लक्ष्मीकान्त मुकुल की रचनाएँ

छनो भर खातिर

उनुका लगे ना रहे
कौनो टाट के मड़ई
आ फूंस-मूंजन के खोंता

ऊ चिरई ना रहन
भा कौनो फेंड़-रूख
हरवाहीं से लौटत ऊ एगो मजूर रहन

भसभसा के गिरेला
जइसे पुअरा के छान्हि
धमका भइला से ओही तरी
लूढ़ेरा गइल रहन ऊ
पोखरा के पिंड़ी पर

ओह ! छनो भर खातिर
ऊखी में के लुकाइल दनवा-दूत
बन के देले रहीत आपन बनूक
कुछऊ बन गइल रहितन ऊ
आन्ही-बुनी भा खर-पतवार
तनीको देरि खातिर
बुला हो गइल रहीत मुँहलुकान

तइयारी

उगरह ना होखल रहे अबे चान
तबो बलुक बरले रहे
जोन्हिया आपन दियरी
ओह करिया रात में
सभे पुंग लेले रहे
अपना काम ले

आइल हमरा मन में
घूमि आई खेत-बधारिन से
देखि आई जनेरा के खेत
सुनि आई पउधन के बतकही

कूदत जा रहे हमार गोइ
मेड़िन के लीख धइले
तले थथम गइलीं हम
केने दो ले बहल आवत
अवँज के सुनि के

बुझाइल जे
अगिया-बैताल मतिन
बतकूचन करत मनई
हेरवा देले होखस जइसे
गगरी अपना उमिदन के

खलबला गइलीसन्
फेंड़न पर के झँपात चिरई
आ गरमा गइल रहे गाँव

भकुवइले हम
बढ़त गइलीं सीवान ओरे
जनाय जइसे तइयार होखसन्
खेतन के जिरात
चले बदे
ओने घहरात रहे बदरी
चूबे लागल रहे आसमान

कवच 

गोजी भाँजल उनुकर खेल रहे
अनमनाह दिनन के सांझ में लौट के
आवां में पाकत बरतन
दुबकल रहसन आके नींनि का गोदी में

बगुलन के तिरछा पाँति
फँसत जात रहे अलोते मिटिकत
दरियाव का पास के झलांसन के बीच

गरूअन के खुरन के उठत धूल के बवंडर
कनपट्टियन में छेदत रहे आकाष
खरवरिया में नाचत बतास
सिटी बजावत फिरत रहे
बाँस के पतई से खेलत खानी

बिरहा अलापत हरवाहा
झबांन हो जा रहे पपड़ी परल खेतन के देखि
पुरबइया के झकोरा बहते
पसीजे लागत रहे गमछी से पसीना के गंध

चलल जात रहे चरवाहन के झुंड
चिरई के नाँव वाला गाँव का राह में
सुनसान परल रहे ऊ गाँव
अल्हारी का कवच में हरदमें लपटाइल

वसंत अइला पर

पीयराह सरसों से
लहलहात रहे बघार
आ गाँव के खोरीयन में
भभस गइल रहे कुकुरबन्हा के जंगल

नदी घसकत
चल आइल रहे कोनहरा
पषु भूख का मारे
बूड़ा आवत रह सन्
चुरूआ भर पानी में मुँह

छतनार फेंड़न पर
बइठल चिरई
टोहत रहीसन दाना के कन
जैने खड़ा रहे बिजूका
अगोरिया करत

खेतन में खड़ा रहीसन फसल
दूर से उड़ के चलल आवत रहे
चीलन के झुंड
जैसे भरल जात रहे
एकाएक पूरा गाँव

नदी के पार के गाँव

झींगवा मछरी के पीठ पर
पबंरत नदी में
नहात रहे कुछ लोग

कुछ लोग जात रहे
काटे खातिर गेंहूवन के बाली
आपन कपार ककुलाब
पेड़न का अलोते

देखत रहे खेला
कुछ लोग
सूरूज के उगे
दिन चढ़े
आ झुरमुटन में लुकाये के छन
कान्ही पर लदले उम्मीदन के आसमान

पूरा गाँवें तना आइल रहे
ओकरा भीतर
जे खोज रहत रहे
नदी के रोज बदलत हेलान

कोर का ओरे
पुकार भरत रहे ऊ बूढ़वा
आँखिन से ना लउकत रहे
ओके कुछऊ

कुछ लोग चलल जात रहे डेगारे
जेने कुहेसा में लपेटात
उबियात रहे ओकर गाँव

भरकी में चहुपल भईसा

 (l)
आवेले ऊ भरकी से
कीच पांक में गोड लसराइल
आर-डंडार प धावत चउहदी
हाथ में पोरसा भ के गोजी थमले
इहे पहचान रहल बा उनकर सदियन से

तलफत घाम में चियार लेखा फाट जाला
उनका खेतन के छाती
पनचहल होते हर में नधाइल बैलहाटा के
बर्घन के भंसे लागेला ठेहून
ट्रेक्टर के पहिया फंस के
लेवाड़ मारेले हीक भ
करईल के चिमर माटी चमोर देले
उखमंजल के हाँक-दाब

हेठार खातिर दखिनहा, बाल के पछिमहा
भरकी के वासी मंगनचन ना होखे दउरा लेके कबो
बोअनी के बाद हरियरी, बियाछत पउधा के सोरी के
पूजत रहे के बा उनकर आदिये के सोभाव
जांगर ठेठाई धरती से उपराज लेलन सोना
माटी का आन, मेहनत के पेहान के मानले जीये के मोल

(ll)
शहर के सड़की पर अबो
ना चले आइल उनका दायें-बायें
मांड-भात खाए के आदी के रेस्तरां में
इडली-डोसा चीखे के ना होखल अब ले सहूर
उनकर लार चुवे लागेला
मरदुआ-रिकवंछ ढकनेसर के नाव प
सोस्ती सीरी वाली चिट्ठी बांचत मनईं
न बुझ पावल अबले इमेल-उमेल के बात
कउडा त बइठ के गँवलेहर करत
अभियो गंवार बन के चकचिहाइल रहेले
सभ्य लोगन के सामने बिलार मतिन
गोल-मोल-तोल के टेढबाँगुच
लीक का भरोसे अब तक नापे न आइल
उनका आगे बढे के चाह

माँल में चमकऊआ लुग्गा वाली मेहरारू
कबो न लुझेलीसन उनका ओर
कवलेजिहा लइकी मोबाइल प अंगुरी फेरत चोन्हा में
कनखी से उनका ओर बिरावेलीसन मुंह
अंग्रेजी में किडबिड बोलत इसकोलिहा बाचा
उनका के झपिलावत बुझेलसन दोसरा गरह के बसेना
शहरीन के नजर में ऊ लागेलन गोबरउरा अस
उनका के देखते छूछ्बेहर सवखिनिहाँ के मन में भभके लागेला
घूर के बास, गोठहुल के भकसी, भुसहुल के भूसी

(lll)

जब ले बहल बा बजरुहा बयार
धूर लेखा उधिया रहल बा भरकी के गाँव, ओकर चिन्हानी
खेत–बधार, नदी–घाट, महुआ–पाकड़
बिकुआ जींस मतीन घूम रहल बाड़ीसन मंडी के मोहानी प
जहवाँ पोखरी के गरइ मछरी के चहुपता खेप
चहुपावल जा रहल बा दूध भरल डिब्बा
गोडार के उप्रजल तियना

खरिहान में चमकत धान, बकेन, दुधगर देसिला गरु के देसावर
समय के सउदागर लूट रहल बा
हमनी के कूल्ह संगोरल थाती
धार मराइल बा सपना प

दिनोदिन आलोपित हो रहल बा मठमेहर अस
धनखर देस पुअरा से चिन्हइला के पहचान
मेट गइल फगुआ चइता–कजरी के सहमेल
भुला गइल खलिहा बखत हितई कमाये जाये के रेवाज
ख़तम हो रहल बा खरमेंटाव के बेरा
सतुआ खाये माठा घोंटे के बानि
छूट गइल ऊ लगन जब आदमी नरेटी से ना
ढोढ़ी के दम से ठठा के हँसत रहे जोरदार

जवानी बिलवारहल बाड़े एहीजा के नवहा
पंजाब, गुजरात, का कारखाना में देह गलावत
बूढ़ झाँख मारताडे कुरसत ज़माना के बदलल खेल प
बढ़ता मरद के दारु, रोड प मेहरारू के चलन
लइका बहेंगवा बनल बुझा रहल बाड़ें जिये के ललसा
सूअर के खोभार अस बन रहल बा गाँव-गली
कमजोर हो रहल बा माटी के जकडल रहे के
धुडली घास, बेंगची, भरकभाड के जड़न के हूब

(IV)
दिनदुपहरिये गाँव के मटीगर देवाल में
सेंध फोरत ढुक गईल बा शहर
कान्ही प लदले बाज़ार
पीठी प लदले विकास के झुझुना
कपार प टंगले सरकारी घिरनई
अंकवारी में लिहले अमेरिकी दोकान

एह नया अवतार प अचंभों में
पडल बा गाँव भरकी के
ना हेठारो के ना पूरा दुनिया-जहान के
जइसे सोझा पड़ गईल होखे मरखाहवा भंइसा
भागल जाव कि भगावल जाव ओके सिवान से
भकसावन अन्हरिया रात में लुकार बान्ह के.

प्रलय के दिनन में

बाकस रहे ऊ डाकखाना के
जे बनल रहे लोहा के पतरन से
जहवाँ दिन बीतते जात रहीं
चिट्ठी पेठवे तोहरा नाँव

आँधियन के पेवन से
फार ले आवत रहीं कागत के कवनो पन्ना
धूपा से माँग ले आवत रहीं
चमचमात रहत पिनसिन
आ सुनसान रेत में बइठ के
प्रलय के दिनन में
कुछ लिखत खानी गढ़त रहत रहीं
सुघर कवितन के

जरा मल देले होखे
कवनो शाम तोहरा के ऊ लोग
हमरा चिट्ठीयन लेखा!

भरमें में 

हमरा अंगना में
जामल बा एगो जटहवा
सुनलें रहीं कि एहीजा बहुत पहिले
लहरात रहे गेंदा के फूल

केहू ओकरा के बोअले ना रहे
कतहूँ दूर से हवा के संगे
अघियात आ गइल एहीजा
जैकरा डरे लुका गइल गेंदा
आ हमरा अंगना के
खाद-पानी लेके ऊ बढ़े लागल

ना काटल केहू ओके आरी से
हँसुओं से छूवल ओके केहू ना
बढ़त गइल ऊ गते-गते
घरे लागल भेख ऊ फेड़ लेखा
सगरे फइल गइल कांट
सउँसे धर भ गइल पतई-पतई

आजो हमरा अंगना में बढ़ता ऊ
तबो काटत नइखीं हम
बढ़े बढ़े हम छोड़ले बानीं
काहें कि ऊ
भ गइल बा हमरा सवांग मतिन

बाकिर हमरा भाई के हाथ में
लउकत बा खुरपी
लुकरो लउकत बा
आ लउकत बा ओकर खुरफात

उखाड़त बा सभ कांटन के
फेनू ले गेंदा रोपे बदे
हम डेरात बानीं देखि के ई सभ
कि कहीं गिर मत जाब
लुकार ओकरा हाथ से
जवना से ऊ जारल चाहता कांट
हम डेरात बानीं कि भरमें में
कहीं जर मात जाव आपन घर

ताक 

थाकल आदमी
जब कबो भारी गठरी लदले
आवेला तनी नियरा
ओके देखि के जाने
काहें दो थरथराये लागेला
बांस के पुल
हमरा गाँव के

Share