विष्णु सक्सेना की रचनाएँ

छोड़ चली क्यों साथ

छोड़ चली क्यों साथ सखी री?
इसीलिए हमसे रचवाए क्या मेंहदी से हाथ सखी री!

गुमसुम होगी कल ये देहरी,
सिसकेगा घर का अंगना।
रोएँगी गुलशन की कलियाँ,
हिलकी-भर रोयें कंगना।
सूरज खाने को दौड़ेगा, डसे चंदनिया रात सखी री।

जिनके संग पंचगोटी खेली,
जिनके संग गुड्डा-गुड़िया।
कोई कहे मेरे बाग की बुलबुल,
कोई मैना, कोई चिड़िया।
जिस गोदी में खेली-कूदी, छूटे वे पितु-मात सखी री!

भइया याद दिलाए राखी,
भाभी होली फागुन की।
जब पीहर से जाए तू, माँ-
याद दिलाए सावन की।
सबके दिल दरपन जैसे हैं, देना ना आघात सखी री!

जा री जा, तेरे दामन में-
खुशियाँ हों दुनिया-भर की,
जैसे लाज रखी इस घर की-
वैसे रखना उस घर की
शुभ हो तुझे नया घर, लो जा खुशियों की सौग़ात सखी री!

तृप्त मयूरी हो ना पाई

तृप्त मयूरी हो ना पाई, प्यासी ही रह गई चातकी,
सत्य छिपाना तुमने सीखा, मेरी आदत खरी बात की।

मैंने वंदनवार सजाए,
क्या तुमको आभास हुआ?
कलियों ने अपमान सहा है,
फूलों का परिहास हुआ।
रात तुम्हारी सदा सुहागन, मेरी चिंता है प्रभात की,
सत्य छिपाना तुमने सीखा, मेरी आदत खरी बात की।

विरह-व्यथा आँसू ने कह दी,
मैंने मन की पीर छिपाई।
केवल था सुधियों में जीवन,
जीवन की सुधि कभी न आई।
ईश्वर से सबने है पाया, मुझ से विधि ने बड़ी घात की
सत्य छिपाना तुमने सीखा, मेरी आदत खरी बात की।

कैसे जन्म सार्थक मानूँ,
जब जीवन में तुम्हीं न आए?
वरदानों से भरे जगत में,
मैंने केवल शाप कमाए।
एक रंज जीवन की निधि है, शतरंजों ने कहाँ मात की
सत्य छिपाना तुमने सीखा, मेरी आदत खरी बात की।

हम-तुम ऐसे दूर रहे हैं,
जैसे दूर नदी के तट हैं।
कौन भरोसा करे यहाँ पर,
पग-पग पर बिछ रहे कपट हैं।
मन-अशांत की शांत नदी में, कल-कल भाई कब प्रपात की?
सत्य छिपाना तुमने सीखा, मेरी आदत खरी बात की।

दुख में सुख की मधुर कल्पना

दुःख में सुख की मधुर कल्पना कैसा सुघड़ निदान है।
प्यासों को दो बूँद ओस की मिली, मिला भगवान है।।

जब माँ से चंदा की ज़िद की,
कहा, चाँदनी तेरी है।
सुख का दिवस बहुत छोटा,
पर दुःख की रात घनेरी है।
ऐसी ज़िद न कर रे लाडले, तू कैसा नादान है।
प्यासे को दो बूँद ओस की मिलीं, मिला भगवान है।

संबंधों के अनुबंधों में,
अंधियारा ही अंधियारा।
जाने किसकी नज़र लगी,
जो टूटा दरपन बेचारा?
सगुण पात्र में ऊधौ कैसा ये निर्गुण पकवान है?
प्यासे को दो बूँद ओस की मिलीं, मिला भगवान है।

नयन उनींदे विवरण देंगे
मेरी बीती रातों का।
समय किसी का सगा नहीं है,
मन आदी आघातों का।
अभिशापों का बोझ मुझी पर, कब पाया वरदान है?
प्यासे को दो बूँद ओस की मिलीं, मिला भगवान है।

एक नई परिभाषा लिख दे,
युग की स्वर्णिम स्याही से।
निश्छल प्रेम करें जन-जन से,
जैसे मंज़िल राही से।
यहीं हुए अवतार, यहीं पूजा जाता पाषाण है।
प्यासे को दो बूँद ओस की मिलीं, मिला भगवान है।

मन का कोरा दर्पन

मन का कोरा दर्पन तेरे नाम करूँ।

भँवरों का मदमाता गुंजन,
तितली की बलखाती थिरकन,
भीनी-भीनी गंध पुष्प की,
कलियों का छलका-सा यौवन
हरा-भरा ये उपवन तेरे नाम करूँ।
मन का कोरा दर्पन तेरे नाम करूँ।

शीतल मेघ छटा केशों में,
पलकों में दुनिया सपनों की,
गालों में है भाव गुलाबी,
अधरों पर बातें अपनों की।
दहका-सा आलिंगन तेरे नाम करूँ।
मन का कोरा दर्पन तेरे नाम करूँ।

करूँ निछावर ऋतुएँ तुझ पर,
बातें करूँ रंगोली से,
दीवाली से करूँ आऱती,
नज़र उतारूँ होली से।
भीगा-भीगा सावन तेरे नाम करूँ।
मन का कोरा दर्पन तेरे नाम करूँ।

हाथ की ये लकीरें

हाथ की ये लकीरें, लकीरें नहीं
ज़ख़्म की सूचियाँ हैं, इन्हें मत पढ़ो
दिल से उठते धुएँ को धुआँ मत कहो,
दर्द की आँधियाँ हैं, इन्हें मत पढ़ो!

मुसकराई जो तुम स्वप्न आने लगे,
खिलखिलाईं तो दिन भी सुहाने लगे,
जब तुम्हारी नज़र ने हमें छू लिया,
अपनी आँखों के आँसू सुखाने लगे,
अब न आँसू, न सपने, न कोई चमक
खोखली सीपियाँ हैं, इन्हें मत पढ़ो!

मछलियाँ थीं मगर जाल डाले नहीं
पास कंकर बहुत पर उछाले नहीं,
तुमको सीमाएँ अच्छी लगी इसलिए,
पाँव चादर से बाहर निकाले नहीं।
पृष्ठ कोरे हैं तो क्या हुआ फेंक दो-
अनलिखी चिट्ठियाँ हैं इन्हें मत पढ़ो!

उम्र-भर हाथ सबको दिखाते रहे,
और निराशा में आशा बँधाते रहे,
जब से देखा तुम्हें फूल से प्यार है,
हम मुंडेरों पे गमले सजाते रहे,
चुभ रहे जो तुम्हें तेज़ काँटे नहीं,
ये मेरी उँगलियाँ हैं, इन्हें मत पढ़ो।

मन बहकने लगा और घबरा गए,
भूख इतनी लगी धूप भी खा गए,
ज़िंदगी-भर बबूलों में भटका किए,
लौटकर अब उसूलों के घर आ गए,
अब पहाड़े सही याद कर लीजिए,
जो ग़लत गिनतियाँ हैं उन्हें मत पढ़ो!

हो सके तो

हो सके तो मुझे गीत दे दीजिए,
मैं अधूरा पड़ा संकलन की तरह,
मैं तुम्हें गुनगुना लूँ ग़ज़ल की तरह,
तुम मुझे खुल के गाना भजन की तरह।

तुम बनो राधिका तो तुम्हारी कसम,
कृष्ण-सा कोई वादा करूँगा नहीं,
जानकी बन के आओ अगर घर मेरे,
राम जैसा इरादा करूँगा नहीं।
प्रेम के यज्ञ में त्याग की आहुति-
डाल दो, मन जला है हवन की तरह।

माना गंभीर हम वेद जैसे रहे,
किंतु तुम भी ऋचाओं-सी चुप-चुप रहीं,
बंधनों के निबंधों को मैंने लिखा,
फिर भी नूतन कथाएँ न तुमने कही।
प्रीति-पथ पर चलें, साँझ से क्यों ढलें?
तुम थकन की तरह में सपन की तरह।

मैंने चाहा बहुत, गीत गाऊँ मगर,
तुमने वीणा के तारों को छेड़ा नहीं,
तुमने आने का मन ही बनाया नहीं,
रास्ता वरना घर का था टेढ़ा नहीं।
तुम तो सौभाग्यशाली रही हो सदा,
भाग्य अपना बना है करण की तरह।

आँखों में पाले

आँखों में पाले तो पलकें भिगो गए
वासंती मौसम भी पतझड़
से हो गए

बीते क्षण बीते पल जीत और हार में
बीत गयी उम्र सबझूठे सत्कार में
भोर और संध्या सब करवट
ले सो गए

जीवन की वंशी में साँसों का राग है
कदमों में काँटे हैं हाथों में आग है
अपनों की भीड़ में सपने
भी खो गए

रीता है पनघट रीती हर आँख है
मुरझाए फूलों की टूटी हर पाँख है
आँधियों को देख कर उपवन
भी रो गए

कितना अजीब फूल काँटे का मेल,
जीवन है गुड्डे और गुड़्यों का खेल,
पथरीले मानव को तिनके
भिगो गए।

जब कभी भी हो तुम्हारा मन

जब कभी भी हो तुम्हारा मन चले आना
द्वार के सतिये तुम्हारी हैं प्रतीक्षा में

हाथ से कांधों को हमने थाम कर
साथ चलने के किये वादे कभी
मन्दिरों दरगाह पीपल सब जगह
जाके हमने बाँधे थे धागे कभी

प्रेम के हर एक मानक पर खरे थे हम
बैठ ना पाये न जाने क्यों परीक्षा में

हम जलेंगे और जीयेंगे उम्रभर
अपना और दिये का ये अनुबन्ध है
तेज़ आँधी भी चलेगी साथ में
पर बुझायेगी नहीं सौगन्ध है
पुतलियाँ पथरा गयीं पथ देखते पल-पल
आँख को शायद मिला ये मंत्र दीक्षा में

अक्षरों के साथ बंध हर पँक्ति में
याद आयी है निगोडी गीत में
प्रीत की पुस्तक अधूरी रह गयी
सिसकियाँ घुलने लगीं सँगीत में
दर्द का ये संकलन मिल जाये तो पढना
मत उलझना तुम कभी इसकी परीक्षा में

रंग है बसंती

रंग है बसंती
तो रूप है गुलाब
देख लिया तुझको तो छोड़
दी शराब

पीला सा बस्ता ले सरसों के फूल,
जाते हैं पढ़ने को अपने स्कूल,
अनपढ़ भी बैठे है खोल
कर किताब।

आपस में बतियाते पीपल के पात,
खूब रात रानी के संग कटी रात,
सुनकर ये चम्पा पर
आया शबाब

गदराये गेंदे और सूरज मुखी,
वासंती मौसम में सब हैं दुखी,
हरियाली पतझड़ से ले
रही हिसाब

स्वार्थ की दुपहरी में

स्वार्थ की
दुपहरी में क्यों रहा टहल
तन-मन झुलसा देगा अपनों का छल

काँटों से
भरी हुयी छूना मत शाख
आग लगा सकती है बुझी हुयी राख
तेज़ बहुत आँधी है बस, ज़रा संभल

फँसना मत
कलियों के रूप में कभी
धोखे ही खाकर मैं आया अभी
आग सी हवायें हैं मोम से महल

रोओ मत
भीगेंगे आँख के सपन
मुड़ कर जो देखोगे आयेगी थकन
औरों को देखो पर जाओ न मचल

जिसको तू
सौंपेगा तन मन की गंध
जिस पर लुटायेगा अपना मकरन्द
वही तुझे कह देंगे चमन से निकल

इस तरह मुझको देखती हो क्या?

इस तरह मुझको देखती हो क्या?
मेरी आँखों की रौशनी हो क्या?

मैं वही एक जलता सूरज हूँ
तुम वही धूप गुनगुनी हो क्या?

फूल की खुशबुओं में लिपटी, तुम
खूबसूरत-सी शायरी हो क्या?

मैंने हर पल जिसे तलाशा है,
शायरी की वह डायरी हो क्या?

जिस्म से जान रूठ कर पूछे,
तुम भी मेरी तरह दुखी हो क्या?

जब भी देखा है हंसते देखा है,
तुम भी बच्चों-सी रूठती हो क्या?

ज़िद तुम्हारी मुझे हंसाती है
मेरी बेटी-सी लाड़ली हो क्या?

रात अंधियारी और उसकी झिलमिलाती सी नज़र

रात अंधियारी और उसकी झिलमिलाती-सी नज़र।
जान ले लेगी ये कातिल मुस्कुराती-सी नज़र।

आज मैंने अपने दिल के साज को छेड़ा ही था।
उठ गई मेरी तरफ इक गुनगुनाती-सी नज़र।

छू लिया हमको जो उसने दिल की धड़कन बढ़ गयी।
कुछ न कर पायी हमारी कंपकंपाती-सी नज़र।

हमने माना गर्मियों की रात तो कट जायेगी,
सर्दियों में टीस देगी सरसराती-सी नज़र।

सादा दिल के हम सो हमने कुछ छुपाया ही नहीं,
घूरती हमको रही वो, आज़माती-सी नज़र।

उस नज़र से डर-सा लगता है जो हो दिल की नक़ाब,
हमको तो भाती है हाले दिल सुनाती-सी नज़र।

फूल गुलशन के सभी हँसते रहें ये है दुआ
देख कर लगता है डर, हर डबडबाती-सी नज़र।

क़त्ल करना तुम्हारी फितरत है

क़त्ल करना तुम्हारी फितरत है।
माफ़ करना हमारी आदत है।

सबका मैं अहतराम करता हूँ,
मेरे घर हर तरह से बरकत है।

अब नहीं बुतघरों से कुछ मतलब,
इश्क़ ही अब मेरी इबादत है।

प्यार से उसने मुझको देखा था,
आज तक रूह में हरारत है।

साथ मैं अपनी माँ के रहता हूँ
मेरे घर में ही मेरी जन्नत है।

एक दरिया मिले समंदर से
ये सियासत है या मुहब्बत है।

मैं चिरागों के साथ जलता हूँ,
क्या कहूँ अब ये मेरी किस्मत है।

गाँठ मन की यहाँ खोलता कौन है

गाँठ मन की यहाँ खोलता कौन है
क्या पता इश्क़ में बेवफा कौन है

शायद औरों के ग़म में परेशां हो तुम,
वरना रातों को यूँ जागता कौन है।

साथ ग़ुरबत में तुमने दिया शुक्रिया
वर्ना हमको यहाँ पूछता कौन है।

मजहबो को तो सब मानते है यहाँ
मजहबों की यहाँ मानता कौन है।

हम कहाँ आपकी तरह मशहूर हैं,
शहर भर में हमें जानता कौन है।

दिल के रिश्ते हों या दिल का मंदिर कोई
तोड़ते हैं सभी जोड़ता कौन है।

तीर्थ को सब हैं जाते बड़े शौक से
घर में माँ-बाप को पूजता कौन है।

रात दिन का सफ़र पर थकावट नहीं,
मेरी नस-नस में ये दौड़ता कौन है।

एक हैं हम भी और देश भी एक है,
फिर न जाने हमें बांटता कौन है।

मेरी बेटी नहीं सिर्फ़ बेटे हैं फिर
मेरे आँगन में ये झूलता कौन है।

एक दूजे को हमने निहारा मगर,
ये पता न चला आइना कौन है!

संग मेरे हँसोगे ये उम्मीद है

संग मेरे हँसोगे ये उम्मीद है।
साथ गम में भी दोगे ये उम्मीद है।

दिन ढला रात ले आयी तन्हाईयाँ
तुम भी तारे गिनोगे ये उम्मीद है।

हाथ उठाओ हर एक की मदद के लिए
तुम भी फूलो फलोगे ये उम्मीद है।

वक्त जैसा भी हो राह कोई भी हो
तुम सम्हल कर चलोगे ये उम्मीद है।

मन से धागा हूँ मैं तन से हो मोम तुम
मैं जलूँ तो गलोगे ये उम्मीद है,

उम्रभर तुमको मैं यूँ ही बाचूँगा पर,
तुम भी मुझको सुनोगे ये उम्मीद है।

अभी खुश थे अचानक हो गया क्या!

अभी खुश थे अचानक हो गया क्या!
किसी की बात से कुछ दिल दुखा क्या?

मुसलसल इतने आँसू बह रहे हैं
तुम्हारी आँख में कुछ गिर पड़ा क्या?

बनेंगीं फूल तो बिखरेगीं कलियाँ,
यही है ज़िन्दगी का फलसफा क्या?

मेरे दिल से धुंआ-सा उठ रहा है
बताओ सच तुम्हारा दिल जला क्या?

मेरी हालत पर तुम क्यूँ हंस रहे हो
मुझे समझा है तुमने चुटकला क्या?

लगायें दिल तो रोएँ ज़िंदगी भर
कोई समझाए है ये मसअला क्या?

खुदा ने आसरा तुमको दिया है
मुझे तुम दे सकोगे आसरा क्या?

यूँ सारी उम्र तुम रोते रहे हो
तुम्हारी आँख से मैं भी बहा क्या?

किया था इश्क़ पर हैं हाथ खाली
दिया बिन तेल के जलता रहा क्या?

गम से रिश्ता मेरा जोड़ कर रख दिया

गम से रिश्ता मेरा जोड़ कर रख दिया।
आपने मेरा दिल तोड़ कर रख दिया।

ये तो तय था मुझे तुम पढोगे नहीं
फालतू में वरक मोड़ कर रख दिया।

उसने समझा दिया ज़िन्दगी का सबक़
सामने बुलबुला तोड़ कर रख दिया।

प्यार में अब वह गर्मी नहीं इसलिए,
शाल उसने लिया, ओढ़ कर रख दिया।

प्यार ने आरज़ुओं के सैलाब का
एक इशारे में रुख मोड़ कर रख दिया।

ख्वाब आँखों में फिर एक जगने लगा

ख्वाब आँखों में फिर एक जगने लगा।
आसमा चाँद तारों से सजने लगा।

प्यार से जब से तुमने निहारा हमें,
घर तुम्हारा हमारा-सा लगने लगा।

जब से मुझको लगा तू समन्दर-सा है
मेरी आँखों से दरिया-सा बहने लगा।

तेरी प्यारी-सी रहमत की इस धूप में
मेरा गम धीरे-धीरे पिघलने लगा।

है ज़माना वही वक्त भी है वही,
तू न बदला मगर मैं बदलने लगा।

ज़िन्दगी में हमें और क्या चाहिए

ज़िन्दगी में हमें और क्या चाहिए।
आपके इश्क का ही नशा चाहिए।

तू न आये तो आ जाऊँ मैं तेरे घर,
इसलिए मुझको तेरा पता चाहिए।

मेरा घर भी हो रोशन तुम्हारी तरह,
मेरे घर को तुम्हारी दुआ चाहिए।

ज़ख्म दिल के बहुत दिन से महके नहीं,
तेरे दामन मुझको हवा चाहिए।

दर्द की याद भी जिससे आये न फिर,
चारागर मुझको ऐसी दवा चाहिए।

न जी-जी के मरते न मर-मर के जीते

न जी-जी के मरते न मर-मर के जीते।
वो पहलू में आते तो जी भर के जीते।

दिया थे, जिया शान से ज़िंदगी को
मुखालिफ हवाओं से क्या डर के जीते।

तुम्हे याद रहती न जन्नत तुम्हारी,
अगर कुछ दिवस मेरे नैहर के जीते।

तुम्हारे पिघलने की मालूम होती
तो बूंदों से हम भी यूँ झर-झर के जीते।

तुम्हें हो न हो हमको पाकर ख़ुशी तो
कहें कैसे हम तुमको खोकर के जीते।

सफ़र में था अब भी सफ़र कर रहा हूँ

सफ़र में था अब भी सफ़र कर रहा हूँ।
कि जीने की कोशिश में मैं मर रहा हूँ।

चरागों को इक रोज़ बुझना पड़ेगा,
ये मैं जानता हूँ मगर डर रहा हूँ।

सिवा मेरे कुछ और उसको न भाया,
मैं उसका पसंदीदा ज़ेवर रहा हूँ।

वही तो हमारी कहानी का हीरो,
मैं जिसकी कहानी का जोकर रहा हूँ।

जुनूँ की हदें टूटती जा रही हैं,
न तुम डर रही हो न मैं डर रहा हूँ

हक़ीक़त को तुम और न हम जानते हैं

हक़ीक़त को तुम और न हम जानते हैं।
मुहब्बत को बस इक भरम जानते हैं।

मैं क्या इसके बारे में मंज़िल से पूछूँ,
थकन मेरी मेरे क़दम जानते हैं।

हमें भूल जाने की आदत है लेकिन,
तुम्हे हम तुम्हारी क़सम जानते हैं।

है छुपना कहाँ और बहना कहाँ है,
ये आंसू सब अपना धरम जानते हैं।

छलकती है क्यों आँख हमको पता है,
कहाँ सब बिछड़ने का ग़म जानते हैं

दिया तो है मजबूर कैसे बताये
उजालों की तकलीफ तम जानते हैं

है जो कुछ मयस्सर हमें इस जहाँ में
हम उसको खुदा का करम जानते हैं।

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