गिरीश पंकज की रचनाएँ

माँ सरस्वती

जय, जय, जय हे माँ सरस्वती,
तुमको आज निहार रहा हूँ ।
अपने हाथ पसार रहा हूँ ।।

ज्ञान-शून्य हो भटक रहा हूँ,
मुझको नव-पथ तू दर्शा दे ।
सूखे मानस में तू मेरे,
ज्ञान-सुधा आकर बरसा दे ।
मुझको शक्ति दे दे माता,
पल-पल में मैं हार रहा हूँ ।।

मातृभूमि की सेवा ही अब,
जीवन का आधार बने माँ ।
कर्म हमारी पूजा होगी,
स्वार्थ नहीं दीवार बने माँ ।
दे आशीष मुझे ओ शारद,
कबसे तुम्हें पुकार रहा हूँ ।।

कर कमलों में वीणा शोभित,
सत्कर्मों के गीत सुनाते ।
श्वेत-वसन पावन माँ तेरे,
विमल आचरण को दर्शाते ।
ज्ञान किरण दे, घोर तिमिर में,
घिरता मैं हर बार रहा हूँ ।

जय, जय, जय हे माँ सरस्वती,
तुमको आज निहार रहा हूँ ।

मत समझो बच्ची 

मत समझो मुझको तुम बच्ची,
करती हूँ मैं बातें अच्छी ।

काम करूँ मैं पढ़ने का,
सोचूँ आगे बढ़ने का ।
झूठ नहीं, मैं बोलूँ सच्ची ।
मत समझो मुझको तुम बच्ची ।

बन्द करो न मुझको घर में,
जाऊँगी मैं दुनिया भर में ।
कौन बोलता, मुझकों कच्ची ।

मत समझो मुझको तुम बच्ची,
करती हूँ मैं बातें अच्छी ।

घड़ा 

मिट्टी का मैं एक घड़ा हूँ,
आता सबके काम बड़ा हूँ ।

क्या ग़रीब, क्या पैसे वाले,
सब हैं मुझको रखने वाले।
छूआछूत को दूर भगाने,
चौराहे पर रोज़ खड़ा हूँ ।

मिट्टी का मैं एक घड़ा हूँ,
आता सबके काम बड़ा हूँ ।

मीठा रगड़म 

अगड़म-बगड़म,
छोड़ो तिकड़म ।

भूलो ऊधम,
पढ़ लो तगड़म ।

फ़ेल हुए तो,
मिलता झपड़म ।

पास हुए तो,
मीठा रगड़म ।

अगड़म-बगड़म,
छोड़ो तिकड़म ।

चिड़िया

प्यारी चिड़िया,
तू फिर आना ।

चावल दूँगी,
उसको खाना ।

खाकर के
मुझसे बतियाना ।

अपने घर का,
हाल सुनाना ।

प्यारी चिड़िया,
तू फिर आना ।

हाथी दादा

हाथी दादा रोज़ नहाते,
पानी साबुन नहीं बचाते ।

चिड़िया रहती है परेशान,
रह जाता उसका स्नान ।।

चल बस्ते 

चल-चल रे बस्ते स्कूल,
राह कहीं न जाना भूल ।

अगर ज़रा सी देर हो गई,
टीचरजी मारेंगे ‘रूल’ ।

चल-चल रे बस्ते स्कूल ।

लोरी अम्मा ! 

ओ री अम्मा, ओ री अम्मा,
देखूँ सूरत तोरी अम्मा ।

नींद नहीं आती है मुझको,
सुना जरा तू लोरी अम्मा ।

ओ री अम्मा, ओ री अम्मा ।।

छतरी : दो शिशु गीत 

एक

बारिश से टकराती छतरी,
इसीलिए तो भाती छतरी ।

देख बरसता पानी फौरन,
बिना कहे खुल जाती छतरी ।

फटी पुरानी जैसी भी हो,
काम बहुत है आती छतरी ।

बरसे जब पानी, पापा को
दफ़्तर तक पहुँचाती छतरी ।।

दो

ये जो अपना छाता है जी,
बड़े काम में आता है जी ।

कड़ी धूप हो या हो बारिश,
सबको यही बचाता है जी ।

नानी जी 

नानी जी ओ, नानी जी,
छोड़ो बात पुरानी जी ।

नई कहानी हमें सुनाओ,
कहाँ के राजा-रानी जी ।

नानी जी ओ, नानी जी ।

जंगल में दीवाली 

जंगल मे दीवाली के दिन,
होते रहे धमाके ।
सभी जानवरों ने मिलजुल कर,
फोड़े खूब पटाखे ।।

लेकिन हाथी दादा सबसे,
अलग-थलग थे उस रोज़ ।
उड़ा रहे थे, भालू के घर,
अहा, चटपटा भोज ।

सभी जानवर बोले — दादा,
बहुत ग़लत है बात ।
जंगल का अनुशासन तोड़ा,
दिया न सबका साथ ।।

हाथी दादा मुस्काये तब,
बोले आकर पास ।
मुझे न भाता धुआँ और ये
शोर-शराबा खास ।

ये पैसों की है बर्बादी,
होती नष्ट कमाई ।
इससे अच्छा भरपेट तुम,
खाओ ढेर मिठाई ।

ख़ुद भी खाओ औऱ सभी को,
बाँटो ख़ुशियाँ सारी।
तभी मनेगी दीवाली फिर,
सचमुच प्यारी-प्यारी ।

हम बच्चे 

सबके घर में दीप जलाएँगे, हम बच्चे,
हर आँगन ख़ुशियाँ बरसाएँगे, हम बच्चे ।।

सभी एक हैं हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख-ईसाई,
सबको जा-जाकर समझाएँगे, हम बच्चे ।

मेहनत और सच्चाई से ही देश बढ़ेगा,
देशभक्ति के गीत सुनाएँगे, हम बच्चे ।

सब के घर में दीप जलाएँगे, हम बच्चे ।
हर आँगन ख़ुशियाँ बरसाएँगे, हम बच्चे ।।

अच्छी-अच्छी बातें सुन

अच्छी-अच्छी बातें सुन
टिक, टिक, टिक, टिक
टुन, टुन, टुन ।
अच्छी-अच्छी बातें सुन ।

जो बच्चें पढ़ते हैं भैया,
आगे ही बढ़ते हैं भैया ।
वही सदा रहते हैं पीछे,
जो सबसे लड़ते हैं भैया ।
बात है सच्ची, इसको गुन ।

टिक, टिक, टिक, टिक
टुन, टुन, टुन ।
अच्छी-अच्छी बातें सुन ।

क ,ख, ग, घ बोलो जी,
खेलो-कूदो-डोलो जी ।
रोज सुबह जल्दी उठ जाओ,
रात को जल्दी सो लो जी ।
देखो कहता है चुन-मुन ।

टिक, टिक, टिक, टिक
टुन, टुन, टुन ।
अच्छी-अच्छी बातें सुन ।

पानी गिरता

पानी गिरता झर-झर-झर,
मोर नाचते फर-फर-फर ।
मेंढक उचक-उचक कर गाते-
गाना, सुन लो टर-टर-टर ।।

बिजली नाचे घूम-घूम कर,
पेड़ डोलते झूम-झूम कर ।
खुश हैं बादल, बाँटे पानी,
धरती माँ को चूम-चूम कर ।

बादल जी देते हैं पानी 

बादल जी देते हैं पानी

सूखी ताल-तलैया हँसती,
ख़ुश है देखो बस्ती-बस्ती ।

कोई भाग रहे न सूखा,
बिजली आकर देती गश्ती ।

सबको सुख पहुँचाने वाले,
कहलाते हैं सच्चे दानी ।

बादल जी देते हैं पानी ।।

पानी से हरियाली होगी,
धरती में ख़ुशहाली होगी ।

कहीं नहीं फिर ‘सूखा’ होगा,
हर होठों पर लाली होगी ।

बात पते की सुन लो भइया,
समझते हैं सबको ज्ञानी।

बादल जी देते हैं पानी

स्कूल 

आँखों का तारा स्कूल,
अपना तो न्यारा स्कूल ।

ज्ञान बाँटता बच्चों को नित,
कभी नहीं हारा स्कूल ।

छुट्टी के दिन रहे अकेला,
हाँ, तब बेचारा स्कूल ।

जैसे मां को मैं प्यारा हूँ,
मुझको है प्यारा स्कूल ।

आँखों का तारा स्कूल ।
अपना तो न्यारा स्कूल ।

पेड़

हरे-भरे मतवाले पेड़,
हम सबके रखवाले पेड़ ।

रंग-बिरंगे फूलों के संग,
लदे हुए फल वाले पेड़ ।

हमको मत काटो कहते हैं,
वर्षा लाने वाले पेड़ ।

पत्थर खाकर फल देते हैं,
देखो ये दिलवाले पेड़ ।

नाम कमाऊँगी

देखो मेरे हाथ डोर है,
मैं भी पतंग उड़ाऊँगी ।

जो भी मुझसे टकराएगा,
उससे पेंच लड़ाऊँगी।

काम अनोखे करती हूँ मैं,
बस, नाम की गुड़िया हूँ ।

मम्मी-पापा मुझे चिढ़ाते ,
आफत की मैं पुड़िया हूँ।

जरा बड़ी हो जाऊँ फिर तो,
जग में नाम कामाऊँगी ।

देखो मेरे हाथ डोर है,
मैं भी पतंग उड़ाऊँगी ।।

होता नाम 

व्यर्थ घूमना, ज्यादा सोना,
ऐसा करके समय न खोना।

पढ़ना-लिखना अच्छा काम,
अपना-सबका होता नाम ।।

कोयल मीठा गाती है 

कोयल से करते सब प्यार,
कौवे को मिलती दुत्कार ।

कौवा काँव-काँव करता है,
कोयल मीठा गाती है ।
कौवे की आवाज़ है कर्कश,
कोयल मन को भाती है।

तुम भी कोयल जैसा बोलो,
पाओगे जग से उपहार ।।

कोयल से करते सब प्यार
कौवे को मिलती दुत्कार ।

पिंजरे का पक्षी 

मैं पिंजरे का इक पक्षी हूँ,
मुझको तुम आज़ाद कराओ ।

मुझको भी उड़ने का हक़ है,
ये बातें सबको समझाओ ।

जिसने क़ैद किया है उसको,
आज़ादी का गीत सुनाओ ।

मैं पिंजरे का इक पक्षी हूँ।
मुझको तुम आज़ाद कराओ ।

एक हमारा देश

तरह-तरह के रंग-रूप हैं,
तरह-तरह के वेश ।
लेकिन सब हैं भाई-भाई,
एक हमारा देश ।।

धर्म और भाषा के झगड़े,
अरे कौन फैलाता ।
पूछ रही है दुखी हृदय से,
अपनी भारत माता ।
क्यों बेटे ही अपनी माँ को,
पहुँचाते हैं क्लेश ।।

आज़ादी की आन की रक्षा,
करना अपना कर्म ।
देश हमारा सबसे पहले,
देश हमारा धर्म ।
वीर शहीदों का है भाई,
यही अमर सन्देश ।।

घऱ-घर अलख जगाना है,
लोगों को समझाना है ।
ऊँच-नीच के भेदभाव को,
मिलकर आज मिटाना है ।
‘बापू’ की इस भावना को,
मत पहुँचाओ ठेस ।।

तरह-तरह के रंग रूप हैं
तरह-तरह के वेश ।
लेकिन सब हैं भाई-भाई,
एक हमारा देश ।।

मै अन्धेरे में उजाला देखता हूँ 

मैं अन्धेरे में उजाला देखता हूँ
भूख में रोटी-निवाला देखता हूँ

आदमी के दर्द की जो दे ख़बर भी
है कहीं क्या वो रिसाला देखता हूँ

हो गए आज़ाद तो फिर किसलिए मैं
आदमी के लब पे ताला देखता हूँ

हूँ बहुत प्यासा मगर मैं क्या करूँ अब
तृप्त हाथों में ही प्याला देखता हूँ

कोई तो मिल जाए बन्दा नेकदिल-सा
ढूँढ़ता मस्जिद, शिवाला देखता हूँ

तुम मिले तो दर्द भी जाता रहा

तुम मिले तो दर्द भी जाता रहा
देर तक फिर दिल मेरा गाता रहा

देख कर तुमको लगा हरदम मुझे
जन्मों-जन्मो का कोई नाता रहा

दूर मुझसे हो गया तो क्या हुआ
दिल में उसको हर घड़ी पाता रहा

अब उसे जा कर मिली मंज़िल कहीं
जो सदा ही ठोकरें खाता रहा

मुफ़लिसी के दिन फिरेंगे एक दिन
मै था पाग़ल ख़ुद को समझाता रहा

ज़िन्दगी है ये किराए का मकां
इक गया तो दूसरा आता रहा

आपकी शुभकामनाएँ साथ हैं 

आपकी शुभकामनाएँ साथ हैं
क्या हुआ गर कुछ बलाएँ साथ हैं

हारने का अर्थ यह भी जानिए
जीत की सम्भावनाएँ साथ हैं

इस अन्धेरे को फतह कर लेंगे हम
रोशनी की कुछ कथाएँ साथ हैं

मर ही जाता मैं शहर में बच गया
गाँव की शीतल हवाएँ साथ हैं

ये सफ़र अन्तिम हैं ख़ाली हाथ लोग
पर हज़ारों वासनाएँ साथ हैं

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