Poetry

चंद्रभूषण की रचनाएँ

तुम्हें नहीं लगता

बहुत देर हो चुकी है

कहते कहते कि देर हो चुकी है

तुम्हें नहीं लगता?

वह सुकूनदेह झुटपुटा

जिसमें खुशी-खुशी

हम चलते चले आए थे

इसी चिपचिपे अंधेरे का बचपना था

और मिट्टी की वो भीनी गंध

सीलन का पहला भभका थी फकत

तुम्हें लगता है

समझ का यह बदलाव

हकीकतबयानी नहीं

सिर्फ उमर का खेल है?

हम इतने सारे लोग

यहां खुद को

यही समझाते आए थे

कि हमारे मन की तरंग

और तन के ताप से

पूरा दृश्य एक दिन

शीतल प्रकाश में नहा जाएगा

हालांकि ऐसे भ्रम की गुंजाइश

यहां कम ही थी

कितना समय हुआ

जब हममें से बोला था कोई पहली बार

‘देर हो चुकी है’?

और उसका हमने क्या किया?

हम अपने खलनायक

जरा जल्दी ही चुन लेते हैं

क्या तुम्हें नहीं लगता?

न जाने कितनी देर हुई तुम्हें

बोले यह वेदवाक्य

कि तुम्हारे कहने पर नहीं

अपनी मर्जी से हम यहां आए थे

इस मर्जी की तह में समझ तुम्हारी थी

यह समझने के लिए

इतना समय कम नहीं होता

और अब तो यहां

‘हम’ जैसा भी कुछ नहीं बचा है

अंधेरे में आमने-सामने

मैं हूं और तुम हो

और एक भुतही अनुगूंज

जो कोई सवाल हो सकती थी

जो शायद कोई

जवाब भी हो सकती थी

मेरे नायक

निकल जाने या खत्म हो जाने की

यह अंतिम दुविधा जीते

क्या तुम्हें नहीं लगता

कि बहुत देर हो चुकी है

कुछ न होगा तो भी कुछ होगा

सूरज डूब जाएगा

तो कुछ ही देर में चांद निकल आएगा

और नहीं हुआ चांद

तो आसमान में तारे होंगे

अपनी दूधिया रोशनी बिखेरते हुए

और रात अंधियारी हुई बादलों भरी

तो भी हाथ-पैर की उंगलियों से टटोलते हुए

धीरे-धीरे हम रास्ता तलाश लेंगे

और टटोलने को कुछ न हुआ आसपास

तो आवाजों से एक-दूसरे की थाह लेते

एक ही दिशा में हम बढ़ते जाएंगे

और आवाज देने या सुनने वाला कोई न हुआ

तो अपने मन के मद्धिम उजास में चलेंगे

जो वापस फिर-फिर हमें राह पर लाएगा

और चलते-चलते जब इतने थक चुके होंगे कि

रास्ता रस्सी की तरह खुद को लपेटता दिखेगा-

आगे बढ़ना भी पीछे हटने जैसा हो जाएगा…

…तब कोई याद हमारे भीतर से उठती हुई आएगी

और खोई खामोशियों में गुनगुनाती हुई

हमें मंजिल तक पहुंचा जाएगी

अकेले में फगुआ

मोरि उचटलि नींद सेजरिया हो
करवट-करवट राति गई ।

ना कहुं मुरली ना कहुं पायल
झन-झन बाजै अन्हरिया हो
ना कहुं गोइयां ताल मिलावैं
बेसुर जाय उमरिया हो
करवट-करवट राति गई ।

कहवां मोहन कहां राधिका
ब्रज की कवनि डगरिया हो
कहवां फूले कदम कंटीले
कवनि डारि कोइलरिया हो
करवट-करवट राति गई ।

एकला मोहन एकली राधिका
भौंचक बीच बजरिया हो
एकली बंधी प्रीत की डोरी
लेत न कोऊ खबरिया हो
करवट-करवट राति गई ।

ऊधो तोहरी रहनि बेगानी
एकली सारी नगरिया हो
देहिं उगै जइसे जरत चनरमा
हियरा बजर अन्हरिया हो
करवट-करवट राति गई ।

रहन कहौ यहि देस न ऊधो
हमरी जाति अनरिया हो
राही हम कोउ अगम देस कै
चलब होत भिनुसरिया हो
करवट-करवट राति गई ।

मोरि उचटलि नींद सेजरिया हो
करवट-करवट राति गई ।

तुम्हारे लिए

बादलों तक विचरती

य’ पतंग

तुम्हारे लिए

दिल में हुलस-हुलस उठती

य’ तरंग

तुम्हारे लिए

मेरी देह

य’ सरग नसैनी

तुम्हारे लिए

मेरी आत्मा

य’ अगम बेचैनी

तुम्हारे लिए

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