कृष्णमोहन झा की रचनाएँ

हिजड़े-1 

कहना मुश्किल है कि वे कहाँ से आते हैं

खुद जिन्होंने उन्हें पैदा किया
ठीक से वे भी नहीं जानते उनके बारे में

ज़्यादा से ज़्यादा
पारे की तरह गाढे क्षणों की कुछ स्मृतियाँ हैं उनके पास
जिनकी लताएँ फैली हुई हैं
उनकी असंख्य रातों में

लेकिन अब
जबकि एक अप्रत्याशित विस्फोट की तरह
वे क्षण बिखरे हुए हैं उनके सामने
यह जानकर हतप्रभ और अवाक हैं वे
कि उनके प्रेम का परिणाम इतना भयानक हो सकता है

लेकिन यह कौन कह सकता है
कि सचमुच उनके वे क्षण थे
प्रणति और प्रेम के?

क्या उनके पिताओं ने
पराजय और ग्लानि के किसी खास क्षण में किया था
उनकी माँओं का संसर्ग?

क्या उनकी माँओं की ठिठुरती आत्मा ने
कपड़े की तरह अपने जिस्म को उतारकर
अपने-अपने अनचाहे मर्दों को कर दिया था सुपुर्द?

क्या उनके जन्म से भी पहले
गर्भ में ही किसी ने कर लिया उनके जीवन का आखेट?

हिजड़े-2 

वासना की एक विराट गंगा बहती है इस धरती पर
जिसकी शीतलता से तिरस्कृत वे
अपने रेत में खड़े-खड़े
सूखे ताड़-वृक्ष की तरह अनवरत झरझराते रहते हैं

संतूर के स्वर जैसा ही
उनकी चारो ओर
अनुराग की एक अदृश्य वर्षा होती है निरंतर
जिसे पकड़ने की कोशिश में
वे और कातर और निरीह होते जाते हैं

अंतरंगता के सारे शब्द और सभी दृश्य
बार-बार उन्हें एक ही निष्कर्ष पर लाते हैं
कि जो कुछ उनकी समझ में नहीं आता
यह दुनिया शायद उसी को कहती है प्यार

लेकिन यह प्यार है क्या?

क्या वह बर्फ़ की तरह ठंडा होता है?
या होता है आग की तरह गरम?
क्या वह समंदर की तरह गहरा होता है?
या होता है आकाश की तरह अनंत?
क्या वह कोई विस्फोट है
जिसके धमाके में आदमी बेआवाज़ थरथराता है?
क्या प्यार कोई स्फोट है
जिसे कोई-कोई ही सुन पाता है?

इस तरह का हरेक प्रश्न
एक भारी पत्थर है उनकी गर्दन में बँधा हुआ
इस तरह का हरेक क्षण ऐसी भीषण दुर्घटना है
कि उनकी गालियों और तालियों से भी उड़ते हैं खून के छींटे

और यह जो गाते-बजाते ऊधम मचाते
हर चौक-चौराहे पर
वे उठा लेते हैं अपने कपड़े ऊपर
दरअसल वह उनकी अभद्रता नहीं
उस ईश्वर से प्रतिशोध लेने का उनका एक तरीका है
जिसने उन्हें बनाया है
या फिर नहीं बनाया

जहाज़ का पंछी

जैसे जहाज़ का पंछी
अनंत से हारकर
फिर लौट आता है जहाज़ पर
इस जीवन के विषन्न पठार पर भटकता हुआ मैं
फिर तुम्हारे पास लौट आया हूँ

स्मृतियाँ भाग रही हैं पीछे की तरफ़
समय दौड़ रहा आगे धप्-धप्
और बीच में प्रकंपित मैं
अपने छ्लछ्ल हृदय और अश्रुसिक्त चेहरे के साथ
तुम्हारी गोद में ऐसे झुका हूँ
जैसे बहते हुए पानी में पेड़ों के प्रतिबिम्ब थरथराते हैं…

नहीं
दुःख कतई नहीं है यह
और कहना मुश्किल है कि यही सुख है
इन दोनों से परे
पारे की तरह गाढ़ा और चमकदार
यह कोई और ही क्षण है
जिससे गुजरते हुए मैं अनजाने ही अमर हो रहा हूँ…

अकेले ही नहीं 

मैं उन कहावतों और दंतकथाओं को नहीं मानता
कि अपनी अंतिम यात्रा में आदमी
कुछ भी नहीं ले जाता अपने साथ

बड़े जतन से जो पृथ्वी
उसे गढकर बनाती है आदमी
जो नदियाँ उसे सजल करती है
जो समय
उसकी देह पर नक्काशी करता है दिन-रात
वह कैसे जाने दे सकता है उसे
एकदम अकेला?

जब पूरी दुनिया
नींद के मेले में रहती है व्यस्त
पृथ्वी का एक कण
चुपके से हो लेता है आदमी के साथ
जब सारी नदियाँ
असीम से मिलने को आतुर रहती हैं
एक अक्षत बूँद
धारा से चुपचाप अलग हो जाती है
जब लोग समझते हैं
कि समय
कहीं और गया होगा किसी को रेतने
अदृश्य रूप से एक मूर्तिकार खड़ा रहता है
आदमी की प्रतीक्षा में।

हरेक आदमी ले जाता है अपने साथ
साँस भर ताप और जीभ भर स्वाद
ओस के गिरने की आहट जितना स्वर
दूब की एक पत्ती की हरियाली जितनी गंध
बिटिया की तुतलाहट सुनने का सुख
जीवन की कुछ खरोंचें,थोड़े दुःख
आदमी ज़रूर ले जाता है अपने साथ-साथ।

मैं भी ले जाऊँगा अपने साथ
कलम की निब भर धूप
आँख भर जल
नाखून भर मिट्टी और हथेली भर आकाश
अन्यथा मेरे पास वह कौन सी चीज़ बची रहेगी
कि दूसरी दुनिया मुझे पृथ्वी की संतति कहेगी!

उसी का समाहार

अगर शहर में होता
तो शायद उधर ध्यान ही नहीं जाता
मगर यह
शहर के कहर से दूर विश्वविद्यालय का परिसर था
जहाँ चाय-बागान से छलकती आती हुई अबाध हरियाली
समूचे परिदृश्य को
स्निग्ध स्पर्श में बदल रही थी
और वहीं पर यह अभूतपूर्व घटना
चुपके से
आकार ले रही थी…

दरअसल हुआ यह था
कि क्वार्टर की ओर जानेवाली खुली सड़क के किनारे
एक पेड़ था
जिसके नीचे एक आदमी खड़ा था

पहली नज़र में
विह्वल करने वाला ही दृश्य था यह
क्योंकि आदमी के हाथ में कुल्हाड़ी नहीं थी
और उसे देखने से लगता था
कि सुबह का भूला शाम को घर लौट आया है…

कि तभी
उसके पौरुष से
एक धार सहसा उछली
और उसके साथ रिंग-टोन बजने लगा

यह एक नए किस्म का यथार्थ था
जिसके सामने मैं खड़ा था
निहत्था
अलबत्ता घटना एक ही थी
पर सत्य थे कई

पहला सत्य कहता था
कि आदमी का उमड़कर बाहर आ रहा है कुछ
इसलिए बज रहा है
दूसरा सत्य कहता था कि वह बज रहा है
इसलिए उससे फूट रही है जलधारा
तीसरा सत्य कहता था
कि वह वृक्ष को सींच रहा है
और चौथे सत्य को कहना था
कि यहाँ कर्ता नहीं है कोई
बस कुछ हो रहा है…

और जो कुछ हो रहा था
यह मंत्र है उसीका समाहार-

सोने की छुच्छी, रूपा की धार।
धरती माता, नमस्कार॥

पर्यटन 

इतनी तेज़ रफ़्तार से चल रही यह दुनिया
इतनी जल्दी-जल्दी
अपने रंग बदल रही यह दुनिया
कि सुबह जगने के बाद
पिछली रात का सोना भी
लगता है समय की पटरी से उतर जाना

रोज़ दिनारम्भ से पहले
न किसी से कुछ कहना न किसी की सुनना
एक कप चाय के सहारे
घंटा आधा घंटा मेरा चुप रहना
बेतहाशा भागती हुई इस दुनिया के साथ
एक काम चलाऊ रिश्ता बनाने के प्रयास हैं मात्र

यों मैं जानता हूँ
कि मेरी गाड़ी छूट चुकी है पिछली रात को ही
मुझे पता है कि मेरे लिए कोई आरक्षित सीट नहीं
पर आदतन यों ही
रोज़ सुबह के स्टेशन पर खड़ा होकर
मैं करता हूँ उसकी प्रतीक्षा

रोज़-रोज़ की यह प्रतीक्षा
मेरे घर से शहर की ओर जानेवाली एक बैलगाड़ी का नाम है
जिस पर मैं अपने बाल-बच्चे कपड़ा-बस्तर बर्तन-बासन
लस्तम-पस्तम के साथ सवार होकर
जीवन के पर्यटन पर निकला हूँ

गड़ेरिया

कवि नागार्जुन को याद करते हुए

हवा पानी और आकाश की तरह
दिख सकता है कहीं भी वह

यानी वहाँ भी
जहाँ उसके होने की संभावना सबसे कम है

अपनी आत्मा को तुम अगर
अंदर से बाहर की ओर उलट दो
तो उसके उजड़े हुए वन में तुम्हें वह
एक गाछ के नीचे बैठा दिखेगा निराकांक्ष
अपनी लाठी बजाता हुआ अपनी भेड़ें चराता हुआ…

लेकिन उसे जाने दो
तुम तो आत्मा पर विश्वास नहीं करते
कहते हो कि विज्ञान प्रमाणित नहीं करता उसे

शायद ठीक कहते हो तुम

गड़ेरिये को देखने से बहुत पहले
गर्भ में ही तुम खो चुके अपना आत्म
इसलिए अब धूल की तरह
यहाँ –वहाँ उड़ते फिरते हो…

लेकिन यह
हवा-पानी और आसमान की तरह सच है
कि अपनी भेड़ों से चुपचाप बतियाता हुआ
कहीं भी दिख सकता है वह

सिर्फ गिरिडीह में नहीं
अलवर में भी
रतलाम में ही नहीं
चंडीगढ़ में भी
यहाँ तक कि हयात के सामने रिंगरोड पर भी
अपनी भेड़ों को ढूँढता
और नदियों को पुकारता हुआ
अपने वन के लिए रोता
और ॠतुओं के लिए बिसूरता हुआ दिख सकता है वह

लेकिन तुम उसे देखते कहाँ हो

तुम्हारे नगर की छत से जब उठने लगती है
उसकी भेड़ के गोश्त की गंध
एक अबूझ ज्वरग्रस्त पीड़ा में वह बड़बड़ाने लगता है…

नहीं, वह पागल नहीं है
न जाने इतिहास के किस अध्याय से
हाँका लगाकर लाया हुआ कस्तूरी मृग है वह
और उसका अपराध उसकी निष्कवच मौलिकता है

सात किवाड़ों के भीतर
जब तुम्हारा नगर डूब जाता है
अपने वांछित अंधकार में
अपनी अटूट यातना के थरथर प्रकाश में वह
एक अभिशप्त देवदूत की तरह सड़क पर भटकता रहता है

देह तो आख़िर 

देह तो आखिर देह ही है

कौन नहीं जानता
पुरुष के शरीर की बनावट
कौन स्त्री-देह की संरचना से है अनभिज्ञ

लेकिन आजकल जितनी दूर तक नजर जाती है
एक प्रचंड आक्रमण की तरह
देह ही देह नजर आती है

कोई लय नहीं
कोई कोमलता नहीं
ह्रदय के सबसे प्राचीन तट पर
किसी पद-चिह्न को सँजो रखने की विकलता नहीं

देह से परे
किसी अज्ञात आलोक के स्पर्श के लिए
कोई सपना नहीं
ओस में भींगे फूल की तरह
प्रेम से भारी होकर
घास के आगे झुक जाने की कामना नहीं

रेस्त्राँ से लेकर
रूम तक जाने में जितना समय लगता है
अगर कह सकते हैं
तो उतना ही बचा है हमारे युग में
रोमांस

नदी-घाटी-सभ्यता

जब भी नदी में उतरता हूँ
इस दुनिया की
सबसे प्राचीन सड़क पर चलने की उत्तेजना से भर जाता हूँ

मेरी स्मृति में
धीरे-धीरे उभरने लगता है
अपने अभेद्य रहस्य में डूबा हुआ जंगल

धीमे-धीमे…
मुझे घेरने लगती है
किसी अदृश्य सरिसृप के रेंगने की सरसराहट

मुझे याद आते हैं
झुंड में पानी पीते हुए पशुओं के
थरथराते प्रतिबिम्ब
और उनके पीछे
गीली मिट्टी पर बाघ के पंजों के निशान

मुझे सुनाई पड़ती है
कोहरे में विलीन डोंगियों की छपछपाहट
और तट पर दिखाई पड़ती है
छाल और खाल में लिपटे हुए लोगों की चहल-पहल
उठा-पटक

मुझे नदियों के प्रवाहित इतिहास में मिलती है
गुफाओं के चित्रलिखित स्वप्न से फूटकर
बाहर भागती आती हुई
इस जीवन की आदि नदी-कथा

और इसके गर्भ से डूबी हुईं अस्थियाँ कह्ती हैं
बीते समय की अखंडित व्यथा

मिट्टी और पानी से जन्म लेते हुए
मुझे दिखते हैं शब्द
घास की तरह लहलहाती हुई दिखती है भाषा
और अपनी प्रत्येक परिभाषा को तोड़कर
अन्ततः बाहर आता हुआ दिखता है मनुष्य

लेकिन आश्चर्य है
कि एक दिन यही मनुष्य
अपने रक्त से नदियों को निर्वासित कर देता है
और इस जीवन के आदिस्रोत से विछिन्न
अपना-अपना ईश्वर गढ़ लेता है

ठीक यहीं से आरंभ होता है
विस्मरण
का
इतिहास
यहीं आकर एक सभ्यता दम तोड़ देती है
यहीं से शुरू होते हैं आत्मघाती हमले
यहीं आकर नदियाँ
अपनी धारा मोड़ लेती हैं

यहाँ से जल-कथाएँ अपने उदगम में लौट जाती हैं।अनाथ जल-
पक्षी चले जाते हैं परदेस।वनस्पति की अनेक प्रजातियाँ ख़त्म
हो जाती हैं। सूखने लगते हैं पेड़। लोकगीत के हरित-प्रदेश में
धूल उड़ने लगती है। भूसे की तरह झड़ने लगते हैं शब्द और
मर जाता है भाषा का कवित्व।अब भग्न हृदय पानी के लिए
छटपटाने लगता है।पूज़ाघरों में लग जाता है नारियल का ढ़ेर
।मंत्र बन जाते हैं शोर। बीमार लोगों की बाँह पर ताबीज बँध
जाती है।मुक्ति के विभिन्न मॉडलों से भर जाता है बाज़ार और
हरेक चौराहे पर ईश्वर बिकने लगता है।

लेकिन
जो एक दहकते हुए प्रश्न को अपने सीने में भरकर
उस सत्ता को लाँघकर
बहुत पहले ही निकल चुके बाहर
कहाँ मिलेगा अब
उनके तपते शरीर को शीतल स्पर्श
कहाँ मिलेगा उनके व्याकुल हृदय को अब
एकमात्र आश्रय

ख़ैर
चाहे नदी-घाटी-सभ्यता की प्रेरणा नहीं
उस तरल आश्चर्य की स्मृति ही सही
मगर वह है मेरे भीतर पूरी तरह से जीवित

मैं उसकी हरेक बूँद के सामने अपना मस्तक झुकाता हूँ।

मिट्टी का बर्तन

मैं नहीं कहूँगा कि फिर लौटकर आऊँगा
क्योंकि मैं कहीं नहीं जाऊँगा

कोहरे के उस पार
शायद ही भाषा का कोई जीवन हो
इसलिए मेरे उच्चरित शब्द
यहीं
कार्तिक की भोर में
धान के पत्तों से टपकेंगे ठोप-ठोप

मेरी कामनाएँ
मेरे विगत अश्रु और पसीने के साथ
दुःख की इन्हीं घाटियों से उठेंगी ऊपर
और जहाँ मैंने जन्म लिया
उसके विदग्ध आकाश में फैल जाएँगी
बादल बनकर

मेरी आत्मा और अस्थियों में रचे-बसे दृश्य
इस गर्द-गुबार इस खेत-खलिहान
इस घर-द्वार में
अपना मर्म खोजने बार-बार आएँगे
इनके बाहर कहाँ पाएंगे वे अर्थ
भला कहाँ जाएँगे

जाना यदि संभव भी हुआ
तो शब्द और दृश्य और कामना के बिना
क्या और कितना बच पाऊँगा
कि उसे कहा जा सकेगा जाना

आया हूँ तो यहीं रहूँगा –

आषाढ़ की इस बारिश में
धरती के उच्छवास से उठनेवाली अविरल गंध में

खपरैल के इस अँधेरे घर में
रोज़ दुपहर को लग जानेवाले
सूर्य के किरण-स्तंभ में

चनके हुए इस दर्पण पर
बार-बार आकर
चुपचाप सो जानेवाली धूल के एक-एक कण में

आया हूँ तो यहीं रहूँगा
मैं कहीं नहीं जाऊँगा

फ़र्क पड़ता है

सिर्फ़ बस्ती के उजड़ने से नहीं
सिर्फ़ आदमी के मरने से नहीं
सिर्फ़ गाछ के उखड़ने से नहीं
एक पत्ती के झड़ने से भी फ़र्क पड़ता है

पुकार

यदि ठीक से पुकारो
तो चीज़ें फिर आ सकती हैं तुम्हारे पास

यह जो अवकाश
तुम्हारे विगत और वर्तमान के बीच
एक मरुथल सा फैला हुआ है
( तुम्हारे विस्मरण से
तुम्हारा आत्म जो इस तरह मैला हुआ है )
वह कुछ और नहीं
शब्द और अर्थ के बीच की दूरी है केवल
विकलता के सबसे गहन क्षण में जिसे
एक आरक्त पुकार से किया जा सकता है तय

शर्त सिर्फ़ यह है
कि उसे
आकांक्षा की अंतिम छोर पर जाकर पुकारा जाय

एक दिन
जब मैं अपनी भाषा के बन में
खोए हुए एक शब्द के लिए भटक रहा था
यहाँ से
वहाँ
और सोच नहीं पा रहा था कि जाऊँ कहाँ
कि अचानक
असंख्य रन्ध्रों से मुझे फोड़ती हुई
ज्वार की तरह एक पुकार निकली-
जीतपुर!
और मैंने पाया कि अर्थ से डबडबाया हुआ
पके जामुन की तरह भीगा हुआ एक शब्द
अपने डैने फैलाए हुए
मेरी जीभ पर उतर आया है…

ऐसा ही एक और वाकया है
जब शहर से मैं
छोड़े गए तीर सा लौट रहा था अपने घर
और भरी हुई स्मृतियों के साथ
सूखी नदी पार कर रहा था
तब अपनी आँखें बन्द करते हुए मैंने
मन ही मन ज़ोर से पुकारा बिछुड़े हुए दोस्तों के नाम
कि रेत में खोए हुए जिए हुए किस्से तमाम
नाव की चोट बनकर
मेरे घुटनों में कचकने लगे
और मैंने देखा-
धूल उड़ाते शोर मचाते
चालीस बरस पुराने बच्चों को अपने साथ
दौड़कर अपनी ही तरफ आते हुए…

अपने अनुभव से जानता हूँ मैं
कि जिस तरह लोग
दरवाजे पर होनेवाले दस्तक को ही नहीं
ख़ुद अपनी आवाज को भी अनसुना कर देते हैं
चीज़ें उस तरह सुनना बन्द नहीं करतीं
बल्कि वे
हमारी विस्मृति की ओट में बैठी हुईं
हर सच्ची पुकार के लिए उत्कंठित रहती हैं

उनकी अपेक्षा हमसे अगर कुछ है
तो वह यह
कि जब भी पुकारा जाय उन्हें
सही समय पर सही नाम से पुकारा जाय

एक अदृश्य हाथ से भयभीत
रात भर दड़बे में छटपटाता हुआ मुर्गा
जब ओस से भीगी हुई धरती को पुकारता है
तो अगले दिन के शोरबे और स्वाद को निरस्त करता हुआ
एक विस्फोट की तरह प्रकट होता है सूर्य

जब कुत्ते की जीभ से
टप्-टप् चू रहा होता है दोपहर का बुख़ार
तब फटे होंठ सूखे कंठ और सूनी आँखों की पुकार पर
वृक्षों को हहराती पत्तों की कलीन बिछाती धूल की पतंग उड़ाती हुई
एक जादूगरनी की तरह प्रकट होती है हवा

जब दुःख में आकंठ डूबा रहता है तन-मन
जब ख़ुद जीना बन जाता
मृत्यु का तर्पण
तब एक धधकती पुकार ही फिर से संभव करती है वह क्षण
जब जीने का मकसद
मरने के कारण में मिल जाता है

यद्यपि मुझे पता है
कि अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए
फिलहाल कुछ भी नहीं है मेरे पास
लेकिन मेरे अन्तःकरण के जल में झिलमिलाता है
एक छोटा सा विश्वास
कि जिन्हें हम कहते हैं चीज़ें
और जिसके प्रभामय स्पर्श के लिए मर-मर कर जीते हैं
पुकार हैं वे-
उत्कटता के सघनतम क्षणों में
हमारे रक्त से पैदा हुए असाध्य अर्थों की पुकार

और जिसे हम ईश्वर के नाम से पुकारते हैं बार-बार
वस्तुतः इन्हीं पुकारों का एक विराट समुच्चय है वह
जिसके सुमिरन के लिए लिखी जाती हैं कविताएँ
जिसके आवाहन के लिए किया जाता है प्रेम
और जिसे पाने के लिए प्राण दिए जाते हैं

तुम्हें मुक्त करता हूँ 

मैं पत्थर छूता हूँ
तो मुझे उन लोगों के ज़ख्म दिखते हैं
जिनकी तड़प में वे पत्थर बने

मैं छूता हूँ माटी
तो मुझे पृथ्वी की त्वचा से लिपटी
विलीन फूलों की महक आती है

मैं पेड़ छूता हूँ
तो मुझे क्षितिज में दौड़ने को बेकल
नदियों के पदचाप सुनाई पड़ते हैं

और आसमान को देखते ही
वह सनसनाता तीर मुझे चीरता हुआ निकल जाता है
जो तुम्हारे पीठ से जन्मा है

मेरे आसपास सन्नाटे को बजने दो
और चली जाओ
यदि मिली
तो अपनी इसी दुनिया में मिलेगी मुझे मुक्ति
तुमसे अब कुछ भी कहने का
कोई मतलब नहीं है
सिवा इसके
कि मैं तुम्हें मुक्त करता हूँ …

मेरी त्वचा और आँखों से
अपने तन के पराग बुहार ले जाओ

खंगाल ले जाओ
मुझमें जहाँ भी बची है तुम्हारे नाम की आहट

युगों की बुनी प्यास की चादर
मुझसे उतार ले जाओ

एक सार्थक जीवन के लिए
इतना दुःख कुछ कम नहीं हैं…

नहीं तो ऐसा करो 

विवशता की अलगनी पर फैला हुआ हूँ
कपड़े की तरह समेट कर रख लो
अपने संसर्ग में

धागे से छिटके मूँगे की तरह
मैं बिखरा हुआ हूँ
यहाँ
वहाँ
आओ, बटोर लो मुझे

चुल्लूभर पानी और मुट्ठीभर धूल का बना
नाज़ुक खिलौना हूँ मैं
अपने एकांत में मुझे कर लो शरीक

यह पत्तियों के झड़ने का मौसम है
सन्नाटे की गूँज में जंगल डूब रहा है
डूब रहा पंखों का आलोक
उदासी का छाता बेरोक तन रहा है
एक सनसनाहट दौड़ रही है
चारो ओर
कोई अदृश्य धुनकिया मुझे लगातार धुन रहा है…

तुम्हें याद है वह दिन
जब क्षितिज का शामियाना टप्-टप् चू रहा था-
तुमसे अलग होते हुए मैं भर गया था आकंठ
और डर रहा था
तब तुमने डबडबाते हुए कहा था-
“सुनो,मेरी देह और मेरी आत्मा में छुप जाओ !”

उस दिन
मैं तुमसे कुछ न कह पाया था
लेकिन इतना जान गया था
कि एक दिन
एक पल के लिए जब
पृथ्वी की तमाम नदियाँ चुपके से मिली होंगी
तब हुआ होगा तुम्हारा जन्म

तुम्हारे संसर्ग में एक जादू है…

जादूगरनी
यह लो एक तुलसी-दल
इसे मंत्रसिक्त कर मेरे कान में रख दो
सुग्गा बनकर अब मैं
किसी वसंत में उड़ जाना चाहता हूँ …

नहीं तो किसी फूल का नाम लेता हूँ
झट से मुझे तितली बना दो
और अपने ख़ाब में कर लो जज़्ब

नहीं तो ऐसा करो
मुझे पीसकर हवा में उड़ा डालो
और फिर अपने गर्भ में धारण कर लो
अगली बार मैं तुम्हारी देह से जन्म लेना चाहता हूँ

महानगर में चाँद

महानगर में चाँद को देखकर
मुझे चाँद पर रोना आता है
और चाँद को रोना आता है इस हाल में मुझे पाकर

लगता है
पिछले जनम की बात है यह
जब कातिक की साँझ या बैसाख की रात में
चाँद और मैं
आँगन से दालान
और दलान से आँगन
इस प्रतियोगिता में भागते थे
कि देखें कौन पहुँचता है पहले
(और मैं हर बार हार जाता था उससे
क्योंकि उम्र में मुझसे काफ़ी बड़ा था वह)

या फिर बाद के वर्षों में
जब मेरी हल्की-हल्की मूँछें निकल आईं थीं
और मेरे सीने में अक्सर दुखती हुई शाम
एक उदास आवारगी में लपेटकर मुझे
यहाँ-वहाँ चली जाती थी-
तब चाँद ही था मेरा सहचर
जिसके मुलायम कंधे पर मैं रखता था अपना सर

लेकिन कुछ ही वर्षों बाद
हम दोनो ऐसे बिछड़े
जैसे ब्याह के बाद बिछुड़ती हैं
गाँव की जुड़वाँ बहनें
और उसका समाचार तभी-तभी पाया
जब दुःख ने उसे घेरा
जब ग्रहण ने उसे खाया

…और आज
इतने युगों बाद
जब हम हैं आमने-सामने
तो कातरता से रूंधा है मेरा गला
कुछ कहते बने न कुछ सुनते बने

महानगर में
गुमशुदा की तलाश में निकले
बड़े भाई सा जर्जर चाँद
चाँद का धूसर विज्ञापन लगता है
बस की खिड़की से बार-बार बाहर झाँकता हुआ मैं
लगता हूँ एक खोए हुए आदमी का विज्ञापन
तथा धरती और आसमान से वंचित
त्रिशंकु की तरह
बीच में लटका हुआ
घर
देखो घर का कैसा विज्ञापन लगता है

तुम्हारा नाम 

चाँद से मैंने गज भर सूत लिया
सूरज से आग्रह किया
कि वह किरण की एक सुई मुझे दे
समुद्र से कुछ मोती उधार लिए मैंने
समय से निवेदन किया कि वह थिर हो जाए
एक पल के लिए…

पृथ्वी की तमाम मज़बूरियों को बुहारकर रख दिया
एक तरफ़ मैंने

एक दिन
इस ज़िन्दगी की स्याह चादर पर
कुछ इस तरह पिरोया तुम्हारा नाम

तुम उसे अब रोक नहीं सकते 

सिर्फ उसकी मुक्ति में संभव है तुम्हारी मुक्ति

इसलिए
कुछ आगे बढ़कर
तुम अगर उसे बुला नहीं सकते
तो कम से कम उसके रास्ते से हँट जाओ

इतने युगों से अपने यातना-घर बंद
अन्ततः जान गई है वह
कि चूल्हा बनने में निहित नहीं है उसकी सार्थकता
इसलिए उसकी देह पर अब तुम
अपनी उफनती इच्छाओं को और पका नहीं सकते

सदियों से अपने पदचिन्ह में अनवरत भटकते हुए
अन्ततः पता चल ही गया है उसे
कि तुम्हारी बनाई हुई तमाम नैतिकता
उसे शिकार बनाने का शास्त्र-सम्मत तरीका है सिर्फ़
इसलिए उसके निर्विकल्प समर्पण और सुन्दरता को
हिरण की खाल की तरह
अब तुम अपने बैठक में सजा नहीं सकते

बेशक किसी और ने नहीं
खुद को पहचानने की
स्वंय उसके दु:खों ने दी है उसे दृष्टि
कि पलंग के नीचे या टेबुल पर ग्लास में रखे पानी
और उसकी नियति के बीच-
धरती और आसमान का अन्तर है
इसलिए अब किसी भी क्षण
गटगट पीकर उसे तुम अपनी प्यास बुझा नहीं सकते

यों यह सच है
कि उसके भीतर एक विराट सरोवर है
और यह भी
कि उसकी प्रकृति में ही शुमार है समरपण
लेकिन इससे अलग भी है उसकी दुनिया
इसके परे भी है उसका जीवन

तुम्हारी अनिच्छा के बावजूद
खिड़कियों को भड़भड़ाती हुई बाहर की हवा
पहुँच चुकी है भीतर

फूल और वनस्पति की खुशबू ओढकर
मार्च महीने के आकाश उसके मस्तिष्क में छा गया है

उसके सीने में दिशाओं ने बना लिए हैं अपने घर
और उसके अभिशप्त घर के परित्यक्त शंख से निरंतर
सागर पुकार रहा है उसे

तुम उसे अब रोक नहीं सकते

पूजाघर से निकलनेवाली अगरबत्ती की मुलायम सुगन्ध की तरह
या एक अदृश्य धागे के सहारे एक अनिश्चित पथ पर अग्रसर
शास्त्रीय संगीत के आलाप की तरह नहीं
इस धरती पर होनेवाली सबसे पहली चीख की तरह
वह
घर से
निकल रही है बाहर…

बल्कि बाहर निकल चुकी है वह

देखो-
उसकी भाषा बदल गई है
उसके कपड़े बदल गए हैं
भंगिमाएँ भी बदल गई हैं उसकी

कल जिस बात को सुनते हुए उसकी आँखें झुक जाती थीं
आज उसे कहते हुए उसकी आँखें चमक रही हैं…

यों अब भी उसके पीछे
दर्द की रेखा-सा खिंचा सन्नाटा है
और आगे है मंडराती एक बेअन्त सनसनाहट
मगर इन दोनों को झंकृत करती
सदियों से दमित उसकी दुर्निवार इच्छाएँ हैं
जो अब बौर की तरह
उसकी बाँहों से भी फूट रही हैं…

कहना चाहिए कि उफनती हुई नदी है वह
और उसकी हसरत
इतमीनान के परिदृश्य को तहस-नहस करते हुए
अपने आगोश में सब कुछ को भरते हुए
उस आबदार तिलिस्म में उमड़कर डूब जाना है-
जिसका एक और नाम है समन्दर

तुलसी स्वीट्स

जो आदमी सामने कुर्सी पर बैठा रहता था कल तक
आज वह दीवार पर टँगा है

जबकि एक कोने में
पानी से भरा जग रखा है यथावत्
प्लेटों में
उसी तरह मिठाइयाँ सजी हुई हैं
सीढ़ियों के नीचे
पूर्ववत जमी है चप्पल-जूतों की धूल
और ऊपर किराएदार के गमलों में
ज्यों के त्यों लहक रहे हैं तरह-तरह के फूल…

लेकिन कल तक
जो आदमी सामने कुर्सी पर बैठा रहता था
आज वह
वहाँ
दीवार पर टँगा है

और दिनों की तरह ही
आज भी
इस सड़क से एक नहाई-धोई सुबह गुज़रेगी

आज भी पसीने से लथपथ एक दोपहर
अपना ठेला सड़क किनारे छोड़कर
किसी ट्रक या पेड़ की छाया में सुस्ताने बैठ जाएगा

आज फिर एक अपराह्न
किसी छोटी-मोटी गाड़ी पर
किसी प्रतिमा को स्थापित कर
प्रसाद लुटाते…
रंग-गुलाल उड़ाते प्रेमतला की और निकल जाएगा

आज फिर ताँत की साड़ी में लकदक एक शाम
नाक को रूमाल से ढँके
गली को पार करती हुई मुख्य सड़क पर आएगी
और किसी घरेलू कथा में व्यस्त
बराक मार्केट की और चली जाएगी…

आज फिर
धीरे-धीरे रिक्शे लौट जाएँगे अपने-अपने ठिकाने पर
एक-एक कर दुकनों के होंगे बंद शटर
फिर समूचा शहर
टीवी धारावाहिक और माछेर झोल में डूब जाएगा
और यह कोई नहीं जान पाएगा
कि कल तक
जो आदमी सामने कुर्सी पर बैठा रहता था- वहाँ
आज वह अपनी निरीह मुस्कुराहट में कैद
दीवार पर टँगा है

मुझे पता है
कुछ दिनों तक उसकी चप्पलें खोजेंगी उसे
कुछ समय के लिए उसका मौन भी हकलाएगा
कुछ अरसे तक उसकी प्यास तड़पेगी
कुछ रातों तक उसका तकिया भी कछमछाएगा

लेकिन एक दिन
उस माला की खुशबू भी
चुपके से छोड़कर चली जाएगी उसे
एक दिन उसका सामान बरामदे पे आ जाएगा
एक दिन उसका कमरा भी लग जाएगा किराए पर
एक दिन वह स्मृति से भी निकल जाएगा

वे तीन

ढेर सारे शब्द हैं उसके पास
एवं घटना
अथवा दुर्घटना को
जीवंत तथा प्रामाणिक बनाने के लिए
उसके पास उतनी ही चित्रात्मक और मुहावरेदार भाषा है
जितनी यह दुर्लभ समझ
कि सिर्फ़ वह जानता है कि हकीक़त क्या है

दूसरे के पास
खून में लिथड़ा हुआ चेहरा
और एक अटूट थरथराहट के सिवा
कहने के लिए कुछ भी शेष नहीं है
या तो जान बचाने में कट गई है उसकी जीभ
या वह बताने के काबिल ही न रहे
इसलिए काट ली गई है

जिसने सबसे निकट से जाना इस बर्बरता को
उसे ज्यों का त्यों बताने के लिए
अब हमारे बीच नहीं है

समाप्ति पर 

नहीं
समाप्ति पर नहीं
पार्टी तो असली रौनक पर आई है अब

जिनके पास दुख थे
वे दस्ताने पहनकर और बहाने ओढकर
अपनी-अपनी दुनिया में लौट चुके हैं

जिन्होंने गम मिटाने के लिए ग्लास उठाया था
वे तीसरे पैग पर लड़खड़ाने लगे
और पाँचवें पर आते-आते
रोते-बड़बड़ाते
अन्ततः
धराशायी हुए

लेकिन जिनकी पोर-पोर में भरा था सुख
और भीतर कहीं कोई पछतावा नहीं था
उन्होंने अपने आखेट का चयन कर लिया तुरन्त

और अब उन्हें
अर्जुन की तरह दिख रही
सिर्फ़ चिड़िया की आँख

और आँख अब है-
दहकते हुए एक चाकू का नाम
जो एक दूसरे के भीतर उतर रही है…

और होंठ
कथनी को करनी में बदल रहे जल्दी-जल्दी…

और जिह्वा ने
हाथों को अप्रासंगिक कर दिया है फौरन

और अब देह
अपनी आदिम आभा से उछलकर
पार्क में पत्थर की बेंच बन गई है

और शेष दुनिया सो रही है बदहवास…

और पेड़ की पत्तियों से
रात के आँसू गिर रहे हैं टप-टप…

और आसमान में डूब रहा है एक चाँद…
और ख़त्म हो रही है एक दुनिया…
और मर रहा है एक कवि…
और झड़ रहा है एक फूल……

इसका क्या मतलब है

ड्योढी के टाट पर
खीरे के पात की हरी छाँह के नीचे
मेरी बाट जोह रही होगी मेरी लालसा….

रात की शाखों से उतरकर रोज़
गिलहरी की तरह फुदकती हुई
मुझे खोज रही होगी मेरी नींद…

मेरे स्वप्न
मेरी अनुपस्थिति पर सर रखकर सो रहे होंगे
और मेरे हिस्से का आसमान
अनछुए ही धूसर हो रहा होगा…

इसका क्या मतलब है
कि जहाँ लौट पाना अब लगभग असंभव है
वहीं सबसे सुरक्षित है मेरा वजूद ?

नाम तो उसका ज़ाफ़र है

डाक्साब, नाम तो उसका ज़ाफ़र है
लेकिन इतना विनम्र
और इतना तेजस्वी है लड़का
कि लगता ही नहीं कि वह ज़ाफ़र है

कहीं भी देख ले
आकर सबसे पहले चरण स्पर्श करता है

और माँस-मछली के भक्षण की बात तो जाने दीजिए
कहता है कि अण्डे से भी बास आती है

और सर्वाधिक आश्चर्य की बात तो ये सुनिए-
अपने प्रस्तावित शोधोपाधि के लिए जो विषय चुना है उसने
वह कबीर या रसखान या जायसी नहीं
बल्कि अपने बाबा तुलसी हैं

…जी,जी हाँ…
बिल्कुल ठीक कहा आपने
कमल तो सदैव कीचड़ में ही खिलता है……

यात्रा-वृत्तांत

आते हुए…छूटते…जाते हुए सारे दृश्य
और सभी ध्वनियाँ
परस्पर गुँथकर
किसी कोलाज की तरह खिड़की पर जम गए हैं
और डब्बे में झूलती पिछली रात के सपने में
हवा में हहराते गाछ के नीचे
उस गर्भवती के लाल-टेस बच्चे को लेकर अभी भी चल रहा हूँ मैं
जिसकी ऊँघती देह
एक नाव बनकर रेल में हिल रही है…

एक परिचित अजनबी स्त्री के खून से उछलकर
फूल की एक बूँद
मेरी आत्मा में धूप की तरह उतर रही है धीरे-धीरे
जिसकी प्रभा में झिलमिलाता मेरी यात्रा का वैभव
पहली बार
इतना अधूरा और इतना पूरा हो रहा है
कि उसे कह पाने के लिए मैं छ्टपटाता हूँ
खुद को जोतता-कोड़ता हूँ
एक-एक सिरा अलगाता हूँ
और तब अपनी नश्वरता में यह भेद पाता हूँ
कि मैं आदमी नहीं
मेरे भीतर जो एक बच्चा बैठा है
उसकी उमगती हुई गेंद हूँ मैं

एक-एक साँस उछलकर जहाँ तक जिस तरह पहुँच पाता हूँ
वही है मेरी अधिकतम भाषा

मेरी इस भाषा के आसमान में उगा है
एक तारा अभी
इस भाषा की टहनी को छूती हुई अभी एक बयार गुजरी है
इस भाषा की देह से अभी उठी है वन-तुलसी की गंध
इस भाषा के रक्त से
अभी–अभी एक नन्हे हाथ की पुकार उभरी है
जिन्हें ठीक से सहने
और यथासंभव कहने के लिए मैं
डब्बे में ऊँघ रहे लोगों को बार-बार जगाने की कोशिश करता हूँ…
लेकिन कोई हिलता तक नहीं
असंख्य गाँवों अनगिनत नदियों और अखण्ड दृश्यों को छोड़ती
फफकती गाड़ी में
सिर्फ छूटी हुई यात्राएँ हिलती हैं…

नदी मतलब शोक-गीत-1

(प्रो० हेतुकर झा के लिए )

आखिर किस चीज़ से बनती है नदी ?

वह पृथ्वी की आग से बनती है
या किसी नक्षत्र की मनोकामना से ?
वह पैदा होती है ॠषियों के श्राप से अथवा मनुष्य के सपने से ?
वह प्रार्थना से अंकुरित होती है या याचना से जन्म लेती है ?
वह पीड़ा की सुपुत्री है या तृष्णा की समगोत्री ?

इस प्रसंग में मुझे नहीं है कुछ भी ज्ञात
मैं हूँ भई एक अदना सा कवि
जीवन के बहुतों सत्य से अज्ञात…

मुझे तो सिर्फ़ इतना पता है
कि नदी का नाम लेते ही
मेरी आत्मा छटपटाने लगती है
चाँछ में फँसी एक अकेली मछली-सी
सहसा मेरा ह्रदय पुरइन के पात में बदल जाता है
मेरी त्वचा चुनचुनाने लगती है
दुर्लभ हो चुके उस स्पर्श के लिए
मेरा यह थका हुआ शरीर अचानक एक डोंगी बन जाता है
मेरी रीढ़
सुदूर समुद्र के निनाद से हो जाती है उन्मत्त
मेरी धमनी में उधियाने लगता है आदिम यात्रा का जल-संगीत
और हजारों बरस पहले
मैं देखता हूँ खुद को जल-आख्यान के एक सजल पात्र के रूप में सक्रिय…

मूल मैथिली से अनुवाद : स्वयं कवि के द्वारा

नदी मतलब शोक-गीत-2

(प्रो० हेतुकर झा के लिए )

नदी का मतलब नहीं होता
अपने लम्बे घने केशों को छितराए एक विकट जादूगरनी
नदी मतलब नहीं होता उज्जर सफ़ेद रौशनी की एक विराट चादर
नदी मतलब नहीं होता गाछपात फूलपत्ती जंगल और पहाड़
नदी मतलब नहीं होता सृष्टि का कोई खास चमत्कार…

नदी का मतलब कतई नहीं होता
दुनिया की सबसे पहली और सबसे दुर्गम और सबसे उत्तेजक यात्रा
नदी मतलब नाव नदी मतलब प्यास नदी मतलब भोजन
नदी मतलब त्याग नदी मतलब उत्सर्ग नदी मतलब विसर्जन
नदी मतलब अविराम अविचल और अप्रतिहत जीवन नहीं होता अब…

अब नदी का मतलब होता है
नगरों-महानगरों का कचरा ढोनेवाला बहुत बड़ा नाला
अब नदी का मतलब होता है
स्याह बदबूदार लसलसाते पानी का मरियल प्रवाह
अब नदी का मतलब होता है
बुढ़ापे में तलाक मिले एक लाचार औरत की कराह…

नदी मतलब फिल्टर
नदी मतलब रंग-बिरंगे वॉटर-प्यूरिफायर और मिनरल वॉटर
नदी मतलब अरबों रुपए की सरकारी परियोजनाएँ
नदी मतलब सेमिनार नदी मतलब एन०जी०ओ०
नदी मतलब पुस्तिका नदी मतलब विमोचन
नदी मतलब बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की लपलपाती जिह्वा
नदी मतलब वर्ल्ड-बैंक नदी मतलब फोर्ड फाउण्डेशन…

मूल मैथिली से हिन्दी में अनुवाद : स्वयं कवि द्वारा

नदी मतलब शोक-गीत-3

(प्रो० हेतुकर झा के लिए )

नदी बदलती रहती है अपना रूप
नदी बदलती रहती है अपना रंग
अपना नाम भी बदलती रहती है नदी…

ऊर्ध्वमुखी होकर जब
प्रवाहित होती है अंतरिक्ष की ओर
तब वह रूपांतरित हो जाती है सहस्रबाहु असंख्य गाछ में
और हरियर-कचोर जंगल बन जाता है एक अभूतपूर्व समुद्र

नदी कभी रौशनी का इतना बड़ा बीज बन जाती है
और आसमान के अनादि-अनंत नीलवर्णी जोते हुए खेत में
पैदा होती है बनकर सूर्य

कई बार तो स्त्री बन जाती है नदी-
वह कुछ कहती नहीं है
सिर्फ़ सहती है
चुपचाप बहती है…

मूल मैथिली से हिन्दी में अनुवाद : स्वयं कवि द्वारा

नदी मतलब शोक-गीत-4

(प्रो० हेतुकर झा के लिए )

जैसे अपने जीवन से आजिज
जैसे लगातार पीढ़े से मार खाई हुई
और करछी से जलाई हुई
जैसे निरंतर यातना की भट्टी में सींझती और खून-पसीने में भींजती स्त्री
आखिर एक दिन
धतूरे का दाना चबा लेती है माहुर खा लेती है
या नहीं तो बिजली की धार की तरह चमकते गड़ाँसे को लेकर
किसी की कलाई उड़ा देती है
किसी की गरदन गिरा देती है
समूचे घर को भुजिया-भुजिया बना देती है
और अन्ततः सारी चीज़ों को छोड़कर चली जाती है बहुत दूर

ठीक उसी तरह
देखो उधर वह-
आधुनिक सभ्यता से प्रताड़ित नदी
जो कभी माँ की तरह वत्सला और गाय की तरह दुग्धवती थी-
घर-दुआर को अपने विकट उदर में लेकर
दीवाल गिराकर
एक-एक घर में पानी की आग लगाकर
गली-गली में मृत्यु की खलबली मचा कर
अन्ततः तुम्हारे नगर को तजकर जा रही रही है दूर…

मूल मैथिली से हिन्दी में अनुवाद : स्वयं कवि द्वारा

नदी मतलब शोक-गीत-5

जिस तरह पेड़-पौधे नहीं जाते
कटने के बाद अकेले
जिस तरह वृक्षविहीन धरती से
हकासे-पिआसे पखेरू अकेले नहीं जाते
उसी तरह नदी भी नहीं जाती सब कुछ को छोड़कर अकेले…

एक कटा हुआ वृक्ष
अपनी रक्तहीन पीड़ा में थरथराते
अनगिनत दोपहरों की छाया
तथा असंख्य पक्षियों के डीह-डाबर और गीत-नाद लेकर
आरा मशीन के ब्लैकहोल में बिला जाता है…

गाछ-पात से वंचित पंछी
सिर्फ धरती-आकाश को अपनी वेदना से सिहराए
अपने अदृश्य आँसुओं से
सिर्फ अंतरिक्ष के अर्थ को अंतरिक्ष से छुपाए नहीं होते विदा
वे अपने साथ भोर-साँझ की संगीत-सभा
और हरियाली की अलौकिक प्रभा लेकर उड़ जाते हैं…

अकेले नदी भी नहीं जाती
वह अपने साथ
लोक-गीत का विशाल भंडार
और किस्से-कहानियों का विराट संदूक दबाए
अपनी काया में जीवन का रहस्य और पूर्वजों की प्रार्थनाएँ छुपाए
अपने गर्भ में
आदिम मनुष्य के धधकते छन्द
और अलिखित इतिहास का अदृश्य दस्तावेज लिए चली जाती है…

मूल मैथिली से अनुवाद : स्वयं कवि द्वारा

नदी मतलब शोक-गीत-6 

अब वह सभ्यता के लैपटॉप पर एक मनोरम दृश्य में बदल गई है
अब वह लिविंगरूम की दीवाल पर आकर्षक फ्रेम में बह रही है…
फिल्मी परदे पर अब वह
बनकर छा गई है आसमानी रंग का एक तरल प्रवाह
रिकॉर्डित गीत-संगीत से निरंतर अब उसकी कलकल आवाज आ रही है…

अब यह जीवन हो गया है
ज़्यादा ठोस ज़्यादा चौकोर ज़्यादा व्यवस्थित
इतना व्यवस्थित कि डर लगता है उधर देखने से…

नपा प्रेम नपी घृणा नपा वात्सल्य नपी करुणा
नपी पीड़ा नपी कामना नपा संघर्ष नपी तृष्णा
नपा सुख नपा दुख नपी उपलब्धि नपी समृद्धि
नपी कला नपा साहित्य…

नपी-तुली
दुनिया के लोग
बरबस डूबे रहते हैं–
चाय-भुजिया-सीरियल में…
कोल्डड्रिंक-सॉफ्टड्रिंक-हार्डड्रिंक में…
टीवी-फ्रिज-वॉशिंगमशीन-माइक्रोवेव-होमथियेटर में…
बर्थडे-मैरेज़डे-मदर्सडे-फादर्सडे-चिल्ड्रेन्सडे-टीचर्सडे-हेल्थडे-ड्रायडे में…
लोन-फ्लैट-प्रॉपर्टी में…इन्श्योरेंस-म्यूचुअलफंड-शेयरमार्केट में…
और समझते हैं कि दुनिया पूर्ववत चल रही है

लेकिन पूर्ववत कैसे चल सकती है दुनिया!

पूर्ववत सिर्फ़ जन्म लेते हैं लोग
और पूर्ववत मरते हैं

जन्म और मृत्यु के बीच
पसरा रहता है एक अजेय असाध्य अपरिभाषित जीवन
उसे समझने की जितनी कोशिश करो
उतना ही वह अबूझ और असह्य होता जाता है…

दूरी को कम करने के किए जाते हैं जितने प्रयत्न
लोग एक दूसरे से उतना ही दूर होते जाते हैं
दुनिया में उतनी ही बढती जाती है अजनबी लोगों की संख्या
ईमानदार लोग उतने ही अकेले और विक्षिप्त होते जाते हैं
कृत्रिम उतना ही करता जाता है मौलिक को लज्जित
अभिव्यक्ति उतनी ही दुरूह होती जाती है…

और रूखी होती जाती है भाषा
और क्षणिक होता जाता है प्रेम
और नाटकीय होते जाते हैं सम्बंध
और हिंसक होती जाती है देह

अब लोग बोलते हैं तो उनके मुँह से झड़ता है भूसा
अब लोग रोते हैं तो उनकी आँखों से धूल उड़ती है…

मूल मैथिली से अनुवाद : स्वयं कवि द्वारा

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