शचीन्द्र भटनागर की रचनाएँ

चाहत

दिवस मास बीतते रहे
रंग और गुलाल के लिए

चाहत थी
सुबह दोपहर कभी
रंगभरा ! क्षण हमें मिले
चट्टानों बीच
किसी सन्धि में
कोई मनहर सुमन खिले
पर कोमल दूब छोड़, हम
भागे शैवाल के लिए

होता है रक्त और गुलाल का
बाहर से
रंग एक सा
किन्तु
एक विषभरा भुजंग है
एक प्यार में रचा बसा
चलो, दृष्टि स्वच्छ हम करें
तीक्ष्ण अन्तराल के लिए

हम न कभी तपकर
आकाश में छाँहभरी बदली बने
खिल देख-देख
खिलखिला सकें
हम न कभी वह कली बने
और समाधान टल गए
एक और साल के लिए

याद

इस जगह आकर पुराने दिन
याद फिर से आ रहे हैं

पैठ की सहजात भीड़े
और मेले
खो गए
पूर्वाग्रही से अन्धड़ों में
खा रही है प्राण को दीमक निरन्तर
आज पीपल और तुलसी की जड़ों में

वे खुले गोबर लिपे आँगन
हर पहर बतिया रहे हैं

शोर में डूबे नगर में
उग रहे हैं
अनवरत कँक्रीट के
जंगल असीमित
बढ़ रहा है इन अन्धेरे जंगलों में
हर तरफ़ विकराल दावानल अबाधित

लौट जाने के लिए अनगिन
भाव अब बहुरा रहे हैं

इस तरह अब चल पड़ी
पछुआ हवाएँ
देह-मन दोनों
दरकते जा रहे हैं
जामुनी मुस्कान, आमों की मिठासें
सभ्यतम संकेत ढकते जा रहे हैं

सावनी धन के हज़ारों ऋण
आँख को बिरमा रहे हैं

झुलसी धरती

साधो
सूख गया गंगाजल
धरती झुलसी है

नहीं कहीं अब
श्वेतपंख की पाँते हैं
नहीं रजतवर्णी मीनों की बातें हैं
लोग गुमे आभूषण अर्पित मुद्राएँ
यहाँ पत्थरों बीच खोजने आते हैं

लोगों की श्रद्धा भी
अब ढुलमुल-सी है

घाट-घाट पर
आसन लोग जमाए हैं
किन्तु प्यास बढ़ रही होंठ पपड़ाए हैं
द्रवित न कोई हदय यहाँ हो पाता है
और न पालन होती मर्यादाएँ हैं

तीर्थभूमि भी
हुई स्वार्थसंकुल-सी है

कल की बात हो गई
संझा बाती है
निष्ठा डगमग-डगमग पाँव बढ़ाती है
सतियों वाली चौकपुरी अँगनाई भी
सम्वेदना हदय में नहीं जगाती है

भूले हम आरती
उपेक्षित तुलसी है

अवकाश नहीं

सूख रहा कण्ठ
होंठ पपड़ाए
लेकिन
अँजुरी भरने का अवकाश नहीं मिलता है
नीर-भरे कूलों को नमस्कार

भाग रहे हैं
अनगिन व्यस्त गली-कूचों में
चौराहों-मोड़ों पर
भीड़ों के बीच कई एकाकीपन
मन से अनजुड़े हुए तन
कभी सघन छाँह देख
ललक-ललक जाता हूँ
मन होता ठहरूँ
विश्राम करूँ
लेकिन
कहीं ठहरने का अवकाश नहीं मिलता है
सतरंगे दुकूलों को नमस्कार
सारे अनुकूलों को नमस्कार

एक घुटन होती है
बादल के मन-सी
कुहरे की परतों में बन्दिनी किरन-सी
गन्धों की गोद पले गीतों के सामने
चटखते दरारों वाले मन जब
दौड़े आते है कर थामने
कभी-कभी मन होता
फेंक दूँ उतारकर विवशता में पहना यह
कण्ठहार
गन्धहीन काग़ज़ का
लेकिन
मन की करने का अवकाश नहीं मिलता है
गन्धप्राण फूलों को नमस्कार
बौराई भूलों को नमस्कार

फगुनाए दिन

तुम आए
तो सुख के फिर आए दिन
बिन फागुन ही अपने फगुनाए दिन

पोर-पोर ऊर्जा से भरा देह-मन
निमिष-निमिष के
हलके हो गए चरण
उतर गई प्राणों तक
भोर की किरण
हो गए गुलाबी फिर सँवलाए दिन

हो गई बयार
इस प्रकार मनचली
झूमने लगी फुलवा बन कली-कली
भोर साँझ दुपहर
मन मोहने लगी
धूप-धूल से लिपटे भी भाए दिन

गुरु-दीक्षा

सद्गुरु गंगातट आए हैं
आओ जीवन धन्य बना लो

जिन्हें न गुरु मिल पाता
उनको कहते हैं सब लोग निगोड़े
ऊपर जाकर सहने पड़ते
उनको यमदूतों के कोड़े

गहकर गुरु की शरण
स्वयं को महादण्ड से आज बचा लो

अहोभाग्य गुरु स्वयं आ गए
करने को कल्याण तुम्हारा
किसे पता है
मिले ना मिले यह अवसर फिर तुम्हें दुबारा

गया समय फिर हाथ न आता
दीक्षा लेकर पुण्य कमा लो

देख-देख हर कर्मकाण्ड में
प्रतिदिन होती लूट यहाँ पर
कृपासिन्धु गुरु जी ने
दीक्षा में दी भारी छूट यहाँ पर

मिली छूट का
समझदार बन इसी समय शुभ लाभ उठा लो

एक नारियल,
पंचवस्त्र के संग पंचमेवाएँ लेकर
और पंच मिष्ठान्न, पंचफल,
पंचशती मुद्राएँ लेकर

सद्गुरु के श्रीचरणों पर
अर्पित कर कृपा-अनुग्रह पा लो

शरणागत पा तुम्हें
कान में मन्त्र तुम्हारे वह फूकेंगे
तीन लोक में
सात जन्म तक वह तुमको संरक्षण देंगे

सद्गुरु तथा शिष्य का नाता
अपने हित के लिए निभा लो

डरो नहीं
जीते हो जैसे जीवन वैसे ही जी लेना
शिष्यों की जीवन-शैली से
उन्हें नहीं कुछ लेना-देना

विगत-अनागत दोनों के ही
सभी कर्मफल क्षमा करा लो ।

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