कैलाश वाजपेयी की रचनाएँ

ऐसा कुछ भी नहीं 

ऐसा कुछ भी नहीं जिंदगी में कि हर जानेवाली अर्थी पर रोया जाए |

काँटों बीच उगी डाली पर कल
जागी थी जो कोमल चिंगारी ,
वो कब उगी खिली कब मुरझाई
याद न ये रख पाई फुलवारी |
ओ समाधि पर धूप-धुआँ सुलगाने वाले सुन !
ऐसा कुछ भी नहीं रूपश्री में कि सारा युग खंडहरों में खोया जाए |….

चाहे मन में हो या राहों में
हर अँधियारा भाई-भाई है ,
मंडप-मरघट जहाँ कहीं छायें
सब किरणों में सम गोराई है |
पर चन्दा को मन के दाग दिखाने वाले सुन !
ऐसा कुछ भी नहीं चाँदनी में कि जलता मस्तक शबनम से धोया जाये |

साँप नहीं मरता अपने विष से
फिर मन की पीड़ाओं का डर क्या ,
जब धरती पर ही सोना है तो
गाँव-नगर-घर-भीतर- बाहर क्या |
प्यार बिना दुनिया को नर्क बताने वाले सुन !
ऐसा कुछ भी नहीं बंधनों में कि सारी उम्र किसी का भी होया जाए |

सूरज की सोनिल शहतीरों ने
साथ दिया कब अन्धी आँखों का ,
जब अंगुलियाँ ही बेदम हों तो
दोष भला फिर क्या सूराखों का |
अपनी कमजोरी को किस्मत ठहराने वाले सुन !
ऐसा कुछ भी नहीं कल्पना में कि भूखे रहकर फूलों पर सोया जाए |

नियोजन

औरतें
अंधा कूप्प
उमस भरे खेत हैं
आप तैर जाएँ तो जाएँ
ईश्वर के लिए
उग नहीं आएँ।

लंदन की डाकमीनार

ऊँचाई है या मज़ाक
यह कौन-सी
इंजीनियरी है
कि नीचे से ऊपर देखने के लिए
लेटना ज़रूरी है।

भविष्य घट रहा है (कविता)

कोलाहल इतना मलिन
दुःख कुछ इतना संगीन हो चुका है
मन होता है
सारा विषपान कर
चुप चला जाऊँ
ध्रुव एकान्त में
सही नहीं जाती
पृथ्वी-भर मासूम बच्चों
माँओं की बेकल चीख़।
सारे के सारे रास्ते

सिर्फ़ दूरियों का मानचित्र थे
रहा भूगोल
उसका अपना ही पुश्तैनी फ़रेब है
कल तक्षशिला आज पेशावर
इसके बाद भेद-ही-भेद
जड़ का शाखाओं से
दाहिनी भुजा का बायीं
कलाई से।

बीसवीं सदी के विशद
पटाक्षेप पर
देख रहा हूँ मैं गिर रही दीवार
पानी की
डूब रहे बड़े-बड़े नाम
कपिल के सांख्य का आख़िरी भोजपत्र
फँसा फड़फड़ा रहा-

अन्त हो रहा या शायद
पुनर्जन्म
पस्त पड़ी क्रान्ति का।

बीसवीं सदी के विशद मंच पर
खड़े जुनून भरे लोग-
जिन नगरों में जन्मे थे
उन्हीं को जला रहे
एक ओर एक लाख मील चल
गिरता हुआ अनलपिण्ड
और
दूसरी तरफ़ बुलबुला
बुलबुला
इनकार करता है पानी
कहलाने से
बडा समझदार हो गया है बुलबुला।

असल में अनिबद्ध था विकल्प
विकल्प ही भविष्य था
भविष्य पर घट रहा है।
इस क्षणभंगुर संसार में
अमरौती की तलाश भी
जा छिपी राष्ट्रसंघ के
पुस्तकालय में
देश जहाँ प्रेम की पुण्यतिथि मना रहे

ज़िक्र जब आता वंशावलि का
हरिशचन्द्र की
पारित हो लेता स्थगन प्रस्ताव
शायद सभी को
अपना भुइँतला ज्ञात है।
बहारों की नगरी में नाद बेहद का
आकाश फट रहा
एक आँखों वाले संयन्त्र पर

देख रहे बच्चे
अपनी जन्मस्थली
बेपरदा हुई मनुष्यता
भोग के प्रमाणपत्र बाँट रही
खुल रही पहेली दिन-ब-दिन
रहस्य
झिझक रहा फुटपाथ पर पड़ा
अपने पहचान-पत्र का अभाव में
दरिद्रदेवता
पूछ रहा पता
हवालात का

जहाँ उसने अपनी शिनाख़्त की
अनुपस्थिति के सबूत के अभाव में
फाँसी लगेगी…लगनी है
असल में यह अनुपस्थिति का मेला है
खत्म हुई चीज़ों की ख़रीद का विज्ञापन
युवा युवतियों को बुला रहा
कि गर्भ की गर्दिश से बचने के
कितने नये ढंग अपना चुकी है
मरती शताब्दी

शोर-शोर सब तरफ़ घनघोर
नेता सब व्यस्त कुरते की लम्बाई बढ़ाने में
स्त्रियाँ
उभराने में वक्ष
किसी को फ़िक्र नहीं सौ करोड़ वाले
इस देश में
कितने करोड़ हैं जो अनाथ हैं
कुत्तों की फूलों में कोई रूचि नहीं
न मछलियों का छुटकारा
अपनी दुर्गन्ध से
यों सारी उम्र रहीं पानी में।

कैसे मैं पी लूँ सारा विष
विलय से पहले
मुझ नगण्य के लिए यह
पेंचीदा सवाल है।
सब फेंके दे रही सभ्यता
धरती की कोख
दिन-ब-दिन ख़ाली
पानी हवा आकाश
हरियाली धूप
धीरे-धीरे
बढ़ती चली जा रही
कंगाली सब्र की
समझ कै़द
बड़बोले की कारा में

त्वरा के चक्कर में
सब इन्तजार हो गया है
काल को पछाड़कर
तेज़ रफ्तार से
सब-कुछ होते हुए
होना
बदल गया है
समृद्धि के अकाल में
अस्ति से परास्त
विभवग्रस्त आदमी
एक-एक कर
फेंककर
सारी सम्पदा
क्या पृथ्वी भी
फेंक देगा ?

मेरे समक्ष यह
संजीदा सवाल है
ठीक है कि सूर्य बुझनहार धूनी है
किसी अवधूत की
अविद्या-विद्यमान को ही़
शाश्वत मानना
ठीक है कि हस्ती
एक झूठा हंगामा है
हर प्रतीक्षा का
गुणनफल
सिराना चुक
जाना है।
तभी भी निष्ठा उकसाती मुझे

सब कुछ को रोक देना
जरूरी है
भूलकर अपनी अवस्था।
चिड़ियों से फूलों से
पेड़ से हवा से
कहना चाहिए
भीतर से बाहर का तालमेल
नाव नदी संयोग
के बावजूद
बना अगर रहा न्यूनतम भी
बिसरा सरगम
किसी ताल में
होकर निबद्ध फिर
आएगा।
पृथ्वी बच जाएगी
मैं रहूँ नहीं रहूँ
फ़र्क क्या।

स्पंदन

कविता हर आदमी
अपनी
समझ भर समझता है
ईश्वर एक कविता है.

सूफ़ीनामा (कविता)

घर ,कपड़े, नौकरी,शहर बिना बदले
बिना प्रार्थना या उपवास के
तुम जो उतर चले आए हो
फ़ना होने इस समुद्र में
इसे कोई नाम नहीं देना
नामों में बड़ा ख़तरा है
उम्र भर तुम आसीमा के वास्ते
सीमा में रह कर रोये हो.
(दु:ख पैदा ही होता है बंदिश के अहसास से)
उम्र भर तुम सीमा की पीड़ा में कलपे-रोये हो
पाँसा फेंका है
सीढ़ियाँ चढ़े हो
फिर तुम्हें सीढ़ी का साँप खा गया है
हर सीढ़ी के ऊपर साँप है
यह क्योंकि भीतर-भीतर तक साफ़ है
इसी लिए हद तोड़ कर कूद आए हो
स्वागत है
फिर भी इस सब पर गर्व नहीं करना
फ़ख़्र एक दूसरी तरह की ज़लालत है
छाती तक पानी में डूबा आदमी
डूब तभी सकता है
पानी जब क़द से ऊपर हो जाए
तुम्हें अभी साँस आ रही है.
पानी में खड़े हो, आँच दे रहे हो.
तुम याददाश्त के शिकार हो
आँखों में जल रहीं बस्तियाँ
पूरी-की-पूरी दुनिया को आटा कर
एक नई दुनिया को गढ़ने का क़स्द किये
यहाँ,वहाँ,पता नहीं कहाँ-कहाँ बारूद फेंकतीं
रोज़ नई हस्तियाँ
ऐसे सब लोगों को तुम आकाश की तरह देखना
हिंसा की उम्र हमेशा कम होती है
इसीलिए उनके खूनी इरादों को न टोकना
बड़ी-बड़ी किताबें हैं,बड़े-बड़े हर्फ़ उन किताबों में
बड़े-बड़े वायदे भरे हैं पूरी पृथ्वी पर
नासमझी की एक ही भाषा है और ज़िन्दगी
ऐसा तमाशा
जिसमें भाग लेने के वास्ते
जिसमें भाग लेना ज़रूरी है.
तुम भी बिना भाग लिए, भाग लेना
आदमी का खोपड़ा अजीब है
कुछ करो, भरो, खुशी, जीत, यश, बोरे कोहेनूर के
ख़ाली का ख़ाली ही रहता है
अच्छा किया तुमने जीते जी उम्र भर का मातम मना लिया
तुमने अच्छा किया
यों ग़रीब के घर में बेटा ज़्यादातर बूढ़ा ही पैदा
होता है.
अच्छा किया तुमने वक़्त रहते
सारे संकल्पों का गर्भ ही गिरा दिया
फिर भी इस सब पर खुश नहीं हो जाना
खुशी भी मियादी बुखार है

तुम अगर और कहीं कुछ
हो सकते होते तो हो गए होते फिर
यहाँ नहीं होते
इसमें भी उसका शुक्र मानना
आग जले जिस्म का एक ही इलाज है
बिजली गिर जाए
वही धूप बत्ती धन्य होती है
जो अपने को खाये
खाती चली जाए.

बंधुआ मज़दूर् 

अरे तू काहे को रोता है
यहाँ कुछ ख़त्म नहीं होता
छूट रही नहीं कोई संपदा
यों ही बेमतलब क्यों
कीचड़ बिलोता है.
भीतर से बाहर तक
ख़ाली ही ख़ालीपन जगमग था
आग,हवा,पानी को तरस आ गया
शक्ल पा गया तू
कोशिश किये बिना
जोड़ किये ठीकरे
छत डाल ली
जहाँ देह तक किस्री और की मेहेर हो
डर मरने का बेमानी है
असल में दोष नहीं दो दीदों का
आदम की नस्ल
तीसरी आँख से कानी है.
रोज़ जाल बुनता है
सर धुनता तू / देखकर / चौपट
यह धंधा हड्डी की खाल का
चोला तो लेकिन
बचुआ हमेशा से
ब‍ंधुआ मज़दूर है
काल का.

समागम

सभी कुछ बदलता है
अपनी रफ़्तार से
सिर्फ़ नदी ही नहीं
पहाड़ भी
चूर-चूर हो कर बहता है
नीचे
नदी की छाती से लगा हुआ.

फ़ना / निर्माण 

लोग पूछते हैं कहाँ उसे पाएँ हम
धरती के किस टुकड़े को घेर कर
किस क़िस्म का कैसा गुम्बद बनाएँ हम
कि वहाँ क़ैद हो जाए
कितनी ऊँचाई से, किस भाषा में, कितनी
ज़ोर से आवाज़ दें हम
कि उसे सुनाई पड़ जाए
अजीब बात है
मछली को पानी में है मछली
पानी की तलाश है.

तत् त्वम्sसि 

अगर वह है तो
उस जैसा होने से
कम पर मत राज़ी हो जाना
और अगर लगता है
सच कुछ नहीं है
तब तुम्हें छूट है
जितना गिर पाओ
गिरते चले जाना.

उभय तर्क 

कमज़ोर होने
का एक ही लाभ है
मार खूब खाने को
मिलती है
देखा नहीं सूखी
घास को
कितने धड़ल्ले
से जलती है.

अंतत:

शरीर सहयोग
नहीं करता
अन्यथा
कोई क्यों मरता

तसव्वुफ़

कोशिश करने की
कोशिश भी कौन
करे
मन जाने के
बाद का
जीना
कश्कोल नहीं होता

बक़ा 

बूँद-बूँद बनकर
बार-बार
बीच में खो जाती है धार
बड़की नदी से
मिलूँ
तो समुद्र मिले
तो समुद्र मिले.

आदिम सवाल

जब तुम पैदा हुए थे
तब नहीं पूछा क्यों
जब तुम मर चुके होगे
तब नहीं पूछोगे क्यों
फिर ये बीच की अवधि में
क्यों क्यों क्यों

सद्भाव 

शब्द बार- बार हमें
बासी पड़े अर्थ की
कुब्जा सतह तक ले जाते हैं
विचार- घास ढका दलदल
विचार हमें तर्क की पेंचदार
खाई में
धक्का दे आते हैं
जबकि सद्भाव
खुला आसमान है
जो आदमी अपने भाई पड़ोसी या दोस्त
या किसी की भी
जलती चिता पर खिचड़ी पकाए
उस आदमी को आदमी
क्यों कहा जाए

समाधि वेला 

आँख भी न ब‍ंद हो
और ये दुनिया आंखों से ओझल हो जाये
कुछ ऐसी तरकीब करना
डूबना तो तय है इसलिये, नाव नहीं
नदी पर भरोसा करना
तुम उन लोगों में हो जो
चीख़ से चलकर चुप्पी पर आए हैं
केचुल की तरह शहर छोड़ कर
जंगल से की है दोस्ती
जहाँ दाएँ-बाएँ की बहस नहीं तुम हो
हवाएँ हैं
पत्ता-पत्ता बेतार वाले तार से
यही ख़बर लाता है बार-बार
जिसकी जड़ जितनी गहरी से गहरी है
वह उतनी ऊँचाई चूम पाता है
शहर मगर अब भी , पीछाकर रहा है
तुम परेशान हो
दुकान तो बढ़ा दी तब भी सामान क्यों बिक रहा है
असल में तुम्हारी बीमारी दोहरी है
तुमको बुख़ार था और तुम बुख़ार में शराब पीते रहे
जीते रहे ज़िन्दगी उधार की,
और अब भौंचक्के हैरान हो
यह जो तुम्हारे गंधाते शरीर से
कभी-कभी उठती है बन कर सुगन्ध-सी
इतने दिन कहाँ बन्द थी?
ज़रूर कुछ धोखा हुआ है
तुमको लगता है
यह सब स्वप्न में हुआ है
जब तक हो नहीं जाए
जुगनू भी कहाँ मानता है सवेरे को
असल में तुम गुज़रे
दौर के अँधेरे से ग्रस्त हो
और
यह अँधेरा खासा बुज़ुर्ग है.
तुम्हारी हिसाब से वह आदमी आदमी नहीं
शोर न मचाए जो नि:शोक हो
जो सोच की दूरबीन से
घाव गिने पृथ्वी के
दु:ख की प्रदर्शनी लगाए
इश्तहार दे रोग-जोग का
वह आदमी है विचारशील
वह आदमी है काम का
तुमने सिक्के का यह पहलू अभी-अभी देखा है
जलती नहीं कोई आग बिना ईंधन के
बीज जब मिटता है
अंकुर होता है
अभी-अभी मोर नाचा है गूँजी बाँसुरी
अमृत अभी-अभी बरसा है
अभी-अभी जला है चिराग़
धैर्य धरना
हर जन्म दूसरी तरह का देहान्त है
हर जीत के आगे-पीछे शिकस्त
इसलिए सफलता से डरना
डूबना तो तय है इसलिए, नाव नहीं, नदी पर
भरोसा करना.

सौंदर्य बोध

अभी-अभी मैंने खिला
देखा है एक कमल
यह कमल पहले नहीं खिला
ऐसा यह कमल अब कभी नहीं होगा
आगे के उजले वर्षों में
कमल को नहीं पता
मैं कमल मुग्ध हो गया हूँ
खिलना-मुरझाना
यों किसी कमल का
साधारण घटना है
रोज़ सैंकड़ों कमल खिलते हैं
यह रहा होगा अंधापन
मेरी आँखों का जो
कमल में , खिलावट नहीं देख सका

कमल को कमल से
इतर नहीं लेख सका
तब फिर मैं क्यों कमल-मुग्ध हो गया हूँ
जबकि कमल अपनी
मर्ज़ी से नहीं खिला
खिले कमल से
अभी
पता नहीं कैसे
मेरा
मेरा नहीं मेरी इन अंधी आंखों का तार
मिल गया है
और एक और कमल
कमल और मेरी
आँखों के बीच खिल गया है

सिकंदर का जनाज़ा

कितना अजीब हो गया है
अपने ही घर मेम शरीर खो गया है
न कहीम कोई दु:ख ,न दुराव
उजली सरलता है
बुद्ध की प्रतिमा पर
एक बिन बाती का दिया जलता है.

भीतर से बाहर तक आकाश फैला
ख़ुशबू की तितलियाँ
उड़ती हैं
लय टूटती है कभी-कभार
पीली ख़बरों की पत्तियाँ
जब झरती हैं.
होने को कुछ नहीं रहा
न खोने को
लगता नहीं कोई इतिहास था
जिससे बिंध जाने के बाद
सब काँटे सीधे हो गए.
वह क्या यही-सा
निर्वैर,निर्भव अहसास था ?
आख़िर कोई नींव क्यों रखता है
जानकर
यह धंधा अंधा है
सरिहन फँसता है बनने देता है सपने को
कोयल से क्यों नहीं सीखता सही
सुरक्षा ग़लत है बुनियादी तौर पर
संकट, मगर
ग़लत का सही पता
सिर्फ़ तब चलता है
जब दूसरे पहर
सिकन्दर का जनाज़ा निकलता है

तक़लीफ़

दुनिया में पाँच अरब लोग हो गए हैं
इसकी भी मुझको तकलीफ़ है
बढ़े हुए लोगों में एक मैं भी हूँ
इसकी भी मुझको तकलीफ़ है
पेड़ नहीं रहे दूर-दूर तक
इसकी भी मुझको तकलीफ़ है
मैंने ख़ुद किसको छाँह दी?
इसकी भी मुझको तकलीफ़ है
लोगों को रोटी नसीब नहीं
इसकी भी मुझको तकलीफ़ है
मेरी रोटी में घी भी शरीक है
इसकी भी मुझको तकलीफ़ है
सरे आम हत्याएँ होती हैं
इसकी भी मुझको तकलीफ़ है
मैं मारे जाने के काबिल क्यों नहीं
इसकी भी मुझको तकलीफ़ है
सब तरफ़ मेरे नरक ही नरक है
इसकी भी मुझको तकलीफ़ है
मेरे नरक की किसी को खबर नहीं
इसकी भी मुझको तकलीफ़ है
सबकी तकलीफ़ भी मेरी तकलीफ़ है
मेरी तकलीफ़ भी मेरी तकलीफ़ है
आखिर तकलीफ़ से छुटकारा क्यों नहीं
बिना तकलीफ़ के गुज़ारा भी
क्यों नहीं.

अंतिम दौर

नींद की नदी सूख जाएगी
खड़खड़ाएगी
साँसों की बाँसुरी
चिड़िया को उड़ना आता है चिड़िया उड़
जाएगी
होगा यही होगा.
तब फिर कुछ भी बचा कर क्या होगा?
गिरा हुआ देश है
दिरे हुए देश में
खुलेआम राज करती है तस्करी
सच बोलने नहीं देती
युधिष्ठिर को
मसखरी
मंत्रपाठ करती है रंगारंग काँच पर
हाई-टेक विज्ञापन
लंगड़ ग़रीब को
मखमली जूता पहनाता है
कितनी मादक हसीन जड़ता है
नशे का स्वाँग भी सच दीख पड़ता है
अपनी पकड़ से पकड़ा जाता है हारिल
स्वप्न में स्वप्न के ख़िलाफ़
कौन लड़ता है
तुम सोचते हो अंतिम
दौर है गुज़र जाएगा.
पा ले कितनी ही ऊँचाई पाले
नीचे जब आएगा
पत्थर ही कहलाएगा.
ठीक सोचते हो तुम
इतिहास मुठ्ठी भर राख है
वक़्त के बदन पर मली गई
बदसूरती का धर्म ही बनावट है
दाग़े गए बाँस की शिनाख़्त नहीं होती
न हवा का कोई क़ायदा
ख़ामोश बहुमत जो लेटा है
दुनिया भर के क़ब्रगाहों मेम
कल किसी महल का उजाला था

भाप बन जाने के बाद
क्या पता चलता है पानी
गंगा था या गन्दा नाला था
ठीक सोचते हो
ज़िन्दगी, बहुत साम्यवादी है
सबके संग एक-सा
आदिम मज़ाक करती है
तब भी चलते चलो
किए चलो ठीक
कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाता ब्रह्माण्ड में.

मोमिन

पूजाघर पहले भी होते थे
हत्याघर भी
पहले होते थे,
हमने यही प्रगति की है.

दोनों को एक में मिला दिया.

रोज़नामचा 

हड्डियाँ
उसकी भी तो उसी रंग की थीं
जैसी सभी की होती हैं
खून भी उसी रंग का
जिस रंग का सबका
होता है
तुमने अभी जिसे
गोली से मारा है
उसकी सिर्फ़ एक ही ग़लती थी
वह ग़रीब

कातर तार-तार था

सामूहिक से अलग
झुका हुआ अपनी
निजी प्रार्थना में
पुलिस की शिनाख़्त से लगता है
उसका नाम
शायद फ़रीद था

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