Poetry

ममता किरण की रचनाएँ

स्त्री

स्त्री झाँकती है नदी में
निहारती है अपना चेहरा
सँवारती है अपनी टिकुली, माँग का सिन्दूर
होठों की लाली, हाथों की चूड़ियाँ
भर जाती है रौब से
माँगती है आशीष नदी से
सदा बनी रहे सुहागिन
अपने अन्तिम समय
अपने सागर के हाथों ही
विलीन हो उसका समूचा अस्तित्व इस नदी में।

स्त्री माँगती है नदी से
अनवरत चलने का गुण
पार करना चाहती है
तमाम बाधाओं को
पहुँचना चाहती है अपने गन्तव्य तक।

स्त्री माँगती है नदी से सभ्यता के गुण
वो सभ्यता जो उसके किनारे
जन्मी, पली, बढ़ी और जीवित रही।

स्त्री बसा लेना चाहती है
समूचा का समूचा संसार नदी का
अपने गहरे भीतर
जलाती है दीप आस्था के
नदी में प्रवाहित कर
करती है मंगल कामना सबके लिए
और…
अपने लिए माँगती है
सिर्फ नदी होना।

स्मृतियाँ

मेरी माँ की स्मृतियों में कैद है
आँगन और छत वाला घर
आँगन में पली गाय
गाय का चारा सानी करती दादी
पूरे आसमान तले छत पर
साथ सोता पूरा परिवार
चाँद तारों की बातें
पड़ोस का मोहन
बादलों का उमड़ना-घुमड़ना
दरवाजे पर बाबा का बैठना।

जबकि मेरी स्मृतियों में
दो कमरों का सींखचों वाला घर
न आँगन न छत
न चाँद न तारे
न दादी न बाबा
न आस न पड़ोस
हर समय कैद
और हाँ…
वो क्रेच वाली आंटी
जो हम बच्चों को अक्सर डपटती।

जन्म

जन्म लूँ यदि मैं पक्षी बन
चिड़ियाँ बन चहकूँ तुम्हारी शाख पर
आँगन-आँगन जाऊँ, कूदूँ, फुदकूँ
वो जो एक वृद्ध जोड़ा कमरे से निहारे मुझे
तो उनको रिझाऊँ, पास बुलाऊँ
वो मुझे दाना चुगायें, मैं उनकी दोस्त बन जाऊँ।

जन्म लूँ यदि मैं फूल बन
खुशबू बन महकूँ
प्रार्थना बन करबद्ध हो जाऊँ
अर्चना बन अर्पित हो जाऊँ
शान्ति बन निवेदित हो जाऊँ
बदल दूँ गोलियों का रास्ता
सीमा पर खिल-खिल जाऊँ।

जन्म लूँ यदि मैं अन्न बन
फसल बन लहलहाऊँ खेतों में
खुशी से भर भर जाए किसान
भूख से न मरे कोई
सब का भर दूँ पेट।

जन्म लूँ यदि मैं मेघ बन
सूखी धरती पर बरस जाऊँ
अपने अस्तित्व से भर दूँ
नदियों, पोखरों, झीलों को
न भटकना पड़े रेगिस्तान में
औरतों और पशुओं को
तृप्त कर जाऊँ उसकी प्यास को
बरसूँ तो खूब बरसूँ
दु:ख से व्याकुल अखियों से बरस जाऊँ
हर्षित कर उदास मनों को।

जन्म लूँ यदि मैं अग्नि बन
तो हे ईश्वर सिर्फ़ इतना करना
न भटकाना मेरा रास्ता
हवन की वेदी पर प्रज्जवलित हो जाऊँ
भटके लोगों की राह बन जाऊँ
अँधेरे को भेद रोशनी बन फैलूँ
नफ़रत को छोड़ प्यार का पैगाम बनूँ
बुझे चूल्हों की आँच बन जाऊँ।

ग़म-ए-दुनिया से गर पायी भी फ़ुरसत सर उठाने की

ग़म-ए-दुनिया से गर पायी भी फ़ुरसत सर उठाने की
तो फिर कोशिश करेंगे हम भी कुछ कुछ मुस्कुराने की

सुनी थी बात घर की चाँद पर दादी के किस्सों में
हकीक़त हो ही जाएगी वहां अब आशियाने की

बशर के बीच पहले भेद करते हैं सियासतदां
ज़रूरत फिर जताते हैं किसी कौमी तराने की

वतन की नींव में मिटटी जमा है जिन शहीदों की
कभी भी भूल ना करना उन्हें तुम भूल जाने की

नगर में जब से बच्चे रह गए और गाँव में दादी
लगाये कौन फिर आवाज़ परियों को बुलाने की

जलायोगे दिए तूफां में अपने हौसलों के गर
कोई आंधी नहीं कर पायेगी हिम्मत बुझाने की

नदी के वेग को ज्यादा नहीं तुम बाँध पाओगे
जो हद हो जाएगी तो ठान लेगी सब मिटाने की

कहा तुमसे अगर कुछ तो उसे क्या मान लोगे तुम
शिकायत फिर तुम्हें मुझसे है क्यूँ कुछ ना बताने की

सभी रंग उनके चेहरे पर लगे हैं प्यार के खिलने
ज़रूरत ही नहीं उनको हिना के अब रचाने की

यही किस्मत है क्या सच्ची मोहब्बत करने वालों की
उन्हें बस ठोकरें मिलती रहें सारे ज़माने की

 

वृक्ष था हरा भरा

वृक्ष था हरा-भरा
फैली थी उसकी बाँहें
उन बाहों में उगे थे
रेशमी मुलायम नरम नाजुक नन्हें से फूल
उसके कोटर में रहते थे
रूई जैसे प्यारे प्यारे फाहे
उसकी गोद में खेलते थे
छोटे छोटे बच्चे
उसकी छांव में सुस्ताते थे पंथी
उसकी चौखट पर विसर्जित करते थे लोग
अपने अपने देवी देवता
पति की मंगल कामना करती
सुहागिनों को आशीषता था
कितना कुछ करता था सबके लिए
वृक्ष था हरा भरा।

पर कभी-कभी
कहता था वृक्ष धीरे से
फाहे पर लगते उड़ जाते हैं
बच्चे बड़े होकर नापते हैं
अपनी अपनी सड़कें
पंथी सुस्ता कर चले जाते हैं
बहुएँ आशीष लेकर
मगन हो जाती हैं अपनी अपनी गृहस्थी में
मेरी सुध कोई नहीं लेता
मैं बूढ़ा हो गया हूँ
कमज़ोर हो गया हूँ
कब भरभरा कर टूट जाएँ
ये बूढ़ी हड्डियाँ
पता नहीं
तुम सबसे करता हूँ एक निवेदन
एक बार उसी तरह
इकट्ठा हो जाओ
मेरे आँगन में
जी भरकर देख तो लूँ।

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