विजेन्द्र अनिल की रचनाएँ

जरि गइल ख्‍वाब भाई जी

रउरा सासन के ना बड़ुए जवाब भाईजी,
रउरा कुरूसी से झरेला गुलाब भाई जी

रउरा भोंभा लेके सगरे आवाज करींला,
हमरा मुंहवा पर डलले बानी जाब भाई जी

हमरा झोपड़ी में मटियों के तेल नइखे,
रउरा कोठिया में बरे मेहताब भाई जी

हमरा सतुआ मोहाल, नइखे कफन के ठेकान,
रउआ चाभीं रोज मुरूगा-कवाब भाई जी

रउरा छंवड़ा त पढ़ेला बेलाइत जाइ के
हमरा छंवड़ा के मिले ना किताब भाई जी

रउरा बुढिया के गालवा प क्रीम लागेला,
हमरा नयकी के जरि गइल ख्‍वाब भाई जी

रउरा कनखी पर थाना अउर जेहल नाचेला,
हमरा मुअला प होला ना हिसाब भाई जी

चाहे दंगा करवाईं, चाहे गोली चलवाईं,
देसभक्‍तवा के मिलल बा खिताब भाई जी

ई ह कइसन लोकशाही, लड़े जनता से सिपाही,
केहू मरे, केहू ढारेला सराब भाई जी

अब ना सहब अत्‍याचार, बनी हमरो सरकार,
नाहीं सहब अब राउर कवनो दाब भाई जी

चाहे हथकड़ी लगाईं, चाहे गोली से उड़ाईं
हम त पढ़ब अब ललकी किताब भाई जी

हमरो सलाम लिहीं जी

संउसे देसवा मजूर, रवा काम लिहीं जी
रउआ नेता हईं, हमरो सलाम लिहीं जी।

रउआ गद्दावाली कुरूसी प बइठल रहीं
जनता भेंड़-बकरी ह, ओकर चाम लिहीं जी।

रउआ पटना भा दिल्ली बिरजले रहीं
केहू मरे, रउआ रामजी के नाम लिहीं जी।

चाहे महंगी बढ़े, चाहे लड़े रेलिया
रउआ होटल में छोकरियन से जाम लिहीं जी।

केहू कछुओ कहे त मंहटिउवले रहीं
रउआ पिछली दुअरिया से दाम लिहीं जी।

ई ह गांधी जी के देस, रउआ होई ना कलेस
केहू कांपता त कांपे, रउआ घाम लिहीं जी।

दउरत-दउरत जिनिगी भार हो गइल

दउरत-दउरत जिनिगी भार हो गइल,
भोरहीं में देखिलऽ अन्हार हो गइल।
केकरा के मीत कहीं, केकरा के दुश्मन,
बदरी में सभे अनचिन्हार हो गइल।
पुरवा के झोंका में गदराइल महुआ,
अचके में पछुआ बयार हो गइल।
दरिया में कागज के नाव चलि रहल,
गड़ही के पानी मँझधार हो गइल।
रेत के महल इहास बन्हले बा,
तुमड़ी के भाग, ऊ सितार हो गइल।
कतना उठान भइल दुनिया के,
प्रेम आउर कविता जेवनार हो गइल।

नयका तरजिया हो

केकरा से करीं अरजिया हो
                    सगरे बंटमार।

राजा के देखनीं, सिपहिया के देखनीं
नेता के देखनीं, उपहिया के देखनीं
पइसा प सभकर मरजिया हो
                    सगरे बंटमार

देखनीं कलट्टर के, जजो के देखनीं
राजो के देखनी आ लाजो के देखनीं
कमवा बा सभकर फरजिया हो
                    सगरे बंटमार

देस भई बोफ़ोर्स के तोप नियसउदा सउदा
लोकतन्त्र नाद भइल, संविधान हउदा
कइसे भराई करजिया हो
                    सगरे बंटमार

छप्पन गो छूरी से गरदन रेताइल
साँपन के दूध आउर लावा दिआइल
गाईं जा नयका तरजिया हो
                    सगरे बंटमार

केकरा से करीं अरजिया हो
                    सगरे बंटमार।

रचनाकाल : 07.2.1988

आइल बा वोट के जबाना हो

आइल बा वोट के जबाना हो,
पिया मुखिया बनिजा।

दाल-चाउर खूब मिली, खूब मिली चीनी,
फेल होई झरिया-धनबाद के कमीनी,
पाकिट में रही खजाना हो,
पिया मुखिया बनिजा।

जेकरा के मन करी, रासन तू दीह
जेकरा से मन करी, घूस लेई लीह,
हाथ में कचहरी आ थाना हो,
मुखिया बनिजा।

तोहरा से बेसी के करेला सेवा?
जिनिगीन ओढ़त रहल टाट अउर लेवा,
कबो ना मिलल नीमन खाना हो,
पिया मुखिया बनिजा।

अहरा आ पोखरा के लीह तू ठीका,
कीनि दिह हमरा के झुमका आ टीका,
गावे के फिलिमी तराना हो,
पिया मुखिया बनिजा।

आइल बा वोट के जबाना हो,
पिया मुखिया बनिजा।

रचनाकाल : 02.2.1978

रउआ खाए के ना लूर बा

रउआ खाए के ना लूर बा, जिआन करीला
संउसे देसवा के काहे, परेसान करींला?

करिया पइसा के बूता प दोकान खोलिके
रउआ कंठी लेके राम के ध्यान करींला

जेकर खूनवा पसेनवा बहेला हरदम,
काहे जिनिगी के गाड़ी ओकर जाम करींला?

रउवा साहेबन के सोझवा डोलाई पोंछिया
अपना कबजा में फैक्टरी-खदान करींला

अपना छंवड़ा के देबे खातिर गद्दी सोगहग
संउसे देसवा के निनिआं हराम करींला

रउरा बीवी के मजार प त ताज बनेला
हमरा मउगी के दिने में नीलाम करींला

रचनाकाल : 14 फरवरी 1978

ए बबुुआ कोठी बना ल 

ए बबुुआ कोठी बना ल, अकाल में।

             कोठी बना ल
             कोठा बना ल
रासन के बोरा खपा द, अकाल में।

             चाउर छिपा ल
             गहुम छिपा ल
कले-कले महंगी बढ़ा द, अकाल में।

             अहरा के ठीका
             पोखरा के ठीका
ठीका के माटी चोरा ल, अकाल में।

             बिडिओ से मिलिके
             ओसियर से मिलिके
कागज प सड़क बना द अकाल में।

             पानी चोरा ल
             बिजली चोरा ल
डीजल के डाबा खपा द, अकाल में।

             गोली चलावs
             गोला चलावs
जूलूस प घोड़ा चढ़ा द, अकाल में।

             घंटी बजावs
             घंटा बजावs
दंगा के बिगुल बजा द, अकाल में।

             खाई से गाई
             नाहीं त जाई,
सीमा प सेना घुमा द, अकाल में।

ए बबुुआ कोठी बना ल, अकाल में।

रचनाकाल : 10.3.1980

जागि गइल देस के किसानवां

जागि गइल देस के किसानवाँ,
               बिहानवां में देर नइखे भइया।

    रखिया के ढेर से उड़ल चिनगरिया
    सागर के पेटवा में दहकल अंगरिया
धधकल गाँव के सिवानवाँ,
               बिहानवां में देर नइखे भइया।

    बूढ़-बूढ़ फेंड़वन में लाल-लाल टूसवा,
    सहमल अमेरिका, सहमि गइल रूसवा,
लाल हो रहल आसमानवाँ,
               बिहानवां में देर नइखे भइया।

    ललकी किरिनियां से दरकल अन्हरिया,
    गँउवा के ओर ताके दिलिया सहरिया,
चिहकल रानी के कँगनवा,
               बिहानवां में देर नइखे भइया।

    बूटवा बरदिया के गुजरल जबानवाँ
    हँसुआ के धार भइली गाँव के जनानवाँ,
जुलुमिन के नाक में परानवाँ,
               बिहानवां में देर नइखे भइया।

    ललका निसानवाँ से काँपे रजधनिया
    ठाकुर बेहाल, केहू करी ना गुलमिया,
हाथवा में तीरवा-कमानवाँ,
               बिहानवां में देर नइखे भइया।

    कोटवा कनूनिया के मरलस लकवा
    सुरूज के जोति भइल सँउसे इलाकवा
भेंड़ियन के मानि में मातमवा,
               बिहानवां में देर नइखे भइया।

जागि गइल देस के किसानवाँ,
               बिहानवाँ में देर नइखे भइया।

रचनाकाल : 25.2.1981

अब ना करबि हम गुलमिया तोहार

अब ना करबि हम गुलमिया तोहार,
                            भले भेजs जेहलिया हो।

            सगरे छिटाइल बा हमरे कमीनी
            हमहीं कमाईं, हमहिं अब कीनी,
उड़ल हवा में झोपड़िया हमार,
                            हँसे तोहरो महलिया हो।

            हमहीं निकालीलां सोना आ चानी,
            हमरे पसेनवा प टिकल रजधानी,
हम भइनी गंगा के ढहल कगार,
                            करत तोहरो टहलिया हो।

            तोहरा लइकवा के मोटर आ गाड़ी
            हमरा लइकवा के खाँची-कुदारी,
अब ना सहबि हम जुलुमवा तोहार,
                            सुनs हमरो कहलिया हो।

            पुलिस मलेटरी के गाँवे बोलाके
            दागेलs गोली तू सभके पोल्हा के,
कबले चली ई बनुकिया तोहार,
                            लहके लागल गलिया हो।

            देखs सिवाना के फेंड़, सुगबुगाइल
            पुरुब में सूरूज के लाली छितराइल
गंगा अस उमड़ल बा जनता के धार,
                            डूबि जाई महलिया हो।

अबना करबि हम गुलमिया तोहार,
                            भले भेजs जेहलिया हो।

रचनाकाल : 07.11.1981

हम तो से पूछींला जुलूमी सिपहिया 

हम तो से पूछींला जुलूमी सिपहिया, बता दे हमके ना।
          काहे गोलिया चलवले बता दे हमके ना।

       हमरो बलमुआ न चोर-बटमारवा
       जाँगर ठेठाइ आपन पाले परिवारवा

केकरा हुकुमवा से खूनवा बहवले, बता दे हमके ना।
          काहे खूनवा बहवले, बता दे हमके ना।

       मरि-मरि खेतवा में अन्न उपजवनीं,
       जिनिगी में बनल रहनीं तबो हम पवनी

कवना कनूनिया से अगिया लगवले, बता दे हमके ना।
          काहे अगिया लगवले, बता दे हमके ना।

       अब बरदास नहीं होत फजीहतिया
       तोहरो अजदिया, हमार भइल रतिया

अपने मतरिया प तनले बनूकिया, बता दे हमके ना
          काहे तनलें बनूकिया बता दे हमके ना।

हम तो से पूछींला जुलूमी सिपहिया, बता दे हमके ना
          काहे गोलिया चलवले, बता दे हमके ना।

रचनाकाल : 18.11.1981

सुनs हो मजूर, सुनs हो किसान

सुनs हो मजूर, सुनs हो किसान
सुनs मजलूम, सुनs हो नौजवान
मोरचा बनावs बरियार… कि सुरू भइल लमहर लड़इया हो

एक ओर राजा-रानी, सेठ-सहुकारवा
पुलिस-मलेटरी अउर जमींदारवा
                    दोसरा तरफ भूमिहीन बनिहारवा
                    खेतवा-खदानवां के करे जे सिंगारवा
हो भइया तूहूं, अब तेयार… कि सुरू भइल लमहर लड़इया हो

खेतवा में खटल, बधरिया अगोरल
जिनिगी में मालिके के घरवा सँगोरल
                    टभकत घउआ के कबहूँ न फोरल
                    बोरसी के अगिया के अबले ना खोरल
उठs बहल पुरवा बेआर… कि सुरू भइल लमहर लड़इया हो

तोहरे लइकवा बनावेला बनूकवा
तोहरे कमइया से भरल सनूकवा
                    ढरकल रतिया, उगल देखs सूकवा
                    जरि जइहें जुलुमी, तू मारs तनी फुंकवा
उमड़ल जनता के धार… कि सुरू भइल लमहर लड़इया हो

रनिया करेले रजधनिया में खेलवा
समराजबदिअन से कइलसि मेलवा
                    जनता के पेरिके निकाले रोज तेलवा
                    मुँह खोलि दिहला प मिलत बा जेलवा
निकसल ललका गोहार… कि सुरू भइल लमहर लड़इया हो
मोरचा बनावs बरियार… कि सुरू भइल लमहर लड़इया हो

सुन s हो मजूर, सुनs हो किसान
सुनs मजलूम, सुनs हो नौजवान
मोरचा बनावs बरियार… कि सुरू भइल लमहर लड़इया हो

रचनाकाल : 23.3.1982

केकरा से करीं अरजिया हो, सगरे बटमार

केकरा से करीं अरजिया हो,
सगरे बटमार।

           राजा के देखनीं, सिपहिया के देखनीं
           नेता के देखनीं, उपहिया के देखनीं,

पइसा प सभकर मरजिया हो,
सगरे बटमार।

           देखनी कलट्टर के, जजो के देखनीं
           राजो के देखनीं आ लाजो के देखनीं,

कमवा बा सभकर फरजिया हो,
सगरे बटमार।

           देस भइल बोफर्स के तोप नियन सउदा
           लोकतंत्र नाद भइल, संविधान हउदा,

कइसे भराई करजिया हो,
सगरे बटमार।

           छप्पर गो छूरी से गरदन रेताइल
           साँपन के दूध अउर लावा दिआइल,

गाई जा नयका तरजिया हो,
सगरे बटमार।
केकरा से करीं अरजिया हो,
सगरे बटमार।

रचनाकाल : 07.2.1988

बदलीं जा देसवा के खाका

बदलीं जा देसवा के खाका,
            बलमु लेइ ललका पताका हो।

          खुरपी आ हँसुआ से कइनीं इआरी
          जिनगी में सुनलीं मलिकवा के गारी
कबले बने के मुँह ताका,
            बलमु लेइ ललका पताका हो।

          ना चाहीं हमरा के कोठा-अटारी
          ना चाहीं मखमल आ सिलिक के साड़ी
बन करs दिल्ली के नाका,
            बलमु लेइ ललका पताका हो।

          राजा आ रानी के उड़े जहजिया
          हमनीं के केहू ना सुने अरजिया
जाम करs सासन के चाका,
            बलमु लेइ ललका पताका हो।

          तू बनिजा सूरज हम बनि जाइब लालि
          तू बनिजा झरना, हम बनबि हरियाली,
पंजा प फेंकी जा छक्का,
            बलमु लेइ ललका पताका हो।

बदलीं जा देसवा के खाका,
            बलमु लेइ ललका पताका हो।

रचनाकाल : 15.10.1984

काहे होखत बाड़ू अतना अधीर धनिया 

काहे होखत बाड़ू अतना अधीर धनिया,
लड़िके बदलीं जा आपन तकदीर धनिया।

सहर कसबा भा गाँव, सगरे जुलुमिन के पाँव
केहू हरी नाहीं हमनीं के पीर धनिया।

सगरे होता लूट-मार, नइखे कतहीं सरकार
ठाढ़ होखs पोंछ अँखिया के नीर धनिया।

जेकरा दउलत बेसुमार, ओकरे सहर ह सिंगार,
दीन-दुखियन के सहर, गँगा-तीर धनिया।

घिरल घाटा घनघोर, नइखे लउकत अँजोर,
अब त करे के बा, कवनो तदबीर धनिया।

छोड़ सपना के बात, धरs धरती प लात,
मिलि-जुलि तूरे के बा अपने जँजीर धनिया।

रचनाकाल : 22.10.1991

गोरवन के राज रहे, बिगड़ल समाज रहे

उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द की याद में

गोरवन के राज रहे, बिगड़ल समाज रहे।
            मकरी बीनत रहे जाला मोर सथिया।

जनता तबाह रहे, सूझत न राह रहे,
            देसवा के निकले देवाला मोरे सथिया।

पापी अँगरेजवन के जुलुम बढ़त रहे,
            मदत में सेठ-साहूकार मोरे सथिया।

राजा-महाराजा, जमींदार, पटवारी सभे
            चूसत रहे जनता के खून मोरे सथिया।

देसवा के पनिया, विदेस के मछरिअन से
            आपन मिठासवा गंवावे मोरे सथिया।

विद्या आबरू संस्कृति देस के बिलात रहे
            धुनत रही सुरसती माथ मोरे सथिया।

कपिल, कणाद, व्यास, वाल्मीकि, कालीदास
            केहू के ना होत रहे पूछ मोरे सथिया।

सूरदास, तुलसी, कबीर के कवित्त-सभ
            खोजलो प कतो ना भेंटात मोरे सथिया।

हिन्दिया त बनल रहे, चेरिया-लँउड़िया हो
            अँगरेजी बनल महरानी मोरे सथिया।

देस के किसनवा-मजूरवा बेहाल रहन
            केहू नाहीं रहे पूछनिहार मोरे सथिया।

ओही रे समइया में कीच के कँवल लेखा,
            प्रेमचन्द लिहलन जनम मोरे सथिया।

जेकरा ना जिनिगी में पनिया भेंटाइल रहे,
            ओकरो पिअसिया मिटवलन मोरे सथिया।

जेकरा न हूब रहे, ठाढ़ होके चलहूँ के
            ओकरो के लठिया थम्हवलन मोरे सथिया।

तोपवा-बनूकवा के कमवा कलम कइलस,
            अँगरेजी राज हलकान मोरे सथिया।

लोरवा जेकर केहू पोछले ना रहे कबो
            ओकरो के नायक बनवलन मोरे सथिया।

होरी, हीरा, घीसू, माधो, गोबर आ धनिया कि
            सभवा के बीचवा बइठलन मोरे सथिया।

‘कर्मभूमि’, ‘रंगभूमि’, ‘गबन’, ‘गोदान’ लिखि के
            हमनीं के रहिया देखवलन मोरे सथिया।

छपन बरिस के उमरिया में चलि गइलन,
            देस-दुनिया रोवे बुक्का फारि-मोरे सथिया।

बाकी रही कायम हरदम उनुकर निसनियाँ हो
            उफ त हवन रोसनी के खान मोर सथिया।

अबहीं ना देस के बिपतिया घटल बिया
            सुखी ना किसान-मजदूर मोरे सथिया।

बेलछी, नरायनपुर, पिपरा आ पारस बिगहा
            जुलुम के कहता कहानी मोरे सथिया।

दुनिया में बढ़ल आवे, समराजी पँजवा हो
            देसवा में मचल हहकार मोरे सथिया।

जहाँ-जहाँ होतबा बिरोधवा जुलुमवा के
            उहाँ बाड़न प्रेमचन्द ठाढ़ मोरे सथिया।

रचनाकाल : 28.7.1980

सुगबुगाहट 

भाषा और व्याकरण के जंगल में
सागर की उद्दाम लहरों को मत बाँधो
मत बाँधों झरनों के कलकल निनाद
पंछियों के कलरव और बच्चों की
दूधिया मुस्कानों को पुश्तैनी ज़ंजीरों से

हरे-भरे पेड़ों को काटकर
ज़मीन को समतल बनाने की
हर कोशिश एक छलावा है
प्रकृति से
इससे
वहशी टीलों और
उन पर उगी कँटीली झाड़ियों को
कोई नुक़सान नहीं

बहुत हुआ
अब बन्द करो अपना मसीहाई अन्दाज़
बन्द करो आदमखोर टीलों और
ख़ूनी मीनारों
की आड़ में बैठकर करना
गौरैयों का शिकार

आख़िर कब तक चलेगा
बन्दर-बाँट का नाटक
और नक़ली बहसों का दौर
बहस को ज़मीन पर खड़ा करो
सिर के बल नहीं
पाँव के बल

गन्धाती आवाज़ों को
कविता का अलंकार मत बनाओ
मत बैठाओ
क़त्ल की मुखौटाधारी
कोशिशों को
न्याय की कुर्सी पर

वक़्त की आवाज़ सुनो
मुल्क की धड़कनें तेज़ हो रही हैं
खण्डहर सुगबुगा रहे हैं।

ज़िन्दा कौमें कभी भाषा के जंगल में
क़ैद नहीं होतीं
गर्म लहू कहीं भी गिरे
अपना रंग लाकर रहेगा
इसे जहाँ-तहाँ मत बहाओ
मत बुलाओ हरे-भरे मैदानों में
रेगिस्तानी आँधी।

सिलसिला 

मेरे लिए हर मौसम
आग का मौसम है
हर बेबस आवाज़
सफ़र का पैग़ाम
एक इम्तिहान

इसीलिए
मैंने हर मौसम में
आग के गीत
लिखे हैं
हर बेबस चेहरे ने
मुझे ताक़त दी है
और हर मोड़ पर
मैंने ख़ुद को जाँचा है

यह सिलसिला
वर्षों से चल रहा है
तब तक चलता रहेगा
जब तक झोपड़ियाँ
धुआँती रहेंगी
बेसहारा आवाज़ें चीख़ती रहेंगी

और मुल्क की
ख़ुशहाली के नाम पर
वक़्त के सौदागर
बारूग की खेती करते रहेंगे

नई धार

मेरे लिए हर कविता
मुल्क की सूरत सँवारने का औज़ार है
हर गीत जंगली फूलों की महक
और हर कथा
मुल्क की देह पर उगे
गुमनाम घावों के लिए
नश्तर

मैं मुल्क की सूरत
बेहतर बनाना चाहता हूँ
जंगली फूलों को
गुलाबों की पाँत में
खड़ा करना चाहता हूँ
और मुल्क की देह पर
दर्दनाशक मलहम की तरह
पसर जाना

चाहता हूँ
लेकिन
इससे पहले कि
मुल्क की सूरत बेहतर हो
इसकी देह पर उगे
घावों का इलाज ज़रूरी है

एक नश्तर
समय की फ़ौरी माँग है
दोस्तो, मौसम को ख़ुशनुमा बनाने के लिए
गीतों को टेसू के फूलों की तरह
लाल बनाने के लिए
प्यार को एक नई शक़्ल दें
कविता को
एक नई धार दें।

प्रवाह

मेरी आवाज़ को
बेरोकटोक
सागर की फेनिल लहरों तक पहुँचने दो
इसकी राह में कोई बाँध मत बनाओ
कोई दीवार मत खड़ी करो

दीवार या बाँध बनाने
अथवा टीला उगाने
की हर कोशिश
बालू की भीत
बन जाएगी
आवाज़ को
सागर की अतल गहराइयों में
पहुँचना ही है
चाहे वह ज़मीन के ऊपर चले
या सुरंग के भीतर
यह हवा में तैरती हुई
विद्युत वेग से
आगे बढ़े
इसे सागर तक पहुँचना ही है
इसे उद्दाम लहरों से
एकाकार होना ही है

मेरी आवाज़ को
मुल्क की धड़कनों में
तब्दील होने दो
इसे मजरिम बनाने की हर कोशिश
मुल्क के चेहरे पर उगा क़ातिलाना दाग है
इस दाग से मुल्क को
बचाओ
हवा के ख़ुशबूदार झोंके को मुजरिम होने से
बचाओ
बचाओ पंछियों की चहक
और फूलों कि मुस्कान

मेरी आवाज़
गंगा की गतिमान धारा है
इसके प्रवाह को मत रोको
मत बनाओ कोई बाँध वरना गंगा और विह्वल
हो जाएगी
और इसका पानी
डुबो देगा
चहचहाते नगरों की
मुण्डेरों को

आग

अतीत को
वर्तमान से जोड़े
भविष्य हमारा है
हवा को
पूरब की ओर मोड़े

भेड़िए मान्द से
बाहर निकल रहे हैं
मेमनों की हिफ़ाजत में
आओ
रतजगा करें

अन्धेरे को चीरने के लिए
रोशनी ज़रूरी है
और रोशनी के लिए
आग — सिर्फ़ आग।

कहाँ हैं तुम्हारी वे फ़ाइलें

मैं जानता था : तुम फिर यही कहोगे
यही कहोगे कि राजस्थान और बिहार में सूखा पड़ा है
ब्रह्मपुत्र में बाढ़ आई है, उड़ीसा तूफ़ान की चपेट में है।
तुम्हारे सामने करोड़ों की समस्याएँ हैं
मुट्ठी भर आन्दोलनकारियों की तुम्हें परवाह नहीं,
कि आन्दोलन से किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता।

तुम वर्षों से, लगातार यही तो कह रहे हो
और सूखा हर साल पड़ता है, बाढ़ हर साल आती है
तूफ़ान हर साल आता है और हर साल मरते हैं लाखों लोग

तुम्हारी फ़ाइलों में सिर्फ़ आँकडे हैं
आँकड़े हैं उन बच्चों के जो अभी-अभी माँ के गर्भ से बाहर निकले हैं
उन मर्दों के जिन्हें तुमने आॅपरेशन और इंजेक्शन के द्वारा नपुंसक बना दिया है
और उन खोखली योजनाओं के,
जिनका एक-एक पैसा घूम-फिर कर तुम्हारी ही तिजोरियों में क़ैद हो जाता है।

कहाँ हैं तुम्हारी वे फ़ाइलें
जिनमें हड़ताली खान मजदूरों पर चलाई गई
गोलियों के आँकड़े हैं?
कहाँ हैं वे फ़ाइलें जिनमें जवानों के सीनों में
घुसेड़ी गई संगीनों के दाग हैं?
कहाँ हैं वे फ़ाइलें जिनमें आंदोलनकारी छात्रों पर फेंके गए
टीयर गैस के गोलों और बन्दूक के छर्रों के निशान हैं?
कहाँ हैं? कहाँ हैं वे फ़ाइलें
जिनमें ज़िन्दा जलाए गए हरिजनों और आदिवासियों की
लावारिस लाशों की गन्ध है?
तुम चालाक हो,
जानते हो, ये फ़ाइलें आग बन सकती है।
इसलिए तुमने इन्हें बर्फ़ की सिल्लियों में छिपा रखा है।
मगर, लगातार पिघल रही बर्फ़ की इन सिल्लियों का
क्या करोगे?

क्या करोगे इन सिल्लियों का जो लगातार
हड़तालों और आन्दोलनों के ताप से पिघल रही हैं?
तुम काग़ज़ की दीवार खड़ी करके गंगा के बहाव को
रोकना चाहते हो
तुम ‘ब्लास्ट फर्नेस’ में पिघलते लोहे की गर्मी को
चम्मच भर दूध और चुल्लू भर पानी से कम करना चाहते हो
वाकई, तुम बहुत चालाक हो !

हर पाँच साल पर, तुम्हारे देश की सीमा पर होती है लड़ाई
कहते हैं खदेरू, गोरख, घीसू, भिखारी, जोखू और करामात के जवान बेटे

जो रोटी की तलाश में
अपनी गर्भवती बीवी को घर पर छोड़कर
या बीमार बाप की खाट पर दवा की ख़ाली शीशी पटककर
या विधवा माँ के मुँह से गिरते बलगम में ख़ून के
थक्कों को देखकर
या रोटी के लिए चीख़ते बच्चों को पत्नी के आँचल में बाँधकर
भाग गए
तुम्हारे ‘रिक्रूटिंग आॅफ़िस’ की ओर
और तुमने उनके हाथों में थमाकर लोहे की पतली-पतली नलियाँ
उनके माथे पर पटक दिया था देश का बेडोल नक़्शा
और ऐलान कर दिया था कि यही ‘तुम्हारी माँ है’—

…और जिस वक़्त
काग़ज़ी माँ की नकली सीमाओं की हिफ़ाज़त के लिए
वे अपने ही भाइयों के सीनों में घुसेड़ रहे थे संगीनें
अथवा दाग रहे थे तोपें और गोलियाँ
उस वक़्त, तुम अपनी बीवी के जूड़े में खोंस रहे थे
रजनीगन्धा के फूल
अथवा ‘नाइट शो’ से लौटने के बाद अपने एयरकण्डीशण्ड
कमरे में बैठकर तोड़ रहे थे ‘रम’ और ह्विस्की के कार्क।

लेकिन यह सब कहना फ़िजूल है
मैं जानता हूं, तुम फिर यही कहोगे
यही कहोगे कि देश एक नाज़ुक दौर से गुज़र रहा है
सीमा पर शत्रुओं ने गोली चलाई है
और फिर…
तुम्हारी टेबल पर नई-नई फ़ाइलें बिख़र जाएँगी
तुम्हारे प्रेस, तुम्हारे रेडियो, तुम्हारे अख़बार,
तुम्हारे टेलीविजन झूठ के बड़े-बड़े गोले उगलने लगेंगे।

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