विजय कुमार देव की रचनाएँ

प्रार्थना

आओ मेरे प्रिय शब्दों
मै प्रार्थना करता हूँ
अपने दुःख भरे दिनों में
ठण्डेपन के साथ

आना तुम शाम को
थककर जिन्दगी से टूटने पर
मैं फिर उलझ जाऊँगा
तुम्हारे मोहपाश में

मेरे मिश्रीमय शब्दों
आना तुम शाम पाँच-सितारा होटल से उतरकर
मेरी टाट झुपड़िया में–
मै तब भी नहीं समझूंगा
तुम्हारा ठीक-ठीक अर्थ

मेरे प्रिय शब्दों
मै कैद कर लूँगा अपने कंठ में
फैला लूँगा पेन भर स्याही में
मै फिर गढ़ूंगा तुम्हें
अपने तई अक्षर-अक्षर
मै फिर उच्चारूँगा तुम्हे
मंत्रमय करके
दसों दिशाओं में टाँक दूँगा
लौटाऊँगा तुम्हारी खोई हुई सत्ता

संवेदन

शब्द कैसे कहेगा
सच-सच अर्थ
अपने होने का बोध
कैसे गढ़ेगा सर्जना में
जबकी
बार-बार मुकर रहा है
हमेश लहलहाने वाला आपका संवेदन

दुरुस्त कर लो सभी
अपने संवेदन-तंत्र
कि अभी आदमी की पूर्णता का
महोत्सव संभव है

शोषक या शोषित
परस्पर का
कहीं भी, किसी एक का
कहीं भी, किसी दुसरे से
मुकर जाता है- संवेदन

शोषित से शोषक
या शोषक से सर्वहारा
बनता है जब कोई
कहीं भी तो फर्क नहीं
सहने या ढाने में

फर्क नहीं पड़ता कि
किसके पास आग है या पानी
दोनों ही हानि कारक हैं
जब उतरते हैं शब्दों में –
लाशों से ज्यादा बयान
शाया होते हैं अख़बारों में
वहाँ कहाँ जीवित -संवेदना

शब्द होते है —
वक्तव्यों के पुल होते हैं
पर नही होता ह्रदय और विचार
सिर्फ एक अदद लालच
शाया होने का
खोखला शेष है संवेदन
बचाओ पत्ते पर पड़ी ओस की बूँद
इतनी गुंजाइश तो करो वर्ना
सदी बीत रही है

पीठ करते हुए 

हम सुनते हैं- पीठ से
पीठ की ओर करते हुए पीठ
बहसियाते हैं , अपरिचय को जीते हैं
भोंकते हैं शब्द तेज़/ हथियार से तेज़
फिर भी,
न भोंथरे होते हैं- शब्द / न हथियार / न आदमी।

हम जान पाते हैं
पीठ करने का मकसद
फिर भी सुरक्षित है -पीठ
ठोंकते हुए पीठ
सुनते है- तारीफशास्त्र
और फेर लेते हैं -पीठ
सुनते हुए पीठ से
घनघनाता है पेट
हुतात्माओं की मानिंद
चौंकता है शरीर/बोलती है आँखे
सुनने लगती है नाक
और/ सूंघने लगते है कान।

हम समझते हैं
कुछ सच है
पीठ पर पड़ती धौल
तो टूटती हैं एड़ियाँ
चटखते हैं तलुए
शास्त्रीय धुन
गूँजने लगती है सायरन की तरह
पेट के गढ़े से
या पीठ की नली से

हमें मालूम है
एक ही बात है
पेट ओर पीठ में

कान उखाड़कर
पेट पाले जाएँगे
ताकि, दुनिया का
अहम् मसला हल हो
तुम फर्क कर सको
पेट ओर पीठ में

सभी को
ज़रूरी होगा सुनना अनवरत
चीकट कालौंची ख़बरें
पेट से न सही गले से
भर दो गला उनका
जो भूखे है सुनने को ।
तुम्हारा
भूगोल बदलेगा ।
ज़रूरी है बदलना
या फिर टैक्स लगाया जएगा
वर्ना
तुम्हारी एक सही हरकत
फना कर देगी-दुनिया की
सबसे हसीन ओर जिंदादिल कविता ।

हम उसे बचाना चाहते हैं
इसलिए सोचो
तुम सब पीठ से सुनना सीखो
सिफ उस हसीन कविता के लिए
क्योकि
जब सब कुछ तबाह हो जायेगा
वह अकेली रच सकती है सब कुछ
बस,
तुम चाकू से तेज़
धारदार शब्दों को
गिरवी रख दो
कुछ सार्थक शब्द
कुछ सार्थक संवाद करो
मैं बचा लूँगा
पूरी ताकत लगाकर
अपनी उर्वरा
भोली-कविता।

आपके समकालीन 

लोग आते हैं आपके पास
राहत की तरह,
आपकी परेशानी में उतरते हैं
कुण्डली के क्षुद्रग्रहों जैसे,
उगते हैं कभी
खिले गुलाब की हरी कच्च डाल पर
काँटों की तरह,
बाधा की तरह आते हैं कभी।

आपके हिस्से में उतरते हैं
सूदखोर की तरह,
नीद में आते हैं करवट बनकर
कर्जे की किस्तों जैसे ,
सपने में डर की शक्ल में
खुशी में हार्टअटैक जैसे
बिजली-सी कौंध की तरह
पतझड़ के मौसम में
आग के लिए हवा बनकर
चले आते हैं लोग।

चले आते हैं आपके पास कुछ
बाज़ार की सस्ती चीज़ की तरह
आपकी मुसीबत में दुआ की तरह
ग़रीबी में मुआवज़े जैसे
नीद की दवा की तरह
पृथ्वी पर हरियाली जैसे |

क्यों नहीं आते
एकमुश्त
भाषा में संवेदन की तरह
आदमक़द इंसान जैसे सम्पूर्ण
आपके समकालीन ?

उबरेंगे पतझड़ से लोग

सब तरफ बदहवास, बदहवास
बेतहाशा दौड़ :

शिशु अपनी जिज्ञासायों में बदहवास
माँ घर की उलझनों में
पिता गृहस्थी चलाने की दिक्कतों में
नेता कुर्सी-दौड़ में बदहवास
खिलाड़ी कीर्तिमान की दुनिया में
विद्यार्थी बस्ता ढ़ोने में
शिक्षक अपनी दुनिया में
धर्माचार्य मठों के चक्कर में
विद्वान प्रसिद्धि के लिए
परीक्षार्थी बदहवास
नकलची बदहवास :

सब बदहवास आँखे
देख रही है -दुनिया की गति में
शामिल अपने पाँवों की नाप :

मोहल्ला,क़स्बा,नगर,राजधानी
पूरा देश एक साथ बदहवास
पूरा देश बदहवास
पूरे लोग बदहवास
देश में दौड़
दौड़ में लोग
लोगों के दिमाग में दौड़
कहाँ जायेंगे सब
पृथ्वी की परिधि नहीं बढ़ेगी |

सब टकरा रहें हैं
टकराहट से बदहवास :
लौटेंगे शायद फिर
पृथ्वी की धुरी में
आरती की तन्मयता लौटेगी
लौटेगी नदी एक दिन
लौटेंगे लोग चौपाल पर

बौन्साई वटवृक्ष निकलेगा गमले से बाहर
धरती की धुरी पर जमाएगा जड़ें ,
कहानी लौटेगी,कम्प्यूटर-स्क्रीन से लोगों की जुबान पर
लौटेगी कविता की धुन लोक गायकों के कंठ में :

सब बदहवास : लौटेंगे एक दिन
आदमकद इंसान की तरह
परिधि से केंद्र की ओर
कंक्रीट जंगल से हरे भरे वनस्पति जगत में
पूरे हर्षोल्लास से
उबरेंगे पतझड़ से लोग |

वे कुछ भी कर सकते हैं

कितनी फुर्ती में आते हैं
चीते की तरह।
चिलचिलाती धूप में
सार्वजनिक प्याऊ की तरफ़
या
कड़कड़ाती ठण्ड में
लपकते हैं जैसे अलाव की तरफ हम।
आ जाते है
जादूगर जैसे
आपकी दुनिया में सेंधमारी करने वे।

आ जाते हैं
देश को बाज़ार करने
अटूट साँस वाले कबड्डी खिलाड़ी की तरह।
फुर्ती में बना देते हैं
मानवता को विज्ञापन
उतार देते है
भाषा के वस्त्र
दबा देते हैं
कंठो में ही शब्द
आदमी को बनाते है शेयर।
आते हैं बैसाखी लेकर
छीनकर एक दिन वह सहारा
हँसते हैं वे अपनी हँसी।

देखना,
झपटकर बच्चों के खिलौने
नदारत हो सकते है।
फुर्ती में आने वालों पर नज़र हो दुरुस्त
फुर्ती में आकर वे कुछ भी कर सकते हैं।।

अभागिन और तीसरा दर्ज़ा

तीसरा यानी सामान्य दर्ज़े
के डिब्बे में ,
लम्बी यात्रा करते हुए
ज़रूर पढ़ा होगा आपने
छपा हुआ पर्चा
हिन्दी फिर अंग्रेज़ी में
जिसका मज़मून
किसी न्यायाधीश का बनाया
पूरे हिंदुस्तान में एक-सा होता है ?

पढ़ा होगा कि
इस अभागिन ब्राह्मणी विधवा बहिन
जिसने चारों-धाम तीरथ किया
बेघर है ,मौन-व्रत रखे हुए है अरसे से।
कन्याएँ ब्याहना चाहती है अपनी
खाने के लाले पड़े हैं
और परिवार में
कमाने वाला उसके सिवा और कोई नहीं है।
आप
हैसियत भर मदद दीजिये।

देखा होगा आपने कि
गूंगी की तरह
फेंक जाती है पर्चा आपके पास
पढ़ें आपकी मर्ज़ी , फेंकें आपकी मर्ज़ी
कुछ दें, न दें आपकी दया पर |
आएगी पर्चा उठाएगी
किसी देवी का फोटो दिखाएगी
और बढ़ती जाएगी क़दम-दर-क़दम
वह कहेगी कुछ नहीं।

मैं सवाल करता हूँ अपने से
इस अनिकेत की
विवाह योग्य कन्याएँ कहाँ होंगीं
इस असुरक्षित समय में ?

या ,
संवेदन-शून्य होते जा रहे
समय की रगों को स्पंदित करने के बहाने हैं ये?
या कि ,
एक प्रायोजित योजना है
किसी गुप्तचर गिरोह की?
फिर ,
ऐसी विकट परिस्थितियों में “मौनव्रत”
ख़ैर। और क्या किया जा सकता है।
मै अचंभित हूँ फिर भी।

तीसरे दर्ज़े में ही क्यों ?
पहले-दूसरे दर्ज़े में ज़्यादा मिलता
क्यों नहीं जाती वहाँ ?
मै फिर अचंभित।
अभागिन मौनव्रत तोड़
गरिया रही है मुझे ,
अव्वल और दोयम दर्ज़े के लोगों को
जो पचास सवाल करने पर भी
पचास पैसे भी नहीं निकालते
बेहतर है हददर्ज़ा ही
जहाँ तर्क नहीं संवेदना है
उसके कहने का अर्थ यही था।

मुझे बेहद रंज हुआ
उसका मौनव्रत तोडकर
लगा कि मैनें उस डिब्बे में
उस समय बैठे उन सैकड़ों यात्रियों से
इस तरह की असंख्य अभागिनों पर कायम
उनका विश्वास छीन लिया है।

वह कैसे लौटाऊँ अब
सोच रहा हूँ।
जैसी भी है
संवेदना है तो सही
तीसरे दर्ज़े में अभी बाक़ी
मुझे उसमें सेंध लगाने का
कोई अधिकार नहीं।।

क्या नहीं हो रहा दुनिया में

रोज़ उगता है सूरज
चाँद आता है-सही समय।
लाल किले की प्राचीर से
भाषण होता है तयशुदा समय में
बिलानागा हर राष्ट्रीय-पर्व की पूर्व-संध्या पर |

जुलूस निकलते हैं रोज़
जलसे होते हैं अनवरत
निरंतर आते हैं समाचार टी०वी० में
ठीक-ठीक समय |

आप कहते हैं -दुनिया में कुछ नहीं रखा।
क्या कहते हैं? नहीं बची आपके लायक दुनिया।
आप कहते हैं – मूल्यों का पतन हो गया है ?
जिन मूल्यों पर पैर रख कर
फूल रहे हैं एलीट लोग
आप कहते हैं सब ग़लत है।
भाई जी! ये ही लोग
तय करते हैं आपका भविष्य
हादसों की तिथियाँ तय
फिर मुआवज़ा , कमेटियाँ
और फिर….?

देखो —
बहुत कुछ हो रहा दुनिया में
लोग रिश्वतें खा रहे हैं नियमानुसार बेहिचक
लोगों की दिनचर्या में है
चापलूसी का एक अध्याय
सपनों में है खंडित मुल्क का सिंहासन
सब कुछ तो समय पर सोचा जा रहा है
आप कहते हैं समय की कद्र नहीं लोगों को।
कहाँ रहते हैं?
आँखे खोलो
सब कुछ साफ-साफ
सच, सच घटता जा रहा है
आपके आस-पास ।

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