ललित मोहन त्रिवेदी की रचनाएँ

आईना भी मुझे बरगलाता रहा 

ग़ज़ल
आईना भी मुझे , बरगलाता रहा !
दाहिने को वो बाँया दिखाता रहा !!

दुश्मनी की अदा देखिये तो सही !
करके एहसान, हरदम जताता रहा !!

तार खींचा औ ‘ फिर छोड़कर,चल दिया !
मैं बरस दर बरस झनझनाता रहा !!

उसने कोई शिकायत कभी भी न की !
इस तरह से मुझे वो सताता रहा !!

मुझको मालूम था एक पत्थर है वो !
आदतन पर मैं सर को झुकाता रहा !!

ना फटा,ना बुझा, मन का ज्वालामुखी !
एक लावा सा बस खदबदाता रहा !!

देखिये तो “ललित “की ये जिद देखिये !
पायलें , पत्थरों से, गढ़ाता रहा !!

नदी की धार चट्टानों पे, जब आकर झरी होगी

नदी की धार चट्टानों पे जब आकर झरी होगी !
तभी से आदमी ने बाँध की साज़िश रची होगी !!

तुझे देवी बनाया और पत्थर कर दिया तुझको !
तरेगी भी अहिल्या तो चरण रज़ राम की होगी !!

मरुस्थल में तुम्हारा हाल तो उस बूँद जैसा है !
जिसे गुल पी गए होंगे जो काँटों से बची होगी !!

कहीं पर निर्वसन है और निर्वासन कहीं पर है !
नहीं कुछ फ़र्क है, तू द्रोपदी या जानकी होगी !!

धुएँ को देखनेवालों, ज़रा सा गौर से देखो !
यहीं पर आँच भी होगी, यहीं थोड़ी नमी होगी !!

तुम्हारी शख्सियत अंधों का हाथी ही रही हरदम !
मिठासों की कहानी है जो गूंगे ने कही होगी !!

नींद आती नहीं है, ये क्या हो गया 

नींद आती नहीं है, ये क्या हो गया ?
रात जाती नहीं है, ये क्या हो गया ?

प्रेम हो या कि हो हादसा आँख अब !
छलछलाती नहीं है, ये क्या हो गया !!

अब किसी भी चरण पर कोई आस्था !
सर झुकाती नहीं है, ये क्या हो गया !!

वैसे कहने को तो रातरानी है ये !
गमगमाती नहीं है, ये क्या हो गया !!

हम ने पायल गढ़ाई ग़ज़ल बेच कर !
छनछनाती नहीं है, ये क्या हो गया !!

मीर की हो ग़ज़ल या कि दुष्यंत की !
गुदगुदाती नहीं है, ये क्या हो गया !!

खिलखिलाती नहीं ज़िन्दगी सब्र था !
मुस्कुराती नहीं है, ये क्या हो गया !!

अपनी तारीफ़ है और अपनी ज़ुबां  !
थरथराती नहीं है, ये क्या हो गया !!

वहीं तक पाँव हैं मेरे, जहाँ तक है दरी मेरी 

वहीं तक पाँव हैं मेरे, जहाँ तक है दरी मेरी !
इसी में सब समेटा है, यही जादूगरी मेरी !!

हमें निस्बत गुलाबों से, वो है गुलकंद का हामी !
बचेगी पाँखुरी कैसे, किताबों में धरी मेरी ?

खरी तो सुन नहीं सकते, किताबों से दबे चहरे !
यहाँ पर काम आजाएगी, शायद मसखरी मेरी !!

निशाना जो तेरा बेहतर, नहीं कम मार अपनी भी !
तेरा खंज़र बजेगा और, बजेगी खंज़री मेरी !!

ये जिद भी है कि अपना बीज, मिटटी में दबाऊँ क्यों !
शिकायत ये भी है, होती नहीं धरती हरी मेरी !!

किसी को हो न हो लेकिन, मुझे पूरा भरोसा है !
पड़ेगी एक दिन बांसों पै, भारी बाँसुरी मेरी !!

आँख से अश्क भले ही न गिराया जाये

आँख से अश्क़ भले ही न गिराया जाये !
पर मेरे गम को हँसी में न उड़ाया जाये !!

तू समंदर है मगर मैं तो नहीं हूँ दरिया !
किस तरह फ़िर तेरी दहलीज़ पे आया जाये !!

दो कदम आप चलें तो मैं चलूँ चार कदम !
मिल तो सकते हैं अगर ऐसे निभाया जाये !!

मुझे पसंद है खिलता हुआ, टहनी पे गुलाब !
उसकी जिद है कि वो, जुड़े में सजाया जाये !!

या तो कहदे कि है जंज़ीर, मुकद्दर मेरा !
या मुझे रक़्स का अंदाज़ सिखाया जाये !!

मेरे जज़्बात ग़लत, मेरी हर इक बात ग़लत !
ये सही तो है मगर कितना जताया जाये !!

लाख अच्छा सही वो फूल मगर मुरदा है !
कब तलक उसको किताबों में दबाया जाये !!

रोशनी तुमको उधारी में भी मिल जायेगी !
पर मज़ा तब है कि, जब घर को जलाया जाये !!

खूब पता था वो सागर है खारा पानी है

खूब पता था वो सागर है खारा पानी है !
फिर भी प्यास बुझाने पहुंचे ये हैरानी है !!

बहुत दूर तक सन्नाटों ने राह नहीं छोड़ी !
लेकिन हमने मीठे सुर की चाह नहीं छोड़ी !!

उधर नियति की और इधर अपनी मनमानी है ………….

जीवन भर अपनी शर्तों पर जिसको जीना है !
मीरा या सुकरात हलाहल उसको पीना है !!

सर कटवाकर जीने की हठ हमने ठानी है …………….

बहुत कसे तारों को थोड़ा ढीला होना था !
ढीले तारों को थोड़ा ठसकीला होना था !!

सुर के साथ हमेशा हमने की नादानी है ………………

आसमान को छू लेने की आस लगाली है !
हमने बैठे ठाले अपनी प्यास बढ़ाली है !!

छाया को कद समझ लिया है उस पर ज्ञानी है ?……….

अँजुरी भर अनुराग मिला तो आँगन सजा लिया !
चुटकी भर वैराग मिला तो ओढा बिछा लिया !!

माया पूरी की पूरी तो हाथ न आनी है ……………….

न तो गोताखोर बने, जल में गहरे उतरे !
फ़िर भी सागर की बातें करने से नहीं डरे !!

अपने साथ सही, लेकिन यह बेईमानी है ……………

दौड़ रहे है लोग भला हम क्यों रह जाए खड़े ?
यही सोचकर, जाने कितने, अंधे, दौड़ पड़े !!

फ़िर इसको विकास कहते है ,अज़ब कहानी है …………

धार कटकर पत्थरों के पार क्या जाने लगी

धार कटकर पत्थरों के पार क्या जाने लगी !
वो नदी गुमनाम सी अब और इतराने लगी !!

बाँध ने रोकी तो ऊपर उठ गई मैदान में
जब गिरी तो छेद पैदा कर दिए चट्टान में
बाँध क्या ली है जरा, झरनों की पायल पाँव में
थी लचक पहले भी अब कुछ और बल खाने लगी
वो नदी ……………

चार नाले आ मिले हैं, इस भरी बरसात में
अब तो ये नदिया, नहीं रह पाएगी औकात में
तोड़कर अपने किनारे ही, उफनने क्या लगी ?
पाठ आज़ादी का वो , सागर को समझाने लगी
वो नदी …………..

इन हवाओं ने, अभी तो प्रश्न छेड़े ही नहीं
वो समझती है , समंदर में थपेड़े ही नहीं
एक बाधा पार क्या करली, बिना पतवार के
नाव छोटी सी , भंवर पर ही तरस खाने लगी
वो नदी …………

मैं अंगारा तुम अगर तपन से प्यार करो तो आजाना 

मैं अंगारा तुम अगर तपन से प्यार करो तो आजाना !
मैं जैसा हूँ, मुझे वैसा ही स्वीकार करो तो आजाना !!

जो चना चबैना तक सीमित वो मेरा चना चबैना क्या
जो लेना-देना करता हो फ़िर उससे लेना-देना क्या
मेरी ही तरह अगर तुम भी व्यापार करो तो आजाना …….

मन में आकाश भरा है पर है धरा न पाँवों के नीचे
मैं अनहद तक आ पहुंचा हूँ लेकिन आँखें मीचें-मीचें
तुम धरती बनकर कुछ मेरा आधार करो तो आजाना ……….

मैं ऊब चुका हूँ प्यालों से, दम घुटने लगा सवालों से
अबतो बातें करना चाहूँ, अपने अंतर के छालों से
तुम ओस कणों की ठंडी सी बौछार करो तो आजाना ……….

माना तुम हारे हुए नहीं, लेकिन यह कोई जीत नहीं
मृत्यु में किसी की प्रीत नहीं, फ़िर क्यों जीवन संगीत नहीं ?
तुम ऐसे ऐसे प्रश्नों से दो चार करो तो आजाना ……………

मैं वरदानों को दान समझ स्वीकार नहीं कर पाऊंगा
व्यापार बुद्धि से समझौता मन मार नहीं कर पाऊँगा
तुम होम अगर कर्तव्यों पर अधिकार करो तो आजाना ………..

मैं बहुत थका हूँ इस भ्रम में, साधारण नहीं अनूठा हूँ
इसलिए अभी तक जग से क्या, ख़ुद से भी रूठा-रूठा हूँ
तुम मान नहीं, मुझसे केवल मनुहार करो तो आजाना ……….

या तो ढोल ढमाके हैं, या फ़िर गुमसुम सन्नाटे हैं
मैं चाहे जिसके साथ रहूँ, मुझको घाटे ही घाटे हैं
तुम हौले-हौले झांझर की झनकार करो तो आजाना …………

मैं घोर यातना में बंदी, अभिशप्त प्रेत की छाया हूँ
मैं शापभृष्ट गन्धर्व कहीं से भटक यहाँ पर आया हूँ
आंसू से तर्पण कर मेरा उद्धार करो तो आजाना …………

व्यर्थ न कर देना तुम पल अभिसार 

प्रश्न छेड़ कर्तव्य और अधिकार का !
व्यर्थ न कर देना तुम पल अभिसार का !!

मन में कब तक व्यर्थ प्रतीक्षा लिए रहोगे
जब कोई भी नहीं आएगा द्वार तुम्हारे !
तुम्हें पता है रात कटेगी तारे गिन गिन
क्यों ख़राब करते हो फ़िर ये साँझ सकारे !

सहज आदमी होना कितना सम्मोहक है
देखो तो चोला उतार अवतार का ……………………

माना हमने संघर्षों में जीना अच्छा
बाधाओं से लड़ते रहना ही है जीवन !
झंझाओं से जूझ नाव तट तक ले जाना
जीवन में गति ,गतिमय जीवन सच है, लेकिन !

धारा के संग बहने का भी अपना सुख है ,
देखो तो आसरा छोड़ पतवार का ……………………

तुम हो जाओ मेरे विराट में लीन और ,
में तुमको पा अस्तित्व हीन होता जाऊं !
तुम झरो स्वांति की बूँद बूँद सी जीवन में ,
मैं चातक बनकर घूँट घूँट पीता जाऊं !

तथाकथित यह पाप आज तो कर ही डालें
कल खोजेंगे पंथ मुक्ति के द्वार का ……………..

छू गई साँस इक पाँखुरी

छू गई साँस इक पाँखुरी , प्राण मन गमगमाने लगे !
नैन में जबसे तुम आ बसे , स्वप्न भी झिलमिलाने लगे !!

जब से काजल डिठौना हुआ , हो गया जो भी होना हुआ !
झम झमाझम हुई देहरी , छम छमाछम बिछौना हुआ
बिन पखावज बिना पैंजनी , पाँव ख़ुद छन छनाने लगे !!
नैन में जबसे ……………

रस छलकते क्षणों का पिया , बूँद को भी नदी कर लिया !
चिलचिलाती हुई धूप का , नाम ही चाँदनी धर दिया !
आसमाँ दूर है तो रहे , पंख तो फड़फड़ाने लगे !!
नैन में जबसे …………….

जब खुले पट नहीं द्वार के , सांकलें तोड़ दीं हार के !
मान फ़िर फन पटकने लगा , पाँव छलनी थे मनुहार के !
झनझनाने लगीं बेड़ियाँ , और तुमको बहाने लगे !!
नैन में जबसे …………………

ले लिया जोगिया वेश है , आग लेकिन अभी शेष है !
जल चुका पंखुरी का बदन , गंध में किंतु आवेश है !
ये अलग बात है आज फ़िर , अश्रु कण छलछलाने लगे !!
नैन में जबसे …………………

जब नियति के कसाले पड़े , सूर्य के होंठ काले पड़े !
पाँव मेरे जले धूप में , उनके हाथों में छाले पड़े !
जिंदगी अब न कुछ चाहिए , होश मेरे ठिकाने लगे !!
नैन में जबसे ………………..

कुछ न कुछ लाचारी होगी 

कुछ न कुछ लाचारी होगी, प्यास प्राण पर भारी होगी !
यूँ ही नहीं किसी के आगे, उसने बांह पसारी होगी !!

नेह व्यथा से सृजन कथा तक, सब दस्तूर निराले देखे !
बच-बच कर चलने वालों के, पांवों में ही छाले देखे !
जान-बूझ कर जो स्वीकारी, भूल बहुत ही प्यारी होगी !!
यूँ ही नहीं ……………

प्यार किया है तो करने का, यह अभिमान कहाँ से आया ?
सब कुछ यहाँ लुटाया था तो, फ़िर मस्तक कैसे उग आया ?
जो चाहे प्रतिदान प्रेम में, सिर्फ़ बुद्धि व्यापारी होगी !!
यूँ ही नहीं …………….

दरिया भी सागर है माना, लेकिन कुछ हटकर बहता है !
दर्पण झूठ न बोले फ़िर भी, बाएँ को दायां कहता है !
तुम अभिमान जिसे समझे हो , वह शायद खुद्दारी होगी !!
यूँ ही नहीं …………….

मौन प्यार अच्छा है लेकिन, जी तो करता है कुछ गाऊँ !
घुंघरू पाँव बंधे हैं मेरे, तो झनकार कहाँ ले जाऊं !
यह थिरकन स्वीकार न की तो, ख़ुद से ही गद्दारी होगी !!
यूँ ही नहीं ………….

खुश्बुओं को जहाँ तुम चले हार के

ख़ुश्बुओं को जहाँ तुम चले हार के !
थे वहीं पर बहुत पेड़ कचनार के !!

आरहा है घटाओं का मौसम मगर !
झेल थोड़े से तेवर भी अंगार के !!

इक थपेड़े ने आकर कहा नाव से !
कितने थोथे भरोसे हैं पतवार के !!

डूबना ही मुक़द्दर में जब तय हुआ !
देखलें हौसले हम भी मझधार के !!

फेर लेते हैं नज़रें मुझे देखकर !
क्या अनोखे हैं अंदाज़ दीदार के !!

आप जिनको मशालें समझते रहे !
हाथ में झुनझुने थे पुरस्कार के !!

देखते हो सदा क्यों कड़क बिजलियाँ ?
देखना सीख झोंके भी बौछार के !!

सर के बदले में मंहगी नहीं ज़िंदगी !
तुमको आते नहीं ढंग व्यापार के !!

मंज़िलें हैं कहाँ ये पता ही नहीं !
सिर्फ़ आदी हुए लोग रफ़्तार के !!

जोगी का मन नहीं ठिकाने

हम सभी कोई न कोई लबादा ओढे हुए हैं और धीरे धीरे यही लबादा हमें सत्य लगने लगता है !
हमारी वासनाएं छूटती नहीं हैं सिर्फ़ वेश बदल लेती हैं ,एक नया लबादा ओढ़ लेती हैं और इसी को हमारे अन्दर बैठा हुआ जोगी परम सत्य मानकर आत्म मुग्ध होता रहता है !
इसी आत्म मुग्धता को तोड़ती एक रचना ………

पहने लाख गेरुआ बाने !
जोगी का मन नहीं ठिकाने !!
पहले दौड़ भोग की खातिर !
अब है दौड़ मुक्ति को पाने !!

तप करते युग बीत चला है
और उमर घट रीत चला है
कभी रती तो कभी आरती
छलते-छलते स्वयम् छला है
मुदी पलक में अभी ललक है !
रम्भा आई नहीं रिझाने !!
जोगी का मन …………………

तृष्णा ने बदला है चोला
घर छोड़ा तो आश्रम खोला
खुल पायीं पर नहीं गठानें
झोली नहीं बन सका झोला
रमता अगर कहीं भी मन तो
आता धूनी नहीं रमाने
जोगी का मन …………………

हम जोगी हैं या बंजारे
मुक्ति और भटकन के मारे
हमको फुरसत कहाँ कि देखें
कौन खड़ा है भुजा पसारे
पहले सब पाने को आतुर
अब पागल है सब ठुकराने
जोगी का मन …………………

बादल गहरे भर जाने थे
बिन टकराए झर जाने थे
मन होता मर जाने का तो
शुभ आशीष अखर जाने थे
लेकिन हमने तो मढ़वाकर
रक्खे हैं पदचिन्ह पुराने
जोगी का मन ………………..

है बिलाशक ये दरिया, चमन के लिए

है बिलाशक ये दरिया, चमन के लिए !
चन्द बूँदें तो रखलो तपन के लिए !!

बदमिज़ाजी न बादल की सह पाऊंगा !
मुझको मंज़ूर है प्यास मन के लिए !!

वो तगाफुल नहीं मुझसे कर पाएंगे !
चाहिए आहुती भी हवन के लिए !!

याद रखता है इतिहास केवल उन्हें !
जो कफ़न ओढ़ पाते हैं फ़न के लिए !!

हम भरे जा रहे पृष्ठ पर पृष्ठ हैं !
ढाई आखर बहुत थे सृजन के लिये !!

घर जला है तो फ़िर कुछ जला ही नहीं !
‘पर’ जलाए हैं हमने गगन के लिए !!

लाख सर हों तुम्हारे चरण पर मगर !
चाहिए एक कांधा थकन के लिए !!

सर उठाना तुम्हारा बहुत खूब पर !
एक देहरी तो रक्खो नमन के लिए !!

ढोते-ढोते उजले चेहरे, हमने काटी बहुत उमर

ढोते-ढोते उजले चेहरे, हमने काटी बहुत उमर !
अब तो एक गुनाह करेंगे, पछता लेंगे जीवन भर !!

वो रेशम से पश्मों वाला, था तो सचमुच जादूगर !
मोर पंख से काट ले गया, वो मेरे लोहे के पर !!

उसको अगर देखना हो तो, आंखों से कुछ दूर रखो !
कुछ भी नहीं दिखाई देगा, आंखों में पड़ गया अगर !!

प्यास तुम्हारी तो पोखर के, पानी से ही बुझ जाती !
किसने कहा तुम्हें चलने को, ये पनघट की कठिन डगर !!

ज्ञान कमाया जो रट-रट कर, पुण्य कमाए जो डरकर !
उसकी एक हँसी के आगे, वे सबके सब न्यौछावर !!

सिर्फ़ बहाने खोज रहा है, पर्वत से टकराने के !
बादल भरा हुआ बैठा है, हो जाने को झर झर झर !!

और भटकने दो मरुथल में, और चटखने दो तालू !
गहरी तृप्ति तभी तो होगी, गहरी होगी प्यास अगर !!

तुम्हारी रसवंती चितवन

तुम्हारी रसवंती चितवन !
और मदिर हो गई चाँदनी घूंघट से छन-छन !!

झरे मकरंद, छंद, सिंगार,
अलस, मद, मान और मनुहार
हो गया चकाचौंध दरपन !
तुम्हारी ……………..

चुभी तो नयन नीर भर गई
झुकी तो पीर-पीर कर गई
उठी तो तार-तार था मन
तुम्हारी …………….

सजीली ज्यों काशी की भोर
हठीली हुई बनी चित्तौर
और गीली तो बृन्दावन
तुम्हारी ………………

लजीली हुई बनीं निर्झर
पनीली तो अथाह सागर
और सपनीली तो मधुवन
तुम्हारी ……………….

हुआ क्या मुझे पहुँच मझधार ,
कि लगने लगी बोझ पतवार
भँवर में इतना आकर्षण ?
तुम्हारी ………………

कभी झिलमिल, झिलमिल, झिलमिल
कभी खिलखिल, खिलखिल, खिलखिल
कभी फ़िर छूम, छनन, छन-छन
तुम्हारी …………………..

कैसौ आयौ नवल बसंत सखी री मोरे आंगन में 

कैसो आयो नवल बसंत सखी री मोरे आंगन में !
पोर पोर में आस , प्यास भर गयो उसाँसन में !!

धरा नें ऐसो करो सिंगार !
चुनर सतरंगी , पचलड़ हार !
रसीले नैनन में कचनार !

अंग-अंग अभिसार झरे, ठसकौरी दुलहन में ….
कैसो आयो …………..

उड़े गालन पे लाल अबीर !
हो गई पायलिया मंजीर !
छनकती फिरे जमुन के तीर !

सखि मुंडेर पे कागा बोले, कोयलिया मन में .
कैसो आयो……………

चटख रहो कली-कली को अंग !
फली की देह भई मिरदंग !
नवल तन हूक और हुरदंग !

पिया संदेसो पढ़े ननदिया काजर कोरन में ….
कैसो आयो ………..

चढ़ो ऐसो टेसू को रंग !
जोगिया बन गए पिया मलंग !
बिलम गई फाग आग के संग !

मैं वासंती चुनर निहारत रह गई दरपन में ….
कैसो आयो ……….

यदि तेरे नत नयनों में भर आता नीर नमन का

यदि तेरे नत नयनों में भर आता नीर नमन का !
तो इतना एहसास न होता एकाकी जीवन का !!

अचक अचानक टूट गए क्यों अमर नेह के नाते
छोड़ गए क्यों गीत अधूरे अधरों पर लहराते
सागर की अनंत गहरे पर अभिमान न करते
लग जाता अनुमान कहीं यदि लहरों की थिरकन का !
तो इतना एहसास……….

देखी थी अव्यक्त वेदना पायल की रुनझुन में
सौ-सौ नमन प्रीत के देखे थे प्यासी चितवन में
यदि प्रणाम तक ही सीमित रह जाती अंजलि मेरी
तो मन्दिर उपहास न करता पाषाणी पूजन का !
तो इतना एहसास ………..

कब अभीष्ट थी अरुण कपोलों पर वसंत की लाली ?
कब इच्छित थी मादक नयनों से छलकी मधु प्याली ?
सौरभमय केसर क्यारी की भी तो चाह नहीं थी ,
एक सुमन ही काफ़ी था इस मन को अभिनन्दन का !
तो इतना एहसास ……………

कब-कब बता शलभ ने जल कर दोष दिया बाती को ?
मृग ने बता कभी कोसा है कस्तूरी थाती को ?
उपालंभ अब हम ही क्या जा उन्हें सुनाएँ जिनको ,
आकृति का विक्रतावर्तन भी लगा दोष दर्पण का !
तो इतना एहसास …………..

पाँवों में जंजीर, दौड़ की इच्छा मन भर दी

पाँवों में जंज़ीर, दौड़ की इच्छा मन भर दी !
तूने भी ज्यादती बनाने वाले, मुझसे की !!

जीवन में सब थोड़ा-थोड़ा
ये संस्कार उमर भर ओढा
रस की बूँदें तो छलकायीं
लेकिन कसकर नहीं निचोडा

मीरा की झांझर जैसा मन, व्यापारी सा जीवन !
ऊपर से ढाई आखर की भाषा मन भर दी !!
तूने भी ज्यादती ………………….

मौसम सर्द, हवाएं तीखीं
नभ असीम, अरु गीली पंखियाँ
फ़िर भी साथ निभायीं मैंने
उजला मन, कजरारी अखियाँ

फिसलन भरी राह पर चलना, वैसे क्या कम था !
जो कबीर की साफ़ चदरिया, मेरे सर धर दी !!
तूने भी ज्यादती ……………….

गहरी प्यास समंदर खारे
भटक मरा हूं द्वारे-द्वारे
फ़िर भी अहम् न टूटा इतना
जो नदिया से हाथ पसारे

सर तो झुक जाने को आतुर, छाती मगर तनी है !
जी भर कर रोने पर भी तो पाबंदी धर दी !!
तूने भी ज्यादती ……………….

मैंने ही क्या किया

मैंने ही क्या किया किसी की लट उलझी सुलझाने को !
क्यों कोई जुल्फें बिखराता , मेरी धूप बचाने को !!

बांध बनाकर ये जलधारा जिसने साधी नहीं कभी !
दौनों हाथ जोड़कर जिसने , अँजुरी बाँधी नहीं कभी !

कोई नदिया रुकी नहीं है , उसकी प्यास बुझाने को !!
क्यों कोई जुल्फें बिखराता मेरी धूप बचाने को !!

जो लगते थे नमन प्रीत के , वो गरदन की अकड़न थी !
उसके मन में नृत्य नहीं था और पांव में जकड़न थी !

मैं पागल था जिद कर बैठा पायलिया गढ़वाने को !!
क्यों कोई जुल्फें बिखराता, मेरी धूप बचाने को !!

अहंकार से ऊपर उठकर ,अपनी आँखें खोलो तो !
जिसे तपस्या समझ रहे हो उसको ज़रा टटोलो तो !

वहां छुपी है ‘चाह’ अप्सरा आई नहीं रिझाने को !!
क्यों कोई जुल्फें बिखराता, मेरी धूप बचाने को !!

उसकी आँखों के आँसू से , अपने नयन भिगो न सके !
कभी विरह में या कि मिलन में, लिपट लिपट कर रो न सके !

बस लालायित रहे हमेशा, हम एहसान जताने को !!
क्यों कोई जुल्फें बिखराता, मेरी धूप बचाने को !!

‘ प्यार’ हमारी अभिलाषाओं का विस्तार नहीं तो क्या है ?
तू मुझको दे ,मैं तुझको दूं , यह व्यापार नहीं तो क्या है ?

हमने प्रेम किया भी तो केवल सम्बन्ध भुनाने को !!
क्यों कोई जुल्फें बिखराता, मेरी धूप बचाने को !!

घातों में कुछ नहीं मगर हाँ बातों में कुछ तो दम है ! 

घातों में कुछ नहीं मगर हाँ बातों में कुछ तो दम है !
अंधों को भी बेच दिया है मैंने सुरमा क्या कम है !!

तुम्हें भले संसार दिखाई पड़ता हो केवल सपना !
लेकिन मुझको तो लगता है जुल्फों में अब भी ख़म है !!

यूँ ही नहीं गँवाई हमने जान बेवजह पंडित जी !
खंज़र उसके हाथ सही पर आँख अभी उसकी नम है !!

जबसे कारा की खिड़की पर तूने ज़ुल्फ़ बिखेरी है !
तबसे सजा सुनाने वालों के चेहरों पर मातम है !!

अब तो इन जंजीरों को ही हमने पायल मान लिया !
लोहू तो रिसता रहता है , लेकिन पाँव छमाछम है !!

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