शहजाद अहमद की रचनाएँ

चुप के आलम में वो तस्वीर सी सूरत उस की

चुप के आलम में वो तस्वीर सी सूरत उस की
बोलती है तो बदल जाती है रंगत उस की

सीढ़ियाँ चढ़ते अचानक वो मिली थी मुझ को
उस की आवाज़ में मौजूद थी हैरत उस की

हाथ छू लूँ तो लरज़ जाती है पत्ते की तरह
वही ना-कर्दा-गुनाही पे नदामत उस की

किसी ठहरी हुई साअत की तरह मोहर-ब-लब
मुझ से देखी नहीं जाती ये अज़िय्यत उस की

आँख रखते हो तो उस आँख की तहरीर पढ़ो
मुँह से इक़रार न करना तो है आदत उस की

ख़ुद वो आग़ोश-ए-कुशादा है जज़ीरे की तरह
फैले दरियाओं की मानिंद मोहब्बत उस की

रौशनी रूह की आती है मगर छन छन कर
सुस्त-रौ अब्र का टुकड़ा है तबीअत उस की

है अभी लम्स का एहसास मिरे होंटों पर
सब्त फैली हुई बाहों पे हरारत उस की

वो अगर जा भी चुकी है तो न आँखें खोलो
अभी महसूस किए जाओ रिफ़ाक़त उस की

दिल धड़कता है तो वो आँख बुलाती है मुझे
साँस आती है तो मिलती है बषारत उस की

वो कभी आँख भी झपके तो लरज़ जाता हूँ
मुझ को उस से भी ज़्यादा है ज़रूरत उस की

वो कहीं जान न ले रेत का टीला हूँ मैं
मेरे काँधों पे है तामीर इमारत उस की

बे-तलब जीना भी ‘शहज़ाद’ तलब है उस की
ज़िंदा रहने की तमन्ना भी शरारत उस की

डूब जाएँगे सितारे और बिखर जाएगी रात

डूब जाएँगे सितारे और बिखर जाएगी रात
देखती रह जाएँगी आँखें गुज़र जाएगी रात

रात का पहला पहर है अहल-ए-दिल ख़ामोश है
सुब्ह तक रोती हुई आँखों से भर जाएगी रात

आरज़ू की बे-हिसी का गर यही आलम रहा
बे-तलब आएगा दिन और बे-ख़बर जाएगी रात

रौशनी कैसी अगर आलम अंधेरा हो गया
दिल में बस जाएगी आँखों में उतर जाएगी रात

कोई आहट भी न सुन पाएगा ख़्वाबीदा चमन
ख़ुश्क पत्तों पर दबे पाँव गुज़र जाएगी रात

दिल में रह जाएँगें तन्हाई के क़दमों के निशाँ
अपने पीछे कितनी यादें छोड़ कर जाएगी रात

शाम ही से सो गए हैं लोग आँखें मूँद कर
किस का दरवाजा खुलेगा किस के घर जाएगी रात

देर तक ‘शहज़ाद’ आँखों में फिरेगी चाँदनी
कट तो जाएगी मगर क्या कुछ न कर जाएगी रात

फ़स्ल-ए-गुल खाक हुई जब तो सदा दी तू ने

फ़स्ल-ए-गुल खाक हुई जब तो सदा दी तू ने
ऐ गुल-ए-ताज़ा बहुत देर लगा दी तू ने

तिरी ख़ुश-बू से मिरे दिल में खिले दर्द के फूल
सो गई थी जो बला फिर से जगा दी तू ने

मेरी आँखों में अंधेरे के सिवा कुछ भी न था
इस ख़राबे में ये क्या शम्अ जला दी तू ने

ज़िंदगी भर मुझे जलने के लिए छोड़ दिया
सब्ज़ पत्तों में ये क्या आग लगा दी तू ने

कोई सूरत भी रिहाई की नहीं रहने दी
ऐसी दीवार पे दीवार बना दी तू ने

मैं तेरे हाथ न चूमूँ तो ये ना-शुक्री है
दौलत-ए-दर्द तमन्ना से सिवा दी तू ने

कभी कह दूँ तो ज़माना मिरा दुश्मन हो जाए
दिल को वो बात भी चुप रह के बता दी तू ने

वो तेरे पास से चुप-चाप गुज़र कैसे गया
दिल-ए-बे-ताब क़यामत न उठा दी तू ने

काश् वापस तुझे गोयाई न मिलती ‘श्हज़ाद’
बोल कर आज बहुत बात बढ़ा दी तू ने

उसे कहने के लिए लफ़्ज़ कहाँ से आए
दास्तान-ए-श्ब-ए-ग़म कैसे सुना दी तू ने

उस को भी उस की निगाहों में बहुत ख़्वार किया
अपनी तौक़ीर भी मिट्टी में मिला दी तू ने

मैं अकेला हूँ यहाँ मेरे सिवा कोई नहीं 

मैं अकेला हूँ यहाँ मेरे सिवा कोई नहीं
चल रहा हूँ और मेरे नक़्श-ए-पा कोई नहीं

ज़ेहन के तारीक गोशों से उठी थी इक सदा
मैं ने पूछा कौन है उस ने कहा कोई नहीं

देख कर हर एक शय का फै़सला करते हैं लोग
आँख की पुतली में क्या है देखता कोई नहीं

किस को पहचानूँ कि हर पहचान मुश्किल हो गई
ख़ुद-नुमा सब लोग हैं और रू-नुमा कोई नहीं

नक़्श-ए-हैरत बन गई दुनिया सितारों की तरह
सब की सब आँखें खुली हैं जागता कोई नहीं

घर में ये मानूस सी ख़ुश-बू कहाँ से आ गई
इस ख़राबे में अगर आया गया कोई नहीं

पैकर-ए-गुल आसमानों के लिए बे-ताब है
ख़ाक कहती है कि मुझ सा दूसरा कोई नहीं

उम्र भर की तल्ख़ियाँ दे कर वो रूख़्सत हो गया
आज के दिन के सिवा रोज़-ए-जज़ा कोई नहीं

गुज़रने ही न दी वो रात मैंने

गुज़रने ही न दी वो रात मैंने
घड़ी पर रख दिया था हाथ मैंने

फ़लक की रोक दी थी मैंने गर्दिश
बदल डाले थे सब हालात मैंने

फ़लक कशकोल लेके आ गया था
सितारे कर दिए खैरात मैंने

शऊरे जात ने ये रस्म भी निबाही थी

शऊरे जात ने ये रस्म भी निबाही थी
उसी को क़त्ल किया जिसने ख़ैर चाही थी

तुम्हीं बताओ मैं अपने हक़ में क्या कहता
मेरे खिलाफ़ भरे शहर की गवाही थी

कई चरागनिहाँ थे चराग़ के पीछे
जिसे निगाह समझते हो कमनिगाही थी

तेरे ही लश्करियों ने उसे उजाड़ दिया
वो सरज़मी जहाँ तेरी बादशाही थी

इसीलिए तो ज़माने से बेनियाज़ था मैं
मेरे वजूद के अन्दर मेरी तबाही थी

तेरी ज़न्नत से निकाला हुआ इन्सान हूँ मैं
मेर ऐजाज़ अज़ल ही से ख़ताकारी है

दो बलायें मेरी आँखों का मुकद्दर ‘शहजाद’
एक तो नींद है और दूसरे बेदारी है

वो मेरे पास है क्या पास बुलाऊँ उसको

वो मेरे पास है क्या पास बुलाऊँ उसको
दिल में रहता है कहाँ ढूंढने जाऊँ उसको

आज फिर पहली मुलाकात से आगाज़ करूँ
आज फिर दूर से ही देखकर आऊँ उसको

चलना चाहे तो रखे पाँव मेरे सीने पर
बैठना चाहे तो आँखों पे बिठाऊँ उसको

वो मुझे इतना सुबुक इतना सुबुक लगता है
कभी गिर जाये तो पलकों से उठाऊँ उसको

शबे ग़म को सहर करना पड़ेगा

शबे ग़म को सहर करना पड़ेगा
बहुत लम्बा सफ़र करना पड़ेगा

सबा नेज़े पे सूरज आ गया है
ये दिन भी अब बसर करना पड़ेगा

ये आँखें सीपियाँ हैं इसलिए भी
हर आँसू को गोहर करना पड़ेगा

उसे रुखसत ही क्यूँ होने दिया था
ये गम अब उम्र भर करना पड़ेगा

कहा तक दरबदर फिरते रहेंगे
तुम्हारे दिल में घर करना पड़ेगा

अभी तक जिसपे हम पछता रहे हैं
वही बारे दिगर करना पड़ेगा

मुहब्बत में तुम्हे जल्दी बहुत है
ये किस्सा मुक्तसर करना पड़ेगा

बहुत आते हैं पत्थर हर तरफ से
शज़र को बेसमर करना पड़ेगा

अज़ाबे जाँ सही तरके ताल्लुक
करेंगे हम अगर करना पड़ेगा

जलाया था मैंने दिया किसलिए

जलाया था मैंने दिया किसलिए
बिफ़रने लगी है हवा किसलिए

अगर जानते हो कि तुम कौन हो
उठाते हो फिर आइना किसलिए

जो लिखा हुआ है वो होना तो है
उठाते हो दस्ते दुआ किसलिए

इसी काफिले का मुसाफिर हूँ मैं
मेरा रास्ता है जुदा किसलिए

बहुत मुख्तलिफ़ थी मेरी आरज़ू
मुझे ये ज़माना मिला किसलिए

भरी अंजुमन में अकेला हूँ मैं
मगर ये नहीं जानता किसलिए

मैं ‘शहजाद’ हर्फे ग़लत हूँ तो फिर
मुझे उसने रहने दिया किसलिए

अपनी तस्वीर को आँखों से लगाता क्या है 

अपनी तस्वीर को आँखों से लगाता क्या है
एक नज़र मेरी तरफ देख तेरा जाता क्या है

मेरी रुसवाई में तू भी है बराबर का शरीक़
मेरे किस्से मेरे यारों को सुनाता क्या है

पास रहकर भी न पहचान सका तू मुझको
दूर से देखकर अब हाथ हिलाता क्या है

सफ़रे शौक में क्यूँ कांपते हैं पाँव तेरे
आँख रखता है तो फिर आँख चुराता क्या है

उम्र भर अपने गरीबां से उलझने वाले
तू मुझे मेरे ही साये से डराता क्या है

मर गए प्यास के मारे तो उठा अबरे करम
बुझ गयी बज़्म तो अब शम्मा ज़लाता क्या है

मैं तेरा कुछ भी नहीं हूँ मगर इतना तो बता
देखकर मुझको तेरे ज़ेहन में आता क्या है

तुझमें कुछ बल है दुनिया को बहाकर लेजा
चाय की प्याली में तूफ़ान उठाता क्या है

तेरी आवाज़ का जादू न चलेगा उनपर
जागने वालो को ‘शहजाद’ जगाता क्या है

ईमाँ को एक बार भी जुम्बिश नहीं हुई /

ईमाँ को एक बार भी जुम्बिश नहीं हुई
सौ बार कूफ़ियों के कदम डगमगा गए

हम इस ज़मीन को लाये हैं आसमानों से
और इन्तिख़ाब किया है कई जहानो से

यही जबाब मिला अब वतन ही सब कुछ है
बहुत सवाल किये हमने नुक्तादानों से

ख़ुदा से उसका करम मांगते हैं हम ‘शहजाद’
चलें तो आगे निकल जाएँ कारवानो से

जो शज़र सूख गया है वो हरा कैसे हो

जो शज़र सूख गया है वो हरा कैसे हो
मैं पयम्बर तो नहीं मेरा कहा कैसे हो

जिसको जाना ही नहीं उसको खुदा क्यूँ मानें
और जिसे जान चुके हैं वो खुदा कैसे हो

दूर से देख के मैंने उसे पहचान लिया
उसने इतना भी नहीं मुझसे कहा कैसे हो

वो भी एक दौर जब मैंने उसे चाहा था
दिल का दरवाज़ा है हर वक़्त खुला कैसे हो

उम्र सारी तो अँधेरे में नहीं कट सकती
हम अगर दिल न जलाएं तो ज़िया कैसे हो

जिससे दो रोज भी खुलकर न मुलाकात हुई
मुद्दतों बाद मिले भी तो गिला कैसे हो

अब तक उसकी मुहब्बत का नशा तारी है

अब तक उसकी मुहब्बत का नशा तारी है
फूल बाकी नहीं खुशबू का सफ़र जारी है

आज का फूल तेरी कोख से ज़ाहिर होगा
शाखे दिल खुश्क न हो अबके तेरी बारी है

ध्यान भी उसका है मिलते भी नहीं हैं उससे
जिस्म से बैर है साये से वफादारी है

इस तगो ताज़ में टूटे हाँ सितारे कितने
आसमाँ जीत सका है न ज़मी हारी है

कोई आया है अभी आँख तो खोलो ‘शहजाद’
अभी जागे थे अभी सोने की तैयारी है

धूप निकली है तो बदल की रिदा मांगते हो 

धूप निकली है तो बादल की रिदा माँगते हो
अपने साये में रहो ग़ैर से क्या माँगते हो

अरसा ऐ हश्र में बक्शिश की तमन्ना है तुम्हें
तुमने जो कुछ न किया उसका सिला माँगते हो

उसको मालूम है ‘शहजाद’ वो सब जानता है
किसलिए हाथ उठाते हो दुआ माँगते हो

ये सोचकर कि तेरी ज़वीं पर न बल पड़े

ये सोचकर कि तेरी ज़वीं पर न बल पड़े
बस दूर ही से देख लिया और चल पड़े

ऐ दिल तुझे बदलती हुई रुत से क्या मिला
पौधों में फूल और दरख्तों में फल पड़े

सूरज सी उसकी तबा है शोला सा उसका रंग
छू जाये उस बदन को तो पानी उबल पड़े

बहुत ख़राब किया ख़्वाहिशाते दुनिया ने 

बहुत ख़राब किया ख़्वाहिशाते दुनिया ने
ज़रा ज़रा से ये बुत बन गए ख़ुदा मेरे

ये दुश्मनों से नहीं जात से लड़ाई है
किसी भी काम न आयेंगे दस्तो पा मेरे

तू दोस्तों की तरह फ़ासला न रख इतना
हरीफ़ है तो फिर आ पास बैठ जा मेरे

ये और बात कि मैं बज़्म में अकेला हूँ
बहुत करीब ही बैठे हैं आशना मेरे

वो रौशनी थी कि मैं कुछ न देख पाया था
कल आफ़ताब बहुत ही करीब था मेरे

आरज़ू की बेहिसी का ग़र यही आलम रहा 

आरज़ू की बेहिसी का गर यही आलम रहा
बेतलब आएगा दिन और बेख़बर जाएगी रात

शाम ही से सो गए हैं लोग आँखे मूंदकर
किसका दरवाज़ा खुलेगा किसके घर जाएगी रात

जल भी चुके परवाने हो भी चुकी रुसवाई 

जल भी चुके परवाने हो भी चुकी रुसवाई
अब खाक उड़ाने को बैठे हैं तमाशाई

अब दिल को किसी करवट आराम नहीं मिलता
एक उम्र का रोना है दो दिन की शनासाई

इक चोर छुपा बैठा है सीने की गुफा में
इस खौफ से इक उम्र हमें नींद न आई

चोरी की तरह ज़ुर्म है दौलत की हवस भी

चोरी की तरह ज़ुर्म है दौलत की हवस भी
वो हाथ कटें जिनसे सख़ावत नहीं होती

तय हमसे किसी तौर मुसाफ़त नहीं होती
नाकाम पलटने की भी हिम्मत नहीं होती

जिंदानिओं क्यूँ अपना गला काट रहे हो
मरना तो रिहाई की ज़मानत नहीं होती

जो तूने दिया है वही लौटायेंगे तुझको
हमसे तो इमानत में खयानत नहीं होती

किस बेतलबी से मैं तुझे देख रहा हूँ
जैसे मेरे दिल में कोई हसरत नहीं होती

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