शुचि ‘भवि’की रचनाएँ

ये सफ़र ज़ीस्त का आसान बनाने वाला

ये सफ़र ज़ीस्त का आसान बनाने वाला
कौन मिलता है यहाँ रिश्ते निभाने वाला

है सदाकत की डगर का वो अगर राही तो
हो नहीं सकता कोई उसको सताने वाला

है ये दुनिया-ए-अना सच में बहुत चमकीली
चश्मा नरमी का लगाना तू लगाने वाला

मुश्किलों से जो बने हैं उन्हें मालूम कहाँ
भाग्य भी होता है जीवन को सजाने वाला

जाने किस फ़िक्र में रहती है सदा गुमसुम सी
कोई मिलता कभी ‘भवि’ को भी हँसाने वाल

लिया है आपने क्यों बेसबब बिन काम का पैसा

लिया है आपने क्यों बेसबब बिन काम का पैसा
हराम आमेज़ हो जायेगा ये आराम का पैसा

जो सड़ता है यहाँ बैंकों में मुर्दा लाश की सूरत
बताओ तो भला आख़िर वो है किस काम का पैसा

ग़रीबी देखती है चार दिन की रोटियाँ जिसमें
अमीरे शहर वो है बस तेरे इक जाम का पैसा

कभी रोटी मिली इक शाम की या फिर रहा फ़ाक़ा
मगर हो दान बाबा को बढ़ा हर धाम का पैसा

बदलती है यहाँ ‘भवि’ हर घड़ी क़ीमत मुहब्बत की
मिलेगा मोल क्या बोलो हो ख़ासो-आम का पैसा

चाहतें होती नहीं है बस दिखाने के लिये 

चाहतें होती नहीं है बस दिखाने के लिये
रूह की बातें हैं दुनिया से छुपाने के लिये

ख़ुद ही ख़ुद से दूर होती जा रही हूँ आज मैं
आपको आना ही होगा अब मिलाने के लिये

आपसे खुशियाँ हैं मेरी आपसे ही सारे ग़म
आपको ही मैं मिली हूँ यूँ सताने के लिये

इक मुहब्बत बस न आयी करनी हमको आजतक
वरना होते हम भी दिलबर इस ज़माने के लिये

याद बीते लम्हों की आती है तो जाती नहीं
सारे ग़म ‘भवि’ को मिले ही हैं रुलाने के लिए

अस्ल में सारी हवाएँ आँधियाँ होती नहीं

अस्ल में सारी हवाएँ आँधियाँ होती नहीं
धूप की आमद को सारी खिड़कियाँ होती नहीं

ऐ बशर आवाज़ अपनी तेज़ थोड़ी कर ले तू
इस ज़मीं पर आसमां सी चुप्पियाँ होती नहीं

हमने ख़ुद को रंग कर देखा है तेरे प्यार में
वैसे पक्के रंग की पिचकारियाँ होती नहीं

उनको आती है महक सूखे गुलों से आज भी
हाँ मगर अब उन गुलों पे तितलियाँ होती नहीं

‘भवि’ की सब ग़ुस्ताखियाँ अब सिर्फ़ तेरे सँग हैं
साथ सबके हों जो वो बदमाशियाँ होती नहीं

कहाँ आसमाँ के सितारों ने लूटा

कहाँ आसमाँ के सितारों ने लूटा
हमें इन निगाहों के वारों ने लूटा

भरोसा किया है जो यारों पे ऐसा
न फिर मुझ से कहना के यारों ने लूटा

रही उनकी नज़रों से बचकर सदा मैं
मगर फिर भी उनके इशारों ने लूटा

खिज़ां पर लगाया था इलज़ाम लेकिन
मिरा दिल हमेशा बहारों ने लूटा

बहुत कम बनाये हैं ‘भवि’ यार जिसने
वो कैसे कहे मुझको यारों ने लूटा

ये चारों तरफ आज फैली ख़बर है

ये चारों तरफ आज फैली ख़बर है
मेरी शायरी पे तुम्हारा असर है

जवानी रही होगी बेशक मुअज्ज़म
बुढ़ापा हो शादाब इसका हुनर है

तुम्हारी इबादत ही है शाम मेरी
तुम्हारे बिना कुछ न मेरी सहर है

जिसे तुमने केवल हमारा बताया
वही घर तो सारे ज़माने का घर है

शबे-वस्ल की याद आती है किसको
कहाँ ‘भवि’ अब एहसास में वो असर है

सुर्ख़ सुर्ख़ होठों पर आग सी दहकती है /

  • सुर्ख़ सुर्ख़ होठों पर आग सी दहकती है*

टूट कर भी औरत हर हाल में सँभलती है

नींव ही तो करती है तय कि घर बने कैसा
सोच जब हो अच्छी तो ज़िंदगी महकती है

बचपना तुम्हें बेशक ख़ूबतर मिला वरना
ज़िंदगी जवानी में सबकी ही बहकती है

देख कर ज़माने में दोस्तो किसी का ग़म
आँख जाने क्यों मेरी ख़ुद ब ख़ुद छलकती है

देख ‘भवि’ मिली तुझको रेत की तरह साँसें
तू इसीलिए शायद फ़िक्र से फिसलती है

जब कभी उसे हमने प्यार से पुकारा है

जब कभी उसे हमने प्यार से पुकारा है
हर घड़ी हमें उसने मुड़ के बस निहारा है

रोज़ रोज़ मिलने से हम हुए हैं दीवाने
लग रहा है ये हमको दिल मेरा कुँवारा है

ईश की रही रहमत साथ मिल गया तेरा
किस क़दर मेरा रौशन हो गया सितारा है

याद वो न आयें अब है यही दुआ मेरी
वक़्त जो बिना उसके मैंने यूँ गुज़ारा है

‘भवि’ न समझेगा कोई इक तेरे सिवा वो जो
ज़ीस्त ने किया तुझको आज जो इशारा है

दिल में तुमको बसा के देख लिया 

दिल में तुमको बसा के देख लिया
सच को भी आज़मा के देख लिया

राज़ कितने दिलों में दफ़्न हुए
थोड़े हमने छुपा के देख लिया

नाज़ भारत पे कुछ किया होता
लब पे नारे सजा के देख लिया

देखते तो कभी हंसा के उसे
सबने माँ को रुला के देख लिया

जंगलों में भी ‘भवि’ कहाँ पंछी
आग में सब जला के देख लिया

ज़माना हमको ख़ुद से भी किसी दिन दूर कर देगा

ज़माना हमको ख़ुद से भी किसी दिन दूर कर देगा
सँभालें ख़ुद को हम कैसे हमें मग़रूर कर देगा

तुम्हारे पास दिल है देख लो शीशा नहीं कोई
तो मामूली सा इक पत्थर इसे क्या चूर कर देगा

जो फ़न से दूर लेकिन ग़ैर के रहमोकरम पर हैं
उन्हें भी देख लेना कल कोई मशहूर कर देगा

वो शायर है नशा तुम से ज़ियादा रख के चलता है
अरे साकी ज़रा सम्हलो तुम्हें मख़मूर कर देगा

जो ‘भवि’ ये चाहती है हो भलाई सारी दुनिया की
उसे चाहेगा तू भी दिल तेरा मजबूर कर देगा

भला कोई किसी का है कहाँ सारे ज़माने में 

भला कोई किसी का है कहाँ सारे ज़माने में
लगे हैं सब के सब इक दूसरे को आज़माने में

हमेशा उसकी थी, उसकी हूँ, उसकी ही रहूँगी मैं
मज़ा आता है फिर भी जाने क्यों उसको जलाने में

कहानी लिख रहे हैं ग़ैर के बदनाम पह्लू पर
भले हों लाख वो बदनाम खुद अपने फ़साने में

भले ग़ुरबत में है लेकिन अजब दौलत कमाता है
दुआयें रोज़ मिलती हैं उसे पानी पिलाने में

सरलता से कहा है सच, लगे अच्छा बुरा जो भी
सुकूँ मिलना नहीं ‘भवि’ को कभी बातें बनाने में

भला जो सोचता है सबका, सब उसको रुलाते हैं

भला जो सोचता है सबका, सब उसको रुलाते हैं
ज़माने वाले जाने कौन सा रिश्ता निभाते हैं

सितारों हम से भी होता है ज़ुल्मत का जहाँ रौशन
शरारे ख़ाक हो जाते हैं तो हम दिल जलाते हैं

ख़ुदा के पास जाऊँ तो करूँगी ये शिकायत मैं
कि औरत को ही वो क्यों इस क़दर नाज़ुक बनाते हैं

हम उनसे दिल लगाते हैं अकेलेपन से बचने को
वो दिल को तोड़कर कैसा दिली रिश्ता निभाते हैं

जिन्हें हम पूजते हैं और दिल से चाहते हैं हम
ज़रूरत पर वही ‘भवि साथ अक्सर छोड़ जाते हैं

ख़ुद से ख़ुद मिलने का ऐ दोस्त ख़याल अच्छा है

ख़ुद से ख़ुद मिलने का ऐ दोस्त ख़याल अच्छा है
तुम मिले हो तो ये लगता है कि साल अच्छा है

लोग हैं जेह्न से वैसे तो बहुत अम्न पसंद
फिर भी कुछ लोगों को लगता है बवाल अच्छा है

दे नहीं पाते किसी तरह मेरे होंट जवाब
पूछती हैं तेरी ऑंखें वो सवाल अच्छा है

कैसे मैं कह दूँ कि क्या होगा मेरा मुस्तक़बिल
न तो माज़ी मेरा अच्छा था न हाल अच्छा है

कम से कम ‘भवि’ से मुलाक़ात तो हो जाती है
धूप में पाँवों के जलने का मलाल अच्छा है

बात पूरी न की कुछ बचा रह गया

बात पूरी न की कुछ बचा रह गया
कुछ तो था जो दबा का दबा रह गया

ज़िन्दगी जब गई मौत आई मगर
दरमयां का जो था फ़लसफ़ा रह गया

ज़ुल्म है हर तरफ़ और कहते हैं वो
मुल्क़ में अब कहाँ हादसा रह गया
 
अश्क में भी बग़ावत की बू आ गई
क्या कोई आँख का अब सगा रह गया

कौन रोता है मैयत पे ‘भवि’ आजकल
बस रिवाजों का ये सिलसिला रह गया

मेरे मेरे ख़्वाबों को जो एहसास का परवाज़ देता है

मेरे ख़्वाबों को जो एहसास का परवाज़ देता है
उसी से लेखनी मेरी वही अल्फ़ाज़ देता है

 हज़ारों इल्म के हक़दार हैं जो लफ़्ज़ देते हैं
मगर आलिम वही है जो निगाहें राज़ देता है

न कोई है गिला उससे न है कोई शिकायत अब
ख़ुदा मुझको सँवरने का सदा अंदाज़ देता है

 बनाई है ज़माने ने किताबों में पकी रोटी
कलाकारी में भी भूखा हमें आवाज़ देता है

सियासत हो गयी इतनी कि है ख़ामोश अच्छाई
बुराई को मगर ‘भवि’ ये ज़माना साज़ देता है

हम अहले इश्क़ उल्फ़त का समंदर ले के चलते हैं 

हम अहले इश्क़ उल्फ़त का समंदर ले के चलते हैं
अना वाले तो बस हाथों में पत्थर ले के चलते हैं

वो चलते हैं मुहब्बत के गुलों को हाथ में लेकर
मगर नफ़रत के कांटे दिल के अन्दर ले के चलते हैं

नई तहज़ीब देखी है बदलते वक़्त में हमने
सब अपनी छोड ग़ैरो की ज़मीं ज़र ले के चलते हैं

हक़ीक़त है किसी अंजाम से डरकर नहीं चलते
जिगर वाले कफ़न अपना तो अक्सर ले के चलते हैं

सिपाही रातदिन लड़ते हैं सरहद की हिफाज़त में
वो अपनी मौत को ‘भवि’ अपने सर पर ले के चलते हैं

थोपते हैं ग़ैर पर जो अपनी ज़िम्मेदारियाँ 

थोपते हैं ग़ैर पर जो अपनी ज़िम्मेदारियाँ
झेलते हैं लोग वो ख़ुद बाद में दुश्वारियाँ

जैसे आये थे यहाँ वैसे ही जाओगे वहां
चाहे कर लो लाख ऐ इन्सान तुम तैयारियाँ

उसकी लाठी में कभी आवाज़ होती ही नहीं
क्या कभी फूली फली हैं आज तक अय्यारियाँ

आदमी इस फ़लसफ़े पर चल पड़े तो खुश रहे
ज़िन्दगी हंसती रहे हरदम रहें किलकारियाँ

तोड़ना मत दिल किसी का भूल से ‘भवि’ तुम कभी
मुश्किलों से ही यहाँ मिलती हैं सच्ची यारियाँ

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