शिवबहादुर सिंह भदौरिया की रचनाएँ

पुरवा जो डोल गई 

पुरवा जो डोल गई,
घटा घटा आँगन में जूड़े-से खोल गई।
बूँदों का लहरा दीवारों को चूम गया,
मेरा मन सावन की गलियों में झूम गया;
श्याम रंग परियों से अम्बर है घिरा हुआ,
घर को फिर लौट चला बरसों का फिरा हुआ;
मइया के मन्दिर में
अम्मा की मानी हुई-
डुग-डुग-डुग-डुग-डुग बधइया फिर बोल गई।

बरगद की जड़ें पकड़ चरवाहे झूल रहे,
बिरहा की तानों में बिरहा सब भूल रहे;
अगली सहालक तक ब्याहों की बात टली,
बात बड़ी छोटी पर बहुतों को बहुत खली;
नीम तले चीरा पर
मीरा की बार बार
गुड़िया के ब्याह वाली चर्चा रस घोल गई।

खनक चूड़ियों की सुनी मेंहदी के पातों नें,
कलियों पै रंग फेरा मालिन की बातों ने;
धानों के खेतों में गीतों का पहरा है,
चिड़ियों की आँखों में ममता का सेहरा है;
नदिया में उमक-उमक
मछली वह छमक-छमक
पानी की चूनर की दुनियाँ से मोल गई।

झूले के झूमक हैं शाखों के कानों में,
शबनम की फिसलन है केले की रानों में;
ज्वार और अरहर की हरी हरी सारी है,
सनई के फूलों की गोटा किनारी है;
गाँवों की रौनक है
मेहनत की बाँहों में,
धोबिन भी पाटे पर हइया छू बोल गई।

सूख रहे धान

सूख रहे धान और पोखर का जल,
चलो पिया गुहरायें बादल-बादल।

रंग की नुमाइश इन्द्र नहीं लाये,
नदी नहीं बाहें तट तक फैलाये;
सजे कहाँ मेघ-अश्व
बजे कहाँ मादल,
क्षितिजों की आँखों में अँजा कहाँ काजल।

लदे कहाँ नींबू, फालसे, करौंदे,
बये ने बनाये कहाँ घर घरौंदे,
पपिहे ने रचे कहाँ
गीत के महल,
गजल कहाँ कह पाये ताल में कँवल।

पौदों की कजराई धूप ले गई
टूटती उमंगों के रूप दे गई
द्वारे पर मँहगाई
खटकाती साँकल
आई है लेने कंगन या पायल।

इन्द्र को मनायेंगे टुटकों के बल
रात ढले निर्वसना जोतेंगी हल
दे जाना, तन-मन से
होकर निर्मल
कोंछ भर चबेना औ लोटे भर जल।

बये के घोसले

लग गये बबूल पर
नये-बये के घोंसले।

एक-तो बबूल
दूजे ताल के किनारे,
पुरवा दे झकोरे
पछुवा ताना मारे;
देख जाँय
झूमाझाम
जिनके पस्त हौसले।

सवार घन्नई पै-
कोई हाथ है पसारता,
पाल्हरें सिंघाड़े की-
इधर-उधर सँवारता,
देखता है
बार-बार,
गदबदायी कोंपले।

लुके छिपे नहा रही है
बादलों में बिजलियाँ,
ताल में कुमारियाँ
सिरा रही हैं कजलियाँ
उछालती हैं कीच
ये हैं:
मौजी मन के चोंचले।

दिन आ गये क्वार के

दिन
आ गये क्वार के,
तनिक देख तो लेते पार द्वार के।

हिलने लगे
काँस के उजले-उजले मुर्दल,
नदियाँ श्वेत वस्त्र पहने हैं
हरे-हरे ब्लाउज-
सिवार के।

रस-घट बाँधे लम्बी ईखें
गाँठ-गाँठ में, पोर-पोर में,
नैहर से लौटी युवती सी
वासमती की गन्ध महकती
ठौर-ठौर में,

फूल खोंस कर मूँग
झूलती है उमंग में
दाने नये पहन इतराती ज्वार,
कहें क्या रंग ढंग जो-
सुख सिंगार के।

दहलीज से दुआरे

आओ
निकल कर बाहर
दहलीज से दुआरे-
तुम्हें चाँदनी पुकारे।

श्वेताम्बरा पुजारिन है यामिनी निराली,
यह हाथ में सहेजे है थाल फूल वाली;
यह आरती धरा के।
हर रूप की उतारे।

अब चाँदनी खुशी में फूली नहीं समाये,
बेलाग दोस्ती यह हर एक से बढ़ाये;
खेले छुआछुवौवल
दौड़े
किरण पसारे।

जो रोकती हैं डालें उनको डपट रही है,
पत्ते ड़े जो टूटे उनसे लिपट रही है;
हर एक टूटे दिल को-
माँ की तरह दुलारे।

दुग्धवर्णा चाँदनी

बिछ रही है देह
भू पर,
दुग्धवर्णा चाँदनी की।

बाग भर में पात केले का
अकेला हिल रहा है,
प्रस्फुटन का प्रथम ताजा कम्प
जैसे मिल रहा है;
शिथिल होती जा रही है,
आन्तरिकता-
यामिनी की।

स्वस्थ शीशम
वह खड़ा निर्लिप्त-सा
जो संयमी है,
बात क्या? निस्पन्द गुमसुम
टीस क्या, कैसी कमी है,
लग रही मुस्काना उसकी
कुछ प्रयत्नज-
म्लान फीकी।

पढ़ चुका चुपचाप झुकती-
डालियों के व्यथित मन को,
एक कोई दर्द
व्याकुल कर रहा पूरे चमन को;
मौन कोई
मुखर कोई
गूँथता है जलन जी की।

बिखरे सम्बन्ध

एक नया गीत दिया
फिर गुलाब-गन्ध ने,
बाँध लिया मुझको आँचल के छन्द ने।

आम्र-वनों ने जी भर कोकिल के बोल पिये,
ताजी मंजरियों ने गन्ध-कोष खोल दिये;
स्वप्निल आँखें खोली ऊँघते कछारों ने,
पोर-पोर कसा उन्हें चाँदनी-प्रसारों ने;
एक जीत दी मुझको-
तन के अनुबन्ध ने।

भूले गृहकाज भ्रमर बन्द जलज के तन में,
सुन्दरता से बढ़कर सत्य नहीं त्रिभुवन में,
चन्दन वासित बन्धन क्षण पर क्षण बीत रहे,
अन्तस के राग सभी गूँजहीन रीत रहे;
एक रीति दी मुझको-
रीतते मिलिन्द ने।

रूपहीन गन्ध-गीत बेले ने भी गाया,
मेरे ही अर्थों को मुझमें ही महकाया,
कई गूढ़ गीत रचे चन्दनी कसावों ने,
व्यापक व्याख्या कर दी फागुनी हवाओं ने,
एक प्रीति दी मुझको-
बिखरे सम्बन्ध ने।

पतझर के कानों में

आसमान का गात बँधा है तारों की जंजीर में,
खेल रही है खेल चाँदनी-
फागुन की जागीर में।
बिना नाल के फूल थिरकते हैं यमुना की धार में,
जैसे उड़-उड़ सपने चलते पहले-पहले प्यार मेें;
रोक रहा है नजर चन्द्रमा अब धरती के चीर में,
मानों कोई नयन गड़ाता-
मुग्धा की तस्वीर में।

धीरे-धीरे पाँव बढ़ाती एक मोरनी डाल में,
नीर छलकने को ज्यों डरती नव पनिहारिन चाल में;
हँसी-खुशी की हाट देखकर परिवर्तन है पीर में,
कली कंज की शरमाती है-
ज्यों भँवरों की भीर में।

भोली निरी ओस की बूँदें पड़ी सोचती बाग में,
बातें करो चाँद से हँस-हँस सोचो मत क्या भाग में;
जगमग-जगमग शुक्र चमकता प्राची की प्राचीर में,
आशा का ईश्वर ज्यों हँसता-
दुखिया की तकदीर में।

पतझर के कानों में भँवरे स्वर हैं ऐसे डालते,
मानों किसी पुराने कवि को नये गीत ललकारते;
मन की बात कोकिला कहती डूब प्यार के नीर में,
दुखी-सुखी दोनों को प्यारे-
रँगना नये अबीर में।

फागुनी सबेरे

फागुनी सबेरे
वन-बाग महमहाये।

उँगली से पंखुड़ियाँ खोलती समीरन,
बिरवों से गुप-चुप यूँ बोलती समीरन;
क्यों बड़े सबेरे-
तुम ओस में नहाये।

पेड़ों पर कल के सोये स्वर फिर जागे,
कुछ डालों पर डोले कुछ उड़कर भागे;
कुछ लम्बे गेहूँ के-
साथ गहगहाये।

गभुआरे तन पर हर फूल है सलोना,
कंधे-से अरहर अब तौल रही सोना;
कह न सके कोई-
घर-गाँव गुनगुनाये।

छिमियारे सरसों के पीताम्बर डोले,
मेड़ों तक झुककर वे राह रोक बोले;
नगर छोड़कर कविवर-
आप कहाँ आये?

गाँव की गुजरिया 

गाँव की गुजरिया-
कहीं नाचे रे!

दँहकी के संग-संग बाँसुरिया तान भरे,
धीमे से नस-नस की पीर हरे, प्रान भरे;
कौन से जनम के सुने
गीत की भनक पड़ी,
भरने लगीं रागिनी कुलाँचे रे!

गहरी बेहोशी में पेड़ों से झरैं पात,
गाय-भैंस बछड़ों की ठगी खड़ी रहै पाँत;
लहरों के पृष्ठों की-
उलट पलट,
पास की तलेया यह कौन कथा बाँचे रे?

दूरागत वंशी की ध्वनियाँ सब डूब चलीं,
उड़ती हुई चिड़ियों की छायायें हिली डुलीं,
गाँठ-गाँठ पानी में
बागुला मुदरिंस-सा-
प्रश्न-पुस्तिका को मौन जाँचे रे।

रंगभरा मौसम

रंग भरा मौसम गुलाल-गीत गायें
मुट्ठी भर-भर अबीर हवा में उड़ायें।

स्नेह सने हाथों से पिचकारी साधें,
रँग भीगे रिश्तों को प्राणों से बाँधे;
आओ
इतिहास-वक्ष पर गंध-वृक्ष फिर
नये उगायें।

रोज कहाँ जुड़ती-मन की टूटी कड़ियाँ,
पहन क्यों न लें हम फूलों की हथकड़ियाँ;
यह पलाश-वन
पूरा
आँख से उठायें।

एक गंगा-स्नान

इस तपन से जेठ की
घबरा गये थे प्राण,
पर अचानक याद आया, एक गंगा-स्नान।

एक दूजे का परस्पर कर गहे थे,
तैरकर कुछ दूर हम सँग-सँग बहे थे;
देख लहरों का लहर का स्नेह-गुम्फन,
एक पल को हो चले हम मौन-उन्मन;
पर न थे
इतने कभी हम चपल और नादान,
सह न पाये संयमों का हम कभी अपमान।

उम्र भर की प्यास को पनघट मिला था,
अन्ध-तम को ज्योति का जमघट मिला था;
एक नन्हा दीप बहता आ रहा था,
प्रीति के संगीत को दुहरा रहा था;
रह न पाये मौन
मुखरित हो चले थे प्राण,
वह तुम्हारा और मेरा अमर है सहगान।

तुम अखण्डित इस तरह मन में बसे थे,
जिस तरह भीगे वसन तन को कसे थे;
एक सँग निरखे गये दो एक तारे,
सान्ध्य-नभ पर जो कि पहले थे पधारे;
रेत पर यूँ
ककड़ियों के पात पात थे छविमान,
विरह-रेगिस्तान पर ज्यों मिलन-नखलिस्तान।

स्नेह-सिंचित बालुका पर बैठना वह,
बहुत विह्वल पुतलियों का भेंटना वह;
‘मैं तुम्हारा कौन,’-मेरा प्रश्न करना,
और उत्तर में तुम्हारा नभ निरखना;
मुग्ध विस्फारित नयन का
दिव्य वह आह्वान,
आज भी जिसमें समाये जा रहे हैं प्राण।

और के मेहमान

जानता हूँ
और के मेहमान हो तुम,
आज भर स्वीकार लो मेरा निमन्त्रण।

मैं सरोवर-सा बँध अकुला रहा हूँ,
मुक्त होकर मैं नहीं कब से बहा हूँ;
पर्वतों को पार कर आया पवन है,
चाँदनी भी छोड़कर आयी गगन है;
स्पर्श के संकेत:
तोड़ो जड़ नियन्त्रण,
यह अबाधित और अकलुष चाह के क्षण

हर अधर को गीत कोई चूमता है,
बाग का हर एक पत्ता झूमता है;
हर दिशा, हर दृश्य से स्वर छूटते हैं,
मूक जड़ता के सहóों कंठ जैसे फूटते हैं;
शब्द के संकेत:
केवल गीत-गायन
लक्ष्य से बढ़कर सुरीली राह के क्षण

होठ की परछाइयाँ गाने लगी हैं,
दर्द को जमुहाइयाँ आने लगी हैं;
जीतती है हार बारम्बार मेरी,
लरजती है महकती मनुहार मेरी;
गन्ध के संकेत:
झूठे मान-प्रकरण,
यह सुगन्धित और शीतल दाह के क्षण।

अनथके अवरोह मेरी रागिनी के,
छू रहे हैं छोर अन्तिम चाँदनी के;
छा रही है ऐन्द्रजालिक मूर्च्छना सी,
रस निमग्ना यह सुहागिन अर्चना सी;
रूप-रस-संकेत:
तर्कातीत द्रावक
यह अतल गहराइयों की थाह के क्षण,

पाती

मैं लिखता हूँ यह पाती तुमको भरे-भरे मन से,
पढ़ना इसको जब गगन कभी घिर जा-
सजल घन से।

सब कूल-कगारे तोड़ हृदय सागर-सा बहता है,
कोई दुख है जो केवल तिनके सा अब तिरता है;
तन की डाली-डाली में क्या बेला-सा गमका है,
तुमको लिखने में प्राण नये चन्दन-सा महका है;
जब उठने लगे सुगन्ध
तुम्हारे भी प्रिय तन-मन से,
छूना भर केवल पाती को तुम अपने कंगन से।

खामोश पवन सब पेड़ों का जब सिर सहलाता हो,
धीमे-धीमे बाँसुरी कहीं सुनसान बजाता हो;
बादल का पर्दा हटा आँख जब चाँद खोलता हो,
ऊपर को देखे मगर पपीहा कुछ न बोलता हो;
उस समय खोलना
पाती को भी तुम निर्भय मन से,
जब कोयल का संगीत मुक्त करता हो बन्धन से।

जी ऊब गया होगा आदर्शों की परिपाटी से,
घुल मिल लेना कुछ देर सरल सपनों की घाटी से;
जग पड़ना तो मुँह धो लेना सुस्मृति के पानी से,
दाना का लेना काम तनिक अपनी नादानी से;
तुम पास उसी के जाना
फौरन, मन के स्यन्दन से,
जो ख्याल बड़ा प्यारा हो तुमको अपने बचपन से।

यदि किसी भाव का अर्थ न तुमसे साफ निकलता हो,
या शब्द कहीं कोई निश्छल प्राणों को छलता हो;
या अगर कहीं हर अक्षर हाथों-सा लम्बा होकर,
हो चाह रहा तुमको भेंटे अपनी सुध-बुध खोकर;
तो हाथ प्रभावित करे
तुम्हें जो व्याकुल दर्शन से,
तुम लिपट उसी से जाना अपने पूर्ण समर्पण से।

नैनीताल की पत्र-प्रतीक्षा 

मैं प्रतीक्षा में तुम्हारे पत्र की, बैठा हुआ हूँ
ढल गया हालाँकि दिन
काला अँधेरा घिर रहा है।
इन पहाड़ों का सलोनापन कभी वर्णन करूँगा,
जब अनूठा शायराना रंग आँखों में भरूँगा;
इस समय तो पात चिकने चीड़ के उठ-गिर रहे हैं,
यह तुम्हारी दृष्टि के असफल नकल सी कर रहे हैं;
फूल-कलियों को झुलाता
झूलता चलता पवन यह,
हृदय को झकझोरने में-
सच, बहुत माहिर रहा है।

बेमुड़े मेरी तरफ चिट्ठीरसाँ ने की तयारी,
खीझ, झुँझलाहट, निराशा और बेहद बेकरारी
तय किया तुमसे न बोलूँगा, मिला भी यदि अचानक,
मोड़ लूँगा मुँह, न लूँगा दर्द फिर ऐसा भयानक,
दूर तक कमुछ घूम फिर कर
भूल जाऊँगा गमों को,
तैश मेरी आँख में अब, अश्रु बन-बन-
तिर रहा है।

दो कदम चलकर इरादों ने नया ही गुल खिलाया,
क्यों न बैठूँ? फिर न सोचूँ, फिर न आखिर पत्र आया;
भूख-रोजी, काम-धन्धे, जब-कुण्ठा सब खड़े हैं,
मुए बरसों-से सभी के वक्त के पीछे पड़े हैं;
क्या पता मजबूर होकर ही
न कुछ भी बन पड़ा हो,
दूर का मसला किसी को ही कहाँ-
जाहिर रहा है।

सब समझकर भी न जाने बेखबर क्यों डालता हूँ?
और बारम्बार थककर कागजों को खोलता हूँ;
लो, बहुत अच्छा हुआ जो पत्र पिछला मिल गया है,
पट अनेकों बार मुरझा मन अचानक खिल गया है;
दे दिलासा, धैर्य, साहस,
आज तो समझा लिया है,
मन पुराने पत्र ही पर देर से-
चल-फिर रहा है।

सिन्दूरी क्षण

आखों के लहरीले क्षण
बाँधों आँचल से।

पपिहे का स्वर सबके हृदय को टटोल गया,
काँप गई डाल-डाल पात-पात डोल गया;
अनछुई छुवन देकर भाग गई पुरवाई,
चम्पे की नरम डाल बार-बार लहराई;
मन के संगीत भरे क्षण बाँधो-
पायल से।

साँसों के तल छूती बजती जो शहनाई,
परिचित छाया-आकृति आँगन तक उड़ आई;
छरहरा कनैर मौज पाकर हिलता जाये,
जैसे लचका खाकर डोला चलता जाये;
अर्पण के सिन्दूरी क्षण बाँधो-
काजल से।

मैं ही दर्शक भी और एक बड़ा मेला हूँ,
बोलती हुई यादों बीच मैं अकेला हूँ;
तन जलता मन जलता, जलता सारा घर है,
दूरी का सूरज तो आपे से बाहर है;
ताप भरे प्राणों के क्षण बाँधों-
बादल से।

नदिया सी कोई

रात चाँदनी फिर आई।
मेरी पिछली यात्राओं के
कुछ भूले चित्र-
उठा लाई।
मैं मुड़ा अनेक घुमाओं पर,
राहें हावी थीं पावों पर
फिर खनका आज यहाँ कंगन,
निर्व्याख्या हैं मन के कंपन;
सन्दर्भों की कथा,
काँपते तरु-पातों ने दुहराई।

सुन पड़ते शब्द बहावों के,
दो पाल दिख रहे नावों के;
धारा में बह-बह कर आते,
टूटे रथ किन्हीं अभावों के;
मेरी बाहें
तट-सी फैलीं
नदिया-सी कोई हहराई।

कहाँ तक बखाने

कहाँ तक बखानें।

जितना
और जहाँ तक
अभी देखना चाहें,
दिखती रहतीं:
उढ़के हुए द्वार के पीछे
राह बिछी दो आँखें
अर्धखुली दो बाहें;
जिनकी मर्म-व्यथा को
दुनियाँ भर के लोग-
न जानें।

क्या यही हमें होना

क्या यही हमें होना।

फैलती हुई बाहों का
सहम-सहम जाना,
बढ़ती हुई दृष्टियों को
रोक-रोक लेना,
हाथ लगे जो कुछ भी-
बार-बार खोना।

भूली किसी वस्तु के-
बहाने मुड़ना,
अवश खड़ी
द्वार लगी
मूर्तित देह को निरखना:
ज्यों बनी हुई रेखाओं पर
कूँची मसि फेरे,
चलना: ज्यों कोई-
ऊँची डाल से गिरे;
बिना अश्रु ढुलकाये-
रोना।

बचपन के अर्थ बोध

भरा पुरा मैं
जैसे
चित्र सजी दालानें।
बचपन के
सँगी साथी अर्थ-बोध
रह रह कर मुझे टेरते,
नदी किनारे
वन-वृक्षों के तले
खेल के लिए घेरते;
संत्रासों की कथा सुनें
या इनका कहना मानें।

तुम ही हुए न घर के

हुए
सब हुए
तुम ही हुए न घर के।
कहाँ-कहाँ पर
माथ न टेका-
हाथ न जोड़े,
किस मन्दिर में फूल न छोड़े-
हैं-
अँजुरी भर-भर के।
अगवारे का
कुआँ ब्याहने
कई बार उतरे हैं डोले,
खुलते खिड़की, चिहुँकी पिड़की-
कागा बोले-
अंग-अंग फरके।

बरस बरस सरके 

छप्पर हुआ-
पुराना,
घुने बाँस करके।
नन्हें सिर
पहाड़ रख रख कर
बरस-
बरस सरके।

काटी गयीं
बहुत बरसातें,
रिसती और टपकती-
छत के तले
हटाते खाट
रात भर-
इधर-उधर
करके।

लो भुला दिया

लो भुला दिया
मैंने।
अहं के कदम्ब चढ़ा
बाँसुरी वादक-न कही,
सिद्धि औ प्रसिद्धि की
दुकानों में
बिका हुआ साधक-
न कहो;
देख तो लिया होगा:
कैसे मोती से जीवन को
घुँघची से-
तुला दिया
मैंने।

अब तुमसे क्या मिले

अब
तुम से क्या मिलें?
बातें सुषुप्ति की-
याद नहीं,
जाग्रति की क्या कहें
सपनों तक
फैल गईं
दफ्तर की फाइलें।

अनियन्त्रित यात्री

अनियन्त्रित यात्री
अँखुओं पर-
पाँव धरें।

कंठ अकेला-कड़ा
करे क्या?
कोलाहल में पड़ा;
पुकारें किसे
सुनेगा कौन एक की-
बात
कहाँ फुरसत है,
सभी मुड़ रहे उधर
जिधर भारी बहुमत है,
नक्षत्रों की चर्चा ही क्या:
बड़े बड़े सूरज
ज्योतिर्मय
जुगुनू के घर-
पानी भरें।

अरे क्या करें

अरे क्या करें?
लोना लगी हुई दीवारें
सेरों माटी झरें।

कोई नहीं हटाना चाहे
जगह जगह-
मकड़ी के जाले,
रोशनदान, खिड़कियाँ
सारी, बन्द द्वार-
अँधियारा पाले;
कहाँ कहाँ हम
अलख जगायें
कहाँ कहाँ अब-
दीप धरें।

लक्ष्यहीन कहाँ चले

दिशाहीन गगन-तले
लक्ष्यहीन कहाँ चले-
चलते रथ-चक्रों को मोड़ो हे सारथी।

चाहे जिन दामों की मँहगी यह ऊँचाई,
तिल भर ठहराव नहीं, पग-पग फिसलन, काई;
उतरो मैदानों में,
खेतों-खलिहानों में,
आकाशी स्वप्न-भूमि छोड़ो परमार्थी।

यह जो है अन्ध-गुफा अपनी ही रची हुई,
देखो कुछ ज्योति अभी इसमकें ही बची हुई;
मानो, कहना मानो,
किरण-बाण सन्धानों,
तम का दुर्भेद्य दुर्ग तोड़ो पुरुषार्थी।

तन कर दृढ़ तरुवर से, आँधियाँ लपेटो रे!
पथ के व्यवधानों को, वस्त्र-सा समेटो रे;
क्रुद्ध वीर्य गाने दो
भैरवी जगाने दो
वीणा-तज, ले त्रिशूल दौड़ो हे भारती।

उड़ती दिशाएँ

भरे-पुरे घर आँगन खोखले हुए।
रक्त नहीं हिलता है स्याह-सी शिराओं का,
अंधड़ में पता नहीं, उड़ रही दिशाओं का;
भले भले सिर थामे
सोच रहे, क्यों भले हुए?
पंख कटी चिड़ियों सी घूमती समस्यायें,
प्रतिक्रियायें बाँझिन, छिपती दायें बायें;
साँवला हुआ सूरज-
तम के हैं रँग खुले हुए।
समझौता कोई हो प्रस्तुत हैं नर-नागर,
पीले पत्तों जैसे झर जाते हस्ताक्षर,
पुण्यों से देह
और पापों से मन मिले हुए।
हवा के दबावों से बचने की युक्ति सोचते,
शतुर्मुर्ग जैसे हम-तुम, बालू के ढेर खोजते;
निष्ठा-निष्काशन पर
जोरों से हम तुले हुए।

सँकरे गलियारे 

टकराती देह बहुत सँकरे गलियारे,
कैसे चलना होगा-
हाँक बिना मारे।
दस्तक देने पर भी द्वार नहीं खोले,
पीट ओट होते ही गूँगापन बोले;
कोलाहल में डूबी दर्द भरी आहें,
दिखती हर ओर उठी ललचायी बाहें
हानि-लाभ के-
बढ़ते जाते अँधियारे।
आ गये वहाँ पर हम, तेज जहाँ धारा,
रखते ही हाथ, धार बन रहा किनारा;
लगते ही पाँव जबकि सेतु धसक जायें,
पार उतारेंगी फिर कौन पताकायों;
कब रहे प्राण
इन बहावों के मारे।
कुछ न करे तृष्णा पर बैठी पगुराये,
बिना पूछे दर्प छतों पर पतंग उड़ाये;
बौद्धिक षडयन्त्रों के अन्धड़ हैं उड़ते,
नफरत के बालू कण आँखों में गड़ते;
जन-जन अवतार धरे
शक्ति को उतारे
क्या होगा काम एक राम के पुकारे।

इस कथन से उस कथन तक

इस कथन से उस कथन तक देख आया
आचरण ढूँढ़े न मिलता-
आदमी में।

दूसरों को ढालने के लिए व्याकुल,
किन्तु साँचे में स्वयं ढलता नहीं है;
आज का यह आदमी पारे सरीखा,
दिख रहा है तरल पर हिलता नहीं;
इस चरण से उस चरण तक देख आया
सन्तुलन ढूँढे न मिलता आदमी में।
हृदय से वक्तव्य का सम्बन्ध यह है
फूल जैसे तेज कैंची पर खिला हो,
सत्य उस दर्पण सरीखा है अभागा
जो किसी नाराज बन्दर को मिला हो,
इस गठन से उस गठन तक देख आया,
संगठन ढूँढ़े न मिलता आदमी में।
अब अगर ईश्वर मिलें तो यह कहूँ मैं
एक मेरा भी जरा सा काम कर दो,
जब न श्रद्धा प्रेम या विश्वास कुछ भी
जिन्दगी का नाम कोई और रख दो;
इस नयन से उस नयन तक देख आया
करुण मन ढूँढ़े न मिलता आदमी में।

महानगर का कमरा

गाँव से भगा लेकिन
यहाँ भी नहीं सँवरा।
चला गया सूर्य रोज,
चौड़ी सड़कों वाले छज्जों पर-
धूप को बिखेर कर,
क्या करने आता
सँकरी गलियों वाली-
मेरी मुँड़ेर पर
सीलन से भरा हुआ महानगर में कमरा।
चलते क्षण नाई जो दिखा गया आरसी,
व्यर्थ दही, अक्षत सब
झूठा हुआ ज्योतिषी,
वैसे ही शनि का प्रकोप जयों का त्यों ठहरा।
जाड़े की रात कटे:
चर्चा कर धान के पुआलों की,
नल के नीचे ग्रीषम का स्नान।
करे याद भरे तालों की,
वर्षा में
डगडगा अखाड़े का
आज भी नहीं बिसरा।

अपनी असंगतियों में

महानगर, नगर या कि गाँव,
कल-कूजन कहीं नहीं-
सिर्फ काँव काँव।
बड़े बड़े स्टूलों पर
खड़े कर दिये,
बौने बड़े कर दिये
क्या होगा रखकर
अंगद के पाँव।

गुजर गए दिन

गुजर गये दिन
जेसे-तैसे।
सूरज के कंधों पर-
डरे हुए बादल से।
जहाँ भी गया मैैं
चौतरफा भीड़ मिली घेर कर,
खोजता रहा उस आवाज को
चली गयी जो मुझको-
टेरकर;
लहरों ने रेत पर लिखा-
मेरा मन टूटा है
जैसे-जैसे।
अधरों को बार-बार छू पाई
केवल दो शक्तियाँ
स्वर वाली वंशी या
मधुर गीत पंक्तियाँ
कितने ही शब्दों के-
रंग उड़ गये,
जो कि नहीं थे-
ऐसे-वैसे।

खण्डहर उगे गुलाब 

गुलाब उग आया
खण्डहर पर।
अनगढ़ माटी की
कई-कई पर्तें,
अननुकूल कंकड़ की
अव्याहत शर्तें;
अनचाहे बोझ पत्थरों के
हटा दिये सिर से
धूप पहन-
उमग रहा जी भर।
तना…तना
पत्तियाँ हरी-
कटाव नुकीले,
अर्थ-कसे डण्ठल
समरस पंखुड़ियाँ
रँग चटकीले,
मुक्त: चेतना हुई फिर से
चर्चित है रूप-गंध
घर-घर।

चलो बायें 

प्राची ने
लाल कमल बाँधे आँचल में
चलो गायें।

अपनी-अपनी
गल्तियाँ चुने,
ज्यों सैकड़ों बरस पहले
आश्रम के छात्र कहीं-
उपवन में
सूखी लकड़ियाँ बिनें
और फिर
उन्हें हँस-हँस-
यज्ञाग्नि मैं जलायें।

नये-नये सन्दर्भों को
दृष्टि में उतारें, प्राण में समोलें,
नाखुश सम्बन्धों पर कुछ पलक भिगोलें,
पहरों पर निरखें, शब्द जहाँ से उतरें
और फिर करें पीछा-
अर्थ जहाँ तक धायें।

कुछ भी मत बाँधें-
रसग्राही पंख सधी, मुक्त कल्पनाओं के पावों में,
मधुमाखी की तरह चतुर्दिक जाने दें: गंध लदे फूलों के गाँवों में,
लाने दें:
गीतों के छत्तों तक, जितना रस ला पायें।

कई-कई दिन

कई-कई दिन।
मेले में
मन न लगे, और
अकेले जी ऊबे,
वहाँ निहारूँ अधिक
जहाँ रवि
तनिक-तनिक डूबे-
किरण लिए
अनगिन।
जल में पड़ी
वृक्ष-छाया को
आँखों मकें रोपूँ
सागर का विस्तार-
उठाकर, गागर को सोंपूँ,
बैठा रहूँ
निहारूँ
जल में मारूँ-
कंकड़ियाँ-
गिनगिन।

एक संकल्प

अब न
अपने आपसे-
मैं छल करूँगा।

कठिन सत् की भूमिका से
अधिकतर
यूँ मुक्ति पाई,
जिस तरह भय-ग्रस्त होकर,
ओढ़ले
कोई रजाई;
अब न
जीवन-प्रश्न कोई
इस तरह-
मैं कल करूँगा।

कुछ अदेखा सा

कुछ अदेखा सा
अनावृत हो रहा है,
क्या करूँगा-
तोड़कर मैं आवरण को।

यह धुएँ के वृत सा बनना-बिगड़ना,
पारदर्शी ज्योति का दिखना न दिखना;
कौंध फिर ऐसी-
कि कुल मस्तिष्क बरसा
एक क्षण को जनम तरसा गया तर-सा
यात्रा:
मुझमें समायी जा रही है,
क्या करूँगा छोड़कर इस अनुभवन को।

शब्द-वन में पैठना छाया-चरण का,
दूर तक दिखना अबाधित संतरण का,
यह असंकेतित चले जाना कहीं को;
ऊर्ध्वमुख हो, छोड़-सा देना मही को,
यह अजानी राह
कितनी रसमयी है,
क्या करूँगा छोड़, इस अमरण-
मरण को।

चलती छाया कोई

चलती छाया कोई मेरे आगे आगे,
जाड़े का दिन जैसे-
जल्दी-जल्दी भागे।

देखे होता कोई आतुर अभिसारों को,
मेरी सीमाओं औ छबि के विस्तारों को;
बीहड़ जंगल में ज्यों पगडंडी का खोना,
भारी मेले में ज्यों बालक का गुम होना;
राहें धुधली-नीली
चाहें गीली-गीली
चितवन खोयी-खोयी-
लोचन जागे-जागे।

ओझल आकृतियों को वह मेरा गुहराना,
मेरी आवाजों का घाटी में घहराना;
डरी हुई ध्वनियों का मुझ तक वापस आना,
कंकड़मारी थाली का जैसे थर्राना;
मेरी बेचैनी को
कोई क्या समझेगा
कब तक यह मन दौड़े-
तन को टाँगे-टाँगे।

एक छाया 

एक छाया-आकृति
मेले में रहने देती है
मुझे अजनबी पर
एकान्त में नहीं।
वे
भाग्यशाली हैं जो
अकेलेपन के दर्द को भोगते हैं,
हिम्मत करते और टूटते
अंधकार से लड़ते हैं,
बहादुरी का खिताब पाते, तमगे पहनते हैं,
मैं क्या करूँ?
एक छाया
मेरी हर स्थिति का गति का पीछा करती है।
जब दुनियाँ की दृष्टि बचाकर
कोई चीज छिपाकर रखता हूँ
यह उचक-उचककर देखती है,
अनभिव्यक्त रखने की इच्छा से
जब किसी विचार-तरंग को
मन पर लिखता हूँ-
यह पढ़ लेती है।
कभी-कभी
बहुत खीझकर
बर्र के डंग मारने पर जैसे
हाथ पैर पटकता हूँ
पर
यह पीछा नहीं छोड़ती।

मैंने
नितान्त गम्भीरतम् क्षणों में
जब-जब
प्रश्नाकुलता को
काँपते स्वरों में अर्थ दिया है-
क… ौ…न?
उत्तर में
हिलते छाया-होठों की शब्दहीन
भाषा
घुल गई है मेरी स्नायुओं में
पहरों रक्त-संचरणों में
ध्वनन हुआ है
तुम क…ौ….न?

पक्षघातित सफर

कहाँ आ गया?
मैं
किस आखेटक का-
शिकार-
पक्षाघातित सफर
अचानक
ठहर गया है
अथवा
किसी बड़ी इच्छा-मशीन ने
धक्का देकर रोक दिया है
रक्त बीज की गूढ़ प्रतीक-कथा के
अर्थ खोजने वाले
किसी रहस्यान्वेषक के पावों को;
और
सामने कोई बहुत परिचिता छाया
मुझे झाँकने को कहती है-
बिना जगत के एक कुएँ में
कई हाथ नीचे तक जिसकी
उखड़ी हुई लखौरी ईंटें
झरबेरी, सेंहुड़, मदार के पेड़
झाड़-झंखाड़
सभी ने छिपा दिया है अथाह जल को
बैठ गया है घेर चतुर्दिक
सर्पाकार
सर्द गहरा घना अंधकार।

आती है
भीतर से जल की गुहार
बाहर का प्यासा कोलाहल
अपनी ही जड़ता का शिकार
नहीं सुन रहा तृप्ति प्रदाता (मैं)
….. मेरी पुकार।

रिक्तता का बोध

चेहरे को
दोनों हाथों की उँगलियों से कसे हुए,
माथे को
घुटनों के बीच छिपाने का प्रयास:
इसे कायरपन
न समझो।

अनुभव कर चुकी है देह
इन बोझिल बाहों को
इन उतरे कंधों को
इस घायल सीने को
इस आत्म-पीड़न को-
सहने और सुनने की सामर्थ्य
युग-धर्म की नहीं,
केवल मुझमें है।
मैंने मना लिया है:
जिसका वक्षस्थल
दड़की हुई सीमेन्टी छत की तरह-
रसा नहीं,
जिसके मन-मन्द्राचल को
जहरीले दर्द के वासुकि ने कसा नहीं,
माना
उसने मौत का मुँह भी सिया होगा,
और चाहे जो कुछ किया होगा,
मगर जिन्दगी नहीं जिया होगा
….नहीं जिया होगा।

मेरी चाह है
इस व्यथा के अंगारे को
(जिसकी लपटें मेरे चेहरे पर दिखती है)
हथेलियों की राख की पर्तों से ढँक दूँ,
और
पानी भरने के लिए
जो घड़े हाथ में हैं
उन्हें यूँ ही तट पर
रिक्त पड़ा रहने दूँ।

मैंने अच्छी तरह
जान लिया है
ये घड़े
पानी में डूबना नहीं चाहते
वह तो मैं हूँ
जिसने पानी और घड़ों का
जबरन
डूबने और डुबाने को लाचार किया है,
लेकिन
आज ये घड़े
कुछ देर यूँ ही रहेंगे
मेरी छूछी आत्मा के
प्रतीक बनेंगे।

यह नदी का पड़ोस
यह खामोशी
मुझे अच्छी लग रही है।

तट को छोड़कर
नदी काफी दूर चली गई है,
किन्तु
रेत पर लहरों के पदचिह्न अभी ताजे हैं,
पिछली रात इस तट पर
बंजारों का डेरा था शायद…

ये टूटे चूल्हे
यह ठंठी राख
यह राख पर अधपकी-
कच्ची दाल का जूठन
यह पुरानी ढोलों को उतरी हुई खालें
ये बाँस के फर्चे
धूल में बने हुए
बच्चों के किले
ये दूधमुहों के ताजमहल
ये वीरानगी के सिंगार-
बड़े मनभावन हैं।
और यह बियाबान की कब्रगाह
जिसको नदी की लहरें
सलाम बजाती हैं,
जिसकी ईंटों पर
केवल आँधी
माथा पटकती है
क्योंकि सिजदा करने वाले नहीं रहे,
फासफोरस कहो
या
अगिया बैताल
जब तब जला देता है चिराग
क्योंकि अब
चिराग जलाने वाले नहीं रहे,

ये सब
मेरे मन पर रखे पत्थरों को-
हटा रहे हैं,
बड़ा सुख दे रहे हैं।
मैंने बहुत-बहुत सोचा है
कि युगधर्म
मुझे धारण कर लेगा
कर्म मुझे उबार लेगा
किन्तु
किसी से कुछ नहीं हुआ,
यही सूनापन मेरा मददगार है,
यही मन की रिक्तता-
हमदर्द है,
ये टूटे खण्डहर
ये छूटे रिश्ते
ये गई वस्तुओं के निशान,
यह धरती
यह आसमान,
ये दिशाओं के निर्विकार-
हाथ
मेरा साथ देते हैं-साथ।

संक्रमित व्यक्तित्व 

और
कौन है?
मेरे प्रतिबिम्ब और
मैं।

शिखरों
की तलाश में
सीढ़ी-सीढ़ी चढ़ती परछाइयाँ,
सान्ध्य-स्वर्ण-गोलक-सी
डूबती दशाब्दियाँ,
दुहरे-तिहरे होकर
उभरते अँधेरे
सब इर्द-गिर्द मेरे;
टूटे हुए दर्पण की
बर्छीली नोकों पर
बिछा हुआ व्यक्तित्व,
एक महाजन की आँख से
दूसरे महाजन की आँख तक
फेंका गया
ऋणग्रस्त-सा अस्तित्व,
विश्राम से
थकन तक
दीवारें खड़ी करते हुए हाथ,
रचने तक तुष्ट
रचकर असन्तुष्ट-
पछताते हुए माथ,
व्यक्ति से निकलकर
भागते हुए….कई-कई व्यक्ति
छायाओं की देह पर-
खिले हुए फूलों को बटोरती हुई
आँखें
और कौन हैं
मेरे प्रतिबिम्ब
और
मैं।

हाँफती सड़क का यात्री 

दग्धदाही पवन
हाँफती है सड़क
तारकोली जीभ काढ़े,
उमस के गुंजल्क में
निस्पन्द, शीतल नहीं छाया
नीमवाली,
एक भी पत्ती न हिलती
या मुरकती
अग्नि-मन्त्रों से यथा कीलित,
प्रताड़ित आन्तरिकता तोड़ती
अनुबन्ध
रगरग टूटती सी देह
कोई
बावली बदली नहीं है क्या?
दौड़कर उत्कण्ठिता हो
भाल पर जो छाँह घर दे
कठिन, समतल, रेत-बंजर और
टीले-र्पतों को, उत्स भरकर
संग मेरे पार कर दे।

प्रत्यावर्तित गतियों का दर्द

शिखरों से भी आगे
किन्हीं मोड़ो पर
पहुँचने को आतुर
मेरी यात्रा
अक्सर देखती रही
हवा-चीरते अन्तरिक्ष यानों की गतियाँ,
धुन्ध भरे धकियाये आसमानों की स्थितियाँ,
छाया भासित
ग्रह, अनगिन नक्षत्र, चन्द्र रवि रहे घूमते
विद्युत स्फुरित इसी देह के इर्द-गिर्द
पर
हुआ सदैव यही कि अचानक
मेघ-घटा गट्ठर से
छूट गिरी जल-बूँदों जैसी मेरी यात्रा,
आ पहुँची फिर
बरसों परिचित
उसी अवांक्षित गलियारे पर
हुआ जहाँ एकत्र वही बरसाती मलबा
कूड़ा कचड़ा
जिसे मँझाते पशुओं जेसे सभी
प्रबुद्ध-बुद्ध या भावुक।

अर्थयान

पीछा करते हुए
लम्बे-लम्बे बिजली के खम्भे,
सम्भवतः पा चुके प्रेत लीला का
पहला पड़ाव,
आन्तरिक अजानी तपन से
जलने लगा है मेरा मस्तक
अप्रत्याशित, स्वतः चालित ब्रेक लगने से
रुक गये हैं पाँव,
इस दुराहे पर आकर
ठहर गईं आँखें
दिखते हैं: ट्रकों में भरे हुए सुरक्षा-सामान
अम्यूनीशन लादे पटरियों पर दौड़ती
माल गाड़ियाँ
क्षेप्यास्त्रों से लैस आसमान में लटके
हवाई जहाज,
विस्फोटक गड़गड़ाहटों से भयाक्रान्त-
औरतों की तरह कानों में उँगली डाले
सुन्न हवाएँ
कटे तरबूज की फाँकों से
लाल-लाल नर-मुण्डों को
बिछाकर
अट्टहास करता महाकाल,
उड़ते हुए हाथों से फील्ड अस्पतालों को
पुकारती लाशें,
और फिर
मध्यकालीन तलवार की नोंक-सा
अ्टहास
मेरी पीठ में धँस गया है,

उफ!
रक्तस्राव
चटखता दर्द, अनगढ़ कराह
मूर्च्छना और
बनते-मिटते होठों पर शब्द-रंग
हल्की बुद् बुद् ….
फिर अर्थ-यान पर चढ़े शब्द:
मैं देख रहा हूँ
मरुस्थलों के गर्म बदन पर हरियाली बाँधती हुई नहरें
फसलें आमन्त्रित करते-
ट्यूबवेल्स
लक्ष-लक्ष शतलक्ष वस्त्र जन्मते यन्त्र
तेजो प्रभावमय
ज्ञान-केन्द्र
रचते नवयुग के
ऋचा-मन्त्र।

दो कैदी

एक ही जगह रहते
मुझमें और तुम में
सिर्फ इतना फर्क है:
मैं जानता हूँ यह निरर्थक सींखचे हैं
लोहे के,
और यह बहुत बड़ा कैदखाना;
मेरे मस्तक पर
लाल चिन्ता की सरितायें बह रही हैं-
और तुम
बड़े मजे में बजा रहे हो तसला
और
गा रहे हो गाना।

कागज की नाव

लहरों को
ऊपर-नीचे
ऊट पटाँग फेंकती है-
नदी की धार,
दहशत में काँपता है
शाम का बढ़ता हुआ घना अन्धकार,
और
ये कागज की नावों पर
बैठे हुए लोग:
कितने निश्चिन्त हैं-
जैसे बचा लेंगे इनको
माटी के माधव
जिनके हाथों में दिखती है
सरकंडों की पतवार।

पीले अखबार

स्याह रात का
जो कुछ अज्ञात है
उससे बनाकर-
ताजे समाचार,
दरवाजा खुलते ही
सबेरा
फेंक जाता है-
पीले अखबार।

कानी बेटी का ब्याह 

चक्करदार
जीनों में चढ़ना,
पीतल पर
सोने को मढ़ना,
सम्भावनाओं के बूते
कर्ज-पर-कर्ज लादना,
आहत स्वाभिमान को
हँसी की गोद में बिठाना
पुचकारना,
सही बातें
न किसी से कहना न सुनना,
सहना….केवल सहते रहना-
हर अन्तर्दाह,
जिन्दगी है
या
कानी बेटी का ब्याह।

प्रश्नों के सामने 

प्रश्नचिह्नों
के सामने
खड़ा हुआ-
देखता हूँ: वृष्टि में-
कागजी महापुरुषों के बहते हुए रंग-रोगन,
सफेद कुर्तों
की थैलियों में
चार रंगों की टोपियाँ, कोयला
और चन्दन;
मन्त्रों का गट्ठर लादे भाड़े के टट्टू
प्रकाश के सात रंगों को अलगाते हुए
प्रिज्म
आग लगे जंगल से भागते हुए हिरन
औ…र
और… मैं
अवाक्।

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