Poetry

चित्रांश खरे की रचनाएँ

कायनात-ए-आरज़ू में हम बसर करने लगे

कायनात-ए-आरज़ू में हम बसर करने लगे
सब बहुत नफरत से क्यूँ हमपर नज़र करने लगे

तेरे हर लम्हे का हमने आज तक रख्खा हिसाब,
ये अलग है बात खुद को बेखबर करने लगे

ज़िंदगी को अलविदा कहकर चला जाऊंगा में,
जब मेरी तन्हाई मुझको दरवादर करने लगे

मुल्क की बरवादियाँ उस वक़्त तय हो जायेंगी,
जब बुरी तहज़ीब बच्चों पर असर करने लगे

या खुदा राहे वफ़ा पर रहबरी करना मेरी,
जब मुझे गुमराह मेरा हमसफ़र करने लगे

छोड़कर उस वक़्त ओहदे खुद चला जाऊँगा में,
शक़ जहाँ कोई मेरे ईमान पर करने लगे

इश्क़ के उस मोड़ को सब लोग कहते हैं जुनूं,
दिल किसी को याद जब शामों-सहर करने लगे

दोनों की आरज़ू में चमक बरकरार है

दौनों की आरज़ू में चमक बरकरार है,
मैं इस तरफ हूँ और वो दरिया के पार है

दुनिया समझ रही है की उसने भुला दिया,
सच ये है उसे अब भी मेरा इंतज़ार है

शायद मुझे भी इश्क ने शादाब कर दिया,
मेरे दिलो दिमाग में हर पल खुमार है

क्यों मेने उसके प्यार में दुनियां उजाड़ ली,
इस बात से वो शख्स बहुत शर्मसार है

तूने अदा से देखकर मजबूर कर दिया,
तीरे निगाह दिल का मेरे आर पार है

दौलत से ज़रा सी भी मुहब्बत नहीं मुझे,
फिर भी मेरे नसीब में ये बेशुमार है

अपने जज़्बात को लफ़्ज़ों में बदलना होगा

अपने जज़्बात को लफ़्ज़ों में बदलना होगा
दर्द की राह से अश्क़ों को गुज़रना होगा

जान दे दूंगा वफाओं की हिफाज़त में कभी,
मुझपे इतना तो भरोसा तुझे करना होगा

अब किसी ग़ैर का होने को जी नहीं करता,
मुझको ता-उम्र तेरी याद में जलना होगा

टाट के वक़्त तेरी राह तकेगीं आँखें,
चाँद तारों को मेरे साथ पिघलना होगा

हाय इन सर्द हवाओं के सुलगते झोके,
कुछ तो मोसम के इशारों को समझना होगा

कल सहर होते ही मुम्किन है कोई सच जागे,
रात भर तुझको उमीदों से बहलना होगा

बचाकर सबकी नज़रों से इसे पर्दे में रहने दो

बचाकर सबकी नज़रों से इसे पर्दे में रहने दो
तुम अपने हुस्न की दौलत मेरे हिस्से में रहने दो

मुहब्बत की क़सम देकर मुझे तब्दील मत करना,
मैं जैसा हूँ मुझे वैसा मेरे लहजे में रहने दो

महल उसके लिए हैं जो कदम चूमे ज़माने के,
अगर खुद्दार है तो फिर उसे कच्चे में रहने दो

बहन के साथ होने का मुझे अहसास रहता है,
कलाई को मेरी ता-उम्र इस धागे में रहने दो

मेरा ही ज़हन दुनिया के सफ़र में खींच लाता है,
मगर ये रूह कहती है मुझे काबे में रहने दो

बड़े शहरों में बच्चों के बिगड़ने की रिवायत है,
अगर्र ये सच है तो बेटी मेरी कासवे में रहने दो

मुहब्बत की गली से हम जहाँ होकर निकल आये

मुहब्बत की गली से हम जहाँ होकर निकल आये
ग़ज़ल कहने के तब से खुद ब खुद मंज़र निकल आये

हमारे हाल पर कोई भी होता जी नही पाता
ग़ज़ल ने हाथ जब पकड़ा तो हम बचकर निकल आये

ये सरकारी महल भी किस कदर कच्चे निकलते है
ज़रा बारिश हुई बुनियाद के पत्थर निकल आये

सिफारिस के बिना जब भी चले हम हसरतें लेकर
हुई जब शाम तो मायूस अपने घर निकल आये

ज़रा सी देर हमने नर्म लहजा किया अपना
हमारे दुश्मनों के कैसे-कैसे पर निकल आये

 

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