रश्मि भारद्वाज की रचनाएँ

एक अतिरिक्त अ-1

वे जो लय में नहीं,
उनके सुर में नहीं मिला पाते अपनी आवाज़,
उनमें भी दफ़न होता रहता है एक इतिहास
जिसे पढ़ने वाला
बहिष्कृत हो जाता है
देवताओँ के बनाए इस लोक से,
देवता जो खड़ी नाक और भव्य ललाट के होते हैं
देवता जो विजेता हैं,
जीतने के लिए भूल जाते हैं देवत्व के सारे नियम
अपने यश गान में उन्हें नहीं चाहिए कोई गलत आलाप

एक उपसर्ग मात्र से बदलती है भूमिकाएँ
साल दर साल ज़िन्दा जलाए जाने की तय हो जाती है सज़ा
बस एक अतिरिक्त अ की ख़ातिर
वे जो सुर नहीं रहते हैं
इतिहास में

एक अतिरिक्त अ-2

हर तरफ़ बिक रहे जीत के नुस्ख़ों के बीच भी
पृथ्वी पर बढ़ रहा आतंक पराजय का
शब्दकोश के चमकते शब्दों की लत में पड़ी दुनिया
नहीं सम्भाल पाती है एक अतिरिक्त अ का कहर

सायबर कैफ़े में किसी चमत्कारी स्मिथ को मेल करता वह बेचैन बेरोज़गार
टूटी-फूटी अँग्रेज़ी में गिड़गिड़ाता
जानना चाहता है जीवन में सफल रहने की तरक़ीबें

वहीँ सड़क के दूसरे किनारे लगे लाल तम्बू में
रंगीन शीशियों में भरे गए हैं विजय-द्रव्य
स्खलित होते आत्मविश्वास के फैलने और टिकने की गारण्टी के साथ

दुनिया की तमाम पवित्र जगहों पर कतारबद्ध प्रार्थनाएँ
अक्षमताओं की त्रासद-कथाएँ हैं
बेबस पुकारों से प्रतिध्वनित है ब्रह्माण्ड

जबकि वरदान सरीखे जीवन को सहेजने की हिदायतों से
अँटे पड़े हैं दुनिया के महान ग्रन्थ
सृष्टि हारती जा रही
एक उपसर्ग मात्र से

18 बी

फ़ोर बाई फ़ोर के क्यूबिकल में फँसे इंसान को कितना उड़ना चाहिए !
ज़्यादा से ज़्यादा उसे देखना चाहिए
एक अदद गाड़ी का सपना
वह देख सकता है दो कमरों का आधुनिक फ़्लैट
और सजे-धजे बच्चे भी
फिर उसे सोचना चाहिए इ०एम०आई० के बारे में
सीखना चाहिए क्यूबिकल में साँस ले पाना
तयशुदा ऑक्सीजन की मात्रा के साथ

मुझसे पहले 18 बी में सव्यसाची बैठा करते थे
सुना वो बहुत कामचोर थे
(उनके सपनों में कविताएँ भी थी!)
मैं सबकी नज़र बचा अपनी कविताएँ फ़ाइलों के नीचे दबाती हूँ
फ़ोर बाई फ़ोर के इस क्यूबिकल में
सपने बाज़ार-रंग के होते हैं
उन्हें पूरा पाने के लिए ख़ुद को देना होता है पूरा

अगर आप आकाश के ताज़ा रंग देखना चाहते हैं
पृथ्वी का हरापन सँजोने की चाहत है
भागते हुए भी अक्सर रुक कर
अब भी देख लेते हैं पेड़, फ़ूल, गिलहरी, चिड़िया
ट्रैफ़िक पर गाड़ियों के बन्द शीशों में नज़र गड़ाती आँखें
और फ़ुटपाथ पर ठण्ड से काँपते उस बूढ़े को
और ले आते हैं सबको साथ अक्सर
अपने फ़ोर बाई फ़ोर के क्यूबिकल में
साबुत (बिना इ०एम०आई० के)

तो धीरे-धीरे आप नाकारा होते जाते हैं
18 बी के लिए

ग्रेपवाइन

बातों की पाँखों पर दुनिया का बसेरा
बातें जो डैनें फैलातीं
तो पल दो पल सुस्ताती मुण्डेर पर
फिर जा पसरती गिरजी चाची की खटिया पर
सूखती मिरचाई के संग
तीखी, लाल, करारी हो उठती

बच्चू बाबा के हुक्के में घुसती
धुएँ के नशे में मदमस्त हो जाती
वे बाते कनिया चाची के चूल्हे पर
खदबद खौलती
सिलबट्टे पर धनिया, गरम मसल्ले के साथ पिसती
चटकार हो जातीं

बूढ़े वामन-सा सीमान्त पर खड़ा
प्रहरी बरगद
मुस्काता मन ही मन
जब लाल मौली-सी मीठी, मनुहारी बातें गुपचुप
बन्ध जाती उसके कठोर तन पर

नइकी कनिया के पैर में काँटा चुभा
या कि पीपल पेड़ वाला जिन्न घुसा था
पेड़ पर बैठा जिन्न आँखें तरेरता
हमरा नाम बहुत बदनाम करती हो
अगली बार आना चाची पीपल के गाछ तले
अब कि तुमको ही धरता हूँ।
तब चाची के पेट में मरोड़ उठा था

बातें थी कहनी कथाओं में ढलतीं
सामा चकेवा की मूरत में सिरजतीं
वे लोकगीतों के बोलों में घुलती
कण्ठ-कण्ठ दर्द, विरह, प्रेम बरसता
खेतों में जो गिरतीं सोना उगलतीं
तालों और कुओं पर झमकती
घोघो रानी!
अहा कितना पानी
कमर तक पानी, गले भर बतकहियाँ

रात को जो भूले से चनेसर मामी रस्सी पर पैर रख आती
साँप-साँप कहके टोला जगाती
कोकिला बंगाल से आई करिया जादूगरनी है
मरद-मानुष को भेड़ा बनाती है
माधोपुर वाली बुढ़िया डायन है
बच्चे चबाती है

सेमर के फूल-सी
धतूरे के बीज-सी
फन काढ़े नागिन-सी
बिन खाए ब्राह्मण-सी
लेकिन वे बातें थीं जिनसे जीवन टपकता था
क़िस्से-कहानी, राग-रंग, सावन

कई बरस बीते जाने कहाँ गुम गईं बातें
खेत-खलिहान सूखे, ताल-तलैया रोईं
अब बातें अक्सर मिलती है
कुएँ की तली में गँधाती,
पेड़ से लटकती,
बेआवाज़ पछाड़ें खातीं
सुना किसी ने कहा कि
यह भी बस एक अफ़वाह है
बातें भी कहीं भूख से मरी हैं!

भारहीन

मैं असीम आकाश को सौंपती हूँ मेरा निर्णय
नदी से कहती हूँ मुझे बताओ कैसे बहना है,
सड़क का पत्थर जो असँख्य ठोकरों के बाद भी सलामत है,
उसे ज़िन्दगी मुझसे बेहतर जीनी आती है
मिट्टी की ख़ुशबू भर से एक नन्ही बेल बोतल में क़ैद भी लहरा उठती है,
हवा को अपना भविष्य सौंप बैठे पेड़ झूमना नहीं भूले।
वह अनन्त सागर लौटता है बार-बार
अपने पास कुछ भी शेष नहीं रखने के बाद की प्रचुरता में उछाहें भरता हुआ,
आग की लौ हर बार कुछ नया रचती है
संहार में भी सृजन के कण दीप्त किए
अपने फ़ैसलों का भार मुझ पर ज़्यादा है
अब एक बार इन्हें तुम सबके हवाले कर
मैं मुक्त होना चाहती हूँ।

इन ए पेपर वर्ल्ड

कुछ लोगों का कोई देश नहीं होता
इस पूरी पृथ्वी पर ऐसी कोई चार दीवारों वाली छत नहीं होती जिसे वे घर बुला सकें
ऐसा कोई मानचित्र नहीं, जिसके किसी कोने पर नीली स्याही लगा वह दिखा सकें अपना राज्य

वे अक्सर जहाजों में डालकर कर दिए जाते हैं समंदर के हवाले
कोई भी नाव उन्हें बीच भँवर में डुबो सकती है
आग की लपटें अक्सर उनके पीछे दूर तक चली आया करती हैं
किसी भी ख़ंजर या चाकू को पसंद आ सकता है उनके रक्त का स्वाद
उनके जन्मते ही किसी एक गोली पर उनका नाम लिखा जाना तय है
उनका ख़ात्मा दअरसल मानवता की भलाई के लिए उठाया गया ज़रूरी कदम है

उनके अब मासूम नहीं रह गए बच्चे जानते हैं कि अक्सर माँ को कहाँ उठा कर ले जाते हैं
जहाँ से लौटकर वह सीधी खड़ी भी नहीं हो पाती
पिछली बार और फिर कई-कई बार
उन्होंने भी चुकाया था माँ की अनुपस्थति का हर्ज़ाना
पिता कभी रोते नहीं दिखाई देते
उनके चेहरे की हर रोज़ बढ़ती लकीरें दरअसल सूख चुके आंसू हैं
उनके ईश्वर वे हेलीकॉप्टर हैं जो ऊपर से खाने के पैकेट गिरा जाते हैं
कुछ गठरियों में सिमट आए घर को ढोते
वे पार कर सकते हैं काँटों की कोई भी तारें रातोंरात
काँटों से तो सिर्फ़ शरीर छिलता है
मन से रिसता रक्त कभी बंद नहीं होता।

एक घर
एक परिवार
एक देश
एक पहचान
कागज़ों से बनी इस दुनिया में जी सकने के लिए
उन्हें दरकार है
बस एक कागज़ की

दो शब्दों के बीच

तुम्हारे लिखे दो शब्दों के बीच बेख़्याली से जो जगह छूट जायेगी,
मैं अपनी कविता के साथ वहां मिल जाया करुंगी
उसी जगह, जहाँ तुम्हारे रचे इतिहास से वंचित किए गए लोग रहते हैं,
हारे -थके और दमित लोग
वहीं, जहाँ उनके आँसू रहते हैं,
भूख बसती है,
अंधेरा सहमाता है
तुम्हारे लिखे चमकते पन्नों से मुझे ख़ून की बू आती है

नींद एक मरहम है

जागते दिनों की तमाम साजिशों के बाद
नींद एक मरहम है
यह हौले से आकर चुपचाप भरती है आगोश में
माँ सी थपकियाँ देती है
और हम एक मौत ओढ़कर सो जाते हैं।

मृत्यु के इन नितांत निजी पलों में
कल आने वाला एक और निर्दयी सूरज नहीं डराता है
जो नयी साजिशों, नयी तिड़कमों के साथ
हमें फिर से एक बार भीड़ के हवाले कर देगा
भीड़ के पास अट्टहास है, भूख है, आस है, हमारे सपने हैं
और एक मज़बूत ताला है
नींद अक्सर उस ताले को भी चुराकर तोड़ डालती है
और हम हमारे सपनों के साथ महफूज़ सो जाते हैं।

नींद में मुस्कुराता यह शिशु ईश्वर है
जो जब चाहे बेसुध सो सकता है
उसे ललचायी आँखों से देखते हैं एक पुरुष और एक स्त्री
नींद उनके लिए एक याचना है
उन्हें अपने दंभ भरे सिरों का बोझ उतारकर
थोड़ी देर सो जाना चाहिए
जिससे जागने पर वे थोड़े धुले निखरे होकर
फिर से जी सकने के लिए तैयार हो सकें

नींद किसी चन्दन की पट्टी सी
हमारे उबलते हुए माथे को सेंकती है
और मन का सारा ताप हर ले जाती है

नींद है कि एक बेहतरीन कविता
इसे अपने आने के लिए चाहिए एक साफ़ दिल
और थोड़ी सी प्यास

रिक्त स्थान

एक पुरुष ने लिखा दुख
और यह दुनिया भर के वंचितों की आवाज़ बन गया
एक स्त्री ने लिखा दुःख
यह उसका दिया एक उलाहना था

एक पुरुष लिखता है सुख
वहाँ संसार भर की उम्मीद समायी होती है
एक स्त्री ने लिखा सुख
यह उसका निजी प्रलाप था

एक पुरुष ने लिखा प्रेम
रची गई एक नयी परिभाषा
एक स्त्री ने लिखा प्रेम
लोग उसके शयनकक्ष का भूगोल तलाशने लगे

एक पुरुष ने लिखी स्त्रियाँ
ये सब उसके लिए प्रेरणाएं थीं
एक स्त्री ने लिखा पुरुष
वह सीढियाँ बनाती थी

स्त्री ने जब भी कागज़ पर उकेरे कुछ शब्द
वे वहां उसकी देह की ज्यामितियां ख़ोजते रहे
उन्हें स्त्री से कविता नहीं चाहिए थी
वे बस कुछ रंगीन बिम्बों की तलाश में थे

भक्ति काल में मीरा लिख गयीं –

राणाजी म्हाने या बदनामी लगे मीठी।
कोई निन्दो कोई बिन्दो, मैं चलूंगी चाल अपूठी…

1930 में महादेवी के शब्द थे –

विस्तृत नभ का कोई कोना, मेरा न कभी अपना होना…

1990 में लिखती हैं अनामिका –

हे परमपिताओं,
परमपुरुषों–
बख्शो, बख्शो, अब हमें बख्शो!

2018 में यह पंक्तियाँ लिखते
मैं आपके लिए तहेदिल से चाहती हूँ
‘ग्रो अप
एन्ड मूव ऑन’

और आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए
20 ….लिख कर रिक्त स्थान छोड़ती हूँ
उम्मीद करती हूँ कि अब कोई नयी बात लिखी जाए!

चंद्रिका स्थान

गांव के सीमांत पर सदियों से खड़ा था एक बूढा बरगद
किसी औघड़ सा अपनी जटाएं फैलाएं
अपने गर्भ में सहेजे था एक देवता-स्त्री को
यह रक्षक स्त्री है तो गांव सलामत है, ऐसा कहते कई पीढियां गुजर गयीं
उसके खोंइंछे में हर दिन टांक दिए जाते थे
दुःखों के अनगिन चाँद सितारे
मन्नतों के कई गोटे
वह उन्हें वैसे ही सहेज लेती जैसे सैकड़ों सालों पहले कभी अपनी व्यथा को सहेजा होगा
मेरी दादी और उन जैसी कई औरतें
हर पखवाड़े बरगद की गोद में बने उस छोटे से स्थान की अँधेरी दीवारों पर सिंदूर से एक आकृति उकेरतीं
उसे हल्दी, चन्दन और कुमकुम से सजातीं
और गीत गाती हुईं उस पर अपने आंसूओं का अर्ध्य चढ़ा आती
मेरे गांव ने अपनी देवता-स्त्री ख़ुद गढ़ी थी
उसे दी थी अपनी पनियाई आँखें, अपने सूखे होंठ और अपना सा ही रूप

बरगद का वह बूढा वृक्ष
उनके कथा गीतों को पक्षियों के कानों से सुनता
और उन्हें पंख मिल जाते
वह गांव -गांव उड़ते
हर नम आँख को तसल्ली दे आते
ब्याही हुई बेटी को मिलता अपनी मां का संदेसा
प्रेमी उन गीतों में खोजते बिछुड़ी हुई प्रेयसी की स्मृतियाँ
कुंवारियों की आशंकाएं उन्हें सुनकर चैन पातीं थी
उन गीतों में उग आती थीं पीढ़ियों की व्यथाओं की असंख्य लकीरें
जिन्हें संग साथ गाते बूढ़े-बुजुर्ग देवता-स्त्री से नयी नस्लों की ख़ुशहाली की दुआएँ मांगते

चंद्रिका स्थान एक बसेरा था
जहाँ ज़िन्दगी की धूप में तप रही आत्माएं सूकून पाती थीं
गपोड़ रिज़वान चचा छाँव में बैठ घन्टों किस्से कहानियां बांचते
उनकी बकरियाँ आस पास घूमती नरम घास चरतीं
खेत में काम कर थकी पड़वा, गौरी, समीमा वहीं बैठ खाती थी अपनी दुपहर की रोटी
और अँचरा ओढ़ कर लुढ़क भी जातीं
वृक्ष एक पिता था जिसकी फैली हुई मज़बूत भुजाओं पर झूला झूलते खिलखिलाते थे बच्चे
और उसकी रूखी- सख़्त शिराओं में दौड़ पड़ता हरा ताज़ा ख़ून
अँखुआ उठती नयी कोंपलें
गांव का पतझड़ हर साल बहुत ज़ल्दी हार जाता था
देवता- स्त्री थी सबकी माँ
वह मुस्कुराती और खेतों का बसन्त लौट आता

और फिर एक दिन अचानक एक पगडंडी ने देखा शहर का रास्ता
देवता-स्त्री की संगमरमर की चमचमाती मूर्ति आ गयी
जिसके होंठों पर एक सदा बहार कृत्रिम मुस्कुराहट थी
उस मूर्त्ति के वैभव को समेटने के लिए छोटी पड़ गईं वृक्ष की भुजाएं
अब वहां एक विशाल मंदिर है
वृक्ष अब नहीं रहा
दादी भी नहीं
और उनके समय की कई और स्त्रियां भी
अब वहां पक्षी नहीं आते
ना मज़दूर औरतें
रिज़वान चाचा अपनी झोपड़ी में बैठे ख़ाली निगाहों से मंदिर जाती यंत्रवत भीड़ को देखते हैं

देवता- स्त्री अब लोहे के फाटकों और मन्त्रों के तीव्र शोर में घिरी
अपनी धवल मुस्कान के साथ
एक पवित्र ईश्वर में तब्दील हो गयी है

स्मॉग इन द सिटी

शहर के बुध्द चौक पर चार दिशाओं में खड़े हैं चार बौद्ध भिक्षु
एक साथ, एक दूसरे की पीठ से जुड़े हुए
झुके हुए शीश, बंद नेत्र, हाथ क्षमा दान की मुद्रा में उठे हुए
उनके चेहरे पर लिखा है घोर विषाद
शायद यह मेरा भ्रम हो या कि कल्पना का अतिरेक
लेकिन शहर पर बीते हर दुःख के बाद
उनके चेहरे पर खिंच आती है पीड़ा की नयी लकीरें
शहर के हर नए पाप के बाद
उनके चेहरे थोड़े और झुक जाते हैं
और मैं वहाँ शर्म की गहरी काली छायाएं देखती हूँ
वे उस मूर्तिकार के शुक्रगुज़ार होंगे शायद
जिन्होंने उनके नेत्र बंद कर दिए और एक अश्लील शहर को देखते रहने के अपराध से बचा लिया

उनके चारों ओर भागती एक बेदम भीड़
अपनी आत्मा में भरती जा रही है एक स्याह धुंआ
उसे कहीं पहुँच जाने की ज़ल्दी है
जबकि वास्तव में वह एक घेरे से बंधी बस गोल गोल चक्कर काट रही है
भिक्षु इस भीड़ के बहाने उन सभी को माफ़ कर देना चाहते है
जो मानवता को प्रतिमाओं में बदल देने की साज़िश में उलझे हैं

एक बीमार शहर के चौराहे पर खड़े ये चार बौद्ध भिक्षु
उसकी हर रोज़ की जा रही आत्महत्या के मूक गवाह हैं
कुछ नहीं कर पाने के दुःख और शर्म से गड़े
वे हर रोज़ ख़ुद भी थोड़ा थोड़ा मरते जा रहे हैं

विखण्डित

एक दिन आता है जब शरीर सिकुड़ कर अस्थि मात्र रह जाता है
जीवन के हर उल्लास पर भारी हो जाती हैं व्याधाएं
स्मृतियाँ लुका छिपी का खेल खेलती हर बार मात दे जाती हैं
एक मृत्यु है जिसकी शेष रहती है प्रतीक्षा
हर रोज़ सुनाई देते हैं जिसके पदचाप

विधाता अगर इतनी उम्र लिखी है खाते में
तो बस इतना करना
कि जब आए ऐसा समय
बचा रहे उससे आँख मिला पाने का सामर्थ्य !
जाऊँ तो साबूत ही
अपने समस्त अहम् , मोहबन्धों, और दुर्बलताओं के साथ
विखण्डित
एक मनुष्य की तरह

पुल की बात करते हुए

पुल की बात करते ही बचपन का एक पुल याद आता है
जो नानी घर जाने के रास्ते में आया करता था
इतना संकरा और इतना कमजोर कि एक रिक्शा भी गुजरता तो हिल पड़ता था
उसपर से गुजरते मैं हमेशा भय से आँखें बंद कर लेती थी
मेरी याद में तो वह गिरा नहीं
लेकिन कभी तो ज़रूर भरभरा कर टूट पड़ा होगा
और साथ ले गया होगा किसी साइकिल से घर लौटते पिता
या हाथ रिक्शे पर सवार स्कूल से लौट रहे बच्चों को
फिर पुल की बात करूँ तो देखे- सुने कई पुल याद आते हैं
झुलनिया पुल, हिलता हुआ पुल
और किसी किसी के बारे में तो लोग खुलेआम कहा कहते थे कि यह अब कभी भी गिरा ही समझो
जबकि किसी भी पुल पर पैर रखते हम भरे होते हैं अदम्य विश्वास या बेपरवाही से
या कि एक लाचारगी से
पार उतरने के लिए गुजरना ही होता है हर बार किसी न किसी पुल से
पुलों को हमेशा टूट कर गिर जाने के लिए छोड़ दिया जाता है
बिना यह ध्यान रखे कि हर टूटता पुल एक भरोसे की मौत भी है

पुलों को छोड़ दिया जाता है ध्वस्त हो जाने के लिए
ताकि आम आदमी को यह याद रहे
कि इतना भी सहज नहीं गुजर जाना उसके लिए साबूत
इस झूलते हुए तंत्र के बीच से

अस्सी का दौर और एक अव्यक्त रिश्ते से गुजरते हुए

जबकि हममें से कइयों को इस बात पर भी दुविधा हो सकती है
कि हम प्रेम की संतानें हैं या नफ़रत की
या किसी रात एक दिनचर्या या अनिच्छा से ही गुजरते हुए हमें संजो लिया गया अपने गर्भ में
जबकि पुरानी, रंग उड़ी तस्वीरों के अलावा
हमने कभी नहीं देखा उन्हें फिर एक दूसरे की आँखों में झांकते हुए
या हाथों में हाथ डाले समंदर से गलबहियाँ करते
जबकि कई बार हमें यह लगता रहा कि यह घर हमारे होने से ही घर बना हुआ है
और जो हम हटा दिए जाएँ तो दो लोगों के साथ रहने की कोई वजह बाक़ी नहीं रह जायेगी
जबकि हमने कभी नहीं सुना कि उन्होंने कहा एक दूसरे से, तुम्हारे बिना नहीं है मेरा वजूद
बल्कि रोज़ रोज़ की बहसों से तंग आकर कई बार सोचा और कहा भी
छोड़ क्यों नहीं देते आप लोग एक दूसरे को !
वे साथ बने ही रहे

बल्कि ये भी होता रहा कि कभी दूर होने पर हर शाम
सुनाई जाती रही एक दूसरे को दिन भर की हर घटना फोन पर
फ्रिज़ और आलमारी में रखी चीज़ें याद दिलाई जातीं रहीं
लौटती के टिकट की तिथि पूछी जाती रही
लेकिन ये नहीं कहा गया कि तुम्हारे बिना घर ख़ाली सा लगता है
यह भी कभी नहीं हुआ कि हमारे बचपन में हमें ही लिपटा कर ढेर सारे चुम्बन दिए गए हों
कहा गया हो कि तुम लोग आँखों के नूर हो
और एक दूसरे को आँखों ही आँखों में शुक्रिया कहा गया हो
हमारे लिए प्रेम हमेशा अव्यक्त ही रहा
लेकिन हम आज़ भी जानते हैं यह बात मन ही मन में
कि जो अव्यक्त है वही सबसे सुंदर है

अब जबकि हम उनके साथ नहीं है
जबकि कहा नहीं जाता होगा अब भी कोई शब्द जिससे प्रेम जैसी कोई गंध आती हो
वे अब तक साथ बने हुए हैं
हमें यह विश्वास करने के लिए बाध्य करते हुए
कि प्रेम कुछ -कुछ ऐसा ही दिखता होगा।

देवी मंदिर

लाल पत्थरों के उस फ़र्श पर अक्सर आ बैठती हैं वे सभी औरतें
औरतें जो प्रेम में हैं
औरतें जो पिट कर आईं हैं
कुछ ने धोखा खाया और अंतिम बार प्रणाम कहने चली आईं हैं
कुछ को गर्भ में मन्नतें संजोनी हैं
कुछ बेटे की रात को दी हुई गालियां याद कर आँखें पोंछती हैं
कुछ आस से सामने खेलते शिशु को निहारती हैं
और अपनी बच्चियों के सिर पर हाथ फिरा देती हैं
कुछ को नहीं पता उन्हें जाना कहाँ हैं
पैरों को बस यहीं का पता सूझता है, घर से निकाल दिए जाने के बाद
फेयर लवली की दो परतें लगा कर आई वह सांवली लड़की
अपने होने वाली सास ननद के सामने खड़ी अक्सर काँप उठती है

उनके माथे पर आँचल हैं
आँखें बंद हैं
और होंठों पर है उनके अपनों के लंबी उम्र की प्रार्थनाएं
जबकि वे जानती हैं कि
ऐसी कोई प्रार्थनाएं नहीं बनी जिनमें गलती से भी चला आता हो उनका नाम

एक पगली अक्सर लाल पत्थर की सीढ़ियों पर आ बैठती है
देवी के भवन में
देवी की प्रतिमा के सामने
गिड़गिड़ाती औरतों को देखकर
खिलखिला के हंसती है
सोचती है, अच्छा है कि उसका कोई घर नहीं है
और उसे जी पाने के लिए किसी और के नाम की प्रार्थना नहीं करनी है।

आत्म संवाद

अब तक नहीं लिख सकी कि कितने नर्कों के बाद मैं यह बोल पड़ी थी कि बस अब यह मेरा आख़िरी नर्क होगा
कहाँ लिखा कि रात -अँधेरे उठ कर तय करती रहती हूँ ठीक से बंद हों घर के दरवाज़े, खिड़कियां
नहीं लिखा कि किन किन मौकों पर मुझे बोलने नहीं दिया गया
या कि मैंने ख़ुद ही चुना चुप रह जाना
नहीं लिख सकी कि कितनी बार मेरी आँखों को ज़बरन बंद करा दिया गया
और कुछ दृश्य जलते रह गए मन में हमेशा
नहीं लिखा कि कितनी ही बार कितनी अश्लीलता से याद करायी जाती है मुझे मेरी देह
या कि मेरे कुछ भी बोलने पर थमाए गए मुझे तमगे
उदंड, बत्तमीज़, बेशऊर या पागल होने के

मेरे हाथ में कलम थी, मेरे पास आवाज़ थी
लेकिन मैं अपने लिए ही नहीं लड़ पायी
मेरा भय छिपा था मेरे नाम में
मेरा भय छिपा था मेरे नाम के आगे लगे एक ख़ास उपनाम में
मेरा भय था एक ऐसी मिट्टी से उखड़ आना जिसका ज़िक्र भी गाली की तरह किया जाता है
मेरा भय था कि पुरुष की छत्र छाया से वंचित हर स्त्री चरित्रहीन ही कहलाती है

मैं एक मज़बूत स्त्री होने का आडंबर रचती
हर दिन एक नए भय से लड़ने को अभिशप्त हूँ

वह तुम ही हो पिता

माँ के लिए लिखी हर कविता में
तुम एक अघोषित ख़लनायक थे पिता
तुम्हारी बोली के कई शब्दों को मैंने अपने शब्दकोश से बहिष्कृत कर दिया है
क्योंकि वे मेरे भाषा घर में नहीं समाते थे
और तन कर खड़ी हो गयी हूँ तुम्हारे उस पुरुष के ख़िलाफ़
जो अक्सर अपनी स्त्री के आंसुओं का कारण बन जाता है
तुम्हारे जूते कभी नहीं समाएंगे मेरे पैरों में
ना तुम्हारे पीछे छूट गए कदमों के निशान नापने की मेरी कोई उत्कंठा है
तुम्हारे ईश्वर ने पहले से ही तय कर रखी है मेरी सीमा रेखा
और तुम्हारे घर में मेरे लिए सुरक्षित कर दिया गया है एक अथिति कक्ष

तुम्हारे उपनाम, तुम्हारी जाति की शुद्धता, तुम्हारे दम्भ
मैं सबसे दूर भागती रही
और मेरे बचपन के पिता कहीं पीछे छूटते गए
लेकिन फिर भी मेरी धमनियों में
जो रक्त बन दौड़ता रहा
वह तुम ही थे
मेरे चेहरे की ज़िद में जिसे पढ़ा जाता रहा ,वह तुम्हारा ही चेहरा था
मैं इनसे कभी नहीं भाग सकी
और हर बार तुमसे मिल कर लौटने पर
तुम्हारे थोड़े से और झुक आए कंधों,
चेहरे पर बढ़ आयीं कुछ और लकीरों को याद कर
जो मेरी आँखों से बह आता है
वह तुम ही हो पिता

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