शशि सहगल की रचनाएँ

गान्धारी-1

मैं नहीं जानती
कि मैं तुम्हें कितना चाहती हूं
कसमें खाने की उम्र नहीं है मेरी
न ही तुम्हारी
फिर भी तुम्हें किसी मुसीबत में फंसते देख
मैं खुद को तुमसे अलग नहीं कर पाती
शायद इसी कारण
कभी कहा था तुमने
‘तुम क्यों गांधारी बन जाती हो?’
जाने कैसा जादू था इस शब्द में
गांधारी शब्द की मूल्य-धर्मिता में!

मैंने तो पट्टी नहीं बांधी
पर क्या पट्टी सिर्फ आंखों पर ही बांधी जाती है?
आज मैंने उतार फेंकी है
गांधारी नाम के साथ ही उसकी वह पट्टी
जो शायद उसे धृतराष्ट्र से
जोड़ती और तोड़ती रही होगी!

मैं नहीं हूं गांधारी
यह विशेषण उपहासास्पद हो गया है
पर इसका यह अर्थ नहीं
कि मैं कुंती बनना चाहती हूं
मैं अपने नाम के साथ
जीती हूं, स्वाभिमान के साथ!

गान्धारी-2 

गांधारी
होगी तुम पतिव्रता
पर एक बात जान लो
आंखों पर पट्टी बांध लेने से
नहीं चलता पति का अता-पता
अनेक दासियों वाले महलों में
जब इधर-उधर
दीवारों से टकराते होंगे धृतराष्ट्र
तब
राजा को सहारा देने के बहाने
बढ़ जाते होंगे कुछ हाथ
और तुम
अपनी पट्टी की गरिमा में
खुद को महासती के गौरव भार के नीचे दबती
जरूर महसूस करती होगी

क्यों बांधी थी तुमने उस क्षण
आंखों पर पतिव्रत्य की पट्टी
सच बतलाना, क्या वह प्रतिशोध था?
धृतराष्ट्र को तिल-तिल गलाने का
या गौरव से मंडित हो
मान और प्रतिष्ठा के पद पर आसीन होने का
कुछ भी कहो गांधारी
मैं नहीं हो पाई अभिभूत
तुम्हारे इस महासती रूप से
न कल और न ही आज

मेरा मन तो तुम्हें शाप देने को होता है
करोड़ों अज्ञानी और मूढ़ नारियों को तुमने
अपने इस महासती के आदर्श तले दबा दिया
क्या मिला तुम्हें गांधारी
जो अपनी व्यक्तिगत पीड़ा का बदला
समूची नारी जाति से लिया?
आज
हर अंधा या नयनसुख पति
यही चाहता है
कि उसकी गांधारी
आंखों से कभी पट्टी न उतारे!

सन्तुलन 

ससुराल की जिस दहलीज पर
कल
मेरा पिता खड़ा था
आज
वहां तुम खड़े हो
और कल
वहीं खड़ा होगा तुम्हारा दामाद
सोचती हूं, क्या फर्क पड़ता है
पीढ़ियों के बदल जाने से
बाप की ऐंठन
जली रस्सी-सी
पड़ी है तुम्हारे सामने
और तुम
आत्मविश्वास के पिरामिड से
सीधे तने हुए
महानता का दम्भ ओढ़े
खड़े हो मेरे सामने
तुम्हारा दामाद
विरासत में पायी ऐंठन और दम्भ को
और अधिक मांज कर
खड़ा हो जाएगा हमारे सामने
तब मैं
संतुलन का व्यर्थ प्रयास साधती
तराजू के कांटे-सी
झुकती रहूंगी
कभी इधर
कभी उधर!

विडम्बना 

रात के अँधेरे में
तुम्हारी हल्की-सी दस्तक से
जाग गया सारा शहर
पुलक उठी मैं तुम्हें देख
पर
तुम किसी और को ढूँढ रहे थे।

अनुरोध

मुझसे/जीने की ताकत को
छीन लिया गया है।
थमा दी है उन्होंने
मेरे हाथों में
अविश्वास की बैसाखियाँ
और कहते हैं
मानो, तुम्हें कुछ नहीं हुआ।
अधमरी-सी मैं
जुटाना चाहती हूँ
अपने में
वह पहले-सी ताकत
पर
रीढ़ की हड्डी का एक-एक पोर
बिखर गया है धरती पर
जोड़ दो ना उसे/तुम
देकर अपना पहला विश्वास।

सन्तुलन 

ससुराल की जिस दहलीज पर
कल
मेरा पिता खड़ा था
आज
वहां तुम खड़े हो
और कल
वहीं खड़ा होगा तुम्हारा दामाद
सोचती हूं, क्या फर्क पड़ता है
पीढ़ियों के बदल जाने से
बाप की ऐंठन
जली रस्सी-सी
पड़ी है तुम्हारे सामने
और तुम
आत्मविश्वास के पिरामिड से
सीधे तने हुए
महानता का दम्भ ओढ़े
खड़े हो मेरे सामने
तुम्हारा दामाद
विरासत में पायी ऐंठन और दम्भ को
और अधिक मांज कर
खड़ा हो जाएगा हमारे सामने
तब मैं
संतुलन का व्यर्थ प्रयास साधती
तराजू के कांटे-सी
झुकती रहूंगी
कभी इधर
कभी उधर!

विडम्बना

रात के अँधेरे में
तुम्हारी हल्की-सी दस्तक से
जाग गया सारा शहर
पुलक उठी मैं तुम्हें देख
पर
तुम किसी और को ढूँढ रहे थे।

अनुरोध

मुझसे/जीने की ताकत को
छीन लिया गया है।
थमा दी है उन्होंने
मेरे हाथों में
अविश्वास की बैसाखियाँ
और कहते हैं
मानो, तुम्हें कुछ नहीं हुआ।
अधमरी-सी मैं
जुटाना चाहती हूँ
अपने में
वह पहले-सी ताकत
पर
रीढ़ की हड्डी का एक-एक पोर
बिखर गया है धरती पर
जोड़ दो ना उसे/तुम
देकर अपना पहला विश्वास।

जमूरा-2

खेल दिखलायेगी?
दिखाऊँगी
प्यार करेगी?
बहुत सारा
बच्चे पैदा करेगी?
जितने तू चाहे
मैं दूसरी के पास जाऊँगा, लड़ेगी?
हाँ, लड़ूँगी
क्या बोला, लड़ेगी?
ठीक है
मैं तो जाऊँगा
पर तू- दूसरे के पास नहीं जाएगी
मैं तू जाऊँगा
तू ज़हर खायेगी।

किसान अब भी चक्की है

शहर किसान से ही बनता है
झोंपड़पट्टी की गन्दगी
चलाती है सेठ का कारखाना
पानी बरसे, मिले चारा
पेट भरें, गाय और बैल
पर बादलों में तो
जल की दरक भी नहीं।
कैसे पाले बैल
कहाँ से दूध दे गाय
लाचार, रात के अँधेरे में
हाँक ले गया उन्हें।
अब तक तो डिब्बा मीत
जूता-चप्पल बन गया उनका
डरता है बोलने से
डरता है पुजारी से
गौ हत्या !
शुद्धि के वास्ते,
किसे बेचे वह अब?

एक फूल से बातचीत

पेड़ की डाली पर लगा
सुर्ख़ लाल फूल
अपने पास बुलाता है
अकेलेपन के बोझ से
उबारना चाहता है मुझे
मानो कह रहा हो
आज आए हो
दो दिन बाद भी आना
मैं अपने बच्चों और साथियों के साथ
कहूँगा तुम्हें मुस्काते हुए
आओ मिलो
हँसो और खेलो ।

संकल्प /

चट्टानों पर गिरती बर्फ़
ठंडा करना चाहती है पाषाण को
रोज़-रोज़ गिरकर
बनती जाती है
मोटी सतह बर्फ़ की
लेकिन चट्टान में
उष्मा का संकल्प
उसे बर्फ़ होने से बचाता है।

आस्था

कुम्भ के मेले में
साधु करते हैं स्नान
देते हैं ज्ञान
पोथियों में लिखे शब्द
थमा देते हैं
प्रश्नाकुल आँखों को
क्या ख़ुद उन्हें
समस्या का समाधान मिल जाता है?
या फिर
कुम्भ यों ही निकल जाता है।

हरीतिमा

पहाड़ों पर उगे
सीधे तने वृक्ष
छूना चाहते हैं नीला आसमान
आसमान और वृक्ष
दोनों का जो भी माजरा होगा, होता रहेगा
मैं तो मन्त्रमुग्ध
देखती हूँ घनी शाखाएँ
शाखाओं से छनती धूप
जो धरती पर इन्द्रजाल बिखेरती
लुका-छिपी खेल रही है।

दम्भ

पहाड़ की ऊँचाई ने
बहुत छोटा कर दिया मुझे
गर्दन की हड्डी
उतना भी न उठ पाई
कि देख सकूँ पूरा पहाड़
और मैं पानी-पानी हो
अपने में
और ज़्यादा सिमटती गई।

मॉडर्न

कालिदास के यक्ष ने
भेजा था संदेसा
अपनी यक्षिणी को
बादलों के पन्नों पर
किए थे हस्ताक्षर
अपनी विरहाकुल आँखों से।

अब क्यों नहीं ले जाते संदेसा
आते-जाते बादल
मन की तरह उमड़-घुमड़
आस-पास ही बरस
फ़र्ज़ पूरा हुआ सोच
उड़ जाते हैं कहीं और।
आज
कौन ढोता है जल-भार
औरों को शीतल करने के लिए।

समझ

शिमला हो या मसूरी
कैनवस पर
सभी पहाड़ एक से ही उतरते हैं
समझाते है
अंधेरे और उजाले की परिभाषा
अंधेरे की कोख से ही
पैदा होती है रोशनी
सिर्फ़ पहाड़ों पर ही नहीं

स्वतंत्रता

अमरीका में है
आज़ादी की मूर्त्ति
उस मूर्त्ति का
केवल धड़ है सिर नहीं।
सिरकटी आज़ादी
बड़ी भयावह होती है
क्योंकि समझ नहीं पाती वह
आज़ादी का अर्थ
फिर
इस बेसिर की आज़ादी का
मतलब ही क्या है?

भोलापन 

हादसा चाहे लंदन में हो
या फिर अमरीका में
हो गर दिल्ली में भी
हादसा ही होता है
शहरों और मुल्कों के नामों से
नहीं फ़र्क पड़ता उसे।
चाहते हो गर करना फ़र्क
तो बदलनी होगी ज़हनीयत
ज़हीन नहीं मासूम बनो
यूँ ही टल जाएँगे हादसे
हँसते-हँसते

ज्ञान

पता चल चुका है हमें
चाँद पर हैं पत्थर, गड्ढे और चट्टानें
लेकिन मासूम दरख़्त
झूमता है
पूरे चाँद की रोशनी में नहाकर।

भूलकर भी मत बतलाना उसे
चाँद की असलियत
मत छीनना उससे
भ्रम का स्वर्ग

औरत

तस्वीर देखते
नहीं आता समझ
कौन किसे पीस रहा है?
चक्की को औरत
या औरत को चक्की !
रंग-बिरंगे परिधान
छनछनाती चूड़ियाँ
नहीं छिपा पाती
भीतर की मायूसी
मत पीसो चक्की
छोड़ दो पीसना
पिसने से ऎसे ही
बच सकती हो तुम

खोज – 1

मुझे तलाश है
एक सिर की,
देखिये मेरी बात सुनकर हँसिये नहीं
हँसना है/तो हँस लीजिये
जी हाँ
सिर ही कहा है मैंने

ऐसा सिर
जो सोच सकता हो
ऐसा सिर
जो खड़ा रह सकता हो
अगणित प्रलोभनों के खिलाफ
ऐसा सिर
जो आदमी की पहचान
खेमों से न करता हो।

ऐसा सिर
जो दीवार पर लिखी इबारत
पहचानता हो
ऐसा सिर
ऐसा सिर
ऐसा सिर
कहाँ हे ऐसा सिर?

गंगाजल 

आरती के असंख्य दिये
गंगा का झिलमिल जल
नहीं हरिया सकता मन
उसे तो चाहिए
मुस्कान की
एक नन्हीं किरण

मज़बूती

दुख उन्हीं का होता है
जिनसे कभी मिला था सुख
अभाव सालता है उन चीज़ों का
जिनके प्रति
रहा था कभी कोमल भाव
छटपटाता है आदमी
इन विपरीतों से मुक्ति के लिए
पर
बड़ी कमज़ोर होती है
आदमी की पकड़

रहस्य

समय के पुराने
छूटे हुए पदचिह्न
जिन्हें देख
मिलती है अद्भुत्त सान्त्वना
पर
अपने वक़्त पर क्यों
होते हैं वे अबूझ।

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