क़तील शिफ़ाई की रचनाएँ

सारी बस्ती में ये जादू 

सारी बस्ती में ये जादू नज़र आए मुझको
जो दरीचा भी खुले तू नज़र आए मुझको॥

सदियों का रस जगा मेरी रातों में आ गया
मैं एक हसीन शक्स की बातों में आ गया॥

जब तस्सवुर मेरा चुपके से तुझे छू आए
देर तक अपने बदन से तेरी खुशबू आए॥

गुस्ताख हवाओं की शिकायत न किया कर
उड़ जाए दुपट्टा तो खनक कर॥

रुम पूछो और में न बताउ ऐसे तो हालात नहीं
एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं॥

रात के सन्नाटे में हमने क्या-क्या धोके खाए है
अपना ही जब दिल धड़का तो हम समझे वो आए है॥

बशर के रूप में एक दिलरूबा तलिस्म बनें 

बशर के रूप में एक दिलरूबा तलिस्म बनें
शफफ धूप मिलाए तो उसका ज़िस्म बने॥

वो मगदाद की हद तक पहुँच गया ‘कतील’
रूप कोई भी लिखूँ उसी का ज़िस्म लगे॥

वो शक्स कि मैं जिसे मुहब्बत नहीं करता
हँसता है मुझे देख कर नफरत नहीं करता॥

पकड़ा ही गया हूँ तो मुझे तार से खेंचो
सच्चा हूँ मगर अपनी इबादत नहीं करता॥

क्यु बक्श दिया मुझ से गुनेहगार को मौला
किसी से भी रियात नहीं करता॥

घर वालो को मफलत पर सभी कोस रहे है
चोरो को मगर कोई बरामद नहीं करता॥

भूला नहीं मैं आज भी आदाब-ए-जवानी
मैं आज भी लोगों को नसीहत नहीं करता॥

इंसान ये समझे की यहाँ गफ्म-खुदा है
मैं ऐसे ही मज़रो की जियादत नहीं करता॥

दुनिया में कभी उस सा मुदवित नहीं कोई
जो ज़ुल्म तो सहता है बगावत नहीं करता॥

हाथ दिया उसने मेरे हाथ में 

हाथ दिया उसने मेरे हाथ में।
मैं तो वली बन गया एक रात मे॥

इश्क़ करोगे तो कमाओगे नाम
तोहमतें बटती नहीं खैरात में॥

इश्क़ बुरी शै सही, पर दोस्तो।
दख्ल न दो तुम, मेरी हर बात में॥

हाथ में कागज़ की लिए छतरियाँ
घर से ना निकला करो बरसात में॥

रत बढ़ाया उसने न ‘क़तील’ इसलिए
फर्क था दोनों के खयालात में॥

जब भी चाहें एक नई सूरत बना लेते हैं लोग 

जब भी चाहें एक नई सूरत बना लेते हैं लोग
एक चेहरे पर कई चेहरे सजा लेते हैं लोग

मिल भी लेते हैं गले से अपने मतलब के लिए
आ पड़े मुश्किल तो नज़रें भी चुरा लेते हैं लोग

है बजा उनकी शिकायत लेकिन इसका क्या इलाज
बिजलियाँ खुद अपने गुलशन पर गिरा लेते हैं लोग

हो खुशी भी उनको हासिल ये ज़रूरी तो नहीं
गम छुपाने के लिए भी मुस्कुरा लेते हैं लोग

ये भी देखा है कि जब आ जाये गैरत का मुकाम
अपनी सूली अपने काँधे पर उठा लेते हैं लोग

अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझ को 

अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको
मैं हूँ तेरा नसीब अपना बना ले मुझको

मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के मानी
ये तेरी सादादिली मार न डाले मुझको

मैं समंदर भी हूँ, मोती भी हूँ, ग़ोताज़न भी
कोई भी नाम मेरा लेके बुला ले मुझको

तूने देखा नहीं आईने से आगे कुछ भी
ख़ुदपरस्ती में कहीं तू न गँवा ले मुझको

कल की बात और है मैं अब सा रहूँ या न रहूँ
जितना जी चाहे तेरा आज सता ले मुझको

ख़ुद को मैं बाँट न डालूँ कहीं दामन-दामन
कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको

मैं जो काँटा हूँ तो चल मुझसे बचाकर दामन
मैं हूँ गर फूल तो जूड़े में सजा ले मुझको

मैं खुले दर के किसी घर का हूँ सामाँ प्यारे
तू दबे पाँव कभी आ के चुरा ले मुझको

तर्क-ए-उल्फ़त की क़सम भी कोई होती है क़सम
तू कभी याद तो कर भूलने वाले मुझको

वादा फिर वादा है मैं ज़हर भी पी जाऊँ “क़तील”
शर्त ये है कोई बाँहों में सम्भाले मुझको

बेचैन बहारों में क्या-क्या है 

बेचैन बहारों में क्या-क्या है जान की ख़ुश्बू आती है
जो फूल महकता है उससे तूफ़ान की ख़ुश्बू आती है

कल रात दिखा के ख़्वाब-ए-तरब जो सेज को सूना छोड़ गया
हर सिलवट से फिर आज उसी मेहमान की ख़ुश्बू आती है

तल्कीन-ए-इबादत की है मुझे यूँ तेरी मुक़द्दस आँखों ने
मंदिर के दरीचों से जैसे लोबान की ख़ुश्बू आती है

कुछ और भी साँसें लेने पर मजबूर-सा मैं हो जाता हूँ
जब इतने बड़े जंगल में किसी इंसान की ख़ुश्बू आती है

कुछ तू ही मुझे अब समझा दे ऐ कुफ़्र दुहाई है तेरी
क्यूँ शेख़ के दामन से मुझको इमान की ख़ुश्बू आती है

डरता हूँ कहीं इस आलम में जीने से न मुनकिर हो जाऊँ
अहबाब की बातों से मुझको एहसान की ख़ुश्बू आती है

दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह 

दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह
फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह

मैनें तुझसे चाँद सितारे कब माँगे
रौशन दिल बेदार नज़र दे या अल्लाह

सूरज सी इक चीज़ तो हम सब देख चुके
सचमुच की अब कोई सहर दे या अल्लाह

या धरती के ज़ख़्मों पर मरहम रख दे
या मेरा दिल पत्थर कर दे या अल्लाह

गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं

गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं
हम चराग़ों की तरह शाम से जल जाते हैं

बच निकलते हैं अगर आतिह-ए-सय्याद से हम
शोला-ए-आतिश-ए-गुलफ़ाम से जल जाते हैं

ख़ुदनुमाई तो नहीं शेवा-ए-अरबाब-ए-वफ़ा
जिन को जलना हो वो आराअम से जल जाते हैं

शमा जिस आग में जलती है नुमाइश के लिये
हम उसी आग में गुमनाम से जल जाते हैं

जब भी आता है मेरा नाम तेरे नाम के साथ
जाने क्यूँ लोग मेरे नाम से जल जाते हैं

रब्ता बाहम पे हमें क्या न कहेंगे दुश्मन
आशना जब तेरे पैग़ाम से जल जाते हैं

हिज्र की पहली शाम के साये

हिज्र की पहली शाम के साये दूर उफ़क़ तक छाये थे
हम जब उसके शहर से निकले सब रास्ते सँवलाये थे

जाने वो क्या सोच रहा था अपने दिल में सारी रात
प्यार की बातें करते करते उस के नैन भर आये थे

मेरे अन्दर चली थी आँधी ठीक उसी दिन पतझड़ की
जिस दिन अपने जूड़े में उसने कुछ फूल सजाये थे

उसने कितने प्यार से अपना कुफ़्र दिया नज़राने में
हम अपने ईमान का सौदा जिससे करने आये थे

कैसे जाती मेरे बदन से बीते लम्हों की ख़ुश्बू
ख़्वाबों की उस बस्ती में कुछ फूल मेरे हम-साये थे

कैसा प्यारा मंज़र था जब देख के अपने साथी को
पेड़ पे बैठी इक चिड़िया ने अपने पर फैलाये थे

रुख़्सत के दिन भीगी आँखों उसका वो कहना हाए “क़तील”
तुम को लौट ही जाना था तो इस नगरी क्यूँ आये थे

जो भी ग़ुंचा तेरे होंठों पर खिला करता है

जो भी गुंचा तेरे होठों पर खिला करता है
वो मेरी तंगी-ए-दामाँ का गिला करता है

देर से आज मेरा सर है तेरे ज़ानों पर
ये वो रुत्बा है जो शाहों को मिला करता है

मैं तो बैठा हूँ दबाये हुये तूफ़ानों को
तू मेरे दिल के धड़कने का गिला करता है

रात यों चाँद को देखा है नदी में रक्साँ
जैसे झूमर तेरे माथे पे हिला करता है

कौन काफ़िर तुझे इल्ज़ाम-ए-तग़ाफ़ुल देगा
जो भी करता है मुहब्बत का गिला करता है

मैनें पूछा पहला पत्थर मुझ पर कौन उठायेगा 

मैनें पूचा पहला पत्थर मुझ पर कौन उठायेगा
आई इक आवाज़ कि तू जिसका मोहसिन कहलायेगा

पूछ सके तो पूछे कोई रूठ के जाने वालों से
रोशनियों को मेरे घर का रस्ता कौन बतायेगा

लोगो मेरे साथ चलो तुम जो कुछ है वो आगे है
पीछे मुड़ कर देखने वाला पत्थर का हो जायेगा

दिन में हँसकर मिलने वाले चेहरे साफ़ बताते हैं
एक भयानक सपना मुझको सारी रात डरायेगा

मेरे बाद वफ़ा का धोखा और किसी से मत करना
गाली देगी दुनिया तुझको सर मेरा झुक जायेगा

सूख गई जब इन आँखों में प्यार की नीली झील “क़तील”
तेरे दर्द का ज़र्द समन्दर काहे शोर मचायेगा

पहले तो अपने दिल की रज़ा जान जाइये 

पहले तो अपने दिल की रज़ा जान जाइये
फिर जो निगाह-ए-यार कहे मान जाइये

पहले मिज़ाज-ए-राहगुज़र जान जाइये
फिर गर्द-ए-राह जो भी कहे मान जाइये

कुछ कह रही है आपके सीने की धड़कने
मेरी सुनें तो दिल का कहा मान जाइये

इक धूप सी जमी है निगाहों के आस पास
ये आप हैं तो आप पे क़ुर्बान जाइये

शायद हुज़ूर से कोई निस्बत हमें भी हो
आँखों में झाँक कर हमें पहचान जाइये

प्यास वो दिल की बुझाने कभी आया ही नहीं 

प्यास वो दिल की बुझाने कभी आया भी नहीं
कैसा बादल है जिसका कोई साया भी नहीं

बेरुख़ी इससे बड़ी और भला क्या होगी
एक मुद्दत से हमें उस ने सताया भी नहीं

रोज़ आता है दर-ए-दिल पे वो दस्तक देने
आज तक हमने जिसे पास बुलाया भी नहीं

सुन लिया कैसे ख़ुदा जाने ज़माने भर ने
वो फ़साना जो कभी हमने सुनाया भी नहीं

तुम तो शायर हो “क़तील” और वो इक आम सा शख़्स
उसने चाहा भी तुझे और जताया भी नहीं

रक़्स करने का मिला हुक्म जो दरियाओं में 

रक़्स करने का मिला हुक्म जो दरियाओं में
हमने ख़ुश होके भँवर बाँध लिये पावों में

उन को भी है किसी भीगे हुए मंज़र की तलाश
बूँद तक बो न सके जो कभी सहराओं में

ऐ मेरे हम-सफ़रों तुम भी थाके-हारे हो
धूप की तुम तो मिलावट न करो चाओं में

जो भी आता है बताता है नया कोई इलाज
बट न जाये तेरा बीमार मसीहाओं में

हौसला किसमें है युसुफ़ की ख़रीदारी का
अब तो महंगाई के चर्चे है ज़ुलैख़ाओं में

जिस बरहमन ने कहा है के ये साल अच्छा है
उस को दफ़्नाओ मेरे हाथ की रेखाओं में

वो ख़ुदा है किसी टूटे हुए दिल में होगा
मस्जिदों में उसे ढूँढो न कलीसाओं में

हम को आपस में मुहब्बत नहीं करने देते
इक यही ऐब है इस शहर के दानाओं में

मुझसे करते हैं “क़तील” इस लिये कुछ लोग हसद
क्यों मेरे शेर हैं मक़बूल हसीनाओं में

शाम के साँवले चेहरे को निखारा जाये 

शाम के साँवले चेहरे को निखारा जाये
क्यों न सागर से कोई चाँद उभारा जाये

रास आया नहीं तस्कीं का साहिल कोई
फिर मुझे प्यास के दरिया में उतारा जाये

मेहरबाँ तेरी नज़र, तेरी अदायें क़ातिल
तुझको किस नाम से ऐ दोस्त पुकारा जाये

मुझको डर है तेरे वादे पे भरोसा करके
मुफ़्त में ये दिल-ए-ख़ुशफ़हम न मारा जाये

जिसके दम से तेरे दिन-रात दरख़्शाँ थे “क़तील”
कैसे अब उस के बिना वक़्त गुज़ारा जाये

तूने ये फूल जो ज़ुल्फ़ों में लगा रखा है

तूने ये फूल जो ज़ुल्फ़ों में लगा रखा है
इक दिया है जो अँधेरों में जला रखा है

जीत ले जाये कोई मुझको नसीबों वाला
ज़िन्दगी ने मुझे दाँव पे लगा रखा है

जाने कब आये कोई दिल में झाँकने वाला
इस लिये मैंने ग़िरेबाँ को खुला रखा है

इम्तेहाँ और मेरी ज़ब्त का तुम क्या लोगे
मैं ने धड़कन को भी सीने में छुपा रखा है

दिल था एक शोला मगर बीत गये दिन वो क़तील,
अब क़ुरेदो ना इसे राख़ में क्या रखा है

उल्फ़त की नई मंज़िल को चला तू

उल्फ़त की नई मंज़िल को चला, तू बाँहें डाल के बाँहों में
दिल तोड़ने वाले देख के चल, हम भी तो पड़े हैं राहों में

क्या क्या न जफ़ायेँ दिल पे सहीं, पर तुम से कोई शिकवा न किया
इस जुर्म को भी शामिल कर लो, मेरे मासूम गुनाहों में

जहाँ चाँदनी रातों में तुम ने ख़ुद हमसे किया इक़रार-ए-वफ़ा
फिर आज हैं हम क्यों बेगाने, तेरी बेरहम निगाहों में

हम भी हैं वहीं, तुम भी हो वही, ये अपनी-अपनी क़िस्मत है
तुम खेल रहे हो ख़ुशियों से, हम डूब गये हैं आहों में

वो दिल ही क्या तेरे मिलने की जो दुआ न करे

वो दिल ही क्या तेरे मिलने की जो दुआ न करे
मैं तुझको भूल के ज़िंदा रहूँ ख़ुदा न करे

रहेगा साथ तेरा प्यार ज़िन्दगी बनकर
ये और बात मेरी ज़िन्दगी वफ़ा न करे

ये ठीक है नहीं मरता कोई जुदाई में
ख़ुदा किसी से किसी को मगर जुदा न करे

सुना है उसको मोहब्बत दुआयें देती है
जो दिल पे चोट तो खाये मगर गिला न करे

ज़माना देख चुका है परख चुका है उसे
“क़तील” जान से जाये पर इल्तजा न करे

ये मोजज़ा भी मुहब्बत कभी दिखाये मुझे 

ये मोजज़ा भी मुहब्बत कभी दिखाये मुझे
कि संग तुझपे गिरे और ज़ख़्म आये मुझे

वो महरबाँ है तोप इक़रार क्यूँ नहीं करता
वो बदगुमाँ है तो सौ बार आज़माये मुझे

मैं अपने पाँव तले रौंदता हूँ साये को
बदन मेरा ही सही दोपहर न भाये मुझे

मैं घर से तेरी तमन्ना पहन के जब निकलूँ
बरहना शहर में कोई नज़र न आये मुझे

वो मेरा दोस्त है सारे जहाँ को है मालूम
दग़ा करे वो किसी से तो शर्म आये मुझे

मैं अपनी ज़ात में नीलाम हो रहा हूँ “क़तील”
ग़म-ए-हयात से कह दो ख़रीद लाये मुझे

यूँ चुप रहना ठीक नहीं कोई मीठी बात करो

यूँ चुप रहना ठीक नहीं कोई मीठी बात करो
मोर चकोर पपीहा कोयल सब को मात करो

सावन तो मन बगिया से बिन बरसे बीत गया
रस में डूबे नग़्मे की अब तुम बरसात करो

हिज्र की इक लम्बी मंज़िल को जानेवाला हूँ
अपनी यादों के कुछ साये मेरे साथ करो

मैं किरनों की कलियाँ चुनकर सेज बना लूँगा
तुम मुखड़े का चाँद जलाओ रौशन रात करो

प्यार बुरी शय नहीं है लेकिन फिर भी यार “क़तील”
गली-गली तक़सीम न तुम अपने जज़बात करो

काम आ गई दीवानगी अपनी

तुम्हारी अंजुमन से उठ के दीवाने कहाँ जाते
जो वाबस्ता हुए, तुमसे, वो अफ़साने कहाँ जाते

निकलकर दैरो-काबा से अगर मिलता न मैख़ाना
तो ठुकराए हुए इंसाँ खुदा जाने कहाँ जाते

तुम्हारी बेरुख़ी ने लाज रख ली बादाखाने की
तुम आँखों से पिला देते तो पैमाने कहाँ जाते

चलो अच्छा हुआ काम आ गई दीवानगी अपनी
वगरना हम जमाने-भर को समझाने कहाँ जाते

क़तील अपना मुकद्दर ग़म से बेगाना अगर होता
तो फिर अपने पराए हम से पहचाने कहाँ जाते

निगाहों में ख़ुमार आता हुआ महसूस होता है 

निगाहों में ख़ुमार आता हुआ महसूस होता है
तसव्वुर[1] जाम छलकाता हुआ महसूस होता है

ख़िरामे- नाज़[2] -और उनका ख़िरामे-नाज़ क्या कहना
ज़माना ठोकरें खाता हुआ महसूस होता है

ये एहसासे-जवानी को छुपाने की हसीं कोशिश
कोई अपने से शर्माता हुआ महसूस होता है

तसव्वुर[3] एक ज़ेहनी जुस्तजू[4] का नाम है शायद
दिल उनको ढूँढ कर लाता हुआ महसूस होता है

किसी की नुक़रई[5] पाज़ेब की झंकार के सदक़े
मुझे सारा जहाँ गाता हुआ महसूस होता है

‘क़तील’अब दिल की धड़कन बन गई है चाप[6] क़दमों की
कोई मेरी तरफ़ आता हुआ महसूस होता है

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें तसव्वुर
  2. ऊपर जायें इठलाती हुई चाल
  3. ऊपर जायें कल्पना
  4. ऊपर जायें अ‍न्तर्मन की इच्छा
  5. ऊपर जायें चाँदी की
  6. ऊपर जायें आहट

धूप है रंग है या सदा है 

धूप है ,रंग है या सदा है
रात की बन्द मुट्ठी में क्या है

छुप गया जबसे वो फूल-चेहरा
शहर का शहर मुरझा गया है

किसने दी ये दरे-दिल पे दस्तक
ख़ुद-ब-ख़ुद घर मेरा बज रहा है

पूछता है वो अपने बदन से
चाँद खिड़की से क्यों झाँकता है

क्यों बुरा मैं कहूँ दूसरों को
वो तो मुझको भी अच्छा लगा है

क़हत[1] बस्ती में है नग़मगी[2] का
मोर जंगल में झनकारता है

वो जो गुमसुम-सा इक शख़्स है ना
आस के कर्ब[3] में मुब्तिला[4] है

आशिक़ी पर लगी जब से क़दग़न[5]
दर्द का इर्तिक़ा[6] रुक गया है

दिन चढ़े धूप में सोने वाला
हो न हो रात-भर जागता है

इस क़दर ख़ुश हूँ मैं उससे मिलकर
आज रोने को जी चाहता है

मेरे चारों तरफ़ मसअलों[7]का
एक जंगल-सा फैला हुआ है

दब के बेरंग जुमलों[8] के नीचे
हर्फ़[9] का बाँकपन मर गया है

बेसबब उससे मैं लड़ रहा हूँ
ये मुहब्बत नहीं है तो क्या है

गुनगुनाया ‘क़तील’ उसको मैंने
उसमें अब भी ग़ज़ल का मज़ा है

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें अकाल
  2. ऊपर जायें संगीत
  3. ऊपर जायें दु:ख
  4. ऊपर जायें ग्रस्त
  5. ऊपर जायें प्रतिबंध
  6. ऊपर जायें प्रगति
  7. ऊपर जायेंसमस्याओं
  8. ऊपर जायें वाक्यों
  9. ऊपर जायें शब्द

पत्थर उसे न जान पिघलता भी देख उसे

पत्थर उसे न जान पिघलता भी देख उसे
ख़ुद अपने तर्ज़ुबात में जलता देख उसे

वो सिर्फ़ जिस्म ही नहीं एहसास भी तो है
रातों में चाँद बन के निकलता भी देख उसे

वो धडकनों के शोर से भी मुतमइन न था
अब चंद आहटों से भी बहलता देख उसे

आ ही पड़ा है वक़्त तो फैला ले हाथ भी
और साथ-साथ आँख बदलता भी देख उसे

सूरज है वो तो उसकी परस्तिश ज़रूर कर
साया है वो तो शाम को ढलता भी देख उसे

निकला तो है क़तील वफ़ा की तलाश में
ज़ख्मों के पुल-सिरात पे चलता भी देख उसे

उफ़ुक़ के उस पार ज़िन्दगी के उदास लम्हे उतार आऊँ

उफ़ुक़[1] के उस पार ज़िन्दगी के उदास लम्हे उतार आऊँ
अगर मेरा साथ दे सको तुम तो मौत को भी उतार आऊँ

कुछ इस तरह जी रहा हूँ जैसे उठाए फिरता हूँ लाश अपनी
जो तुम ज़रा-सा भी दो सहारा तो बारे-हस्ती[2] उतार आऊँ

बदल गये ज़िन्दगी के महवर[3],तवाफ़े-दैरो-हरम[4] कहाँ का
तुम्हारी महफ़िल अगर हो बाक़ी तो मैं भी परवानावार आऊँ

कोई तो ऐसा मुकाम होगा जहाँ मुझे भी सुकूँ मिलेगा
ज़मीं के तेवर बदल रहे हैं तो आस्माँ को सँवार आऊँ

अगरचे[5] इसरार-ए-बेख़ुदी[6] है तुझे भी ज़रपोश महफ़िलों में
मुझे भी ज़िद है कि तेरे दिल में नुक़ूश-ए-माज़ी[7] उभार आऊँ

सुना है एक अजनबी-सी मंज़िल को उठ रहे हैं क़दम तुम्हारे
बुरा न मानो तो रहनुमाई को सरे-रहगुज़ार आऊँ

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें क्षितिज
  2. ऊपर जायें जीवन का बोझ
  3. ऊपर जायें धुरियाँ
  4. ऊपर जायें बुतख़ाने और क़ाबे की परिक्रमा
  5. ऊपर जायें यद्यपि
  6. ऊपर जायें बेसुध होने का हठ
  7. ऊपर जायें अतीत के चिह्न

हर बे-ज़बाँ को शोला नवा कह लिया करो

हर बेज़ुबाँ को शोला-नवा[1] कह लिया करो
यारो, सुकूत[2] ही को सदा[3] कह लिया करो

ख़ुद को फ़रेब दो कि न हो तल्ख़ ज़िन्दगी
हर संगदिल को जाने-वफ़ा कह लिया करो

गर चाहते हो ख़ुश रहें कुछ बंदगाने-ख़ास[4]
जितने सनम हैं उनको ख़ुदा कह लिया करो

यारो ये दौर ज़ौफ़-ए-बसारत[5] का दौर है
आँधी उठे तो उसको घटा कह लिया करो

इंसान का अगर क़द-ओ-क़ामत[6] न बढ़ सके
तुम उसको नुक़्स-ए-आब-ओ-हवा[7]कह लिया करो

अपने लिए अब एक ही राह-ए-नजात[8] है
हर ज़ुल्म को रज़ा-ए-ख़ुदा[9] कह लिया करो

दिखलाए जा सकें जो न काँटे ज़ुबान के
तुम दास्तान-ए-कर्ब-ओ-बला[10] कह लिया करो

ले-दे के अब यही है निशान-ए-ज़िया[11] क़तील
जब दिल जले तो उसको दिया कह लिया करो

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें जिसकी आवाज़ में आग हो
  2. ऊपर जायें मौन
  3. ऊपर जायें आवाज़
  4. ऊपर जायें विशेष उपासक
  5. ऊपर जायें दृष्टि की कमज़ोरी
  6. ऊपर जायें डील-डौल
  7. ऊपर जायें जलवायु का दोष
  8. ऊपर जायें मुक्ति का रास्ता
  9. ऊपर जायें ईश्वरेच्छा
  10. ऊपर जायें दुखों की कहानी
  11. ऊपर जायें प्रकाश का चिह्न

किया इश्क था जो 

किया इश्क था जो बा-इसे रुसवाई बन गया
यारो तमाम शहर तमाशाई बन गया

बिन माँगे मिल गए मेरी आँखों को रतजगे
मैं जब से एक चाँद का शैदाई बन गया

देखा जो उसका दस्त-ए-हिनाई करीब से
अहसास गूँजती हुई शहनाई बन गया

बरहम हुआ था मेरी किसी बात पर कोई
वो हादसा ही वजह-ए-शानासाई बन गया

करता रहा जो रोज़ मुझे उस से बदगुमाँ
वो शख्स भी अब उसका तमन्नाई बन गया

वो तेरी भी तो पहली मुहब्बत न थी क़तील
फिर क्या हुआ अगर कोई हरजाई बन गया

प्यार की राह में ऐसे भी मकाम आते हैं

प्यार की राह में ऐसे भी मक़ाम आते हैं |
सिर्फ आंसू जहाँ इन्सान के काम आते हैं ||

उनकी आँखों से रखे क्या कोई उम्मीद-ए-करम |
प्यास मिट जाये तो गर्दिश में वो जाम आते हैं ||

ज़िन्दगी बन के वो चलते हैं मेरी सांस के साथ |
उनको ऐसे भी कई तर्ज़-ए-खराम आते हैं ||

हम न चाहें तो कभी शाम के साए न ढलें |
हम तड़पे हैं तो सुबहों के सलाम आते हैं ||

कुव्वत-ए-दस्त-ए-तलब का नहीं जिन को इदराक |
तेरे दर से वही बे-नील मराम आते हैं ||

मुंह छुपा लेते हैं ग़म हज़रात-ए-नासेह की तरह |
जब भी मैखाने में रिंदान-ए-कराम आते हैं ||

हम पे हो जाएँ न कुछ और भी रातें भारी |
याद अक्सर वो हमें अब सर-ए-शाम आते हैं ||

छिन गए हम से जो हालात की राहों में क़तील |
उन हसीनों के हमें अब भी पयाम आते हैं ||

हालात से ख़ौफ़ खा रहा हूँ

हालात से ख़ौफ़ खा रहा हूँ
शीशे के महल बना रहा हूँ

सीने में मेरे है मोम का दिल
सूरज से बदन छुपा रहा हूँ

महरूम-ए-नज़र है जो ज़माना
आईना उसे दिखा रहा हूँ

अहबाब को दे रहा हूँ धोका
चेहरे पे ख़ुशी सजा रहा हूँ

दरिया-ए-फ़ुरात है ये दुनिया
प्यासा ही पलट कर जा रहा हूँ

है शहर में क़हत पत्थरों का
जज़्बात के ज़ख़्म खा रहा हूँ

मुमकिन है जवाब दे उदासी
दर अपना ही खटखटा रहा हूँ

आया न ‘क़तील’ दोस्त कोई
सायों को गले लगा रहा हूँ

क्या जाने किस ख़ुमार में

क्या जाने किस ख़ुमार में किस जोश में गिरा
वो फल शजर से जो मेरी आग़ोश में गिरा

कुछ दाएरा से बन गए साथ-ए-ख़याल पर
जब कोई फूल साग़र-ए-मय-नोश में गिरा

बाक़ी रही न फिर वो सुनहरी लकीर भी
तारा जो टूट कर शब-ए-ख़ामोश में गिरा

उड़ता रहा तो चाँद से यारा न था मेरा
घायल हुआ तो वादी-ए-गुल-पोश में गिरा

बे-आबरू न थी कोई लग़्ज़िश मेरी ‘क़तील’
मैं जब गिरा जहाँ भी गिरा होश में गिरा

फूल पे धूल बबूल पे शबनम देखने वाले देखता जा

फूल पे धूल बबूल पे शबनम देखने वाले देखता जा
अब है यही इंसाफ़ का आलम देखने वाले देखता जा

परवानों की राख उड़ा दी बाद-ए-सहर के झोंकों ने
शम्मा बनी है पैकर-ए-मातम देखने वाले देखता जा

जाम-ब-जाम लगी हैं मोहरें मय-ख़ानों पर पहरे हैं
रोती है बरसात छमा-छम देखने वाले देखता जा

इस नगरी के राज-दुलारे एक तरह कब रहते हैं
ढलते साए बदलते मौसम देखने वाले देखता जा

मसलहतों की धूल जमी है उखड़े उखड़े क़दमों पर
झिजक झिजक कर उड़ते परचम देखने वाले देखता जा

एक पुराना मदफ़न जिस में दफ़्न हैं लाखों उम्मीदें
छलनी छलनी सीना-ए-आदम देखने वाले देखता जा

एक तेरा ही दिल नहीं घायल दर्द के मारे और भी हैं
कुछ अपना कुछ दुनिया का ग़म देखने वाले देखता जा

कम-नज़रों की इस दुनिया में देर भी है अँधेर भी है
पथराया हर दीदा-ए-पुर-नम देखने वाले देखता जा

सिसकियाँ लेती हुई ग़मगीं हवाओ चुप रहो

सिसकियाँ लेती हुई ग़मगीं हवाओ चुप रहो
सो रहे हैं दर्द उन को मत जगाओ चुप रहो

रात का पत्थर न पिघलेगा शुआओं के बग़ैर
सुब्ह होने तक न बोलो हम-नवाओ चुप रहो

बंद हैं सब मय-कदे साक़ी बने हैं मोहतसिब
ऐ गरजती गूँजती काली घटाओ चुप रहो

तुम को है मालूम आख़िर कौन सा मौसम है ये
फ़स्ल-ए-गुल आने तलक ऐ ख़ुश-नवाओ चुप रहो

सोच की दीवार से लग कर हैं ग़म बैठे हुए
दिल में भी नग़मा न कोई गुनगुनाओ चुप रहो

छट गए हालात के बादल तो देखा जाएगा
वक़्त से पहले अँधेरे में न जाओ चुप रहो

देख लेना घर से निकलेगा न हम-साया कोई
ऐ मेरे यारो मेरे दर्द-आशनाओ चुप रहो

क्यूँ शरीक-ए-ग़म बनाते हो किसी को ऐ ‘क़तील’
अपनी सूली अपने काँधे पर उठाओ चुप रहो

विसाल की सरहदों तक आ कर जमाल तेरा पलट गया है

विसाल की सरहदों तक आ कर जमाल तेरा पलट गया है
वो रंग तू ने मेरी निगाहों पे जो बिखेरा पलट गया है

कहाँ की ज़ुल्फ़ें कहाँ के बादल सिवाए तीरा-नसीबों के
मेरी नज़र ने जिसे पुकारा वही अँधेरा पलट गया है

न छाँव करने को है वो आँचल न चैन लेने को हैं वो बाँहें
मुसाफ़िरों के क़रीब आ कर हर इक बसेरा पलट गया है

मेरे तसव्वुर के रास्तों में उभर के डूबी हज़ार आहट
न जाने शाम-ए-अलम से मिल कर कहाँ सवेरा पलट गया है

मिला मोहब्बत का रोग जिस को ‘क़तील’ कहते हैं लोग जिस को
वही तो दीवाना कर के तेरी गली का फेरा पलट गया है

खुला है झूठ का बाज़ार आओ सच बोलें

खुला है झूठ का बाज़ार आओ सच बोलें
न हो बला से ख़रीदार आओ सच बोलें

सुकूत[1] छाया है इंसानियत की क़द्रों पर
यही है मौक़ा-ए-इज़हार आओ सच बोलें

हमें गवाह बनाया है वक़्त ने अपना
ब-नाम-ए-अज़मत[2]-ए-किरदार आओ सच बोलें

सुना है वक़्त का हाकिम[3] बड़ा ही मुंसिफ़[4] है
पुकार कर सर-ए-दरबार आओ सच बोलें

तमाम शहर में क्या एक भी नहीं मंसूर
कहेंगे क्या रसन-ओ-दार[5] आओ सच बोलें

बजा[6] के ख़ू-ए-वफ़ा[7] एक भी हसीं में नहीं
कहाँ के हम भी वफ़ा-दार आओ सच बोलें

जो वस्फ़[8] हम में नहीं क्यूँ करें किसी में तलाश
अगर ज़मीर है बेदार आओ सच बोलें

छुपाए से कहीं छुपते हैं दाग़ चेहरे के
नज़र है आईना बरदार[9] आओ सच बोलें

‘क़तील’ जिन पे सदा पत्थरों को प्यार आया
किधर गए वो गुनह-गार आओ सच बोलें

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें ख़ामोशी
  2. ऊपर जायें आन, उपाधि
  3. ऊपर जायें शासक
  4. ऊपर जायें निर्णायक
  5. ऊपर जायें रस्सी और फंदा
  6. ऊपर जायें न्याय संगत, उचित
  7. ऊपर जायें स्थिरता की आदत
  8. ऊपर जायें गुण, विशेषता
  9. ऊपर जायें धारक

तड़पती हैं तमन्नाएँ किसी आराम से पहले

तड़पती हैं तमन्नाएँ किसी आराम से पहले
लुटा होगा न यूँ कोई दिल-ए-ना-काम से पहले

ये आलम देख कर तू ने भी आँखें फेर लीं वरना
कोई गर्दिश नहीं थी गर्दिश-ए-अय्याम से पहले

गिरा है टूट कर शायद मेरी तक़दीर का तारा
कोई आवाज़ आई थी शिकस्त-ए-जाम से पहले

कोई कैसे करे दिल में छुपे तूफ़ाँ का अंदाज़ा
सुकूत-ए-मर्ग छाया है किसी कोहराम से पहले

न जाने क्यूँ हमें इस दम तुम्हारी याद आती है
जब आँखों में चमकते हैं सितारे शाम से पहले

सुनेगा जब ज़माना मेरी बर्बादी के अफ़साने
तुम्हारा नाम भी आएगा मेरे नाम से पहले

शायद मेरे बदन की रुसवाई चाहता है 

शायद मेरे बदन की रुसवाई चाहता है
दरवाज़ा मेरे घर का बीनाई चाहता है

औक़ात-ए-ज़ब्त उस को ऐ चश्म-ए-तर बता दे
ये दिल समंदरों की गहराई चाहता है

शहरों में वो घुटन है इस दौर में के इंसाँ
गुमनाम जंगलों की पुरवाई चाहता है

कुछ ज़लज़ले समो कर ज़ंजीर की ख़नक में
इक रक़्स-ए-वालेहाना सौदाई चाहता है

कुछ इस लिए भी अपने चर्चे हैं शहर भर में
इक पारसा हमारी रुसवाई चाहता है

हर शख़्स की जबीं पर करते हैं रक़्स तारे
हर शख़्स ज़िंदगी की रानाई चाहता है

अब छोड़ साथ मेरा ऐ याद-ए-नौ-जवानी
इस उम्र का मुसाफ़िर तंहाई चाहता है

मैं जब ‘क़तील’ अपना सब कुछ लुटा चुका हूँ
अब मेरा प्यार मुझ से दानाई चाहता है

गम के सहराओ में 

गम के सहराओ में घंघोर घटा सा भी था
वो दिलावर जो कई रोज़ का प्यासा भी था॥

ज़िन्दगी उसने ख़रीदी न उसूलो के एवज़
क्योकि वो शक्स मुहम्मद का निवासा भी था॥

अपने ज़ख्मो का हमें बक्श रहा था वो सवाब
उसकी हर आह का अन्दाज़ दुआ-सा भी था॥

सिर्फ तीरो ही कि आती हुई बौछार न थी
उसको हासील गम-ए-ज़ारा का दिलासा भी था॥

जब गया वो बन के सवाली वो हुसूर-ए-यज़दा
सरे अकदस के लिए हाथ में प्यासा भी था॥

उसने बोए दिल-ए-हर-ज़र्रा में अज़मत के गुलाब
रेगज़ार उसके लहू से चमन आसा भी था॥

मैं तही रस्त न था हश्र के मैदान में ‘क़तील’
चन्द अश्को का मेरे पास इफासा भी था॥

आओ कोई तफरीह का सामान किया जाए

आओ कोई तफरीह का सामान किया जाए
फिर से किसी वाईज़ को परेशान किया जाए॥

बे-लर्जिश-ए-पा मस्त हो उन आँखो से पी कर
यूँ मोह-त-सीबे शहर को हैरान किया जाए॥

हर शह से मुक्क्दस है खयालात का रिश्ता
क्यूँ मस्लिहतो पर इसे कुर्बान किया जाए॥

मुफलिस के बदन को भी है चादर की ज़रूरत
अब खुल के मज़रो पर ये ऐलान किया जाए॥

वो शक्स जो दीवानो की इज़्ज़त नहीं करता
उस शक्स का चाख-गरेबान किया जाए॥

पहले भी ‘कतील’ आँखो ने खाए कई धोखे
अब और न बीनाई का नुकसान किया जाए॥

मुझे आई ना जग से लाज

मुझे आई ना जग से लाज
मैं इतना ज़ोर से नाची आज,
के घुंघरू टूट गए

कुछ मुझ पे नया जोबन भी था
कुछ प्यार का पागलपन भी था
कभी पलक पलक मेरी तीर बनी
एक जुल्फ मेरी ज़ंजीर बनी
लिया दिल साजन का जीत
वो छेड़े पायलिया ने गीत,
के घुंघरू टूट गए

मैं बसी थी जिसके सपनों में
वो गिनेगा अब मुझे अपनों में
कहती है मेरी हर अंगड़ाई
मैं पिया की नींद चुरा लायी
मैं बन के गई थी चोर
मगर मेरी पायल थी कमज़ोर,
के घुंघरू टूट गए

धरती पे ना मेरे पैर लगे
बिन पिया मुझे सब गैर लगे
मुझे अंग मिले अरमानों के
मुझे पंख मिले परवानों के
जब मिला पिया का गाँव
तो ऐसा लचका मेरा पांव
के घुंघरू टूट गए

अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई की

अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई की
तुम क्या समझो तुम क्या जानो बात मेरी तन्हाई की

कौन सियाही घोल रहा था वक़्त के बहते दरिया में
मैंने आँख झुकी देखी है आज किसी हरजाई की

वस्ल की रात न जाने क्यूँ इसरार था उनको जाने पर
वक़्त से पहले डूब गए तारों ने बड़ी दानाई की

उड़ते-उड़ते आस का पंछी दूर उफ़क़ में डूब गया
रोते-रोते बैठ गई आवाज़ किसी सौदाई की

अपने होंठों पर सजाना चाहता हूँ 

अपने होंठों पर सजाना चाहता हूँ
आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ

कोई आँसू तेरे दामन पर गिराकर
बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ

थक गया मैं करते-करते याद तुझको
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ

छा रहा है सारी बस्ती में अँधेरा
रोशनी हो, घर जलाना चाहता हूँ

आख़री हिचकी तेरे ज़ानों पे आये
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ

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