कांतिमोहन ‘सोज़’ की रचनाएँ

बोल मजूरे हल्ला बोल

बोल मजूरे हल्ला बोल
काँप रही सरमाएदारी खुलके रहेगी इसकी पोल
बोल मजूरे हल्ला बोल !

ख़ून को अपने बना पसीना तूने बाग लगाया है
कुँए खोदे नहर निकाली ऊँचा महल उठाया है
चट्‌टानों में फूल खिलाए शहर बसाए जंगल में
अपने चौड़े कन्धों पर दुनिया को यहाँ तक लाया है,
बाँकी फौज कमेरों की है, तू है नही भेड़ों का गोल !
बोल मजूरे हल्ला बोल !

गोदामों में माल भरा है, नोट भरे हैं बोरों में
बेहोशों को होश नही है, नशा चढ़ा है जोरों में
इसका दामन उसने फाड़ा उसका गरेबाँ इसके हाथ
कफनखसोटों का झगड़ा है होड़ लगी है चोरों में
ऐसे में तू हाँक लगा दे ला मेरी मेहनत का मोल !
बोल मजूरे हल्ला बोल !

सिहर उठेगी लहर नदी की, दहक उठेगी फुलवारी
काँप उठेगी पत्ती-पत्ती, चटखेगी डारी डारी,
सरमाएदारों का पल में नशा हिरन हो जाएगा
आग लगेगी नंदन वन में सुलग उठेगी हर क्यारी
सुन-सुनकर तेरे नारों को धरती होगी डावाँडोल !
बोल मजूरे हल्ला बोल !

रचनाकाल : मार्च 1982

जागो रे मज़दूर किसान 

जागो रे मज़दूर किसान
रात गई अब हुआ विहान
रात गई रे साथी !

किरनों की आहट पाकर कलियों ने आँखें खोलीं
ताक़त नई हवा से पाकर गूंगी लहरें बोलीं
गुन-गुन-गुन सब ओर गूँजता परिवर्तन का गान
रात गई रे साथी !

चलो साथियों चलो कि अपनी मंज़िल बहुत कड़ी है
उधर विजय ताज़ा फूलों की माला लिए खड़ी है
चलो साथियो तुम्हें जगाना पूरा हिन्दुस्तान
रात गई रे साथी !

खोने को हथकड़ियाँ पाने को है दुनिया सारी
चलो साथियो बढ़ो कि होगी अन्तिम विजय हमारी
सर पर कफ़न हथेली पर रख लें अब अपनी जान
रात गई रे साथी !

आ साथी बढ़े चलें !

आँखों में सुबह नई
पैरों से रौंदते हुए गई बोसीदा शामों को
आ साथी बढ़े चलें !
आ साथी आ
आ बढ़े चलें आ बढ़े चलें !!

मंज़िल दूर सही दिल तो मजबूर नहीं
राहों में दम लेना अपना दस्तूर नहीं
आवाज़ उठा अपनी कह दे उन बहरों से
नफ़रत से भरी दुनिया हमको मंज़ूर नहींI
साँसों में आग लिए
पैरों से रौंदते हुए गई बोसीदा शामों को
आ साथी बढ़े चलें !
आ साथी आ
आ बढ़े चलें आ बढ़े चलें !!

ये दिल तो करोड़ों हैं पर साथ धड़कते हैं
बाज़ू भी करोड़ों हैं पर साथ फड़कते हैं
आवाज़ उठा अपनी कह दे उन अन्धों से
हम लाखों अनलमुखी एक साथ भड़कते हैं I
गीतों में आग लिए
पैरों से रौंदते हुए गई बोसीदा शामों को
आ साथी बढ़े चलें !
आ साथी आ
आ बढ़े चलें आ बढ़े चलें !!

रचनाकाल : 1973

चक्का जाम हुआ भई चक्का जाम हुआ !

चक्का जाम हुआ भई चक्का जाम हुआ !
दिल्ली के मज़दूरों ! ओ मेरे रणशूरों
शाबाशी का काम हुआ !
चक्का जाम हुआ भई चक्का जाम हुआ !

घर में पड़ा सड़े सरमाया
पूंजीपति मन में घबराया
पुलिस मिलिट्री लाठी गोली
सबने मिलकर ज़ोर लगाया
मजदूरों के बिना मिलों का क्या अंजाम हुआ
क्या अंजाम हुआ
चक्का जाम हुआ भई चक्का जाम हुआ !

हम ही महल बनानेवाले
हम ही महल गिरानेवाले
हम भूगोल बदलनेवाले
हम इतिहास बनानेवाले
जो हमसे टकराया उसका क्या अंजाम हुआ
क्या अंजाम हुआ
चक्का जाम हुआ भई चक्का जाम हुआ !

दिल्ली के मज़दूरों ! ओ मेरे रणशूरों
शाबाशी का काम हुआ !
चक्का जाम हुआ भई चक्का जाम हुआ !

नवम्बर 1973 में दिल्ली के इतिहास में पहली बार किसी मज़दूर संगठन यानी ’सीटू’ ने अपने दम पर हड़ताल कराई थी I

फ़सल कटाई का गीत 

अरमानों की खड़ी फ़सल काटेंगे भई काटेंगे !
चले दराँती चाहे हल हो चले दराँती चाहे हल
काटेंगे भई काटेंगे ! काटेंगे भई काटेंगे !

हमने धरती बोई है बीज पसीने का डाला
देखो जलते सूरज ने रंग किया किसका काला ?
फ़सल नहीं इज्ज़त है अपनी कैसे ले लेगा लाला
भई कैसे ले लेगा लाला ?
जो हमसे टकराएँगे धूल सरासर चाटेंगे !
काटेंगे भई काटेंगे अरमानों की खड़ी फसल !
काटेंगे भई काटेंगे चले दराँती चाहे हल !!

पण्डे पल्टन पटवारी सारे देखे-भाले हैं
बगुला-भगत कचहरी के दिल के कितने काले हैं
काले नियम अदालत काली सब मकड़ी के जाले हैं
भई सब मकड़ी के जाले हैं
सीधा अपना नारा है बोएँगे सो काटेंगे !
काटेंगे भई काटेंगे अरमानों की खड़ी फ़सल!
काटेंगे भई काटेंगे चले दराँती चाहे हल !!

रचनाकाल : 1974

रेल-हड़ताल का गीत

रेल का चक्का जाम करो
जाम करो भई जाम करो
ऊँचा झण्डा लाल तुम्हारा ऊँचा अपना नाम करो I
रेल का चक्का जाम करो ।।

अपने बच्चे भूखे हैं और रेल-मिनिस्टर सोया है
अपनी नस-नस दुखती है और वो सपनों में खोया है
उसको झकझोरो साथी ! उसकी भी नींद हराम करो I
रेल का चक्का जाम करो ।।

सर से कफ़न बाँधकर अपने चलो बीच मैदान चलें
इस बंजर धरती पर साथी ! अब सौ-सौ तूफ़ान चलें
जब तक मंज़िल दूर तुम्हारी तब तक मत आराम करो I
रेल का चक्का जाम करो ।।

रेल का चक्का मेल का चक्का तेल का चक्का जाम करो I
पुलिस का चक्का फ़ौज का चक्का जेल का चक्का जाम करो ।।
जाम करो भई जाम करो
रेल का चक्का जाम करो ।।

1974 की ऐतिहासिक रेल हड़ताल का आह्वान करते हुए

बिहार आन्दोलन का गीत 

कोई गुल खिलनेवाला है कुहुक रही कोयलिया
कोयल कुहुक रही रे कोयल कुहुक रही I

कारतूस से भरे-भरे दिल जेब-जेब है ख़ाली
खप्पर लेकर नाच रही है सड़क-सड़क पर काली
तूफ़ान मचलने वाला है कुहुक रही कोयलिया I
कोई गुल खिलनेवाला है कुहुक रही कोयलिया
कोयल कुहुक रही रे कोयल कुहुक रही ।।

काँप रहे हैं पीले पत्ते लाल हुई तरुणाई
शाख-शाख पर शोले लहकें दहक रही अमराई
तूफ़ान मचलनेवाला है कुहुक रही कोयलिया I
कोई गुल खिलनेवाला है कुहुक रही कोयलिया
कोयल कुहुक रही रे कोयल कुहुक रही ।।

सहम उठी ज़ालिम की लाठी सिहर गई है गोली
सर से कफ़न बाँधकर निकली मस्तानों की टोली
तूफ़ान मचलनेवाला है कुहुक रही कोयलिया I
कोई गुल खिलनेवाला है कुहुक रही कोयलिया
कोयल कुहुक रही रे कोयल कुहुक रही ।।

रचनाकाल : नवम्बर 1974

इमरजेंसी का गीत 

इस नागवार सन्नाटे में आ कोई धुन गाएँ
ख़ामोश लबों की लाचारी गीतों में बुन जाएँ
आ कोई धुन गाएँ ।।

इस बार रंग दीवारों का काला और गहरा है
सपनों के पैरों में बेड़ी साँसों पर पहरा है
संशय का भूत भगाने को
अपनी ज्वाला चेताने को
आ कोई धुन गाएँ ।।

कोयल ख़ामोश रहेगी क्या संगीनों के डर से
जंगल में मोर थिरक उठ्ठेंगे बाँध कफ़न सर से
चन्दन में लपट उठाने को
लपटों में कमल खिलाने को
आ कोई धुन गाएँ ।।

आँखों से आँखें चार करो बाँहों को कसने दो
छिलने दो अन्तर के छाले घावों को रिसने दो
यूँ बिगड़ी बात बनाने को
संकेतों में समझाने को आ कोई धुन जाएँ ।
ख़ामोश लबों की लाचारी गीतों में बुन जाएँ ।।

नौजवानों से

बढ़े मजूर उनके साथ चल रहे किसान !
उठो निशान थामकर वतन के नौजवान !!

उबल रही हैं ख़ून में जूनून की कहानियाँ
नई दिशा दिखा रही हैं वक़्त की निशानियाँ
हवा-सी घूम-घूमकर घटा-सी झूम-झूमकर
नई ज़मीन तोड़ने निकल पड़ीं जवानियाँ
सरों पे सबके है कफ़न हथेलियों पे जान !
उठो निशान थामकर वतन के नौजवान !!

नज़र-नज़र उठा रही है लाख-लाख आँधियाँ
नज़र-नज़र गिरा रही है लाख-बिजलियाँ
जो लाख आँधियाँ उठें जो लाख बिजलियाँ गिरें
कहाँ बचेंगे इस जहाँ में ज़ालिमों के आशियाँ
बराबरी की नींव पर उठे नया मकान !
उठो निशान थामकर वतन के नौजवान !!

बला का ज़लज़ला है थरथरा रही पहाड़ियाँ
ग़रूरे-इन्क़लाब से दमक रही हैं खाड़ियाँ
जो खेल जायँ जान पर चमन की आन-बान पर
वो जांसिपर हसीन गुल खिला रही हैं झाड़ियाँ
क़दम मिलाके चल पड़े मजूर और किसान !
उठो निशान थामकर वतन के नौजवान !!

अब आगे बढ़ते जाएंगे मज़दूर-किसान हमारे

अब आगे बढ़ते जाएँगे मज़दूर-किसान हमारे ।
मज़दूर किसान हमारे आशा-अरमान हमारे ।।

हाथों की हथकड़ी छूटी पैरों की बेड़ी टूटी
मंज़िल सर करते जाएँगे मज़दूर-किसान हमारे ।
मज़दूर किसान हमारे आशा-अरमान हमारे ।।

दे दिया ओखली में सर अब कैसा मूसल का डर
हर आफ़त से टकराएँगे मज़दूर-किसान हमारे ।
मज़दूर किसान हमारे आशा-अरमान हमारे ।।

करके सारी तैयारी चल दिया क़ाफ़िला भारी
अब लाल धुजा फहराएँगे मज़दूर किसान हमारे ।
मज़दूर किसान हमारे आशा-अरमान हमारे ।।

क्रान्ति का गीत 

तूफ़ान उठाती आ
बिजली चमकाती आ
पीले पत्तों को खाद बना नव सुमन खिलाती आ ।।

मुरझाए तेरे फूल सभी सूखी हर डाली है
मुट्ठी भर हत्यारों ने सबकी नींद चुरा ली है
मूँछों पर देता ताव यहाँ अन्याय अकड़ता है
हैरानी की है बात कि तेरा खप्पर ख़ाली है
आवाज़ लगाती आ
हाँ आग लगाती आ
दुष्टों के शीश उड़ा उनकी जयमाल बनाती आ ।
पीले पत्तों को खाद बना नव सुमन खिलाती आ ।।

फूलों को खिलने दो शूलों के डंक कुचल डालो
सहमे-सहमे नन्हें पौधों में नवजीवन डालो
धरती के निर्मल पानी पर एकाधिकारवाले
बरगद के तन पर चोट करो और शाख़ काट डालो
आ न्याय दिलाती आ सबको हुलसाती आ
इस तपती हुई धरित्री पर अमरित बरसाती आ ।
तूफ़ान उठाती आ
बिजली चमकाती आ
पीले पत्तों को खाद बना नव सुमन खिलाती आ ।।

रचनाकाल : मार्च 1978

आ क़दम मिलाकर चल, चल क़दम मिलाकर चल

आ क़दम मिलाकर चल, चल क़दम मिलाकर चल

तेरा खूं पी जिसने तुझको कंकाल बनाया है
मेरे अरमानों पर भी उस ज़ालिम का साया है
उसके पर अगर काटने हैं परवाज़ मिलाकर चल
सरगम से सरगम सुर से सुर आवाज़ मिलाकर चल ।।
आ क़दम मिलाकर चल ।।

वो देख धुँधलकों के पीछे दुश्मन थर्राया है
हम एक हुए उसके प्राणों पर संकट आया है
अन्दाज़ मिला अंजाम मिला आग़ाज़ मिलाकर चल
सरगम से सरगम सुर से सुर आवाज़ मिलाकर चल ।।
आ क़दम मिलाकर चल ।।

रचनाकाल : जून 1978

क़दम बढ़ेंगे गिर-गिरके उठेंगे उठ-उठके चलेंगे आ साथी !

क़दम बढ़ेंगे गिर-गिरके उठेंगे उठ-उठके चलेंगे आ साथी !
अब न सहेंगे अब चुप न रहेंगे सर तानके चलेंगे आ साथी !

लगन लगी है ऐसी अगन जगी है बढ़ने का ज़माना आया है
थिरक उठा है मन किरन-सरीखा चढ़ने का ज़माना आया है
कोट चढ़ेंगे परकोट चढ़ेंगे परबत पे चढ़ेंगे आ साथी !

हम मतवाले हम हिम्मतवाले हमें बढ़ने से रोकेगा कौन यहाँ
धूम-धुँआरे कारे घन कजरारे हमें खिलने से रोकेगा कौन यहाँ
उमड़-घुमड़ घनघोर गरजेंगे धारासार बरसेंगे आ साथी !

सहम उठेंगे खल सिहर उठेंगे उन्हें मिटने रोकेगा कौन यहाँ
बिजली हमारी बड़ी तेज़ है कटारी उसे छाती पे रोकेगा कौन यहाँ
पाँव उखड़ेंगे रिपु भाग चलेंगे हमीं जीतके रहेंगे आ साथी !!

क़िस्मत के नहीं हिकमत के धनी दौलत के नहीं हिम्मत के धनी 

क़िस्मत के नहीं हिकमत के धनी दौलत के नहीं हिम्मत के धनी
‘परिचय इतना इतिहास यही’ क़ुदरत के नहीं फ़ितरत के धनी ।

परबत हो कि वीरां हर शय की तस्वीर निखारी है हमने
माशूक़ है ये धरती इसकी हर ज़ुल्फ़ सँवारी है हमने
फूलों को खिलाया काँटों को दामन से निकाला है हमने
आदम के बदन की रग-रग में फ़ौलाद को ढाला है हमने ।
ख़ुद खाद बने गुलशन के लिए
तब जाके कहीं कुछ बात बनी ।।

रातों की सियाही पर अपने लोहू से इबारत की हमने
हर एक बला इस सीने पर लेने में महारत की हमने
मिट्टी में मिले पर मिट्टी को सोने में बदल डाला हमने
ज़हराब पीया जो सदियों तक अमरित में उगल डाला हमने ।
लोहू को बनाया है गारा
तब जाके कहीं कुछ बात बनी ।।

इस बार की बात निराली है इस बार ये ठानी है हमने
सदियों में बनाई जो तुमने दीवार वो ढानी है हमने
अब अपना ज़माना आया है कुछ खेल दिखाना है हमने
धरती को उठाकर हाथों में दुलहन सा सजाना है हमने ।
मन के सच्चे धुन के पक्के
अब करके रहेंगे हम अपनी ।।

रचनाकाल : जुलाई 1979

मंज़िलें दूर हैं पैर मजबूर हैं 

मंज़िलें दूर हैं पैर मजबूर हैं
साँस उखड़ी हुई दिल में नासूर हैं
फिर भी ज़िन्दा हैं हम उस जहाँ के लिए
उस घड़ी के लिए उस समाँ के लिए ।

कोई भूखा न हो कोई नंगा न हो
बे-दवा बे-कफ़न कोई मरता न हो
बाज़ कोई न हो फ़ाख़्ता के लिए
हम हैं गर्मे -सफ़र उस जहाँ के लिए ।

खून-सा लाल है उसका इक़बाल है
आज तलवार है कल वही ढाल है
सर कटा देंगे हम उस निशाँ के लिए
तायरे-अम्न के आशियाँ के लिए ।

बढ़ रहे क़ाफिले घट रहे फ़ासले
दिल को छोटा न कर हाथ में हाथ ले
ख़ार झेलें नए गुलसिताँ के लिए
अपने ख़्वाबों के हिंदोस्ताँ के लिए ।।

रचनाकाल : अक्तूबर 1979

मज़दूर एकता के बल पर हर ताक़त से टकराएँगे

 मज़दूर एकता के बल पर हर ताक़त से टकराएँगे ।
हर आँधी से हर बिजली से हर आफ़त से टकराएँगे ।।

जितना ही दमन किया तुमने उतना ही शेर हुए हैं हम
ज़ालिम पंजे से लड़लड़कर कुछ और दिलेर हुए हैं हम
चाहे काले क़ानूनों का अम्बार लगाए जाओ तुम
कब ज़ुल्मो-सितम की ताक़त से घबराकर ज़ेर हुए हैं हम ।
तुम जितना हमें दबाओगे हम उतना बढ़ते जाएँगे ।
हर आँधी से हर बिजली से हर आफ़त से टकराएँगे ।।

जब तक मानव द्वारा मानव का लोहू पीना जारी है
जब तक बदनाम कलण्डर में शोषण का महीना जारी है
जब तक हत्यारे राजमहल सुख के सपनों में डूबे हैं
जब तक जनता का अधनंगे-अधभूखे जीना जारी है ।
हम इनक़लाब के नारे से धरती-आकाश गुँजाएँगे ।
हर आँधी से हर बिजली से हर आफ़त से टकराएँगे ।।

तुम बीती हुई कहानी हो अब अगला ज़माना अपना है
तुम एक भयानक सपना थे ये भोर सुहाना अपना है
जो कुछ भी दिखाई देता है जो कुछ भी सुनाई देता है
उसमें से तुम्हारा कुछ भी नहीं वो सारा फ़साना अपना है ।
‘वो दरिया झूमके उट्ठे हैं तिनकों से न टाले जाएँगे ।
हर आँधी से हर बिजली से हर आफ़त से टकराएँगे ।
मज़दूर एकता के बल पर हर ताक़त से टकराएँगे ।।

रचनाकाल : नवम्बर 1981

जितने भी हुए हैं ज़ुल्मो-सितम

जितने भी हुए हैं ज़ुल्मो-सितम
जितने भी मिले हैं रंजो-अलम
उतना ही शेर हुए हैं हम
कुछ और दिलेर हुए हैं हम
ऐसी ही ज़ात हमारी है
कुछ ऐसी ही तैयारी है ।।

दो जून नहीं एक जून सही
भूखों रहकर भी जीते हैं
हम रोज़ खोदते हैं कूआँ
तब जाकर पानी पीते हैं
ऐसी ही ज़ात हमारी है
कुछ ऐसी ही तैयारी है ।।

ज़ख़्मों से अगरचे चूर हैं हम
मंज़िल से अगरचे दूर हैं हम
ये बात ज़माना याद रखे
मजबूर नहीं मज़दूर हैं हम
ऐसी ही ज़ात हमारी है
कुछ ऐसी ही तैयारी है ।।

जिस रोज़ बिगुल बज जाएगा
ये टाट पलट कर रख देंगे
हम रोज़ उलटते हैं धरती
धरती को उलटकर रख देंगे
ऐसी ही ज़ात हमारी है
कुछ ऐसी ही तैयारी है ।।

रचनाकाल : फ़रवरी 1980

जाग उठा मज़दूर रे साथी जाग उठा मज़दूर

जाग उठा मज़दूर रे साथी जाग उठा मज़दूर
झूटी बात यक़ीन न करना नहीं है मंज़िल दूर
रे साथी जाग उठा मज़दूर ।।

परबत जैसे पुट्ठे इसके हाथ पेड़ छतनार
मन में एक नई दुनिया के सपने लिए हज़ार
फ़ौलादी सीने में इसके ताक़त है भरपूर
रे साथी जाग उठा मज़दूर ।।

एक आँख में सुधा भरी है दूजे में अंगार
एक हाथ से सिरजन करता दूजे से संहार
हिंसक पशु भी थर-थर काँपे यह ऐसा रणशूर
रे साथी जाग उठा मज़दूर ।।

गोली खाकर शेर दहाड़े साँप भरे फुँकार
बाघ पलटकर हल्ला बोले गज उट्ठे चिंघार
इस मर्दाने से टकराकर गोली चकनाचूर
रे साथी जाग उठा मज़दूर ।।

रचनाकाल : मार्च 1982

छब्बीस जनवरी आती है छब्बीस जनवरी जाती है

छब्बीस जनवरी आती है छब्बीस जनवरी जाती है
लेकिन अपनी सूनी दुनिया तो सूनी ही रह जाती है ।

कुछ खील-बताशे होते हैं कुछ खेल-तमाशे होते हैं
जगमग दीवाली होती है रंगीन पटाखे होते हैं
महफ़िल जमती है यारों की हाथों में प्याले होते हैं
कुछ माल-मलीदे उड़ते हैं कुछ धूम-धड़ाके होते हैं ।
आनेवाले सुन्दर कल की झाँकी दिखलाई जाती है ।

लेकिन अपनी सूनी दुनिया तो सूनी ही रह जाती है ।
छब्बीस जनवरी आती है छब्बीस जनवरी जाती है ।।

भाषण सुनवाए जाते हैं वादे दुहराए जाते हैं
नंगी हथेलियों पर सरसों के खेत उगाए जाते हैं
झण्डे लहराए जाते हैं बाजे बजवाए जाते हैं
कालीन बिछाकर जलसों में कूल्हे मटकाए जाते हैं ।
सरकारी भाण्डों से अपनी तारीफ़ कराई जाती है ।

लेकिन अपनी सूनी दुनिया तो सूनी ही रह जाती है ।
छब्बीस जनवरी आती है छब्बीस जनवरी जाती है ।।

हम सारी बातें जान गए सच क्या है ये पहचान गए
आँखों में धूल झोंकने में माहिर हो तुमको मान गए
मेहनतकश सारे एक हुए अब उट्ठेंगे तूफ़ान नए
इन हँसिए और हथौड़ों से लिक्खेंगे अपने गान नए ।

लो स्वांग तुम्हारा खत्म हुआ अब अपनी बारी आती है ।
छब्बीस जनवरी आती है छब्बीस जनवरी जाती है ।।

रचनाकाल : नवम्बर 1980

लाल है परचम नीचे हँसिया ऊपर सधा हथौड़ा है 

लाल है परचम नीचे हँसिया ऊपर सधा हथौड़ा है ।
इस परचम की ख़ातिर साथी जान भी दें तो थोड़ा है ।।

आधी दुनिया है उजियारी आधी में अँधियारा है
आधी में जगमग दीवाली आधी में दीवाला है
जहाँ-जहाँ शोषण है बाक़ी वहाँ लड़ाई जारी है
पूरी दुनिया में झण्डा फहराने की तैयारी है
जिसने हमें ज़माने भर के मज़दूरों से जोड़ा है ।
इस परचम की ख़ातिर साथी जान भी दें तो थोड़ा है ।।

हमने अपने ख़ून से रंगकर ये परचम लहराया है
इसकी ही किरनों से छनकर लाल सवेरा आया है
लाखों हिटलर लाखों चर्चिल लाखों निक्सन हार गए
सौ-सौ जेट लड़ाकू सारे एटम बम बेकार गए
हिन्दचीन से हमलावर का नाम मिटाकर छोड़ा है ।
इस परचम की ख़ातिर साथी जान भी दें तो थोड़ा है ।।

दहकानों की मीत दराँती फ़सल काटकर घर लाए
मज़दूरों का यार हथौड़ा दुश्मन जिससे थर्राए
जब इस झण्डे के नीचे धरती के बेटे आते हैं
मज़दूरों के चौड़े सीने फ़ौलादी बन जाते हैं
क़दम मिलाकर साथ चलें दुश्मन ने मैदान छोड़ा है ।
इस परचम की ख़ातिर साथी जान भी दें तो थोड़ा है ।।

रचनाकाल : मार्च 1978

अपनी तो नहीं यारो उस बुत से शनासाई 

अपनी तो नहीं यारो उस बुत से शनासाई[1]
होती है ज़माने में क्यूँ सोज़ की रुसवाई।।

क्यूँ दर्ज करें दिल पर बेकार-सी तफ़सीलें[2]
किस-किसके गुनाहों की किस-किसने सज़ा पाई।

हम किसको कहेँ मुंसिफ़ और किससे सिला माँगें
सबको तो हमारी ही तक़सीर नज़र आई।

ऐ दिल कहीं चलकर अब उज़लतगजीं[3] हो जाएँ
सुनते हैं खराबे में जी रहते हैं सौदाई[4]

शायद खिले गुल कोई शायद कि फ़ज़ा बदले
वो सुब्ह का लश्कर भी लेता तो है अंगड़ाई।।

18-4-1989

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें परिचय
  2. ऊपर जायें ब्योरे
  3. ऊपर जायेंएकान्तप्रिय
  4. ऊपर जायें पागल

तीर खाने के लिए दार पे जाने के लिए

तीर खाने के लिए दार पे जाने के लिए।
हम हैं मौजूद तेरे नाज़ उठाने के लिए।।

इश्क़ से जंग-तलक जो भी किया ख़ूब किया
हमने कुछ भी न किया रस्म निभाने के लिए।

दिल का हर रेज़ा रहा लालो-गौहर[1] पर भारी
कुछ उठा लाए तेरी बज़्म सजाने के लिए।

मशगला होता घड़ी भर का तो हम रो लेते
उम्र दरकार थी एक अश्क बहाने के लिए।

उनकी नज़रों में तो एक ज़र्रा थे नाचीज़ थे हम
क्या हुआ जो हुए मक़बूल ज़माने के लिए।

एक-एक करके सब उशशाक़[2] ने दम तोड़ दिया
हम बचे रह गए अहवाल सुनाने के लिए।

सोज़ काँधे पे उठाए हुए तेशा[3] अब तक
नौकरी करता है कोहसार[4] गिराने के लिए।।

6-2-1986

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें लाल और मोती
  2. ऊपर जायें आशिक का बहुवचन
  3. ऊपर जायें कुदाल
  4. ऊपर जायें पहाड़

मैं जी रहा हूं मगर जी ज़रा नहीं लगता 

मैं जी रहा हूं मगर जी ज़रा नहीं लगता।
नए जहां में मुझे कुछ नया नहीं लगता।।

किसी दुआ में असर का यक़ीं नहीं होता
किसी का तीर मुझे बेख़ता[1] नहीं लगता।

मेरी पसन्द की परवा न कर मेरे हमदम
तेरे करम से मुझे कुछ बुरा नहीं लगता।

हर एक शख़्स को हँस-हँसके जाम देता हूं
अगरचे सबसे ख़फ़ा हूँ ख़फ़ा नहीं लगता।

चलो भी सोज़ ज़माने से तुमको क्या लेना
है अब तो यूँ कि ख़ुद आपा भला नहीं लगता।।

21-11-1990

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें अचूक

ये चाँद है सहमा हुआ ख़ामोश नहीं है 

ये चाँद है सहमा हुआ ख़ामोश नहीं है ।
ख़ामोश नज़र आता है ख़ामोश नहीं है ।।

इस सोई हुई राख के अम्बार के नीचे
लावा है चहकता हुआ ख़ामोश नहीं है ।

पेशानी[1] की वादी में पसीने का ये दरिया
अफ़्सूं[2] है छलकता हुआ ख़ामोश नहीं है ।

ग़ुंचों से ढलक जाती है चुपचाप जो शबनम
गिरिया[3] है दहकता हुआ ख़ामोश नहीं है ।

ख़ामोशी से लबरेज़ नज़र आती है महफ़िल
एक सुर है चटख़ता हुआ ख़ामोश नहीं है ।।

7-7-1983

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें माथा
  2. ऊपर जायें जादू
  3. ऊपर जायें आँसू

लामहाला आईने के सामने जाता हूँ मैं

लामहाला[1] आईने के सामने जाता हूँ मैं।
एक अजब से आदमी को घूरते पाता हूँ मैं।।

गो समझता हूं कि कुछ भूला न भूलूँगा कभी
जबकि सच ये है कि सब-कुछ भूलता जाता हूँ मैं।

क्यूँ मेरी ख़्वाहिश न हो हर सिम्त हो अम्नोअमान
हो किसी की भी ख़ता सबकी सज़ा पाता हूँ मैं।

इश्क़ उलझन है अजब उलझन है इसका क्या करूँ
जब इस उलझन से निकलता हूं तो फँस जाता हूँ मैं।

जाने किसका घर जला दें बिजलियों को क्या पता
होके बेघर सोचता हूं और घबराता हूँ मैं।

ये गली है तंग इसमें दो की गुंजाइश कहाँ
ख़ुद को गुम पूरी तरह करके उसे पाता हूँ मैं।

कजदाई[2] बेनियाज़ी[3] बदगुमानी[4] बरहमी[5]
गोया उसकी हर नवाज़िश भूलता जाता हूँ मैं।।

31-1-1997

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें लाचार होकर
  2. ऊपर जायें रूखापन
  3. ऊपर जायें उपेक्षा
  4. ऊपर जायें बुरी राय रखना
  5. ऊपर जायें नाराज़गी

आया बसन्त आया !

आया बसन्त आया !
बिरहा का अन्त आया !

अम्बुआ पे बोले कोयल
पाँवों में बाजे पायल
पंचम हुआ है पाग़ल
सुख दस दिगन्त छाया !
आया बसन्त आया !
बिरहा का अन्त आया ।।

फूली हुई है बगिया
उमड़ी हुई है नदिया
बौरा गई है रधिया
अँगना में कन्त आया !
आया बसन्त आया !
बिरहा का अन्त आया ।।

मन प्रेम में पगा है
अरमान फिर जगा है
एक बार फिर लगा है
यौवन अनन्त आया !
आया बसन्त आया !
बिरहा का अन्त आया ।।

एक बार कहीं मैं सुन पाता !

एक बार कहीं मैं सुन पाता !
सुन पाता तो मैं कुछ कह पाता ।।

अलफ़ाज़ जो होठों तक आए
पर जिनकी अदाई हो न सकी
फ़रियाद जो सीने में उभरी
जिसकी सुनवाई हो न सकी
सौ बार जिसे मैं सुन न सका
एक बार कहीं मैं सुन पाता
सुन पाता तो मैं कुछ कह पाता ।।

जो हाथ दबा था संग-तले
ख़ामोश था वो ख़ामोश न था
कुछ चीख़ रहा था सन्नाटा
सुनने का किसी को होश न था
सौ बार जिसे मैं सुन न सका
एक बार कहीं मैं सुन पाता
सुन पाता तो मैं कुछ कह पाता ।।

पिया सों कहियो जाय !

पिया सों कहियो जाय !
पपीहे मोरे पिया सों कहियो जाय !

वो मरजानी प्रेम दिवानी
जिसकी तूने कदर न जानी
दुनिया से होकर बेगानी
मरी कटारी खाय
पिया सों कहियो जाय !
पपीहे मोरे पिया सों कहियो जाय ।।

जेहिके कारन जोग जगाया
छोड़के सारी ममता-माया
ऊ बेदर्दा लौट न आया
मरी कटारी खाय
पिया सों कहियो जाय !
पपीहे मोरे पिया सों कहियो जाय ।।

पिया सों कहियो जाय !
पपीहे मोरे पिया सों कहियो जाय ।।

मन भरा नहीं !

मन भरा नहीं !
अमृत-सिन्धु घन आया गया झरा नहीं !
मन भरा नहीं !
भरा नहीं भरा नहीं ।।

मन का चातक उदास
श्वास-श्वास तृषित बाँस
स्वाति-बिन्दु लिए अंक घन ढरा नहीं !
अमृत-सिन्धु घन आया गया झरा नहीं !

मन भरा नहीं !
भरा नहीं भरा नहीं ।।

गरजो मत बरसो घन
तरसे क्यों सरसे मन
रोम-रोम तृषावन्त यह गिरा नहीं
अमृत-सिन्धु घन आया गया झरा नहीं !

मन भरा नहीं !
भरा नहीं भरा नहीं ।।

साँवरिया घर आजा !

साँझ भई लौटे बनपाखी साँवरिया घर आजा !
आ जा !
साँवरिया घर आजा ।।

दरसन की प्यासी अँखियन को
एक झलक दिखला जा
तन की अगन तपन कन-कन की
मन की थकन मिटा जा !
आ जा !
साँवरिया घर आजा ।।

बिरह सताय जिया घबराए
सूरतिया दिखला जा
मेघ डराय समझ नहिं आए
आँगन कुटी छवा जा
आ जा !
साँवरिया घर आजा ।।

धीर बँधा जा नैन जुड़ा जा
सोई आस जगा जा !
या घर आजा अंग लगा जा
या फिर मोहे मिटा जा !

आ जा !
साँवरिया घर आजा I

साँझ भई लौटे बनपाखी साँवरिया घर आजा !
आ जा !
साँवरिया घर आजा ।।

बुन्दियाँ पड़ने लगीं !

आली जग की उलट गई रीत बुन्दियाँ पड़ने लगीं !
प्यार हारा ज़माना गया जीत बुन्दियाँ पड़ने लगीं ।।

अभी आया नहीं मनुआ का मीत बुन्दियाँ पड़ने लगीं !
अभी ज़ाहिर हुई न मोरी प्रीत बुन्दियाँ पड़ने लगीं !
अभी खिला है कमल न सिरीस बुन्दियाँ पड़ने लगीं I
अभी जले नहीं संझा के दीप बुन्दियाँ पड़ने लगीं !
अभी गाए नहीं मैया ने गीत बुन्दियाँ पड़ने लगीं !
अभी मिला नहीं बाबा का असीस बुन्दियाँ पड़ने लगीं !
अभी प्यासी है सागर की सीप बुन्दियाँ पड़ने लगीं !
प्यार हारा ज़माना गया जीत बुन्दियाँ पड़ने लगीं ।।

आली जग की उलट गई रीत बुन्दियाँ पड़ने लगीं !
कहके आया नहीं मनुआ का मीत बुन्दियाँ पड़ने लगीं I
प्यार हारा ज़माना गया जीत बुन्दियाँ पड़ने लगीं ।।

बचपन में सुने एक गीत का रूपान्तर

छोटा सा बलमा मोरे 

छोटा सा बलमा मोरे
आँगना में गिल्ली खेले I

पनिया भरन जाऊँ वो कहे
मोहे गोदी ले ले I
छोटा सा बलमा मोरे
आँगना में गिल्ली खेले II

गोदी उठाऊँ तो वो
यूँ कहे मोहे ले चल मेले I
छोटा सा बलमा मोरे
आँगना में गिल्ली खेले ।।

मेले ले जाऊँ तो
जुल्मी कहे कहीं चल अकेले I
छोटा सा बलमा मोरे
आँगना में गिल्ली खेले ।।

कैसे बताऊँ मेरी
जान को हैं सौ झमेले I
छोटा सा बलमा मोरे
आँगना में गिल्ली खेले ।।

अपने इलाक़े (उत्तराखण्ड के हल्द्वानी इलाके) के एक लोकगीत के आधार पर

भोला मन कुछ समझ न पाया !

दुनिया ने कितना समझाया
भोला मन कुछ समझ न पाया ।।

आँख लगी तो सपने देखे
सपनों में चाँदी-सोना था
आँख खुली तो क्या होना था
झूठा था सारा सरमाया !
मूरख मन फिर-फिर भरमाया ।।

भोला मन कुछ समझ न पाया ।।

आँख खुली तो मन घबराया
पाया जो सब-कुछ खोना था
आँख लगी तो क्या होना था
झूठे जग की झूटी माया !
मूरख मन फिर-फिर भरमाया ।।

भोला मन कुछ समझ न पाया ।।
भोला मन कुछ समझ न पाया ।।

तू इन फूलों से कर न प्यार !

तू इन फूलों से कर न प्यार!

इनका यौवन भी क्षणभंगुर
इनका जीवन भी क्षणभंगुर
पगले इनकी जीवन-चादर
कल हो जाएगी तार-तार !
तू इन फूलों से कर न प्यार ।।

जो सत्ता इन्हें खिलाती है
जो सत्ता इन्हें जिलाती है
पहचान उसे जो इन्हें
खिलाती-मुरझाती है बार-बार !
तू इन फूलों से कर न प्यार ।।

कभी फिर मिलोगे तो कैसा लगेगा !

कभी फिर मिलोगे तो कैसा लगेगा !
नहीं फिर मिलोगे तो कैसा लगेगा !

तुम्हें देखकर हम जिगर थाम लेंगे
इरादा तो है सब्र से काम लेंगे
ये कैसे कहें हम नज़र फेर लेंगे
न कोई सुने इस तरह नाम लेंगे
ज़माना हँसा था ज़माना हँसेगा ।

कभी फिर मिलोगे तो कैसा लगेगा ।
नहीं फिर मिलोगे तो कैसा लगेगा ।।

ज़बां चुप रहेगी मगर बात होगी
कभी शह लगेगी कभी मात होगी
न सूरज ढलेगा मगर रात होगी
ये क़ुदरत की भारी करामात होगी
ज़माना हँसा था ज़माना हँसेगा ।

कभी फिर मिलोगे तो कैसा लगेगा !
नहीं फिर मिलोगे तो कैसा लगेगा !

कभी फिर मिलोगे तो कैसा लगेगा ।
नहीं फिर मिलोगे तो कैसा लगेगा ।।

मितवा कौन तुझे समझाए !

मितवा कौन तुझे समझाए!
सोवत हो तो हाँक लगाऊँ जागत कौन जगाए रे मितवा ।
कौन तुझे समझाए ।

तू है हठी अरज नहिं माने
निरमोही मोरी पीर न जाने
मन केवल तोको पहचाने
बिसरत नहिं बिसराए रे मितवा !
कौन तुझे समझाए ।

मोहिनि सूरत माहिं बसत है
तोरे दरस बिन कल न परत है
नाग बिरह का मोहे डसत है
भागत नाहिं भगाए रे मितवा
कौन तुझे समझाए ।
सोवत हो तो हाँक लगाऊँ जागत कौन जगाए रे मितवा ।
कौन तुझे समझाए ।।

तोसों कहा तकरार बदरवा ! 

तोसों कहा तकरार बदरवा !
तू दुखियन का यार बदरवा !

तेरा जल है सागर का जल
मेरे आँसू गंगा निरमल
मेरी धार बिलम नहिं जाने
तू जाएगा हार बदरवा ।
तोसों कहा तकरार बदरवा ।
तू दुखियन का यार बदरवा ।।

आ हम दोनों बन हमजोली
रंग-बिरंगी रचें रंगोली
मैं भी उनकी बाट सकेरूँ
तू भी पंथ निहार बदरवा ।
तोसों कहा तकरार बदरवा ।
तू दुखियन का यार बदरवा ।।

बंसी ऐसी तो न बजा !

बंसी ऐसी तो न बजा !
हठीले मोहे ऐसे तो न सता !!

तान सुनत मैं होश गँवाऊँ
लोग हँसें मैं समझ न पाऊँ
चतुरन से नादान कहाऊँ
ऐसा दिन न दिखा
हठीले मोहे ऐसे तो न सता !!
बंसी ऐसी तो न बजा ।।

धुन मीठी मन को झकझोरे
सुर से पकड़ बुलाए धोरे
कान्हा तोरे करूँ निहोरे
और न मोहे नचा !
हठीले मोहे ऐसे तो न सता !
बंसी ऐसी तो न बजा ।।

बिन कारन मोरी सुध बिसराई
सारी उमर मोहे निन्दिया न आई
अब तो आ जा ओ हरजाई
मन की तपन मिटा !
हठीले मोहे ऐसे तो न सता ।
बंसी ऐसी तो न बजा ।।

धरती को सहला जा रे 

शीतल पवन-झकोरा बनकर
धरती को सहला जा रे !
प्यार से बोझल बादल बनकर
अमरित से नहला जा रे I
धरती को सहला जा रे ।।

ताप-भरा जग का आँगन है
पग-पग पर व्याकुल क्रन्दन है
आँखों में दुःख का अंजन है
तू दुखियों का दुखभंजन है
सबका ताप मिटा जा रे ।
शीतल पवन झकोरा बनकर
धरती को सहला जा रे ।।

जीवन में नवजीवन भर दे
प्राणों में नवयौवन भर दे
हर मन में अपनापन भर दे
कल्मष धोकर निरमल कर दे
जगती को हुलसा जा रे ।
शीतल पवन झकोरा बनकर
धरती को सहला जा रे ।।

कैसी मजबूरी है

तुम क्या जानो तुम बिन जीना
कैसी मजबूरी है ।
मेरी जान ही लेकर मानेगी
तुमसे जो दूरी है ।
कैसी मजबूरी है ।।

मैं आकुल-व्याकुल डोल रही
दिल किसको दिखलाऊँ
दुख सुनकर हँसते लोग यहाँ
किसको क्या बतलाऊँ
मेरे होठों तक आ न सके
जो बात ज़रूरी है ।
कैसी मजबूरी है ।।

सब जानके तुम अनजान बने
क्या तुमको समझाऊँ
शीशे के जिगर को पत्थर से
कब तक मैं टकराऊँ
तुम सुख-सपनों में लीन हुए
मेरी बात अधूरी है ।
कैसी मजबूरी है ।।

तुम क्या जानो तुम बिन जीना
कैसी मजबूरी है ।
मेरी जान ही लेकर मानेगी
तुमसे जो दूरी है ।
कैसी मजबूरी है ।।

सँवरिया आन मिलो ! 

सुन्दर चतुर सुजान
सँवरिया आन मिलो !
निकस न जाय मोरी जान
सँवरिया आन मिलो !!

भूख नसानी मोरी नींद नसानी
बैरिन हो गई रात की रानी
घर मोहे खाने आय सेज बेगानी
कौन सुनेगा मोरी अकथ कहानी
मैं जग से अनजान !
सँवरिया आन मिलो !

सुन्दर चतुर सुजान
सँवरिया आन मिलो ।।

मोहे दीवाना कहें लोग सयाने
अपने-पराए सभी मारे हैं ताने
लाख मनाऊँ मोरा मन नाहिं माने
तोरे सिवा कछु ना पहचाने
ये मूरख नादान !
सँवरिया आन मिलो !

सुन्दर चतुर सुजान
सँवरिया आन मिलो ।।

मन के दुआरे 

आँख के तारे दिल के सहारे
मन के दुआरे आओ ना !
आस थकी है साँस रुकी है
और हमें तड़पाओ ना !
मन के दुआरे आओ ना I

आवन कह गए अजहुँ न आए
रह-रह मोरा मन घबराए
निस-दिन तुम्हरा बिरह जलाए
पल-पल बैरन याद सताए ।
मान भी जाओ लौट भी आओ
सूरतिया दिखलाओ ना !
आंख के तारे दिल के सहारे
मन के दुआरे आओ ना !

तुम तरुवर मैं तुम्हरी छाया
तुम जीवन मैं तुम्हरी काया
जुग-जुग मैंने तुमको पाया
तुम परमेसुर मैं हूँ माया
लगन लगी है अगन जगी है
आकर अगन मिटाओ ना ।

आँख के तारे दिल के सहारे
मन के दुआरे आओ ना !
आस थकी है साँस रुकी है
और हमें तड़पाओ ना !
मन के दुआरे आओ ना I

हम हिन्दू है न मुसलमाँ हैं हम मेहनत करनेवाले हैं

हम हिन्दू है न मुसलमाँ हैं हम मेहनत करनेवाले हैं ।
हम प्यारभरे गुलदस्ते हैं अमरित के छलकते प्याले हैं ।।

भाई के गले पर भाई की तलवार नहीं गिरने देंगे
भाईचारे की सतरंगी मीनार नहीं गिरने देंगे
ख़ुद अपने लहू के नदियों से सींचा है जो हमने सदियों से
भारत के चमन पर नफ़रत की बौछार नहीं गिरने देंगे
इस अमन के हम रखवाले हैं इस चमन के हम रखवाले हैं ।
हम प्यारभरे गुलदस्ते हैं अमरित के छलकते प्याले हैं ।।

पूँजी की अन्धेरी मण्डी में इन्सान नहीं बिकने देंगे
हम दीन-धरम के झगड़े में ईमान नहीं बिकने देंगे
मेहनत की क़सम ग़ैरत की क़सम इस धरती की अज़मत की क़सम
इस हाट में क़त्लो-ग़ारत का सामान नहीं बिकने देंगे
इस अमन के हम रखवाले हैं इस चमन के हम रखवाले हैं ।
हम प्यारभरे गुलदस्ते हैं अमरित के छलकते प्याले हैं ।।

लानत है जो भाई का ख़ंजर भाई के जिगर को पार करे
लानत है कमेरा एक अगर दूजे पे उछलकर वार करे
ख़ुद अपने लहू के गारे से तंज़ीम बनाई जो हमने
लानत है हमारा ख़ूँ ही उसे कमज़ोर करे मिस्मार करे
इस अमन के हम रखवाले हैं इस चमन के हम रखवाले हैं ।
हम प्यारभरे गुलदस्ते हैं अमरित के छलकते प्याले हैं ।।

हम प्यारभरे गुलदस्ते हैं अमरित के छलकते प्याले हैं ।।
हम हिन्दू है न मुसलमाँ हैं हम मेहनत करनेवाले हैं ।।

पैसा पैसा पैसा

बचपन में एक नाटक में सुने गीत के आधार पर

पैसा पैसा पैसा

दरबार मैंने देखा
घरबार मैंने देखा
परिवार मैंने देखा
पर यार मैने देखा
बस पैसा पैसा पैसा ।
बस पैसा पैसा पैसा ।।

इनकार मैंने देखा
इक़रार मैंने देखा
इसरार मैंने देखा
पर यार मैने देखा
बस पैसा पैसा पैसा ।
बस पैसा पैसा पैसा ।।

ज़रदार मैंने देखा
नादार मैंने देखा
दिलदार मैंने देखा
पर यार मैने देखा
बस पैसा पैसा पैसा ।
बस पैसा पैसा पैसा ।।

इस पार मैंने देखा
उस पार मैंने देखा
मंझधार मैंने देखा
पर यार मैने देखा
बस पैसा पैसा पैसा ।
बस पैसा पैसा पैसा ।।

गुरुवार मैंने देखा
शनिवार मैंने देखा
इतवार मैंने देखा
पर यार मैने देखा
बस पैसा पैसा पैसा ।
बस पैसा पैसा पैसा ।।

एक बार मैंने देखा
दस बार मैंने देखा
सौ बार मैंने देखा
पर यार मैने देखा
बस पैसा पैसा पैसा ।
बस पैसा पैसा पैसा ।।

बस पैसा पैसा पैसा ।
बस पैसा पैसा पैसा ।।

नईं पीना मेरे यार सिगरेट नईं पीना

नईं पीना मेरे यार सिगरेट नईं पीना ।
ज़िद न करीं मेरे यार सिगरेट नईं पीना ।।

नीची कर ले अपनी मूँछ
वरना कट जाएगी पूँछ
खा ले भुट्टा फ़ेंक दे छूँछ
बहस न कर बेकार सिगरेट नईं पीना ।।
शावा सिगरेट नईं पीना
नईं पीना जी नईं पीना ।।

और बुरा चोरी से पीना
सर्दी में भी आए पसीना
शाल भी तेरा है पश्मीना
हो न जाय बेकार सिगरेट नईं पीना ।।
शावा सिगरेट नईं पीना
नईं पीना जी नईं पीना ।।

बस में मना रेलों में मना है
मेलों में ठेलों में मना है
दुनिया के खेलों में मना है
किसी की हो सरकार सिगरेट नईं पीना ।।
शावा सिगरेट नईं पीना
नईं पीना जी नईं पीना ।।

सिगरेट पीकर रोग लगाओ
सुन्दर मुखड़ा जग से छुपाओ
झगड़ा करके जेल में जाओ
पुलिस खड़ी तैयार सिगरेट नईं पीना ।।
शावा सिगरेट नईं पीना
नईं पीना जी नईं पीना ।।

क्यूँ ये झंझट जी को लगाएँ
खुद डूबें औरों को डुबाएँ
अस्पताल की भीड़ बढाएँ
तंगी रहे तलवार सिगरेट नईं पीना ।।
शावा सिगरेट नईं पीना
नईं पीना जी नईं पीना ।।

बीड़ी-सिगरेट नईं पीना
ज़हर तमाकू नईं पीना
किसी भी सूरत नईं पीना
नईं पीना तो नईं पीना
साफ़ करो इंकार सिगरेट नईं पीना ।।
अब कैसी तकरार सिगरेट नईं पीना ।।
हम सब हैं तैयार सिगरेट नईं पीना ।।

जमुना के तीर कान्हा बाँसुरी बजाए !

जमुना के तीर कान्हा बाँसुरी बजाए !
बाँसुरी की तान मोरे प्राण में समाए !

बिसरो सब काम-काज
भूलि गई लोक-लाज
कैसो रंग चढ़ो आज
समझ कछु न आए ।
जमुना के तीर कान्हा बाँसुरी बजाए ।।

थिरकें पग मन अधीर
नीकौ लागे अबीर
सीतल सुमधुर समीर
खींचकै बुलाए
जमुना के तीर कान्हा बाँसुरी बजाए ।
बाँसुरी की तान मोरे प्राण में समाए ।।

इस दिल में अब एक धुँधली सी तस्वीर है तेरी 

इस दिल में अब एक धुँधली-सी तस्वीर है तेरी ।
तस्वीर तेरी आज भी तक़दीर है मेरी ।।

माथे पे तेरे धूल की एक पर्त जमी है
मुरझाए हुए होठ हैं आँखों में नमी है
मुखड़े पे उदासी की घटा फैल चली है
दिन हैं मेरे आँगन में मगर शाम झुकी है ।
जिस दिन से मेरे हाथ से छूटा तेरा दामन
उस दिन से तेरी याद बग़लगीर है मेरी ।।

इस दिल में अब एक धुँधली-सी तस्वीर है तेरी ।
तस्वीर तेरी आज भी तक़दीर है मेरी ।।

ज़ालिम ज़रा इक बार इनायत की नज़र कर
इस बार मुझे देख ले एक लम्हा ठहरकर
जादू है तेरी आँख में एक बार इधर कर
फूलों के क़दम चूम लूँ काँटों से गुज़रकर ।
सोचा था बहुत दूर निकल जाऊँगा तुझसे
पाया कि तेरी ज़ुल्फ़ ही ज़ंजीर है मेरी ।

इस दिल में अब एक धुँधली-सी तस्वीर है तेरी ।
तस्वीर तेरी आज भी तक़दीर है मेरी ।।

तुझे क्या हुआ मेरे हमसफ़र 

तू मुझे रुलाके भी ख़ुश नहीं
तुझे क्या हुआ मेरे हमसफ़र ।
जो तू ख़ुश नहीं तो मैं कुछ नहीं
तुझे क्या हुआ मेरे हमसफ़र ।।

तेरी आस्तीं पे जो दाग़ था
वो मेरी वफ़ा का सुराग़ था
वो सुराग़ तूने मिटा दिया
तुझे क्या हुआ मेरे हमसफ़र ।

तू मेरी वफ़ा का नसीब है
मेरी धड़कनों के क़रीब है
ये भरम भी तूने मिटा दिया
तुझे क्या हुआ मेरे हमसफ़र ।

मेरी आन तू मेरी शान तू
मेरी जान मेरा जहान तू
ये भरम भी तूने मिटा दिया
तुझे क्या हुआ मेरे हमसफ़र ।

छुपा क्या है तुझसे छुपाऊँ क्या
तुझे दिल के दाग़ दिखाऊँ क्या
तुझे साफ़-साफ़ बताऊँ क्या
तुझे क्या हुआ मेरे हमसफ़र ।

मेरे हमसफ़र तुझे क्या हुआ
तुझे क्या हुआ मेरे हमसफ़र ।।

आली मोरा मोहना आयो रे मोरे आँगना !

आली मोरा मोहना आयो रे मोरे आँगना !
आयो मोरे आँगना भायो रे मोरे आँगना !!

कहाँ पे बिठाऊँ मोहे समझ न आए
जो है मन माहीं सो तो कहा नहिं जाए
कहा भी न जाए मोसों रहा भी न जाए
सखी-सहेली आज कोऊ मोरे संग ना !!

आली मोरा मोहना आयो रे मोरे आँगना !
आयो मोरे आँगना भायो रे मोरे आँगना !!

बलि-बलि जाऊँ मैं तो मन में बिठाऊँ
अँखियों में पलकों का पालना बिछाऊँ
वो सब जाने काहे मुख सों बताऊँ
कछु कहे आँसू कछु बोले मोरा कंगना !!

आली मोरा मोहना आयो रे मोरे आँगना !
आयो मोरे आँगना भायो रे मोरे आँगना !!

नएपन से मैं कुछ घबरा उठा था

नएपन से मैं कुछ घबरा उठा था ।
पुराना कुछ न था वां सब नया था ।।

न रस्सी थी न थी ज़ंजीर कोई,
मगर कुछ था कि मुझको बाँधता था ।

उस एक लम्हे ने जादू कर दिया था,
सख़ी था वो न मैं कुछ चाहता था ।

बरसते थे जिलौ के ताज़ियाने,
अन्धेरा पागलों-सा हँस रहा था ।

ग़मे-दुनिया की परवा ही किसे थी,
फ़ज़ाओं में शहद-सा घुल चला था ।

हटा पर्दा तो बेपर्दा हुई वो,
सचाई क्या थी मैं क्या सोचता था ।

बड़े काम आई तेरी कज-अदाई,
वगरना सोज़ से अब क्या छुपा था ।।

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