विद्याभूषण की रचनाएँ

आधी रात को 

आधी रात को
शोर जब थक कर निढाल सोता है
शहर का अजब हाल होता है।
सड़कें सुनसान और गलियाँ वीरान
हो जाती हैं।
नींद में ग़र्क है मेरा पड़ोस।
सन्नाटे को छींक तक नहीं आती
थकान की वसीयत ढोती है ख़ामोशी
उस वक़्त मुश्किल माहौल में
मेरी सपनीली आँखें
समय के बंद हो चुके दरवाज़ों के
अकस्मात खुलने की टोह लेती है।

तुम्हारी यादें कटीले रास्तों पर
क़वायद करती होती हैं
और बर्फ़ीली ख़ंदकों में
लुढ़क जाते हैं तमाम हिमालयी सुख।
काले सागर की सरहद पर
दुखों की पनडुब्बियों का सफ़र
नामालूम जारी रहता है।
हासिल दुश्वारी है, यही लाचारी है।

यह मुस्कराती हुई तस्वीर 

यह मुस्कराती हुई तस्वीर
मेरी ताउम्र हमदम नादानी पर
तरस खाती है शायद!
मेरे घर के हर कोने में
मौजूद है उसका वजूद
और वह हरदम तारी है
मेरे जेहन पर मुसलसल क़ाबिज़।

बेशुमार शब्दों के बावजूद
ज़िन्दगी का महाकोश अकूत है।
इस मेले में सभी व्यस्त हैं
किसी ने किसी जुनूनी शगल में।
सबकी अपनी भूख, अपनी प्यास।
सम्मोहक तृष्णाएँ हर मौसम में
यहाँ अभिसार करती हैं।

साँस लेने पर मिल जाती है हवा,
लेकिन क्षमाशील आकाश की छाँह
अब सुलभ नहीं है मुझे।
उमसते दिनों के जुए में जुते घोड़े
हरियाली को कैसे बचाएँगे।

उस रंग भरे गिलास में

उस रंग भरे गिलास में
अनजाने मुझसे छूट गिरे थे
पत्थर के कई नुकीले टुकड़े।
उस वक़्त
मेरे लिए जाम बनाती
उन लहूलुहान उंगलियों के लिए
उपचार की कोई शैली
नहीं मालूम थी मुझे।
यह इल्म भी नहीं थी अपने पास
कि ज़ख़्म की गहराई नाप सकूँ।
अब जब यह सब पता है
अपना वह सब बेपता है
इस बीच गहरी धुँध में
डूब गई हैं सारी दिशाएँ,
अँधेरे में गुम है रोशनी का घर।
वह जगह निगाहों से ओझल है
जहाँ हुआ था अपना रूपांतर।

इधर रोज़ जिरह करती है मुझसे
दुनिया जहान की ख़बरें,
फिर भी गाफ़िल बेख़बर हूँ
कि इस ताउम्र कालेपानी से
कब तक मिलेगी निजात,
और किस औजार से
इस जेल-फाटक की सलाख़ें
तोड़ पाऊँगा मैं।
न मुश्किल राह ख़त्म होती है,
न वह आधा सफ़र।

पता नहीं, नींद कब आएगी

पता नहीम, नींद कब आएगी
सपनों को!
घुमड़ता आकाश
बादलों की बौछार के संग
व्यस्त है,
वातावरण अलमस्त है,
फिर भी यह मन आज पस्त है।

किसके लिए लिखूँ शब्द?
कोई पाती किसके नाम?
अब तक कई ख़ास पते
बेपते हो गए हैं,
घर में क़ैद बेघर हूँ मैं।

ख़ामोशी एक ताबूत बनाती है

ख़ामोशी एक ताबूत बनाती है
और यह फ़िज़ा मेरी दरगाह
बन जाती है।
उस पुरसुकून घेरे से बाहर आकर
पाता हूँ कि लोगबाग,
उनकी ख़बरें, भीड़-भाड़,
रोज़मर्रे की धमाचौकड़ी
गोष्ठी, समारोह जुलूस,
जन्म से मृत्यु तक के विधि-विधान,
हर ख़ास अवसर पर
मजमे में हाज़िरी लगाते हुए
सबकी शर्तों पर मत्था टेक कर
आख़िरश अपना सिर धुनता हूँ।

मेले में माँ से बिछुड़े बच्चे-सा मैं
विषण्ण रहता हूँ इन दिनों।
मीना बाज़ार में
कटी जेब लेकरभटकने का दर्द
मुझे चीरता है।
मैं जादूगर की पेटी में बंद
गुड्डे की तरह
आरों से बार-बार चिर कर भी
साबुत बच जाता हूँ।
मुझे बाहरी चोट नहीं पहुँचती,
मगर भीतर घाव गहरा है।

धड़कनों के जलतरंग पर

धड़कनों के जलतरंग पर
बजता रहा प्रेमगीत का कोरस
और देह-सागर पर
तिरती रही सतरंगी मछलियाँ।
उस लय के विसर्जन का साक्षी हूँ,
इसलिए समुद्र तल पर
नहीं खोज पाता कोई अवशेष।

जीवन किसी संगी की प्रतीक्षा
नहीं करता।
वह आता है बिना कहे
और बिना बताए चला जाता है।
वर्णमैत्री के प्रतीकाक्षर गढ़ते हैं
कई तरह के अर्थपूर्ण विराम,
किन्तु यह नहीं बतलाते कभी
कि पूर्ण विराम के आगे क्या होता है।

शर्त 

एक सच और हज़ार झूठ की बैसाखि‍यों पर
सि‍यार की ति‍कड़म
और गदहे के धैर्य के साथ
शायद बना जा सकता हो राजपुरूष,
आदमी कैसे बना जा सकता है ?

पुस्तकालयों को दीमक की तरह चाट कर
पीठ पर लाद कर उपाधि‍यों का गट्ठर
तुम पाल सकते हो दंभ,
थोड़ा कम या बेशी काली कमाई से
बन जा सकते हो नगर सेठ ।

सिफ़ारि‍श या मि‍हनत के बूते
आला अफ़सर तक हुआ जा सकता है।
किं‍चि‍त ज्ञान और सिंचि‍‍त प्रति‍भा जोड़ कर
साँचे में ढल सकते हैं
अभि‍यंता, चिकित्सक, वकील या क़लमकार ।
तब भी एक अहम काम बचा रह जाता है
कि‍ आदमी गढ़ने का नुस्खा क्या हो ।

साथी ! आपसी सरोकार तय करते हैं
हमारी तहज़ीब का मि‍जाज़,
कि‍ सीढ़ी-दर-सीढ़ी मि‍ली हैसि‍यत से
बड़ी है बूँद-बूँद संचि‍त संचेतना,
ताकि‍ ज्ञान, शक्ति और ऊर्जा,
धन और चातुरी
हिंसक गैंडे की खाल
या धूर्त लोमड़ी की चाल न बन जाएँ

चूँकि आदमी होने की एक ही शर्त है
कि‍ हम दूसरों के दुख में कि‍तने शरीक हैं ।

फ़र्क

सागर तट पर
एक अंजुरी खारा जल पी कर
नहीं दी जा सकती सागर की परि‍भाषा,
चूँकि वह सि‍र्फ़ जलागार नहीं होता ।
इसी तरह ज़ि‍न्दगी कोई समंदर नहीं,
गोताखोरी का नाम है
और आदमी गंगोत्री का उत्स नहीं,
अगम समुद्र होता है ।

धरती कांटे उगाती है ।
तेजाब आकाश से नहीं बरसता ।
हरि‍याली में ही पलती है वि‍ष-बेल ।
लेकि‍न मिट्टी को कोसने से पहले
अच्छी तरह सोच लो ।
फूल कहाँ खि‍लते हैं ?
मधु कहाँ मि‍लता है ?
चन्दन में साँप लि‍पटे हों
तो जंगल गुनहगार कैसे हुए ?

मशीनें लाखों मीटर कपड़े बुनती हैं,
मगर य‍ह आदमी पर निर्भ‍र है
कि वह सूतों के चक्रव्यूह का क्या करेगा !
मशीनें साड़ी और फंदे में
फ़र्क नहीं करतीं,
यह तमीज
सि‍र्फ़ आदमी कर सकता है ।

अथ से इति तक 

भाई तुलसीदास !
हर युग की होती है अपनी व्‍याधि-व्‍यथा ।
कहो, कहाँ से शुरू करूँ आज की कथा ?
मौजूदा प्रसंग लंका-कांड में अटक रहा है ।
लक्ष्‍मण की मूर्च्‍छा टूट नहीं रही,
राम का पता नहीं,
युद्ध घमासान है,
मगर यहाँ जो भी प्रबुद्ध या महान है,
तटस्‍थ है,
चतुर सुजान है ।

ज़हर के समन्‍दर में
हरि‍याली के बचे-खुचे द्वीपों पर
प्रदूषण की बरसात हो रही है ।
आग का दरि‍या
कबाड़ के पहाड़ के नीचे
सदि‍यों से गर्म हो रहा है ।

भाई तुलसीदास !
आज पढ़ना एक शगल है,
लि‍खना कारोबार है,
अचरज की बात यह है
कि‍ ‍जि‍सके लि‍ए क़ि‍ताबें ज़रूरी हैं,
उसे पढ़ना नहीं सि‍खाया गया,
और जि‍न्‍हें पढ़ना आता है,
उन्‍हें ज़ुल्म से लड़ना नहीं आता।
इसलि‍ए भाषण एक कला है,
और जीवन एक शैली है ।
जो भी यहां ग्रह-रत्‍नों के पारखी हैं,
वे सब चाँदी के चक्‍के के सारथी हैं ।

वाकई लाचारी है
कि‍ प्रजा को चुनने के लि‍ए हासि‍ल हैं
जो मताधि‍कार,
सुस्‍थापि‍त है उन पर
राजपुरूषों का एकाधि‍कार ।
मतपेटि‍यों में
वि‍कल्‍प के दरीचे जहाँ खुलते हैं,
वहाँ से राजपथ साफ़ नज़र आता है,

और मुझे वह बस्‍ती याद आने लगती है
जो कभी वहाँ हुआ करती थी-
चूँकि आबादी का वह काफ़ि‍ला
अपनी मुश्‍कि‍लों का गट्ठर ढोता हुआ
चला गया है यहाँ से परदेस –
सायरन की आवाज़ पर
ईंट-भट्ठों की ‍चि‍म‍नि‍याँ सुलगाने,
खेतों-बागानों में दि‍हाड़ी कमाने
या घरों-होटलों में खट कर रोटी जुटाने ।

भाई तुलसीदास !
जब तक राजमहलों के बाहर दास-बस्तियों में
रोशनी की भारी कि‍ल्‍लत है,
और श्रेष्‍ठि‍-जनों की अट्टालि‍काओं के चारों ओर
चकाचौंध का मेला है,
जब तक बाली-सुग्रीव के वंशजों को
बंधुआ मज़दूर बनाए रखता है,
वि‍भीषण सही पार्टी की तलाश में
बार-बार करवटें बदल रहा है,
और लंका के प्रहरी अपनी धुन में हैं,
तब तक दीन-दु‍खि‍यों का अरण्‍य-रोदन
सुनने की फुर्सत कि‍सी के पास नहीं ।

कलि‍युग की रामायण में
उत्‍तरकाण्‍ड लि‍खे जाने का इन्‍तज़ार
कर रहे हैं लोग,
सम्‍प्रति‍, राम नाम सत्‍य है,
यह मैं कैसे कहूँ !
मगर एक सच और है भाई तुलसीदास!
ज़ि‍न्‍दगी रामायण नहीं, महाभारत है।
कौरव जब सुई बराबर जगह देने को
राजी न हों
तो युद्ध के सि‍वा और क्‍या रास्‍ता
रह जाता है ?

प्रजा जब रोटी माँगती हो
और सम्राट लुई केक खाने की तज्वीज़
पेश करे
तो इति‍हास का पहि‍या कि‍धर जाएगा ?
डंका पीटा जा रहा है,
भीड़ जुटती जा रही है,
चि‍नगारि‍याँ चुनी जा रही हैं,
पोस्‍टर लि‍खे जा रहे हैं,
और तूति‍याँ नक्‍कारखाने पर
हमले की हि‍म्‍मत जुटा रही हैं ।

गर्द ग़ुबार का इज़हार 

अरे ओ खजांची,
जब तुम्हारे सामने रखी होंगी
ति‍जोरी की चाबि‍याँ,
मगर वहाँ तक पहुँचने में
असमर्थ होंगे तुम्हारे हाथ,
चेक-बुक पड़ी होगा मेज़ पर
और दस्तख़त करते काँपेंगी उँगलि‍याँ,
जब छप्पन भोग की सजी हुई थाली से
जायकेदार नि‍वाले
नहीं कर सकोगे अपने मुँह के हवाले,
जब कभी प्यास से अकड़ा होगा हलक
मगर गि‍लास नहीं पहुँचेंगे होंठों तक,
तो सोचो कैसा होता होगा
लाचार ज़ि‍न्दगि‍यों का दुख-जाल !

अबे ओ थानेदार,
जब भूख से ऐंठती हों अंतड़ियाँ
और घर में आधी रोटी भी
मयस्सर नहीं हो,
न फ्रि‍ज, न लॉकर,
न दराज़, न ति‍जोरी,
न चेक-बुक, न नगदी,
और चूल्हा हो ठंडा, देगची हो खाली,
तो कैसे बन जाता है
कमज़ोर आदमी मवाली !

अजी ओ जि‍लाधीश !
कब तक कतार में झुके रहेंगे
ये शीश ?
बकरे की अम्मा कब तक मनाएगी ख़ैर,
जल में रह कर कैसे नि‍भे मगर से बैर !
जब भारी जुल्म-सि‍तम तारी हो,
सि‍र्फ़ ‍सि‍फ़र जीने की लाचारी हो,
ज़ि‍न्दा लाशों का हुजूम हो
गलि‍यों में, सड़कों पर,
और तमाम रास्ते हों बंद,
तब कहाँ जाएगी यह दुनि‍या
अमनपसन्द ?

जरा सुनो सरताज,
यह आज देता है कि‍स कल का आगाज़ ?
क्यों माँगने वाले हाथ
मज़बूरन बंदूक थाम लें ?
क्यों‍ मेहनतकश लोग
बेइंतहा ग़ुरबत का इनाम लें ?
बंधुआ अवाम को ज़ि‍ल्लत की जेल से
नि‍कलने के लि‍ए,
देश और दुनि‍या को बदलने के लि‍ए
क्या तज्वीज़ है तुम्हारे पास ?
ठोस ज़मीन पर चलो,
मत नापो आकाश ।

साठ साल के धूप-छाँही रंग-1

काग़ज़ पर शब्द लि‍ख कर सोचता हूँ
सार्थक हो गया अपना अनकहा,
फागुन से जेठ तक
हर मौसम में भला-बुरा जो भी सहा ।

सपनों से अनि‍द्रा तक
चुंबन बरसाती अदाओं के तोरण द्वार
सजा कर
अस्तित्व को घेरते रहे कुछ शब्द-
रंग, गंध, स्पर्श, स्वाद,
सुख, आनन्द, उत्सव, समारोह,
सेहत, जवानी, रूप-सौन्दर्य,
मधु, मदि‍रा, सुधा,
वक्ष, होंठ, कदलि-‍वन,
आकाश, क्षि‍ति‍ज, शून्य,
आत्मीय, संगी, मित्र, प्रशंसक,
ख़रीदार, दरबारी, पुजारी,
पहचान, सम्मान, जय-जयकार,
भ्रान्ति, दि‍वास्वप्न, मि‍थ्या वि‍स्तार ।

यह सतरंगी जि‍ल्दोंवाली डायरी
पलट कर देखता हूं जब भी फ़ुरसत में,
अंधे एकान्त का अक्स
खुल जा सि‍म-सि‍म की तर्ज पर
खुलता है यकायक ।
अजन्ता-एलोरा के मादक रूपांकन,
कोणार्क के सुगठि‍त प्रस्तर शि‍ल्प
और मांसल चैनलों के वर्जनामुक्त दृश्य
मन के राडार पर अंकि‍त हो जाते हैं
ख़ुद-ब-ख़ुद ।

इस दि‍लकश संचि‍का को
बचाए रखने की जुगत नहीं थी अपनी,
फि‍र भी जाने कैसे
मन के नामालूम अँधेरों में
वर्षों छि‍पती रह कर
वह जीवि‍त रही है
और बदराए मौसम में कभी-कभी
लपटीली इबारतों के साथ
मेरे चश्मे पर घि‍रती रही है ।

साठ साल के धूप-छाँही रंग-2

इस सुरमई मौसम में
मुश्किलों की बहंगी ढोती ज़ि‍न्दगी
सि‍हरती है ।
अतृप्त स्वाद, रेशमी स्पर्श,
मनहर दृश्य, गुलाबी गंध
और घटाटोपी कुहासे में
अनगि‍नत ऐन्द्रिक भूचाल
सदाबहार कामनाओं को
रसभरे इशारे करते हैं ।

जि‍स प्रेम-ग्रंथ का साठवाँ संस्करण
प्रस्तुत है मेरे सामने,
उसमें अनगि‍नत अनलि‍खी कवि‍ताएँ
ओस-अणुओं में दर्ज़ हैं ।
कुछेक लि‍खी गई थीं गुलाबी कि‍ताबों के
रूपहले पन्नों पर ।
कई अनछपी डायरि‍याँ
संस्मरणों में ढल गई हैं,
और तमाम गीली स्मृ‍‍ति‍याँ
उच्छवासों में वि‍सर्जि‍त हो चुकी हैं ।

ओस में नहाई गुलाबों की घाटी
भली लगती है मुझे आज भी,
मगर फूल तोड़ना सख़्त मना है यहाँ ।
मि‍त्रो, वर्जित फलों की सूची लंबी है,
और सभाशास्त्र में उनके स्वाद
सर्वथा नि‍षि‍द्ध घोषि‍त हैं ।
आदम और हव्वा की पीढ़ि‍याँ
एक सेब चखने की सजा
भुगतती रही हैं बार-बार ।
लेकि‍न स्मृति‍‍याँ नि‍र्बंध शकुंतलाएँ हैं,
उनका अभि‍ज्ञान रचता हूँ मैं ।

साठ साल के धूप-छाँही रंग-3

साठ ऋतुचक्रों को समर्पि‍त इस यात्रा में
रम्‍य घाटि‍यों से गुज़रते हुए
हर मौसम में आठों पहर
सि‍सि‍फ़स की शाप-कथा का साक्षी रहा मैं ।

अनगि‍नत बार शि‍खर छूने का भरम
और ढलान पर सरकते हुए
धरातल पर वापसी का करम ।
कि‍सी क्षण मुझे यह पता नहीं चला
कि‍ त्रि‍शंकु को नि‍यति‍ ने क्‍यों छला !

मैं तंद्रि‍ल कवि‍ताओं की गोष्‍ठी में
आता-जाता रहा कई बार,
मधुमती भूमि‍का से लेकर
बले-बले की धुन में चल रहे
मदहोश महफि‍ल में
तुमुल कोरस का श्रोता
रहा बरसों तक।

पता नहीं,
कि‍तना सही है यह सहज ज्ञान
कि‍ थि‍रकती है देह, और हुलसता है मन,
इससे अधि‍क कुछ नहीं है जीवन ।
कोलाहल में आत्‍मा सो जाती है अक्‍सर
और जागती है कभी-कभी
अनहद भोर की चुप्‍पी में ।

राग-वि‍राग की सेज पर
करवटें बदलती आई हैं सदि‍यां,
श्रद्धा और इड़ा की लहरीली चोटि‍यों के बीच
प्रलय की उत्‍ताल तरंगों पर
नौका वि‍हार का पहला यात्री था मनु ।

आज भी देह का दावानल तपता है
मानसरोवर की घाटी में,
उस जल प्‍लावन का प्रति‍पल साक्षी है
जो यायावर‍-कवि
उसे वि‍‍द्याभूष‍ण कहते हैं ।

दोहे का दहला

करे ठि‍ठोली समय भी, गर्दिश का है फेर,
यश-वर्षा की कामना, सूखे का है दौर ।

महँगाई का जोर है, कि‍ल्‍लत की है मार,
ति‍स पर घी भी ना मि‍ले, कर्ज़ हुआ दुश्‍वार ।

दास मलूका कह गए, सबके दाता राम,
संत नि‍ठल्‍ले हो रहे, उन्‍हें न कोई काम ।

नाम-दाम सब कुछ मि‍ले जि‍नके नाथ महंत,
कर्म करो, फल ना चखो, कहें महागुरू संत ।

हरदम चलती मसखरी, ऐसी हो दूकान,
मौन ठहाके से डरे, सदगुण से इनसान ।

दस द्वारे का पींजरा, सौ द्वारे के कान,
सबसे परनिंदा भली, चापलूस मेहमान ।

ऐसी बानी बोलि‍ए जि‍समें लाभ अनेक,
सच का बेड़ा ग़र्क हो, मस्‍ती में हो शोक ।

आडम्‍बर का दौर है, सच को मि‍ले न ठौर,
राजनीति‍ के दाँव में पाखंडी सिरमौर ।

अपना हो तो सब भला, दूजे की क्‍या बात !
जगत रीति‍ यह है भली, दि‍न हो चाहे रात ।

राज रोग का कहर है, आसन सुधा समान,
जि‍सको कोई ना तजे, उसे परम-पद जान ।

गीत जब खो जाता है

आज का सबसे जटि‍ल सवाल
मि‍त्र, मत पूछो यह फ़ि‍लहाल,
गीत कब खो जाता है,
लबों पर सो जाता है ।

सुबह-सवेरे
सब को घेरे
अफ़वाहों का दबा-घुटा-सा शोर
कि‍ आज की भोर
क़त्‍ल की ओर…
मुहल्‍ले में चौराहे बीच
रक्‍त की जमा हो गयी कीच ।
कि‍सी का ख़ून हो गया, प्रात
एक झुरझुरी भरा आघात
कि‍ बाक़ी दि‍न क्‍या होगा हाल
सुबह का रक्‍त सना जब भाल ?

चार कंधों पर चलते शब्‍द
पसर जाते हैं
पस्‍त नि‍ढाल ।
सहमते-से सारे एहसास
कि‍ ऐसी हत्‍याओं के पास
एक आतंक
घूमता है बि‍ल्‍कुल नि‍श्‍शंक,
जेल से छुटे हुए
खुफ़ि‍या चेहरों के डंक ।
चतुर्दि‍‍क झूठा रक्षा चक्र
आम जीवन-समाज दुश्‍चक्र ।

शब्‍द हो जाते हैं लाचार,
नहीं दि‍खता कोई उपचार ।
प्रशासन देता सि‍र्फ़ कुतर्क-
तर्क का बेड़ा करता ग़र्क ।
भेड़ है कौन ? भेड़ि‍या कौन ?
व्‍यवस्‍था मि‍टा रही यह फ़र्क ।
कि‍न्‍तु मथता है एक वि‍चार
कि‍ सोचो अब
क्‍या हो प्रति‍कार ।

अजब है ऐसा लोकाचार
कि‍ पशुता का अरण्‍य वि‍स्‍तार…
इसी बीहड़ जंगल के बीच
प्रश्‍न जब ले जाते हैं खींच,
गीत तब खो जाता है,
लबों पर सो जाता है ।

वि‍रासत का भार

वाद-वि‍वाद-संवाद गोष्‍ठि‍यों में
अपनी संकटग्रस्‍त आस्‍था के लि‍ए
तर्क-वि‍तर्क-सतर्क बहसों की गि‍रफ़्त में
घु‍ट कर
जब लौटता हूँ घर-
अपने अन्‍तरकक्ष में,
मैं संतुष्‍ट आदमी नहीं रह जाता।
कई बेसुरी आवाज़ें
तमाम सवालों का जायका
कसैला कर देती हैं
कि‍ साठ सालों के सफ़र में
लाल आँधी की ग्‍लोबल-रफ़्तार
सि‍यासी वक़्त की दौड़ में
पीछे क्‍यों रह गई ?

कई द्वीपों पर बाग़ी परचम
वक़्ती तौर पर लहराया ज़रूर,
मगर ति‍रंगे देश की धरती
रह गई प्‍यासी परती,

इति‍हास के रास्‍तों पर
मील के दीगर पत्‍थर गड़ते रहे
बारबार-लगातार,
और हमारे साथि‍यों की बैरक में
तकरीरें चलती रहीं हाँफती चाल ।

फि‍लहाल जम्‍हूरी दस्‍तावेज़ों के क़ाति‍ब
पूछ रहे यह बेमुरव्वत सवाल
कि‍ उस सुर्ख़ परचम को काट-छाँट कर
कि‍सने बनाए बीस रूमाल ?

उस सुलगती अंगीठी को जल समाधि
कहाँ-कहाँ मि‍ली ?
कि‍ आगे दि‍खती है अब बंद गली।
वि‍सर्जन की वह जगह कौन-सी है-
हि‍न्‍द महासागर या हुगली ?

मुश्‍कि‍ल में है इंकलाबी इन्‍तज़ार
कि‍ अब कि‍सके नाम दर्ज़ हो
इस अपाहि‍ज वि‍रासत का भार ?

शब्द 

शब्द
ख़ाली हाथ नहीं लौटाते।

तुम कहो प्यार
और एक रेशमी स्पर्श
तुम्हें छूने लगेगा।
तुम कहो करुणा
और एक अदृश्य छतरी
तुम्हारे सन्तापों पर
छतनार वृक्ष बन तन जाएगी।

तुम कहो चन्द्रमा
और एक दूधपगी रोटी
तुम्हें परोसी मिलेगी,
तुम कहो सूरज
और एक भरा-पूरा कार्यदिवस
तुम्हें सुलभ होगा।

शब्द
किसी की फरियाद
अनसुनी नहीं करते।

गहरी से गहरी घाटियों में
आवाज़ दो,
तुम्हारे शब्द तुम्हारे पास
फिर लौट आएँगे,
लौट-लौट आएँगे।

कविता : एक उम्दा ख़याल

कविता
अलार्म घड़ी नहीं है दोस्तो
जिसे सिरहाने रख कर
तुम सो जाओ
और वह हर नियत वक़्त पर
तुम्हें जगाया करे।
तुम उसे
संतरी मीनार पर रख दो, तो
वह दूरबीन का काम देती रहेगी।

वह सरहद की मुश्किल चौकियों तक
पहुँच जाती है राडार की तरह,
तो भी
मोतियाबिन्द के शर्तिया इलाज का दावा
नहीं उसका।
वह बहरे कानों की दवा
नहीं बन सकती कभी।
हाँ, किसी चोट खाई जगह पर
उसे रख दो
तो वह दर्द से राहत दे सकती है
और कभी सायरन की चीख़ बन
ख़तरों से सावधान कर सकती है।

कविता ऊसर खेतों के लिए
हल का फाल बन सकती है,
फरिश्तों के घर जाने की ख़ातिर
नंगे पाँवों के लिए
जूते की नाल बन सकती है,
समस्याओं के बीहड़ जंगल में
एक बागी सन्ताल बन सकती है,
और किसी मुसीबत में
अगर तुम आदमी बने रहना चाहो
तो एक उम्दा ख़याल बन सकती है।

बिरसा के नाम

ओ दादा!
कब तक
बँधे हाथ खड़े रहोगे
वर्षा-धूप-ठण्ड में
एक ठूँठ साल के तने से टिके हुए?

ओ दादा !
खूँटी-राँची-धुर्वा के नुक्कड़ पर
तेज़ रफ़्तार गाड़ियों की धूल-गर्द
फाँकते हुए
कब तक
बँधे हाथ खड़े रहोगे ख़ामोश?

किसने तुम्हें भगवान कहा था?
पूजा गृह की प्रस्तर-प्रतिमा की तरह
राजनीतिक पुरातत्त्व का अवशेष
बना दिया गया है तुम्हें,
जबकि तुम अमृत ज्वालामुखी थे,
ज़ोर-ज़ुल्म के ख़िलाफ़
और ‘दिक्कुओं‘ के शोषण से दुखी थे।

आज़ाद हिन्दुस्तान में
शहीदों को हम इसी तरह गौरव देने लगे हैं
कि ज़िन्दा यादगारों को मुर्दा इमारतों में
दफ़न करते हैं,
बारूदी संकल्पों का अभिनन्दन ग्रन्थ
छाप कर समारोहों को सुपुर्द कर देते हैं,
ताकि सुरक्षित रहे कोल्हू और बैल का
सदियों पुराना रिश्ता
और इतिहास की मज़ार पर
मत्था टेकते रहें नागरिक।

आज कितना बदल गया है परिदृश्य :
नए बसते नगरों-उजड़ते ग्रामाँचलों में
एक तनाव पसरा रहा है,
झरिया-धनबाद-गिरिडीह की ख़दानों में
ज़िन्दगी सुलग रही है,
बोकारो की धमन भट्ठियाँ और चासनाला के लोग
एक ही जलती मोमबत्ती के दो सिरे हैं।

पतरातू-भवनाथपुर-तोरपा की मार्फ़त
तिजोरियों, बैंक लाकरों, बेनामी ज़ायदादों के लिए
राजकोष खुल गया है
और आमदनी के रास्ते खोजती सभ्यता के मुँह
ख़ून लग गया है दादा !

आज कितनी बदल गयी हैँ स्थितियाँ :
जगन्नाथपुर मन्दिर के शिखर से ऊपर उठ गई हैं
भारी इंजीनियरी कारख़ाने की चिमनियाँ,
सूर्य मन्दिर के कलश
और रोमन-गोस्सनर चर्चों के
प्रार्थना भवनों से ऊँचा है
दूरभाष केन्द्र का माइक्रोवेव टावर।

लहराते खेतों को उजाड़ कर बनी हवाई पट्टी
औद्योगिक विकास के नाम पर
खुली लूट का आमन्त्रण देती है
आला अफसरों को, श्रेष्ठि जनों को, जनसेवकों को।
हटिया कारख़ाने की दिन-रात धड़धड़ाती मशीनें
लौह-इस्पात सँयँत्र उगलती रहती हैं
देश-देशान्तर के लिए और,
मेकान-उषा मार्टिन के ग्लोबल टेण्डर खुलते हैं,
और खुलते जा रहे हैं
आरामदेह अतिथि गृह, चकला केन्द्र, आलीशान होटल,
जनतन्त्र को उलूकतन्त्र में ढालते हुए।

दादा !
विकास के इसी रास्ते
टिमटिमाती ढिबरियों की लौ
पहुँचती है मज़दूर झोपड़ों में, खपड़ैल मकानों में,
दूरदराज गाँवों में।

सच, कितना बदल गया है परिवेश :
अल्बर्ट एक्का के नाम।
वसीयत होने के बावजूद
नगर चौक पर फिरायालाल अभी तक काबिज़ है।
तोरपा-भवनाथपुर-पतरातू-हटिया-डोरण्डा में
सरकारी इमारतों के फाटकों पर
विस्थापितों की एक समान्तर दुनिया
उजाड़ के मौसम का शोकगीत गा रही है।

चिलचिलाती धूप में अन्धेरा फैलाता है
हटिया विद्युत ग्रिड स्टेशन नावासारा-तिरील में।
कोकर-बड़ालाल स्ट्रीट में टेलिप्रिण्टर-आफ़सेट मशीनों पर
समाचार का आयात-निर्यात व्यवसाय
दिन-रात चल रहा है।
मगर दीया तले अन्धेरा है दादा !
अन्धेरा है पतरातू तापघर की ज़मीन से उजाड़ कर
बनाई गई बस्ती में,
अन्धेरा है
झारखण्ड के गाँवों में, जंगलों में, पहाड़ों पर,
प्रखण्ड विकास अँचल कार्यालयों के इर्द-गिर्द,
वन उद्योग के सरकारी महकमों के चारों ओर
अन्धेरा है।

दादा, झारखण्ड के गर्भ गृहों की लूट ज़ारी है।
जंगल उजाड़ हो गए हैं राजपथ की अभ्यर्थना में।
पहाड़ों पर
कितने साल वृक्ष अरअरा के कट चुके हैं,
खदानों के बाहर काला बाज़ारियों के ट्रकों की
शृंखला अटूट लग रही है,
पतरातू विद्युत गृह अनवरत जल रहा है
राजधानी की मोतियाबिन्दी आँखों में
रोशनी भरने के लिए।

उस दिन लोहरदगा रेल लाइन की पटरियों पर
उदास चलती मगदली ने पूछा था मुझसे,
सिसलिया और बुँची के चेहरों पर
छले जाने का दर्द था,
सावना की आँखों में वही हताशा झाँक रही थी
जो ब्रिटिश राज से जूझते हुए
राँची सदर जेल में
सुकरात की तरह ज़हर पी कर बुझते हुए
तुमने महसूस की होगी।
तुम कौन थे?
क्या किया था तुमने अपनी कौम की ख़ातिर?
उस दिन यही सवाल पूछा था क्लास में।
मास्टर जी सिर खुजलाते बोले थे —
भगवान थे, फिरँगियों की क़ैद में मरे थे
बीमार हो कर।

दादा ! दन्तकथाओं की मालाओं से दब कर
तुम पुराणकथाओं के नायक बन गए हो,
मगर ज़ुल्म से टक्कर लेने वाले उस आदमी
की चर्चा क्यों फीकी है?

अनामिका तिर्की तुम्हें भगवान मानती है,
यही जानता है विवेक महतो।
राँची विश्वविद्यालय के परीक्षा केन्द्रों से
उफनती युवा ज्वालामुखी
डैनी-अमज़द-राज बब्बर और
पद्मिनी कोल्हापुरी को समर्पित है।

पार्टियाँ इस भीड़ को अपनी फौज में
बदलने की कोशिश कर रही हैं लगातार…
वैसे शहर में पार्टियाँ अकसर चलती हैं!
किसी घोटाले से बेदाग बचने की ख़ुशी में
जश्न की महफ़िल सजती है,
थैली पार्टियों से झण्डा पार्टियों की दोस्ती
ख़ूब जमती है,
क्योंकि सफ़ेदपोशों के इस देश में
बिचौलियों की चान्दी है,
जनता नेता की बान्दी है।

लेकिन तुम, दादा तुम
कब तक, कब तक
बँधे हाथ खड़े रहोगे
खूँटी-राँची-धुर्वा के तिराहे पर
ख़ामोश?

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