विनोद विट्ठल की रचनाएँ

अड़तालीस साल का आदमी

अड़तालीस की उम्र अस्सी प्रतिशत है ज़िन्दगी का
आख़िर के आधे घण्टे की होती है फ़िल्म जैसे
चान्द के साथ रात के आसमान में टँक जाती है कुछ चिन्ताएँ
गीतों की जगह याद की डायरी में दर्ज़ हो जाती है कुछ गोलियाँ
रविवार नियत हो जाता है लिपिड प्रोफ़ायल जैसे कुछ परीक्षणों के लिए
हर शाम डराते हैं इंवेस्टमेण्ट
उड़ते बालों की तरह कम होती रहती है एफ०डी० की ब्याज़ दर

मेडिक्लेम के विज्ञापनों और बड़े अस्पतालों में सर्जरी के ख़र्चों की
सूचनाओं को इकट्ठे करते बुदबुदाता है :
कल से तमाम देवताओं के चमत्कारिक व्हाट्स एप सन्देशों को सौ लोगों को शेयर किया करूँगा
ज़रूरत पड़ी तो कर लूँगा नेहरू और सोनिया के खि़लाफ़ ट्रोलिंग
पार्टटाइम में हैण्डल कर सकता हूँ किसी पार्टी का ट्वीटर अकाउण्ट

ईर्ष्या हो जाती है उस दोस्त से
जिसका प्लॉट बारह गुना हो गया है पिछले बीस बरसों में
उस लड़की से भी जिसने प्रेम के एवज में एन०आर०आई० चुना
और अब इंस्टाग्राम पर अपनी इतनी सुन्दर तस्वीरें डालती है
गोया पैसे के फ्रिज़ में रखी जा सकती है देह तरोताज़ा, बरसों-बरस

उसे अपनी ही पुरानी तस्वीरें देखते हुए डर लगता है
मोटापा घिस देता है नाक-नक़्श
ज़िन्दगी के थपेड़े उड़ा ले जाते हैं आत्मविश्वास
कभी जिस हौसले से होती थी पहचान
वह खो चुका है तीसरी में साथ पढ़ी दिव्या जैन की ब्लैक एण्ड वाइट फ़ोटो की तरह

लगता है बाज़ारों की रौनकों और मन की बेरौनकों के बीच कोई सह-सम्बन्ध है
मोबाइल के ऐड में नितम्बों को सहलाती एक अभिनेत्राी
और बोतलबन्द पानी की बिक्री के लिए झूलते वक्षों को दिखाती एक पोर्नस्टार को देखने के बाद भी
अब कुछ नहीं होता
डॉक्टर इसे मधुमेह से जोड़ते हैं
और कथाकार रघुनन्दन त्रिवेदी की कहानियाँ इसे बाज़ार से जोड़ती हैं
सच तो ये है बाज़ार से डरने और हारने की उम्र है ये
जिसमें बेअसर हैं सारी दवाइयाँ
बाल बचाने और काले रखने के तमाम नुस्ख़े

घुटनों के बढ़ते दर्द और दाँतों की सँख्या के कम होने के बीच
झिंझोड़ता रहता है व्हाट्स एप का ज्ञान
समझना मुश्किल होता है सही और ग़लत को
नहीं कहा जा सकता : कौन किसे बेच रहा है
इलाज करने वाले बीमार हैं और बीमार इलाज कर रहे हैं

”कितनी बेवकूफ़ी और बेध्यानी से जिए तुम
जयपुर तो अच्छी पोस्टिंग मानी जाती है
हज़ार करोड़ के भुगतान में भी तुम ख़ाली रहे
सॉरी, तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता“, सस्पेंशन में चल रहा एक इँजीनियर दोस्त कहता है

बच्चों को डाँटता लेकिन खु़द के मानकों को नीचा करता अड़तालीस का ये आदमी
अपनी जाति को कहीं पीछे फेंक चुका है
धर्म से खु़द को अलगा चुका है
अपनी नैतिकता और सचाई की सत्ता के भ्रम में जीता एक दयनीय, डरा हुआ और डरावना है अँकल
बन कर रह गया ये आदमी
कुछ उपन्यासों के नायकों और कहानियों की नायकीय जीत में भरोसा करता हुआ

अड़तालीस के हुए किसी आदमी को गौर से देखना
वह ज़िन्दगी की स्लेट से अपने निष्कर्ष तेज़ी से मिटाता हुआ पाया जाएगा
इतना निरीह होगा कि डरेगा दफ़्तर जाने से
रोएगा अपनी बेटी के भविष्य के बारे में सोचकर

ज़िन्दगी के ए०टी०एम० पर अपने पासवर्ड खो चुके दिमाग के साथ खड़ा होगा वह
उसका अपना ही मोबाइल फ़ोन इनकार कर देगा उसके अँगूठे के निशान को पहचानने से
लेकिन आज भी टाइम्स ऑफ़ इण्डिया के कबाड़ में पड़े किसी पेजर की तरह
वह अपना नेटवर्क मिलते ही बीप करने के लिए तैयार है
मैथोडिस्ट चर्च के स्टोर में पड़े पियानो की तरह सोचता है
थोड़ा रिपेयर मिल जाए तो अब भी गूँजा सकते हैं सिमफ़नी
वह पूरी ताक़त से कहना चाहता है —
हम सबसे नई, युवा और बेहतर पीढ़ी थे
बेहतर दुनिया का नक़्शा था हमारे पास
आधार कार्ड से पहले हम आए थे धरती पर
जुकरबर्ग से पहले बजी थी हमारे लिए थाली
हम अड़तालीस साल बाद भले ही obsolete हो रहे हैं
पर सुनो हमें, ज़िन्दगी की रिले रेस की झण्डी हमसे ले लो
ये धरती फ़ेसबुक का फ़र्ज़ी अकाउण्ट नहीं है
जितनी मेरी है उससे ज़्यादा तुम्हारी है !

टी-शर्ट : वारेन बफ़ेट और गीत चतुर्वेदी के लिए

चान्द की तरह होता है टी-शर्ट, सबका
बिना चेन-बटन की होती है बसन्त की हंसी भी

बसन्त हमेशा टी-शर्ट पहन कर आता है
देख लो तुम्हारी पुरानी तस्वीरें

माँ की दाल और दीदी की चाय की तरह
ये कभी कम नहीं पड़ती
बढ़ जाती है ज़रूरत के मुताबिक़
काश ! बैंक बैलेंस ने इससे सीखा होता
ज़रूरत मुताबिक़ बढ़ जाने का हुनर

सी०पी० और सरोजनी के यू०एस० पोलो में
कौन असली है कोई नहीं जानता,
एक से दिखते हैं अन्ना और उनके साथ तस्वीर खिंचवाने वाले लोग

फूड हिस्टॉरीयन की तरह गार्मेण्ट के हिस्टॉरीयन भी कहाँ हैं
नहीं तो पता होता हमें : कहाँ बनी, कैसे आई, कौन लाया
इतना ज़रूर है, किसी ने भी इसे पहन युद्ध नहीं किया है
किसी सेना का गणवेश नहीं रहा ये
न रामायण में, न महाभारत में, न ही विश्व-युद्धों में

लड़ते समय शायद आदमी के कपड़े उतर जाते हैं

इसका ज़िक्र न बाबरनामा में है, न आईन-ए-अकबरी में
ह्नेन्साँग भी चुप है
क्या तब भी चीन आज जैसा ही था ?

आप कुछ भी कह लो चीन ने सारी स्ट्रेटेजी टी-शर्ट से ही सीखी है —
सस्ता ! सबका ! सुविधाजनक ! डिज़ाइनर !
चाहो तो लिखवा लो पाश की कविता या फिर करणी सेना के नारे !

मर्दाना कमज़ोरी का इलाज करते डॉ० जुनैद ख़ानदानी
या हिमालयी शफ़ाख़ाना का तम्बू चलाने वाले क़दीमी वैद्य कीरतराम की तरह
ये सेक्युलर है और जातिविहीन भी

क्या हमारी राजनीति को टी-शर्ट नहीं हो जाना चाहिए?

फ़िंगर प्रिण्ट से खुलने वाली चीज़ों के इस दौर में
बिना पासवर्ड वाले टाइपराइटर की तरह है टी-शर्ट
जबकि पति शेयर नहीं कर रहे हैं पासवर्ड पत्नियों के साथ भी
शेयरिंग कितना विरल मूल्य हो गई है
बावजूद इसके कि इंस्टाग्राम के मँच पर शेयर की जा रही है
हनीमून की हॉट तस्वीरें

टी से ही चीज़ें बँटती हैं,
टी-शर्ट पहन कर सैनेट्री का काम करने वाला मेरा दोस्त टीकम बताता है
लेकिन ये बात
नेसडेक के स्क्रीन से दुनिया चलाते वारेन बफ़ेट कहाँ समझते हैं

वारेन बफ़ेट कभी टी-शर्ट पहना करो !

मैं डर जाता हूँ उन लोगों से जो टी-शर्ट नहीं पहनते
और प्यार करता हूँ गीत चतुर्वेदी से
जिनकी हर तस्वीर में बिना बटन-चेन की टी-शर्ट हुमगती रहती है

टी-शर्ट पर कितनी खु़श होती वर्जीनिया वुल्फ़
कि बण्टी और बबली दोनों एक-दूसरे का पहन सकते हैं, शबनम मौसी भी
और इधर दैनिक भास्कर का शीर्षक है :
लिंग से आज़ाद होता बहुलिंगी टी-शर्ट !

लैटरबॉक्स

अल्लाउद्दीन खि़लज़ी के बनाए हौज़ख़ास की दीवारों पर खुरचकर
लिखे गए एक कूट नाम की तरह अदेखे
पिता के बरसों से अचुम्बित गालों की तरह वीरान
पुराने और प्रिय इँक पेन के टूटे निब की तरह अकेले
ओछी हो गई बेलबॉटम की तरह अप्रचलित
तस्वीर में बदल गई बम्बईवाली मौसी की तरह अनुपस्थित
तुम कहाँ हो लैटरबॉक्स ?

any letter box nearby लिखने के बाद भी
तुम्हें ढूँढ़ नहीं पा रहे हैं इक्कीसवीं सदी के तमाम सर्च इँजन
जो तस्वीर और क्लिप के साथ मोबाइल नम्बर तक तुरन्त दे देते हैं
निकटतम उपलब्ध कॉल गर्ल तक का

किसी भी स्टेशन से निकलते ही सबसे पहले तुम दिखते थे हाथ हिलाते हुए
ICICI के ए०टी०एम० और COKE के डिस्पेंसर ने तुम्हें बेदखल कर दिया है
के०एफ़०सी० और मैक-डी का अतिक्रमण कोई नहीं हटा सकता

सड़कों की चौड़ाई बढ़ाने के चलते काटे गए बरगदों की तरह
तुम भी ग़ायब हुए हो
और तुम्हारे लिए कोई नेशनल ग्रीन ट्रायब्यूनल चिन्ता नहीं कर रहा है

कैमलिन पेन और एम्बेसेडर कार की तरह
कोई शिकायत नहीं थी तुम्हारे इस्तेमाल से
अकेले, डरे हुए, सब-कुछ उलींच देना चाहने वाले
हर गुमनाम का भरोसा तुम पर था
एक दुनिया को दूसरी दुनिया के साथ खोलते थे तुम
लेकिन कभी नहीं पढ़ पाए ये दुनिया
जो लिखना नहीं चाहती
जो बिना धैर्य के सेण्ड कर रही है सबकुछ
जिसे पोस्टकार्ड की साफ़गोई से डर लगता है
जिसके पास कुछ भी अपना नहीं है लिफ़ाफ़े में डालने लायक़

किसी भाषा की तरह गुम हो रहे तुम केवल एक बार दिख जाओ सड़क पर
कि दिखा सकूँ दौर को भरोसे की शक़्ल और रास्ता
जिससे आएगी बेहतर दुनिया की चिट्ठी !

हर समय, सबके लिए उपलब्ध रहने की तुम्हारी ज़िद ने
तुम्हें लाल रँग दिया
और इसीलिए मुझे तुमसे और लाल रँग से प्यार हुआ !

कितनी उड़ानें बचाई कबूतरों की
हज़ारों मील बचाए हरकारों के
किसी से नहीं पूछी जाति-धर्म-नागरिकता
फिर भी तुम्हारी डी०पी० कोई क्यों नहीं बना रहा है ?
किसी भी देश के झण्डे में तुम क्यों नहीं हो ?

शेरों से ज़्यादा ज़रूरी है तुम्हें बचाया जाना,
बुदबुदाते हुए एक कवि सुबक रहा है
जिसे कोई नहीं सुन रहा है !

दर्ज करो इसे
कि अलीबाबा को बचा लेंगे जैकमा और माइक्रोसॉफ़्ट को बिल गेट्स
राम को अमित शाह और बाबर को असदुद्दीन ओवैसी
किलों को राजपूत और खेतों को जाट
टिम कुक बचा लेंगे एप्पल को जैसे जुकरबर्ग फ़ेसबुक को
तुम खु़द उगो जँगली घास की तरह इटेलियन टाइलें तोड़कर
और लहराओ जेठ की लू में लहराती है लाल ओढ़नी जैसे !

लाइक

पवैलियन में बैठा दूर का चश्मा घर भूल आया कोच
देखता है रनआउट को जैसे

फेड और धूसर हो चुके उजाड़ कुलधरा के पीले पत्थरों को
पढ़ती है रोमिला थापर जैसे

डबल बस की ऊपरी मँज़िल से मिड-डे में छपी तस्वीर को देख
ख़ुश होती है एक्स्ट्रा कलाकार नन्दिता सिंह जैसे

मैं तुम्हें देखता हूँ — लाइक !

तुम अस्पष्ट होते हो अनुत्तरित प्रेमपत्र की तरह
गूढ़ होते हो जैसे अधपकी मुस्कान
विरल होते हो एक रुपए के नोट या पुरानी चवन्नी की तरह

उपस्थिति से भी पूरा समझना मुश्किल होता है
जैसे तीसरे के उठावणे में सफ़ेद कपड़ों में आई भीड़ की शोकग्रस्तता को

कभी लगता है तुम वैसे ही हो
कि खाना बहुत अच्छा बना है कहने के बाद भी
डिनर पर आया जोड़ा कुल जमा तीन के बाद
न चौथी रोटी लेता है, न ही सब्ज़ी दाल

बहुत गर्मजोशी वाला आमन्त्रण भी तुम नहीं होते हो
जैसे हाथ मिलने या ताली ठोककर बात करने वाली कोई लड़की

कितना भीषण है यह कि एक पार्टी कह रही है :
ग्रेट नेशन टु लिव — लाइक करो
गान्धी गड़बड़ था — लाइक करो
अमरीका सही है — लाइक करो
मन्दिर वहीं बनाएँगे — लाइक करो
देश देते हैं आधा अम्बानी को — लाइक करो
आधा अडानी को — लाइक करो
आधा सुदर्शन को — लाइक करो
आधा शाह को — लाइक करो

दिखते हुए भी
कभी तुम होते हो
कभी नहीं होते हो
कभी औपचारिकता में उगे
कभी बेरुख़ी से टँगे
कभी दिखावे भर के लिए
कभी बहस से बचते हुए
कभी व्यावहारिक टिप्पणी
कभी चलताऊ थपकी
तो कभी सचमुच की पसन्द, पहली नज़र जैसे

इस लायक़ तो हो ही तुम — लाइक
कि लिखी जा सके तुम पर कविता
और कमाए जा सकें कुछ लाइक !

स्टिकी नोट

(पीले रँग के स्टिकी नोट जो सत्ता के गलियारों और कॉरपोरेट में इस्तेमाल किए जाते हैं)

पहली बार देखने पर लगे थे तुम गेन्दे के फूल की तरह
सजीव, मासूम, सहज, साधारण लेकिन ज़रूरी

इतने ज़रूरी कि बिना कहे रुन्ध जाए गला
और कहने के बाद इतने हल्के जैसे लैण्डलाइन फ़ोन पर मिस हुई कोई कॉल

कभी कहती है ये, कभी कहते हुए भी चुप रहती है
दर्ज होना चाहती है किसी कण्डोम में तैरते पाँच अरब शुक्राणुओं की तरह

जितनी इसकी रिश्तेदारी सच के साथ है, उतनी ही असच के साथ भी
मुखौटे से अलग नहीं है यह, जिसे लगाया ही हटाने के लिए जाता है

कुछ इसका प्रयोग करना चाहते हैं बिना बदनाम हुए
पता नहीं क्यों, साहस की कमी या सुविधा के लिए
जैसे उदार, आत्मीय और अधेड़ प्रेमिका का उपयोग कर लेते हैं प्रेमी बनते कुछ लम्पट

कोई इसका इस्तेमाल
अपराधी की तरह बरसों बाद कर लेते हैं
पाँचवें पैग के बाद कुछ पुरुष सुनाने लग जाते हैं जैसे
मिसेज एक्स या वाई या जेड के ऐक्टिव होने के क़िस्से
पुरानी फ़िल्मों में प्रेमपत्रों का किया जाता था इस्तेमाल जैसे
आज के ज़माने में स्क्रीन शॉट कह लो

कई बार
पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है
एक सड़क सत्तावन गलियाँ
कितनी नावों में कितनी बार
जैसी पँक्तियाँ इसके आस-पास भिनभिनाती हैं

बेहद हल्के और स्थाई रूप से न चिपकने के लिए बने ये पोस्टर
कभी प्रश्न की तरह लगते हैं
कभी चेतावनी में बदलते हैं
कभी कहते हैं
कभी नहीं कहते हैं
व्हाट्स ऐप पर आए किसी रोमाण्टिक शेर की तरह इसे अनदेखा किया जा सकता है
और लिया जा सकता है सीरीयस भी

कई बार धर्म इसकी तरह लगता है
कइयों के लिए क़ानून भी इसी की तरह होते हैं
कई अवसरों की पीठ ढूँढ़ते रहते हैं इसके लिए
कई लगे रहते हैं इसे चिपकाने और हटाने के खेल में

क्यूँ भूल जाते हैं हम
हम भी एक स्टिकी नोट ही हैं
किसी दिन हटा दिए जाएँगे, गुम हो जाएँगे
पाए जाएँगे कूड़े के ढेर में
और किसी दिसम्बर की रात जला भी दिए जाएँगे
जैसे थे ही नहीं इस सृष्टि पर !

तरीके

(1970 में जन्मी एक लड़की के लिए)

मैंने भाषा के सबसे सुन्दर शब्द तुम्हारे लिए बचा कर रखे
मनचीते सपनों से बचने को रतजगे किए
बसन्त के लिए मौसम में हेर-फेर की
चान्द को देखना मुल्तवी किया
सुबह की सैर बन्द की

अपने अस्तित्व को समेट
प्रतीक्षा के पानी से धरती को धो
तलुओं तक के निशान से बचाया

न सूँघ कर खु़शबू को
न देख कर दृश्यों को बचाया
जैसे न बोल कर सन्नाटे को
एकान्त को किसी से न मिलकर

समय तक को अनसुना किया
सब-कुछ बचाने के लिए

याद और प्रतीक्षा के यही तरीक़े आते हैं मुझे !

जवाब 

हाथों की तरह एक थे
आँखों की तरह देखते थे एक दृश्य
बजते थे बर्तनों की तरह

रिबन और बालों की तरह गुँथे रहते थे
साथ खेलना चाहते थे दो कँचों की तरह

टँके रहना चाहते थे जैसे बटन

टूटे तारे की तरह मरना चाहते थे
गुमशुदा की तरह अमर रहना चाहते थे

किसी और नक्षत्र के वासी थे दरअसल
पृथ्वी से दीखते हुए ।

प्रौढ़ावस्था में प्रेम

उतर चुका होता है देह का नमक
तानपुरे की तरह बैकग्राउण्ड में बजता है बसन्त
गुज़िश्ता तज़ुर्बों के पार झिलमिलाता है दूज का चान्द
टूटे हुए पाँव के लिग़ामेण्ट्स के बाद भी चढ़ी जाती है सँकोच की घाटी

नगाड़े या ढोल नहीं बजते
बस सन्तूर की तरह हिलते हैं कुछ तार मद्धम-मद्धम
इतने मद्धम कि नहीं सुन पाता दाम्पत्य का दरोग़ा
इतना कुहासेदार कि बच्चे तक न देख पाएँ

एक बीज को पूरा पेड़ बनाना है बिना दुनिया के देखे

दरअसल ये उलटे बरगद की तरह पनपते हैं धरती के भीतर

धरती की रसोई में रखी कोयला, तेल और तमाम धातुएँ

इन्हीं के प्रेम के जीवाश्म हैं
जिन्हें भूगर्भशास्त्री नहीं समझ पाते !

2.

बिना बीज का नीम्बू
बिना मन्त्र की प्रार्थना
बिना पानी की नदी

मल्लाह के इन्तज़ार में खड़ी एक नाव है ।

3.

छीजत है चान्द की
बारिश है बेमौसम

पीले गुलाब की हरी ख़ुशबू है

सफ़ेदी में पुती ।

पृथ्वी पर दिखी पाती

(बिटिया पाती के जन्म पर लिखी कविता)

फूलों ने माँगी होगी एक नई प्रजाति
दूब रूठी होगी तलुओं के नए जोड़े के लिए
पानी ने नई प्यास के लिए अनशन किया होगा
मुझे नई बांसुरी दो, हवा ने कहा होगा
तभी; एक नए वाद्य-यन्त्र की तरह
पृथ्वी पर दिखी पाती ।

धरती के सितार पर तार की तरह
पक्षियों के कोरस में एक स्वर ज़्यादा था
एक नया रँग नामकरण की प्रतीक्षा में था
बढ़ा हुआ आकार था चान्द का
गिनती से ज़्यादा थे तारे
कहीं कुछ था हर जगह, नए वर्ण-सा
जिससे भाषा भरी जानी थी
तभी; एक नए प्रेम की तरह
पृथ्वी पर दिखी पाती ।

पौधों के पास अपना उल्लास था
पेड़ों और तितलियों की तरह
आकाश से धरती जो फूटी थी एक अण्डे की तरह
तभी; एक नई नदी की तरह
पृथ्वी पर दिखी पाती ।

फ़रवरी

सुन्दर सपने जितना छोटा होता है
कम रुकता है कैलेण्डर इसकी मुण्डेर पर
जैसे सामराऊ स्टेशन पर दिल्ली-जैसलमेर इण्टरसिटी

फ़रवरी से शुरू हो जाती थी रँगबाज़ी; होली चाहे कितनी ही दूर हो
सी०बी०एस०ई० ने सबसे पहले स्कूल से रँगों को बेदख़ल किया है

इसी महीने से शुरू होता था शीतला सप्तमी का इन्तज़ार
काग़ा में भरने वाले मेले और आनेवाले मेहमानों का
अमेज़ोन के मेलों में वो बात कहाँ ?

लेकिन कॉलेज के दिनों में बहुत उदास करती थी फ़रवरी
दिनचर्या के स्क्रीन से ग़ायब हो जाती थी सीमा सुराणा की आँखें
पूरा कैम्पस पीले पत्तों से भर जाता था
घाटू के उदास पत्थरों से बनी लाइब्रेरी
बहुत ठण्डी, बहुत उदास और बहुत डरावनी लगती
जैसे निकट की खिलन्दड़ी मौसी अचानक हो जाती है विधवा

नौकरी के दिनों में ये महीना
मार्च का पाँवदान होता है : बजट, पैसा और ख़र्च-बचा पैसा

इच्छा तो ये होती है
हेडफ़ोन पर कविता शर्मा की आवाज़ में
बाबुशा कोहली की प्रेम कविताएँ सुनते हुए
टापरी के फ़ॉरेस्ट गेस्ट हाउसवाली रोड पर निकल जाएँ

पर वो रोड भी तो फ़रवरी की तरह छोटी है
कई बार ये मुझे सुख का हमशक़्ल लगता है
देखो, पहचानो, ग़ायब !

घर 

एक

पहाड़ छोड़ देते हैं अपनी अकड़
जँगल अपनी जड़

धरती बनना चाहती है माँ
आकाश पिता बनने नीचे उतरता है

नदी की तरह मुस्कुराता है एक बच्चा ।

दो

हार जाते हैं योद्धा
थक जाते हैं शक्तिवान
सो जाते हैं सांसारिक

सबके सपनों में
दरवाजे-सा जगता रहता है ।

तीन

बहुत अकेले हो जाते हैं
ऊबने लगते हैं हर-एक से
घेरने लगती है स्मृतियाँ और आशँकाएँ
समय हो जाता है लम्बा और भारी

एक क़िस्सा-गो जो दूसरी दुनिया में ले जाता है ।

माँ और गुम होता काजल

भले ही शुरू करते हैं स्मृति की वर्णमाला उससे
बाद के दिनों में किसी पर्फ़्यूम की तरह वह धीरे-धीरे उड़ती है
लेकिन दर्द के क्षणों में वह अचानक आ जाती है
जैसे लँच में अचार की गन्ध से खाने की इच्छा

कहीं भी हो उसकी आँखें हमें देख रही होती हैं
उसकी प्रार्थना और प्रतीक्षा में वैसे ही शामिल रहते हैं हम
जैसे उसके सपनों और डरों में

माँ बड़ियाँ बनाती है
बाजरे की खीर
और कुछ ऐसी सब्ज़ियाँ जिन्हें खाते हुए हम पूछते हैं उनके नाम

कुछ रिश्तेदारों के बारे में भी केवल वही जानती है
वैसे ही जैसे कुछ फूलों, फलों और फ़सलों के बारे में
बीमारियों, कीटों, जानवरों और उपचारों के बारे में

उसे सपनों के कूट अर्थ पता हैं
शगुन वह जानती है

बक़ौल उसी के —
कि जिस रात सपने में दिखेगी सूखी नाडी
अगली सुबह वह नहीं होगी
और हमारे स्वाद और ज्ञान का एक बड़ा हिस्सा
उस काजल की तरह गुम होगा
जो वह मेरी बिटिया के रोज़ सुबह आँजती है

माँ के बिना पिता की एक शाम

किसी एक रँग की कमी
या बिना झूलों के मेले की-सी स्थिति है यहाँ माँ
इस समय, जबकि दूज के इस एक ही चान्द को देखते
तुम हज़ारों मील दूर हो
गोया तुम माँ नहीं, चान्द हो घर की परात में हिलती, दिखती, हुड़काती

पिता अगर कविता लिखते तो ऐसी ही कुछ :
तुम्हारे बिना आधी है
रोटी की हंसी
नमक की मुस्कान
दरवाजों की प्रतीक्षा
सब-कुछ आधा है
मसलन चान्द, रात, सपने
सिरहाने का तकिया
पीठ की खाज
दाढ़ का दर्द
आज की कमाई

मुझे नहीं पता
तुम्हारे होने से
ज़िन्दगी की रस्सी पर नट की तरह नाचते पिता
तुम्हारा नहीं होना किसे कहते हैं
रात से, परीण्डे से, या तुम्हारी तम्बाकू की ख़ाली डिब्बी से
तुम्हारा वह नाम लेते हुए
जो मैंने कभी नहीं सुना
तुम्हें उस रूप में याद करते हुए
जब तुम पल्लू से वहीदा रहमान और हंसी से मधुबाला लगती थीं
और पिता, दादी से छिपाकर चमेली का गज़रा
आधी रात तुम्हारे बालों में रोपते थे
और थोड़े समय के लिए चान्द गुम हो जाता था ।

माँ; चौतरी जिस पर तुम बैठती हो
उदास है ।
घर के बुलावे पर भगवान् भी चले आते हैं
चली आओ तुम
नहीं तो, पिता की डायरी में एक मौसम कम हो जाएगा ।

रफ़ कॉपी पर दर्ज़न भर रफ़ कविताएँ 

1)

हर कॉपी रफ़ कॉपी नहीं होती शुरू में
बन जाती है बाद में

जैसे कुछ बच्चे बन जाते हैं चोर या भिखारी

(2)

हर कॉपी फ़ेयर बने रहना चाहती है
सम्भाली जाना चाहती है किसी प्रेम-पत्र की तरह

वो क्या होता है नागरिक की तरह जो उसे बेबस कर देता है

(3)

शुरुआत ठीक होती है हर कॉपी की रिश्तों की तरह ही
पर गर्मियों में अचानक गन्ध छोड़ती आलू की सब्ज़ी की तरह
कुछ बिगड़ जाता है

और रफ़ हो जाती है कोई कॉपी जैसे गन्धा जाते हैं रिश्ते

(4)

नयी कोपियों को नए रिश्तों की तरह ही
नहीं पता होता है हमारी फ़ितरत के बारे में

और इस तरह वे भी रफ़ कॉपियों में बदल जाती हैं

(5)

कटी पतंग और अमर प्रेम के गीत
सुषमा पालीवाल के लैण्डलाइन नम्बर
मधु गहलोत और कविता शर्मा के जन्मदिन
सितार बजाती खुले बालोंवाली प्रेरणा शर्मा का एक स्केच

इतनी ज़रूरी चीज़ें हम ग़ैर ज़रूरी समझ रफ़ कॉपी में लिखते हैं
और फिर पूरी ज़िन्दगी उदास रहते हैं

(6)

पाँच साल में एक बार डालते हैं वोट
फ़ेयर कॉपी की तरह

सरकारें उसे रफ़ कॉपी बना देती हैं

(7)

जब रफ़ कॉपियाँ नहीं होंगी हम किसमें अभ्यास करेंगे

बड़े होने पर क्या ज़िन्दगी ही रफ़ कॉपी हो जाती है

(8)

फ़ेयर कॉपियों के बचे पन्नों की कुछ बनाते हैं रफ़ कॉपियाँ
कुछ के लिए ये ही फ़ेयर होती हैं

फिर भी, उन्हें पकड़ो जो देश की कॉपी को रफ़ कॉपी में बदल रहे हैं

(9)

रफ़ कॉपी का कोई एक विषय नहीं होता
एक भाषा भी नहीं

फिर दुनिया को इकरँगा क्यूँ बनाया जा रहा है
देश को कुछ लोग बना रहे हैं जैसे

(10)

कुछ तुकें होती है इनमें कुछ रेखाएँ भी

रफ़ कॉपी के साथ इस तरह खो जाते हैं कुछ कवि और चित्रकार

(11)

कोई तो स्कूल हो जहाँ रफ़ कॉपी के भी नम्बर मिलें

कमतर या कम सजावटी होना क्या कोई मूल्य नहीं

(12)

नौकरी में बरसों बाद समझ में आता है —

मैं तो एक रफ़ कॉपी था, केवल इस्तेमाल हुआ

मिठाइयों के बारे में कुछ कविताएँ : पुष्पेश पन्त के लिए

(1)

कबीर बस्ती में ये शादी में मिलती है
वसन्त विहार और वर्ली सी-फ़ेस में कॉर्ड के साथ ही

कहीं ये शामिल करती है, कहीं केवल सूचना देती है

मिठाई की सूचना कितनी मीठी होती होगी, पुष्पेश पन्त !

(2)

जलेबी तुर्कों के साथ आई
मुग़ल मालपुए लाए
गुलाब जामुन शाहजहाँ के ख़ानसामे से बेध्यानी में बना
बीकानेर का रसगुल्ला बँगाल या उड़ीसा से आया
सब-कुछ, सब जगह से आया जब
फिर चुनाव के वक़्त भाषणों से क्यूँ ग़ायब हो जाती है मिठास

आपसे पूछना चाहता है, पुष्पेश पन्त !
जोधपुर के पुँगलपाड़े में गुलाब जामुन बनाता चतुर्भुज हलवाई

(3)

बशीर बनाए या बंशी
बर्फ़ी खाने से कहाँ इनकार करते हैं
लाल भाख़री वाले हनुमान

बताओ, पुष्पेश पन्त !

(4)

फ़ैज़ाबाद के फ़त्तु से लेकर
राजसमन्द के रामजिलावन तक
मेरठ के मुरली हलवाई से लेकर
धारवाड़ के धुरन्धर तक
सभी को एक ही चाशनी जोड़ती है

पुष्पेश पन्त, जन्तर-मन्तर पर जाकर
इसे सेक्युलर डिक्लेयर कर दो

(5)

लूणी के रसगुल्ले बेहद मीठे होते हैं
जोधपुरी गुलाब जामुन बिलकुल कम
अलवरी मावा मारक मीठा
और जयपुरी घेवर मद्धम

खाते हुए पता चलता है
मावा डाँगियावासी है या बृजवासी

जोधपुरी खाते हुए बता देते हैं हलवाई का नाम शर्तिया
मैं डरता हूँ, पुष्पेश पन्त ! उन मिठाईयों से
जो हाईजेनिक डिब्बों में पैक होकर
पूरे साल मिलती हैं हर जगह
और जिन्हें अमेज़ोन पर भी ऑर्डर किया जा सकता है

(6)

फलोदी के भैय्ये भाभे के गाल के लड्डू
मण्डोर का चूरमा
मोहन जी के रबड़ी के लड्डू
वैष्णव का कलाकन्द
दल्लूजी के पुए
अमेज़ोन पर नहीं हैं

मैं ख़ुश हूँ
कोई तो है जिसने किया है इनकार
बनने से बाज़ार

भूमण्डलीकरण के विरोध में इनके पोस्टर लहराओ, पुष्पेश पन्त !

(7)

बहुत फीकी हो जाती है कोई भी मिठाई

खानेवाला जब ख़ुशी में शामिल नहीं होता

(8)

बड़े लोग बहुत कम खाते हैं मिठाई

बड़े होने पर हम भूल जाते हैं
दूसरों की ख़ुशी में बेहिसाब शामिल होना

(9)

बारहवें दिन बनती थी मिठाई
शोक तोड़ने के लिए

सहकर्मी के प्रमोशन की मिठाई खाते
शोकग्रस्त हो जाते हैं कोरपोरेट के लोग

(10)

मैत्रेयी कॉलेज दिल्ली से इतिहास में ऑनर्स कर रही चार लड़कियाँ
पाती पुरोहित, सारा रज़ा, ज़ोर्ज़िना और हरप्रीत कौर
कोरस में हंसती हैं कन्हैया हलवाई की इमरती खाते हुए

मोदी जी को बताओ, पुष्पेश पन्त !
कन्हैया की तस्वीर टेबल पर रखा करें

बसन्त : 2018

जब से बादशाह ने शुरू की है
मन की बात कहनी
बसन्त
सरोजनी नगर के फुटपाथिया बाज़ार में आते
एम०सी०डी० स्कवाड की तरह लगता है !

माँ की अलमारी और वित्तमन्त्री जी

(बैंकर-कवि-मित्र कुमार अम्बुज, विनोद पदरज और दिनेश सिन्दल के लिए, जो मध्यवर्ग की स्मृति को एक आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक सन्दर्भ में समझेंगे)

माँ की अलमारी में
कुछ सुपारियाँ थी जो उन्हें मिलती थीं
पीहर से विदाई के समय शुभाशीष के रूप में
कुछ मौली के गट्टे थे जो न जाने किन माँगलिक प्रसँगों के लिए लाए गए थे और बचे रह गए थे
आग़ामी माँगलिक प्रसँगों के लिए

कुछ पुराने सिक्के थे
जिन्हें सम्भाले वह बेख़बर थी उनके प्रचलन से बाहर हो जाने के तथ्य से
जैसे प्रचलन से बाहर हो जाती हैं
कुछ नैतिकताएँ, आस्थाएँ और भरोसे

कुछ नोट भी थे
जिन पर लगी होती थी कुमकुम की टीकी
कुछ रसीदें थी जो अस्ल में मियादी जमा रसीदें थी
कुछ इन्दिरा विकास पत्र थे
कुछ किसान विकास पत्र और कुछ नेशनल सेविंग सर्टिफ़िकेट
जिन्हें देखते मैं उदास हो जाता हूँ
क्योंकि इन्दिरा बची नहीं है
किसानों ने आत्महत्याएँ शुरू कर दी हैं
और नेशन को कोई सेव नहीं कर रहा है

एफ़०डी०आर० या मियादी रसीदें भी
अब कम घरों में दिखती हैं
तीन, पाँच या दस साल की गिनती
प्रधानमन्त्री के भाषणों के सिवा अब किसी में नहीं होती
शादियाँ तक इतनी नहीं चलती
तीन महीने पहले अपने मेहदी भरे हाथों की तस्वीर फ़ेसबुक पर डालने वाली लड़की
रातोंरात अपना स्टेटस बदल कर सिंगल कर देती है
रिश्ते अचानक अनफ़्रेण्ड हो जाते हैं
ख़ूबियों से ज़्यादा ख़ामियाँ शेयर होती हैं
पुराने दिनों से लोग तेज़ी से लॉगआउट कर जाते हैं

फेक आई०डी० के इस ज़माने में माँ की पुरानी मियादी रसीदें
बच्चे, बचत, भरोसा और वक़्त पर काम आने लायक धन के बहाने
जो रिश्ते की अनन्त उपस्थिति का दर्शन थीं

अब कितनी बचकानी हो गई हैं
कि माँ की मियादी रसीदों के मज़बूत प्लास्टिक के कवर को
नेट बैंकिंग करने वाली मेरी बेटी हैरत से देखती है
गोया ये भी कभी थे !
गोया माँ भी कभी थी !

कितना भयावह है यह
कि माँ और उसके साथ के अपने दिन
हम किसी चश्मदीद की तरह बच्चों को बताते हैं
और हमें सन्देह के साथ सुना जाता है

वित्तमन्त्री जी, भाड़ में जाए जी०डी०पी० और डॉलर के मुक़ाबले हमारी हैसियत
बस, बच्चों के सिलेबस में इतना डलवा दीजिए
कि कभी इन्दिरा विकास पत्र, किसान विकास पत्र, नेशनल सेविंग सर्टिफ़िकेट भी हुआ करते थे
और मियादी जमा की रसीदें
प्लास्टिक के जोड़े में होती थीं !

अनपढ़ी किताबें 

गुमशुदा की तस्वीरों की तरह सामने खड़ी चुनौती देती हैं
किसी थीम सॉंग की तरह धीमे और लगातार बजते हुए

वे फुसफुसाती रहती हैं व्यावहारिक गृहिणी की तरह बिना लाउड हुए

याद करती रहती हैं ख़रीदे जाने के क्षण को, जब किसी दुल्हन की तरह आई थीं घर में
अबोली बैठी विधवा की तरह
वे बुनती हैं बेआवाज़ इन्तज़ार कि कोई आए, उठाए

वेण्टिलेटर पर लेटे बुज़ुर्ग की तरह उम्मीद से होती हैं :
किसी भी क्षण हो सकता है चमत्कार, झड़ सकती है धूल
और किसी स्पर्श के साथ वे शुरू कर सकती हैं अपना गाना महफ़िल में

उपेक्षित माँओं की तरह अपने बच्चों के बारें में बात करती होंगी
ज़मीन में दबी नदी या पेट्रोल की तरह इन्तज़ार करती हैं देखे जाने का

अनपढ़ी किताबें उम्रदराज़ कुँवारी लड़कियाँ होती हैं
छुअन का जोड़ा उन्हें कभी भी दुल्हन बना सकता है

बेचारी सुन्दर साध्वियाँ !

वे पाँच थीं

(उन पाँच सहेलियों के नाम जो वादे के मुताबिक बीस बरस बाद बिना पति और बच्चों के एक अनजान शहर के होटल मे री-यूनियन के लिए मिली थीं।)

वे पाँच नहीं थीं
उनके थे पाँच पति और दस के आसपास बच्चे भी
कुल जमा बीस का कुनबा था जिसमें मायके और ससुराल की
आबादी जोड़ी जाए तो हो सकती थी सौ के भी पार
लेकिन रिश्तों की गणित के बावजूद वे पाँच थीं

वे पाँच सहेलियाँ जो कभी बेझिझक माँग लेती थीं सेनेट्री नेपकिन का पैड, हेयरपिन और चुन्नी
और साझा कर लेती थीं अपने-अपने चान्द और वे ख़ुशबुएँ जिनका पीछा वे कर रही होती थीं
आज आई थीं पाँच अलग-अलग दिशाओं से
अपने सुखी, उबाऊ, परेशाननाक, चमकते और स्वीकारे जा चुके वर्तमानों के साथ
अतीत की गठरियाँ लिए
जिन्हें लाते हुए उनके पति-बच्चों-सहकर्मियों ने नहीं देखा
लेकिन वो अतीत था और साथ आया था
हैरत की बात है कि वो इतने गहरे कोठारे में रहता था
जहाँ जाने के लिए हवा को भी मशक्कत करनी पड़ती है
जहाँ सूरज अपने जन्म से आज तक नहीं पहुँचा और
चान्द केवल एक फटे काग़ज़ पर पेंसिल से उकेरे गए चित्र का नाम भर था

वे पाँच थीं अलग-अलग दिशाओं से अपने-अपने अतीतों के साथ आती
उनके पास पाँच देहें थीं और पाँच संसार और पाँच ब्रह्माण्ड जिसमें भरत के पाँचवे वेद की तरह
वे सुना रही थीं अपनी गाथा, जैसे सुनाता था यूनान के नाटकों में लम्बा मोनोलॉग कोई सूत्रधार
या फिर ऊँटों के किसी कारवाँ को क़िस्सागोई से जीवन्त करता है कोई क़िस्सागो अतीत और आज के बीच
नट की तरह झूलता हुआ
जिस पाँच रास्तेवाले गोलचक्कर पर वे मिली थीं
वहाँ एक वादा किसी अम्पायर की तरह उनकी प्रतीक्षा कर रहा था कि उन्हें बीस बरस बाद
इस जगह, इस तरह मिलना होगा

क्या मिलना अनावृत्त होना है
क्या मिलना अतीत की किसी पगडण्डी से वर्तमान की सड़क पर आ जाना है या फिर उलटा ही
क्या मिलना सुविधा की उन सलाईयों की तरह है जिसमें
ज़िन्दगी के स्वेटर के कुछ रँग बदले जा सकते हैं
क्या मिलना किसी खेल की तरह हो सकता है जिसमें आप कुछ घटनाओं से अलगा सकते हैं ख़ुद को
और रीटेक करते हुए जी सकते हैं कोई शॉट जिसमें कोई फ़ैसला लिया था,
सोचता है अम्पायर और चुप रहता है

पाँच दिशाओं से आई वे पाँच थीं, जो बोल रही थी बारी-बारी
जो भीग रही थीं बारी-बारी
उनमें से कोई बीच में खिड़की खोलती और हाथ निकाल कर देखती
घनघोर बारिश को और फिर चुप हो
जाती
थोड़ा सहमती, थोड़ा घबराती, थोड़ा इतराती अपने किसी फ़ैसले पर
और थोड़ा धन्यवाद देती ईश्वर को
कि ये स्थिति उसके साथ नहीं हुई

कुछ ईर्ष्याएँ थीं उनके बीच; केवल सुख की नहीं दुखों की भी लेकिन
इतनी बारीक़ कि नज़र नहीं आती थीं
कुछ अबोले शब्द भी थे तैरते हुए उन ख़ुशबुओं की तरह जो हेयर-रिमूवर की होती है
लेकिन अच्छा ये था कि सब-कुछ डी-कोड हो रहा था

वे पाँच थीं और उनके पास कुल दस जीवन थे
पाँच वे जो वे जीना चाहती थीं
और पाँच वे जो वे जी रही थीं
बावजूद इसके वे पाँच थीं

उनमें से एक के पास अपने प्रेमी के प्रेमपत्र की छायाप्रतियाँ थीं जिसमें नाम की जगह ख़ाली थी
एक के पास थे कुछ अपने पाप चोट के निशान की तरह जिसे वो
अब किसी को नहीं दिखाना चाहती थीं
एक के पास क्रान्तिकारी भाषणवाले पति के व्यावहारिक पहलुओं पर लिखी गई पपड़ाई डायरी थी
एक के पास अपनी ज़िन्दगी को बच्चों में जीने को रोडमैप था
एक के पास अगले जनम के भरोसे थे सारे दृश्य

एक के पास थोड़े से बढ़े हुए मोटापे के साथ कुछ महँगी अँगूठियाँ, चूड़ियाँ, कुछ प्लोट्स के कागज़ात
और पति के किसी अन्या के साथ रिश्तों की एक निगेटिव भी थी जिसे वो अब डिवैलप नहीं करना
चाहती थीं

वे पाँच थीं
हर घण्टे हो जाते थे अपडेट उनके फ़ेसबुक स्टेटस
हर घण्टे वे पढ़ती थीं चालीस पार के लिए ज़रूरी हैल्थ अपडेट्स
हर घण्टे वे देखती थीं बच्चों के एड्मिशन के लिए आनेवाले अलर्ट
हर घण्टे वे अनचाहे ही दस-बीस लाइक्स कर रही थीं
हर घण्टे वे पहले की तुलना में कुछ गीली और भारी हो जातीं
और सुलगती हुई लकड़ियों की तरह हवा में एक कसैलापन आ जाता जो
ए०सी० की ठण्डक के बाद भी अप्रिय लगता

वे पाँच थीं और उनके पाँच पति भी थे
उनकी कामनाओं में कोई और था या नहीं, कह नहीं सकते
लेकिन कुछ मोडिफ़िकेशन वे सोचती थीं अपने पतियों के बारे में
और उस समय के बारे मे भी, जिसे किसी भी मशीन से खींच कर वापस नहीं लाया जा सकता
ज़िन्दगी के उन लम्हों के बारे में जिन्हें अन-डू नहीं किया जा सकता

वे पाँच थीं अपने पाँच अतीतों के साथ
लेकिन वर्तमान में उन अतीतों के लिए कोई जगह नहीं थी
लिहाजा उन्होंने अपने अतीतों को फिर अपने-अपने दिल के डीप-फ्रिज मैं क़ैद किया और रवाना हो गईं
ये कहते हुए कि भविष्य के किसी ऐसे ही पाँच दिशाओं वाले गोलचक्कर पर वे फिर मिलेंगी
और कोशिश करेंगी कि बिना गला खँखेरे बात कर सकें
और माफ़ कर सकें इस दुनिया को, क्योंकि ज़िन्दगी की हार्डडिस्क को बदल पाना नामुमकिन है !

अच्छे दोस्त

चोर जब
पिता की जेब से चवन्नी भर पिता
माँ की रोटी से कौर भर माँ
भाई के हाथ से मुट्ठी भर भाई
बहन के धागे से गाँठ भर बहन
प्रेमिका के पर्स से झपकी भर प्रेमिका
और
पत्नी की सिन्दूरदानी से चुटकी भर पति चुरा
अपने-अपने घरों में सुस्ता रहे होते हैं
तब इन सबको
ब्रह्मा चुरा
कुछ प्राणियों में डाल देते हैं
चुराई चीज़ों से बने
ये पारदर्शी लोग होते हैं
अच्छे दोस्त ।

अच्छे दोस्त
उपेक्षा और लापरवाही के बावजूद
छातों और स्वेटरों की तरह
बुरे मौसमों में साथ देते हैं

घास की तरह बिछे
तमाम मौसमों से बेअसर ये लोग
हमें हमारे हर अच्छे बुरे के साथ
केवल हिचकियों में सताते हैं

रात गए जब सो चुकी होती है पत्नी
किसी पुराने प्रेमी के साथ
या पिता उलट रहे होते हैं
या माँ मन में पिता से पहले जाने की कामना कर रही होती है
या घर जब नौकरशाह चौकीदार की तरह सुस्ता रहा होता है
तब
बहुत बेतकल्लुफ़ी से
पीठ पर घूंसा मर
हमें अपनी नीन्द से बेदखल कर
पेशेवर अपहर्ताओं की तरह
उठा ले जाते हैं
अच्छे दोस्त

ईमानदार प्यार की तरह
तर्कों से ऊपर
बेईमान बच्चों की तरह
पलँग के नीचे
और तटस्थ दिनों की तरह
कैलेण्डर पर छपकर
ये हमेशा हमारे पास रहते हैं, बिना किराया दिए
किरायेदारों की कमसिन और ख़ूबसूरत पत्नियों की तरह
पहली ही नज़र में अच्छे लगकर

ये लोग
आपके इतिहास को नहीं पढ़ना चाहते
आपके भूगोल से भी इन्हें कतई दिलचस्पी नहीं हैं
ये तो आपको सिन्धु सभ्यता के सिक्के मान
पुराविदों की तरह प्यार कहते हैं
इनकी गणित हमेशा कमज़ोर होती है

ये कुशल फ़ोटोग्राफ़रों की तरह
आपके चेहरे को हमेशा अच्छा पाते हैं
इनके सारे प्रयास होते हैं :
आपकी एक अदद मुस्कुराती फोटो

पुरानी प्रेमिकाएँ
पहले प्यार के सँकोच भरे दिन
मनचाहे सपनों से सजी नीन्द
इन सबको
हर रोज़
डाकिये-सी निश्छलता के साथ दे जाते हैं
अच्छे दोस्त ।

स्मृति कविता : कथाकार रघुनन्दन त्रिवेदी के लिए

1.

ग़लत है मृत्यु
अगर निरेचन के लिए भी गए

कुछ भी तो नहीं था जिसे साफ़ किया जाता

2.

गुण बताते थे जैसे नीम के
नीम्बू और नीन्द के
चींटी की सक्रियता और चिड़ियों की जाग के

पर इनके लिए ज़रूरी है इन्हीं का होना
जैसे आपका

3.

आपकी टोकों से ज़्यादा है हमारे पास टुच्चापन
नसीहतों से ज़्यादा है लापरवाहियाँ
विवेक से ज़्यादा हैं ग़लतियाँ

लौट आओ

4.

हरे रँग का बजाज कब स्कूटर : आर एन क्यू 3317
पुष्प क़ैफ़े
मोहन की थड़ी
नैनी बाई के मन्दिर की सीढ़ियाँ

तालाब
क़िले का रास्ता
सभी कुछ है

सिवा उस जँगल के
जिसमें हम खो गए हैं

5.

सोचते हो कभी आप :
हमेशा के लिए टूटे चान्द को देखकर
क्या सोचते हैं हम

6.

तारा बनकर
किस दिशा में उगते हो
सन्नाटे के कोरस में
कब रिकॉर्ड करते हो हमारी आवाज़
किन तनों पर लगा दिए हैं
कैमरे

आकाश की छत से झाँकते हुए
कितने बड़े नज़र आते हैं हम
बताओ, रघुजी !

7.

कैसी होती है वहाँ की जाग
अब जाते हो अलसुबह घूमने
देखते हो उगता सूरज और उसे विदा भी करते हो
कैसा दीखता है चान्द पास से
क्या वैसा ही स्वाद वहाँ भी है करेले का
अब भी लेते हो वही हीपर सल्फ़ गले की ख़राश में
बताते हुए लोगों को वहाँ नुस्ख़े

झाँको और देखो
हमें भी ज़रूरत है नुस्ख़ों की
कि जी सकें हम बिना आपके

8.

शर्मिन्दा हो सकते हैं अपने टुच्चेपन पर
रो सकते हैं अभावों पर
बस, ख़ुश नहीं हो सकते
बिना आपकी तस्दीक़ के

9.

कुछ भी पहले जैसा नहीं है
हम बार-बार लौटते हैं
10 जुलाई, 2004 के पहले वाले कैलेण्डर में :
तलाशते हुए
हमारे शहर की भावी लोककथा
बुदबुदाते हुए
यह ट्रेजडी क्यों हुई
जानते हुए

वह लड़की अभी ज़िन्दा है
स्वीकारते हुए
इन्द्रजाल

10.

नहीं खेली ताश
नहीं देखा शह और मात का खेल
चुप रहा शैलेन्द्र के गीतों और लता की आवाज़ पर
टी-शर्ट नहीं ख़रीदा
होमियोपैथी की दवाई और सुदर्शन घनवटी भी

रिस जाती हैं आँखें
कुछ भी अच्छा लिखकर

बारहखड़ी पूरी कराने से पहले
क्यूँ बन्द करवा दी पढ़ाई ।

दुनिया

स्वस्थ दिनों में ही बोते हैं बीमारियों के बीज जैसे
ख़ुशहाल दिनों में ही बनाते हैं बर्बादी का रास्ता

अलग होने की शुरुआत करते हैं गर्मजोशी से साथ रहते हुए

मुद्रा को महीन और बाज़ार को बड़ा
खु़द को छोटा और दुनिया को कड़ा
हम ही करते हैं जैसे
जलाते हैं मोमबत्ती उम्र की बेपरवाही से

हम नहीं सुन रहे हैं किसी का कहना,
दुनिया भी एक मोमबत्ती है ।

ढब्बू मियाँ 

यक़ीनन किसी मस्ज़िद के न रहने का ग़म नहीं था उन्हें

अपने अनपढ़पन का दुःख वे कातरता से देखते
एक शराबी और बेनमाज़ी की तक़रीर सुनते हुए

कितने अकेले थे ढब्बू मिंयाँ

वे अपनी दाढ़ी से मुसलमान
और कपड़ों से ग़रीब लगते थे
नस्ली तौर पर आदमी से कहीं ज़्यादा वे ढब्बू के क़रीब थे

इस बात से बेख़बर की ढब्बू होना कितना मुश्किल है

उनकी सबसे बड़ी चिन्ता
बच्चे के हाथ में ढब्बू का सलामत पहुँचना था
गोया कि वह धरती हो

बच्चे ढब्बू से खेलते दूसरे ग्रहों की ईर्ष्या बढ़ाते हुए
और ढब्बू मियाँ नए ढब्बू में फूलते !

छोलतू

(तीन सौ की आबादी का हिमाचल का वह छोटा-सा गाँव जहाँ मैं रहता हूँ — सतलुज किनारे)

(एक)

यहाँ नहीं आते हैं कोई अख़बार
न ये जाता है अख़बार तक

यहीं आकर पता चलती है
कितनी अच्छी होती है अख़बार से दूरी !

(दो)

जीते हैं जैसे मोटे
अपने वज़न के साथ

पहाड़ी पहाड़ के साथ !

(तीन)

कितने अकेले होते हैं पहाड़

ऊँचाई अकेला कर देती है !

(चार)

यहाँ लोग उगाते हैं सेब
ताकि गाल लाल हो सकें
डाक्टरों, वक़ीलों, नेताओं के

इन्हीं की याददाश्त के लिए अखरोट उगाते
ये ख़ुद भूल जाते हैं अखरोट के फ़ायदे !

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