‘वामिक़’ जौनपुरी की रचनाएँ

अभी तो हौसला-ए-कारोबार बाक़ी है

अभी तो हौसला-ए-कारोबार बाक़ी है
ये कम कि आमद-ए-फ़स्ल-ए-बहार बाक़ी है

अभी तो शहर के खण्डरों में झाँकना है मुझे
ये देखना भी तो है कोई यार बाक़ी है

अभी तो काँटों भरे दश्त की करो बातें
अभी तो जैब ओ गिरेबाँ में तार बाक़ी है

अभी तो काटना है तिशों से चट्टानों को
अभी तो मरहला-ए-कोहसार बाक़ी है

अभी तो झेलना है संगलाख़ चश्मों को
अभी तो सिलसिल-ए-आबशार बाक़ी है

अभी तो ढूँडनी हैं राह में कमीं-गाहें
अभी तो मारका-ए-गीर-ओ-दार बाक़ी है

अभी न साया-ए-दीवार की तलाश करो
अभी तो शिद्दत-ए-निस्फु़न-नहार बाकी है

अभी तो लेना है हम को हिसाब-ए-शहर-ए-क़िताल
अभी तो ख़ून-ए-गुलू का शुमार बाक़ी है

अभी यहाँ तो शफ़क़-गूँ कोई उफ़ुक़ ही नहीं
अभी तसादुम-ए-लैल-ओ-नहार बाक़ी है

ये हम को छेड़ के तन्हा कहाँ चले ‘वामिक़’
अभी तो मंज़िल-ए-मेराज-ए-दार बाक़ी है

हो रही है दर-ब-दर ऐसी जबीं-साई कि बस 

हो रही है दर-ब-दर ऐसी जबीं-साई कि बस
क्या अभी बाक़ी है कोई और रूसवाई कि बस

आश्ना राहें भी होती जा रही हैं अजनबी
इस तरह जाती रही आँखों से बीनाई कि बस

तो सहर करते रहे हम इंतिज़ार-ए-मेहर-ए-नौ
देखते ही देखते ऐसी घटा छाई कि बस

ढूँडते ही रह गए हम लाल ओ अलमास ओ गुहर
कोर बद-बीनों ने ऐसी ख़ाक छनवाई कि बस

कुछ शुऊर ओ हिस का था बोहरान हम में वर्ना हम
अहद-ए-नौ की इस तरह करते पज़ीराई कि बस

क्या नहीं कज-अक्स आईनों का दुनिया में इलाज
जिस को देखो है अजब महव-ए-ख़ुद-आराई कि बस

चाकरी करते हुए भी हम रहें आज़ाद-रौ
दस्त-ओ-पा-ए-शौक़ में है वो तवानाई कि बस

आह क्या करते कि हम आदी न थे आराम के
चोट इक इक गाम पर अलबत्ता वो खाई कि बस

इस हसीं गीती के खुल कर रह गए सब जोड़-बंद
चंद पागल ज़र्रों को आई वो अँगड़ाई कि बस

वो तो कहिए बात कि फ़ुर्सत न थी वर्ना अजल
पूछती गाव-ए-ज़मीं से और पसपाई कि बस

कौन शाइर था कहीं का कौन दानिश-वर मगर
दफ़्तरों की दौड़ ‘वामिक़’ ऐसी रास आई कि बस

जीने का लुत्फ़ कुछ तो उठाओ नशे में आओ 

जीने का लुत्फ़ कुछ तो उठाओ नशे में आओ
हँसते हैं कैसे ग़म में दिखाओ नशे में आओ

नश्शा पिला के ख़ूब मिरा हाल-ए-दिल सुना
कुछ तुम भी दिल की बात बताओ नशे में आओ

तुम होश में जब आए तो आफ़त ही बन के आए
अब मेरे पास जब भी तुम आओ नशे में आओ

दिल का ग़ुबार रखना है तौहीन-ए-मै-कशी
बस ख़त्म उठ के हाथ मिलाओ नश में आओ

ये ज़िंदगी की रात है तारीक किस क़दर
दोनों सिरों पे शम्अ जलाओ नशे में आओ

‘वामिक़’ ये दिल की प्यास भला यूँ बूझेगी क्या
अब आग ही से आग बुझाओ नशे में आओ

मिरे फ़िक्र ओ फ़न को नई फ़जा नए बाल-ओ-पर की तलाश है 

मिरे फ़िक्र ओ फ़न को नई फ़जा नए बाल-ओ-पर की तलाश है
जो क़फ़स को यास के फूँक दे मुझे उस शरर की तलाश है

है अजीब आलम-ए-सर-ख़ुशी न शकेब है न शिकस्तगी
कभी मंज़िलों से गुज़र गए कभी रहगुज़र की तलाश है

मुझे उस जुनूँ की है जुस्तुजू जो चमन को बख़्श दे रंग ओ बू
जो नवेद-ए-फ़स्ल-ए-बहार हो मुझे उस नज़र की तलाश है

मुझे उस सहर की हो क्या ख़ुशी जो हो जुल्मतों में घिरी हुई
मिरी शाम-ए-ग़म को जो लूट ले मुझ उस शहर की तलाश है

यूँ तो कहने के लिए चारागर है मुझे बे-शुमार मिले मगर
जो मिज़ाज-ए-ग़म को समझ सके उसी चारागर की तलाश है

मिरे नासेहा मिरे नुक्ता-चीं तुझे मेरे दिल की ख़बर नहीं
मैं हरीफ़-ए-मसलक-ए-बंदगी तुझे संग-ए-दर की तलाश है

मुझे इश्क़ हुस्न ओ हयात से मुझे रब्त फ़िक्र ओ नशात से
मिरा शेर नग़मा-ए-ज़िंदगी तुझे नौहा-गर की तलाश है

उसे ज़िद कि ‘वामिक़’-ए-शिकवा-गर किसी राज़ से नहो बा-ख़बर
मुझे नाज़ है कि ये दीदा-वार मिरी उम्र भर की तलाश है

क़िरतास पे नक़्शे हमें क्या क्या नज़र आए

क़िरतास पे नक़्शे हमें क्या क्या नज़र आए
सब ख़ुश्क नज़र आए जो दरिया नज़र आए

किस को शब-ए-हिज्राँ की गिरानी का हो एहसास
जब दिन चढ़े बाजार में तारा नज़र आए

पत्थर सा वो लगता है टटोलो न जो दिल को
और हाथ में ले लो तो सरापा नज़र आए

सहरा की सदा जिस को समझते रहे कल तक
वो हर्फ़-ए-जुनूँ अब चमन-आरा नज़र आए

मंज़िल का तअय्युन ही ख़ला में नहीं मुमकिन
हम को तो कोई दश्त न दरिया नज़र आए

ऐ काश मिरे गोश ओ नज़र भी रहें साबित
जब हुस्न सुना जाए या नग़मा नज़र आए

इक हल्क़ा-ए-अहबाब है तन्हाई भी उस की
इक हम हैं कि हर बज़्म में तन्हा नज़र आए

हम ने जो तराशे थे सनम अहद-ए-जुनूँ में
उन में से हर इक आज शिवाला नज़र आए

इस दौर की तख़्लीक़ भी क्या शीशा-गरी है
हर आईन में आदमी उल्टा नज़र आए

रात के समंदर में ग़म की नाव चलती है 

रात के समंदर में ग़म की नाव चलती है
दिन के गर्म साहिल पर ज़िंदा लाश जलती है

इक खिलौना है गीती तोड़ तोड़ के जिस को
बच्चों की तरह दुनिया रोती है मचलती है

फ़िक्र ओ फ़न की शह-ज़ादी किस बला की है नागिन
शब में ख़ून पीती है दिन में ज़हर उगलती है

ज़िंदगी की हैसियत बूँद जैसे पानी की
नाचती है शोलों पर चश्म-ए-नम में जलती है

भूके पेट की डाइन सोती ही नहीं इक पल
दिन में धूप खाती है शब में पी के चलती है

पत्तियों की ताली पर जाग उठे चमन वाले
और पत्ती पत्ती अब बैठी हाथ मलती है

घुप अँधेरी राहों पर मशअल-ए-हुसाम-ए-ज़र
है लहू में ऐसी तर बुझती है न जलती है

इंक़िलाब-ए-दौराँ से कुछ तो कहती ही होगी
तेज़ रेलगाड़ी जब पटरियाँ बदलती है

तिश्नगी की तफ़्सीरें मिस्ल-ए-शम्मा हैं ‘वामिक’
जो ज़बान खुलती है उस से लौ निकलती है

सुर्ख़ दामन में शफ़क के कोई तारा तो नहीं

सुर्ख़ दामन में शफ़क के कोई तारा तो नहीं
हम को मुस्तक़बिल-ए-ज़र्री ने पुकारा तो नहीं

दस्त ओ पा शल हैं किनारे से लगा बैठा हूँ
लेकिन इस शोरिश-ए-तूफ़ान से हारा तो नहीं

इस ग़म-ए-दोस्त ने क्या कुछ न सितम ढाए मगर
ग़म-ए-दौराँ की तरह जान से मारा तो नहीं

दुख भरे गीतों से मामूर है क्यूँ बरबत-ए-जाँ
इस में कुछ गुरसना नज़रों का इशारा तो नहीं

अश्क जो दे न उठे लौ सर-ए-मिज़गाँ आ कर
सिर्फ़ इक क़तरा-ए-शबनम है शरारा ता ेनहीं

इक उजाला सा झलकता है पस-ए-पर्दा-ए-शब
चश्म-ए-बे-ख़्वाब में लरजाँ कोई तारा तो नहीं

कितनी उम्मीदों पे जीता रहा ‘वामिक़’ अब तक
अब मगर इक यही जीने का सहारा तो नहीं

तक़सीर क्या है हसरत-ए-दीदार ही तो है

तक़सीर क्या है हसरत-ए-दीदार ही तो है
पादाश उस की हुस्न का पिंदार ही तो है

क्या पूछते हो मेरा फ़साना नया नहीं
क्या देखते हो इश्क़ सर-ए-दार ही तो है

बंद-ए-क़बा चटकता हुआ ग़ुँचा-ए-गुलाब
पहलू-ए-यार निकहत-ए-गुलज़ार ही ता ेहै

हम-साएगी में उस की है क्या लुत्फ़ इन दिनों
लेकिन ये लुत्फ़-ए-साया दीवार ही तो है

ऐ बाग़-बाँ ब-नाम-ए-बहाराँ न छेड़ उसे
गुल-ज़ार मे मुहाफ़िज़-ए-गुल-ख़ार ही तो है

साज़-ए-हयात हम-नफ़सो ख़ूब है मगर
कब टूट जाए साँस का इत तार ही तो है

मैं तंग हूँ सुकून से अब इजि़्तराब दे
बे-इंतिहा सुकूल भी आज़ार ही तो है

ख़ुद जिस में कुछ न पाया न औरों को कुछ दिया
फ़िल-अस्ल ऐसी ज़िंदगी बेकार ही तो है

वो तन्हा मेरे ही दरपय नहीं है 

वो तन्हा मेरे ही दरपय नहीं है
किसी से ख़ुश हो ये भी तय नहीं है

यहाँ की मसनदें सब के लिए हैं
ये मेरा घर है क़स्र-ए-कय नहीं है

अभी ग़ुंचा अभी गुल और अभी तुख़्म
तो क्यूँ कहिए कि हस्ती है नहीं है

तग़य्युर इर्तिक़ा दस्तूर-ए-फ़ितरत
न बदले जो वो कोई शय नहीं है

मगस की ख़ाक-ए-पा नुत्फ़ा इनब का
कशीद-ए-गुल मगस की क़य नहीं है

वो कैसी शख़्सियत जिस में न हो रूह
वो कैसा शीशा जिस में मय नहीं है

वो क्या झरना न जिस से राग फूटे
वो कैसा नग़मा जिस में लय नहीं है

वो फीका वाज़ जिस में कर्ब मादूम
वो झूठा साज़ जिस में नय नहीं है

वो क्या ‘वामिक’ जो निचला बैठ जाए
वो कैसा फ़ासला जो तय नहीं है

ज़हराब पीने वाले अमर हो के रह गए

ज़हराब पीने वाले अमर हो के रह गए
नैसां के चंद क़तरे गुहर हो के रह गए

अह्ल-ए-जुनूं वो क्या हुए जिन के बग़ैर हम
अह्ल-ए-ख़िरद के दस्त निगर हो के रह गए

सहरा गए तो शहर में इक शोर मच गया
जब लौट आए शहर बदर हो के रह गए

उम्मीद के हुबाबों पे उगते रहे महल
झोंका सा एक आया खण्डर हो के रह गए

राहों पे दौड़ते रहे आतिश ब-जेर-ए-पा
मंज़िल मिली तो ख़ाक बसर हो के रह गए

आवारा-गर्द मिस्ल बगोलों के हम रहे
बैठे तो गर्द-ए-राहगुज़र हो के रह गए

बढ़ते रहे सराबों पे मानिंद-ए-तिश्नगी
पानी मिला तो ख़ुश्क शजर हो के रह गए

नज़रें तलाश-ए-हुस्न में जा पहुँचीं तो उफ़क़
जलवे तमाम हद्द-ए-नज़र हो के रह गए

पांबदियों में थे तो दिखाते थे मोजज़े
आज़ादियों में शोबदा-गर हो के रह गए

ढाले गए तो पत्थरों से फूट निकले राग
तोड़े गए तो रक़्स-ए-शरर हो के रह गए

चंग ओ रूबाब में रहे मानिंद-ए-नग़मगी
तेग़ ओ सिनां में सीना सिपर हो के रह गए

मुँह जितने उतनी बातें कहीं जा रहीं हैं आज
यूँ मुश्तहर हुए कि ख़बर हो के रह गए

‘वामिक़’ दो-धारी तेग़ है वो लहजा-ए-जदीद
नग़मे तमाम ख़ून में तर हो के रह गए

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