राजेन्द्र गौतम की रचनाएँ

डल से लोहित तक ये बादल

डल से लोहित तक ये बादल
ख़बरें ही बरसाते ।

रोज़ विमानों से गिरतीं हैं
रोटी की अफ़वाहें
किन्तु कसे हैं साॅंप सरीखी
तन लहरों की बाॅंहें
अन्तरिक्ष से चित्रित हो हम
विज्ञापन बन जाते ।

किस दड़बे में लाशों का था
सब से ऊँचा स्तूप
खोज रही हैं गिद्ध-दृष्टियाॅं
अपने-अपने ‘स्कूप’
कितने क़िस्मत वाले हैं हम
मर सुर्खी में आते ।

कल तक सहते थे
लूओं का हम ही क़त्ले-आम
आज हमारी ही बस्ती में
बिजली का कुहराम
बची-खुची साॅंसें निगलेंगी
कल पाले की रातें ।

मायामृग के पीछे-पीछे

मायामृग के पीछे-पीछे
रथ को इतना दौड़ाया
भटके तो आ पहुँचे, देखो,
कितने गहरे जंगल में

मुझको मुझ तक लौटा लाए
वह पथ किससे पूछूँ मैं
कोई भी उत्तर देता है
कब यह बहरा सन्नाटा ।
परिचित पगडण्डी की काया
शिथिल पड़ी होकर नीली
ज़हरीले संशय-नागों ने
घात लगा उसको काटा ।

छूट-छूट जातीं हाथों से
संकल्पों की वल्गाएँ
ऐसे भी धँसता क्या कोई
दोपहरी के दलदल में ।

हमें विकल्पों में जीने का
दण्ड यही तो मिलना था
सूने सीवानों पर अंकित
अन्तहीन यह निर्वासन
कुहरे ढके कँगूरे वे-
सपनों के पीछे छूट गए
अब भावों के राजमहल का
खाली-खाली सिंहासन ।

बिजली-बादल आँचल-काजल
रेशम कोंपल स्वप्निल पल
अर्थ सभी के डूब गये हैं
अर्थहीन कोलाहल में ।

डायरी के पन्नों में सोई हुई साँसे

डायरी के पन्नों में सोई हुई साँसे
महकती हैं रात भर मेरे साथ

एक-एक शब्द
शरद कि पूर्णिमा में राधा बन जाता है
हर अर्थ थिरकता है श्याम-सा

साँझ होते ही जगाता हूँ मैं
उन शब्द-आकृतियों को
वे दीप-सी जल उठती हैं
सोख लेती हैं अँधेरों के सैलाब

तब कितनी बार मैं सैलाब के उतार में
रेत पर बिखरी
एक-एक रेखा को पढ़ता हूँ
सच, कितनी बार!

पर पूछो मत आशय मुझसे
मैं हर आशय को
काँपते होंठों से पी जाना चाहता हूँ
तब सभी क्षण डूब जाते हैं मुझ में
… साँझ होते ही जगाता हूँ मैं
उन शब्द-आकृतियों को
वे दीप-सी जल उठती हैं !

आँगन-आँगन दीप धरें

आँगन-आँगन दीप धरें
यह अन्धकार बुहरें

होता ही आया तम से रण
पर तम से तो हारी न किरण
जय करें वरण ये अथक चरण
भू-नभ को नाप धरें

लोक-हृदय अलोक-लोक हो
शोक-ग्रसित भव गत-शोक हो
तमस-पटल के पार नोक हो
यों शर-सन्धान करें

डूबे कलरव में नीरवता
भर दे कोमलता लता-लता
पत्ता-पत्ता हर्ष का पता–
दे, ज्योतित सुमन झरें

सदी के अन्त का गीत

जुट आई है भीड़ देखने
बरगद पीपल जड़ से उखड़े
ढहते काल-नदी के तीर ।

सिंगापुर की तस्वीरों में
जँचता खूब पलामू है
सदी बीसवीं से आजिज-सा
अाया अपना रामू है
मुग्ध गुजरिया लगी नाचने
दधि-माखन से भरे घड़े
परदेसों के जुटे अहीर ।

छोटी-सी इस दुनिया में
कितना ज़्यादा है अपनापन
शयन-कक्ष तक तारों से हैं
पहुँच रहे अब आमन्त्रण
गली-गली में बिकते सपने
हीरे-मोती-लाल जड़े
चमकी ‘गुलकी’ की तकदीर ।

चैराहों पर बिके सूचना
लौकी, कद्दू, सीताफल-सी
पड़ी टोकरी मूल्यों की पर
सड़े-गले बासी कटहल-सी
अपने-अपने ‘शून्य’ बेचने
बाज़ारों में सब निकल पड़े
सूरा, तुलसी और कबीर ।

उजाला छिन न पाएगा

यह धुआँ
सच ही बहुत कड़वा —
घना काला
क्षितिज तक दीवार फिर भी
बन न पाएगा ।

सूरज की लाश दबी
चट्टान के नीचे
सोच यह मन में
ठठा कर रात हँसती है
सुन अँधेरी कोठरी की वृद्ध खाँसी को
आत्ममुग्धा-गर्विता यह
व्यंग्य कसती है

एक जाला-सा
समय की आँख में उतरा
पर उजाला सहज ही यों
छिन न पाएगा ।

संखिया कोई —
कुओं में डाल जाता है
हवा व्याकुल
गाँव भर की देह है नीली
दिशाएँ निःस्पन्द सब
बेहोश सीवाने
कुटिलता की गुँजलक
होती नहीं ढीली

पर गरुड़-से
भैरवी के पंख फैलेंगे
चुप्पियों के नाग का फन
तन न पाएगा ।

क़स्बे की साँझ

पीपल, बरगद, नीम ये
सब गूलर के फूल
चौरस्ते
अब झूलते
थूहर और बबूल ।

हैण्डल पर
ख़ाली टिफ़िन
घर को चले मुनीम
आसमान पलकें झँपे
गटके हुए अफ़ीम ।

टाँगे, खच्चर, रेहड़ी
मुड़े गाँव की ओर
साँझ हुई
अब थम गया
गुड़-मण्डी का शोर ।

कहाँ बचेंगे टेण्ट में
मज़दूरी के दाम
बैठी लेकर राह में
ठर्रा
ठगिनी शाम ।

क़स्बे में जब से खुली
राजनीति की टाल
अफ़वाहों-सा
फैलता
धूल-धुएँ की जाल ।

चूल्हे-चौके की हुई
खटर-पटर अब बन्द
आँगन में
बस गूँजते
चुप्पी के ही छन्द ।

बर्फ़ सरीखी हो गई
नीचे बिछी पुआल
राम हवाले
भोर तक
इस कुनबे का हाल ।

आग पानी में

थाम लेंगे हाथ जब जलती मसालों को
देख लेना तब लगेगी आग पानी में

नर्म सपनों की त्वचा जो नोचते पँजे
भोंथरे होंगे वही चट्टान से घिसकर
बहुत मुमकिन थरथराए यह गगन सारा
हड्डियाँ बारूद हो जाएँ सभी पिसकर

रोशनी की सुरँगें हमको बिछानी हैं
अन्धेरा घुसपैठ करता राजधानी में

बन्ध सका दरिया कहाँ है आज तक उसमें
बर्फ़ की जो एक ठण्डी क़ैद होती है
लाज़िमी है पत्थरों का राह से हटना
सफ़र में जब चाह ख़ुद मुस्तैद होती है
साहिलों तक कश्तियाँ ख़ुद ही चली आतीं
ज़ोर होता है इरादों की रवानी में

सदा ही बनते रहे हैं लाख के घर तो
कब नहीं चौपड़ बिछी इतिहास को छलने
प्राप्य लेकिन पार्थ को तब ही यहाँ मिलता
जब धधक गाँडीव से ज्वाला लगे जलने
जब मुखौटे नायकों के उतर जाएँगे
रँग आएगा तभी तो इस कहानी में

अधिनायक कोड़ा

हत-चेतन संज्ञाएँ,
केवल
उपसर्ग बदलते हैं !

‘निर्वाचन’ की
परम्परा ने
थक कर दम तोड़ा
लोकतन्त्र की
छिली पीठ पर
अधिनायक कोड़ा
अक्षत-अक्षर वर्णों के
कब वर्ग बदलते हैं ?

वैध-अवैध
समासों ने कुछ
ऐसे कसे शिकँजे
जन की छाती
चढ़ी सँधियाँ
नोच रहे तन पँजे
वही व्याकरण
काशी का , कब–
गुलमर्ग बदलते हैं ?

तुम हमारी जान ले लो

तुम हमारी जान ले लो
यह बहुत सस्ती मिलेगी ।

बेदख़ल हम खेत से हैं
बेदख़ल खलिहान से हैं
कब भला दिखते तुम्हें हम
इक अदद इंसान से हैं
पाँव छाती पर धरे हो
या कि गर्दन पर रखे हो
देह अब सामान, ले लो
यह बहुत सस्ती मिलेगी ।

पीपलों को बरगदों को काट देना
उधर स्वीमिंग-पूल होगा
बस्तियाँ जब तक न उजड़ेंगी यहाँ से
मौसम कहाँ अनु’कूल’ होगा
झील-परबत-जँगलों पर
सेज बिछनी है तुम्हारी
गाँव की पहचान ले लो
यह बहुत सस्ती मिलेगी ।

तुम ख़ुदा, हाक़िम तुम्हीं हो
स्वर्ग का बसना यहाँ पर लाजिमी अब
छू रहे आकाश तुम हो
राह रोके कौन अदना आदमी अब
चान्द-तारों से सजी
बारात निकली जा रही है
रात की तुम शान ले लो
यह बहुत सस्ती मिलेगी ।

 

कुहरा छाया है

बूढ़े बरगद पर छाया है
पूरी बस्ती पर छाया है
कुहरा छाया है ।

झुनिया ने था रखा थान पर
जो छोटा दियरा
चिरता कितना उससे तम का
पाथर-सा हियरा
टूटे छप्पर पर छाया है
सूने आँगन में छाया है
कुहरा छाया है ।

राजपथों पर तो दीपों की
मालाएँ होंगी
अन्धकार से अनजानी
मधुशालाएँ होंगी
धूसर पगडण्डी पर लेकिन
गिद्धों के पँखों-सा काला
कुहरा छाया है ।

शीश-महल में देख रहे जो
महफ़िल का मुज़रा
नहीं पूछते इस रधिया से
दिन कैसे गुज़रा
भारी पलकों पर छाया है
धँसती आँखों पर छाया है
कुहरा छाया है ।

सिर-फिरा कबीरा

फूल खिले हैं
तितली नाचे
आओ इन पर गीत लिखें हम
भूख, ग़रीबी या शोषण से
कविता-रानी को क्या लेना ?

महानगर की चौड़ी सड़के
इन पर बन्दर-नाच दिखाएँ
अपनी उत्सव-सन्ध्याओं में
भाड़ा दे कर भाण्ड बुलाएँ
हम हैं संस्कृति के रखवाले
इसे रखेंगे शो-केसों में
मूढ़-गँवारों की चीख़ों से
शाश्वत वाणी को क्या लेना ?

लिए लुकाठी रहा घूमता
गली-गली सिर-फिरा कबीरा
दो कोड़ी की साख नहीं थी
कैसे उसको मिलता हीरा
लखटकिया –
छन्दों का स्वागत
राजसभा के द्वार करेंगे
निपट निराले
तेरे स्वर से
इस ‘रजधानी’ को क्या लेना ?

 

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