कल्पना सिंह-चिटनिस की रचनाएँ

मेरा शहर 

एक सुलगते शहर की
लम्बी संकरी गलियां
अपनी वही पुरानी बास समोये

जिसमे परिवर्तन की चेतना
इस कम्प्यूटर और जेट युग में भी
थोड़ा रेंग कर थक जाती हैं
वह शहर मेरा है।

विशाल समुद्र में दूर कहीं
एक नन्हा, अभिशप्त द्वीप जैसा
जिसे सागर लहरों की आवाज़ तो सुनाये

पर हर लहर
बिना उस पर से गुजरे
बगल से निकल जाए।

एक समर्पित जीवन साथी सा
अपनी अभिशप्त सहचरी
फल्गु की नियति
शायद इसने भी बांट ली है,

इसके चारो तरफ परां बांधे
नंगी, निश्छाय पहड़ियाँ
रक्षा की ओट में
इसका दम घोंटती हैं

पर जाने क्यों
एक मौन-लीन साधक सा
यह सब कुछ सहता है

किन्तु फिर भी
नियति के घेरे में कैद
इस गूंगे शहर की हर दिशा से
दिल झकझोर देने वाली
एक आवाज़ उठती है,

यह कौन कराहता है?
चित्कारता यह स्वर किसका है ?
नहीं, मौन का भरम है हमें

यह तो यातना के तलघर में क़ैद
इन्साफ मांगता
शहर मेरा है।

शर्त

आशंका, अनिश्चितता,
असमर्थता, अपूर्णता,
ज़िन्दगी का लिबास पहने
हर जगह।

असमर्थ जिसे रोकने में
देश, काल, सीमा, शक्ति सब।
क्यों अधीन होते जा रहे हम इनके?
क्यों घिर रहे इनके अँधेरे साये में?

नहीं…
आओ उठें अब,
कहीं से रोशनी ढूंढ लायें,
सम्हालें अपने बिखरे अस्तित्व को,
धोयें रिसते ज़ख्मों को,
बांधें हादसे की उमड़ती
पागल नदियों को।

हमारी प्रतिक्रिया पर
आघात तो करेंगी ये,
चोट लगेगी,
ज़ख्म भी मिलेगा।

पर याद रहे,
जिस्म से टपका
हर कतरा
लहू का नहीं,
रोशनी का हो।

ज़िंदा रहने की शर्त
शहादत है।

(अफ़्रीकी कवि बेंजामिन मोलॉइसे के लिए)

ज़िन्दगी 

हवाएं अपनी सांस रोके
दिशाएं विक्षिप्त सी
अलसाता हुआ उठता
कारखाने की चिमनी से धुआं।

हर शै पर एक असहनीय बोझ,
जिसके तले दबा आज का इंसान
हर रोज उठता है,
ज़िन्दगी का बोझ ढोते चलता है,

और पूछता है अपने आप से
क्या यही है ज़िन्दगी?

मरघट में एक और जश्न

जाने कितनी मन्नतें मानकर
उसने एक सुबह मांगी थी,
और सूरज की चुटकी भर सिंदूरी किरण से
अपनी मांग सजाई थी।

पर समाज के अवैध खाते में
एक स्त्रियोचित कर्ज था वह,
जिसे अदा करते-करते
वह पूरी की पूरी चुक गयी
और उसकी सुबह
रात के हवाले कर दी गई।

फिर इंसानियत के मरघट में
दहेज़ ने एक और चिता सजाई,
हवस ने एक और जश्न मनाया।

सागर

संघर्ष का सागर,
हुंकारती लहरें,
एक के बाद एक जब
मन मस्तिष्क को हताहत करने लगती हैं,

उसके हर क़तरे में हम
जहर घोल देते हैं,
पर सागर मरता नहीं,
विषाक्त हो जाता है,

और पहले से भी
दुगने जोश के साथ
सिर पटकता है –
हमारी आत्मा के द्वार पर।

वे बीमार थे 

मेरी प्रवृति है
औषधियां सहेज कर रखना,
और रोगों का
निदान ढूंढना।

मेरे शुभचिंतक कहते हैं
मैं समय गंवाती हूं,
अमूल्य क्षणों को
व्यर्थ लुटाती हूँ।

हर रोज आकर
वे उलाहने देते हैं मुझे।
पर इधर कई पखवारे बीत गये,
वे नहीं आये तो सोंचा कि

मैं ही चलूं आज
उनकी कुशल पूछने,
तो मालूम हुआ –
वे बीमार थे।

उमराव के लिए

उसकी सूरत
बिल्कुल मेरे जैसी थी,
और आंखों में ख्वाब
मेरी तमन्नाओं के हमशक़्ल।

मैंने उसकी तरफ
दोस्ती का हाथ बढ़ाया
पर वह कांप कर पीछे हट गई,
मानो कोई वर्जित सपना देख लिया हो।

फिर हंस कर बोली –
नादान,
मैं इंसान नहीं,
एक प्रतीक हूं!

बस चुपके से आकर देखो,
झांको
और खुदा की नज़र बचा कर
दरवाजा बंद कर लो।

मैं कुछ समझी नहीं,
पर जाने क्यों
उसके इर्द-गिर्द खड़े
कुछ ज़र्द पुतले, ठठा कर हंस पड़े।

और उसका वज़ूद
आहिस्ता-आहिस्ता ऊपर उठता
एक प्रश्नचिन्ह में परिवर्तित होकर
आकाश के एक कोने में टंग गया।

उमराव नाम था उसका।

चाँद का पैवन्द

आकाश कितना समृद्ध,
फिर भी उसके दामन पर
चाँद का पैवन्द।

जमीं पर उस किनारे से
चांदनी है उतर रही,
और शहर के सारे मकान,
खंडहरों सी चुप्पी समोए वीरान,

फिर भी पुरानी मस्जिद से अज़ां
अभी देखना उठेगी।
तब ये वीराने क्या चुप रहेंगे?

नहीं,
निकल पड़ेंगे खोज में
बेबस और बेचैन होकर,
अज़ां के हक़दार के।

एक अनोखी मस्जिद

एक मस्जिद ऐसी
जहाँ हर रोज
नए नए लोग आकर
सिजदे करते हैं,
और वक़्त बेवक़्त
नमाज़ों की अदायगी होती है।

कोई आगे कोई पीछे उठता है
और आमीन कहकर चल देता है।

वस्तुस्थिति

महासागर के बर्फीले आवर्त में उतराते
इन ग्लेशियरों की परवशता
और दिशाहीनता
उनकी नियति
या षड़यंत्र सूरज का?

पूर्वाभास

मस्तिष्क सुन्न,
आत्मा बेचैन,
शायद फिर कोई कविता
आ रही है।

तलाश 

मैं ढूंढती हूँ रोशनी को
पग-पग पर अँधेरे में
और अँधेरे ढूंढते हैं मुझको
रोशनी के डेरे में।

आकाश

हर रोज गर्व से निकलते हैं तारे
और कहते हैं – आकाश हमारा है।

मंजिल

सफर ही रहे
मंजिल न मुझको भाती है,
सफर की तपिश
मंजिल की राहतों से बेहतर है।

खबर

आज बाजार में
कई नक़ाब खरीदे गए,
एक जायदात नीलाम होगी कल।

अजीबोगरीब किताब 

ज़िन्दगी
भूमिका विहीन,
किश्तों में छपने वाली
एक अजीबोग़रीब किताब,
जिसे नाम सदा
पढ़ने वाले ही देते हैं।

कल्पना

कल्पना,
सागर किनारे
रेत के घरौंदे की तरह
लहरों के ठोकर खाती है
और बिखर जाती है,
और मैं –
एक जिद्दी बच्चे की तरह।

तफ़्तीश जारी है

मरने से पहले
वह चीखी थी,
लड़ी थी
जाहिर था,
पर उसकी चीख गयी कहाँ
तफ़्तीश जारी है…

दस खरोंचे उसके बदन पर
और तेज दांतों के निशान
बड़ा अजीब पशु था

डंडे हिलाते
उसके मुंह पर से भिनकती मक्खियाँ हटाते
तफ़्तीश में लगे हैं वे,
डायरी में कुछ लिखा जा रहा है,

पता करो गांवों में,
पहाड़ियों में,
जंगलों में,
चीख आखिर गयी कहाँ?
चीख मिले तो शिनाख्त हो पशु की!

पर पहाड़ियां चुप,
गाँव वाले चुप,
दिहाड़े पर आये मज़दूर चुप,
कुल्हाड़ियाँ, झाड़ियाँ सब चुप,
चीख नहीं मिली …

जंगल को जैसे काठ मार गया हो,
रात भर सिर्फ वही तो भागता फिरा था
उस चीख के पीछे,
कभी इस छोर तो कभी उस छोर

फिर ठहर गया था वहां
जहाँ से बंगले का दरवाज़ा बंद होने के बाद चौकीदार,
खांसता हुआ चला गया था
अपने आउट हाउस की तरफ,

और चीख?
उस रात की टूर डायरी क्लोज होती हैं,
फिर कहीं कोई आवाज़ नहीं,
जंगल में हांका अब भी लगा है।

आभास

उसने शीशे मैं झाँका
पूरी दुनिया तिर रही थी उसके आँखों में,
उसने जुबान फेरी
उसके होठों पर था अब दुनिया का स्वाद,
उसने खुद को टटोला तो महसूस किया कि
पूरी दुनिया आ बसी थी उसके अंदर,
पर वह हैरान कि
वह दुनिया से बाहर कैसे?
तभी एक गौरैया आकर
उसकी पेशानी पर ठोकरें मारती है
और वह दरकता चला जाता है
एक बीजावरण की तरह,
एक तीखी हरी गंध फैल जाती है उसके चारो तरफ,
और उसे महसूस होता है कि
वह अभी-अभी पैदा हुआ है,
एक पूर्वाभास के साथ

पहाड़ी के उस पार

आज वर्षों बाद
उसे भूख नहीं थी,
इसलिए नहीं कि
उसके अंदर का कोई
टुकड़ा मर गया था

बल्कि इसलिए कि
उसकी भूख
आज उतर गयी थी
एक पहाड़ी के पार,
किसी हरे भरे मैदान में

और छक कर पी ली थी ओस
पत्तियों पर ठहरी हुई – पुरनम,
ओस, जैसे उसकी आँखों में ठहरे
निष्पाप स्वप्न,

न जिनमें राख उदासी की,
न अविश्वासों का धुआं,
न सपनों का रक्त,

आकाश की ओर बाहें उठाये
जंगल की फुंगियों पर अधखिले स्वप्न,
बंद कलियों में कल की सुबह
और जंगल की जड़ों की मजबूती
जैसे उसके खुद की ही तो थी।

धरा का अंक,
जैसे मरियम की गोद,
और उसे महसूस हो रहा था प्रतिक्षण
अपने संपूर्ण तन में प्रवाहित जीवन…

आज सक्षम है वह बता सकने में कि
पहाड़ी के उस पार जंगल
मर क्यों जाते हैं,

कि ओस चाटते ही लोग
नीले क्यों पड़ने लगते हैं
उस पार,

पहाड़ी के उस पार।

पहाड़ी के इस पार

फिर वही नीले फूल,
नीले फूलों की घाटियों में रहने वाले
नीले लोग,
बहता जहर नदियों के साथ
पीते लोग
और एक सन्नाटा!

ढोलक की थाप और गीतों की गूँज पर
जिंदगी की लय को भूलते लोग
चिहुंक पड़ते हैं जब-तब,
जैसे उतरती चली गई हों उनमें गहरे तक
किसी आदमभक्षी पेड़ की सर्पीली शाखें
जड़ों की तरह,

फिर मौन,
एक गहन मौन,
चाँद कसैला हो गया है इस घाटी में,
जाने कबसे रोशनी नहीं पी,
अग्निपिंडों से अधर लिए पड़े हैं लोग,
और टंगी आँखें आसमान की तरफ

ध्रुव-तारा यहीं था कहीं।

शब्द 

लोग एक दूसरे से बोलते हैं ,
फिर भी नहीं बोलते,

कि कोई बाज उतरेगा
और लपक जायेगा उनके शब्द,
लहूलुहान कर डालेगा,

कि उनके शब्द फिर
शब्द नहीं रह जायेंगे।

लोग डरते हैं
शब्दों के दिन दहाड़े उठ जाने से,
रात के अंधेरे में गायब हो जाने से,

लोग चुप हैं
कि वे डरते हैं शब्दों की मौत से।

इस चुप्पी से,
मर नहीं रहे अब शब्द,
मर रहे हैं अर्थ अब शब्दों के।

चिड़िया

चिड़िया अपने पंखों पर
उतार लाती है धूप
हर सुबह।

चोंच भर दाने के लोभ में
नहीं आती चिड़िया

चिड़िया आती हैं,
घर की छत पर ठहरे
पानी में नहाती है,

और छोड़ जाती है
ढेर सारा सुख।

चिड़िया जो करती है रोज
कितना मुश्किल है
हमारे लिए

सच

मां तुम मत ढूंढो
अपनी संतानों के चेहरे पर
सुबह के सूरज का सत्व अभी,

पिता तुम मत ढूंढो
उनकी आँखों में
कोई अन्यथा स्वप्न।

तुम दो उन्हें अपना वात्सल्य,
पर इस तरह नहीं कि वे
तुम्हें कभी माफ़ नहीं कर पाएं

तुम मत कहो उनसे
कि सात रंगों की धनुष पर टंगा आसमान
आज भी वहीं है,

मत कहो कि तुम्हारे मन के कोने में
अभ भी बाकी है
कहीं कोई जमीन हरी,

तुम कहो उनसे बस वही,
जो सच है,
और अगले ही क्षण

तुम्हारे शिशु ,
तुम्हारी धरती की अंगार पपड़ियों पर
दौड़ते दिखाई पड़ेंगे।

तुम कहो उनसे वह
जो नहीं कह पाए आज तक
स्वयं से भी

तुम मत करो बंद
अपनी आँखें इसलिए कि
तुम्हे आँखें,

भूख से दम तोड़ते
उस सोमालियाई बच्चे के पिता की
रेतीली आंखों से मिलती हैं,

कि तुम्हारे भीतर का सच
किसी युद्ध के बाद लहूलुहान,
वीरान पड़े शहर की सूनी, मातमी गलियों की तरह,

कि तुम्हारे भीतर
कहीं कोई शुभ नहीं,
समृद्धि नहीं,

तुम सौंपो उन्हें, बस अपना सत्य,
चाहे संताप, आंधियां और हिचकियाँ ही सही,
पर दो वही जो सच है।

कुछ दे सको तो दो
यह आंदोलित समुद्र
और विशाल मरू सा अपना विश्वास,

कुछ दे सको तो दो यह आशीष
कि तुम्हारी संताने तनी रहें
पतवारों की तरह,

कि समुन्दर की लहरों में भी घुलें
सात रंगो वाले धनुष के
सात रंग।

संताप के दिन

धूं-धूं कर जल जायें
पेड़ों की पत्तियां तमाम,

किसी वृष्टि के उन्माद में
नगर, ग्राम,

देखते-देखते पिघल जायें
महाद्वीप हमारी हथेलियों पर,

समा जाएँ समुद्र में
सभी वेद, शास्त्र,

अनिश्चय की अकेली शिला पर
थरथराता रहे वर्त्तमान,

छोड़ जाये काल-सर्प
केंचुल की तरह सदियाँ, अनिष्ट,

सूरज के क्रोड़ में
आखरी किरण शेष जब तक,

शेष जब तक किसी भूखंड पर
एक भी दूब,

एक भी स्पंदन, धरती के गर्भ में –
अंगड़ाई लेते किसी एक भी अंकुर में,

मेरे और तुम्हारे संताप के दिन
तब तक नहीं।

स्ट्रीट की लड़कियां

वे चौराहें थीं,
जहाँ तक
सभी दिशाओं से
आने के मार्ग तो निर्धारित थे,
पर वे स्वयं कोई मार्ग या
गंतव्य नहीं थीं।

कोई राह चलता मुस्कुराता
उनका पता बताता,
तो वे जैसे
लड़कियों से सहसा पौध,
और फिर पौध से सहसा
वृक्षों में बदल जातीं,

तीव्रगंधा, पुष्पोंवाली,
जो सारा दिन देखती हैं
अपने दरीचों और मुंडेरों पर बीतता सूरज,
और जगमगाती हुई रोशनी से निकलकर
अपनी सीढ़ियों पर चढ़ती रात,
हर रात।

रात बीतती है
पर चुकती नहीं,
सूरज डूबता है
पर मरता नहीं,
बस हर सांझ
दुबक जाता है

वही कहीं,
उनके आसपास,
या किसी लड़की के ज़ाफ़रानी दुपट्टे के पीछे
उसके धड़कते सीने में,
फिर रात भर
तिलमिलाता है।

रात थकती है,
सूरज तिलमिलाता है
और लड़कियां…?
किसी थके हुए एक लम्हे में देखती हैं
अपने थकते पॉँव,
और तब,

उनकी आँखों में
उतर आता है
उनका शहर,
अथवा गांव,
और अपने घर की
एक धुंधली सी याद।

आँगन में बैठ कर मां ने कभी
उनकी खनकती हुई हंसी सी
एक पायल पहनाई थी उनके पावों में,
याद आता है उन्हें,
उस पायल के नन्हें नूपुर
अब कितने विकसित हो गए हैं,
क्या पता होगा माँ को?

उसकी करुण आँखे तो
अब भी ताकती होंगी द्वार,
नन्हें-नन्हें नूपुर बंधे
नन्हें पावों की प्रतीक्षा में…
पर उससे आगे भला
कब, कहाँ सोच पाईं लड़कियां?

जब भी सोचना चाहा –
हर बार, एक बहस उनके इर्द-गिर्द
तेज होती गई।
हर बार, एक अधूरी रह जानी वाली बहस!
अपने औचित्य और अनौचित्य के हिंडोले पर
एक बार फिर जाकर झूलने लगती हैं लड़कियां,

तेज, और तेज, खूब तेज,
कहकहों के आतिश में
झुलसती चली जाती हैं लड़कियां,
हर रात खुद पर से
एक नया पतझड़
गुजार देने के लिए!

ईश्वर जाने, कि हर सुबह
पतझड़ के मारे उनके पत्तों की जगह
फिर कोई नया पत्ता कैसे उग आता है,
कि उनका हर जख़्म,
बगैर किसी मरहम ही
कैसे भर जाता है?

अभिशाप होती हैं ये लड़कियां
या वरदान होती हैं ये लड़कियां?
होती हैं पुतलियां,
या सामान होती हैं ये लड़कियां?
चीखती हैं फिर क्यों हमारी तरह ये,
कोई भी तो नहीं कहता,
इंसान होती हैं ये लड़कियां?

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