शरद कोकास की रचनाएँ

अनकही

वह कहता था
वह सुनती थी
जारी था एक खेल
कहने सुनने का

खेल में थी दो पर्चियाँ
एक में लिखा था ‘कहो’
एक में लिखा था ‘सुनो’

अब यह नियति थी
या महज़ संयोग
उसके हाथ लगती रही
वही पर्ची
जिस पर लिखा था ‘सुनो’
वह सुनती रही

उसने सुने आदेश
उसने सुने उपदेश
बन्दिशें उसके लिए थीं
उसके लिए थीं वर्जनाएँ
वह जानती थी
कहना सुनना नहीं हैं
केवल हिंदी की क्रियाएँ

राजा ने कहा ज़हर पियो
वह मीरा हो गई
ऋषि ने कहा पत्थर बनो
वह अहिल्या हो गई
प्रभु ने कहा
घर से निकल जाओ
वह सीता हो गई
चिता से निकली चीख
किन्हीं कानों ने नहीं सुनी
वह सती हो गई

घुटती रही उसकी फरियाद
अटके रहे उसके शब्द
सिले रहे उसके होंठ
रुन्धा रहा उसका गला

उसके हाथ कभी नहीं लगी
वह पर्ची
जिस पर लिखा था – ‘कहो’

बीता हुआ दिन

कल का जो दिन बीता
बिगड़ी हुई मशीन-सा था
कल कितनी प्रतीक्षा थी
हवाओं में फैले गीतों की
गीतों को पकड़ते सुरों की
और नन्हे बच्चे सी मुस्कराती
ज़िन्दगी की
कल का दिन
बिगड़ी हुई मशीन-सा था
कल राजाओं के
मखमली कपड़ों के नीचे
मेरे और तुम्हारे
उसके और सबके
दिलों की धड़कनें
काँटे मे फँसी मछली-सी
तड़पती थीं

सचमुच प्रतीक्षा थी तुम्हारी
ओ आसमान की ओर बहती हुई हवाओ
तुम्हारी भी प्रतीक्षा थी
लेकिन कल का दिन
बिगड़ी हुई मशीन-सा था
कल का वो दिन
आज फिर उतर आया है
तुम्हारी आँखों में
आज भी तुम्हारी आँखें
भेड़िये की आँखों सी चमकती हुई
कल का खेल
खेल रही हैं ।

प्रकृति के दफ़्तर में

कल शाम गुस्से में लाल था सूरज
प्रकृति के दफ़्तर में हो रहा है कार्य-विभाजन
जायज़ हैं उसके गुस्से के कारण
अब उसे देर तक रुकना जो पड़ेगा

नहीं टाला जा सकता ऊपर से आया आदेश
काम के घंटों में परिवर्तन ज़रूरी है
यह नई व्यवस्था की माँग है
बरखा, बादल, धूप, ओस, चाँदनी
सब किसी न किसी के अधीनस्थ
बंधी-बंधाई पालियों में
काम करने के आदी
कोई भी अप्रभावित नहीं हैं

हवाओं की जेबें गर्म हो चली हैं
धूप का मिज़ाज़ कुछ तेज़
चांदनी कोशिश में है
दिमाग की ठंडक यथावत रखने की
बादल, बारिश, कोहरा छुट्टी पर हैं इन दिनों

इधर शाम देर से आने लगी है ड्यूटी पर
सुबह जल्दी आने की तैयारी में लगी है
दोपहर को नींद आने लगी है दोपहर में
सबके कार्य तय करने वाला मौसम
ख़ुद परेशान है तबादलों के इस मौसम में

खुश है तो बस रात
अब उसे अकेले नहीं रुकना पड़ेगा
वहशी निगाहों का सामना करते हुए
ओवरटाइम के बहाने देर रात तक

भोर, दुपहरी, साँझ, रात
सब के सब नये समीकरण की तलाश में
जैसे पुराने साहब की जगह
आ रहा हो कोई नया साहब ।

कोयल चुप है 

गाँव की अमराई में कूकती है कोयल
चुप हो जाती है अचानक कूकते हुए

कोयल की चुप्पी में आती है सुनाई
बंजर खेतों की मिट्टी की सूखी सरसराहट
किसी किसान की आखरी चीख़
खलिहानों के खालीपन का सन्नाटा
चरागाहों के पीलेपन का बेबस उजाड़

बहुत देर की नहीं है यह चुप्पी फिर भी
इसमें किसी मज़दूर के अपमान का सूनापन है
एक आवाज़ है यातना की

घुटन है इतिहास की गुफाओं से आती हुई

पेड़ के नीचे बैठा है एक बच्चा
कोरी स्लेट पर लिखते हुए
आम का ’आ’
वह जानता है
अभी कुछ देर में
उसका लिखा मिटा दिया जाएगा

उसके हाथों से
जो भाग्य के लिखे को
अमिट समझता है ।

अर्थी सजाने वाले

अपने जीते जी संभव नहीं जिस दृश्य को देख पाना
उस दृश्य में उपस्थित हैं वे
जो भीड़ में दिखाई देते हुए भी भीड़ से अलग हैं
वे सिर्फ जनाजे को कंधा लगाने नहीं आए हैं
अर्थी सजाने की कला में भी वे माहिर हैं

कला इस मायने में कि बाँस इस तरह बाँधे जाएँ
कि अर्थी मज़बूत भी हो और उठाने में सुविधाजनक
देह जिस पर अपने पूरे आकार में आ जाए
साँसों की डोर का टूटना तो एक दिन निश्चित था
बस अर्थी में बँधी रस्सी बीच में न टूट पाए

गनीमत कि इस कला को लेकर कहीं कोई बहस नहीं है
कोई गुमान भी नहीं अर्थी सजाने वालों के जेहन में
वे इसे कला कहने को कोई औचित्य भी नहीं मानते
मृत्यु की भयावहता से आतंकित होकर भी
अपने प्रकट रूप में वे भयाक्रांत नहीं होते

सामाजिक के प्रचलित अर्थ में असामाजिक भी नहीं
भावना और व्यवहार की आती-जाती लहरों के बीच
संयत होकर निर्वाह करते अपने धर्म का
स्त्रियों को रोता देखकर भी वे नहीं रोते

भौतिक जगत से मनुष्य की विदाई के इस अवसर पर
जहाँ आयु से अधिक मुखर होता है अनुभव
उनकी क्रियाओं में अभिव्यक्त होता है उनका ज्ञान
वे जानते हैं अग्निसंस्कार के लिए
किस मौसम में कितनी लकड़ियाँ पर्याप्त होंगी
उन्हें कैसे जमाएँ कि एक बार में आग पकड़ ले

देह को कब्र में उतारकर पटिये कैसे जमाएँ
खाली बोरे, इत्र, राल, फूल, हंडिया, घी, लोबान
कफन-दफन का हर सामान वे जुटाते हैं
अर्थी उठने से पहले याद से कंडे सुलगाते हैं
अर्थी सजाकर वे आवाज देते हैं
मृतक के बेटे, भाई, पति या पिता को

उन्हें पता है अर्थी सजाने की जिम्मेदारी भले उनकी हो
कंधा लगाने का पहला हक सगों का है
उनके सामान्य ज्ञान में कहीं नहीं है शामिल
दुनिया के पहले इंसान की क़ब्र का कोई जिक्र

उन्हें नहीं पता अंतिम संस्कार की परम्परा
किस धर्म में कब दाखिल हुई
क्या होता था मनुष्य की मृत देह का
जब उसका कोई धर्म नहीं था

मोक्ष, आत्मा-परमात्मा, लोक-परलोक, जन्नत-जहन्नुम जैसे शब्द
दाढ़ी-चोटी वालों के शब्द-कोष में सुरक्षित जानकर
वे चुपचाप सुनते हैं श्मशान के शांत में
मृतक के व्यक्तित्व और क्रिया-कलापों का बखान

कर्मकांड पर चल रही असमाप्त बहस से अलग
उनके संतोष में विद्यमान रहता है एक अनूठा विचार
चलो… मिट्टी ख़राब नहीं हुई आदमी की।

बदबू

इसे सहज स्वभाव कहें या अज्ञान
बदबू की ज़िम्मेदारी हवाओं पर डालकर हम मुक्त
नाक अपनी जगह सही-सलामत
अपनी ख़ुशख़याली में महफ़ूज वह जगह
उठ रही है जहाँ से बदबू जमाने भर की

चलें विषय के बूचड़खाने में
सभ्यता का रूमाल नाक पर रख लें
जुगुप्सा को कविता का स्थायी भाव मान लें
अतीत को याद करें उपलब्ध हवाओं में
जिनमें शामिल बदबू महसूस की थी हमने

कभी किसी सड़ी-गली लाश से दूर चंद कदम
किसी गंदे नाले पर बना पुल पार करते हुए
चित्र की जगह कूड़े का ढेर रू-ब-रू देखकर
रेल के महानगर में प्रवेश करते हुए

नाक पर जीभ की विजय के चलते
मटन-मछली बाजार में
किसी सार्वजनिक शौचालय के आसपास
अपने घर में मरा चूहा ढूँढते हुए

या उत्कट प्रेम के मशविरे पर
पायरिया से ग्रसित दाँतों भरा
प्रेमिका का मुँह चूमते हुए

क्षमा करें प्रसंगों के बखान में निहित उद्देश्य
सोई हुई खराब अनुभूतियाँ जगाना नहीं है
इसकी व्यंजना में शामिल है समय सापेक्ष जीवन
बदबू के स्थूल अर्थ से परे

पूजाघर की खुशबुओं के बीच उपस्थित है जो
जिसमें अगरबत्ती फूल माला और इत्र बनाने वाले
मज़दूरों के पसीने में महकती इच्छाएँ
हमारी जीभ के सुख के लिए
जानवरों पर छुरी चलाते कसाई की भूख
हमारे दैहिक सौंदर्य के लिए
मरे जानवरों के जिस्म से खाल उतारते

भाइयों की जिजीविषा
चलिये कवि के यह सब रूपक
दिल पर मत लीजिये
बदबू भरी व्यवस्था, बदबू भरी राजनीति जैसे
साहित्यिक शब्दों की जुगाली कीजिये

परफ्यूम लगा रूमाल नाक पर रखिये
और यहीं कविता पढ़ना बंद कर दीजिये
फिर सोचिये ऐसे लोगों के बारे में
जिनके हर कृत्य में किसी साजिश की बू है
जो किसी सोच के तहत कह रहे हैं
कि ज्यादा बदबू वाली जगह से
कम बदबू वाली जगह पर जाने में
बदबू महसूस ही नहीं होती

ढूँढिए ऐसे लोगों को जो कह रहे हैं
बदबू सहन करते रहो
धीरे-धीरे इसकी आदत पड़ जाएगी
पहचानिये ऐसे लोगों को जिनका कहना है
अब बदबू कहाँ अब तो खुशबू ही खुशबू है
सो खुश रहो और खुशबू महसूस करो

यह वे लोग हैं जिनके निजी शब्दकोश में
बदबू जैसा कोई शब्द नहीं है
हमारे जीवन से रही सही खुशबुएँ चुराकर जो
बदलना चाहते हैं सारी दुनिया को
एक बदबूदार दुनिया में।

चलती हुई रेल में कविता

एक

चलती हुई रेल में
खिड़कियों के शीशे चढ़े हों
क़ैद हो रोशनी डिब्बे के भीतर
उस पार हो गहरा अन्धेरा
काँच पर उभरते हैं
अपने ही धूमिल अक्स

बस इसी समय
मन के शीशे पर
उभरता है कोई चेहरा
जो मौज़ूद नहीं होता
चलती हुई रेल में ।

दो

सो जाएँ जब सब के सब
गहरी नीन्द में
मैं जागती हूँ उनीन्दी

नीन्द में ढलकते सिर के लिए
कोई कान्धा नहीं होता

वह भी नहीं जिसे मेरा सर
एक स्टेशन मानकर
टिक जाता था

कौन है तुम्हारे सिवा
जिससे कह सकूँ
मन की तमाम बातें

दिल की धड़कनों की
चलती हुई रेल में
साथ चलते हो तुम
लिए अपनी बातों का पिटारा ।

तीन

ठीक इसी वक़्त
घड़ी ने तीन बजाए हैं

ठीक इसी वक़्त
उचटी है मेरी नीन्द

ठीक इसी वक़्त
मन की चलती हुई रेल भी
ठिठकी होगी

यादों के किसी
छोटे से स्टेशन पर ।

हैलमेट

एक छुपा हुआ ऐलान है इसकी ठनक में
ख़तरे घर में नहीं घर से बाहर हैं
और बुद्धिमानी इसी में है कि जहाँ ज़रूरी है
वहीं ठीक है ख़तरों से खेलना

नियमों की किताब लिये यह हर जगह साथ रहता है
चिकनी-चौड़ी सड़क हो या ऊबड़-खाबड़ पगडंडी
छोटा-मोटा कारखाना हो या विशाल संयंत्र
युद्ध का मैदान हो या क्रिकेट की पिच
हर जगह अपनी उपस्थिति से मौत को डकारता है

आकस्मिक मृत्यु से बचाव का यह उपाय
जिस किसी के मन में पहली बार आया होगा
अपनी हथेलियों की शक्ल में इसे ढाला होगा उसने
धातु ने अपना वर्चस्व सिद्ध किया होगा हड्डियों पर
लोहे ने हैलमेट का रूप लिया होगा

कारखाने में जन्म लेने से पहले
मस्तिष्क में जन्मी होगी इसकी आकृति
फिर आया होगा यह अपने जन्मदाता की रक्षा के लिए

मनुष्य का असुरक्षा-बोध है इसका आविष्कारक
यह आक्रमण से पूर्व बचाव का पक्षघर है
गजब का आत्मविश्वास पैदा करता है यह
अपने धारणकर्ता के मन में
जरा सी अति होते ही जिसके
अहंकार में बदल जाने में देर नहीं लगती

वर्दी की शह पर यह कभी अपने खेल दिखाता है
रक्षक के बिम्ब में पैंतरा बदलकर हत्यारा बन जाता है
जाने कितने रूप कितने रंग कितने नाम हैं इसके
फिर भी अपने स्थायी स्वभाव में यह
बच्चों के लिए पिता के सकुशल घर लौटने का भरोसा है
कारखाने के मालिक के लिए अधिक उत्पादन की गारंटी
स्त्रियों के लिए उनके सुहाग का रक्षक

बावजूद इसके किसी बेकार बुजुर्ग की तरह
घर के किसी कोने में यूँ ही पड़ा हुआ
बाजदफा आत्मा पर गुनाह के बोझ की मानिंद
शरीर पर महसूस होता है
भूलकर घर लौटने वाली वस्‍तुओं की सूची में यह शामिल
मनुष्य की पहचान छुपा लेने में माहिर है

गंजों की चाँद ढाँककर हर किसी को
अंतरिक्ष यात्री बनने का भ्रम देता हुआ

सांसारिक भय से सामना करने का दर्शन है यह
इस पर जमती हुई धूल में
वक़्त अपनी बेरोज़गारी के दिनों का हिसाब लिखता है
पल-पल नष्ट होते संसार में

आत्मरक्षा का मौलिक विचार
सदैव बचा रहेगा अपनी बदलती हुई शक्ल में
जब यह शीश नहीं होगा तब भी बचा रहेगा हैलमेट
अपने भीतर अंधेरे में एक चेहरा छुपाए
देखता रहेगा जीने की आपा-धापी में मनुष्य की भागदौड।

इज़्ज़तदार

एक इज़्ज़तदार
बदनामी की हवाओं में
टीन की छत सा काँपता है
हर डरावनी आवाज़
उसे अपना पीछा करते हुए महसूस होती है
हर दृष्टि घूरती हुई
चर्चाओं कहकहों मुस्कानों का सम्बन्ध
वह अपने आप से जोड़ता है
अपनत्व और उपहास के बोलों को
एक ही लय में सुनता है

समय की चाल में
असहाय होकर देखता है
डर और साहस के बीच
खुद को खंडित होते हुए
कोशिश करता है भीड़ से बचने की
अपने लिये सुरक्षा के इंतज़ामात करता है
एक स्क्रिप्ट लगातार चलती है
उसके मस्तिष्क में
जहाँ वह अपने व्यक्तित्व के बचाव में
संवाद गढ़ता है

पपड़ी की तरह जमता है समय
उसकी पहचान पर
वह पैने नाखूनों से डरता है
उसे लगातार तलाश रहती है
पत्थर से विश्वास वाले दोस्तों की |

झील से प्यार करते हुए–1

झील की ज़ुबान उग आई है
झील ने मनाही दी है अपने पास बैठने की
झील के मन में है ढेर सारी नफ़रत
उन कंकरों के प्रति
जो हलचल पैदा करते हैं
उसकी ज़ाती ज़िन्दगी में
झील की आँखें होतीं तो देखती शायद
मेरे हाथों में क़लम है कंकर नहीं

झील के कान उग आए हैं
बातें सुनकर
पास से गुज़रने वाले
आदमक़द जानवरों की
मेरे और झील के बीच उपजे
नाजायज़ प्रेम से
वे ईर्ष्या करते होंगे

वे चाहते होंगे
कोई इल्ज़ाम मढ़ना
झील के निर्मल जल पर
झील की सतह पर जमी है
ख़ामोशी की काई
झील नहीं जानती
मै उसमें झाँक कर
अपना चेहरा देखना चाहता हूँ

बादलों के कहकहे
मेरे भीतर जन्म दे रहे हैं
एक नमकीन झील को
आश्चर्य नहीं यदि मैं एक दिन
नमक के बड़े से पहाड़ में तब्दील हो जाऊँ ।

झील से प्यार करते हुए–2

वेदना-सी गहराने लगती है जब
शाम की परछाईयाँ
सूरज खड़ा होता है
दफ़्तर की इमारत के बाहर
मुझे अँगूठा दिखाकर
भाग जाने को तत्पर

फ़ाइलें दुबक जाती हैं
दराज़ों की गोद में
बरामदा नज़र आता है
कर्फ़्यू लगे शहर की तरह

ट्यूबलाईटों के बन्द होते ही
फ़ाइलों पर जमी उदासी
टपक पड़ती है मेरे चेहरे पर

झील के पानी में होती है हलचल
झील पूछती है मुझसे
मेरी उदासी का सबब
मैं कह नहीं पाता झील से
आज बॉस ने मुझे ग़ाली दी है

मैं गुज़रता हूँ अपने भीतर की अन्धी सुरंग से
बड़बड़ाता हूँ चुभने वाले स्वप्नों में
कूद पड़ता हूँ विरोध के अलाव में
शापग्रस्त यक्ष की तरह
पालता हूँ तर्जनी और अँगूठे के बीच
लिखने से उपजे फफोलों को

झील रात भर नदी बनकर
मेरे भीतर बहती है
मै सुबह कविता की नाव बनाकर
छोड़ देता हूँ उसके शांत जल में
वैदिक काल से आती वर्जनाओं की हवा
झील के जल में हिलोरें पैदा करती है
डुबो देती है मेरी काग़ज़ की नाव

झील बेबस है
मुझसे प्रेम तो करती है
लेकिन हवाओं पर उसका कोई वश नहीं है ।

बच्चा अपने सपनों में राक्षस नहीं होता

बच्चों की दुनिया में शामिल हैं
आकाश में
पतंग की तरह उड़ती उमंगें
गर्म लिहाफ़ में दुबकी
परी की कहानियाँ
लट्टू की तरह
फिरकियाँ लेता उत्साह

वह अपनी कल्पना में
कभी होता है
परीलोक का राजकुमार
शेर के दाँत गिनने वाला
नन्हा बालक भरत
या उसे मज़ा चखाने वाला खरगोश

लेकिन कभी भी
बच्चा अपने सपनों में
राक्षस नहीं होता ।

ईश्वर यहीं कहीं प्रवेश करता है

पत्थर को मोम बना सकता है
बच्चे की आँख से ढलका
आँसू का बेगुनाह कतरा

गाल पर आँसू की लकीर लिए
पाँव के अंगूठे से कुरेदता वह
अपने हिस्से की ज़मीन

भिंचे होंठ तनी भृकुटी
हाथ के नाखूनो से
दीवार पर उकेरता
आक्रोश के टेढ़े- मेढ़े चित्र

भय की कश्ती पर सवार होकर
पहुँचना चाहता वह
सर्वोच्च शक्ति के द्वीप पर

बच्चे के कोरे मानस में
ईश्वर यहीं कहीं प्रवेश करता है ।

शहर में शाम

घर लौटते मज़दूरों के साथ
खाली टिफ़िन में बैठकर
घर लौटती है शाम

दफ़्तर से लौटती बाबुओं की
साइकिलों पर सवार होकर
अपने शहर लौटती है शाम
देखती है घरों में जलती बत्तियाँ
दुकानों की चकाचौंध
सडकों पर उड़ती धुल
आवारा जानवरों, शराबियों को देखती है

टी० वी० पर नजर गड़ाए
बही-खातों पर सर झुकाए
ख़रीद-फरोख़्त में व्यस्त
इंसानों को देखकर
दुखी होती है शाम

अपनी उपेक्षा पर रोती है शाम
दुखी शाम
स्कूल से घर लौटते बच्चों को देखती है
उन्हें खेलते-खिलखिलाते देखती है
उनके बस्तों में बैठकर घर लौटती है
सारे दुख भूलकर
उनके साथ खेलती है

रसोई में पाव रखती है
गृहणी के हाथों में समाकर
रोटियाँ बेलती है
उसे अब अपना होना
सार्थक लगता है

तालाब

ठण्डे किए जाते हैं ताजिए
विसर्जित की जाती है मूर्तियाँ
इसी तालाब में
इसी तालाब से शुरू होकर
इसी पर विराम पाता है
त्यौहार का उल्लास

इसी तालाब में
कपड़ों के साथ
धोती-पछाडती है औरतें
घर-गृहस्थी की परेशानियाँ
इसी तालाब में
हँस कर नहाती हैं
बच्चों की मस्तियाँ
जवानों की बेफ़िक्री
बुज़ुर्गों की जिजीविषा

गले तक डूबे रहते ढोर-डंगर
बगुले बुझाते प्यास
मछलियाँ लेती साँस

इसी तालाब में
इसी तालाब की मिट्टी
विवाह में बनती मांगर-माटी
वहीँ मरने के बाद
सिराए जाते
अस्थि और फूल

इसी तालाब में ढलकते हैं
गाँव के आँसू
इसी तालाब के सहारे
कटते हैं
गाँव के बचे-खुचे दिन

कुएँ में रहने का सुख

घर से बाहर पाँव रखते ही
कल्लू कसाई ने किया सलाम
मैंने जान लिया
देश मुक्त हो गया है
दंगों की भयावहता से

नुक्कड़ पर खड़े सिपाही ने
सेल्यूट के अंदाज़ में ठोंकी नमस्ते
मुझे सुकून मिला
देश में सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद है

ट्रैफ़िक पुलिसमैन ने
बढ़ने का संकेत देते हुए
अभिवादन में हाथ उठाया
मुझे लगा
अब देश में
दुर्घटनाओं की कोई संभावना नहीं

अस्पताल में कार्यरत चिकित्सक ने
तमाम भीड़ के बावजूद
मुझे भीतर बुलवा लिया
मुझे इत्मिनान हुआ
स्वास्थ्य-सेवाएँ अच्छी चल रही हैं

कढ़ाई में करछुल चलाता हलवाई
मुझे देख मुस्कुराया
कौन कहता है
देश में लोग भूख से मरते हैं

दरज़ी ने चश्मे के ऊपर से झाँका
बहुत दिनों के बाद आए, बाबूजी
कपड़ों की भीड़ देखकर
मैंने तसल्ली ज़ाहिर की

देश में लोगों के पास
पहनने के लिए पर्याप्त वस्त्र हैं

पान की दुकान में खड़े गुरूजी ने
आगे बढ़कर हाथ मिलाया
मैंने संतोष व्यक्त किया
साक्षरता की बढ़ती दर
देश की शिक्षा पद्धति पर

मोहल्ले के पार्षद ने कहा– भैया, नमस्ते
मै समझ गया
देश में जनतंत्र को कोई ख़तरा नहीं

सबसे हुई जान-पहचान
सबसे हुई दुआ-सलाम
कुएँ में रहते हुए

मै ख़ुश था

मुर्दों का टीला

टीले पर उमड़ आया है
पूरा का पूरा गाँव
गाँव देख रहा है
पुरातत्ववेत्ताओं का तम्बू
कुदाल, फावड़े, रस्सियाँ
निखात से निकली मिट्टी
छलनी से छिटककर गिरते
रंग-बिरंगे मृद्भाण्डों के टुकड़े
मिट्टी की मूर्तियाँ
टेराकोटा
मिट्टी के बैल
हरे पड़ चुके ताँबे के सिक्के

गाँव हैरान है
बाप-दादाओं से सुनी
कहानियाँ क्या झूठी थीं
ज़मीन में दबी
मोहरों से भरी सन्दूकों की
सोने के छल्लों से टकराने वाली
लौह-कुदालों की
खज़ाने पर फन फैलाए
बैठे हुए काले नाग की
सुना तो यही था
उसे स्वर्णयुग कहते थे
चलन में थे सोने-चाँदी के बर्तन
उसके घर के मिट्टी के बर्तनों जैसे हैं

श्रुतियों का विश्वास
बलगम के साथ थूकते हुए
वह याद करता है
अपने उस अँगूठे के निशान को
पिछले चुनाव के दौरान
टीले के नीचे दबे खज़ाने को
गाँववालों के बीच बँटवाने का आश्वासन देकर
ऐसे ही चित्रोंवाले कागज़ पर
मुहर लगवाकर कोई चला गया था

एक बच्चा
ज़ोरों से चीख़ता हुआ
गाँव की ओर भागता है
अँगूठा लगाने वालों जागो ।

बूढ़ा हँसता है 

झोपड़ी के बाहर
झोलंगी खाट पर पडा बूढ़ा
अपने और सूरज के बीच
एक बड़े से बादल को देख
बच्चे की तरह हँसता है

उसकी समझ से बाहर है
सूरज का भयभीत होना
सूरज की आग से बड़ी
एक आग और है
जो लगातार धधकती है
उसके भीतर
सूरज उगने से पहले भी
सूरज उगने के बाद भी।

कबाड़ 

व्यवस्था की ऊबड़-खाबड़ सड़कों पर
देश के नाम दौड़ने वालों के
घिसे हुए पुर्ज़े
मरम्मत के लायक नहीं रहे

मशीनी जिस्म के
ऊपरी खाने में रखा
मस्तिष्क का ढाँचा
मरे जानवर की तरह
सड़ांध देता हुआ

वैसे ही जैसे दाँतों और तालू को
लुभावने वादों के
निश्चित स्थान पर छूती
शब्दों के दोहराव में उलझी जीभ
और
पूजाघर के तैलीय वस्त्रों से
पुनरुत्थानवादी विचार
फटे पुराने बदबूदार

सड़क से गुज़रता है
आवाज़ देता हुआ कबाड़ी
पुराना देकर नया ले लो ।

बचपन 

बच्चों की दुनिया में शामिल हैं
आकाश में
पतंग की तरह उड़ती उमंगें
गर्म लिहाफ़ में दुबकी
परी की कहानियाँ
लट्टू की तरह
फिरकियाँ लेता उत्साह

वह अपनी कल्पना में
कभी होता है
परीलोक का राजकुमार
शेर के दाँत गिनने वाला
नन्हा बालक भरत
या उसे मज़ा चखाने वाला खरगोश

लेकिन कभी भी
वह अपने सपनों में
राक्षस नहीं होता।

गिद्ध जानते हैं 

मुर्गे की बाँग से
निकलता हुआ सूरज
चूल्हे की आग से गुज़रते हुए
बन्द हो जाता है
एल्यूमिनियम के टिफ़िन में
बाँटकर भरपूर प्रकाश
जीने के लिए ज़रूरी उष्मा
तकिये के पास रखकर
जिजीविषा के फूल
छोड़ जाता है
कल फिर आने का स्वप्न

यह शाश्वत सूरज
उस सूरज से भिन्न है
जो उगता है कभी-कभार
झोपडपट्टी को
महलों में तब्दील करने की
खोखली गर्माहट लिए हुए

भर लेता है वह
अपने पेट में
मुर्गे की बाँग क्या
समूचा मुर्गा ही
और चूल्हे की आग
रोटी का स्वप्न
नींद का चैन तक

वह छोड़ जाता है अपने पीछे
उसे आकाश की ऊँचाई तक पहुँचाने वाले गिद्धों को
जो जानते हैं
सूरज के संरक्षण में
जिस्मों से ही नहीं
कंकालों से भी
माँस नोचा जा सकता है ।

अभिलेख

हम नहीं देख सकते
हमारे माथे पर खुदा अभिलेख
नोंचकर फेंक आए हैं हम
अपनी आँखें
इच्छाओं की अँधी खोह में
हम कोशिश में हैं
हथेलियों को आँख बनाने की

हमारे माथे पर नहीं लिखा है
कि हम अपराधी हैं
उन अपराधों के
जो हमने किए ही नहीं
नहीं लिखा है किसी किताब में
कि जीना अपराध है
फिर भी
हाथों में छाले
और पेट में
रोटी का वैध स्वप्न पाले
हम सज़ा काटने को विवश हैं
जन्म के अपराध की

जन्म के औचित्य को लेकर
कोई भी प्रश्न करना व्यर्थ है
सीखचों से बाहर हैं
हमारे अस्तित्व पर
चिंता करने वाले लोग
जो ठंडी साँसों में
फरेब का गोंद लगाकर
हमारे माथे पर चिपका देते हैं
परम्परिक दर्शन
कि ज़िन्दगी एक सज़ा है
हम भी अपना मन बहला लेते हैं
खुद को उच्च श्रेणी का क़ैदी मानकर ।

यह भय व्यर्थ नहीं है

कितना आसान है
किसी ऐसे शहर के बारे में सोचना
जो दफ़न हो गया हो
पूरा का पूरा ज़मीन के भीतर
पुराणों के शेषनाग के हिलने से सही
या डूब गया हो गले तक
बाढ़ के पानी में
इन्द्र के प्रकोप से ही सही
या भाग रहा हो आधी रात को
साँस लेने के लिए
चिमनी से निकलने वाले
दंतकथाओं के दैत्य से डरकर ही सही

ढूँढ़ लो किसी जर्जर पोथी में
लिखा हुआ मिल जाएगा
पृथ्वी जल वायु और आकाश
समस्त प्राणियों की सामूहिक सम्पत्ति है
जिससे हम
अपना हिस्सा चुराकर
अपने शहर में स्टीरियो पर
पर्यावरण के गीत सुनते
आँखें मूँदे पड़े हैं

वहीं कहीं प्रदूषित महासागरों का नमक
चुपचाप प्रवेश कर रहा है हमारे रक्त में
आधुनिकता की अन्धी कुल्हाड़ी से
बेआवाज़ कट रहा है
हमारे शरीर का एक एक भाग
सूखा, बाढ़, उमस और घुटन
चमकदार कागज़ों में लपेटकर देने चले हैं हम
आनेवाली पीढ़ी को

हवा में गूँज रही हैं
चेतावनी की सीटियाँ
दूरदर्शन के पर्दे से बाहर आ रहे हैं
उन शहरों के वीभत्स दृश्य

हमारे खोखले आशावाद की जडॆं काटता हुआ
हमे डरा रहा है एक विचार
कल ऐसा ही कुछ
हमारे शहर के साथ भी हो सकता है

यह भय व्यर्थ नहीं है ।

बाढ़

बारिश अच्छी लगती है
बस फुहारों तक
बादल बूँद और हवाएँ
कपड़ों का कलफ़ बिगाड़ने का
दुस्साहस न करें

मौसम का कोई टुकड़ा
कीचड़-सने पाँव लेकर
कालीन रौंदने लगे
तो छत के ऊपर
आसमान में
बादलों के लिए आप
प्रवेश–निषेध का बोर्ड लगा देंगे

आकाश तक छाई
हृदय की घनीभूत पीड़ा को लेकर
कविता लिखने वाले
ख़ाक लिखेंगे कविता
टपकते झोपड़े में
घुटनों तक पानी में बैठकर

आनेवाली बाढ़ में
अलग-थलग रह जाएँगे
सारे के सारे बिम्ब
बच्चे, पेड़ , चिड़िया
सभी अपनी जान बचाने की फ़िक्र में
कैसे याद आ सकेगी
माटी की सोंधी गन्ध
लाशों की सड़ांध में

फ़ोटोग्राफ़र
कैमरे की आँख से देखकर
समीक्षक की भाषा में कहता है
पानी एक इंच और बढ़ जाता
तो क्या ख़ूबसूरत दृश्य होता ।

सितारे

अंधेरी रातों में
दिशा ज्ञान के लिए
सितारों का मोहताज़ होना
अब ज़रूरी नहीं

चमकते सितारे
रोशनी का भ्रम लिए
सत्ता के आलोक में टिमटिमाते
एक दूसरे का सहारा लेकर
अपने-अपने स्थान पर
संतुलन बनाने के फेर में हैं

हर सितारा
अपने ही प्रकाश से
आलोकित होने का दम्भ लिए
उनकी मुठ्ठी में बन्द
सूरज की उपस्थिति से बेख़बर है।

धुएँ के ख़िलाफ़

अगली शताब्दी की हरकतों से
पैदा होने वाली नाजायज़ घुटन में
सपने बाहर निकल आएँगे
पारम्परिक फ़्रेम तोड़कर
कुचली दातून के साथ
उगली जाएँगी बातें
मानव का स्थान लेने वाले
यंत्र-मानवों की
सुपर-कम्प्यूटरों की
विज्ञान के नए मॉडलों
ग्रहों पर प्लॉट खरीदने की
ध्वनि से चलने वाले खिलौनों की

मस्तिष्क के खाली हिस्से में
अतिक्रमण कर देगा
आधुनिकता का दैत्य
नई तकनीक की मशीन पर
हल्दी का स्वास्तिक बनाकर
नारियल फोड़ा जाएगा

ऊँची-ऊँची इमारतों से
नीचे झाँकने के मोह में
हाथ–पाँव तुड़वा कर
विपन्नता पड़ी रहेगी
किसी झोपड़पट्टी में
राहत कार्य का प्लास्टर लगाए

कहीं कोई मासूम
पेट से घुटने लगा
नींद में हिचकियाँ ले रहा होगा
टूटे खिलौनों पर शेष होगा
ताज़े आँसुओं का गीलापन

मिट्टी के तेल की ढिबरी से उठता धुआँ
चिमनियों के धुएँ के ख़िलाफ़
सघन होने की राह देखेगा ।

दो तिहाई ज़िन्दगी 

भुखमरी पर छिड़ी बहस
ज़िन्दगी की सड़क पर
मज़दूरी करने का सुख
कन्धे पर लदी अपंग संतान है
जो रह-रह मचलती है
रंगीन गुब्बारे के लिए

कल्पनाओं के जंगल में उगे हैं
सुरक्षित भविष्य के वृक्ष
हवा में उड़–उड़ कर
सड़क पर आ गिरे हैं
सपनों के कुछ पीले पत्ते

गुज़र रहे हैं सड़क से
अभावों के बड़े-बड़े पहिए
जिनसे कुचले जाने का भय
महाजन की तरह खड़ा है
मन के मोड़ पर

तब
फटी जेब से निकल कर
लुढ़कती हुई
इच्छाओं की रेज़गारी
बटोर लेना आसान नहीं है
मशीनों पर चिपकी जोंक
धीरे-धीरे चूस रही है
मुश्किलें हल करने की ताक़त

चौबीस में से आठ घंटे बेच देने पर
बची हुई दो तिहाई ज़िन्दगी
कई पूरी ज़िन्दगियों के साथ मिलकर
बुलन्द करती है
जिजीविषा
रोटी और नींद का समाधान

तुम्हारी नियति

आग आग है
पेट में जली तो कहलाई भूख
दिमाग़ में पली तो विद्रोह
आँखों से बरसी तो चिंगारी
होंठों से निकली तो गाली
तुमने छीनी रोटी
जिस्म पर चढ़ाया मुलम्मा
कवच पहने
कान बन्द किये
कोशिश की
आग न पहुँचे तुम तक
मगर आग आग है
कब रुकी
मशानी बनी
जले कवच, पिघला मुलम्मा
आग में अब पकेगी रोटी
सोने से दमकेंगे चेहरे हमारे
तुम्हारी नियति?

शुक्र मनाओ

वैदिक ऋचाएँ सुनने के आरोप में
मेरे पूर्वजों के कानों में
उँड़ेला हुआ पिघला गर्म सीसा
जला रहा है मेरी धमनियाँ

उनकी मर्मान्तक चीख़ें
हर रात उड़ा देती हैं मेरी नींद
गर्म सलाखों से दागी गयी

उनकी आँखों से टपकता लहू
यक-ब-यक
टपक पड़ता है मेरी आँखों से

जूठी पत्तलों के लिए
कुत्तों से लड़ते हुए
उनके शरीर पर पड़ी खरोंचें
मेरे बदन पर हैं

जो कुछ भी सहा गया
विरासत में मिला है मुझे
तुम्हें भी मिला है विरासत में
वही सब कुछ

रुको
अट्हास से आसमान मत गुँजाओ
समीकरण बदल रहे हैं अब
गनीमत है उलट नहीं रहे
शुक्र मनाओ!

बीच का आदमी

दबी इच्छाओं का बोझ
पीठ पर लादे
पसीने की नदी में
वह ढूँढ़ता है ठहराव
अभी आएगा कुछ देर में
छाते, टोपी और छड़ी की
सुनियोजित सुविधा-प्राप्त
एक साफ़-सुथरा आदमी
दागते हुए गालियाँ
उसके मालिक का
कवच बना यह आदमी
झेल लेगा
आक्रोश के वार
शिकायतों के आक्रमण
उसके रक्त में बसा
वफ़ादारी का नमक
हस्तिसेना की तरह
उलटे पाँव रौंद डालेगा
मुक्ति का सुखद स्वप्न
यह और वह
दोनों चल रहे हैं
विवशताओं के अपने-अपने वृत्त में
सदियों से अनभिज्ञ हैं
इस क्रूर खेल का नियामक
पूरी तरह सुरक्षित है
अपने प्रभामंडल के भीतर।

प्रजा 

कम्बल के छेदों से
हाड़ तक घुस जाने वाली
हवा के ख़िलाफ़
लपटों को तेज़ करते हुए
वह सुना रहा है
आग के आस-पास बैठे लोगों को
राम वनवास की कथा
राम थे अवतारी पुरुष
राम ने आचरण किया
सामान्य मनुष्य की तरह
राम हैं सब जगह

राम हैं हमारे-तुम्हारे भीतर
अवचेतन से बसे चरित्र की
विवेचना करते हुए
वह विस्मय भर देता है
सबकी आँखों में
गर्व से कहता है
यह तमाम बातें
कल सुनी थीं मालिक के घर
एक पहुँचे हुए सन्त के मुख से

चिंगारी की तलाश में
फूँकते हुए राख का ढेर
वह सोचता है
राम तो राजा थे
उसके मालिक भी राजा हैं
उसकी नियति तो बस
प्रजा होना है।

पेट के लिए

दाने की खोज में
उड़ते हुए पंछियों के
थक जाते होंगे पंख
अन्न की तलाश में
भटकती हुई चींटियों के
थक जाते होंगे पाँव
चारा ढूँढ़ती मछलियाँ
तैरते-तैरते
थक जाती होंगी
थक जाते होंगे कीट-पतंगे
थक जाती होंगी छिपकलियाँ
थक ही जाता होगा
रोटी के जुगाड़ में
मुँह-अँधेरे निकला
रिक्शेवाला!!

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