ख़ुशबीर सिंह ‘शाद’ की रचनाएँ

अब अँधेरों में जो हम ख़ौफ़-ज़दा बैठे हैं 

अब अँधेरों में जो हम ख़ौफ़-ज़दा बैठे हैं
क्या कहें ख़ुद ही चराग़ों को बुझा बैठे हैं

बस यही सोच के तस्कीन सी हो जाती है
और कुछ लोग भी दुनिया से ख़फा बैठे हैं

देख ले जान-ए-वफ़ा आज तेरी महफ़िल में
एक मुजरिम की तरह अहल-ए-वफ़ा बैठे हैं

एक हम हैं के परस्तिश पे अक़ीदा ही नहीं
और कुछ लोग यहाँ बन के ख़ुदा बैठे हैं

‘शाद’ तू बज़्म के आदाब समझता ही नहीं
और भी लोग यहाँ तेरे सिवा बैठे हैं

बुझा के मुझ में मुझे बे-कराँ बनाता है 

बुझा के मुझ में मुझे बे-कराँ बनाता है
वो इक अमल जो शरर को धुआँ बनाता है

न जाने कितनी अज़ीयत से ख़ुद गुज़रता है
ये ज़ख़्म तब कहीं जा कर निशां बनाता है

मैं वो शजर भी कहाँ जो उलझ के सूरज से
मुसाफिरों के लिए साएबाँ बनाता है

तू आसमाँ से कोई बादलों की छत ले आ
बरहना शाख़ पे क्या आशियाँ बनाता है

अजब नसीब सदफ़ का के उस के सीने में
गोहर न होना उसे राइगाँ बनाता है

फ़कत़ मैं रंग ही भरने का काम करता हूँ
ये नक़्श तो कोई दर्द-ए-निहाँ बनाता है

न सोच ‘शाद’ शिकस्ता-परों के बारे में
यही ख़याल-सफ़र को गिराँ बनाता है

चश्‍म-ए-हैरत सारे मंज़र एक जैसे हो गए

चश्‍म-ए-हैरत सारे मंज़र एक जैसे हो गए
देख ले सहरा समंदर एक जैसे हो गए

जागती आँखों को मेरी बारहा धोखा हुआ
ख़्वाब और ताबीर अक्सर एक जैसे हो गए

वक़्त ने हर एक चेहरा एक जैसा कर दिया
आरजू़ के सारे पैकर एक जैसे हो गए

जब से हम को ठोकरें खाने की आदत हो गई
रास्तों के सारे पत्थर एक जैसे हो गए

दीदा-ए-तर की कहानी अब मुकम्मल हो गई
दर्द सब अश्‍कों में घुल कर एक जैसे हो गए

‘शाद’ इतनी बढ़ गई हैं मेरे दिल की वहशतें
अब जुनूँ में दश्‍त और घर एक जैसे हो गए

एक तो क़यामत है इस मकाँ की तन्हाई 

एक तो क़यामत है इस मकाँ की तन्हाई
उस पे मार डालेगी मुझ को जाँ की तन्हाई

तुम ने तो सितारों को दूर ही से देखा है
तुम समझ न पाओगे आसमाँ की तन्हाई

वो उधर अकेला था हम इधर अकेले थे
रास्ते में हाइल थी दरमियाँ की तन्हाई

फिर वही चराग़ों का रफ़्ता-रफ़्ता बुझ जाना
फिर वही सुकूत-ए-शब फिर वो जाँ की तन्हाई

दश्‍त में भी कुछ दिन तक वहशतें तो होती हैं
रास आने लगती है फिर वहाँ की तन्हाई

कोई भी यकीं दिल को ‘शाद’ कर नहीं सकता
रूह में उतर जाए जब गुमाँ की तन्हाई

हवा के पर कतरना अब ज़रूरी हो गया है 

हवा के पर कतरना अब ज़रूरी हो गया है
मेरा परवाज़ भरना अब ज़रूरी हो गया है

मेरे अंदर कई एहसास पत्थर हो रहे हैं
ये शीराज़ा बिखरना अब ज़रूरी हो गया है

मैं अक्सर ज़िंदगी के उन मराहिल से भी गुज़रा
जहाँ लगता था मरना अब ज़रूरी हो गया है

मेरी ख़ामोशियाँ अब मुझ पे हावी हो रही हैं
के खुल कर बात करना अब ज़रूरी हो गया है

बुलंदी भी नशेबों की तरह लगने लगी है
बुलंदी से उतरना अब ज़रूरी हो गया है

मैं इस यक-रंगी-ए-हालात से उकता चुका हूँ
हक़ीक़त से मुकरना अब ज़रूरी हो गया है

मेरी आँखें बहुत वीरान होती जा रही हैं
ख़ला में रंग भरना अब ज़रूरी हो गया है

जो शब को मंज़र-ए-शब ताब में तब्दील करते हैं

जो शब को मंज़र-ए-शब ताब में तब्दील करते हैं
वो लम्हें नींद को भी ख़्वाब में तब्दील करते हैं

जो आँसू दर्द की गहराइयों में डूब जाते हैं
वही आँखों को भी गिर्दाब में तब्दील करते हैं

किसी जुगनू को हम जब रात की ज़ीनत बनाते हैं
ज़रा सी रौशनी महताब में तब्दील करते हैं

अगर मिल कर बरस जाएँ यही बिखरे हुए बादल
तो फिर सहराओं को सैलाब में तब्दील करते हैं

जो मुमकिन हो तो उन भूले हुए लम्हात से बचना
जो अक्सर ख़ून को ज़ेहराब में तब्दील करते हैं

यही क़तरे बनाते हैं कभी तो घास पर मोती
कभी शबनम को ये सीमाब में तब्दील करते हैं

कहीं देखी नहीं ऐ ‘शाद’ हम ने ऐसी ख़ुशहाली
चलो इस मुल्क को पंजाब में तब्दील करते हैं

कोई नहीं था मेरे मुक़ाबिल भी मैं ही था 

कोई नहीं था मेरे मुक़ाबिल भी मैं ही था
शायद के अपनी राह में हाइल भी मैं ही था

अपने ही गिर्द मैं ने किया उम्र भर सफर
भटकाया मुझ को जिस ने वो मंज़िल भी मैं ही था

उभरा हूँ जिन से बारहा मुझ में थे सब भँवर
डूबा जहाँ पहुँच के वो साहिल भी मैं ही था

आसाँ नहीं था साज़िशें करना मेरे खिलाफ
जब अपनी आरज़ुओं का क़ातिल भी मैं ही था

शब भर हर इक ख़याल मुख़ातिब मुझी से था
तंहाइयों में रौनक़-ए-महफिल भी मैं ही था

दुनिया से बे-नियाज़ी भी फ़ितरत मेरी ही थी
दुनिया के रंज ओ दर्द में शामिल भी मैं ही था

मुझ को समझ न पाई मेरी जिंदगी कभी
आसानियाँ मुझी से थीं मुश्‍किल भी मैं ही था

मुझ में था ख़ैर ओ शर का अजब इम्तिज़ाज ‘शाद’
मैं ख़ुद ही हक़-परस्त था बातिल भी मैं ही था

मैं अपने रू-ब-रू हूँ और कुछ हैरत-ज़दा हूँ मैं

मैं अपने रू-ब-रू हूँ और कुछ हैरत-ज़दा हूँ मैं
न जाने अक्स हूँ चेहरा हूँ या फिर आईना हूँ मैं

मेरी मजबूरियाँ देखो के यक जाई के पैकर में
किसी बिखरे हुए एहसास में सिमटा हुआ हूँ मैं

मेरे अंदर के मौसम ही मुझे तामीर करते हैं
कभी सैराब होता हूँ कभी सहरा-नुमा हूँ मैं

जो है वो क्यूँ है आख़िर जो नहीं है क्यूँ नहीं है वो
इसी गुत्थी को सुलझाने में ही उलझा हुआ हूँ मैं

ये बात अब कैसे समझाऊँ मैं इन मासूम झरनों को
गुज़र कर किन मराहिल से समंदर से मिला हूँ मैं

तभी तो ‘शाद’ मैं हूँ मोतबर अपनी निगाहों में
मनाज़िर को बड़ी संजीदगी से सोचता हूँ मैं

नई मुश्किल कोई दर-पेश हर मुश्‍किल से आगे है

नई मुश्किल कोई दर-पेश हर मुश्किल से आगे है
सफ़र दीवानगी का इश्‍क़ की मंज़िल से आगे है

मुझे कुछ देर में फिर ये किनारा छोड़ देना है
मैं कश्‍ती हूँ सफ़र मेरा हर इक साहिल से आगे है

खड़े हैं साँस रोके सब तमाशा देखने वाले
के अब मज़लूम बस कुछ ही क़दम क़ातिल से आगे है

मुझे अब रूह तक इक दर्द सा महसूस होता है
तो क्या वुसअत मेरे एहसास की इस दिल से आगे है

मेरे इस कार-ए-बे-मसरफ को क्या समझेगी ये दुनिया
मेरी ये सइ-ए-ला-हासिल हर इक हासिल से आगे है

ये अक्सर ‘शाद’ रखती है मुझे ख़ुश रंग लम्हों से
मेरी तन्हाई तेरी रौनक-ए-महफिल से आगे है

परिंदे बे-ख़बर थे सब पनाहें कट चुकी हैं

परिंदे बे-ख़बर थे सब पनाहें कट चुकी हैं
सफ़र से लौट कर देखा के शाखें कट चुकी हैं

लरज़ जाता हूँ अब तो एक झोंके से भी अक्सर
मैं वो ख़ेमा हूँ जिस की सब तनाबें कट चुकी हैं

बहुत बे-रब्त रहने का ये ख़ामियाजा है शायद
के मंज़िल सामने है और राहें कट चुकी है

हमें तन्हाई के मौसम की आदत पड़ चुकी है
के इस मौसम में अब तो कितनी रातें कट चुकी हैं

नए मंज़र के ख़्वाबों से भी डर लगता है उन को
पुराने मंज़रों से जिन की आँखें कट चुकी हैं

रगों में ज़हर-ए-ख़ामोशी उतरने से ज़रा पहले 

रगों में ज़हर-ए-ख़ामोशी उतरने से ज़रा पहले
बहुत तड़पी कोई आवाज़ मरने से ज़रा पहले

ज़रा सी बात है कब याद होगी इन हवाओं को
मैं इक पैकर था ज़र्रो में बिखरने से ज़रा पहले

मैं अश्‍कों की तरह इस दर्द को भी ज़ब्त कर लेता
मुझे आगाह तो करता उभरने से ज़रा पहले

कोई सूरज से ये पूछे के क्या महसूस होता है
बुलंदी से नशेबों में उतरने से ज़रा पहले

कहीं तस्वीर रूसवा कर न दे मेरे तसव्वुर को
मुसव्विर सोच में है रंग भरने से ज़रा पहले

सुना है वक़्त कुछ ख़ुश-रंग लम्हे ले के गुज़रा है
मुझे भी ‘शाद’ कर जाता गुज़रने से ज़रा पहले

सदा-ए-दिल न कहीं धड़कनों में गुम हो जाए

सदा-ए-दिल न कहीं धड़कनों में गुम हो जाए
ये क़ाफिला न कहीं रास्तों में गुम हो जाए

ये दिल का दर्द जो आँखों में आ गया है मेरी
मैं चाहता था मेरे क़हक़हों में गुम हो जाए

तुझे ख़बर भी है ये बे-हिसों की बस्ती है
तेरी सदा न कहीं पत्थरों में गुम हो जाए

मैं ख़ुद को ढूँढने निकला तो खो गया जैसे
निकल के घर से कोई रास्तों में गुम हो जाए

न जाने आज है तारों को क्यूँ ये अँदेशा
ये रात भी न कहीं जुगनुओं में गुम हो जाए

मैं बारहा तेरी यादों में इस तरह खोया
के जैसे कोई नदी जंगलों में गुम हो जाए

चमन से क्यूँ न शिकायत हो ‘शाद’ रंगों को
हर एक फूल अगर ख़ुशबुओं में गुम हो जाए

शाम तक फिर रंग ख़्वाबों का बिखर जाएगा क्या 

शाम तक फिर रंग ख़्वाबों का बिखर जाएगा क्या
राइगाँ ही आज का दिन भी गुज़र जाएगा क्या

ढूँडना है घुप अँधेरे में मुझे इक शख़्स को
पूछना सूरज ज़रा मुझ में उतर जाएगा क्या

मानता हूँ घुट रहा है दम तेरा इस हब्स में
गर यही जीने की सूरत है तो मर जाएगा क्या

ऐन-मुमकिन है बजा हों तेरे अंदेशे मगर
देख कर अब अपने साए को भी डर जाएगा क्या

सोच ले परवाज़ से पहले ज़रा फिर सोच ले
साथ ले कर ये शिकस्ता बाल ओ पर जाएगा क्या

एक हिजरत जिस्म ने की एक हिजरत रूह ने
इतना गहरा ज़ख्म आसानी से भर जाएगा क्या

रफ़्ता रफ़्ता मंज़र-ए-शब ताब भी आ जाएँ 

रफ़्ता रफ़्ता मंज़र-ए-शब ताब भी आ जाएँगे
नींद तो आ जाए पहले ख़्वाब भी आ जाएँगे

क्या पता था ख़ून के आँसू रूला देंगे मुझे
इस कहानी में कुछ ऐसे बाब भी आ जाएँगे

ख़ुश्‍क आँखों ने तो शायद ये कभी सोचा न था
एक दिन सहराओं में सैलाब भी आ जाएँगें

हौसले यूँ ही अगर बढ़ते गए तो देखना
साहिलों तक एक दिन गिर्दाब भी आ जाएँगे

बस ज़रा मिलने तो दो मेरी तबाही की ख़बर
दिल दुखाने के लिए अहबाब भी आ जाएँगे

आप की बज़्म-ए-मोहज़्ज़ब में नया हूँ ‘शाद’ मैं
आते आते बज़्म के आदाब भी आ जाएँगे

इस इंतिशार का कोई असर भी है के नहीं 

इस इंतिशार का कोई असर भी है के नहीं
तुझे ज़वाल की अपने ख़बर भी है के नहीं

कहीं फ़रेब न देती हों मिल के कुछ मौज़ूँ
जहाँ तू डूब रहा है भँवर भी है के नहीं

यक़ीन करने से पहले पता लगा तो सही
के तेरे दिल की सदा मोतबर भी है के नहीं

ये रोज़ अपने तआकुब में दर-ब-दर फिरना
बता मसाफ़त-ए-हस्ती सफ़र भी है के नहीं

कभी तू अपने ख़जीने उछाल साहिल पर
किसी सदफ़ में ये देखें गोहर भी है के नहीं

मैं जिस की शाख़ पे छोड़ आया आशियाँ अपना
ये सोचता हूँ के अब वो शजर भी है के नहीं

हवा से ले तो लिया ढेर सूखे पत्तों का
न जाने राख में मेरी शरर भी है के नहीं

मैं जिस के चाक पर रक्खा हूँ ‘शाद’ ढलने को
मुझे तो शक है के वो कूज़ा-गर भी है के नहीं

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