यश मालवीय की रचनाएँ

चाय प्रेम से सीझा एक प्रेम गीत 

अच्छी चाय कहीं फ़ुर्सत से
चलकर पीते हैं

चीविंगम चुभलाते मुँह का
टेढ़ा-मेढ़ा होना
दो पल हमको भी दे-दो ना
इतने व्यस्त बनो ना

वह लमहे जो साथ जिये हैं
अच्छे बीते हैं

शाम हो गई तलब लगी है
सिर भी लगा पिराने
चोरी-चुपके से बतियाने
आया किसी बहाने

दिन-दिन भर से धरे मेज़ पर
प्याले रीते हैं

बाहर तो आओ क़िताब से
मौसम भी अच्छा है
कुछ अधीर सा गुलदस्ते में
फूलों का गुच्छा है

दिन बीतें, जो बिना तुम्हारे
लगते तीते हैं

देख रही है माँ

जाती हुई धूप संध्या की
सेंक रही है माँ
अपना अप्रासंगिक होना
देख रही है माँ

भरा हुआ घर है
नाती पोतों से, बच्चों से
अन बोला बहुओं के बोले
बंद खिड़कियों से
दिन भर पकी उम्र के घुटने
टेक रही है माँ

फूली सरसों नही रही
अब खेतों में मन के
पिता नहीं हैं अब नस नस
क्या कंगन सी खनके
रस्ता थकी हुई यादों का
छेक रही है माँ

बुझी बुझी आँखों ने
पर्वत से दिन काटे हैं
कपड़े नहीं, अलगनी पर
फैले सन्नाटे हैं
इधर उधर उड़ती सी नजरें
फेक रही है माँ

गाए फगुआ कबीर 

गाए फगुआ कबीर
जागे सुलझे हैं सौ सवाल
हर आहट है गुलाल
गीत गुनगुनाने हैं
पूजा का सजा थाल
अच्छा है हालचाल
ओढ़ें हैं हवा शाल
होंठ पर बहाने हैं
साँसों में हैं अबीर
गाये फगुआ कबीर
लगे बीच धारा भी
जैसे हो नदी तीर
नावों में खिंचा पाल
उड़ते हैं खुले बाल
शब्दों में है उछाल
भाव डगमगाने हैं
मन सबको ले सहेज
पुरवाई चले तेज
चलों खोलकर बैठे
यादों के वही पेज
एक हुये होंठ गाल
अब कैसी रख संभाल
मछली को लिखा जाल
होश फिर ठिकाने हैं।

मौसम हो गया फागुनी 

सपने मैरून हुये
शाम बैंजनी
बोलते धुधलके में
छुपी रोशनी
कौंध रहे बादल की
छांव के बसेरे
बडा कठिन अपने से
कोई मुंह फेरे
हर जुगनू में चमकी
धूप की कनी
नाव संग डोल रहा
नदी का किनारा
जाने फिर किसने
उस ओर से पुकारा
पल भर में मौसम
हो गया फागुनी
चाय जरा छलकी
मन और और छलका
इस जरा छलकने से
समय हुआ हलका
होंठो पर अभी
हर पंक्ति गुनगुनी
सहसा ही हवा चली
फूल फूल जागा
साँसों में महक उठा
साँसों का धागा
मुश्किल से बिगड़ी सी
बात है बनी।

कोई एक पेड़ तट का 

कोई एक पेड़ तट का
क़द हमारा नाप जाता है
हमारी झील का समतल
हवा में काँप जाता है

बहुत से मिथ उजागर कर
सवेरा धुँध में खोए
बड़ी तस्कीन मिलती है
अँधेरा फूटकर रोए
जो मन को निर्वसन करता
वही फिर ढाँप जाता है

ज़ेहन में बर्फ़ गिरती
सोच में आकाश आ बैठे
कोई ’एहसास’ ठिठुरा
गठरियों-सा पास आ बैठे
हमारी रुह की
जलती लकड़ियाँ ताप जाता है

बहुत-कुछ कौंधता है
कौंध कर, करता किनारा फिर
उसी इक कौंधने को
हम नहीं पाते दुबारा फिर
समझ पाते नहीं हम
और अपना ’आप’ जाता है

नींद में हो रही बारिश

ख़्वाब सच हों, है हँसी हर चन्द कोशिश
नींद ही में हो रही है कहीं बारिश

रात, काली रात
उजली-सी पहाड़ी
खिलखिलाकर हँस रहा
मौसम अनाड़ी
बीच जंगल में कहीं पर
रुकी गाड़ी
जुगनुओं की जल रही बुझ रही माचिस

साँवले-से
रोशनी के हैं इशारे
हवा चलती
पेड़ होते हैं उघारे
घाटियों से ही
नदी का घर पुकारे
हर लहर शोला कि है हर लहर आतिश

लड़कियों से
झील-झरने खेत हारे
फूल अपनी पत्तियों को
आँख मारे
ओट में शरमा रहे हैं
गीत सारे
पढ़ रहे हैं सोबती का ’दिलो-दानिश’

कोई चिनगारी तो उछले

अपने भीतर आग भरो कुछ, जिस से यह मुद्रा तो बदले।

इतने ऊँचे तापमान पर शब्द ठिठुरते हैं तो कैसे,
शायद तुमने बाँध लिया है ख़ुद को छायाओं के भय से,
इस स्याही पीते जंगल में कोई चिनगारी तो उछले।

तुम भूले संगीत स्वयं का मिमियाते स्वर क्या कर पाते,
जिस सुरंग से गुजर रहे हो उसमें चमगादड़ बतियाते,
ऐसी राम भैरवी छेड़ो आ ही जायँ सबेरे उजले।

तुमने चित्र उकेरे भी तो सिर्फ़ लकीरें ही रह पायीं,
कोई अर्थ भला क्या देतीं मन की बात नहीं कह पायीं,
रंग बिखेरो कोई रेखा अर्थों से बच कर क्यों निकले?

बेटे पर तीन गीत

(1)
जन्मदिन बेटे तुम्हारा !
साथ लाया नया सूरज
और बीता कल हमारा
आज पंद्रह साल पीछे
देर तक देखा निहारा
जन्मदिन बेटे तुम्हारा !

तुम दुधाइन गन्ध से गेहूँ हुए
कस रही-सी देह की ख़ुशबू हुए
भीगती-सी मसें चेहरे पर उगीं
टिमटिमाती आँख में जुगनू हुए

पर हमारे ख़ून ने ही
हमें बिन बोले पुकारा
उठी गंगा की लहर-सी
झिलमिलाती भावधारा
जन्मदिन बेटे तुम्हारा

एक भाई घर कि इक बाहर खिला
पीढ़ियों तक रोशनी का सिलसिला
बहन चम्पा सी हँसी दालान में
क्यों न गहरा दुख उठे फिर तिलमिला

एक झोंका उठा पल भर
हुआ बरगद भी उधारा
मन हुआ फिर मिले हमको
ज़िन्दगी अपनी दुबारा
जन्म दिन बेटे तुम्हारा

माँ तुम्हारी खीर सी महकी फिरी
हुई दादी बीच हलुए के, गरी
लगी करने याद बाबा को ज़रा
मन भरा तो आँख भी थोड़ी भरी

नाव जैसे पा गई फिर
भँवर में खोया किनारा
सजी टोली की दुआएँ
टँका अक्षत का सितारा
जन्म दिन बेटे तुम्हारा

(2)
हमारा लाड़ला स्कूल जाता है
बहुत कुछ याद आता है
बहुत कुछ भूल जाता है
टिंफ़िन लेकर हमारा लाड़ला
स्कूल जाता है

कि तुमसे ही सुबह होती
कि तुमसे शाम होती है
कि सारी सल्तनत जैसे
हमारे नाम होती है
तुम्हारी बाँह से झोंका हवा का
झूल जाता है

तुम्हारे हाथ की रोटी
समय का स्वाद होती है
हुँकारी भर रहा मौसम
कहानी याद होती है
दुआएँ साथ देती हैं
कि मन फल-फूल जाता है

तुम्हारी बोलियों में
भोर की चिड़िया चहकती है
पुरानी डायरी में
एक कविता-सी महकती है
लहर में नाव के सँग
गीत का मस्तूल जाता है
(3)

बहुत दिनों पर घर आए हो
बेटे कैसे हो ?
चलने फिरने में, दिखने में
मेरे जैसे हो !

मेरे बाद तुम्हें रहना है
दुनिया जीनी है
हर मिठास के साथ जुड़ी
कड़ुवाहट पीनी है
आने वाला कल हो फिर भी
लगते तय से हो !

राजपाट देखना,
समझना ज़िम्मेदारी भी
आने लगीं समझ तुमको
हारी-बीमारी भी
देखो तो आइना, जान लो
कैसे, ऐसे हो !

वैसे ही बोलते, बात करते
हँस देते हो
बात-बात पर वैसे ही
जुमले कस देते हो
मैं अब तक जैसा था
तुम भी बिल्कुल वैसे हो !

अपनी आदत की मत पूछो
अचरज होता है
सूरज का वंशज भी आख़िर
सूरा होता है
बँधी नोट से बँधे,
खुले तो फुटकर पैसे हो !

दुखते हुए घाव,
यात्रा के क़िस्से कहते हैं
पाँव तुम्हारे अब मेरे
जूतों में रहते हैं
कहीं पराजय और कहीं
अपनी ही जय से हो !

अलग तरह से जीने की
तरक़ीबें गुनते हो
सुख मिलता जब अपनी अलग
राह भी चुनते हो
बाक़ायदा ठसक से हो
कब जैसे तैसे हो !

गाँव से घर निकलना है 

कुछ न होगा तैश से या सिर्फ़ तेवर से,

चल रही है, प्यास की बातें समन्दर से ।

रोशनी के काफ़िले भी भ्रम सिरजते हैं,

स्वर आगर ख़ामोश हो तो और बजते हैं,

अब निकलना ही पड़ेगा, गाँव से- घर से

एक सी शुभचिंतकों की शक्ल लगती है,

रात सोती है हमारी नींद जगती है,

जानिए तो सत्य भीतर और बाहर से ।

जोहती है बाट आँखें घाव बहता है,

हर कथानक आदमी की बात कहता है,

किसलिए सिर भाटिए दिन- रात पत्थर से ।

फूल हैं हम हाशियों के

चित्र हमने हैं उकेरे आँधियों में भी दियों के,

हमें अनदेखा करो मत फूल हैं हम हाशियों के ।

करो तो महसूस, भीनी गंध है फैली हमारी,

हैं हमी में छुपे, तुलसी – जायसी, मीरा – बिहारी,

हमें चेहरे छल न सकते धर्म के या जातियों के ।

मंच का अस्तित्व हम से हम भले नेपथ्य में हैं,

माथे की सलवटों सजते ज़िंदगी के कथ्य में हैं,

धूप हैं मन की, हमीं हैं, मेघ नीली बिजलियों के ।

सभ्यता के शिल्प में हैं सरोकारों से सधे हैं,

कोख में कल की पलें हैं डोर से सच की बँधे हैं,

इन्द्रधनु के रंग हैं, हम रंग उड़ती तितलियों के ।

वर्णमाला में सजे हैं क्षर न होंगे अग्नि-अक्षर,

एक हरियाली लिये हम बोलते हैं मौन जल पर,

है सरोवर आँख में, हम स्वप्न तिरती मछलियों के ।

ऐसी हवा चले 

काश तुम्हारी टोपी उछले ऐसी हवा चले,

धूल नहाएँ कपड़े उजले ऐसी हवा चले ।

चाल हंस की क्या होगी जब सब कुछ काला है,

अपने भीतर तुमने काला कौवा पाला है,

कोई उस कौवे को कुचले ऐसी हवा चले ।

सिंहासन बत्तीसी वाले तेवर झूठे हैं,

नींद हुई चिथड़ा, आँखों से सपने रुठे हैं,

सिंहासन- दुःशासन बदले ऐसी हवा चले ।

राम भरोसे रह कर तुमने यह क्या कर डाला,

शब्द उगाये सब के मुँह पर लटका कर ताला,

चुप्पी भी शब्दों को उगले ऐसी हवा चले ।

रोटी नहीं पेट में लेकिन मुँह पर गाली है,

घर में सेंध लगाने की आई दीवाली है,

रोटी मिले, रोशनी मचले ऐसी हवा चले ।

उजियारे के कतरे

लोग कि अपने सिमटेपन में बिखरे-बिखरे हैं,
राजमार्ग भी, पगडंडी से ज्यादा सँकरे हैं ।

हर उपसर्ग हाथ मलता है प्रत्यय झूठे हैं,
पता नहीं हैं, औषधियों को दर्द अनूठे हैं,
आँखें मलते हुए सबेरे केवल अखरे हैं ।

पेड़ धुएँ का लहराता है अँधियारों जैसा,
है भविष्य भी बीते दिन के गलियारों जैसा
आँखों निचुड़ रहे से उजियारों के कतरे हैं ।

उन्हें उठाते जो जग से उठ जाया करते हैं,
देख मज़ारों को हम शीश झुकाया करते हैं,
सही बात कहने के सुख के अपने ख़तरे हैं ।

नईम को देखे बहुत दिन हो गए 

नईम को देखे
बहुत दिन हो गए

वो जुलाहे सा कहीं कुछ बुन रहा होगा
लकड़ियों का बोलना भी सुन रहा होगा
ख़त पुराने,
मानकर पढ़ता नए

ज़रा सा कवि, ज़रा बढ़ई, ज़रा धोबी
उसे जाना और जाना गीत को भी
साध थी कोई, सधी,
साधू भए

बदल जाना मालवा का सालता होगा
दर्द का पंछी जतन से पालता होगा
घोंसलों में
रख रहा होगा बए

स्वर वही गन्धर्व वाला कांपता होगा
टेगरी को चकित नयनों नापता होगा
याद आते हैं
बहुत से वाक़िए

ज़िन्दगी ओढ़ी बिछाई और गाया
जी अगर उचटा, इलाहाबाद आया
हो गए कहकहे,
जो थे मर्सिए।

गीत बनाने की ज़िद है 

दीवारों से भी बतियाने की ज़िद है
हर अनुभव को गीत बनाने की ज़िद है

दिये बहुत से गलियारों में जलते हैं
मगर अनिश्चय के आँगन तो खलते हैं

कितना कुछ घट जाता मन के भीतर ही
अब सारा कुछ बाहर लाने की ज़िद है

जाने क्यों जो जी में आया नहीं किया
चुप्पा आसमान को हमने समझ लिया

देख चुके हम भाषा का वैभव सारा
बच्चों जैसा अब तुतलाने की ज़िद है

कौन बहलता है अब परी कथाओं से
सौ विचार आते हैं नयी दिशाओं से

खोया रहता एक परिन्दा सपनों का
उसको अपने पास बुलाने की ज़िद है

सरोकार क्या उनसे जो खुद से ऊबे
हमको तो अच्छे लगते हैं मंसूबे

लहरें अपना नाम-पता तक सब खो दें
ऐसा इक तूफान उठाने की ज़िद है

दीवाली

देह हुई दीपावली, जगमग-जगमग रात
करे अमावस किस तरह, अब कोई भी घात॥

चाहे कुछ हो अब कहीं, होगी नहीं अंधेर
दिया पहन कर शाम से, हंसने लगी मुंडेर॥

आंखों में सजने लगा, पूजा का सन्देश
मंद-मंद मुस्का उठे, लक्ष्मी और गणेश॥

मन में आतिशबाजियां, तन पर उसकी जोत
आंखों में तिरने लगा, सांसों का जलपोत॥

तिमिर छंद को तोड़कर, जुड़ा तीज त्यौहार
कहीं फुलझड़ी हंस पड़ी, छूटा कहीं अनार॥

डबडब करती आंख में, झिलमिल करते दीप
ऐसे भी आया करे, कोई कभी समीप॥

जब जैसा राजा बोलेगा

सिंहासन के आगे-पीछे
जी भर डोलेगी
जब जैसा राजा बोलेगा
परजा बोलेगी

राजा अगर हँसेगा
तो परजा भी हँस देगी
समझ न पाएगी अपनी
गर्दन ही कस लेगी
जागी-सी आँखों देखेगी सपना,
सो लेगी

ख़ून चूसते जो
उन पर ही वारी जाएगी
हर उड़ान, उड़ने से पहले
मारी जाएगी
उम्मीदों के नुचे हुए से
पर ही तोलेगी

अंधियारों के ज़ख़्म
रोशनी के प्यासे होंगे
हर बिसात पर
उल्टे-सीधे से पाँसे होंगे
सिसक-सिसककर हवा चलेगी
आँख भिगो लेगी

तुम्ही हो माता, पिता तुम्ही हो
गाती जाएगी
आँगन होगा, आँगन से
सँझवाती जाएगी
दुनिया अपनी साँस गिनेगी
नब्ज टटोलेगी

राजभवन के आगे भी
कुछ भिखमंगे होंगे
तीन रंग वाले क़िस्से भी
सतरंगे होंगे
धूप जल रही सी पेशानी
फिर-फिर धो लेगी

बारिश के दिन आ गए

बारिश के दिन आ गए हँसे खेत खपरैल
एक हँसी मे धुल गया मन का सारा मैल

अबरोही बादल भरें फिर घाटी की गोद
बजा रहे हैं डूब कर अमजद अली सरोद

जब से आया गाँव में यह मौसम अवधूत
बादल भी मलने लगे अपने अंग भभूत

बदली हँसती शाम से मुँह पर रख रूमाल
साँसो में सौगंध है आँखें हैं वाचाल

बादल के लच्छे खुले पेड़ कातते सूत
किसी बात का फिर हवा देने लगी सबूत

कठिन गरीबी क्या करे अपना सरल स्वाभाव
छत से पानी रिस रहा जैसे रिसता घाव

मीठे दिन बरसात के खट्टी मीठी याद
एक खुशी के साथ हैं सौ गहरे अवसाद

बिजली चमके रात भर आफ़त में है जान
मैला आँचल भीगता सीला है गोदान

सासों में आसावरी आँखो में कल्यान
सहे किस तरह हैसियत बूँदो वाले बान

ठोस लिखना या तरल लिखना

ठोस लिखना या तरल लिखना
दोस्त मेरे कुछ सरल लिखना

आस्था के सिन्धु मंथन में
नाम पर मेरे गरल लिखना

भोर में भी एक सो रहे हैं जो
नींद में उनकी खलल लिखना

पाँव जब पथ से भटकते हों
गाँव की कोई मसल लिखना

झूठ का चेहरा उतर जाए
बात जब लिखना असल लिखना

पेट की जो आग है उसको
आग में झुलसी फसल लिखना

घर में ही घर चुप रहते हैं

नींव के पत्थर चुप रहते हैं
हम तो अक्सर चुप रहते हैं

खिड़की दरवाज़े दीवारें
देखें खिंची हुई तलवारें

डोला करती हैं छायाएँ
घर में घर चुप रहते हैं

अबाबील सी हर सच्चाई
दिखकर छुप जाती ऊँचाई

ख़ुद हैरत में हैं तकरीरें
बाहर भीतर चुप रहते हैं

रेतघड़ी सुनसान सजाए
सिर्फ़ रात का समय बजाए

खाते हैं धोखे पर धोखा
आँसू पीकर चुप रहते हैं

सड़क पहाड़ों की ज्यों टूटे
सपने पड़ जाते हैं झूठे

ये कैसा मौसम आया
मस्त कलंदर चुप रहते हैं

पानी का खारापन चखते
साहिल मुँह पर ऊँगली

लहरों की सीना ज़ोरी पर
नदी समंदर चुप रहते हैं

पर्वत सागर नदियों झीलों
चलते जाते मीलों मीलों

सबसे जीते ख़ुद से हारे
कई समंदर चुप रहते हैं

जलती बुझती हैं कंदीलें
चुभती सन्नाटे की कीलें

मन कुछ कहता नहीं कि मन में
उठे बवंडर चुप रहते है

पानी भी धुआँ देने लगा 

प्यास के हर प्रश्न पर सूखा कुआँ देने लगा
आग की क्या बात, पानी भी धुआँ देने लगा

मरे पशु की गंध से भारी हुए रस्ते
रो रहे हैं लोग, केवल हादसे हँसते
जो मिला बस थके काँधों पर जुआ देने लगा

युग पुरूष, युगबोध के और हुए दीखे
भीड़ में चुप रहे पर सुनसान में चीख़े
मौत का डर मगर जीने की दुआ देने लगा

बस जंयती, पुण्यतिथियों में उमर बीती
किस घड़ी में कलेंडर से दोस्ती की थी
वक़्त नंगा तार बिजली का छुआ देने लगा

‘लोनमेला’ देख सब मेले हुए फीके
उस तरह मर लिया, मर लो इस तरह जी के
जो नहीं था, क्लास अपना बुर्जु़आ देने लगा

हो रहा जो, कभी उसकी भी वजह देखो
आँख जल जाए न सपने इस तरह देखो
स्वयं को आवाज़ बूढ़ा ‘हरखुआ’ देने लगा

एक दुनिया कई हिस्सों में कुतर ली

भीड़ से भागे हुओं ने
भीड़ कर दी
एक दुनिया कई हिस्सों में
कुतर ली
सिर्फ़ ऎसी और
तैसी में रहे
रहे होकर
ज़िन्दगी भर असलहे
जब हुई ज़रूरत,
आँख भर ली
रोशनी की आँख में
भरकर अंधेरा
आइनों में स्वयं को
घूरा तरेरा
वक़्त ने हर होंठे पर
आलपिन धर दी
उम्र बीती बात करना
नहीं आया
था कहीं का गीत,
जाकर कहीं गया
दूसरों ने ख़बर ली,
अपनी ख़बर दी

सीढ़ियाँ ही सीढ़ियाँ हैं

एक भी कमरा नहीं है
मगर सौ-सौ खिड़कियाँ हैं
छत नहीं, ऊँचाइयों तक
सीढ़ियाँ ही सीढ़ियाँ हैं
रोशनी ही पी गए
कुछ लोग रोशनदान थे जो
आग ही अपनी नहीं
किस आग को पालो सहेजो?
जल रहे घर, बस्तियाँ ही
धुँए वाली चिमनियाँ हैं
पेड़-पत्ते चुप
कि सूनापन हवाओं में घुला है
ज़ेहन में बस
डबडबायी आँख वाला चुटकुला है
जिन्हें पढ़ने का नहीं साहस
कि ऎसी चिट्ठियाँ हैं
होंठ अपने हिल रहे हैं
बात पर अपनी नहीं है
दृश्य हैं ऎसे कि अपनी
आँख भी झपनी नहीं है
ज़िन्दगी के हर सफ़े पर
कुछ पुरानी ग़लतियाँ हैं

ख़ुद कलेजा पकड़ने लगी बिजलियाँ

ख़ुद कलेजा पकड़ने लगी बिजलियाँ
चोंच में बाज़ की शान्ति की टहनियाँ
फिर धमाकों में बजने लगी खिड़कियाँ
रोशनी तो हुई
पर धुआँ हो गई
जिससे लपटें उठीं,
वो कुआँ हो गईं
ख़ुद कलेजा पकड़ने लगीं बिजलियाँ
लोग सोकर उठे
और नारे उठे
कुछ लहर में नहीं
सब किनारे उठे
तन खुजाने लगीं रेत में कश्तियाँ
वक़्त के होंठ
कुछ और नीले हुए
लाल आँखें हुईं
दृश्य पीले हुए
फिर ज़हर में धुलीं कुछ नई तल्ख़ियाँ
जो हवा थी कभी
आँधियाँ बो गई
छप्परों-छप्परों
सिसकियाँ बो गई
धूल पीने लगीं नीम की तख़्तियाँ

एक फ़ैण्टेसी बुनें आओ

एक फ़ैण्टेसी बुनें आओ
एक फ़ैण्टेसी बुनें आओ
गीत जो अब तक नहीं गाया
हम उसे समझें सुनें आओ

हैं रिहर्सल में हमारी आत्माएँ
और मंचन की नहीं तारीख़ तय है
बोलने के नाम पर ज़्यादा कहें क्या
घुट रहे से शोर की ही चीख़ तय है,

एक फ़ैण्टेसी बुनें आओ
उँगलियों पर ख़ून की बूँदें सजाएँ
फूल काँटों से चुनें आओ

नीच ट्रेजडी का कथानक भूल जाएँ
खुली खिड़की से निहारें आसमाँ
पाँव से ही ये ज़मी नत्थी रहे
और हम फिर-फिर पुकारें आसमाँ

एक फ़ैण्टेसी बुनें आओ
आ रहे कल पर ज़रा सोचें-विचारें
सिर रुई जैसा धुनें आओ

कुछ नहीं ‘रेडिकल’ रहा तो क्या हुआ
बत्तखों जैसी सुबह अब भी सजे
रात में भी जाग उठती हैं उम्मीदें
दस बजे, ग्यारह बजे, बारह बजे

एक फ़ैण्टेसी बुनें आओ
है लबालब ताल आँखॊं का
गुनगुना पानी गुनें आओ

है धुएँ में सदी

है धुएँ में सदी
उसको आवाज़ दो
बन्द घड़ियों को कोई
घड़ीसाज दो
साँस को ख़ुशबुओं का
वजीफ़ा तो दो
इस उदासी को कोई
लतीफ़ा तो दो
दोस्ती के कई राज़ लो,
राज़ दो
खिड़कियाँ बन्द हैं
खिड़कियाँ खोल दो
है जो गुमसुम उसे
गीत के बोल दो
वक़्त के हाथ फिर से
नया साज़ दो
कब से देखा नहीं
कहकशाँ की तरफ़
मुँह करो तो कभी
आसमाँ की तरफ़
तितलियों को भी
रंगों का कोलाज दो ।

लाठी पीटे, अलग न होगी काई मेरे भाई

लाठी पीटे ,अलग न होगी
काई मेरे भाई
कुछ भी कर लें, जी लें , मर लें
देश भक्त दंगाई

इसको उसको चाहे जिसको
कर लेते हैं अगवा
कैसा रंगों का संयोजन
हुआ तिरंगा भगवा
बड़े-बड़े अवतारों की है
नई-नई प्रभुताई

लोकसभा से राजसभा तक
खादी पहनें चीलें
ठोंक रही हैं प्रजातंत्र के
माथे पर ही कीलें
खून थूकते पर्वत झरने
घाटी और तराई

अट्टहास करता सिंहासन
काँप रहा मतदाता
पटक रहा सिर, पागलख़ाने
में ख़ुद बुद्धि प्रदाता
इसके-उसके बाल बनाता
समय हुआ ख़ुद नाई

पेड़ चुप, पत्तियाँ चुप हैं

पेड़ चुप, पत्तियाँ चुप हैं
वक़्त मुँह पर रखे उँगली बोलता है
कौन ठिठकी-सी हवा में
दर्द पिछले घोलता है
है सवेरा तो नया पर
बात कुछ लगती पुरानी
मंत्रीमंडल भी वही है
वही राजा, वही रानी
शहर क़स्बों के कथानक
राज करती राजधानी
पेड़ चुप, पत्तियाँ चुप हैं
लहर पर ठिठके हुए जलपोत-सा
मन डोलता है
आँख का पानी बहुत-कुछ मोलता है
जो कभी इतिहास था
अब गर्द में डूबी हवेली
घुटे टूटी बावड़ी में
पानियों वाली पहेली
रैम्प पर जलवे दिखाती
महारानी की सहेली
पेड़ चुप, पत्तियाँ चुप हैं
बन्द दरवाज़े न कोई खोलता है
इक विदूषक शब्द के बटखरे लेकर
अर्थ के सच तोलता है।

जब जैसा राजा बोलेगा.

सिंहासन के आगे-पीछे
जी भर डोलेगी
जब जैसा राजा बोलेगा
परजा बोलेगी

राजा अगर हँसेगा
तो परजा भी हँस देगी
समझ न पाएगी अपनी
गर्दन ही कस लेगी
जागी-सी आँखों देखेगी सपना,
सो लेगी

ख़ून चूसते जो
उन पर ही वारी जाएगी
हर उड़ान, उड़ने से पहले
मारी जाएगी
उम्मीदों के नुचे हुए से
पर ही तोलेगी

अंधियारों के ज़ख़्म
रोशनी के प्यासे होंगे
हर बिसात पर
उल्टे-सीधे से पाँसे होंगे
सिसक-सिसककर हवा चलेगी
आँख भिगो लेगी

तुम्ही हो माता, पिता तुम्ही हो
गाती जाएगी
आँगन होगा, आँगन से
सँझवाती जाएगी
दुनिया अपनी साँस गिनेगी
नब्ज टटोलेगी

राजभवन के आगे भी
कुछ भिखमंगे होंगे
तीन रंग वाले किस्से भी
सतरंगे होंगे
धूप जल रही सी पेशानी
फिर-फिर धो लेगी

दोहे

कौन चतुर चालाक है और कौन मासूम,
सब कह देता आपका, अपना ड्राइंगरूम।।

साँसों का चुकने लगा, खाता और हिसाब,
पढी न पूरी जंदगी, पढते रहे किताब।।

पढते अपना नाम ही, लिखते अपना नाम,
हम अपने ही इस कदर, अब हो गए गुलाम।।

सुबह नहीं अपनी रही, रही न अपनी शाम,
ओवरटाइम जो मिला, किया काम, बस काम।।

सुबह सुबह माथा गरम, कंधे पर वैताल,
लहर उठाए किस तरह, उम्मीदों का ताल।।

थकने की क्या बात हो, जीना हमें जहान,
कंधे पर सामान है, पाँव पाँव प्रस्थान।।

दिल में है दरियादिली, पर खाली है जेब,
बिन घुँघरू कैसे बजे, खुशियों की पाजेब।।

मरहम पट्टी संग रखें, संग रखें रूमाल,
सपने ही अब आपको, करने लगे हलाल।।

है उडान की जद मगर, बिछा हुआ है जाल,
कैसे कोई हल करे, इतना बडा सवाल।।

झुलसा अपनी आग में, राहत का सामान,
बादल भागे छोडकर, जलता हुआ मकान।।

आने को आती नहीं, कभी साँच को आँच,
सपने है ताजा लहू, सपने टूटा काँच।।

वो जो रामसजीवन था

वो जो रामसजीवन था
खुशियों वाला ऑंगन था
फूलों सा उसका मन था
सबका जिया जुड़ावन था
जेठ दुपहरी सावन था
सचमुच ही मनभावन था

उस पर इक दिन कहर हुआ
शाम हुआ, दोपहर हुआ
खून का प्यासा देखो तो
उसका अपना शहर हुआ
पास फटा इक हथगोला
धरती आसमान डोला
चिथड़ों में तब्दील हुआ
उगता सा सूरज भोला
उसका बेटा ढेर हुआ
क्रूर समय का फेर हुआ
लाश हो गई घर वाली
अब क्या होली दीवाली
राम रहीम जूझ बैठे
खांर से अकड़े-ऐंठे
ख्वाब हो गए नूर मियाँ
हुए जिगर से दूर मियाँ
सुख में दुख में साथी थे
अब हैं चकनाचूर मियाँ
रामसजीवन बदल गया
करने लगे फितूर मियाँ
भरी जवानी टूट गया
प्याले जैसा फूट गया
किससे बात करे दिल की
अपने से ही रूठ गया
अब तो बहुत अकेला है
पड़ा सड़क पर ढेला है
वर्तमान की छाती पर
बस यादों का मेला है
अब जो रामसजीवन है
खाली खाली बर्तन है
टूटा टूटा दरपन है
मातम वाला आँगन है
पानी के बाहर जैसे
मछली वाली तड़पन है

रामसजीवन पहले का
मिले कभी जो तुम्हें कहीं
उसको घर पहुंचा देना
मेरी खोज खबर देना
तुमको जो लिखता आया
कहना तुमको ढूंढ रहा
कभी यहां तो कभी वहां
सारे जहां से अच्छा था
कहां गया वो हिंदोस्ताँ

रामसजीवन लौटो तो
एक बार फिर कविता में
अपनी खोई दुनिया में
कवि को नींद न आती है
बस तबियत घबराती है

रामसजीवन, नूरमियाँ
इस रस्ते उस रस्ते से
आ जाओ चौरस्ते पर
लौटो चाय-नमस्ते पर

चौराहे पर देश खड़ा
गली गली अजगर लहरे
ज़ख्म दे रहा है गहरे

उसका फन मिलकर कुचलो
फिर से सूरज सा उछलो
अपनी सुबह निकल आए
काली रात दहल जाए
बंदूकें सब सो जाएं
हाथ न आएं, खो जाएं
मन से मन का तार जुड़े
तबला और सितार जुड़े
चेहरों से आतंक धुले
कोई खुशबू नई घुले
रामसजीवन पहले सा
फूलों जैसा खिले खुले
फिर से आएं नूर मियाँ
कितना अच्छा लगता था
बजते थे संतूर मियाँ
देखो ज्यादा देर न हो
और अधिक अंधेर न हो
रामसजीवन पहल करो
परछाई से नहीं डरो
बंद पड़ी खिड़की खोलो
और हवाओं के हो लो
बातचीत फिर शुरू करो
मरने से इतने पहले
क्यों आखिर इस तरह मरो?

टीवी की शौकीन हमारी नानी जी

टीवी की शौकीन हमारी नानी जी।
खाती हैं नमकीन हमारी नानी जी।

जीवन बीता कभी मदरसे नहीं गईं,
भैंस के आगे बीन हमारी नानी जी।

नाना जी परतंत्र दिखाई देते हैं,
रहती हैं स्वाधीन हमारी नानी जी।

गली मुहल्ले नुक्कड़ की अफवाहों पर,
करतीं नहीं यकीन हमारी नानी जी।

बिन साबुन पानी जाड़े के मौसम में,
होतीं ड्राई क्लीन हमारी नानी जी।

चढ़ा पेट पर सोमू तबला बजा रहा,
ताक धिना धिन धीन हमारी नानी जी।

गलत बात सुनकर गुस्से में आ जातीं,
तेज धूप में टीन हमारी नानी जी।

घर पर बैठे-बैठे खटिया ही तोड़ें,
सोचें भारत-चीन हमारी नानी जी।

जितना नया-नया नाती है गोदी में,
उतनी हैं प्राचीन हमारी नानी जी।

फूल हैं हम

गीत – नाटक – चित्रकारी,
कार्यशाला है हमारी।

नए स्वर से सज रहे हैं
तालियों से बज रहे हैं,
जिंदगी के रंग हैं हम
मुश्किलें सब तज रहे हैं।

ऊँट के चरचे कहीं हैं,
कहीं घोड़े की सवारी।

हँसी, कविता, कहकहे हैं
हम कि झरनों से बहे हैं,
ध्यान से सुनिए कि हमने
बहुत-से किस्से कहे हैं।

फूल हैं हम, खोलते हैं,
रोज खुशबू की पिटारी!

हम किताबें पढ़ रहे हैं
और खुद को गढ़ रहे हैं,
भोर के सूरज सरीखे
आसमां पर चढ़ रहे हैं।
आँख में सपने, खिलौनों-
से भरी है अलमारी!

कार्टूनों से किलकते
रोज ही कुछ नया लिखते,
देह पर खिलता पसीना
हम कभी भी नहीं थकते।
लोरियों से गूँजते हैं,
नींद में भरते हुंकारी।

निंदिया आई निंदिया आई दौड़ी-दौड़ी,

निंदिया आई दौड़ी-दौड़ी,
हमने खाट बिछाई चौड़ी।

लिए खूब लंबे खर्राटे,
भागे बड़े मियाँ सन्नाटे,
सपने में इक महल बनाया
जोड़-जोड़कर कौड़ी-कौड़ी।

गढ़ी कहानी सच्ची झूठी,
कुंभकरण सी नींद न टूटी,
भले खोपड़ी पर टिक-टिक-टिक
घड़ी चलाती रही हथौड़ी।

सोते रहे पहनकर टाई,
कहाँ-कहाँ हम घूमे भाई,
सपने में ही जीभ जल गई
फिर भी खाई गरम पकौड़ी।

हाथी बेचारा

सबकी बनी सवारी लेकिन
उसकी नहीं सवारी है,
परेशान हाथी बेचारा
कैसी दुनियादारी है?
यही सोच, खुद को समझाया-
शायद सबसे भारी है,
इसीलिए पैदल चलता है,
उसकी नहीं सवारी है।
उसकी अगर सवारी होती
चर्र-चर्र, चूँ-चूँ करती,
गिर पड़ता तो अस्पताल में
कौन उसे करता भरती।

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