कुमार नयन की रचनाएँ

तारों भरी है रात ग़ज़ल कह रहा हूँ मैं

तारों भरी है रात ग़ज़ल कह रहा हूँ मैं
रौशन है कायनात ग़ज़ल कह रहा हूँ मैं।

अहले-जहां सुनो कि तुम्हें आज दर्द से
मिल जायेगी निजात ग़ज़ल कह रहा हूँ मैं।

कुछ देर भूल जाओ न हर बात अक़्ल की
होगी दिलों की बात ग़ज़ल कह रहा हूँ मैं।

आये हैं मुद्दतों पे तो आंखों में अश्क़ आज
धुलने दो ये हयात ग़ज़ल कह रहा हूँ मैं।

बिछ जायेगी दिलों में तुम्हारे ख़ुदा क़सम
एहसास की बिसात ग़ज़ल कह रहा हूँ मैं।

मुमकिन नहीं कि ख़ूने-जिगर हो न पाए आज
होगी ये वारदात ग़ज़ल कह रहा हूँ मैं।

तुम ज़िन्दगी की जंग में जीतोगे तो मगर
होगा न कोई मात ग़ज़ल कह रहा हूँ मैं।

ज़मीं के ज़ख़्म का मरहम नहीं क्या

ज़मीं के ज़ख़्म का मरहम नहीं क्या
फ़लक की आंख होगी नम नहीं क्या।

हर इक शय आग बनकर जल रही है
कहीं इक क़तरा-ए-शबनम नहीं क्या।

पिएगी और क्या क्या ये सियासत
लहू बच्चों का कोई कम नहीं क्या।

बहुत से लोग मुझसे पूछते हैं
वतन में अपने ही अब हम नहीं क्या।

खुशी से आज भी क्यों जी रहा हूँ
मुझे ग़म होने का कुछ ग़म नहीं क्या।

लहू क्यों खोलता रहता है हरदम
सुकूं का अब कोई मौसम नहीं क्या।

कभी तन्हा नहीं मुझको समझना
मिरी ग़ज़लें मिरी हमदम नहीं क्या।

क़लम लेकर उतर जाऊं सड़क पर
अभी भी मां क़सम वो दम नहीं क्या।

रगों में चीखते नारे लहू-सा चलते हैं 

रगों में चीखते नारे लहू-सा चलते हैं
मिरे जिगर में हज़ारों जुलूस पलते हैं।

सदी की आग का अंदाज़ा क्या लगाओगे
फ़क़त ये जिस्म नहीं साये भी पिघलते हैं।

बहार भी न गुलों को खिला सके शायद
यहां दरख़्त फ़ज़ा में धुआं उगलते हैं।

कोई नहीं है नया कुछ भी सोचने वाला
यहां ढले हुए सांचे में लोग ढलते हैं।

पता न था कि ज़माने का रंग यूँ होगा
हमारे खून के रिश्ते भी अब बदलते हैं।

सितमगरों की सियासत ठठा के हंसती है
घरों से ख़ौफ़ज़दा लोग जब निकलते हैं।

मिरा दिल मुझसे धोखा कर गया तो

मिरा दिल मुझसे धोखा कर गया तो
कहीं ये मुझसे पहले मर गया तो।

मैं अपना कत्ल तो कर लेता लेकिन
कहीं इल्ज़ाम तेरे सर गया तो।

मिरी नाकामियों तुम ये भी सोचो
मैं हर उम्मीद से ही डर गया तो।

चले जाएंगे लाखों लोग नीचे
अगर तू और कुछ ऊपर गया तो।

मिरा दुश्मन लगा मुझसे भी बेहतर
मैं उसके दिले के अंदर जब गया तो।

मिरे बच्चों से होंगी मेरी बातें
किसी दिन वक़्त पर मैं घर गया तो।

मैं खाली ट्यूब हूँ पहिये का लेकिन
हवा बनकर तू मुझमें भर गया तो।

ज़िन्दगी का हिसाब रखता हूँ 

ज़िन्दगी का हिसाब रखता हूँ
अपने हक़ का अज़ाब रखता हूँ।

मेरी आंखों को तो पढ़े कोई
मैं भी दिल में किताब रखता हूँ।

सोचकर चुप हूँ कुछ सवालों पर
वरना मैं भी जवाब रखता हूँ।

नींद आती नहीं है पहले सी
जब से आंखों में ख़्वाब रखता हूँ।

मुझसे मत पूछिए कि क्यों कब से
मैं ये सूखा गुलाब रखता हूँ।

आग नफ़रत की जल न पायेगी
प्यार का दिल में आब रखता हूँ।

खून से तर शरीर ज़िंदा है 

खून से तर शरीर ज़िंदा है
मेरा ज़ख़्मी ज़मीर ज़िंदा है।

वहां पांखड चल नहीं सकता
जहां कोई कबीर ज़िंदा है।

है हुक़ूमत तो मुफ़लिसी की मगर
मुल्क का हर अमीर ज़िंदा है।

इक पियादा हो जब तलक ज़िंदा
तो समझना वज़ीर ज़िंदा है।

कोई इससे बड़ी तो खींचे अब
मेरी छोटी लकीर ज़िंदा है।

तेरी दुनिया में मर गयी होगी
मेरी दुनिया में हीर ज़िंदा है।

पूछियो मत फ़िराक़ ग़ालिब से
मेरी ग़ज़लों में मीर ज़िंदा है।

चल गया बहुत तो ग़म क्या है

चल गया बहुत तो ग़म क्या है
अभी भी पास मव कम क्या है।

बला-ए-भूख तोड़ दे सब कुछ
उसूल क्या है ये क़सम क्या है।

मिरे ख़ुदा अगर तू सबमें है
तो फिर ये दौर क्या हरम क्या है।

हमारे तुम हो हम तुम्हारे हैं
अगर ये सच है तो भरम क्या है।

तमाम उम्र रहगुज़र पे कटी
मैं मर गया तो चश्मे-नम क्या है।

हरेक चोट ने दुआ दी है
हमें पता नहीं सितम क्या है।

तमाम ज़िन्दगी की शय हैं मगर
नहीं है तू तो ऐ सनम क्या है।

वो हुआ जिसका नहीं इम्कान था 

वो हुआ जिसका नहीं इम्कान था
मेरा क़ातिल ही मिरा मेहमान था।

सिर्फ हिन्दू और मुस्लिम थे वहां
कैसे बचता वो जो इक इंसान था।

कत्ल जिस काफ़िर का तूने कर दिया
क्या पता तुझको तिरा रहमान था।

सितम को पहचानना दुश्वार था।
रास्ते पर चलना तो आसान था।

क्या मैं कहता हा-हा हू-हू था जहाँ
ग़म मिरे अफ़साने का उनवान था।

हमला-आवर असलहों से लैस थे
मेरे हाथों में मिरा दीवान था।

प्यार की बस्ती अजब इक थी जहां
मज़हबों से हर कोई अंजान था।

मुख़्तलिफ़ लोगों से मिलना उम्र भर अच्छा लगा 

मुख़्तलिफ़ लोगों से मिलना उम्र भर अच्छा लगा
मुझको सचमुच मेरा होना दर-बदर अच्छा लगा।

दूर तक मंज़िल न कोई मरहला इस राह में
मील का पत्थर नहीं फिर भी सफ़र अच्छा लगा।

रूह पर तो रंग कोई दूसरा चढ़ता नहीं
जब कभी मेरा हुआ ख़ूने-जिगर अच्छा लगा।

आपने भी फाड़ डाली अपनी सारी अर्ज़ियाँ
आप भी खुद्दार हैं यह जानकर अच्छा लगा।

की मिरी तारीफ जब तो खोलते मेरी किताब
क्यों नहीं मुझको पढ़ा मैं था अगर अच्छा लगा।

आपको कहना मुझे सुनना था आगे भी मगर
ग़म के अफ़साने का होना मुख़्तसर अच्छा लगा।

है वो ही दीवारो-दर आंगन वो ही बिस्तर वो ही
शख्स इक आया तो मुद्दत बाद घर अच्छा लगा।

दिल के गहराई से जब सोचा तो मुझको मां क़सम
मेरे दुश्मन का मिरे दिल पर असर अच्छा लगा।

खिलौनों की ख़ातिर मचलते नहीं हैं 

खिलौनों की ख़ातिर मचलते नहीं हैं
ये बच्चे हैं फिर क्यों उछलते नहीं हैं।

मैं निकला हूँ इसका सबब ढूंढने को
कि क्यों आज कल दिल पिघलते नहीं हैं।

चलो कुछ सवालों को लोगों से पूछें
किताबों से हल अब निकलते नहीं हैं।

बदल जाएंगे बाप-बेटा-बिरादर
विचारों के रिश्ते बदलते नहीं हैं।

पढ़ो पढ़ सको तो इन आंखों को मेरी
अब अहसास लफ़्ज़ों में ढलते नहीं हैं।

मुक़द्दर नहीं ये कहो ज़िद हमारी
कि हम ठोकरों से सम्भलते नहीं हैं।

हमारा दिल निकल जाये तो अच्छा

हमारा दिल निकल जाये तो अच्छा
महब्बत आज फल जाये तो अच्छा।

ज़रूरी है तुम्हारे सच का बचना
हमारा ख़्वाब जल जाये तो अच्छा।

बहुत मुश्किल है अब मेरा बदलना
ज़माना ही बदल जाये तो अच्छा।

यक़ीनन खून कर डालूंगा अपना
जुनूने-दिल बहल जाये तो अच्छा।

बहुत संगीन होगी सुब्ह लेकिन
ये नागिन रात ढल जाये तो अच्छा।

दिलों को जो बना देता है पत्थर
वो जादू मुझ पे चल जाये तो अच्छा।

अभी कुछ दिन बचे हैं ज़िन्दगी के
मिरा दिल तू सम्भल जाये तो अच्छा।

तू कैसे क्यों हारा सोच

तू कैसे क्यों हारा सोच
तब फिर जीत का नारा सोच।

मत दे औरों पर इल्ज़ाम।
तू कितना नाकारा सोच।

ग़फ़लत करने वाला कौन
सोच ज़रा दोबारा सोच।

कुछ भी करने से पहले
क्या था सोच हमारा सोच।

बस इतना है मेरे पास
मीठी बोली खारा सोच।

सौ खुशियां दे देता है
इक पागल आवारा सोच।

काश कि दोनों मिल जाते
मेर्क सोच तुम्हारा सोच।

बद्दुआओं में भर कर दुआएं न दे

बद्दुआओं में भर कर दुआएं न दे
प्यार को ओढ़ने की कबाएं न दे।

दर्द मेरे हैं रहने दे मुझ तक उन्हें
अहले-दिल को बता कर सज़ाएं न दे।

जल रहा है मिरा दिल तो तू मत बुझा
बस करम इतना कर कि हवाएं न दे।

लौट आएं न हम बीच ही राह में
इतनी खामोशियों से सदाएं न दे।

मर न जाऊं खुशी से ही तेरी क़सम
मेरे महबूब इतनी वफाएं न दे।

बेक़रारी न दीदारे-आशिक़ की हो
दिलबरों को ख़ुदा ये खताएं न दे।

कोई किस्सा सुना या ग़ज़ल गुनगुना
नींद आने की हमको दवाएं न दे।

अपनी-अपनी ज़िद के चलते मरहला बाक़ी रहा

अपनी-अपनी ज़िद के चलते मरहला बाक़ी रहा
मेरे हां से तेरे ना का फासला बाक़ी रहा।

खत्म उनसे था तअल्लुक फिर हुआ क्यों दिन तबाह
उम्र भर यादों का शायद सिलसिला बाक़ी रहा।

ज़िन्दगी तो ख़ूबसूरत आसरे में कट गयी
क्या बुरा है गर महब्बत का सिला बाकी रहा।

हमको अपनी ओर से कोई शिकायत कब रही
ज़िन्दगी का हमसे लेकिन कुछ गिला बाक़ी रहा।

चाहते थे उड़ न जाना जो हदे-परवाज़ तक
उनके अंदर दूर तक लेकिन ख़ला बाक़ी रहा।

जंग कैसी जंग है ये खत्म क्यों होती नहीं
बाद हर इक कर्बला के कर्बला बाक़ी रहा।

ज़िन्दगी के मोर्चे पर जूझता जो रह गया
उसके हक़ में अब तलक क्यों फ़ैसला बाक़ी रहा।

खौलते पानी में डाला जायेगा

खौलते पानी में डाला जायेगा
यूँ हमें धोया-खंगाला जायेगा

लूटने में लड़ पड़ें आपस में हम
इस तरह सिक्का उछाला जायेगा।

फिर मेरी मजबूरियों का देखना
दूसरा मतलब निकाला जायेगा।

एक मजहब के बताओ नाम पर
तख्त को कितना संभाला जायेगा।

कुछ अंधेरा हम भी लेकर घर चलें
तब कहीं घर-घर उजाला जायेगा।

मुझपे चलती हैं हथौड़ी छेनियां
मुझमें कोई अक्स ढाला जायेगा।

फिर हमारी ज़िन्दगी का फैसला
कल के जैसे कल पे टाला जायेगा।

बकरियों-गायों को लेकर चल ‘नयन’
अब यहां बाघों को पाला जायेगा।

बिखरती ज़िन्दगी को यूँ सजा लें 

बिखरती ज़िन्दगी को यूँ सजा लें
चलो कुछ ख़्वाब आंखों में बसा लें।

दिलों पर रख के अहसासों का मरहम
जहां का ज़ख़्म बढ़ने से बचा लें।

कहीं पानी भी है तो खौलता-सा
सुलगता दूर अश्क़ों से बुझा लें।

अगर सुनता है वो हर एक दिल की
ख़ुदारा काफिरों की भी दुआ लें।

सुकूं बच्चों के जैसा ही मिलेगा
कलेजे से ग़मों को तो लगा लें।

चुभन होगी जहां ख़ुशबू भी होगी
गुलों पर पहरे हैं कांटे चुरा लें।

हमारे पास अब आंसू नहीं हैं
किसी से दर्द होने की दवा लें।

वफ़ा की हर मिसाल ज़िंदा रख

वफ़ा की हर मिसाल ज़िंदा रख
तू इश्क़ का ख़याल ज़िंदा रख।

हसीन ख़्वाब रख के आंखों में
दिलों में कुछ वबाल ज़िंदा रख।

हयात जब तलक भी है तेरी
लहू में रंग लाल ज़िंदा रख।

मिटेगा एक दिन अंधेरा ये
यक़ीन की मशाल ज़िंदा रख।

नये हों नज़रिये मिजाज़ मगर
सवाल-दर-सवाल ज़िंदा रख।

खुशी ठुमक-ठुमक के नाचेगी
ग़मों के सुर व ताल ज़िंदा रख।

पलट के देखना ज़रूरी है
गुज़र गया जो साल ज़िंदा रख।

शराबी शाम बहकाये तो क्या हो

शराबी शाम बहकाये तो क्या हो
कहीं दिल लड़खड़ा जाये तो क्या हो।

ये पूछो अहले-दिल भंवरों से जाकर
कली गुलशन में शरमाये तो क्या हो।

अभी तो सिर्फ तुम हो और मैं हूँ
ज़माना बीच में आये तो क्या हो।

बहुत मुश्किल हैं राहें ज़िन्दगी की
कोई हमराह मिल जाये तो क्या हो।

ज़रा सोचो तो नफ़रत करने वालो
महब्बत रंग दिखलाए तो क्या हो।

महब्बत को बचाने के लिए जब
कोई झूठी क़सम खाये तो क्या हो।

उठा हो दर्द जब ज़ोरों से दिल में
तू ऐसे में ग़ज़ल गाये तो क्या हो।

बहार ढोके खिज़ाओं से दिल लगाएंगे 

बहार ढोके खिज़ाओं से दिल लगाएंगे
चमन को राज़े-महब्बत है क्या बताएंगे।

हज़ार बार ज़माना हमें रुलायेगा
हज़ार बार ज़माने को हम हंसाएंगे।

हम उनके दर से यही सोच कर गुज़रते हैं
कभी तो खुद वो हमें अपने घर बुलाएंगे।

हमारे पास अभी भी है सांस की दौलत
चलो कि दांव पे अब ज़िन्दगी लगाएंगे।

ख़रा उतरने में हर बार टूट जाता हूँ
वो कितनी बार मुझे और आजमाएंगे।

ज़माना सच तो तभी समझे और मानेगा
हमारे दर्द को जब आप गुनगुनायेंगे।

तमीज़ सबको कहां पूछने की आती है
सवाल देख वो ही प्यार से उठाएंगे।

मरते-मरते किसने सदा दी

मरते-मरते किसने सदा दी
क़ातिल को जीने की दुआ दी।

मैं फिर क्या महफ़िल में सुनाता
मेरी कहानी तुमने सुना दी।

ख़्वाब भला आते भी तो कैसे
जाग के सारी रैन बिता दी।

दुश्मन ने दिल लूट के मेरा
आज मिरी औक़ात बता दी।

हंगामा बरपा जो किया था
बात वही फिर तुमने उठा दी।

छूकर अपने हाथ से तुमने
पानी में भी आग लगा दी।

अपनी धुन में आपने गाकर
मेरी ग़ज़ल की उम्र बढ़ा दी।

यारो कभी-कभी हमें मर जाना चाहिए

यारो कभी-कभी हमें मर जाना चाहिए
उल्फ़त में हद के पर गुज़र जाना चाहिए।

तूफ़ान है उठा यहां हर दिल में दर्द का
कुछ दिन इसी नगर में ठहर जाना चाहिए।

मानोगे तुम नहीं तो कभी बोलेंगे नहीं
बच्चों की धमकियों से तो डर जाना चाहिए।

माना कि सिर्फ होगी क़ियामत उधर जनाब
लेकिन जो दिल कहे तो उधर जाना चाहिए।

पहले तो कितना गहरा है दरिया पता चले
यूँ ही नहीं दिलों में उतर जाना चाहिए।

दीवाने हो अगर तो हो महफ़िल से दूर क्यों
दावत नहीं मिली है मगर जाना चाहिए।

कल फिर मिलेंगे शहरे-अदब हम ग़ज़ल लिए
अब रात ढल चुकी हमें घर जाना चाहिए।

जाने क्या आज हुआ है मुझसे

जाने क्या आज हुआ है मुझसे
दिल मिरा रूठ गया है मुझसे।

जान ईमाँ न करूँ क्यों कुरबां
उसने मांगी जो दुआ है मुझसे।

पहले जी भर के तो रो लेने दो
कोई मुद्दत पे मिला है मुझसे।

वो कोई ग़ैर नहीं अपना है
वरना क्यों उसको गिला है मुझसे।

यूँ मिले चैन तो मैं मर जाऊं
आज क्यों दर्द खफ़ा है मुझसे।

कितनी ज़ालिम है तुम्हारी दुनिया
एक बच्चे ने कहा है मुझसे।

अपनी ख़ूबी को नहीं थी जो पता
मेरे दुश्मन ने सुना है मुझसे।

कब कहां होता है मेरा आना-जाना ये तो पूछ 

कब कहां होता है मेरा आना-जाना ये तो पूछ
किसके किसके है ख़यालों में ठिकाना ये तो पूछ।

दिलबरों की बात क्या रहने दे होगी फिर कभी
दुश्मनों ने हमको कितना दिल से माना ये तो पूछ।

हम न जीते हैं न जीतेंगे कभी लेकिन ज़रा
चाहता है क्यों कोई हमको हराना ये तो पूछ।

ये हमारी मुफ़लिसी का जश्न है इसको न देख
कैसे चलता है हमारा आबो-दाना ये तो पूछ।

कब तलक बदलेगा मुश्किल है बताना ये मगर
क्यों ज़रूरी है बदलना ये ज़माना ये तो पूछ।

जानते हैं ज़िन्दगी का राज़ हम अल्ला क़सम
दर्द क्या है इश्क़ का क्या है फ़साना ये तो पूछ।

हम ग़ज़ल क्यों कह रहे हैं ये नहीं हम जानते
किसको लेकिन चाहते हैं हम सुनना ये तो पूछ।

सुब्ह को हां-हां कहा शाम को ना-ना बाबा

सुब्ह को हां-हां कहा शाम को ना-ना बाबा
कितनी तेज़ी से बदलता है ज़माना बाबा।

अद्ल ईमान वफ़ा ढूंढ रहे हो अब भी
तुम तो सचमुच हो पुराना का पुराना बाबा।

बढ़ गया जुर्म बहुत और हुए मुजरिम गायब
जब से बस्ती में नया खुल गया थाना बाबा।

गिर पड़ो तुम जो सड़क पर तो उठाये न कोई
भूलकर भी न मिरे शहर में आना बाबा।

सिर्फ बदतर नहीं बेहतर भी है दुनिया अपनी
मैंने आंखों से तिरी देख के जाना बाबा।

एक आवारा-सा बदनाम-सा बेकार-सा शख्स
मुझसे मिलना हो तो बस इतना बताना बाबा।

हमको मालूम है नाराज़ ज़माने से हो तुम
आओ फिर साथ ही हंगामा मचाना बाबा।

महफ़िलों से महलों से गांव के सिवानों तक

महफ़िलों से महलों से गांव के सिवानों तक
ले चलो ग़ज़ल को अब खेत की मचानों तक।

पूछने लगे हैं अब गांव रहनुमाओं से
क्यों न कुछ पहुंच पाता मुल्क के किसानों तक।

उसको क्या पता होगा मर्म दिल की दुनिया का
जो नहीं पहुंच पाया दर्द के ठिकानों तक।

भूख की अदालत में हों गवाहियां जब भी
बात तो पहुंचनी है बाजरे के दानों तक।

गोलियाँ चलाता है कोई मेरे अंदर से
जब कभी पहुंचता हूँ सोच के दहानों तक।

लाज़िमी है हक़ की इक जंग फैसलाकुन अब
कह रहे हैं चीख़ों में सुन लो बेज़बानों तक।

अपना नहीं है फिर भी तू लगता तो है कोई 

अपना नहीं है फिर भी तू लगता तो है कोई
दुश्मन का ही सही मगर रिश्ता तो है कोई।

आंखों में जितनी आग तिरी है वो कम नहीं
इस शहरे-बेचिराग़ में जलता तो है कोई।

आती है एक याद मिरे पास रात को
दिल पर किसी का आज भी पहरा तो है कोई।

सच है लहूलुहान तो होंगे हमारे पैर
तुझ तक मगर पहुंचने का रस्ता तो है कोई।

बस इतना है कि इसको नहीं खोलते हैं हम
दोनों तरफ किवाड़-सा खुलता तो है कोई।

कोई नहीं है साथ मिरे साये के सिवा
मैं चल रहा हूँ फिर भी कि चलता तो है कोई।

शायद कभी न कहता मगर माँ क़सम सुनो
जीता है तुमको देख के मरता तो है कोई।

मत सोच कोई दूसरा तुझसे बड़ा नहीं

मत सोच कोई दूसरा तुझसे बड़ा नहीं
ये और बात है तुझे उसका पता नहीं।

आसूदगी से अपनी तो मैं हूँ खफ़ा मगर
अब मेरे पास अश्क़ का क़तरा बचा नहीं।

मैं जानता हूँ खुदकुशी करना गुनाह है
जीने का दिल में अब मगर वो हौसला नहीं।

सब कुछ है तेरे पास मेरे पास कुछ नहीं
अब तेरे-मेरे बीच कोई फासला नहीं।

मैं जी रहा हूँ कम नहीं इतना मिरे लिए
सर पर मिरे ख़ुदा क़सम कोई ख़ुदा नहीं।

मुंसिफ बने हो तुम मिरा तो सोच लो ज़रा
इंसाफ़ मांगने चला हूँ फैसला नहीं।

जैसे लड़ोगे मुझसे मैं वैसे लड़ूंगा अब
मैदाने-जंग है ये कोई कर्बला नहीं।

रहता हूँ ठीक-ठाक से राज़ी-खुशी के साथ
पर माँ क़सम ये बात कोई मानता नहीं।

अब लहू में मिरे वो रवानी नहीं

अब लहू में मिरे वो रवानी नहीं
मेरी आंखों में पहले सा पानी नहीं।

सब मुझे देख कर फेर लेते हैं मुंह
मेरे चेहरे पे कोई कहानी नहीं।

तुम भी मजबूर थे हम भी मजबूर थे
की किसी ने कोई मेहरबानी नहीं।

आखिरी क़तरा भी अश्क़ का बह गया
अब मिरे पास तेरी निशानी नहीं।

ज़हर का घूंट उसका मुक़द्दर नहीं
वो तो मीरा है मीरा दीवानी नहीं।

जाओ बेख़ौफ़ होकर महब्बत करो
इस ज़माने में राजा या रानी नहीं।

जान देकर करो जान लेने की बात
प्यार की गुफ़्तगू मुंहज़बानी नहीं।

चलता है तो बेख़ौफ़ ज़मीं पर नहीं गिरता 

चलता है तो बेख़ौफ़ ज़मीं पर नहीं गिरता
क्यों नट तनी रस्सी से फिसलकर नहीं गिरता।

फ़ितरत तो है फ़ितरत ये बदल जायेगी कैसे
दरिया में कभी जाके समंदर नहीं गिरता।

हां धूप में बारिश में भी चलता रहूंगा मैं
जब तक मिरे कदमों पे मुक़द्दर नहीं गिरता।

ये सोच के कुछ ऊंचे मकां वाले हैं नाराज़
क्यों फूस का कच्चा मिरा छप्पर नहीं गिरता।

ग़म ने मिरे मुस्कान से है दोस्ती कर ली
अब अश्क़ कोई आंखों से ढल कर नहीं गिरता।

ये कौन है बच्चों का लहू पी रहा है जो
इतना तो सियासत का सितमगर नहीं गिरता।

जब तक न बहुत सब्ज़ जज़ीरा दिलों का हो
तब तक तो वहां प्यार का लंगर नहीं गिरता।

अजीब हाल था कल शब

अजीब हाल था कल शब
मैं बेख़याल था कल शब।

फ़क़त ख़याल का जल्वा
कोई बवाल था कल शब।

सुकून दिन से था लिपटा
यही मलाल था कल शब।

किसी का इंतज़ारे-वस्ल
पलों में साल था कल शब।

तू कोई ख़्वाब था या सच
ये इक सवाल था कल शब।

नज़र भी कैसे कुछ आता
तिरा जमाल था कल शब।

न बेख़ुदी न चश्मे-तर
मिरा कमाल था कल शब।

सच है जो बात कहूँ न कहूँ 

सच है जो बात कहूँ न कहूँ
रात को रात कहूँ या न कहूँ।

पड़ गया सोच में मैं सुन कर तुम्हें
अपने हालात कहूँ या न कहूँ।

मान जाएंगे बहुत लोग बुरा
खुल के जज़्बात कहूँ या न कहूँ।

जीत पाया न किसी दिल को कभी
अपनी मैं मात कहूँ या न कहूँ।

पास रहकर भी कहा कुछ भी नहीं
ये मुलाक़ात कहूँ या न कहूँ।

दिल मिरा मुझको भुला देता है
उसकी ये घात कहूँ या न कहूँ।

ज़िंदा रखने की मुझे कोशिश है
इसको ख़ैरात कहूँ या न कहूँ।-

सिर्फ लोगों से भरा होने से घर होता नहीं

सिर्फ लोगों से भरा होने से घर होता नहीं
चाहने वाला कोई उसमें अगर होता नहीं।

हमसफ़र हो साथ तो मंज़िल भी आ जाती है पास
तन्हा तन्हा ज़िन्दगी का तय सफ़र होता नहीं।

एक दुनिया और इस दुनिया के अंदर है छुपी
ये पता उसको नहीं जो दर-बदर होता नहीं।

चाहता हूँ हद में ही रहना मगर मैं क्या करूँ
माँ क़सम बंदिश का मुझ पर कुछ असर होता नहीं।

सिर्फ तारीखें बदलने से नहीं आता है दिन
जब तलक सूरज की किरणों का बसर होता नहीं।

कुछ नहीं था पास तो हंसकर गुज़ारे रात-दिन
मिल गया सबकुछ तो रो-रो कर गुज़र होता नहीं।

जुर्म की सारी हदों को पार कर जाता अगर
आदमी को आदमी होने का डर होता नहीं।

अंधेरी रात के तारों में ढूंढना मुझको 

अंधेरी रात के तारों में ढूंढना मुझको
मिलूंगा दर्द के मारों में ढूंढना मुझको।

चला हो ज़ुल्म की जो सल्तनत से टकराने
उसी जुलूस के नारों में ढूंढना मुझको।

मिरे नसीब में लिक्खी नहीं है तन्हाई
जो ढूंढना तो हज़ारों में ढूंढना मुझको।

मैं दुश्मनों के बहुत ही क़रीब रहता हूँ
समझ के सोच के यारों में ढूंढना मुझको।

ख़ुदा क़सम ये तुम्हारी ही भूल है यारो
नज़र नवाज़ नज़ारों में ढूंढना मुझको।

फ़क़त गुलों की हिफाज़त का काम ही है मिरा
चमन में जाना तो ख़ारों में ढूंढना मुझको।

जहां कहीं भी मिले ज़िन्दगी मिलूंगा वहीं
धड़कते दिल के दयारों में ढूंढना मुझको।

पहुंच गया हूँ मैं इंसानियत की बस्ती में
दुसाध डोम चमारों में ढूंढना मुझको।

मरने के जब हज़ार बहाने थे मिरे पास

मरने के जब हज़ार बहाने थे मिरे पास
जीने के तब भी कुछ तो ठिकाने थे मिरे पास।

नाज़ुक मिजाज़ लोग थे क्या उनको सुनाता
कड़वी हक़ीक़तों के फ़साने थे मिरे पास।

दौरे-खिजां में भी मैं रहा यूँ ही सलामत
ख़ुशबू-ए-इश्क़ के जो ज़माने थे मिरे पास।

चुप था कि मेरे पास नये लफ्ज़ नहीं थे
जज़्बात सब के सब ही पुराने थे मिरे पास।

तुमने तो मुझ गरीब के घर को ही टटोला
दिल को टटलोते तो ख़ज़ाने थे मिरे पास।

हर बार दिल का अक्स रहा तीर के आगे
वरना बहुत अचूक निशाने थे मिरे पास।

पूरे नहीं हुए वो जवां फिर भी रही उम्र
सारे अधूरे ख़्वाब सुहाने थे मिरे पास।

मुद्दतों पर मिला जो रुका ही नहीं 

मुद्दतों पर मिला जो रुका ही नहीं
यार ने कुछ कहा कुछ सुना ही नहीं।

सारा किस्सा तो आंखों में ही दर्ज था
क्या करें हम किसी ने पढ़ा ही नहीं।

जाने ख़ारों ने चुप रह के क्या कह दिया
तितलियों ने गुलों को छुआ ही नहीं।

मैंने देखा है ऐसे भी खुद्दार को
जिसने मांगी किसी से दुआ ही नहीं।

कोई दीवाना है या कि मजबूर है
हंस रहा है वो जैसे खफ़ा ही नहीं।

प्यार को कह रहे हैं वो अब भी बुरा
कैसे कह दूँ मिरी कुछ ख़ता ही नहीं।

खून देता रहा मुझको चुपके से जो
कह रहा है मुझे जानता ही नहीं।

हमारे शहर का मौसम बदल गया कैसे 

हमारे शहर का मौसम बदल गया कैसे
हरेक शख्स मशीनों में ढल गया कैसे।

ग़लत नहीं थी मिरी चाल कोई साज़िश थी
ज़मीन ख़ुश्क थी तो मैं फिसल गया कैसे।

लिपट के आज जो मुझसे किसी ने चूम लिया
मैं सोच में हूँ कि पत्थर पिघल गया कैसे।

कभी किसी ने नहीं जिसपे कुछ इनायत की
वो शख्स सब ही से आगे निकल गया कैसे।

कोई ज़रूर ही रहबर था इस बग़ावत में
ये इंक़लाब फिर इस बार टल गया कैसे।

ये अब्र बरसा तो था फ़सले-गुल की ख़ातिर ही
मगर हमारा नशेमन ये जल गया कैसे।

हकों की मांग थी मज़हब के दे दिये नारे
हरेक शख्स इसी पर बहल गया कैसे।

सियह रात रंगत बदलने लगी है

सियह रात रंगत बदलने लगी है
सहर होने को अब मचलने लगी है।

मैं ख्वाबों की दुनिया में गुम हो गया हूँ
तमन्ना जवां दिल में पलने लगी है।

किनारे पे पहुंचेगी कैसे न कश्ती
निशाने पे शमशीर चलने लगी है।

बढ़ा हौसला इस क़दर कारवां का
कि रहजन की छाती दहलने लगी है।

ये ज़ुल्मों-सितम के अंधेरे से कह दो
कि लौ सरफ़रोशी की जलने लगी है।

सितारों की महफ़िल बुलाने की ख़ातिर
ज़मीं आसमां तक उछलने लगी है।

ग़मों की रहबरी करनी पड़ेगी

ग़मों की रहबरी करनी पड़ेगी
खुशी की चौकसी करनी पड़ेगी।

करोगे मुझसे यारो दोस्ती तो
किसी से दुश्मनी करनी पड़ेगी।

ज़माने को जो पढ़ना चाहते हैं
उन्हें आवारगी करनी पड़ेगी।

यक़ीनन कल हमारा होगा लेकिन
अभी फ़ाक़ाकशी करनी पड़ेगी।

हवन के सुख से जिस दिन भी जलोगे
दुखों की आरती करनी पड़ेगी।

नहीं समझोगे साज़िश क़ातिलों की
तो तुमको खुदकुशी करनी पड़ेगी।

चलो अब अपना-अपना घर जला दें
इसी से रौशनी करनी पड़ेगी।

दुआ सबसे बड़ी गर चाहते हो
तो दिल की बन्दगी करनी पड़ेगी।

खुद को खो दें और फिर ढूंढा करें 

खुद को खो दें और फिर ढूंढा करें
खेल ऐसा भी कभी खेला करें।

यूँ ग़ज़ल के शेर को समझा करें
चुप रहें और देर तक रोया करें।

याद तो अश्क़ों का कमरा है जनाब
आप इसको रोज़ मत खोला करें।

अब तो बिकने लग गये एहसास भी
तोलकर और नापकर बोला करें।

कल बड़े होकर सहारा देंगे ये
दर्द बच्चों की तरह पाला करें।

बस दुआओं ने किया हमको खराब
आप देकर बद्दुआ अच्छा करें।

आ के वो अंदर हमारे बस गये
अब भला कैसे उन्हें सजदा करें।

मिरा साहस अचानक खो गया है 

मिरा साहस अचानक खो गया है
रगों का खून पानी हो गया है।

कहीं से दूध थोड़ा-सा भी लाओ
ये बच्चा रोते-रोते सो गया है।

बड़े आराम से सब लड़ पड़ेंगे
वो नफ़रत प्यार से यूँ बो रहा है।

दयारे-इश्क़ में क्या है कि यारो
नहीं लौटा अभी तक जो गया है।

सितमगर सोच ले क्या होगा तेरा
वो खूं से अपनी आंखें धो गया है।

पता सच का नहीं चल पायेगा अब
कि बनकर झूठ ही सच हो गया है।

दबा है खुद के वजनों से वही जो
हमें कंधों पे अपने धो रहा है।

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