाखों मे।
भीड़ भले है लाखों की पर तुम ही तुम हो लाखों में।

जबसे तुमको देखा मैंने
दिल की हर धड़कन धड़की।
आग प्यार की शान्त पड़ी थी
जोर-शोर से फिर भड़की।
अब तक शायद दबी हुई थी इक चिंगारी राखों में।
भीड़ भले है लाखों की पर तुम ही तुम हो लाखों में।

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