कृष्ण कुमार ‘नाज़’ की रचनाएँ

वफ़ा भी, प्यार भी, नफरत भी, बदगुमानी भी 

वफ़ा भी, प्यार भी, नफरत भी, बदगुमानी भी
है सबकी तह में हक़ीक़त भी और कहानी भी

जलो तो यूँ कि हर इक सिम्त रोशनी हो जाय
बुझो तो यूँ कि न बाक़ी रहे निशानी भी

ये ज़िंदगी है कि शतरंज की कोई बाज़ी
ज़रा-सी चूक से पड़ती है मात खानी भी

किसी की जीत का मतलब हुआ किसी की हार
बड़ा अजीब तमाशा है ज़िंदगानी भी

उन आँसुओं का समंदर है मेरी आँखों में
जिन आँसुओं में है ठहराव भी, रवानी भी

दवा की फेंकी हुई ख़ाली शीशियों की तरह
है रास्तों की अमानत मेरी कहानी भी

महानगर है ये, सब कुछ यहाँ पे मुमकिन है
यहाँ बुढ़ापे-सी लगती है नौजवानी भी

हैं चंद रोज़ के मेहमान हम सभी ऐ ‘नाज़’
हमीं को करनी है ख़ुद अपनी मेज़बानी भी

जो ख़ुद उदास हो, वो क्या ख़ुशी लुटाएगा

जो ख़ुद उदास हो, वो क्या ख़ुशी लुटाएगा
बुझे दिये से दिया किस तरह जलाएगा

कमान ख़ुश है कि तीर उसका कामयाब रहा
मलाल भी है कि अब लौटकर न आएगा

वो बंद कमरे के गमले का फूल है यारो
वो मौसमों का भला हाल क्या बताएगा

मैं जानता हूँ, तेरे बाद मेरी आँखों में
बहुत दिनों तेरा अहसास झिलमिलाएगा

तुम उसको अपना समझ तो रहे हो ‘नाज़’ मगर
भरम, भरम है, किसी रोज़ टूट जाएगा

इक मुक़द्दर है कि अपना क़ौल बिसराता नहीं 

इक मुक़द्दर है कि अपना क़ौल बिसराता नहीं
और इक तू है कि वादे पर कभी आता नहीं

मुस्कराहट की रिदा ओढ़े हुए हूँ इसलिए
आइने को भी मैं चेह्रा अपना दिखलाता नहीं

छोड़ना क्या और अपनाना भी क्या उसका भला
जिसपे कोई हक़ नहीं, जिससे कोई नाता नहीं

ज़ह्न और दिल में ठनी है इन दिनों कुछ इस तरह
कोई भी इक-दूसरे को अब समझ पाता नहीं

कस रही है ख़ूब फ़िक़रे, कर रही है तंज़ भी
जिं़दगी तेरी इनायत से मैं घबराता नहीं

दोस्ती ही उससे अच्छी है न अच्छी दुश्मनी
फ़र्क़ अपने और पराये में जो कर पाता नहीं

तूने उसको भी मुहब्बत से लगाया है गले
वो, जिसे सारे जहाँ में कोई अपनाता नहीं

ख़्वाहिशों की ताजपोशी कर रहे हो ‘नाज़’ तुम
वरना इतनी देर तक कोई भी इतराता नहीं

बाद तुम्हारे सब अपनों के मनमाने व्यवहार हुए

बाद तुम्हारे सब अपनों के मनमाने व्यवहार हुए
मुस्कानें ही क्या, आँसू भी सालाना त्योहार हुए

आँखों में तूफ़ान मचा तो दामन की दरकार हुई
और जब दामन हाथ में आया, सब आँसू ख़ुद्दार हुए

पैसों के बदले बच्चों से माँग रहे हैं मुस्कानें
जैसे ये माँ-बाप न होकर, रिश्वत के बाज़ार हुए

घर में सबकी अपनी ख़्वाहिश, सबकी अपनी फ़रमाइश
आज हमें तनख़्वाह मिली है, हम भी इज़्ज़तदार हुए

सबकी नज़रों में तो अपने घर के मुखिया हैं अब भी
लेकिन बच्चों की नज़रों में हम बासी अख़बार हुए

झूठ पे सच की चादर डाले खेल रहे हैं अपना खेल
दोहरेपन को जीने वाले हम नक़ली किरदार हुए

चिंता, उलझन, दुख-सुख, नफ़रत, प्यार, वफ़ा, आँसू, मुस्कान
एक ज़रा-सी जान के देखो कितने हिस्सेदार हुए

जीत किसके लिए, हार किसके लिए 

जीत किसके लिए, हार किसके लिए
ज़िंदगीभर ये तकरार किसके लिए

जो भी आया है वो जायेगा एक दिन
फिर ये इतना अहंकार किसके लिए

तोड़ डाले तअल्लुक़ के बंधन तो फिर
जन्मदिन पर ये उपहार किसके लिए

पूछते हैं दियों से अँधेरे घने
रोशनी का पुरस्कार किसके लिए

ज़िंदगी तेरा कोई नहीं है तो फिर
कर रही है तू सिंगार किसके लिए

तेरा मक़सद है मुझको डुबोना अगर
फिर ये कश्ती, ये पतवार किसके लिए

एहसास की शिद्दत ही सिमट जाए तो अच्छा

एहसास की शिद्दत ही सिमट जाए तो अच्छा
ये रात भी आँखों ही में कट जाए तो अच्छा

कश्ती ने किनारे का पता ढूँढ लिया है
तूफ़ान से कहदो कि पलट जाए तो अच्छा

शाख़ों पे खिले फूल यही सोच रहे हैं
तितली जो कोई आके लिपट जाए तो अच्छा

जिस नींद की बाँहों में न तू हो, न तेरे ख़्वाब
वो नींद ही आँखों से उचट जाए तो अच्छा

अब तक तो मुक़द्दर ने मेरा साथ दिया है
बाक़ी भी अगर चैन से कट जाए तो अच्छा

ख़ुद से भी मुलाक़ात ज़रूरी है बहुत ‘नाज़’
यादों की घनी भीड़ जो छट जाए तो अच्छा

खींच लाता है समय उस मोड़ पर इंसान को 

खींच लाता है समय उस मोड़ पर इंसान को
दाँव पर यूँ ही नहीं रखता कोई ईमान को

हमने कब मायूस लौटाया किसी मेह्मान को
अपनी कश्ती अपने हाथों सौंप दी तूफ़ान को

जिसकी ख़ातिर आदमी कर लेता है ख़ुद को फ़ना
कितना मुश्किल है बचा पाना उसी पहचान को

फिर न रख पाएगा वो महफ़ूज़ क़दमों के निशाँ
साथ जब मिल जाएगा आँधी का रेगिस्तान को

ऐ मेरे अश्को! मुझे इक बार कह दो शुक्रिया
मार दी ठोकर तुम्हारे वास्ते मुस्कान को

ज़िंदगी तो ज़िंदगी है, ज़िंदगी की क्या बिसात
जो नज़रअंदाज़ कर दे मौत के फ़रमान को

जान ले लेगी किसी दिन बंद कमरे की घुटन
खोल दो खिड़की को, दरवाज़े को, रोशनदान को

तन-बदन ही क्या, सुलग उठता है मेरा रोम-रोम
ठेस लगती है किसी अपने से जब सम्मान को

क्या हुआ तुमको अगर चेहरे बदलना आ गया

क्या हुआ तुमको अगर चेहरे बदलना आ गया
हमको भी हालात के साँचे में ढलना आ गया

रोशनी के वास्ते धागे को जलते देखकर
ली नसीहत मोम ने उसको पिघलना आ गया

शुक्रिया ऎ दोस्तो, बेहद तुम्हारा शुक्रिया
सर झुकाकर जो मुझे रस्ते पे चलना आ गया

सरफिरी आँधी का थोड़ा-सा सहारा क्या मिला
धूल को इंसान के सर तक उछलना आ गया

बिछ गये फिर खु़द-बखु़द रस्तों में कितने ही गुलाब
जब हमें काँटों पे नंगे पाँव चलना आ गया

चाँद को छूने की कोशिश में तो नाकामी मिली
हाँ मगर, नादान बच्चे को उछलना आ गया

पहले बचपन, फिर जवानी, फिर बुढ़ापे के निशान
उम्र को भी देखिए कपड़े बदलना आ गया

राहत दो या उलझन दो

राहत दो या उलझन दो
ज़ह्न को कुछ तो ईंधन दो

घोर अँधेरा, तेज़ हवा
एक दिये के दुश्मन दो

आपस की नासमझी है
एक ही घर में आँगन दो

कितनी ख़ुश है नई दुल्हन
अबके बरस में सावन दो

आपस में खटकेंगे भी
गर हों घर में बर्तन दो

गिनलूँ मैं अपने भी दाग़
लाओ मुझको दरपन दो

लगा रक्खी है उसने भीड़ मज़हब की, सियासत की

लगा रक्खी है उसने भीड़ मज़हब की, सियासत की
मदारी है, भला समझेगा क्या क़ीमत मुहब्बत की

महल तो सबने देखा, नींव का पत्थर नहीं देखा
टिकी है ज़िंदगी जिस पर भरी-पूरी इमारत की

अजब इंसाफ़ है, मजबूर को मग़रूर कहते हो
चढ़ा रक्खी हैं तुमने ऐनकें आँखों पे नफ़रत की

हम अपनी आस्तीनों से ही आँखें पोंछ लेते हैं
हमारे आँसुओं ने कब किसी दामन की चाहत की

हमारे साथ हैं महकी हुई यादों के कुछ लश्कर
वो कुछ लमहे इबादत के, वो कुछ घड़ियाँ मुहब्बत की

वो चेहरे से ही मेरे दिल की हालत भाँप लेता है
ज़रूरत ही नहीं पड़ती कभी शिकवा-शिकायत की

डरी सहमी हुई सच्चाइयों के ज़र्द चेहरों पर
गवाही है सियासत की, इबारत है अदालत की

हैं अब तक याद हमको ‘नाज़’ वो बीती हुई घड़ियाँ
कभी तुमने शरारत की, कभी हमने शरारत की

झूठ है,छल है,कपट है,जंग है,तकरार है

झूठ है,छल है,कपट है,जंग है,तकरार है सोचता रहता हूँ अक्सर क्या यही संसार है

ज़हन से उलझा हुआ है मुद्दतों से इक सवाल आदमी सामान है या आदमी बाज़ार है

आज भी उससे तअल्लुक़ है उसी सूरत,मगर उसके मेरे बीच ख़ामोशी की इक दीवार है

इस तरक़्क़ी पर बहुत इतरा रहे हैं आज हम जूतियाँ सर पर रखी हैं पाँव में दस्तार है

इस बग़ीचे का मैं रखवाला हूँ,मालिक तो नहीं ये बग़ीचा फिर भी मेरे ख़ून से गुलज़ार है

बीच रस्ते से पलट जाना भी तो अच्छा नहीं अबके हिम्मत और करले,अबके बेड़ा पार है

उस किनारे किस तरह जा पाओगे ऐ ’नाज़’ तुम नाव में सूराख़ है और घुन लगी पतवार है

मैं तेरा अक्स हूँ तुझसे कभी जुदा ही नहीं

मैं तेरा अक्स हूँ, तुझसे कभी जुदा ही नहीं
ये बात और, तू आईना देखता ही नहीं

कोई सवाल जो तुझसे जुड़ा नहीं होता
मैं उस सवाल के बारे में सोचता ही नहीं

उन्हें ये ग़म है जो पाया था खो दिया सब कुछ
हमें ये दुख है कि कुछ भी कभी मिला ही नहीं

मैं अपनी ज़ात की तारीकियों से वाक़िफ़ हूँ
किसी चराग़ की लौ को कभी छुआ ही नहीं

बदल-बदल के वही तिश्नगी, वही सहरा
जनम-जनम का वही क़र्ज़ जो चुका ही नहीं

शिकस्त जिसको मिली हो क़दम-क़दम पर ‘नाज़’
उसे ये लगता है जैसे कहीं ख़ुदा ही नहीं

शाम का वक्त है शाखों को हिलाता क्यों है 

शाम का वक़्त है शाख़ों को हिलाता क्यों है
तू थके-माँदे परिंदों को उड़ाता क्यों है

स्वाद कैसा है पसीने का, ये मज़दूर से पूछ
छाँव में बैठ के अंदाज़ा लगाता क्यों है

मुझको सीने से लगाने में है तौहीन अगर
दोस्ती के लिये फिर हाथ बढ़ाता क्यों है

प्यार के रूप हैं सब, त्याग-तपस्या-पूजा
इनमें अंतर का कोई प्रश्न उठाता क्यों है

मुस्कराना है मेरे होंठों की आदत में शुमार
इसका मतलब मेरे सुख-दुख से लगाता क्यों है

भूल मत तेरी भी औलाद बड़ी होगी कभी
तू बुज़ुर्गों को खरी-खोटी सुनाता क्यों है

वक़्त को कौन भला रोक सका है पगले!
सूइयाँ घड़ियों की तू पीछे घुमाता क्यों है

जिसने तुझको कभी अपना नहीं समझा ऎ ‘नाज़’
हर घड़ी उसके लिये अश्क बहाता क्यों है

तरफ़दारी नहीं करते कभी हम उन मकानों की 

तरफ़दारी नहीं करते कभी हम उन मकानों की
छ्तें जिनकी हिमायत चाहती हों आसमानों की

ये कालोनी है या बेरोज़गारों की कोई मंडी
जिधर देखो क़तारें ही क़तारें हैं दुकानों की

मुरादाबाद में कारीगरी ढोता हुआ बचपन
लिये फिरता है साँसों में सियाही कारखा़नों की

उगा है फिर नया सूरज, दिशाएँ हो गईं रोशन
परिंदो! तुम भी अब तैयारियाँ कर लो उडा़नों की

न जाने कितनी तहज़ीबें बनीं और मिट गईं, लेकिन
मिसालें आज भी का़यम हैं उन गुज़रे ज़मानों की

तू जिस इंसाफ़ की देवी के आगे गिड़गिड़ाता है
वो तुझको न्याय क्या देगी, न आँखों की, न कानों की

तुम उसको बेवफ़ा ऎ ‘नाज़’ साबित कर न पाओगे
बड़ी लंबी-सी इक फ़हरिस्त है उस पर बहानों की

बस गया हो ज़हन में जैसे कोई डर आजकल 

बस गया हो ज़हन में जैसे कोई डर आजकल
सब इकट्ठा कर रहे हैं छत पे पत्थर आजकल

शहरभर की नालियाँ गिरती हैं जिस तालाब में
वो समझने लग गया खु़द को समंदर आजकल

फ़ाइलों का ढेर, वेतन में इज़ाफ़ा कुछ नहीं
हाँ, अगर बढ़ता है तो चश्मे का नंबर आजकल

कतरनें अख़बार की पढ़कर चले जाते हैं लोग
शायरी करने लगे मंचों पे हाकर आजकल

उग रही हैं सिर्फ़ नफ़रत की कटीली झाड़ियाँ
भाईचारे की ज़मीं कितनी है बंजर आजकल

‘नाज़’ मुझको हैं अँधेरे इसलिए बेहद अज़ीज़
अपनी परछाईं से लगता है बहुत डर आजकल

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