विष्णु खरे की रचनाएँ

वापस

सफेद मूँछें सिर पर उतने ही सफेद छोटे-छोटे बाल
बूढ़े दुबले झुर्रीदार बदन पर मैली धोती और बनियान
चेहरा बिल्कुल वैसा जैसा अस्सी प्रतिशत भारतवासियों का
शहर के बीच सिनेमा के पास वह
जमीन पर नक्शे, बायोलॉजी, गणित और बारहखड़ी के चार्ट बेच रहा है

नक्शे और चार्ट काफी जगह घेरते हैं
बूढ़े का उन तक हाथ नहीं पहुँचता
इसलिए उसके पास एक लड़की है दस-ग्यारह बरस की
घरेलू लड़कियों की तरह दुबली बड़ी-बड़ी सहमी सफेद आँखों
लेकिन सहज मुस्कान वाली
वह उसकी नातिन है या धेवती नहीं कहा जा सकता
मगर इतवार का दिन है और तय है कि उसका दिल
खेलों और सहेलियों को याद कर रहा होगा

बूढ़ा उसे ग्राहकों की फरमाइश पर
इस नक्शे या उस चार्ट को दिखाने को कहता है
यह नहीं कि नक्शों में लड़की की कोई दिलचस्पी नहीं है
लेकिन आदमी औरतों की माँसपेशियों और शिराओं वाले
बायोलॉजी के चार्टों को दिखाते हुए
वह खुद उन्हे देखने में शामिल हो जाती है
आसपास रूमाल, कमीज, टेरीकाट, सॉफ्टी
और लॉटरी बेचनेवालों का शोर है
भीड़ उसी तरफ ज्यादा है लेकिन ऐसे लोग भी हैं
जो बूढ़े के नक्शों और चार्टों में दिलचस्पी रखते हैं

क्या हरयाना का नक्शा रखते हो?
इंडिया को रेलवे मैप होगा ?
फीमेल एनॉटमी का इन-डैप्थ चार्ट है क्या
कालेज के दो लड़के हँसकर पूछते हैं
एक विदेशी लड़की को शहर का नक्शा मिल गया है
वह मुस्करा कर एक जगह उँगली रखकर मित्र से कहती है
वी आर हियर और कुछ समझकर
छोटी लड़की पंजों के बल खड़ी होकर देखती है कि उसकी दुकान कहाँ है

दोपहर के तीन बज रहे हैं
कि दूर नुक्कड़ से जैसे किसी आँधी में बुहारे गए
रूमाल, पैन, चश्मे, टेरीकॉट और अंडरवियर वाले
अपनी-अपनी गठरियाँ उठाये इस तरफ भागते हुए आते हैं
मुनिस्पल कमेटी का उड़नदस्ता आ गया है
इन गैरकानूनी दुकानों को पकड़ने के लिए

दोनों भागते हैं अपनी दुकान लिये सिनेमाघर के पीछे
कई नक्शे और चार्ट फिर भी पीछे छूट गए हैं
उड़नदस्ते के सिपाही और इन्सपैक्टर उन्हे अपने कब्जे में लेते हैं
शहर सूबे मुल्क और संसार
और मर्दों और औरतों के शरीरों की बनावट के चार्ट
जब्त कर लिये जाते हैं एक गठरी में
और जब दबिश खत्म हो है और कारिंदे ट्रक में बैठकर लौटते हैं
तब उन्हे एक-दूसरे को दिखाते हैं
देख सेहर मुलक आदमी और औरत अपने हात्थ में हैं

बूढ़ा और लड़की अपने आश्रय से गर्दन बाहर निकालते हैं
वह लड़की को भेजता है कि देखकर आए
वह लौटकर बताती है कि थोड़ा-सा माल सड़क पर उड़ा पड़ा है
सरकार कमेटी और दुनिया को गालियाँ बकता हुआ
बूढ़ा चादर लिये लौटता है अपने ठिये पर गाहक फिर आ रहे हैं
कुछ चीजें ऐसी हैं तमाम चीजों के बावजूद जिनकी जरूरत नहीं बदलती
जैसे नक्शे इबारत गिनती और आदमी के शरीर की बनावट की तस्वीरें
जिन्हे बूढ़ा और लड़की फिर बेच रहे हैं
वापस अपने नक्शे में अपनी जगह पर

कोमल

किस स्थानीय मसखरे ने
उसे खुद को कोमल गाँडू कहना सिखा दिया था
यह एक रहस्य है
लेकिन अब उसे किसी और नाम से पुकारना अजीब लगता था
कई बार मुहल्ले की संभ्रान्त महिलाएँ भी
उस पर कोई फुटकर दया करते समय
उसे इसी नाम से अनायास पुकार देतीं
और फिर कई दिनों तक
अपनी जुबान दाँतों के नीचे रख आपस में खिसखिसाया करती थीं।

अपने विधुर पिता मुंशीजी और छोटे भाइयों के लिए
वह अनिर्वचनीय दैनंदिन लज्जा का कारण था–
अक्सर वे अपने काम से
घर पर ताला डालकर चल देते थे
और गलियों-बाजारों से वह लौटता, थका हुआ और खुश,
तो देर तक दरवाजे के पास बैठे रहने के बाद
जब भरे-पूरे शरीर की भूख उसके दिमाग तक पहुँचती
तो किसी भी घर के सामने
वह सपरिचय रोटी के लिए पुकारता
जो शीघ्र ही मिल जाती–उसे अपने प्रभाव का पता न था
किन्तु जवान होती लड़कियों के उस इलाके में
कौन अपने दरवाजे पर बार-बार वह बेलौस नाम सुनना चाहता।

जहाँ मरियल लड़कों और नुक्कड़-नौजवनों का मनोरंजन
उस मानव रीछ को नचाने-गवाने
और सारा वैविध्य समाप्त हो जाने के बाद रुलाने का था
(विचित्र आनंददायक भाँ-भाँ रुदन था उसका)
वहाँ वह नितांत मित्रहीन भी नहीं था। लोगों ने
उसे राममंदिर में हमेशा औंधे पड़े रहने वाले कबरबिज्जू से
और चुड़ैल समझी जानेवाली सत्तर वर्षीया भूतपूर्व दहीवाली से भी
लम्बी बातें करते हुए देखा था
जो दोनों के बीच रोमांस और शादी ( मजाक, भारतीय शैली)
की अफवाहों के बावजूद
उसे बेटा कहती थी।
अपनी किस्म के लोगों की तरह
अरसे तक गायब रहने की आदत
हमारे चरितनायक की भी थी लेकिन
अबकी बार जब वह लौटा
तो दरवाजे पर कई दिन बैठने के बाद भी ताला नहीं खुला
और लोगों ने भरसक उसे समझाया
कि मुंशीजी और उसके भाई मकान और शहर छोड़कर चले गए
लेकिन वह खुश होता हुआ उनकी तरफ देखता रहा
फिर कुछ दिनों तक लगातार
कबरबिज्जू तथा दहीवाली से गुप्त मंत्रणाएँ करता रहा
और इसके-उसके चबूतरे पर सोने की खुली कोशिशें।जब
मकान में वाकई असहिष्णु दूसरे रहनेवाले आ गए
तो वह अदृश्य हो गया।

यहाँ से तथ्यों का दामन छूटता है।
गृहस्थों की याददाश्त कमजोर होती है किन्तु कल्पनाशीलता तेज–
कबरबिज्जू और दहीवाली कहाँ चले गए
यह पूछें तो जानकारियों के अनेक संस्करण मिलेंगे।
और जिसके वे दोनों एकमात्र मित्र थे
वह कभी सिवनी, कभी नागपुर, कभी एक ही समय में
अलग-अलग तीरथों(और अगर हरनारायन वकील के लड़के
बैजनाथ पर विश्वास किया जाय तो बम्बई तक) में
देखा गया। जहाँ तक मुहल्ले के आम लोगों का सवाल है
उनमें काली माई की इष्टवाली जमनाबाई का सपना ही
ज्यादा स्वीकृत हुआ है
जिसमें दिखा था कि कबरबिज्जू ने, जो असल में
एक मालगुजार था जिसपर सराप था,
वापस गाँव जाके जमीन-जायदाद थी सो गरीबों में बाँट दी
और साधू हो गया
दहीवाली बुढ़िया जो बिना बताए बरसों से बरत रखती थी
मैया की सिद्धी पाके सीधी सुरग चली गई
और गेरुआ अँगरखा पहने लाल-लाल आँखों वाला एक जोगी
जो आके ग्यान और करम की बातें कह रहा था
वह अपना कोमल गाँडू था।

टेबिल

टेबिल

उन्नीस सौ चालीस के आसपास
जब चीजें सस्ती थीं और फर्नीचर की दो-तीन शैलियाँ ही प्रचलित थीं
मुरलीधर नाजिर ने एक फोल्डिंग टेबिल बनवाई
जिसका ऊपरी तख्ता निकल आता था
और पाए अंदर की तरफ मुड़ जाते थे
जिस पर उन्होने डिप्टी कमिश्नर जनाब गिल्मोर साहब बहादुर को
अपनी खास अंग्रेजी में अर्जियाँ लिखीं
छोटे बाजार की रामलीला में हिस्सा लेने वालों की पोशाक
चेहरों और हथियारों का हिसाब रखा
और गेहुएँ रंग की महाराजिन को मुहब्बतनामा लिखने की सोची
लेकिन चूंकि वह उनके घर में नीचे ही रहती थी
और उसे उर्दू नहीं आती थी
इसलिए दिल ही दिल में मुहब्बतनामे लिख-लिखकर फाड़ते रहे
और एक चिलचिलाती शाम न जाने क्या हुआ कि घर लौट
बिस्तर पर यूं लेटे कि अगली सुबह उन्हे न देख सकी
और इस तरह अपने एक नौजवान शादीशुदा लड़के
दो जवान अनब्याही लड़कियों और बहु और पोते को
मुहावरे के मुताबिक रोता-बिलखता लेकिन असलियत में मुफलिस
छोड़ गए

टेबिल, जिस पर नाजिर मरहूम काम करते थे
और जो करीब-करीब नई थी
मिली उनके बेटे सुन्दरलाल को
जिनका एकमात्र सपना डाॅक्टर बनने का था, उस बच्चे का बाप नहीं
जिसे असमय ही उनकी घरवाली ने उन पर थोप दिया था.
जमाना हुआ मंदी का, नौकरी मिलती नहीं थी
किसी ने जँचा दिया मिलटरी की अस्पताली टुकड़ी में भर्ती हो जाओ
वहाँ डाॅक्टर बना देते हैं
सो वे हो गए दाखिल मेडिकल कोर में
और बर्मा फ्रन्ट पर एकाध बार चोरी-छुपे घायल हुए
और भेजा अपनी घरवाली रामकुमारी को एक रोबीला फोटो
जिसे रखा रामकुमारी ने टेबिल पर
और पालती रहीं तपेदिक बलगमी रातों में
(ननदों में से एक बैठ गई हलवाई के घर
और दूसरी मर गई जिस तरह देर तक अनब्याही जवान लड़कियाँ
मर जाती हैं अचानक)
रखती रहीं फूल और ऊदबत्ती और उपास
और हारमोनियम भी वहीं रखा
जो कलकत्ते से मंडाले जाते वक्त भिजवाया था सुन्दरलाल ने और जिसे लेने
रामकुमारी बच्चे के साथ गई थीं पहली और आखिरी बार रेलवे माल
गोदाम
और पहली और आखिरी बार ही बैलगाड़ी पर
बैठकर आई थीं घर उसे छुड़वाकर

(जाहिर है) बड़ी लड़ाई के दर्म्यान और बावजूद
टेबिल बमय हारमोनियम और फोटो उसी कोने में खड़ी रही
और छँटनी के बाद भूतपूर्व जमादार सुन्दरलाल मेन्शन्ड इन डिस्पैचेज
जब वापस आए तो टेबिल पर पड़ी अपनी तस्वीर
और बिस्तर पर रामकुमारी को देखकर
उन्होने उस तरह अपना चेहरा सिकोड़ा
जिसे बर्मा के जंगलों में मुस्कराहट समझने की उनकी आदत पड़ गई थी
और कहा – अच्छा.

लेकिन कुछ भी (जिसमें रामकुमारी भी शामिल थीं)
अच्छा नहीं हुआ और
विधुर सुन्दरलाल ने, जिनका विश्वास भावनाओं के
भद्दे प्रदर्शन में नहीं रह गया था,
अपना फोटो तो टेबिल से हटा लिया
साथ ही रामकुमारी की भी तस्वीर उस पर नहीं रखी
क्योंकि कोई थी ही नहीं. फिर एक वाजिब अंतराल के बाद
वे बैठे टेबिल पर अर्जियाँ लिखने
और बेकारी, बेगार, क्लर्की और मास्टरी से गुजरते हुए
हेडमास्टरी को हासिल हुए
और उसी टेबिल पर केरल के ज्योतिषी को जन्मपत्री की नकलें
शिक्षा-उपमंत्री को सुझाव
हाईस्कूल बोर्ड के सेक्रेटरी को इम्तहान की रिपोर्ट
संभाग शिक्षा निरीक्षक को तबादले की दलीलें
और मातहतों की कान्फिडेंशियल लिखते हुए
(और यह सब करते वक्त एक असंभव तथा करुण आवाज निकालते हुए
जिसे वह अलग-अलग समयों पर अलग-अलग शास्त्रीय राग
के नाम से पुकारते थे)
पचास वर्ष की अपेक्षाकृत अल्पायु में एक सरकारी अस्पताल में मरे
और अपनी विधुर गृहस्थी का सामान टेबिल समेत छोड़ गए

अपने बेटे को जो अब बड़े शहर में
गंजा और भद्दा होता हुआ एक मँझोला अफसर था
और जो बाकी सामान को ठिकाने लगा
सिर्फ टेबिल, चूँकि वह फोल्डिंग थी और आसानी से ले जाई जा सकती थी,
साथ ले आया
और जब फर्नीचर वाले ने कह दिया कि वह तो बहुत पुरानी हो चुकी है
और उस पर सनमाइका लगवाना भी बेकार है
तो उसने उस पर गैरजरूरी किताबें, पुराने खत, बेकार दवाइयाँ और
कंपनियों के सूचीपत्र,
टूटे और गुमे हुए तालों की चाबियाँ, जापानी दूरबीन
और टाइपराइटर की घिर्रियाँ रख दीं
जिनमें उसकी तीन बरस की लड़की की जायज और भरपूर दिलचस्पी थी
और जो टेबिल के पायदान पर खड़ी होकर
उसी तरह इस आश्चर्यलोक को फैली आँखों से देखती थी
जिस तरह चौबीस बरस पहले
यह अब गंजा और तुंदियल होता हुआ मँझोला अफसर
उझककर झाँकता था उस आइने में
जिसमें सुन्दरलाल बाएँ गाल को जीभ से उभारकर
दाढ़ी बनाते हुए भैंगे होकर देखते थे
(नाक के तीखेपन और जबड़े की लम्बाई में मरहूम मुरलीधर
का असर शायद पहचानते हुए)
और टेबिल के हिलने की वजह से
वह थोड़ा-थोड़ा हिलता था.

लौटना

हम क्यों लौटना चाहते हैं
स्मृतियों, जगहों और ऋतुओं में
जानते हुए कि लौटना एक ग़लत शब्द है-
जब हम लौटते हैं तो न हम वही होते हैं
और न रास्ते और वृक्ष और सूर्यास्त-
सब कुछ बदला हुआ होता है और चीज़ों का बदला हुआ होना
हमारी अँगुलियों पर अदृश्य शो-विन्डो के काँच-सा लगता है
और उस ओर रखे हुए स्वप्नों को छूना
एक मृगतृष्णा है

अनुभवों, स्पर्शों और वसन्त में लौटना
कितना हास्यास्पद है-फिर भी हर शख़्श कहीं न कहीं लौटता है
और लौटना एक यंत्रणा है
चेहरों और वस्तुओं पर पपड़ियाँ और एक त्रासद युग की खरोंच
देखकर अपनी सामूहिक पराजयों का स्मरण करते हुए
आईने के व्योमहीन आकाश में
एक चिड़िया लहूलुहान कोशिश करती है उस ओर के लिए
और एक ग़ैर-रूमानी समय में
हम लौटते हैं अपने-अपने प्रतिबिंबित एकांत में
वह प्राप्त करने के लिए
जो पहले भी वहाँ कहीं नहीं था

चे

वक़्त साधती बहसों और धूर्त समझौतों के बाद

एक तंग आदमी को कोई हाथ का काम दो

और एक दूसरे की तरफ़ न देखकर भी सब समझ लेने वाले चंद दोस्त

और खुले आसमान के नीचे असंभव पड़ाव

जहाँ से सब कुछ एक गंभीर मज़ाक की तरह संभव हो

फिर हो एक लम्बा और बेरहम मुक़ाबला

जिसमें कुछ भी अक्षम्य न हो

निर्मम हमलों आगे बढ़ने पीछे हटने

कुछ उनके लोग गिरा देने कुछ अपने साथी गँवा देने

और चिरायंध और अंतड़ियों के पहले दर्म्यान और बाद

सब कुछ जायज हो.

स्वीकार

आप जो सोच रहे हैं वही सही है

मैं जो सोचना चाहता हूँ वह ग़लत है

सामने से आपका सर्वस्म्मत व्यवस्थाएँ देना सही है

पिछली कतारों में जो मेरी छिछोरी ‘क्यों’ है वह ग़लत है

मेरी वज़ह से आपको असुविधा है यह सही है

हर खेल बिगाड़ने की मेरी ग़ैरज़िम्मेदार हरक़त ग़लत है

अँधियारी गोल मेज़ के सामने मुझे पेश किया जाना सही है

रोश्नी में चेहरे देखने की मेरी दरख़्वास्त ग़लत है

डरो

कहो तो डरो कि हाय यह क्यों कह दिया

न कहो तो डरो कि पूछेंगे चुप क्यों हो

सुनो तो डरो कि अपना कान क्यों दिया

न सुनो तो डरो कि सुनना लाजिमी तो नहीं था

देखो तो डरो कि एक दिन तुम पर भी यह न हो

न देखो तो डरो कि गवाही में बयान क्या दोगे

सोचो तो डरो कि वह चेहरे पर न झलक आया हो

न सोचो तो डरो कि सोचने को कुछ दे न दें

पढ़ो तो डरो कि पीछे से झाँकने वाला कौन है

न पढ़ो तो डरो कि तलाशेंगे क्या पढ़ते हो

लिखो तो डरो कि उसके कई मतलब लग सकते हैं

न लिखो तो डरो कि नई इबारत सिखाई जाएगी

डरो तो डरो कि कहेंगे डर किस बात का है

न डरो तो डरो कि हुक़्म होगा कि डर

चित्तौड़

संग्रामसिंह का खण्डहर महल की ध्वस्त गुम्बद पर

बैठा गिद्ध

टूरिस्ट गाड़ी को ऊपर आती देखता है

पीछे है युद्ध का सूना मैदान. पीछे है सिंहद्वार जहाँ से चरवाहे

बकरियाँ अन्दर लाते हैं

नीचे चमकती पटरियाँ हैं . नीचे है बिजलीघर और जलघर. नीचे है फैला

सफ़ेद शहर .

नीचे और ऊपर की दूरी के लिए

जिसे तय करने गाड़ी को आधा घण्टा और कुछ ईंधन चाहिए

गुम्बद के गिद्ध की एक उड़ान काफ़ी है .

लेकिन शहर के लोग उसे अपने घरों की छत पर अभी बैठने नहीं देंगे .

पंख

मरा हुआ ताज़ा कबूतर

कोलतार की सड़क पर.

जैसे वंदनीय सर्प की पीठ पर

अक्षत रखा हो. उसकी रक्ताभ आँखें

अभी भी आते-जाते पहियों को देखती हैं.

एक जंगली कबूतर की

क्या कीमत हो सकती है ? शाम तक

जहाँ लाश थी वहाँ कुछ पंख हैं

जिन्हें दुविधा में पड़ा हुआ

गाँव का कुत्ता दूर से सूँघता है.

लड़कियों के बाप

‘लड़कियों के बाप’
वे अक्सर वक्त के कुछ बाद पहुँचते हैं
हड़बड़ाए हुए बदहवास पसीने-पसीने
साइकिल या रिक्शों से
अपनी बेटियों और उनके टाइपराइटरों के साथ
करीब-करीब गिरते हुए उतरते हुए
जो साइकिल से आते हैं वे गेट से बहुत पहले ही पैदल आते हैं

उनकी उम्र पचपन से साठ के बीच
उनकी लड़कियों की उम्र अठारह से पच्चीस के बीच
और टाइपराइटरों की उम्र उनके लिए दिए गए किराए के अनुपात में

क्लर्क टाइपिस्ट की जगह के लिए टैस्ट और इन्टरव्यू हैं
सादा घरेलू और बेकार लड़कियों के बाप
अपनी बच्चियों और टाइपराइटरों के साथ पहुँच रहे हैं

लड़कियाँ जो हर इम्तहान में किसी तरह पास हो पाई हैं
दुबली-पतली बड़ी मुश्किल से कोई जवाब दे पाने वालीं
अंग्रेजी को अपने-अपने ढंग से ग़लत बोलनेवालीं
किसी के भी चेहरे पर सुख नहीं
हर एक के सीने सपाट
कपड़ों पर दाम और फ़ैशन की चमक नहीं
धूल से सने हुए दुबले चिड़ियों जैसे साँवले पंजों पर पुरानी चप्पलें

इम्तहान की जगह तक बड़े टाइपराइटर मैली चादरों में बँधे
उठाकर ले जाते हैं बाप
लड़कियाँ अगर दबे स्वर में मदद करने को कहती भी हैं
तो आज के विशेष दिन और मौके पर उपयुक्त प्रेमभरी झिड़की से मना कर देते हैं
ग्यारह किलो वज़न दूसरी मंज़िल तक पहुँचाते हुए हाँफते हुए
इम्तहान के हाल में वे ज़्यादा रुकना चाहते हैं
घबराना नहीं वगैरह कहते हुए लेकिन किसी भी जानकारी के लिए चौकन्ने
जब तक कि कोई चपरासी या बाबू
तंग आकर उन्हे झिड़के और बाहर कर दे
तिसपर भी वे उसे बार-बार हाथ जोड़ते हुए बाहर आते हैं

पता लगाने की कोशिश करते हुए कि डिक्टेशन कौन देगा
कौन जाँचेगा पर्चों को
फिर कौन बैठेगा इन्टरव्यू में
बड़े बाबुओं और अफ़सरों के पूरे नाम और पते पूछते हुए
कौन जानता है कोई बिरादरी का निकल आए
या दूर की ही जान-पहचान का
या अपने शहर या मुहल्ले का
उन्हें मालूम है ये चीज़ें कैसे होती हैं
मुमकिन है कि वे चाय पीने जाते हुए मुलाज़िमों के साथ हो लें
पैसे चुकाने का मौका ढूँढते हुए
अपनी बच्ची के लिए चाय और कोई खाने की चीज़ की तलाश के बहाने
उनके आधे अश्लील इशारों सुझावों और मज़ाकों को
सुना-अनसुना करते हुए नासमझ दोस्ताने में हँसते हुए
इस दफ़्तर में लगे हुए या मुल्क के बाहर बसे हुए
अपने बड़े रिश्तेदारों का ज़िक्र करते हुए

वे हर अंदर आने वाली लड़की से वादा लेंगे
कि वह लौटकर अपनी सब बहनों को बताएगी कि क्या पूछते हैं
और उसके बाहर आने पर उसे घेर लेंगे
और उसकी उदासी से थोड़े ख़ुश और थोड़े दुखी होकर उसे ढाढस बँधाएँगे
अपनी-अपनी चुप और पसीने पसीने निकलती लड़की को
उसकी अस्थायी सहेलियों और उनके पिताओं के सवालों के बाद
कुछ दूर ले जाकर तसल्ली देंगे
तू फिकर मत कर बेटा बहुत मेहनत की है तूने इस बार
भगवान करेगा तो तेरा ही हो जाएगा वगैरह कहते हुए
और लड़कियाँ सिर नीचा किए हुए उनसे कहती हुईं पापा अब चलो

लेकिन आख़िरी लड़की के निकल जाने तक
और उसके बाद भी
जब इन्टरव्यू लेने वाले अफसर अंग्रेजी में मज़ाक़ करते हुए
बाथरूम से लौटकर अपने अपने कमरों में जा चुके होते हैं
तब तक वे खड़े रहते हैं
जैसा भी होगा रिज़ल्ट बाद में घर भिजवा दिया जाएगा
बता दिए जाने के बावजूद
किसी ऐसे आदमी की उम्मीद करते हुए जो सिर्फ़ एक इशारा ही दे दे
आफ़िस फिर आफ़िस की तरह काम करने लगता है
फिर भी यक़ीन न करते हुए मुड़ मुड़कर पीछे देखते हुए वे उतरते हैं भारी टाइपराइटर और मन के साथ जो आए थे रिक्शों पर वे जाते हैं दूर तक
फिर से रिक्शे की तलाश में
बीच बीच में चादर में बँधे टाइपराइटर को फ़ुटपाथ पर रखकर सुस्ताते हुए
ड्योढ़ा किराया माँगते हुए रिक्शेवाले और ज़माने के अंधेर पर बड़बड़ाते हुए
फिर अपनी लड़की का मुँह देखकर चुप होते हुए
जिनकी साइकिलें दफ्तर के स्टैंड पर हैं
वे बाँधते हैं टाइपराइटर कैरियर पर
स्टैंडवाला देर तक देखता रहता है नीची निगाह वाली लड़की को
जो पिता के साथ ठंडे पानी की मशीनवाले से पाँच पैसा गिलास पानी पीती है
और इमारत के अहाते से बाहर बैठती है साइकल पर सामने
दूर से वह अपने बाप की गोद में बैठी जाती हुई लगती है

ग्राहक

दो बार चक्कर लगा चुकने के बाद
तीसरी बार वह अंदर घुसा. दूकान ख़ाली थी
सिर्फ़ एक पाँच बरस का ख़ुश बच्चा आईने के सामने
कुर्सी पर बैठा हुआ था जिसका बाप लम्बी बेंच से
आधी निगाह अपने स्कूटर डबलरोटी और लांड्री के कपड़ों पर
और आधी तीन माह पुराने फ़िल्मफ़ेयर पर रखे हुए था.
सैलूनवाला एक ही था और बच्चे के साथ ख़ुश
वह भी हँसी-मज़ाक करता जा रहा था.

अंदर घुस कर वह चुपचाप खड़ा रहा
ताकि जब बाल बनानेवाले का ध्यान उस पर जाए तभी वह बोले
और ऐसा ही हुआ.
उसके हाथ की थैली
और पैरों के फटे पाँयचेवाले पजामे को देखकर
सैलूनवाला अचानक बच्चे को छोड़कर उसके पास आया
और उससे पूछा : क्या काम है ?

बाल बनेंगे ? : उसने इतने धीरे से पूछा
कि उसे फिर पूछना पड़ा : बाल बनेंगे?
सैलून वाला तब तक कुछ सँभल चुका था
और उसने कहा : हाँ बनेंगे क्यों नहीं बैठ जाओ,
ज़रा बाबा की कटिंग हो जाए. बैठने के लिए दो जगहें ख़ाली थीं–
एक दूसरे आईने के सामने और दूसरी बेंच पर स्कूटरवाले के पास–
वह दोनों के बीच हिचकिचाता खड़ा रहा.
तब सैलूनवाले ने कहा : बैठ जाओ बैठ जाओ,
कुर्सी पर ही बैठ जाओ,
बस बाबा के बाद तुम्हारा ही नम्बर है.
सैलून में हर दीवार पर आईने लगे थे
जिनमें सारे सामानों वाली दूकानें नज़र आती थीं
उनमें कई गुना होते हुए उसने बेंचवाले बाबू साहब से दूर
अपनी थैली रखी.
आईनों में हँसते लोगों, सुन्दर औरतों, मंदिरों और साईंबाबा के अक्सों को बिल्कुल न
देखता हुआ वह
कुर्सी के बिल्कुल सिरे पर करीब-करीब उठंग बैठा हुआ बाहर देखता रहा.
उसने अपने सामने के आईने में भी
दाग़ों और झुर्रियों से भरा हुआ अपना तीस-बत्तीस का चेहरा
और उसके पीछे प्रधानमंत्री का बातें कम काम ज़्यादा वाला कैलेन्डर नहीं देखा.
बच्चे और बाल बनानेवाले के बीच उस खेल पर भी
वह नहीं मुस्कराया जिसपर बेंचवाले बाबू साहब ख़ुश होते रहे.

बाबा को निपटाकर जब सैलूनवाला उसके पास आया
तो जैसे वह जगा. उसे बतलाया गया कि कटिंग के पाँच रुपये लगते हैं.
उसने कहीं भी न देखते हुए कहा ठीक है जो भी हो.
जब उससे पूछा गया कि कैसे रहेंगे तो उसने कहा
बिल्कुल छोटे, तीन-चार महीने की इल्लत मिटे.
बाल बनाने वाले ने उसके बाल गीले किए, कैंची-कंघा चलाया,
मशीन लगाई. चूँकि दूकान में अब और कोई नहीं था
इसलिए वह कुर्सी पर कुछ ठीक से बैठा और पीछे को थोड़ा सहारा लिया.
उसने तब भी अपने को आईने में नहीं देखा
हालाँकि सैलून में इतने आईने थे कि वह पूरे बाज़ार से घिरा लगता था
लेकिन बाल बनाने वाला उसका सिर जहाँ घुमाता था
उसे बस अपनी थैली साफ़ नज़र आती थी
जिसमें शायद महँगी हो रही प्याज
पड़ोस की चक्की से लिया हुआ फ़र्श बुहारा गया शाम का थोड़ा-सा आख़िरी
आटा
और मज़दूरी के दो-एक पुराने कुछ ज़ंग-लगे औज़ार थे.

सत्य

जब हम सत्‍य को पुकारते हैं

तो वो हमसे हटते जाता है

जैसे गुहारते हुए युदिष्ठिर के सामने से

भागे थे विदुर और भी घने जंगलों में

सत्‍य शायद जानना चाहता है

कि उनके पिछे हम कितनी दूर तक भटक सकते हैं

कभी दिखता है सत्‍य

और कभी ओझल हो जाता है

और हम कहते रह जाते हैं कि रुको यह हमको हैं

जैसे धर्मराज के बार-बार दुहाई देने पर

कि ठहरिए स्‍वामी विदुर

यह मैं हूँ आपका सेवक कुंतीनंदन युदिष्ठिर

वे नहीं ठिठकते

यदि हम किसी तरह युदिष्ठिर जैसा संकल्‍प्‍ा पा जाते हैं

तो एक दिन पाता नहीं क्‍या सोचकर रुक ही जाता है सत्‍य

लेकिन पलटकर खड़ा ही रहता है वो दृढ़निश्‍चयी

अपनी कहीं और देखती दृष्‍टी से हमारी आँखों में देखता हुया

अंतिम बार देखता-सा लगता है वह हमें

और उसमें से उसी का हलका सा प्रकाश जैसा आकार

समा जाता है हममें

जैसे शमी वृक्ष के तने से टिककर

न पहचानने में पहचानते हुए विदुर ने धर्मराज को

निर्निमेष देखा था अंतिम बार

और उनमें से उनका आलोक धीरे-धीरे आगे बढ़कर

मिल गया था युदिष्ठिर में

सिर झुकाए निराश लौटते हैं हम

कि सत्‍य अंत तक हमसे कुछ नहीं बोला

हाँ हमने उसके आकार से निकलता वह प्रकाश-पुंज देखा था

हम तक आता हुया

वह हममें विलीन हुया या हमसे होता हुया आगे बढ़ गया

हम कह नहीं सकते

न तो हममें कोई स्‍फुरण हुया और न ही कोई ज्‍वर

किंतु शेष सारे जीवन हम सोचते रह जाते हैं

कैसे जानें कि सत्‍य का वह प्रतिबिंब हममें समाया या नहीं

हमारी आत्‍मा में जो कभी-कभी दमक उठता है

क्‍या वह उसी का छुअन है

जैसे

विदुर कहना चाहते तो वही बात कह सकते थे

सोचा होगा माथे के साथ अपना मुकुट नीचा किए

युदिष्ठिर ने

खांडवप्रस्‍थ से इंद्रप्रस्‍थ लौटते हुए।

निवेदन

डॉक्टरो मुझे और सब सलाह दो
सिर्फ़ यह न कहो कि अपने हार्ट का ख़याल रखें और
ग़ुस्सा न किया करें आप–
क्योंकि ग़ुस्से के कारण आई मृत्यु मुझे स्वीकार्य है
ग़ुस्सा न करने की मौत के बजाए

बुज़ुर्गो यह न बताओ मुझे
कि मेरी उम्र बढ़ रही है और मैं एक शरीफ़ आदमी हूँ
इसलिए अपने ग़ुस्से पर काबू पाऊँ
क्योंकि जीवन की इस शाइस्ता सार्थकता का अब मैं क्या करूँगा
जो अपने क्रोध पर विजय प्राप्त कर एक पीढ़ी पहले आपने
हासिल कर ली थी

ग्रंथो मुझे अब प्रवचन न दो
कि मनुष्य को क्रोध नहीं करना चाहिए
न गिनाओ मेरे सामने वे पातक और नरक
जिन्हे क्रोधी आदमी अर्जित करता है
क्योंकि इहलोक में जो कुछ नारकीय और पापिष्ठ है
वह कम से कम सिर्फ़ ग़ुस्सैल लोगों ने तो नहीं रचा है
ठंडे दिल और दिमाग़ से यह मुझे दिख चुका है

ताकतवर लोगो मुझे शालीन और संयत भाषा में
परामर्श न दो कि ग़ुस्सा न करो
क्योंकि उससे मेरा ही नुकसान होगा
मैं तुम्हारे धीरोदात्त उपदेश में लिपटी चेतावनी सुन रहा हूँ
लेकिन सब कुछ चले जाने के बाद
यही एक चीज़ अपनी बचने दी गई है

डॉक्टर तो सदाशय हैं भले-बुरे से ऊपर
लेकिन बुज़ुर्गो ग्रंथो ताकतवर लोगो
मैं जानता हूँ
आप एक शख़्श के ग़ुस्से से उतने चिंतित नहीं हैं
आपके सामने एक अंदेशा है सच्चा या झूठा
चंद लोगों के एक साथ मिलकर ग़ुस्सा होने का

चुनौती

इस क़स्बानुमा शहर की इस सड़क पर
सुबह घूमने जाने वाले मध्यवर्गीय सवर्ण पुरुषों में
हरिओम पुकारने की प्रथा है

यदि यह लगभग स्वगत
और भगवान का नाम लेने की एकान्त विनम्रता से ही कहा जाता
तब भी एक बात थी
क्योंकि तब ऐसे घूमने वाले
जो सुबह हरिओम नहीं कहना चाहते
शान्ति से अपने रास्ते पर जा रहे होते

लेकिन ये हरिओम पुकारने वाले
उसे ऐसी आवाज़ में कहते हैं
जैसे कहीं कोई हादसा वारदात या हमला हो गया हो
उसमें एक भय, एक हौल पैदा करने वाली चुनौती रहती है
दूसरों को देख वे उसे अतिरिक्त ज़ोर से उच्चारते हैं
उन्हें इस तरह जाँचते हैं कि उसका उसी तरह उत्तर नहीं दोगे
तो विरोधी अश्रद्धालु नास्तिक और राष्ट्रद्रोही तक समझे जाओगे
इस तरह बाध्य किए जाने पर
अक्सर लोग अस्फुट स्वर में या उन्हीं की तरह ज़ोर से
हरिओम कह देते हैं
शायद मज़ाक़ में भी ऐसा कह देते हों

हरिओम कहलवाने वाले उसे एक ऐसे स्वर में कहते हैं
जो पहचाना-सा लगता है

एक सुबह उठकर
कोठी जाने वाले इस ज़िला मुख्यालय मार्ग पर
मैं प्रयोग करना चाहता हूँ
कि हरिओम के प्रत्युत्तर में सुपरिचित जैहिन्द कहूँ
या महात्मा गाँधी की जय या नेहरू ज़िन्दाबाद
या जय भीम अथवा लेनिन अमर रहें
— कोई इनमें से जानता भी होगा भीम या लेनिन को? —
या अपने इस उकसावे को उसके चरम पर ले जाकर
अस्सलाम अलैकुम या अल्लाहु अकबर बोल दूँ
तो क्या सहास मतभेद से लेकर
दँगे तक की कोई स्थिति पैदा हो जाएगी इतनी सुबह
कि इतने में किसी सुदूर मस्जिद का लाउडस्पीकर कुछ खरखराता है
और शुरू होती है फ़ज्र की अज़ान
और मैं कुछ चौंक कर पहचानता हूँ
कि यह जो मध्यवर्गीय सवर्ण हरिओम बोला जाता है
वह नमाज़ के वज़न पर है बरक्स

शायद यह सिद्ध करने का अभ्यास हो रहा है
कि मुसलमानों से कहीं पहले उठता है हिन्दू ब्राह्म मुहूर्त के आसपास
फिर वह जो हरिओम पुकारता है उसी के स्वर अज़ान में छिपे हुए हैं
जैसे मस्जिद के नीचे मन्दिर
जैसे काबे के नीचे शिवलिंग

गूँजती है अज़ान
दो-तीन और मस्जिदों के अदृश्य लाउडस्पीकर
उसे एक लहराती हुई प्रतिध्वनि बना देते हैं
मुल्क में कहाँ-कहाँ पढ़ी जा रही होगी नमाज़ इस वक़्त
कितने लाख कितने करोड़ जानू झुके होंगे सिजदे में
कितने हाथ माँग रहे होंगे दुआ कितने मूक दिलों में उठ रही होगी सदा
अल्लाह के अकबर होने की लेकिन
क्या हर गाँव-क़स्बे-शहर में उसके मुका़बिले इतने कम उत्साहियों द्वारा
हरिओम जैसा कुछ गुँजाया जाता होगा

सन्नाटा छा जाता है कुछ देर के लिए कोठी रोड पर अज़ान के बाद
होशियार जानवर हैं कुत्ते वे उस पर नहीं भौंकते
फिर जो हरिओम के नारे लगते हैं छिटपुट
उनमें और ज़्यादा कोशिश रहती है मुअज़्ज़िनों जैसी
लेकिन उसमें एक होड़, एक खीझ, एक हताशा-सी लगती है
जो एक ज़बरदस्ती की ज़िद्दी अस्वाभाविक पावनतावादी चेष्टा को
एक समान सामूहिक जीवन्त आस्था से बाँटती है
वैसे भी अब सूरज चढ़ आया है और उनके लौटने का वक़्त है

लेकिन अभी से ही उनमें जो रंज़ीदगी और थकान सुनता हूँ
उस से डर पैदा होता है
कि कहीं वे हरिओम कहने को अनिवार्य न बनवा डालें इस सड़क पर
और फिर इस शहर में
और अन्त में इस मुल्क में

एक कम

1947 के बाद से
इतने लोगों ने इतने तरीकों से
आत्मनिर्भर मालामाल और गतिशील होते देखा है
कि अब जब आगे कोई हाथ फैलाता है
पच्चीस पैसे एक चाय या दो रोटी के लिए
तो जान लेता हूँ
मेरे सामने एक ईमानदार आदमी, औरत या बच्चा खड़ा है

मानता हुआ कि हाँ मैं लाचार हूँ कँगाल या कोढ़ी
या मैं भला चँगा हूँ और कामचोर और
एक मामूली धोखेबाज़
लेकिन पूरी तरह तुम्हारे संकोच लज्जा परेशानी
या गुस्से पर आश्रित
तुम्हारे सामने बिलकुल नंगा निर्लज्ज और निराकांक्षी

मैंने अपने को हटा लिया है हर होड़ से
मैं तुम्हारा विरोधी प्रतिद्वन्द्वी या हिस्सेदार नहीं
मुझे कुछ देकर या न देकर भी तुम
कम से कम एक आदमी से तो निश्चिन्त रह सकते हो

शिविर में शिशु

शिविर में शिशु

एक चादर पर पन्द्रह शिशु लिटाए गए हैं
वे उन पैंतालीस में से एक हैं
जो दंगों के बाद मे इन कुछ हफ़्तों में
एक राहत शिविर में पैदा हुए हैं

पिछले कुछ बरसों से तुम जली हुई
फ़र्श पर गिरी या रखी हुई लाशों की तस्वीरें ही देखते आए हो
इधर लगभग हर हफ़्ते देखते हो
और हालात ऐसे हैं कि उनकी तादाद और भयावहता इतनी बढ़ जाए
कि उनके फ़ोटो न लिए जा सकें
और उनमें शायद इस अनाम छायाकार के साथ-साथ
तुम सरीखे देखनेवाले की लाशें भी हों

तस्वीरें और भी हैं
सिर से पैर तक जली हुई बच्ची की
जिसकी दो सहमी हुई आँखें ही दिख रही हैं पट्टीयों के बीच से
अपने घर के मलबे में बैठी शून्य में ताकती माँ-बेटी की
जान बचा लेने की भीख माँगते घिरे हुए लोगों की

लेकिन अभी तो तुम्हारे सामने ये पंद्रह बच्चे हैं

और ये औरतें जो इनकी माँ बुआ नानी दादी हो सकती हैं
या कोई रिश्तेदार नहीं महज़ औरतें
जो इन्हे घेरकर खड़ी हुई हैं या उकड़ूँ बैठी हुई हैं
इनके चेहरों पर वह कोमलता देखो वह खुशी वह हल्का-सा गर्व
और उसमें जो गहरा दुख मिला हुआ है
उसके साथ तुम भी वह खुशी महसूस करो और थर्रा जाओ

देखो वे सारे शिशु कितने ख़ुश हैं वे मुस्करा रहे हैं
उन औरतों को सिर्फ़ देखकर या पहचान कर
या उनके प्यार-भरे सम्बोधन सुनकर
नन्हे हाथ कुछ उठे हुए छोटे-छोटे पाँव कुछ मुड़े हुए
साफ़ है वे गोदी में आना चाहते हैं

उन्हे पता नहीं है जिस घर और कुनबे के वे हैं
उनके साथ क्या हुआ है
और तुम यह कह नहीं सकते कि उनके पिता ज़िन्दा ही हों
या घर के दूसरे मर्द
या कि उन्हे जनम देने के बाद उनकी माँएँ भी बची या नहीं

चूँकि ये एक मुस्लिम राहत शिविर में पैदा हुए हैं
इसीलिए इन्हे मुसलमान शिशु कहा जा सकता है
वर्ना इस फ़ोटो से पता नहीं चल पा रहा है
कि ये किसकी सन्तान हैं
28 फरवरी को ऐसा फ़ोटो यदि गोधरा स्टेशन पर लिया जा सकता
तो ये हिन्दु माने जाते
क्योंकि इन औरतों के चेहरों और पहनावे से
हिन्दु-मुसलमान की शनाख़्त नहीं हो पा रही है

इस देश में उन तस्वीरों की क़िल्लत कभी नहीं होगी
जो तुम्हारा कलेजा चाक़ कर दें
शर्मिन्दा और ज़र्द कर दें तुम्हें
तुम्हारे सोचने कहने महसूस करने की व्यर्थता का एहसास दिलाती रहें
लेकिन फ़िलहाल तुम्हारे सामने ये पन्द्रह मुस्कराते बच्चे हैं
जिनका एक भी दाँत अभी आया नहीं है

तुम क्यों इस क़दर ख़ुश और विचलित हो उन्हे देखकर
क्या इसलिए कि वे तुम्हे अपने बच्चों के छुटपन की तस्वीर लगते हैं
या ख़ुद तुम्हारी अपनी पहली फ़ोटो की तरह
जिसमें तुम माँ की गोद में इसी तरह थोड़े हाथ-पैर हिला बैठे थे
या कि फिर उन घिसी-पिटी उक्तियों के मुताबिक सोचकर
कि बच्चों के कोई धर्म सम्प्रदाय जाति वर्ग भाषा संस्कृति नहीं होते
लेकिन तुमने यह भी सोचा कि जिन्होने गोधरा में जलाया व अहमदाबाद में
यदि उनकी भी बचपन या पालने की तस्वीर देखोगे
तो वे भी इतने ही प्यारे लगेंगे और मार्मिक
और कितना विचित्र चमत्कार लगता है तुम्हें
कि राहत शिविर में भी इतने और ऐसे मासूम बच्चे जन्म ले सकते हैं
निहत्थे और अछूते
और ये ऐसे पहले शिशु नहीं हैं
इनसे भी कठिन और अमानवीय हालात में
औरतों और मर्दों को बनाया है बच्चों ने माँ-बाप
बहुत सारी समस्याएँ पैदा करते आए हैं बच्चे
जो बड़े हुए हैं और भी कहर बरपा करते हुए
लेकिन इन्सानियत भी तभी रहती आ पाई है

इस तस्वीर के इन पन्द्रह बच्चों में लेकिन ऐसा क्या है
कि लगता है दीवानावार पहुँच जाऊँ इनके पास
कोई ऐसी अगली गाड़ी पकड़कर जिसके जलाए जाने की कोई वजह न हो
इनकी माँओं के सामने चुपचाप खड़ा रहूँ गुनहगार
गान्धारी के सामने किसी नखजले विजेता के हिमायती की तरह
क्या ले जाऊँ इन बच्चों को उठाकर सौंप दूँ हिन्दुओं को
और बदले में ऐसे ही बच्चे हिन्दुओं में बाँट दूँ इनमें
या ऐसे तमाम बच्चों को गड्डमड्ड कर दूँ
और बुलाऊँ लोगों को उनमें हिन्दू-मुसलमान पहचानने के लिए
लेकिन ऐसी भावुक असम्भव ख़तरनाक हरकतें बहुत सोची गई हैं
और उससे बहुत हो नहीं पाया है
लेकिन क्या करूँ कैसे बचाऊँ इन शिशुओं को
किसी जलते हुए डिब्बे फुँकते हुए घर धधकते हुए मुहल्ले में
पाई जानेवाली अगली झुलसी हुई लाशें बनने से
जिनके हाथ-पैर इन्ही की तरह मुड़े हुए होते हैं
मानो उठा लेने को कह रहे हों या दुआ माँग रहे हों

क्या इन बच्चों से कहूँ बच्चो बड़े होकर उस वहशियत से बचो
जो हममें थी बचो हमारी नफ़रतों हमारे बुग़्ज़ हमारी जहालतों से बचो
यदि तुम्हें नफ़रत करनी ही है तो हम जैसों से करो
और उस सबसे जिसने हमें वैसा ही बना डाला था
तुम्हे अगर इंतक़ाम लेना ही है तो हम सरीखों से लो
जिनसे तुम सरीखे बचाए नहीं जा सके थे

लेकिन यह सब क्या पहले नहीं कहा जा चुका है

फिर भी फिर भी यह हर बार कहा जाना ही चाहिए
इन बच्चों को सिर्फ़ बचाना ही ज़रूरी नहीं है
वह खुशी कैसे बचे वह मुस्कान कैसे
जो अभी फ़कत अपने आसपास महज़ इन्सानों को देख इनके चेहरों पर है
और नामुमकिन उम्मीदें जगाती है
कितना भी तार-तार क्यों न लगे यह
लेकिन हाँ ये उम्मीद हैं हमारे भविष्य-जैसी किसी चीज़ की
हाँ इन्हे देखकर फिर वह पस्त जज़्बा उभरता है आदमी को बचाने का
हाँ यक़ीन दिलाते-से लगते हैं कि इन्हे देखकर जो ममता जागती है
अन्ततः शायद वही बचा पाएगी इन्हे और हमें
सब बताया जाए इन्हे क्योंकि वैसे भी ये उसे जान लेंगे
यह उन पर छोड़ दिया जाए कि वे क्या तय करते हैं फिर
उन्हे बचाएँ क्योंकि एक दिन शायद इन्हीं में से कुछ बचाएँगे
अपनों को हम जैसों को और उस सबको जो बचाने लायक है
और शायद बनाएँगे वह
जो मिटा दिया जाता है जला दिया जाता है फिर भी बार-बार बनता है
जनमता हुआ

स्वर्ण जयंती वर्ष में एक स्मृति

आज़ादी के पहले पैदा क्या हो गया
इस स्वर्ण जयंती वर्ष में
जिसे देखो वह 15 अगस्त 1947 के
मेरे अनुभव जानना चाहता है

मानो उस दिन भी
मैं साढ़े सत्तावन बरस का था
और अपने सारे ताज़िबों और विचारों का
ऐतिहासिक निचोड़ उन्हें तुरंत दे डालूँगा
और वे मेरे पास इस तरह जाएँगे
जैसे किसी आराध्य या महाराज के सानिध्य से

उन्हे क्या बताऊँ कि जिसने अभी
एक वर्ष पहले ही अपनी माँ को मरते हुए देखा हो तपेदिक़ से
उस साढ़े सात साल के लड़के की
क्या स्मृति हो सकती है भारतमाता के मुक्त होने की
सिवा सिर्फ़ इसके कि मुन्नू ख़ाँ हेडमास्टर ने
ऐलान किया था कि छिंदवाड़ा मेन बोर्ड प्राइमरी स्कूल के सारे लड़के
और मास्टर सुबह जमा होंगे पुलिस ग्राउंड पर
अच्छी ड्रेस मे जहाँ परेड होगी झंडा फहराया जाएगा
और मिठाई बँटेगी

लगभग मुँह अँधेर एक गिलास पानी पीकर
गया मैं ग्राउंड को जहाँ छिंदवाड़ा की बड़ी भीड़ जमा हो रही थी
छोटे और बड़े लड़कों को अलग-अलग घेरों में
स्कूलवार बैठाया गया खुले में
शामियाने के नीचे कुर्सियों पर बैठे थे
कोयला खदानों के मालिक मैनेजर ठेकेदार सिनेमा चलाने वाले
शहर के सेठ और साहूकार
अफ़सर और नेता तो थे ही
मास्टर कुछ दूर अलग बैठाले या तैनात किए गए थे

जमकर बारिश होती थी उन दिनों सावन-भादों में
लेकिन आज़ादी के पहले ही दिन चटख़ धूप निकली थी
सलामी और भाषण होने तक सिर पर चिलचिला रहा था सूरज
कुछ खाने की बात क्या पीने को ओक-भर पानी नहीं था
मास्टर और बड़े लोगों को कोई ध्यान नहीं था
बारह बजते-बजते जब छुट्टी मिली तब बिलबिलाए लड़कों में
ताक़त बाक़ी नहीं थी
जिस मिठाई की उम्मीद थी शामियाने में ही बँट गई
किसी और को देखने तक को न मिली
लौटे हम लोग भूखे प्यासे
रास्ते के कुछ घरों से माँगा पानी और पेट दुखने तक पिया
कि अचानक नज़र पड़ी छींद के नुकीले पत्तों पर
लाई लगे बंदनवारों पर
टूट पड़े छोटे पंसारियों वकीलों मास्टरों बाबुओं के बेटे
सरकारी सजावटी द्वारों पर लगाई गई
ज्वार और मक्के की लाई पर चिड़ियों-कौओं की तरह
जिनमें शामिल हो गए नए पंजाबी सिंधी सरदार लड़के भी
इस अभूतपूर्व दृश्य को देखकर लूट में आ मिले हिम्मत कर
वे निचले छोकरे भी जो स्कूल नहीं जाते थे
मुफ़्त की चीज़ के लिए होड़ मचने लगी
काफ़ी ऊँचाई तक आज़ादी के द्वार बंदनवार अपनी सजावट खो बैठे
देखते-देखते

17 अगस्त 1997 को स्वतंत्रता की राष्ट्रव्यापी स्वर्ण-जयंती के ब्यौरों के बीच
जब अख़बार में यह पढ़ा कि लाल किले में
इकट्ठा किए गए बच्चों को
तीन बार जयहिंद कहने के बावज़ूद
सारे वक्त खाने-पीने को कुछ न मिला
तो मुझे 1947 के छिंदवाड़ा और 1997 की दिल्ली के बीच
पचास साल के बावज़ूद ऐसी समानता से विचित्र आश्चर्य हुआ
लेकिन यह भी ख़याल आया
कि दिल्ली में पत्तों के दरवाजों-बंदनवारों का चलन नहीं
फिर पचास बरस पहले छिंदवाड़ा के छोटे तालाब के पास
जो लाई हमने खाई थी
वह अब आठ रुपये के प्लास्टिक में बिकती है
उसे यहाँ लाई के नाम से कोई पहचानता भी नहीं
उसका राष्ट्रीय नाम अब पॉप कॉर्न है
उससे तोरण नहीं सजाई जातीं उसे भूखे बच्चे अब नहीं खाते
पिछले पचास बरसों में कुछ दूसरी चीज़ों की लूट हुई है
जो उसमें शामिल है
वे उसे वक्त काटने के लिए शौक़िया या अजीर्ण रोकने के लिए
चबाते हैं गोल्डन जुबली चैरिटी मेगा शोज़ और ईवेंट्स के दौरान

गुंग महल

खुली बहसों को दावत देना
रवादार शाहंशाहों को भी परेशानी में डाल देता था

हिजरी 987-88 के दौरान दीवान-ए-ख़ास में
जब इस बात पर मुबाहिसा हुआ
कि ख़ुदावंद की बनाई सबसे उम्दा शय अशरफ़-उल-मख़लूकात
आदमज़ाद की वाहिद पैदाइशी मुक़द्दस ज़ुबान क्या थी
तो काज़ी और उलमा इस पर यकराय थे
कि अल्लाह की ज़ुबान अरबी है
जिसमें उसने कुन् कहकर कायनात को वज़ूद बख़्शा
और किताब-उल-मुबीन को नबी पर तारी किया
उधर ब्राह्मण और दूसरे दरबारी सवर्ण
पूरी भयभीत विनम्रता किन्तु क्षमायाचना-भरी दृढ़ता से कहते रहे
कि वेद जो सृष्टि के प्राचीनतम ग्रन्थ हैं और ईश्वर-विरचित ही हैं
चूँकि संस्कृत में हैं जिसे नाम ही देवभाषा का दिया गया है
अतएव इस पुनरावृत्ति की आवश्यकता नहीं है
कि परब्रह्म किस वाणी में बोलता है
मंद स्वर में उन्होने पाणिनी का भी उल्लेख किया

अनपढ़ होने के बावज़ूद
आक़-ए-ज़ीशान जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर
एक ऐसा बादशाह था जिसे चीज़ों के तज़्रिबे करने
और उन्हे सही या बातिल साबित करने में बेदार दिलचस्पी थी
चुना उसने बीस हामिला हिन्दू मुसलमान औरतों को
जो कमोबेश एक ही वक्त में माँ बनने वाली थीं
और ज़च्चगी के फौरन बाद भेज दिया फ़कत उनकी औलादों को
उस महल में जिसे आगरे में दूर नीम-बियाबान में
ख़ास इसी मक़सद से आनन-फ़ानन में बनवाया गया था
जहाँ सिर्फ़ धायें थीं और आयाएँ और चंद दूसरे अहलकार औरत-मर्द
जिन सबको हुक्म था कि उनके मुँह पर पट्टी रहेगी
वे पालेंगे इन बच्चों को लेकिन उनसे और आपस में क़तई बोलेंगे नहीं
वर्ना उनकी ज़ुबान क़लम कर ली जाएगी
और उस महल में जो दूसरे कारिंदे आएँगे वे भी अपना मुँह बन्द रखेंगे

मुआवज़े दिए गए थे इन बच्चों के वास्ते
या इन्हें निज़ाम के काम से तलब कर लिया गया था
यह पता नहीं चलता
यही बताया गया है
कि ज़िल्ले-इलाही जानना चाहते थे कि ये बच्चे
जब बोलने लायक होंगे तो कौन सी ज़ुबान बोलते पाए जाएँगे
अरबी संस्कृत या कोई और

महीने बीत गए तीन-चार बरस भी
कि आलमपनाह को फ़तहपुर से दूर उस महल की याद आई
जिसकी बेज़ुबान ख़ामोशी की वजह से आसपास के काश्तकारों गूजरों ने
उसे नाम दे दिया था गुंग महल

10 अगस्त 1582 को गया बादशाह
अपने बहस करने वाले दरबारियों के साथ उस इमारत तक
जहाँ अब भी गूँगे बने हुए औरत मर्द पाल रहे थे बच्चों को
इन बरसों में मुँह पर पट्टी बाँधे कारकून
लाए थे रसद तनख़्वाहें और बाक़ी साज़-ओ-सामान

चुप्पी तुड़वाई अकबर ने अड़तीस महीनों की और हुक्म दिया औरतों को
जिनके गलों की नसें तक जड़ हो चुकी थीं
और जो अब ख़ुद सिर्फ़ इशारों में बात कर सकती थीं
कि बच्चों को हाज़िर किया जाए

आलीजाह मुल्लाओं पण्डितों आलिमों के सामने
पेश किए गए बीस बच्चे
जो बेहद सहमे हुए थे
ऐसे और इतने इन्सान उन्होंने कभी देखे न थे
लेकिन कहा महाबली ने मुस्कराकर उनसे अरबी में :
बोलो

घबराकर पीछे हटने लगे बच्चे
तब शहंशाह ने पुचकार कर एक से संस्कृत में बोलने को कहा
इशारा पाकर सभी उलेमा और पुजारी
हौसला बढ़ाने लगे बच्चों का अलग-अलग दोनों भाषाओं में

जो गुंगियाने लगे पीछे हटते हुए
कुछ कुत्तों सियारों भेड़ियों की तरह रोने लगे
कुछ नर्राने लगे दूसरे जानवरों परिन्दों की मानिंद

बादशाह ने तब उनसे तुर्की दक़नी उर्दू ब्रज कौरवी सबमें कहा बोलने को
पचास दरबारी और ज़ुबानों में इसरार करते रहे उनसे

अब बच्चों की आँखें निकल आई थीं
उनके काँपते बदन ऐंठ रहे थे वे मुँह से झाग निकालने लगे
कुछ ने दहशत में पेशाब और पाख़ाना कर दिया
फिर वे दीवार के सहारे दुबक गए एक कोने में पिल्लों की तरह
और उनके मुँह से ऐसी आवाज़ें निकलने लगीं
जो इंसानों ने कभी इंसान की औलाद से सुनी न थीं

थर्रा गया अकबर इसके मायने समझकर
कलेजा उसके मुँह में आ गया
वह यह तो कहता था कि दुनिया में पैग़म्बर अनपढ़ हुए हैं
चुनान्चे हर ख़ान्दान में एक लड़का उसी तरह उम्मी छोड़ा जा सकता है
लेकिन बच्चों को इस तरह गूँगा देखने का माद्दा उसमें न था
उसने चीख़ कर हुक्म दिया बोलना शुरू हो यहाँ बेख़ौफ और मनचाहा
सौंप दो इन बच्चों को इनके वाल्दैन सरपरस्तों को
फ़ौरन ख़ाली करो इस मनहूस महल को
आइंदा यहाँ ऐसा कुछ न हो

यह पता नहीं चलता है
कि उन बच्चों के कोई अपने बचे भी थे या नहीं
उन बीस माजूरों को किस किसने पहचाना और अपनाया
उन्हे कभी कोई ज़ुबानें आई भी या नहीं
वे अपने घर बसा पाए या नहीं

चुन दिए गए गुंग महल के सभी रोशनदान खिड़की दरवाज़े
आसपास के गाँवों में अफ़वाह फैल गई
कि उसके भीतर से अब भी गूँगों की
जानवरों जैसी आवाज़ें आती हैं
धीरे धीरे ढह गया गुंग महल
कुछ बरसों तक रहे खण्हर में सियार लोमड़ियाँ और चमगादड़ें
आगरा के पास की इस शाही तज़िबागाह का तो क्या
उस फ़ैज़ाबाद का भी कोई नामोनिशान नहीं मिलता
जहाँ एक दिन पहले बादशाह सलामत ने मक़ाम फ़र्माया था

अकबरनामा में उस रात ज़िल्ले-इलाही की
तहज्जुद की नमाज़ की यह दुआ भी दर्ज़ नहीं है
कि कभार मैं तेरे नबी को लेकर हँस लेता था
लेकिन मेरे अल्लाह मेरा यह आज़मूदा कुफ़्र भी माफ़ कर
कि ख़ुदाई ज़ुबान जैसी कोई चीज़ नहीं है

वह शायद इसलिए कि जब अकबर ने यह फ़रियाद की
तो उसके बहुत कुछ जान चुके ज़ेहन का एक कोना
एक नए ख़ौफ़ के मारे हमेशा के लिए गूँगा हो चुका था

हर शहर में एक बदनाम औरत होती है

कोई ठीक-ठीक नहीं बता पाता उसके बारे में
वह कुँआरी ही रही आई है
या उसका ब्याह कब और किससे हुआ था
और उसके तथाकथित पति ने उसे
या उसने उसको कब क्यों और कहाँ छोड़ा
और अब वह जिसके साथ रह रही है या नहीं रह रही
वह सही-सही उसका कौन है
यदि उसको संतान हुई तो उन्हें लेकर भी
स्थिति अनिश्चित बनी रहती है

हर शहर में एक बदनाम औरत होती है

नहीं वह उस तरह की बदनाम औरतों में नहीं आती
वरना वह इस तरह उल्लेखनीय न होती
अकसर वह पढ़ी-लिखी प्रगल्भ तथा अपेक्षाकृत खुली हुई होती है
उसका अपना निवास या फ्लैट जैसा कुछ रहता है
वह कोई सरकारी अर्धसरकारी या निजी काम करती होती है
जिसमें ब्यूटी सैलून नृत्य-संगीत स्कूल रेडियो टी०वी०, एन०जी०ओ० से लेकर
राजनीतिक तक कुछ भी हो सकता है
बताने की ज़रूरत नहीं कि वह पर्याप्त सुंदर या मोहक होती है
या थी लेकिन इतनी अब भी कम वांछनीय नहीं है

जबकि सच तो यह है कि जो वह वाकई होती है उसके लिए
सुंदर या खूबसूरत जैसे शब्द नाकाफ़ी पड़ते हैं
आकर्षक उत्तेजक ऐंद्रिक काम्या
सैक्सी वालप्चुअस मैन-ईटर टाइग्रेस-इन-बेड आदि सारे विशेषण
उसके वास्ते अपर्याप्त सिद्ध होते हैं
अकसर तो उसे ऐसे नामों से पुकारा जाता है
जो सार्वजनिक रूप से लिए भी नहीं जा सकते
लेकिन बेशक वह जादूगरनियों और टोनहियों सरीखी
बल्कि उनसे अधिक मारक और रहस्यमय
किसी अलग औरत-ज़ात कर तरह होती है
उसे देखकर एक साथ सम्मोहन और आतंक पैदा होते है।

वह एक ऐसा वृत्तान्त ऐसी किंवदंती होती है
जिसे एक समूचा शहर गढ़ता और संशोधित-संविर्द्धत करता चलता है
सब आधिकारिक रूप से जानते हैं कि वह किस-किस से लगी थी
या किस-किस को उसने फाँसा था
सबको पता रहता है कि इन दिनों कौन लोग उसे चला रहे हैं
कई तो अगल-बगल देख कर शनाख़्त तक कर डालते हैं
कि देखो-देखो ये उसे निपटा चुके हैं
उन उनकी उतरन और जूठन है वह
स्वाभाविक है कि यह जानकारियाँ सबसे ज़्यादा और प्रामाणिक
उन दुनियादार अधेड़ों या बुजुर्ग गृहस्थों के पास होती हैं
जो बाक़ी सब युवतियों स्त्रियों को साधिकार बिटिया बहन भाभी कहते हैं
सिर्फ़ शहर की उस बदनाम औरत को उसके नाम से पुकारते हैं
और वह भी मज़बूरन
और उसकी संतान हुई तो कभी उसके मामा नाना या चाचा नहीं बनते

उस बदनाम औरत के विषय में अकसर इतने लोग बातें करते हैं
खुद उससे इतने लोग अकसर बातें करते या करना चाहते हैं
उसके पूर्व या वर्तमान प्रेमियों से इतने लोग इतना जानना चाहते हैं
उसके साथ इतने लोग संयोगवश दिखना चाहते हैं
उसे इतनी जगहों पर उत्कंठा और उम्मीद से बुलाया जाता है
कि यह निष्कर्ष अपरिहार्य है कि उसका वजूद और मौजूदगी
किसी अजीब खला को भरने के लिए दुर्निवार हैं
जो औरतें बदनाम नहीं हैं उनका आकर्षक दुस्वप्न
और उनके उन मर्दों के सपनों का विकार है वह बदनाम औरत
जो अपनी पत्नियों को अपने साथ सोई देखकर
उन्हें और अपने को कोसते हैं
सोचते हैं यहां कभी वह औरत क्यों नहीं हो सकती थी
उसके सफल कहे जानेवाले कथित प्रेमियों के बारे में सोचते हैं
कि ऐसी सस्ती औरत ही स्वीकार कर पाती होगी इतने घटिया लोगों को
फिर सोचते हैं सब झूट बोलते हैं कमीने शेखीबाज़
ऐसी चालू औरत ऐसों को हाथ तक नहीं रखने देती
आशंका और आश्वस्ति के बीच वे अपनी सोती पत्नियों को देखते
उसके सद्गुणों से द्रवित बाधामुक्त होते हैं

अध्ययन से मालूम पड़ जाएगा
कि शहरों की ये बदनाम औरतें बहुत दूर तक नहीं पहुंच पातीं
निचले और बीच के तबकों के दरमियान ही आवाजाही रहती है इनकी
न उन्हें ज्यादा पैसा मिल पाता है और न कोई बड़ा मर्तबा
वे मंझोले ड्रांइगरूमों औसत पार्टियों समारोहों सफलताओं तक ही
पहुंच पाती हैं क्योंकि उच्चतर हलक़ों में
जिन औरतों की रसाई होती है वे इनसे कहीं ज़हीन और मुहज्जब होती हैं

ऐसी बदनाम औरत को अलग-अलग वक्तों पर
जिनके साथ वाबस्ता बताया जाता है
क्या वाकई वह उनसे प्रेम जैसा कुछ करती थीं और वे उससे?
क्या उन्होंने इससे फ़ायदा उठाया
या वह भी उतने ही नुक़सान में रहीं ?
क्या, जैसा कि एक खास रूमानियत के तहत माना जाता है ,
उसे किसी आदर्श संबंध की तलाश है?
या कि उसे िफ़तरतन हर छठे महीने एक नया मर्द चाहिए
या वह अपनी बनावट में के उन संवेगों से संचालित है
जिन्हें वह भी नहीं समझती?

कुछ कह नहीं सकते
ऐसी किसी औरत से कभी किसी ने अंतरंग साक्षात्कार नहीं लिए हैं
न उसका मनोवैज्ञानिक अध्ययन किया गया है
और स्वयं अपने बारे में उसने अब तक कुछ कहा नहीं है
उसे हंसते तो अकसर सुना गया है
लेकिन रोते हुए कभी नहीं देखा गया

यह तो हो नहीं सकता कि उस बदनाम औरत को
धीरे-धीरे अपनी शक्तियों का पता न चलता हो
और इसका कि लोग उससे कितनी नफ़रत करते हैं
लेकिन कितनी शिद्दत से वे वह सब चाहते हैं
जो वह कथित रूप से कुछ ही को देती आयी है
बदनाम औरत जानती होगी कि वह जहां जाती है
अपने आसपास को स्थाई ही सही लेकिन कितना बदल देती है
कभी-कभी सार्वजनिक या एकांत उसका अपमान होता होगा
शायद वह भी किसी को तिरस्कृत करती हो
फ़ाहशा कहलाने का जोखिम उठाकर
घर और दफ्तर में उसे घिनौने और डारावने फोन आते होंगे
अश्लील चिटि्ठयों की वह आदी हो चुकी होगी
रात में उसके बरामदे के आगे से फिब्तयां कसी जाती होंगी
खिड़कियों के शीशे पत्थरों से टूटते होंगे
यदि वह रिपोर्ट दर्ज़ करवाने जाती भी होगी
तो हर वर्दीवाला उसकी तरफ़ देखकर मुस्कराता होगा

जो औरतें बदनाम नहीं हैं
उनका अपनी इस बदनाम हमज़ात के बारे में क्या सोच है
इसका मर्दों को शायद ही कभी सही पता चले
क्योंकि औरतें मर्दों से अकसर वही कहती हैं
जिसे वे आश्वस्त सुनना चाहते हैं
लेकिन ऐसा लगता है कि औरतें कभी किसी औरत से
उतनी नफ़रत नहीं करतीं जितनी मर्दों से कर सकती हैं
और बेशक उतनी नफ़रत तो वे वैसी बदनाम औरतों से भी कर नहीं सकतीं
जितनी मर्द उससे या सामान्यत: औरतों से कर पाते हैं
अगर हर फुर्सत में एक नई औरत को हासिल करना अधिकांश मर्दों की चरम फंतासी है
तो बदनाम औरत भी यह क्यों न सोचे
कि अलग-अलग या एक ही वक्फ़े में कई मर्दों की सोहबत भी
एक शग़ल एक खेल एक लीला है
और कौन कह सकता है कि उसमें सिर्फ़ वहीं गंवाती है
संभव है कि औरतों में ही इसे लेकर मतभेद हों
लेकिन यदि मर्द औरत का इस्तेमाल कर सकता है
तो बदले में औरत उसका इस्तेमाल क्यों न करे
और आखिरी बात तो यह
कि यदि मर्द को हर दूसरे दिन एक नया जिस्म चाहिए
तो औरत वह बदनाम हो नेकबख़्त
वैसा ही चाहे तो यह उसका हक़ कैसे नहीं?

शहर की ऐसी बदनाम औरत
यदि वाकई भयभीत और शोकार्त होती होगी
तो शायद उस क्षण की कल्पना कर
जब एक दिन वह अपनी संतान का अपमान जानेगी या देखेगी
या उसे अचानक बदला हुआ पाएगी
उसकी आंखों में पढ़ेगी वह उदासी और हिकारत
देखेगी उसका दमकता चेहरा अचानक बुझा हुआ
समझ जाएगी कि उसके बारे में सही और ग़लत सब जान लिया गया है
कोई कैिफ़यत नहीं देगी वह शायद
सिर्फ़ इंतज़ार करेगी कि उसकी अपनी कोख से बना हृदय तो उसे जाने
और यदि वैसा न भी हुआ
तो वह रहम या समझ की भीख नहीं मांगेगी
सबको तज देगी अपने अगम्य अकेलेपन को नहीं तजती
शहर की वह बदनाम औरत

ऐसी औरत के आख्यान खुद उससे कहीं सर्वव्याप्त रहते हैं
वह कब छोड़कर चली जाती है शहर
और किस वास्ते किसके साथ यह मालूम नहीं पड़ता
फिर भी उसे जहां-तहां एकाकी या युग्म में देखे जाने के दावे किए जाते हैं
ऐसी औरत की देह के
सामान्य या अस्वाभाविक अवसान का कभी कोई समाचार नहीं मिलता
कभी-कभी अचानक किसी नामालूम रेल्वे स्टेशन या रास्ता पार करती भीड़
या दोपहर के सूने बाज़ार में अकेली वह वाकई दिखती है अपनी ही रूह जैसी
उसकी उम्र के बावजूद उसकी बड़ी-बड़ी आंखों उसकी तमकनत से
अब भी एक सिहरन दौड़ जाती है
उसकी निगाहें किसी को पहचानती नहीं लगतीं
और लोगों और चीज़ों के आर-पार कुछ देखती लगती हैं
शायद वह खोजती हो या तसव्वुर करती हो अपने ही उस रूप का
स्वायत्त छूटकर जो न जाने कहां किसमें विलीन हो चुका ले चुका अवतार
शायद उसी या किसी और शहर की अगली बदनाम औरत बनकर !

मौत और उसके बाद

 विष्णु खरे की पहली कविता का एक अंश। यह कविता कवि द्वारा ” विष्णु कान्त खरे ‘ शैलेश ‘ नाम से लिखी गई थी

मुझे शायद याद करें वे टिमटिमाते तारे
रातों में जिन्हें देखता था मैं
मुझे न पाकर रोएँगें मेरे पागल विचार
अनजाने ही जिन्हें था लेखता मैं
बरखा मुझे न देखकर कहे
” क्या चल दिया वह ? “

और आवारा बादलों का टुकड़ा न रहे
पूछ बैठे ” नहीं रहा क्या वह
एक ही, बस एक ही पागल जो
हमें था देखता और मुस्कुराया ? “

मेरी चिता पर नहीं होंगे किसी के
अश्रु, स्मृति में चढ़ाए फूल
बाद दो दिन के दिखावे के, रोने के,
सभी जाएँगे मुझको भूल
क्या हुआ जो सिरफिरा इक मर गया ?
जगत के आनन्द में कम क्या कर गया ।

परस्पर

साथ का आख़िर यह भी कैसा मकाम
कि आलिंगन और चुम्बन तक से अटपटा लगने लगे
ऐसे और बाक़ी शब्द भी अतिशयोक्ति मालूम हों
इसलिए उन्हें एकांत किसी जगह पर भी
महज एक-दूसरे के हाथ छूते हुए से बैठना होगा
सामने से गुज़रने वाले इक्का-दुक्का लोगों को
यह देख कर भी कुछ अजब-सा लगेगा
जहाँ ज़रा भी कुछ अलग करना नुमाइश हो जाना है
और थोड़ी दूर से उनकी खिलखिलाहट उन तक पहुँचेगी
और शायद एक लम्हे के लिए वे एक-दूसरे को फ़कत देखेंगे
उनके हिस्से की धरती
सांझ की छाया की ओर घूम रही होगी
सूरज के डूबने का भ्रम रचती हुई
और जब चेहरे और मंजर धुंधले पड़ने लगेंगे
रात का कोई पहला पक्षी कुछ बोलना शुरू करेगा
तब वे उसी तरह चुप उठेंगे
उनके बीच वह होगा
जो न फ़ासला है न नज़दीकी सिर्फ़ संग है
शायद वह उसकी उंगलियां छोड़ चुका होगा
और नीचे देखता चल रहा होगा
जबकि वह सामने देखती होगी और घटते उजाले में
उसकी वह सोच भरी किंचित मुस्कान दिखाई नहीं देगी
इसी तरह वे वापस आएंगे अपने चौथे मंजले पर
मन ही मन गिनते पाँच दर्जन सीढ़ियाँ लगभग बिना दिक़्क़त चढ़ते हुए
और या तो वह कहेगी कितने दिन हुए तुम्हारे हाथ की चाय पिये
और वह अपने खुफ़िया नुस्ख़े से उसे तैयार करेगा
या वह ख़ुद ही बिना कहे बना कर ले आएगी
उसकी आसूदा उसाँस उफ़ान की झुलसती आवाज़ में डूबती हुई
उनकी आंखें स्वाद रंगत और गर्माहट पर सहमत होंगी
परस्पर आख़िरी घूंट तक

गूँगा

वह एक छोटा कौआ है जो अभी उड़ना सीख नहीं पाया है
घिरा हुआ और घबराया हुआ
उसके काले पंख कुछ कम काले हैं मटमैला शरीर कुछ ज़्यादा उजला
वह लँगड़ाता हुआ फुदक रहा है
और चीखने के लिए जब चोंच खोलता है तो वह लाल है अन्दर से

लड़कों ने उस पर पत्थर फेंके हैं
और वह फड़फड़ा कर यहाँ वहाँ असफलता से घुसा है
ऊपर मण्डराते हुए कौओं का और नीचे पिछवाड़े बँधे हुए कुत्तों का
शोर इतना तेज़ है
कि घबराई हुई माएँ निकल आती हैं घरों के पीछे
और डरी हुई रोकती हैं लड़कों को उसे मारने से

गूँगे की माँ नहीं है अभी कि उसे रोके
वह लपक कर छोटे कौए को हाथों में पकड़ लेता है
और आतंकित और उत्तेजित लड़कों और औरतों के बीच से
भाग जाता है लोहे के अपने दरवाज़े की तरफ़
लड़कों का झुण्ड उसके पीछे है
और कौए शोर करते हुए उसके साथ उड़ते हैं

गूँगे के हाथ की पकड़ भरपूर है
छोटे कौए ने पहले उसे आश्रय समझा होगा
किन्तु अब असहायता और आतंक की अन्तिम दशा में है
पाँच उँगलियों में कसा हुआ चुपचाप

गूँगे की आँखें देखती हैं कौए की आँख में
कौए का गरम जिस्म और घबराया हुआ दिल
धड़कता है उसकी गिरफ़्त में और जब भी
वह हिलता है तो गूँगा उसे मारता है सिर पर
झटके और वार के कारण कौए की चोंच खुलती है
जिसका अन्दरूनी रंग गूँगे के मसूढ़ों की तरह लाल है

नीचे मण्डराते हुए कौओं से बच कर
गूँगा छिपा हुआ है सूनी कोठी के गैराज में
छोटे कौए को हाथ में लिए हुए
उसे कुछ देर तक देख-देख कर मारता हुआ
या अपने तईं पुचकारता हुआ

और कौआ अब बहुत चुप है
यदि उसे दिमाग मिला होता
जो गूँगे से भी छीन लिया गया था दस बरस पहले
तो इस क्षण वह शायद सोचता
कि यह किसके किए की सज़ा कौन उसे दे रहा है

लड़के इकट्ठा हैं लोहे के दरवाज़े के पास
उड़ते हुए कौओं के मण्डराने और शोर में कुछ परेशानी है
गूँगे के हाथ में छोटे कौए ने
अब गर्दन डाल दी है
और वह उसकी आँख खोलने के लिए उसे हिलाता है

दौड़ कर दरवाज़े के पास चुप खड़े लड़कों के पास जाता है
जो अब उसके हाथ में बेहरकत पड़े हुए कौए को
लेना नहीं चाहते
और उसकी पीठ पर मार कर
दूर नाली में फेंक आने को कहते हैं

गूँगा जाता है अपनी मुट्ठी में सोए हुए-से
छोटे कौए पर सर झुकाए हुए
शोर करते हुए कौए उसकी परछाईं पर उड़ रहे हैं
लेकिन अब वह डर के परे हैं
नाली के पास पहुँच कर उसे फेंक देता है
घास उगे पानी में एक हलकी छप की आवाज़ होती है

गूँगा खड़ा देखता है
मुन्दी आँख बन्द चोंच और गीले होते हुए डैनों को

पार्क की ज़मीन पर कुछ दूर कौए बैठ गए हैं

उसके लौटने के इन्तज़ार में जब लड़के परेशान हो जाते हैं
तो क्या कर रहा है यह देखने पार्क में आते हैं

उसे नाली के पास वाली टूटी पुलिया पर
छोटा कौआ हाथ में लिए रोता हुआ पाते हैं ।

नए खेल

दूर
खेल से बहिष्कृत बालक सा
असीरगढ़
कनखियों से इस ओर देखता है

इधर
नेपा मिल की चिमनियाँ
किसी दिवालिए, मुद्दतों से तरसे हुए
सिगरेट प्रेमी सी
हिचकिचाती सी, मज़े ले-लेकर
धुआँ उगलती है

समझौतावादी धुआँ
किसी दुनिया देखे बूढ़े-सा
यत्नपूर्वक चलकर
असीर की रुष्ट मीनारों तक पहुँच
उसके प्राचीन, बधिर कर्णविवरों में
मैया का नूतन सन्देसा फुसफुसाता है

किन्तु
असीर और कुढ़ता है
तथा खेल से बहिष्कृत बालक-सा
मुँह फुलाए
(खेलने की इच्छा रखे हुए भी)
’ऊँह’ की मुद्रा बनाए
वक्र खड़ा रहता है।

१९६०

लौटना

उसे जहाँ छोड़ा था
कभी-कभी वहाँ जाकर खड़ा हो जाता हूँ
कूडे़ के जिस अम्बार को देख
वह लपक कर दौड़ गया था
अब वहाँ नहीं है
दरअसल अब कुछ भी वहाँ उस दिन जैसा नहीं है
मैंने उसे आधे दिल से पुकारा भी था
कि अगर लौट आए तो उसे वापस ले जाऊँ
लेकिन वह सिर्फ़ एक बार मेरी तरफ़ देख कर
मुझे ऐसा लगा कि जैसे हँसता हुआ
कूड़ा खोदने में जुटा रहा

उसके बाद मैं चला आया लेकिन कई बार लौटा हूँ
वह जगह अब एकदम बदल चुकी है
नई इमारतों दूकानों की वजह से पहचानी नहीं जाती
वह कूड़ा भी नहीं रहा वहाँ
वह सड़क अंदर जहाँ जाती थी
उस पर भी कुछ दूर तक गया हूँ
वह या उससे मिलता-जुलता कुछ भी दिखाई नहीं देता
कभी कभी एकाध आदमी पूछ लेता है
किसे देखते हैं भाई साहब
नहीं यूँ ही या कोई और झूठ बोल कर चला आता हूँ
कई कारणों से वहाँ जाना कम होता गया है
और अब तो बहुत ज़्यादा बरस भी हो गए
फिर भी कभी लौटता हूं सारी उम्मीदों के खिलाफ़
और जहाँ वह कूड़े का ढेर था उससे कुछ दूर
वह उतनी ही देर
याद करता खड़ा रहता हूँ कि कोई मददगार फिर पूछे नहीं

एक दिन ऐसे जाऊंगा कि कोई मुझे देख नहीं पाएगा
और बिना पुकारे पता नहीं कहाँ से
वह झपटता हुआ तीर की तरह आएगा
पहचानता हुआ मुझे अपने साथ ले जाने के लिए

शुरुआत

अशोकनगर स्टेशन पर रात दो बजे
उन सैकड़ों की भीड़ देख कर दिल डूब गया था
अपनी स्लीपर की रिजर्व-सीट भले ही न छिने
तो भी डिब्बे में घुस कर वे चैन से सोने नहीं देंगे

लेकिन वे बिना किसी शोर-शराबे गाड़ी में दाखिल हुए
जिसको जहाँ बैठने या खड़े रहने की वाजिब जगह मिली
वह उस पर चुप रहा

ध्यान से देखा मैंने उन्हें
इस तरह के इतने मौन यात्री मैंने कभी देखे न थे
अधिकांश खद्दर के सादा-कपड़े पहने हुए
पैरों में सस्ते जूते भी कम किफ़ायती चप्पलें ज़्यादा
हरेक के कुर्ते-कमीज़ की जेब पर उसकी पहचान पर्ची लगी हुई

वे बाहर के अंधेरे वीरान में उस तरह चुप लग रहे थे
जैसे सदियों से वंचित शोषित अवमानित लोग
अपने जीवन अपनी आत्मा अपने अतीत में देखते हैं
और प्रतीक्षा करते हैं
लेकिन उनके शरीर की भाषा में एक संयम था
उनके चेहरों पर एक अपूर्व संकल्प कभी-कभी कौंध जाता था

बहुजन समाज के वे कार्यकर्ता
जिनमें कम्यूनिस्टों को छोड़ दीगर हर पार्टी के गिरोहों की
उठाईगीरी और उचक्केपन का अविश्वसनीय अभाव था
अपनी भोपाल की रैली के लिए कब बेआवाज़ उतर गए
मुझे अपनी नींद में मालूम न पड़ा

लेकिन मुझे ख़ूब याद है
मैंने उन्हें उत्तर प्रदेश के शहरों और कस्बों में
उनके दफ़्तरों में देखा है
जहाँ उनका सिर्फ़ एक नुमाइंदा पत्रकारों से बात करता था
आत्मसम्मान और गरिमा भरी मितभाषी तार्किकता और दृढ़ साफगोई से
और उसके आसपास बाकी सारे ऐसे ही कार्यकर्त्ता
उसे तल्लीन मौन वर्ग-गर्व से देखते थे-
उन दृश्यों से मुझे हमेशा लेनिन को घेरे हुए
दमकते चेहरों वाले बोल्शेविक काडरों की तस्वीरें याद आती थीं-
मैंने उन्हें आम्बेडकर साहित्य और महात्मा फुले की जीवनी ख़रीदते देखा है
उन्होंने कभी-कभी मुझसे बातें भी की हैं
गुंडागीरी अश्लीलता और शोहदेपन का उनमें नाम नहीं

तुम जो उनके कथित नेताओं के कदाचार से इतने ख़ुश हो
खुश हो कि तुम्हारे जितना पतित होने में उन्हें कितना कम वक़्त लगा
और सोचते हो कि तुम्हारी आँखों में ये नीच लोग
इसी तक़दीर के काबिल हैं
अव्वल तो तुम यह भूलना चाहते हो
कि द्विजों के पाँच हज़ार वर्षों के पाशविक-तंत्र में
यही सम्भव है और कुछ दिन और रहेगा
कि रिश्वतखोर और धूर्त सवर्ण साथ दें
एक पथभ्रष्ट उनके लिए अस्पृश्य नेतृत्व का
और दूसरे तुमने वे चेहरे देखे नहीं है
जो इस किमाश के वंचित नेताओं बुद्धिजीवियों के नहीं हैं
बल्कि अभी तक सताए जा रहे निम्नतम वर्गों के हैं
लेकिन जिनकी आस्था और एकजुटता मैंने देखी है
जो न बिके हैं और न गिरे हैं न गिरेंगे
वे ही एक दिन पहचानेंगे
मायावी राजनीति की काशी करवटों के असली चेहरे
शनाख़्त करेंगे हर जगह छिपे हुए
मनु कुबेर और लक्ष्मी के दास-दासियों की अपने बीच भी
तुम्हारी द्विज राजनीति पिछले सौ वर्षों में सड़ चुकी है
और तुम उस मवाद को इनमें भी फैलती समझ कर सुख पाते हो,
लेकिन इनकी आँखों में और इनके चेहरों पर जो मैंने देखा है
उससे मैं जानता हूँ
कि तुम्हारे पाँच हज़ार वर्षों की करोड़ों हत्याओं के बावजूद
ये मिटे नहीं हैं और अब भी तुम्हारे लिए पर्याप्त हैं
तुम्हारे साथ अपने कठिन युद्ध का यह मात्रा प्रारम्भ है उनका
फिर तुम देखोगे कि अपने दूसरे समानधर्मा भी पहचान लेंगे ये
जो पहले से ही सक्रिय हैं
और इसी दुहरी समझ से अंततः जन्म लेंगे
और किसी द्विज कुल में कभी नहीं
बल्कि जैसे कई जो बुद्ध के बाद विष्णु के नये अवतार नहीं होंगे
मात्र मुक्तिदाताओं में होंगे हमारे
अपने समूचे समाज के और तुम्हारे सारे कलुष के

अक्स

आईने में देखते हुए
इस तरह इतनी देर तक देखना
कि शीशा चकनाचूर हो जाये-
फिर भी इतना मुश्किल नहीं

वह शीशे में
यूँ और इतना देखना चाहता है
कि बिल्लौर में तिड़कन तक न आये
सिर्फ़ जो दिख रहा है वह पुर्जा-पुर्जा हो जाए
और जो देख रहा है वह भी
फिर भी एक अक्स बचा रहे
जिसका वह है उसे जाने कैसे देखता हुआ

आगाही

रात काफ़ी गुज़र जाने पर कहीं कोई जो कुत्ता रोने लगता है, दरअसल वह रोता नहीं होगा क्योंकि न तो उसके कराहने-सुबकने की आवाज़ आती है न ही उसके आँसू टपकने के कोई निशान मिलते हैं बस देखने वाले बताते हैं कि आसमान की तरफ मुँह उठा कर वह लगातार एक अजीब सुर निकालता है जो बेशक रात के बियाबान में भयावह लगता है जिससे सुनने वालों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं और उन्हें अपने पर विपत्ति की तबाही की और मृत्यु तक की डरावनी कल्पनाएँ आने लगती हैं क्योंकि ऐसा खौफ़जदा विश्वास चला आता है कि कुत्ता ऐसा तभी करता है जब उसे कुछ ऐसा अपने आसपास आता दिखाई या सुनाई देता है या कोई पूर्वाभास हो जाता है जो आदमियों को नहीं होता और जो इस कुछ के बारे में भी डर कर बोलते हैं क्योंकि उनका संकेत प्रेतों-डायनों और मौत की तरफ़ रहता है और चूँकि अशुभ का नाम नहीं लिया जाना चाहिए – जैसे रात में लोग साँप को साँप नहीं कीड़ा कहते हैं – इसलिए वे सिर्फ़ इशारों में इशारे करते हैं जबकि किसी वैसे कुत्ते की तरफ़ से कभी ऐसा दावा नहीं किया गया है कि वह उस कुछ को देख लेता है वह तो वही करता है जिसे हम रोना कहते हैं और जिसे सुन कर उसके पास के दूसरे कुत्ते भौंकने लगते हैं साथ ही ऐसा शक होता है कि दूर से भी कहीं एक और वैसी ही रोने की आवाज़ सुनाई पड़ रही है फिर कुछ लोग हिम्मत करके खिड़की खोल उसे गालियाँ या चेतावनी भी देते हैं या पत्थर वगैरह फेंक कर उसे खदेड़ने-चुप करने की कोशिश करते हैं लेकिन वह कुछ दूर जाकर फिर वही करने करने लगता है यानी जिसे रोना कहा जाता है मगर बजाय इसके कि यह जानने की कोशिश की जाए कि वह निरी भूख से रोता है या सर्दी-गर्मी-बरसात से या किसी और तकलीफ़ या शिकायत से या वाकई उसे कोई गंध आती है या आहट किन्हीं बढ़ते आते सायों की आकारों की या कि वह याद कर रहा है बीते हुए को या आगाह जो घटित होने वाला है उसके बारे में सब यही चाहते हैं कि उसका यह रोज़-रोज़ का डरावना बेवक़्त रोना बंद हो किसी तरह वरना वे अपने सिखाए हुए घरेलू पहरेदार जानवरों को इकट्ठा उस पर छुड़वा देंगे या उसे पिंजरे में पकड़वा कर भिजवा देंगे या ज़हर दिलवा देंगे या रेबीस है कह कर गोली से मरवा देंगे।

हिन्दी मालवी में एक अरज

नईं साब हम उधर फैजाबाद से नईं अई रिया था
हम तो रतलाम में चढ्या था
ये बई या छोरा म्हारा नईं
पन हम लोग दरवज्जे के नजीक
संडास से सलंग बठी गिया था कईं करां
गर्दी भोत थी टिकट हमारे कने थी
रात मां कईं मालम पड़े हजूर के रिजरब कम्पाट है

हां साब कुछ झन खूप चिल्लई रिया था
डब्बा में से चढ़ी उतरी रिया था
खूप धूम मस्ती थी सरकार
हमसे भी किया जोर से जै बोलो रे
नईं बोलते तो कईं पतो मारता पीटता उतारी देता

नईं साब अपने को नईं मालम पलेटफारम पे कईं हुयो
उतर के देखता तो अपनी या जगा भी चली जाती

फेर गाड़ी धकी तो अचानचक दग्गड़ फत्तर चलने लगा
कंसरे में से किरासन कूड़ने लगे
हमने भोत हाथ पैर जोड़े हुकम
पन हम दबी गये
मालम नईं पड़ा के कुचला के मरे
के अंगार में जल दे हजूर
हमने कभी किसी का कुछ नईं किया
में मजूरो की तलास में अमदाबाद जई रिया था काकासाब
ये बई ओर यो इसका छोरा अपने गाँव

आपके मन में सुना है भोत दया है
म्हारे जैसा बेकसूर मरने वाला के लिए हजूर
इसी कारन अरज करने हाजर हो गये दासाब
हमारी भी कुछ सुनवाई सनाखत हो
कुछ तो इंसाप हो मायबाप
हमारी बात कोई नईं बोलता
हमें तो अबार तक मालम नईं के बात कईं थी
हम तो बसे बोगी के फरस पर जरा सी जगा में बठी गया था मालक
इत्ती बड़ी गाड़ी थी सरकार हमें जाना मो भोत दूर नईं था
चार कलाक में अमदाबाद पोंहची जाता हुकम

पाठांतर

उम्र ज़्यादा होती जाती है
तो तुम्हारे आस-पास के नौजवान सोचते हैं
कि तुम्हें वह सब मालूम होगा
जो वे समझते हैं कि उनके अपने बुजुर्गों को मालूम था
लेकिन जो उसे उन्हें बताते न थे
सो वे तुमसे उन चीज़ों के बारे में पूछते हैं
जिन्हें तुम ख़ुद कभी हिम्मत करके
लड़कपन में अपने बड़ों से पूछते थे
और तुम्हें कोई पूरा तसल्लीबख़्श जवाब मिलता न था
फिर भी उतनी व दूसरी सुनी-सुनाई बहुत-सी बातें
प्रचलित रहती ही थीं
और अलग-अलग रूपांतरों में दुहराई जाकर
वे एक प्रामाणिकता हासिल कर लेती थीं
सो तुम भी उन कमउम्रों को कमोबेश वही बताते हो
अपनी तरफ से उसे कम से कम अविश्वसनीय बनाते हुए
उस यकीन के साथ जो
एक ख़ालिस लेकिन लम्बी बतकही पर आश्रित रहता है
और वे हैरत में एक दूसरे को देखते हैं
और तुम्हें काका या दादा सम्बोधित करते हुए
आदर से बोलते हैं कि आपको कितना मालूम है
अब तो इससे चौथाई जानने वाले लोग भी नहीं रहे
आपसे कितना कुछ सीखने-जानने को है-
और अचानक तुम्हें अहसास होता है
कि जो तुमने उन्हें बताया उसे अपनी सचाई बनाते हुए
जब ये लोग अपने वक़्त अपने नौजवानों से मुख़ातिब होंगे
तो तुम जैसों के हवाला बना कर या न बना कर
वही दुहरा रहे होंगे
जो तुम्हें अनिच्छा से बताया था तुम्हारे बुजुर्गों ने
अपने बड़ों से उतनी ही मुश्किलों से पूछ कर
लेकिन उस पर एक अस्पष्ट यक़ीन करके
और उसमें अपनी तरफ़ से कुछ भरोसेमंद जोड़ते हुए-
इस तरह धीरे-धीरे हर वह चीज़ प्रामाणिक होती जाती है
और हर एक के पास अपना उसका एक संस्करण होता है
उतना ही मौलिक और असली
और इस तरह बनता जाता होगा वह
जिसे किसी उपयुक्त शब्द के अभाव में
परम्परा स्मृति इतिहास आदि के
विचित्र किन्तु अपर्याप्त बल्कि कभी-कभी शायद नितांत भ्रामक
नामों से पुकारा जाता है।

संकल्प

सूअरों के सामने उसने बिखेरा सोना
गर्दभों के आगे परोसे पुरोडाश सहित छप्पन व्यंजन
चटाया श्वानों को हविष्य का दोना
कौओं उलूकों को वह अपूप देता था अपनी हथेली पर
उसने मधुपर्क-चषक भर-भर कर
किया शवभक्षियों का रसरंजन
सभी बहरूपिये थे सो उसने भी वही किया तय
जन्मान्धों के समक्ष करता वह मूक अभिनय
बधिरों की सभा में वह प्रायः गाता विभास
पंगुओं के सम्मुख बहुत नाचा वह सविनय
किए जिह्वाहीन विकलमस्तिष्कों को संकेत-भाषा सिखाने के प्रयास
केंचुओं से करवाया उसने सूर्य-नमस्कार का अभ्यास
बृहन्नलाओं में बाँटा शुद्ध शिलाजीत ला-लाकर
रोया वह जन-अरण्यों में जाकर
स्वयं को देखा जब भी उसने किए ऐसे जतन
उसे ही मुँह चिढ़ाता था उसका दर्पन
अन्दर झाँकने के लिए तब उसने झुका ली गर्दन
वहाँ कृतसंकल्प खड़े थे कुछ व्यग्र निर्मम जन

नई रोशनी

 (नागार्जुन, भवानीप्रसाद मिश्र, रघुवीर सहाय के क़दमों में)

अव्वल चाचा नेहरू आए
नई रोशनी वे ही लाए

इन्दू बिटिया उनके बाद
नई रोशनी पाइन्दबाद

हुए सहायक संजय भाई
नई रोशनी जबरन आई

फिर आए भैया राजीव
डाली नई रोशनी की नींव

आगे बढीं सोनिया गाँधी
पीछे नई रोशनी की आँधी

सत्ता की वे नहीं लालची
मनमोहन उनके मशालची

राहुल ने तब तजा अनिश्चय
नई रोशनी की गूँजी जय

जब राहुल दुल्हन लाएँगे
नई रोशनियाँ हम पाएँगे

बहन प्रियंका अलग सक्रिय हैं
वड्रा जीजू सबके प्रिय हैं

ये खुद तो हैं नई रोशनी
इनकी भी हैं कई रोशनी

यह जो पूरा खानदान है
राष्ट्रीय रोशनीदान है

एकमात्र इसकी सन्तानें
नई रोशनी लाना जानें

क्या इसमें अब भी कुछ शक़ है
नई रोशनी इसका ही हक़ है

जब तक सूरज चान्द रहेगा
यह न कभी भी मान्द रहेगा

बीच बीच में नई रोशनी के आए दीगर सौदागर
लेकिन इस अन्धियारे को ही वे कर गए दुबारा दूभर

हर दफ़ा इसी कुनबे से गरचे है नई रोशनी सारी
फिर भी अन्धकार यह बार-बार क्यों हो जाता है भारी?

इनकी ऐसी नई रोशनी में जीवन जीना पड़ता है
यह क्लेश कलेजे में जंग-लगे कीले-सा हर पल गड़ता है

क्या हमीं नहीं मिलकर खींचें अपने हाथों की रेखाएँ
पहचानें नित नई रोशनी सबकी, उसे ख़ुद लेकर आएँ?

तभी

सृष्टि के सारे प्राणियों का
अब तक का सारा दुःख
कितना होता होगा यह मैं
अपने वास्तविक और काल्पनिक दुखों से
थोड़ा-बहुत जानता लगता हूँ
और उन पर हुआ सारा अन्याय?
उसका निहायत नाकाफ़ी पैमाना
वे अन्याय हैं जो
मुझे लगता है मेरे साथ हुए
या कहा जाता है मैंने किए
कितने करोड़ों गुना वे दुःख और अन्याय
हर पल बढ़ते ही हुए
उन्हें महसूस करने का भरम
और ख़ुशफ़हमी पाले हुए
यह मस्तिष्क
आख़िर कितना ज़िन्दा रहता है
कोशिश करता हूँ कि
अन्त तक उन्हें भूल न पाऊँ
मेरे बाद उन्हें महसूस करने का
गुमान करनेवाला एक कम तो हो जाएगा
फिर भी वे मिटेंगे नहीं
इसीलिए अपने से कहता हूँ
तब तक भी कुछ करता तो रह

असह्य

दुनिया भर की तमाम प्यारी औरतो और आदमियो और बच्चो
मेरे अपने लोगो
सारे संगीतों महान कलाओं विज्ञानों
बड़ी चीज़ें सोच कह रच रहे समस्त सर्जको
अब तक के सारे संघर्षों जय-पराजयों
प्यारे प्राणियो चरिन्दो परिन्दो
ओ प्रकृति
सूर्य चन्द्र नक्षत्रों सहित पूरे ब्रह्माण्ड
हे समय हे युग हे काल
अन्याय से लड़ते शर्मिंदा करते हुए निर्भय (मुझे कहने दो) साथियो
तुम सब ने मेरे जी को बहुत भर दिया है, भाई
अब यह पारावार मुझसे बर्दाश्त नहीं होता
मुझे क्षमा करो
लेकिन आख़िर क्या मैं थोड़े से चैन किंचित् शान्ति का भी हक़दार नहीं

जो मार खा रोईं नहीं

तिलक मार्ग थाने के सामने
जो बिजली का एक बड़ा बक्स है
उसके पीछे नाली पर बनी झु्ग्गी का वाक़या है यह

चालीस के क़रीब उम्र का बाप
सूखी सांवली लंबी-सी काया परेशान बेतरतीब बढ़ी दाढ़ी
अपने हाथ में एक पतली हरी डाली लिए खड़ा हुआ
नाराज़ हो रहा था अपनी
पांच साल और सवा साल की बेटियों पर
जो चुपचाप उसकी तरफ़ ऊपर देख रही थीं

ग़ु्स्सा बढ़ता गया बाप का
पता नहीं क्या हो गया था बच्चियों से
कु्त्ता खाना ले गया था
दूध दाल आटा चीनी तेल केरोसीन में से
क्या घर में था जो बगर गया था
या एक या दोनों सड़क पर मरते-मरते बची थीं
जो भी रहा हो तीन बेंतें लगी बड़ी वाली को पीठ पर
और दो पड़ीं छोटी को ठीक सर पर
जिस पर मुण्डन के बाद छोटे भूरे बाल आ रहे थे

बिलबिलाई नहीं बेटियाँ एकटक देखती रहीं बाप को तब भी
जो अन्दर जाने के लिए धमका कर चला गया
उसका कहा मानने से पहले
बेटियों ने देखा उसे
प्यार, करुणा और उम्मीद से
जब तक वह मोड़ पर ओझल नहीं हो गया

एबेण्डेण्ड

A B A N D O N E D

वे शायद हिन्दी में त्यागे या छोड़े नहीं जा सकते रहे होंगे
उर्दू में उनका तर्क या मत्रूक किया जाना कोई न समझता
इंग्लिश की इबारत का बिना समझे भी रोब पड़ता है
लिहाज़ा उन पर रोमन में लिखवा दिया गया अँग्रेज़ी शब्द
एबेण्डेण्ड

उनमें जो भी सहूलियतें रही होंगी वे निकाल ली गई होती हैं
जो नहीं निकल पातीं मसलन कमोड उन्हें तोड़ दिया जाता है
जिनमें बिजली रही होगी उनके सारे वायरों स्विचों प्लगों होल्डरों मीटरों के
सिर्फ़ चिन्ह दिखते हैं
रसोई में दीवार पर धुएँ का एक मिटता निशान बचता है
तमाम लोहा-लंगड़ बटोर लिया गया
सारी खिड़कियाँ उखड़ी हुईं
सारे दरवाज़े ले जाए गए
जैसे किन्हीं कंगाल फ़ौजी लुटेरों की ग़नीमत
कहीं वह खुला गोदाम होगा जहाँ
यह सारा सामान अपनी नीलामी का इन्तज़ार करता होगा

रेल के डिब्बे या बस में बैठे गुज़रते हुए तुम सोचते हो
लेकिन वे लोग कहाँ हैं जो इन सब छोड़े गए ढाँचों में तैनात थे
या इनमें पूरी गिरस्ती बसाकर रहे
कितनी यादें तजनी पड़ी होंगी उन्हें यहाँ
क्या ख़ुद उन्हें भी आखिर में तज ही दिया गया

जो धीरे-धीरे खिर रही है
भले ही उन पर काई जम रही है
और जोड़ों के बीच से छोटी-बड़ी वनस्पतियाँ उग आई हैं
और मुण्डेरों के ऊपर अनाम पौधों की कतार
सिर्फ़ वही ईंटें बची हैं
और उनमें से जो रात-बिरात दिन-दहाड़े उखाड़ कर ले जाई जा रही हैं
ख़ुशक़िस्मत हैं कि वे कुछ नए घरों में तो लगेंगी

पता नहीं कितने लोग फिर भी सर्दी गर्मी बरसात से बचने के लिए
इन तजे हुए हों को चन्द घण्टों के लिए अपनाते हों
प्रेमी-युगल इनमें छिप कर मिलते हों
बेघरों फकीरों-बैरागियों मुसीबतज़दाओं का आसरा बनते हों ये कभी
यहाँ नशा किया जाता हो
जरायमपेशा यहाँ छिपते पड़ाव डालते हों
सँपेरे मदारी नट बाजीगर बहुरूपिए कठपुतली वाले रुकते हों यहाँ
लंगूर इनकी छतों पर बैठते हों
कभी कोई चौकन्ना जंगली जानवर अपनी लाल जीभ निकाले हाँफता सुस्ताता हो

किस मानसिकता का नतीज़ा हैं ये
कि इन्हें छोड़ दो उजड़ने के लिए
न इनमें पुराने रह पाएँ न नए
इनमें बसना एक जुर्म हो

सारे छोटे-बड़े शहरों में भी मैने देखे हैं ऐसे खण्डहर होते मकान
जिन पर अबेण्डेण्ड छोड़ या तज दिए गए न लिखा हो
लेकिन उनमें एक छोटा जंगल और कई प्राणी रहते हैं
कहते हैं रात को उनमें से आवाज़ें आती हैं कभी-कभी कुछ दिखता है
सिर्फ़ सूने घरों और टूटे या तोड़े गए ढाँचों पर
आसान है छोड़ या तज दिया गया लिखना
क्या कोई लिख सकता है
तज दिए गए
नदियों वनों पर्वतों गाँवों कस्बों शहरों महानगरों
अनाथालयों अस्पतालों पिंजरापोलों अभयारण्यों
दफ़्तरों पुलिस थानों अदालतों विधानसभाओं संसद भवन पर
सम्भव हो तो सारे देश पर
सारे मानव-मूल्यों पर
किस-किस पर कैसे कब तक लिखोगे
जबकि सब कुछ जो रखने लायक था तर्क किया जा चुका

कभी एक फंतासी में एक अनन्त अन्तरिक्ष यात्रा पर निकल जाता हूँ देखने
कि कहीं पृथ्वियों आकाशगंगाओं नीहारिकाओं पर
या कि पूरे ब्रह्माण्ड पर भी कौन-सी भाषा कौन-सी लिपि में किस लेखनी से
कहीं कोई असम्भव रूप से तो नहीं लिख रहा है धीरे-धीरे
जैसे हाल ही में बनारस स्टेशन के एक ऐसे खण्डहर पर पहली बार लिखा देखा परित्यक्त

प्रलय-संकेत

                          कविता पूर्व कवि की टिप्पणी —
{मानव के नैतिक ह्रास के कारण अपरिहार्य, सृष्टि के अन्त के लक्षणों और पूर्वसंकेतों का जैसा वर्णन और भविष्यवचन प्राचीन भारतीय परम्परा में है, वैसा शायद और कहीं नहीं है. बाइबिल के पूर्वार्ध ‘ओल्ड टेस्टामेण्ट’ में जेरेमियाह नामक एक सन्त-मसीहा हैं, जिन्होंने ऐसी ही दारुण भविष्यवाणियाँ की हैं और इस तरह उनके लिए ‘जेरेमियाड’ शब्द प्रदान किया है, लेकिन भारतीय चेतावनियों के लिए ऐसा कोई प्रत्यय संस्कृत में नहीं मिलता और मात्र ‘अपशकुन’ इनके लिए अपर्याप्त है। निस्सन्देह ऐसी संकेतावलियों में हर युग और सभ्यता अपनी नैतिक अवनति और दुरावस्था का प्रतीकभास देखते आए हैं और भले ही मानव-जाति या सृष्टि का अन्त अभी न हुआ हो, महर्षि वेदव्यास विरचित ‘महाभारत’ में वर्णित दुर्दान्त अपशकुन, दु:स्वप्न और कुलक्षण इस इक्कीसवीं सदी में अधिक प्रासंगिक, आसन्न और अवश्यंभावी प्रतीत हो रहे हैं।

इस कविता को स्वीकृत, सुपरिचित अर्थों में पूर्णतः ‘मौलिक’ नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह गीताप्रेस, गोरखपुर द्वारा अपने सुविख्यात मासिक ‘कल्याण’ के अगस्त १९४२ के विशेषांक के रूप में प्रकाशित महाभारत-अनुवाद ‘संक्षिप्त महाभारतांक’ से प्राप्त, उत्थापित, शोधित, उत्खनित, अन्वेषित तथा आविष्कृत ( प्रबुद्ध पाठक जो चाहें सो कह लें) है। कुछ अंश अवश्य प्रक्षिप्त किए गए हैं, किन्तु भगवान कृष्णद्वैपायन के विश्व-काव्य में ऐसे प्रक्षेपणों को एक आपराधिक प्रमाद ही कहा जाएगा. तब भी यह दुस्साहसिक विनम्रता में यहाँ प्रस्तुत है।}

                             प्रलय-संकेत
(तुभ्यमेव भगवन्तम् वेदव्यासम्)

दिवस और रात्रि में कोई अन्तर नहीं कर पाता मैं दोनों समय ऐसे दीखते हैं जैसे सूर्य चन्द्र नक्षत्रों से ज्वालाएँ उठती हों
दोनों सन्धिवेलाओं में देखता हूँ दिवाकर को घेरे हुए एक मृत शरीर जिसके सिर भुजा जँघाएँ नहीं हैं
धधकती हैं दोनों सँध्याओं की दिशाएँ
अन्तरिक्ष में टकराते हैं धूमकेतु उल्काएँ ग्रह उपग्रह तारागण क्या गरजता है यह मेघों के बिना कौन-सी विद्युत् कौंधती है रात में बरसते हैं रक्त माँस-मज्जा
नदियों के जल में लहू पीब भ्रूण बहते दीखते हैं वे अपने उद्गमों को लौटने लगती हैं कूपों तालाबों नालों से विषैले झाग उठते हैं
पर्वतों से कौन-सा भयानक नाद उठता है यह उनके शिखर और शिलाएँ रेत जैसे ध्वस्त होते हैं
सागर उफनते हैं भूकम्प से अपने तट तोड़कर धरती को डुबोते हुए
दुर्गन्ध उठती है अग्नि से
कभी आकाश में सात सूर्य एक साथ उदित होते हैं मुण्ड और कबन्ध की तरह राहु और केतु कभी जुड़ते कभी अलग दीखते हैं चन्द्र के लुप्त होने पर कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष कब परिवर्तित होते हैं ज्ञात नहीं होता
नष्ट हो गई हैं मेरी इन्द्रियों की क्षमताएँ अपनी चेतना खो चुका हूँ मैं
वन्ध्या शाखाएँ वर्णगन्धहीन अवास्तव फलों से लद गई हैं जिन पर कोई नहीं मण्डराता जिन्हें कोई नहीं खाता हरे वृक्ष ठूँठ हो जाते हैं और जलने लगते हैं
कभी भी चलने लगते हैं डरावने बवण्डर उनसे बालुका नहीं पीसी हुई हड्डियों का चूर्ण बरसता है
मध्याह्न में अमावस्या की अर्धरात्रि का अन्धकार छा जाता है
ज्येष्ठ और वैशाख में लुप्त सरिताएँ नगरों को डुबो देती हैं मरुस्थल में दिन में हिमपात होता है सरीसृपों को मारता हुआ
एक गरुड़ दीखता है जिसके माथे पर चोटी और सींग हैं उसके तीन पँजे हैं और चोंच के स्थान पर चार दाढ़ें हैं
वृक्षों पर बैठे गीध श्येन और चील शवों की घात में नीचे देखते हैं कोकिलों शुकों मयूरों चातकों के कण्ठ से लपटें और चीत्कार निकलते हैं वे ध्वजों पर बैठकर उन्हें नोचते हैं
रात में एक पक्षी मण्डराता है जिसके एक आँख एक डैना एक पँजा है और जब वह क्रुद्ध होकर बोलता है तो ऐसे कि कोई रक्त वमन करता हो
गीध घरों में घुस आते हैं और जीवित मनुष्यों का माँस नोचते हैं आतँकित जो आर्तनाद तक नहीं कर पाते
आकाश कभी भी टिड्डियों से आच्छादित हो जाता है जो प्रत्येक हरित वनस्पति और जीवित प्राणियों को खाती हैं
गर्दभों को जनती हैं गायें हाथियों को खच्चरियाँ श्वानों को शूकरियाँ
तीन सींग चार नेत्र पाँच पैर दो मूत्रेन्द्रिय दो मस्तक दो पूँछ तथा अनेक दाढ़ों वाले अकल्पनीय पशु जन्म लेते हैं और वर्णनातीत भयावह वाणी में बोलते हैं
चूहे छछून्दर गोधिकाएँ चीटे तिलचट्टे सोते हुए स्त्री-पुरुषों के नख केश उँगलियाँ कुतरकर खाते हैं और उन्हें भान नहीं होता
सियार लोमड़ियाँ और लकड़बग्घे भरी दोपहर झुण्ड बनाकर निकलते हैं और कुत्तों बिल्लियों बछड़ों का आखेट करते हैं
बन्धे हुए पशु अचानक चौंकने-बिदकने लगते हैं पसीना-पसीना हो जाते हैं उनकी आँखों से आँसू और मूत्रेन्द्रिय से रक्त बहता है
अट्टालिकाओं पूजास्थलियों वाहनों के ध्वज काँपते हैं जलने लगते हैं मानवहीन रथ चलने लगते हैं
शस्त्रों से लपटें उठती हैं
पाकशालाओं की रसोई में कीड़े बिलबिलाते दिखाई देते हैं
जो इस पृथ्वी पर कहीं दिखाई नहीं देते ऐसे भीषण प्राणियों को जन्म देती हैं स्त्रियाँ जिनमें से कुछ एक साथ चार-चार पाँच-पाँच सन्तान उत्पन्न करती हैं जो जनमते ही नाचती गाती हँसती हैं
सारी मर्यादाएँ तोड़कर समस्त नारियाँ समस्त पुरुष परस्पर सम्भोग करते हैं अहर्निश हर सम्भव पापाचार होता है
सँग्राम से पलायन करते हैं अचानक नपुँसक हो गए नवयुवक धूर्तों दस्युओं वेश्यालयों के स्वामियों का क्रीतदास बनने के लिए जिनके समक्ष स्त्रियाँ स्वेच्छा से निश्शुल्क निर्वसन होती हैं
किस निद्रा किस मूर्च्छा में चल रहा हूँ मुझे ज्ञात नहीं मैंने कब नखों केशों दूषित वस्त्रों से अशुद्ध हुआ जल पिया या उससे स्नान किया अपने सँज्ञान में मैंने नहीं किया किसी रजस्वला किसी अगम्या से सहवास मुझसे नहीं हुई कोई ब्रह्महत्या तब कैसे पराभव हुआ मेरा
मेरे पास धनुष था किन्तु उसकी प्रत्यँचा तक न चढ़ा सका मैं मेरी भुजाओं में जो बल था अब नहीं रहा सभी बाण नष्ट हो चुके मेरे तूणीर में कोई सायक नहीं अपने किसी मन्त्रपूत अस्त्र का आह्वान नहीं कर सकता मैं मेरा पराक्रम नष्ट हुआ मेरे वंश का नाश हुआ
कौन से महापातक हुए मुझसे किसी पाप किसी महासँहार को रोक न सका मैं
अश्रुतपूर्व महारोग फैलते हैं अकल्पनीय अपराध होते हैं माता पिता पुत्र पुत्री भ्रातृ भगिनी पति पत्नी परस्पर हत्याएँ करते हैं नर-माँस से कोई घृणा नहीं करता
मरीचिकाओं में दिखती है स्वर्णनगरियों कल्पवृक्षों अप्सराओं अट्टालिकाओं की अमरावती जिसकी दिशा में दौड़ते हैं नर-नारी वो फिर लौटकर नहीं आते
लोग सत्पुरुषों पूर्वजों पूज्यों हुतात्माओं से द्वेष और उनकी निंदा करते हैं आराध्य और अवतारों का ही नहीं सत्गुरुओं का तिरस्कार होता है गुरुकुलों में हत्याएँ होती हैं
बालक विकलाँग होकर नाचते-गाते अट्टहास करते हैं शस्त्रास्त्र लेकर वे मूर्तियाँ उकेरते और बनाते हैं परस्पर आक्रमण करते हैं कृत्रिम नगर बसाकर युद्ध करते हुए उन्हें वे नष्ट कर देते हैं
देवताओं की मूर्तियाँ काँपती अट्टहास करती रक्त उगलती खिन्न और ध्वस्त होती हैं आश्रम और पूजागृह धूलिसात हो जाते हैं
जब मन्त्रोच्चार और जप किया जाता है तो ऐसा सुनाई देता है जैसे कुछ मानव-समूह आक्रमण कर रहे हों किन्तु कोई दिखाई नहीं पड़ता
किन्हीं दूसरे लोकों से आए राक्षसों जैसे प्राणी धन आभूषण छत्र कवच ध्वजा सहित नगरवासियों का भक्षण करते हैं
जब पूजा-अर्चना के वाद्य बजाए जाते हैं तो सूने घरों से घोर स्वर उठते हैं
जलते हुए खण्डहर दिखाई देते हैं जिनसे दीन-हीनों अनाथों का विलाप सुनाई देता है
पुरातन यम और शाश्वत मृत्यु के स्थान पर यह कौन-सी नवीन, कैसी नूतन मृत्यु है यह जो न स्वर्ग ले जाती है और न नरक
लोग स्वप्नों में देखते हैं एक विकराल कृत्या जो अपने अस्थियों जैसे सफ़ेद दांत दिखाती हुई आई है और स्त्रियों के आभूषण लूटती हुई सारे नगर में दौड़ रही है
अपना काला और पीला सिर मुण्डाए हुए काल प्रतिदिन नगर के मार्गों पर चक्कर लगाता है भवनों प्रासादों अट्टालिकाओं उपवनों निवासियों नृपतियों को देर तक खड़ा देखता रहता है कभी दीखता है
कभी अदृश्य हो जाता है
फिर एक अट्टहास जो ब्रह्माण्ड के अन्त तक जाता गूँजता है।

आलैन

 तुर्की के पास डूबे सीरियाई बच्चे ‘आलैन’ की तस्वीर ने पूरी दुनिया को विचलित कर दिया था। इस दुर्घटना में उसका भाई ग़ालिब और माँ रेहाना की भी मृत्यु हो गई थी। हिंसा और युद्ध के सबसे पहले शिकार मासूम ही होते हैं। धार्मिक कट्टरता के भी सबसे पहले शिकार बच्चे ही होते हैं। तब पूरी दुनिया में ‘आलैन’ के लिए शोकसभाएँ की गई थीं, मार्मिक चित्र बनाए गए थे और कविताएँ लिखीं गई थीं। हिन्दी के कवि विष्णु खरे ने भी ‘आलैन’ के लिए यह कविता लिखी थी।

हमने कितने प्यार से नहलाया था तुझे
कितने अच्छे साफ़ कपड़े पहनाए थे
तेरे घने काले बाल सँवारे थे
तेरे नन्हें पैरों को चूमने के बाद
जूतों के तस्मे मैंने ही कसे थे
ग़ालिब ने सताने के लिए तेरे गालों पर गीला प्यार किया था
जिसे तूने हमेशा की तरह पोंछ दिया था
और अब तू यहाँ आकर इस गीली रेत पर सो गया
दूसरे किनारे की तरफ़ देखते हुए तेरी आँख लग गई होगी
जो बहुत दूर नहीं था
जहाँ कहा गया था तेरे बहुत सारे नए दोस्त तेरा इन्तिज़ार कर रहे हैं
उनका तसव्वुर करते हुए ही तुझे नींद आ गई होगी
क़िश्ती में कितने खुश थे तू और ग़ालिब
अपने बाबा को उसे चलाते देख कर
और अम्मी के डर पर तुम तीनों हँसते थे
तुम जानते थे नाव और दरिया से मुझे कितनी दहशत थी
तू हाथ नीचे डालकर लहरों को थपकी दे रहा था
और अब तू यहाँ आकर इस गीली रेत पर सो गया
तुझे देख कर कोई भी तरद्दुद में पड़ जाएगा कि इतना ख़ूबरू बच्चा
ज़मीं पर पेशानी टिकाए हुए यह कौन से सिजदे में है
अपने लिए हौले-हौले लोरी गाती और तुझे थपकियाँ देती
उन्हीं लहरों को देखते हुए तेरी आँखें मुन्दी होंगी
तू अभी-भी मुस्कराता-सा दीखता है
हम दोनों तुझे खोजते हुए लौट आए हैं
एक टुक सिरहाने बैठेंगे तेरे
नींद में तू कितना प्यारा लग रहा है
तुझे जगाने का दिल नहीं करता
तू ख़्वाब देखता होगा कई दूसरे साहिलों के
तेरे नए-नए दोस्तों के
तेरी फ़ूफ़ी तीमा के
लेकिन तू है कि लौट कर इस गीली रेत पर सो गया
तुझे क्या इतनी याद आई यहाँ की
कि तेरे लिए हमें भी आना पड़ा
चल अब उठ छोड़ इस रेत की ठण्डक को
छोड़ इन लहरों की लोरियों और थपकियों को
नहीं तो शाम को वे तुझे अपनी आग़ोश में ले जाएँगी
मिलें तो मिलने दे फ़ूफ़ी और बाबा को रोते हुए कहीं बहुत दूर
अपन तीनों तो यहीं साथ हैं न
छोड़ दे ख़्वाब नए अजनबी दोस्तों और नामालूम किनारों के
देख ग़ालिब मेरा दायाँ हाथ थामे हुए है तू यह दूसरा थाम
उठ हमें उनींदी हैरत और ख़ुशी से पहचान
हम दोनों को लगाने दे गले से तुझे
आ तेरे जूतों से रेत निकाल दूँ
चाहे तो देख ले एक बार पलट कर इस साहिल उस दूर जाते उफ़क को
जहाँ हम फ़िर नहीं लौटेंगे
चल हमारा इन्तिज़ार कर रहा है अब इसी ख़ाक का दामन।

उसाँस

कभी-कभी
जब उसे मालूम नहीं रहता कि
कोई उसे सुन रहा है
तो वह हौले से उसाँस में सिर्फ़
हे भगवन… हे भगवन… कहती है

वह नास्तिक नहीं लेकिन
तब वह ईश्वर को नहीं पुकार रही होती
उसके उस कहने में कोई शिक़वा नहीं होता

ज़िन्दगी भर उसके साथ जो हुआ
उसने जो सहा
ये दुहराए गए शब्द फ़क़त उसका खुलासा हैं

पर्याप्त

जिस तरह उम्मीद से ज़्यादा मिल जाने के बाद
माँगनेवाले को चिन्ता नहीं रहती
कि वह कहाँ खाएगा या कब
या उसे भूख लगी भी है या नहीं
वही आलम उसका है

काफ़ी दे दिया जा चुका है उसके कटोरे में
कहीं भी कभी भी बैठकर खा लेगा जितना मन होगा
जल्दी क्या है

बच जाएगा या खाया नहीं जाएगा
तो दूसरे तो हैं
और नहीं तो वही प्राणी
जो दूर बैठे उम्मीद से देख रहे हैं

दज्जाल

दज्जाल — इस्लामी क़यामत से पहले आनेवाला दानव, जिसका वध ईसा या मेहदी करेंगे। असद जै़दी का आभार, पहले हवाले के लिए।

न यह इस्फ़हान के रस्तक़ाबाद से आया है
न इसका नाम सफ़ी बिन सईद है
इस सदी में मुख्तलिफ़ मुल्कों में
मुख्तलिफ़ इस्मों से नाजि़ल हो रहे हैं दज्जाल
उनकी दोनों आँखें होती हैं अँगूर की तरह नहीं
कबन्ध की तरह
लोग पहले से ही कर रहे हैं इबादत इबलीस की
उनकी आँखों की शर्म कभी की मर चुकी
बेईमानी मक्र-ओ-फ़रेब उनकी पारसाई और ज़िन्दगानी बन चुके
अपने ईमान गिरवी रखे हुए उन्हें ज़माने हुए
उनकी मजबूरी है कि अल्लाह उन्हें दीखता नहीं
वरना वे उस पर भी रिबा और रिश्वत आज़मा लें
मशाइख़ और दानिश्वरों की बेहुर्मती का चौतरफ़ा रिवाज़ है
कहीं-न-कहीं कहत पड़ा हुआ है मुल्क में
क़त्ल और ख़ुदक़ुशी का चलन है
कौन-सा गुनाह है जो नहीं होता
दज्जाल ठीक यही कहता हुआ आएगा
उस दिन लगेगा कि सूरज पच्छिम से उगा है
क्योंकि वहीं से उभरेगा दज्जाल
इबलीस का ज़ाहिद-ओ-आबिद होगा वह
लेकिन उसकी मुख़ालिफ़त का स्वाँग करेगा
कहेगा उसी को नेस्तनाबूद करने उतरा है वह
सारी बदी को ख़त्म करने और नेकी का निज़ाम लौटाने का वादा करेगा
वह बक़्क़ाल शाहे-आदमज़ाद बनने के हौसले में
बेचेगा जन्नत के ख़्वाब कहेगा मेरा ही इन्तिख़ाब करो
और गुमराह क़ौमें उसके हाथों क़दमों और जि़ल्ल को चूमने लगेंगी
दीवानावार उसकी मोतकिद हो जाएँगी
फिर वह ऐलान करेगा कि नबूवत भी उसी की है
और ख़ुदाई भी उसी की
परस्तिन्दों को एक में ही
दोनों के दीदार-ओ-इबादत का सुभीता हो जाएगा
लेकिन दज्जाल अपनी असली किमाश को
कब तक पोशीदा रख सकता है
जब उसका दहशतनाक़ चेहरा सामने आएगा
और वह वही सब करेगा जिसके ख़िलाफ़ उतरने का
उसने दावा और वादा किया था
बल्कि और भी बेख़ौफ़ उरियानी और दरिन्दगी से
तो अगर तबाही से बचे तो ख़ून के आँसू रोते हुए अवाम
ज़मीन पर गिर कर छटपटाने लगेंगे
किसी इब्ने-मरिअम किसी मेहदी किसी कल्कि की दुहाई देते हुए
जो आए भी तो तभी आएँगे जब क़ौमें पहले ख़ुद खड़ी नहीं हो जाएँगी
दज्जाल की शनाख़्त कर शय्याद मसीहा के खि़लाफ़

जा, और हम्मामबादगर्द की ख़बर ला

(हातिम को सौंपी हुई आख़िरी ज़िम्मेदारी)

पहले मिलते हैं तनोमन्द दीवाने नौजवान जो डूब जाते हैं
बेरहम परीज़ादियों की सराबी मुहब्बत में
फिर कहीं आगे उन आदमज़ाद दोशीज़ाओं की नुमाइश होती है
जिन्हें अज़दहे पसन्द कर उठा ले जाते हैं
वहाँ होते हैं जिन्नात जिनके पास
किसी शय की कि़ल्लत नहीं होती

उकाब बबर कल्ब रूबा की मिली-जुली शक्लो-सूरत
वह कभी-भी अख्तियार कर लेते हैं
उनकी दुम शिगाल की मानिन्द होती है
लगता है उनकी आवाज़ जहन्नुम से आती है
वहाँ रेगिस्तान फ़िलिज़्ज़ के होते हैं
जहाँ सुनहरी ख़ारों की फ़सलें तलुओं को लहूलुहान कर डालती हैं

वहाँ कातान के बादशाह हर मुमकिन कोशिश करते हैं कि कोई
उनके तिलिस्मों तक न पहुँचे
पहुँचे तो उन्हें तोड़कर ज़िन्दा न लौटे

वहाँ दालाने-ग़ुस्ल की गुम्बद चट्टानों में बदल जाती है
इन्सान अगर वहाँ डूबता नहीं है
तो ख़ुद को सहरा में पाता है
फिर नमूदार होता है एक ऐवान
जिसके बाग़ के गुलों और मेवों से तस्कीन नहीं होती
जिसके अन्दर होते हैं मर्मर के मुजस्समे
एक कतार में खड़े
पैर से कमर तक पथराए हुए

वहाँ कफ़स में होता है उड़ता फड़फड़ाता
एक तोता इनसानों की ज़ुबान बोलता हुआ
जिसकी शिक्म में बादशाह क़ैयूमारात ने छिपा रखा है
दुनिया के नायाबतर हीरे को
और जो तीन तीरों में उस ख़ुद-रवाँ परिन्दे की गर्दन काट नहीं देता
वह पत्थर का होता जाता है

तीसरे तीर से जब तोते का सर धड़ से अलग हुआ
तब घन-गरज हुई बिजलियाँ कौंधीं अँधेरा छा गया
अपनी संगियत से रिहा हुआ मैं
सारे मुजस्समे ज़िन्दा हो गए वे सब मुझसे पहले आए थे
मेरे पैरों के पास पड़े हुए थे तीर-कमान
और यह हीरा जो मैं बतौर सुबूत साथ ले आया हूँ
लेकिन जिसे मुझे इसके हक़दारों को लौटाना है

वह तेरी आख़िरी पुर्सिश थी या मुराद
लेकिन उसका यही जवाब ला सका मैं ऐ हुस्नबानू
शुक्र है तेरी धाय को यह सात ही मालूम थीं
वर्ना मैं आजिज़ आ ही रहा था लगातार सामने नुमूदार नँगीमुनँगी हूरों
और मेरे चूतड़ों के गोश्त के लिए पीछा करनेवाले लज़्ज़तपसन्द भेड़ियों से
अभी न जाने कितने शुब्हो-सवाल मेरा इन्तिज़ार कर रहे हैं यमन में
कितनी जद्दोजहद
अच्छा हुआ तूने मुझे उनकी आदत डाल दी

लौटते हुए मुनीरशामी को बताता जाऊँगा कि अब तू उसकी हुई
परवरदिगार उसकी मुहब्बत और तेरी जौजि़यत को महफ़ूज़ रक्खे
तुम दोनों का कितना शुक्रिया अदा करूँ
जो तुम्हारी वजह से हासिल कर पाया
पसोपेश और मुसीबत के हर लम्हे में
हज़रत ख़्वाज़ा खि़ज़्र के मेहरबान मुक़द्दस साये की रहनुमाई को —
उनके पास दोनों जहान के सारे सवालों के हल हैं

फ़ासला

वर्णित मढ़ा-हुआ फ़ोटो मित्र-पत्रकार कुलदीप कुमार के ‘पायनियर’ कैबिन में लगा रहता था। यह कविता उस तस्वीर के अज्ञात फ़ोटोग्राफ़र को समर्पित।

थोड़ा झुका हुआ देहाती लगता एक पैदल आदमी
अपने बाएँ कन्धे पर एक झूलती-सी हुई वैसी ही औरत को ढोता हुआ
जो एक हाथ से उसकी गर्दन का सहारा लिए हुए है
जिसके बाएँ पैर पर पँजे से लेकर घुटने तक पलस्तर
दोनों के बदन पर फ़क़त एकदम ज़रूरी कपड़े
अलबत्ता दोनों नँगे पाँव
उनकी दिखती हुई पीठों से अन्दाज़ होता है
कि चेहरे भी अधेड़ और सादा रहे होंगे
दिल्ली के किसी चैंधियाते दिन में ली गई स्याह-सुफ़ैद तस्वीर थी वह
शायद 4.5 या सुपर 1200 एमएम टेलीलेंस वाले
किसी कैनन ए ई 1 या निकोर एफ़ 801 से खींची गई —
फ़ोटोग्राफ़र ने ख़ुद को मोहनसिंह प्लेस या खड़कसिंह मार्ग के
एम्पोरिअमों के सामने कहीं स्थित किया होगा
यह मान लेने में कोई हर्ज़ नहीं कि ले जाई जा रही औरत
ढोने वाले आदमी की ब्याहता ही रही होगी
लेकिन दूर-दूर तक दोनों के साथ और कोई (आख़िर क्यों) नहीं
सड़क के बाएँ से उन्हीं की दिशा में जाता हुआ
एक ख़ाली ऑटो वाला कुछ उम्मीद से यह मंज़र देखता है
दाईं ओर के एम्बेसेडर और मारुति के ड्राइवर हैरत और कुतूहल से —
उन दोनों के अलावा सड़क पर और कोई पैदल नहीं है
जिससे धूप और वक़्त का अन्दाज़ा होता है
यह लोग जन्तर-मन्तर नहीं जा रहे
आगे चल कर यह राह विलिंग्डन अस्पताल पहुँचेगी
जहाँ शायद इन्हें पलस्तर कटवाना है
या क्या मालूम पाँव और बिगड़ गया हो
ऐसे लोगों के साथ पचास रोने लगे रहते हैं
एक तो यही दिखता है कि इनके पास कोई सवारी करने तक के पैसे नहीं हैं
या आदमी इस तरह आठ-दस रुपए बचा रहा है
जिसमें दोनों की रज़ामन्दी दिखती है
इनकी दुनिया में कहीं भी कैसा भी बोझ उठाने में शर्मिन्दगी नहीं होती
यह तो आख़िर घरवाली रही होगी
वह सती शव नहीं थी अपंग थी
यह एकाकी शिव जिसे उठाए हुए अच्छी करने ले जा रहा था
किसी का यज्ञ-विध्वंस करने नहीं
किस तरह की बातें करते हुए यह रास्ता काट रहे थे
या एकदम चुप्पी में क्या-क्या सोचते हुए
शायद किसी पेड़ का सहारा लेकर सुस्ताए हों
क्या रास्ते के इक्का-दुक्का लोगों ने इसे माँगने का एक नया तरीक़ा समझा
फिर भी अगर किसी ने कुछ दिया तो इनने लिया या नहीं
अस्पताल पहुँचे या नहीं
पहुँचे तो वहाँ क्या बीती
शायद उसने कहा हो
कब तक ले जाते रहोगे
यहीं कहीं पटक दो मेरे को और लौट जाओ
उसने जवाब दिया हो
चबर-चबर मत कर, लटकी रह
खड़कसिंह से विलिंग्डन बहुत दूर नहीं
लेकिन एक आदमी एक औरत को उठाए हुए
कितनी देर में वहाँ पहुँच सकता है
यह कहीं दर्ज नहीं है
मुझे अभी तक दिख रहा है
कि वह दोनों अब भी कहीं रास्ते में ही हैं
गाड़ियों में जाते हुए लोग उन्हें देख तो रहे हैं
लेकिन कोई उनसे रुक कर पूछता तक नहीं
बैठाल कर पहुँचाने की बात तो युगों दूर है

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