कैलाश झा ‘किंकर’ की रचनाएँ

भेलै केहन ससुरा

केहन हम्मर नैहर रहै
भेलै केहन ससुरा।

बूँदा-बूदी होत्तेॅ होय छै
कादऽ कैसन गाँव में
केना केॅ वियाह कैलन
बाबू ऐसन गाँव में

रोड छै नै बिजली
गेलै बीसवीं सदी
काटने आबै गाँव तरफ
गंगा जैसन नदी

बाँधै पर सँ गिरतें-पड़तें
पहुँचै कनियाँ-पूतरा।

सौंसे जिला हल्ला भेलै
गामऽ पर छै खतरा।

खेती-पत्ती की होतै
सौंसे गाँव बगीचा
आम अमरूद, केला-कटहल
काटै छै शरीफा

पान के दुकान छै नै
चाय के दुकान छै
बजबै सभ्भे गाल कहै
हमरऽ गाँव महान छै

डेहरी-डेहरी ताश खेलै
खाय छै भाँग-धथूरा।

लागौं तोरा चाहे जैसन
कहबौं साफ-सुथरा।

केहन हम्मर नैहर रहै
भेलै केहन ससुरा।

बकलेल

हम्मर बेटा छै बकलेल।
पेट में खर नै सिंग में तेल॥

माय कहलकै-हेरे लाल
आने जल्दी आटा-दाल
दाल के पैसा वें बचाय केॅ
किनने छै गमकौआ तेल।

कथी लेॅ घर में सब्जी आनतै
ऊ पैसा के गुटका फाँकतै
पान चिबैने ठोर रँगैने
साथी सब में करै कुलेल।

दूध उठौना देलक छोड़ाय
ऊ पैसा धोबी घर जाय
आयरन करीकेॅ पेंट-सर्ट में
खेलै छै ऊ क्रिकेट खेल

बल्हों हम कनियाँ करी देलियै
जोड़तें-जोड़तें आब बुढ़ैलियै
पत्नी के फरमाइस छोड़ी केॅ
छुच्छे फुटानी साँझ-सबेर।

दीवाली 

हमर दीया हुकहुकी पर, सगरो दीपऽ के माला छै।
सबके घऽर में दीवाली छै, हमरऽ घऽर दीवाला छै॥
हम्मर छोटका छौड़ा ऐलै
दौड़ल-दौड़ल हमरा पास
कपड़ा लत्ता आरो पटाखा
देलियै नै से बड़ा उदास

बिगड़ल छथनी लछमी जी त हमर फकीरी आला छै।
सबके घर में दीवाली छै, हमरऽ घऽर दीवाला छै॥
की कहौं हम घऽर के खिस्सा
विपदा हमरऽ भारी छै
केना करबै घऽर केॅ लछमी
चौखऽ छै नै केवाड़ी छै

एबो करथिन घुरिये जैथिन, हमरा कन नै ताला छै।
सबके घऽर में दीवाली छै, हमरऽ घऽर दीवाला छै॥

देखै छियै हमरऽ सन सन
आरो बहुत सन लोग छै
सभ्भे दिन सँ इहे गरीबी
बड़का भारी रोग छै

ओकरा सुख सँ नीन्द उड़ल छै, हमरा दुख सँ पाला छै।
सबके घर में दीवाली छै, हमरऽ घऽर दीवाला छै॥
हुसलै फेनू इहो दीवाली
लाबो हुक्का-पाती देॅ
संठी सँ उकिऐयै आब
अबकी ई सुकराती केॅ

लछमी जें लेब से लेॅ-लेॅ, हमर दरिद्री केबाला छै।
सबके घर में दीवाली छै, हमरऽ घऽर दीवाला छै॥

नाता टुटलै 

गुरु शिष्य के नाता टुटलै।
तहिये भाग्य विधाता रुठलै॥

गुरुवे सें गुरुवाय करै में
अक्षर-कटुआ आस लगैने
कथी लोॅ सीखतै बढ़तै आगू
बैठल छै ऊ जाल बिछैने

जेकरा नै कर्त्तव्य-बोध छै।
वू विरोधी बनी केॅ उठलै॥

चेलबा भस्मासुर भेॅ गेलै
भोला बाबा फेर में पड़लै
पार्वती के नीक बात पर
बर देॅ केॅ सब नियम टुटलै

कर्म करैवाला बर पैतै।
झूठा बर के वादा टुटलै॥

बच्चै में गुरुवैती सीखै
चेला-खुहरी कथी लेॅ बनतै
सीढ़ी-दर-सीढ़ी चढ़ै में
बेसी देरी कथी लेॅ लगतै

गाड़ी ओवर टेक करै में
ठेहुना टुटलै माथा फुटलै

बड़ऽ लकीर केॅ छोटऽ करै में
नीप-तोल लै ठेलम-ठेला
केकरै नै आबेॅ छोटऽ समझऽ
गुरुवे सब एक्को नै चेला

गुरुवो द्रोणाचार्य भेलऽ छै
ऐ चलतें ई रिस्ता बँटलै।

प्रेम-प्यार के बाते छोड़ऽ 

प्रेम-प्यार के बाते छोड़ऽ।

रूप के जे दीवाना भेलै
दर्दे दिल अफसाना भेलै
घऽर-बाहर सब दुश्मन ओकरऽ
ओकरे पर ई गाना भेलै

बहुत कहलियै हम्में ओकरा
नै नैना सें नैना जोड़ऽ।

लैला मजनूँ आबेॅ कहाँ छै
धोखा के बाजार लगै छै
दिल बहलाबै खातिर दुनियाँ
कटपिस आबेॅ प्यार करै छै

करथौं नै वें बियाह तोरा सँ
चाहे नाता कत्तो जोड़ऽ।

दिल तेॅ एक खिलौना भेलै
ओढ़ना आरु बिछौना भेलै
तीन बरस में फटथौं निश्चित
धोखा रूप सलोना भेलै

नै कानि-कानि केॅ लोर बहाबऽ
बल्हों नै तों माथा फोड़ऽ।

घऽर गृहस्थी बसबऽ पहिने
जा बियाही केॅ कनियाँ आनऽ
कमबऽ खा आ खुशी-खुशी सँ
एकेॅ बात हमरऽ तों मानऽ

पानी नीयन ढरकैवाला
दिशाहीन जजवाते छोड़ऽ।

बूढ़ऽ तेॅ जपाले होय छै

घरे-घऽर धमाले होय छै।
बूढ़ऽ तेॅ जपाले होय छै॥

बेटा-पोता खातिर मरलौं
बीज जेकां मिट्टी में सड़लौं
हरा-भरा अब सौंसे बगिया
लत्ती जेकां खूब पसरलौं

कि जन गेलियै अन्त समय में
बूढ़-पुरान पैमाले होय छै।

बनलऽ घर में घुसी गेलै
पेंसन लेली रुसी गेलै
बड़ा जतन सें फसल लगैलियै
साँसे खेत में भूसी भेलै

बूढ़ लेॅ देखऽ दलान में
खटियो ते कमाले होय छै।

कथी लेॅ कोय बूढ़ऽ के सुनतै
टहल-टिकोरा तनियों गुंनतै
भैयारी में झगड़ा करी केॅ
गड़लऽ मुर्दा रोज उखनतै

बे-अदबी सें लागै जेना
सन्तानों चण्डाले होय छै।

धीरंे-धीरें बात समझलौं
नई पीढ़ी के घात समझलाँ
घर के सबकुछ बाँटैवाला
बेटा के जजबातेॅ समझलाँ

पास-पड़ोसी ताना मारै
सम्बन्धी जंजाले होय छै।

बाकी सबकुछ ठीक-ठाक छै 

दुश्मन बनलोॅ चीन-पाक छै,
बाकी सबकुछ ठीक-ठाक छै।

सीमा पर हड़कम्प मचल छै,
लाशो सेॅ कश्मीर पटल छैय
धरती के जे स्वर्ग कहाबै-
वहाँ गिद्ध के भीड़ लगल छै।

देश-देश के कूटनीति मेॅ-
दोस्ती करना भी मजाक छै।

हिन्दी चीनी भाई-भाई
यै नारा सेॅ भेलै बुराईय
हड़पा-हड़पी कैलकै जेहन-
कहियो नै होतै भरपाई।

घात लगैने बैठ बिलैया-
बार-बार खोजै खुराक छै।

गुरुवैं सें गुरुवाय करै छै,
हरदम छोटका भाय लड़ै छैय
पड़लै ऐसन शाप काल के-
प्रजातंत्र के लोर झड़ै छै।

तैयो नै छै होश जरा भी-
दुर्दिन देखी जग अवाक छै।

भारत तेॅ बम भोला बनलै,
चाहै छै खुद दुश्मन सँभलैय
टुटलै जब-जब सहन शक्ति तेॅ-
देव-दनुज में निश्चय ठनलै।

आकाशोॅ त्रिशूल पृथ्वी
बश मेॅ सभ्भे अग्नि-नाग छै।

बैठ केॅ धुनऽ अप्पन कपार

बैठ केॅ धुनऽ अप्पन कपार

जै अफसर सें काम पड़ै छै
घूस बिना नै काम करै छै
देश-प्रेम के बात कहऽ तेॅ-
नै सुनै लेॅ कोय तैयार।

कौआ-मैना मौज उड़ाबै
हंस केॅ सभ्भैं तरसाबै
बात करऽ नै प्रजातंत्र के-
मूर्खऽ के होय छै सरकार।

दोषी छुट्टा सांढ़ घुमै छै
निर्दोषी सें जेल भरै छै
आँखऽ पर पट्टी देवी के-
न्याय बनल छै अब व्यापार

रक्षक भक्षक बनी केॅ घूमै
शत-शत रावण साँझ केॅ झूमै
विपदा के मारलऽ बेचारी-
बलात्कार के भेलै शिकार।

शाख-शाख पर उल्लू बसलै
बाग-बाग के फूल उजड़लै
अकुलाबै छै अंकुर-अंकुर-
महाप्रलय के छै आसार।

कविजी 

1.

भारतीय रेल जेकाँ लेट पर लेट करै,
कहियो कवि केॅ सखी पत्नी नै बनिहऽ।
घर सँ निकलथौं तेॅ सबकुछ भूलि जैथौं,
एहन पति के कोनऽ कहलऽ नै सुनिहऽ॥
बारे बजे रात धरि कविता केॅ खोजैवाला,
जंजीरो बजाबै चुपचाप मुँह मुनिहऽ।
घरेॅ जरूरत के कोनो नै फिकिर करै,
एहनऽ पति सँ आस छोड़ि सिर धुनिहऽ॥

2.

दोसरा के घरबा में टी.वी. फ्रिज देखि-देखि
कवियो के पत्नी के मऽन ललचाय छै।
दोसरा के पिया के दुतल्ला घर बनलै,
हमरऽ पति केॅ देखऽ कविते सोहाय छै॥
कुच्छु-कुच्छु लिखि-लिखि रोजे-रोज हँसै-गाबै,
हमरऽ सलाह नोनछाहे तेॅ बुझाय छै।
भनई कैलाश कवि पत्नी केॅ करजोरि,
भावै छै कवि केॅ जेना जिनंगी बिताय छै॥

3.

धरबा में कविजी केॅ केतनऽ बीमारी रहै,
कविता सुनाबै लेली दूर-दूर जाय छै।
धीया-पूता कविजी के पलै बिना बाप जेकाँ,
ओकरा लेली त बस सब कुछ माय छै॥
दुनियाँ लेॅ ढेर उपदेश लिखि-लिखि बाँचै,
डिबिया के पेनी में अन्हरिये बुझाय छै॥
दोसरा के ओठ पर हँसी-खुशी बाँटै वाला,
अप्पन प्रिया केॅ रोजे-रोज वें सताय छै॥

4.

लक्षमी सँ बैर करी सरोसती भजैवाला,
नाम लेली यश लेली जिनगी बिताय छै।
कोऽ पत्र-पत्रिका में कविता छपै तेॅ देखऽ-
ओकरे खुशी में कवि झूमि-झूमि जाय छै॥
नवका कवि सँ लेॅ केॅ बड़का कवि केॅ देखऽ-
कविता में घर-बार सब बिसराय छै।
मान सम्मान लेली कलम सँ जूझैवाला,
दवा-दारू बिना देखऽ दुनियों सँ जाय छै॥

5.

सूरज के जोत जहाँ पहुँच नै पाबै वहाँ,
कवि के नजर रस खोजी-खोजी लाबै छै।
मरूभूमि लागै जहाँ नागफनी-नागफनी,
कविता के फूल तेॅ वहाँ भी वें उगाबै छै॥
जिनगी सँ हारलऽ ऊबलऽ जे पथिक हुअेॅ-
ओकरो तेॅ नैन में सपना वें सजावैं छै॥
देश कहाँ देश लागै साहित्य-सुगंधि बिना।
‘किंकर’ कवि के गुण झूमि-झूमि गाबै छै॥

अंग-महिमा

1.

गंगा पद प्रक्षालिनी, गिरि मंदार ललाट।
महासती विहुला यहाँ, अजगैवी के ठाठ॥
अजगैवी के ठाठ, यहाँ छै विक्रमशीला।
नामी ऋषि कहोल, कर्ण केॅ जीवन लीला॥
मैदानी छै भग, पहाड़ो छै बहुरंगा।
बैजू के छै धाम अंग में पावन गंगा॥

2.

सीताकुंड नहाय कॅे, पूजऽ चंडी थान।
देखऽ महिमा अंग के, पुरथौं हर अरमान॥
पुरथौं हर अरमान, कहै कुषीतक कात्यायन।
कोशी, गंडक, गंग, नदी तट पर नारायण॥
धर्म-कर्म के भूमि लगै छै परम पुनीता।
निर्भय औ निःशंक सगर विचरै छै सीता॥

3.

चम्पा नगरी अंग के रहै विश्व-विख्यात।
व्यापारिक यै केन्द्र पर, अद्भुत यातायात॥
अद्भुत यातायात मगन नाचै व्यापारी।
नाथनगर में आदिकाल सें महल अटारी॥
लछमीजी के रहै जहाँ अद्भुत अनुकम्पा।
गंगाजी सें जुड़लऽ नदी अभियो छै चम्पा॥

4.

भाषा हमरऽ अंगिका, हमरऽ जीवन प्राण।
हिन्दी भाषा के करौं, युग-युग सें सम्मान॥
युग-युग सें सम्मान, सुयश हिन्दी पावै छै।
घर आँगन के नारि अंग-मंगल गाबै छै॥
हिन्दी के उत्थान होतै, ई राष्ट्रीय भाषा।
मतर अंगिका छिकै, अंग के मातृभाषा॥

5.

चाहै सब्भैं फेरू सें, अंग राज्य सुखधाम।
होतै तब रुकलऽ सगर, हर विकास के काम॥
हर विकाश के काम, सगर खुशियाली एैतै।
लगतै जब उद्योग, काम मजदूरो पैतै॥
जनपद के उत्थान लेल अब सभ्भैं साहै।
अंग राज्य निर्माण, सदा ‘किंकर’ भी चाहै॥

हमरऽ दिन की एहने रहतै! 

हमहूँ बनबै कहियो टीचर
भलें आय कहि दहो फटीचर
बैठले-बैठले पैबै रूपा
इस्कूल जैबै बुध-शनीचर

हमरऽ जादू एहनऽ चलतै
कि राष्ट्रपति के सम्मानों मिलतै!
हमरऽ दिन की एहने रहतै!

नै तेॅ बनबै राष्ट्रीय नेता
अजगर, गेहूँमन आरो करैता
जलो नै माँगतै डसबै जेकरा
दौड़ले-दौड़ले ऊपर जैता

जन्नेॅ चाहबै देश घूमैबै
मिनटऽ में सरकारे गिरतै!
हमरऽ दिन की एहने रहतै!

नै तेॅ बनबै हम व्यापारी
करबै हम कालाबाजारी
बड़का डीलर बनी केॅ हमहूँ
माल हजम करबै सरकारी

देखतें रइहऽ आँख फाड़ि के
रूपा घर में रोज बरसतै!
हमरऽ दिन की एहने रहतै!

नै तेॅ छियै हमहूँ बिगड़ल
बनबे करबै बड़का क्रिमनल
हमरा नाम सँ काँपतै सभ्भे
परशासन भी रहतै छिटकल

लूट-पाट अपहरणऽ करबै
लाख करोड़ त ऐबे करतै!
हमरऽ दिन की एहने रहतै!

जत्तेॅ चलेॅ चलैने जा 

जे मऽन आबौं कैने जा।
जत्तेॅ चलेॅ चलैने जा॥

केकरऽ के छै सुनैवाला, सब दोनों कान केॅ मुनैवाला
देखै लेॅ केकरा के बैठल, सब दोनों आँख केॅ मुनैवाला
हे गाँधी के तेसर बन्दर हाथ मुँह पर धैने जा।
जे मऽन आबों कैने जा, जत्तेॅ चलेॅ चलैने जा॥

जात-पात के बात उछालऽ या बालऽ के खाल निकालऽ
धर्मवाद के कट्टरता में, चाहऽ तेॅ तलवार निकालऽ
शान्त सरोवर के पानी में, सगरो जहर मिलैने जा।
जे मऽन आबों कैने जा, जत्तेॅ चलेॅ चलैने जा॥

धन-बल के छोड़ऽ गुमान नै, मानऽ तों वेद-पुराण नै
कमजोरऽ खूब सताबऽ, मानवता सँ छै उठान नै
की करतै ई निम्मर लोगवा, एकरऽ खेत चरैने जा।
जे मऽन आबों कैने जा, जत्तेॅ चलेॅ चलैने जा॥

जात-पात केॅ गिंजतें रइहऽ रक्त-पिपासु जीत्ते रइहिऽ
केकरा चिन्ता छै समाज के, नेता छऽ तों नेत्ते रइहऽ
की करतै ई मूरख जनता, कुर्सी अपन बचैने जा।
जे मऽन आबों कैने जा, जत्तेॅ चलेॅ चलैने जा॥

तोहीं छऽ बड़का विद्वान, सौंसे छै ई मूर्खिस्तान
यहाँ पेड़ जब कोनो नै छै, अंडी के तों पेड़ महान
रोकैवाला के छै तोरा, हरदम गाल बजैने जा।
जे मऽन आबों कैने जा, जत्तेॅ चलेॅ चलैने जा॥

बढ़ियें होय छै 

जे हेय छै से बढ़ियें होय छै।
की करभो एनाहियें छै॥

बच्चा-बच्चा बूझै छै आबेॅ
नेता तेॅ बहुरुपिये होय छै।

के जितलै के हारले छोड़ऽ,
जीत-हार तेॅ होबे करै छै;
सनकल छै जनता अपने में-
रात-दिन बेकारे लड़ै छै।

लोकतंत्र में राजतंत्र छै
भाय-भतीजावाद नै झेलऽ
एक्के घर में तीन-तीन नेता
कोय पटना कोय दिल्ली गेलऽ

मार-पीट आ खून-खराबा-
नै देखै छै दुनियें होय छै॥

केतनऽ उछलऽ-कूदऽ भैया
बऽर के साथ लोकनियें होय छै।

धूम-धड़का छोड़ऽ काका,
नै फोड़ऽ तों आरो पटाका;
राजनीति तेॅ जेहन भेलै जे-
देशऽ में फेरू पड़लै डाका।

लोकतंत्र के चीर हरण छै
कुर्सी तेॅ द्रौपदी भेलै
कोय एन्नेॅ कोय उन्नेॅ घींचै
इहो बीसवीं सदी गेलै

कुर्सी खातिर भारत में तेॅ
साले-साल चुनावये होय छै।

भीष्म पितामह हक्कन कानेॅ
राजा तेॅ राृतराष्ट्रे होय छै

ऐलै भेड़िया वेश बदली केॅ
पार्टी आ उद्देश्य बदली केॅ
डंडा-झंडा आसन-भाषण
फेरु जितलै संदेश बदली केॅ

जे होय छै बढ़ियें होय छै
की करभो एनाहियै होय छै।
जे होय छै बढ़ियें होय छै
की करभो एनाहियै होय छै।

शक्ति-शक्ति के जलै मशाल 

एक तरफ नारी के पूजा, दोसरऽ दिस छै अत्याचार।
हिन्नेॅ माय कतनों पूजौं, हुन्नेॅ नारी के चित्कार॥

रोज रंगल अखबार रहै छै, नारी के उत्पीड़न सँ
हर सीता छै परेशान आय, डेग-डेग पर रावण सँ
लहु-लुहान अबलासभ सँ, अखबारो छै लाले-लाल।
हिन्नेॅ माय कतनो पूजौं, हुन्नेॅ नारी के चित्कार॥

अबलासभ सँ छेड़-छाड़ करि, कलि-कुसुम के रौंदै छै
क्षनिक मात्र के विषय-वासना, गिद्ध-दृष्टि सन कौंधै छै
पौरुष छै शक्ति पर हाबी, जीत हार के बनल सबाल।
हिन्नेॅ माय कतनो पूजौं, हुन्नेॅ नारी के चित्कार॥

जौं दहेज के आगिन धधकै, धू-धू दुल्हिन जरै छै
राम-राम नै रावण-रावण, कहि केॅ दुल्हिन मरै छै
अबलासभ के अबलापन आय, बनी गेलै जी के जंजाल।
हिन्नेॅ माय कतनो पूजौं, हुन्नेॅ नारी के चित्कार॥

दुर्गा, काली, सरस्वती हे, ब्रह्माणी, रुद्राणी माय
बचाबऽ-बचाबऽ नारीसभ कें, लाज हाथ छौ तोरे आय
तोरऽ कृपा होतै तेॅ मैया, नारी फेरू होतै निहाल।
हिन्नेॅ माय कतनो पूजौं, हुन्नेॅ नारी के चित्कार॥

औरत पर जें हाथ उठावै, तोड़ि दहऽ तों ओकरऽ हाथ
दुलहिन के जराबैवाला के, दहो जरायै साथे-साथ
खोयलऽ प्रतिष्ठा दिलबावऽ, शक्ति-शक्ति के जलेॅ मशाल।
हिन्नेॅ माय कतनो पूजौं, हुन्नेॅ नारी के चित्कार॥

होली 

रंगाबऽ धोती-कुर्ता केश।
कि होली लेलऽ छौं संदेश॥

घर में भौजी भिंगल जाय
कि अंगिया-साड़ी भिंगल जाय
मगन मन मोहन लाले-लाल
कि फगुआ-फगुआ सौंसे देश।

इलेक्शन फगुआ बनलऽ जाय
सगा पर बन्दूक तनलऽ जाय
रंगऽ में प्रेम-रंग अनमोल
मिटाबऽ एकरा सँ हर द्वेष।

सुधारऽ काका अप्पन चाल
न खींचऽ जात-धरम के खाल
सिनेहिया व्यर्थे मारल जाय
मिटाबऽ राग-रंग सँ क्लेश।

कि कौआ नेने जाय छौं कान
गगन नै देखऽ अप्पन कान
दबारऽ घर सँ भ्रम के भूत
भटकल जीवन के राह शेष।

गुरुजी

1.

चाहै सरकार आबै, स्कूल बंद रहै;
जनता के कोप सब, सहै छै गुरुजी।
कभी घर गणना तेॅ, कभी जन गणना में,
कभी पशु गणना में, रहै छै गुरुजी॥
कभी पल्स पोलियो के दवा पिलैबै में;
धरे-घर सगरो ई, बहै छै गुरुजी।
कभी छै इलेक्शन के ड्यूटि में उलझल;
साँचे-साँच सबके ई कहै छै गुरुजी॥

2.

इस्कूल बंद करी, गेहूँ लानेॅ चललै;
शिक्षा के ड्यूटी, बजाबै छै गुरुजी।
बी.ओ.सीओ छथिन कौन ठाम पर;
पूछी-पूछी पतबा, लगावै छै गुरुजी॥
लाठी-सोटा लेने आबै, माय-बाप ओकरऽ;
जेकरऽ नै हाजरी, लगाबै कभी गुरुजी।
गेहूँ बटवाबै में, जेल भेलै ते देखऽ;
जेल में लोर बहाबै छै गुरुजी॥

3.

गिनै छै आकाशऽ के, तरेगन गुरुजी;
गुरुजी के वेतन के नै कोनो ठिकाना।
महीना के महीना, उधारी पै जीयैबाला;
रोजे-रोज करै छै तकादा पर बहाना।
दूधवाला, पेपरवाला, टोकतें रहै छै;
अभिये तकादा करि गेलऽ छै किराना।
नौकरी रहैतों देखऽ केहनऽ छै रहन-सहन;
मुश्किल लागै आबेॅ बच्चौं के पढ़ाना॥

4.

सबके पढ़ाबैवाला, भारतीय गुरुजी केॅ;
लोगें सब भारतीय उलटे पढ़ाय छै।
उचऽ उचऽ अफसर, वृद्ध-वृद्ध गुरुजी केॅ;
जीयै लेली रस्ता, उल्टे बताय छै॥
छोट-छोट काम लागी, रोजे-रोज काटै चक्कर;
ऑफिस बेदर्दी तेॅ बड़का कसाय छै।
नौकर बुझै छै, राजा परजा बुझै छै जेना;
गुरुवे सँ जनम-जनम के लड़ाय छै॥

5.

टुटलै जे नाता, शिष्य गुरु के समाज में;
कोढ़ के कान्हा पर, सब रीत-नीत गेलै।
लूट-पाट रात-दिन होय छै चतुर्दिक;
लागै छै जेना कि कोनो दुर्दिन ऐलै॥
केकरो नै वश में रहै छै आबेॅ भारतीय;
साम-दाम दण्ड भेद धूसरित भेलै।
भनई कैलाश आबेॅ विद्या के देवी;
तोरा देखि-देखि, दुख दुख नै बुझैलै॥

भीतर सें करथौं आघात

खैथों-पीथौं साथे-साथ।
भीतर सें करथों आघात॥

मुखड़ा पर जेहनऽ नकाब छै, लागै लोगवा लाजवाब छै
पोर-पोर काँटऽ सें भरलऽ, रूप-रंग में उ गुलाब छै

सटलहो जखने ओकरा में तों
लानथों विपदा के सौगात।

अंग-अंग में जहर भरल छै, तनिक सुधा सँ ठोर गढ़ल छै
साथी नै बनबऽ तों ओकरा, ओकरे कारण फेर लगल छै

फुलते-फलते रहै बाग ई
आबे आँख में बरसात।

बसें बेसी द्वेष-भावना, उलझल छै साहित्य-साधना
आगू जों बढ़भो ते मिलथों, डेग-डेग पर सिर्फ वेदना

लेखक के दुश्मन छै लेखक
अपने के मानै निष्णात।

फीकऽ साहित्यिक अधिवेशन, कुटिल चाल कुत्सित सप्रेशन
ओजहा-गुणी के मंतर सें, सरस्वती-सुत में डिप्रेशन

गुटबाजी के कारण आबे
कवि-लेखक के जाय छै जात।
खैथों-पीथौं साथे-साथ।
भीतर से करथौं आघात॥

फैशन के पीने शराब छै 

फैशन के पीने शराब छै।
झूठ कहै दुनियाँ खराब छै॥

हम्मर पत्नी रोज कहै छै-
ब्यूटी पार्लर जैबे करबै
भाग्य श्री के बाल ठीक छै
ओहने बाल कटैबे करबै

देखै छियै विश्व सुंदरी
सौंसे दुनियाँ बेनकाब छै

बेटबो स्कूल सें भागै छै
बस्ता छोड़ी क टाकिज में
आँख में चश्मा जेब में कंघी
हिरोइन छै ताबिज में

तीन बेर में मैट्रीक कैलकै
लागै लखनउ के नवाब छै

टी.वी. सें सब सीख-साख केॅ
बेटियो केहन पागल भेलै
पढ़ै लिखै में मऽन लगै नै
ऐसन आय अभागल भेलै

हीरो हिरोइन के चर्चा
फिल्मी गप-शप बेहिसब छै।

कोन मुँह सें केकरा कहबै
पाकल केश रंगलियै हमहू
जब-जब निकलै छी बजार
चार्ली सेंट लगैलियै हमहूँ

के गहूम के बात बुझै छै
सबके सब चाहै गुलाब छै।

देश लेेॅ कहिया लड़भो भैया 

बाँटै खातिर भैयारी मेॅ,
झगड़ै छय बाड़ी-झाड़ी मेॅ,
शक्ति-प्रदर्शन करोॅ यहाँ नै
सीमा पर जा हो रखवैया ।।

हिन्दू बनलय, मुस्लिम बनलय,
सिक्खो और ईसाई बनलय,
हिन्दुस्तानी नै बनभो तेॅ
डुबतै सौंसे देश के नैया ।।

हरिजन और सवर्ण के नारा,
फोरवार्ड-बेकवार्ड के नारा,
ऊँचोॅ अप्पन मोंछ करै लेॅ
ताल ठोक केॅ ता-ता थैया ।।

कांग्रेस बनलय राजद बनलय,
जोइर-तोइर केॅ राजग बनलय,
आतंकी संसद तक ऐलोॅ
राजनीति केॅ नाच-नचैया ।।

जे सीमा पर जान लड़ैने,
दुश्मन पर छै आँख गड़ैने,
ऊ सेना पूछै छौं सबसे
देश लेॅ कहिया लड़भो भैया ।।

मास्टर 

मास्टर केॅ मस्टरबा कहभो,
तेॅ बच्चा पढ़तोॅ कहियो नै ।
ऐतोॅ -जैतोॅ स्कूल लेकिन,
आगू बढतोॅ कहियो नै ।।

उत्स ज्ञान के गुरुवे छथनी गुरुवे सेॅ इंजोर छै ।
देखै नै छो तीस बरस सेॅ , केहन घटा-घनघोर छै ।
रहलोॅ इहे हाल अगर तेॅ
देश सुधरतोॅ कहियो नै ।

वेतन जब सेॅ मिलै लगलै, गुरु चढ़ल छोॅ ऐंख पर ।
जब विकास केॅ सीढ़ी मिललै चोट करै छोॅ पैंख पर ।
नौकर जब तक बुझतें रहभोॅ
ज्ञान मँजरतोॅ कहियो नै ।

गुरु तेॅ ब्रह्मा,विष्णु,शिव केॅ धरती पर अवतार छथिन ।
गुरु तेॅ भवसागर तरवैया माँझी के पतवार छथिन ।
मिलतै नै सम्मान गुरु केॅ
तेॅ स्वर्ग उतरतोॅ कहियो नै ।

जानै जौ कि जानै जाता

जानै जौ कि जानै जाता ।।

मजदूरोॅ सब चललै दिल्ली,
टिकट रहतौं चौंकै पिल्ही,
तैय्यो दस टकिया लेॅ टी.टी
बहुत लगैलकै अप्पन माथा ।

शिक्षक नै स्कूल मेॅ पढ़बै,
बच्चों दिन भर घासे गड़है,
बिडियो कैलका विजिट एकदिन
गुरु शिष्य मेॅ अद्भुत नाता ।

मोटर साइकिल नै मिललोॅ छै,
दुल्हिन के किस्मत जरलोॅ छै,
पड़ताड़ित बेटी केॅ देखी
कानैै-पीटै छै अब माता ।

कुर्सी बचबै के फेरा मेॅ,
नेता छै खुद अँधेरा मेॅ,
के विकास के बात सुनै छै
स्वारथ के सब गौरव गाथा ।

हत्यारा आजाद घुमै छै,
निर्दोषी जेलोॅ मेॅ जुमै छै,
न्यायाधीश के बात कहाँ छै
मुंसिफ बनलै भाग्य-विधाता ।

एकरोॅ नै छौं कोनो निदान

कानी गाय के भिन्ने बथान ।
एकरोॅ नै छौं कोनो निदान ।।

पछिया-पूरबा कतनो बहतै, जिद्दी छै वें सब कुछ सहतै ।
जंगल मेॅ उगलोॅ गुलाब छै, अपने खिलतै अप्पन झरतै ।
गमला मेॅ नै ऐतोॅ कहियो
अलगे छै औक्कर पहचान ।

साथ रहै मेॅ जी मिचलैतै, अप्पन खिचड़ी अलग पकैतै ।
केकरो कोच नै छै दुनिया मेॅ, हरदम ई बतिया दुहरैतै ।
रूखा-सूखा खैतै तैय्यो
छाती कैने चलै उतान ।

कुच्छू मेॅ नै देथौं चन्दा, कहथौ थे सब गोरख धन्धा ।
बनलै नै कहियो सामाजिक, अलबत्ते लागै छै बन्दा ।
बाबा धाम मेॅ चुप्पे-चापे
फेनु करतै कन्यादान ।

बड़का बेटा दिल्ली गेलै, छोटको डंडा गुल्ली खेलै ।
मूर्ख आदमी जिदिऐलै तेॅ संतानो सब मूर्खे भेलै ।
औंठा छाप बनल परिवारोॅ
तैय्या देखोॅ अजगुत गान ।

खुद केॅ पंडित- ज्ञानी मानै, लड़ै-भिडै लेॅ कूदै फानै ।
भूत भगाबै केॅ आडंबर, घोंघा केॅ नै मंतर जानै ।
काली आबै, दुर्गा आबै
ओकरा देह पर आबै मशान ।

झूठ कहै दुनियाँ खराब छै

झूठ कहै दुनियाँ खराब छै ।
फैशन के पीने शराब छै ।।
हम्मर पत्नी रोज कहै छै, ब्यूटी पार्लर जैबे करबै ।
भाग्यश्री के बाल ठीक छै, ओहने बाल कटैबे करबै ।
देखै छियै विश्व सुन्दरी
सौंसे दुनियाँ बेनकाब छै ।

बेटबो स्कूल सेॅ भागै छै, बस्ता छोड़ि केॅ टॉकिज मेॅ ।
आँख पे चश्मा जेब मेॅ कंघी, हिरोइन छै ताबिज मेॅ ।
तीन बेर मेॅ मैट्रिक कैलकै
लागै लखनऊ केॅ नवाब छै ।

टी.वी सेॅ सब सीख-साइख के, बेटियो फैसन पागल भेलै ।
पढ़ै-लिखै मेॅ मोॅन लगै नै, ऐसन आय अभागल भेलै ।
हीरो-हिरोइन केॅ चर्चा
फिल्मी गपशप बेहिसाब छै ।

कोन मुँह सेॅ केकरा कहबै, पाकल केश रंगैलियै हमहूँ ।
जब-जब निकलै छी बजार तब चार्ली सेंट लगैलियै हमहूँ ।
के गेहूँ केॅ बात बुझै छै
सबकेॅ सब चाहै गुलाब छै ।

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