शेखर जोशी की रचनाएँ

निराला के प्रति 

शेष हुआ वह शंखनाद अब
पूजा बीती !
इन्दीवर की कथा रही
तुम तो अर्पित हुए स्वयं ही ।

ओ महाप्राण !
इस कालरात्रि की गहन तमिस्रा
किन्तु न रीती !
किन्तु न रीती !!

द्विज

यज्ञवेदी
गीत सुस्वर
गृहजाग, समिधा-धूम
ऋचाओं की अनवरत अनुगूँज
रह-रह शंख का उद्घोष !

आज मुनुवाँ द्विज हो गया है ।

अभी कुछ देर पहले
पिता का आदेश पाकर
‘माम भिक्षाम देहि’ कहता
वह शिखाधारी
दण्डधारी
मृगछाला लपेटे
राह गुरुकुल की चला था
लौट आया बाल-बटु फिर
कर न पाया अनसुनी मनुहार माँ की !

गिन रहा अब नोट,
परखता
सूट के कपड़े, घडिय़ाँ
और भी कितनी अनोखी वस्तुएँ
झोली में पड़ीं जो ।

मुनुवँ मगन है अब
आज मुनुवाँ द्विज हो गया है ।

पर, साथ छूटा हमजोलियों का
अब बीती बात होगी:
वे ताल-पोखर
वे अमराइयाँ
जूठी-कच्ची कैरियाँ ।
अब सीधे सम्वाद होगा
अग्नि, सविता औ’ वरुण से

छह पीली डोरियों से मुनुवाँ अब बंध गया है
आज मुनुवाँ द्विज हो गया है ।

अंकित होने दो 

मैं कभी कविताएँ लिखता था, शुभा !
और तुम अल्पना !
चाँद-तारे
फूल-पत्तियाँ
और शंखमुद्री लताएँ चित्रित करते
न जाने कब
कविताओं की डायरी में
मैं हिसाब लिखने लगा ।
कभी ख़त्म न होने वाला हिसाब
अल्ल-सुबह टूटी चप्पल से शुरू होकर
देर रात में फटी मसहरी के सर्गों तक फैला
अबूझ अंकों का महाकाव्य

और तुम
अस्पताल, रोज़गार-दफ़्तर
और स्कूलों की सूनी देहरी पर
माण्डती रही वर्तुल अल्पना

साल दर साल !
साल दर साल !!

शुभा !
अभिशप्त हैं पीढिय़ाँ
लिखने को कविताएँ
बुनने को सपने
और अंकित करने को सतरंगी दुनिया ।

न रोको उन्हें
लिखने दो शुभा
दीवारों पर नारे ही सही
अंकित होने दो उनके सपनों का इतिहास

बर्फ़

फ्रिज से निकालकर
गिलासों में ढाल लेते हैं जिसे
रंगीन पानी के साथ
चुभला भी लेते हैं कभी-कभी
खूब ठण्डी-ठण्डी होती है
यही शायद आप समझते हैं बर्फ़ है ।

बर्फ़ जला भी देती है
गला देती है नाक, कान, अँगुलियाँ
पहाड़ों की बर्फ़ बहुत निर्मम होती है
बहुत सावधानी चाहिए बर्फ़ के साथ

अक्सर देखा है
बेपर्दा आँखों को अन्धा कर देती है
पहाड़ों की चमकती बर्फ़ ।

पहली वर्षा के बाद 

भूरी मटमैली चादर ओढ़े
बूढ़े पुरखों से चार पहाड़
मिलजुल बैठे
ऊँघते-ऊँघते-ऊँघते ।

घाटी के ओंठों से कुहरा उठता
मन मारे, थके-हारे बेचारे
दिन-दिन भर
चिलम फूँकते-फूँकते-फूँकते ।

उन सृष्टा अँगुलियों को चूम लूँ 

डूबता रवि
घिर रही है सांझ
चित्रित गगन-आँगन !

किन अदीखी अँगुलियों ने वर्तुल सप्तरंगी अल्पना लिख दी ?
कहाँ हैं वे हाथ
कितने सुघड़ होंगे ?
(अल्पना के रंग साक्षी)

क्षणभर देख तो लूँ
नयन-माथे से लगा लूँ
उन सृष्टा अँगुलियों को चूम लूँ।

मैं कि जिसका भाग्य अब तक
सूने चौक, देहरी, द्वार-आँगन से बंधा है ।

शायद ये वही हों हाथ
जो धानों की हरी मखमल के किनारे
पीली गोट सरसों की बिछाते
जो धरा पर सप्तवर्णी बीज-रंगों अल्पना लिखते
जो धरा पर सप्तरंगी फूल-रंगों अल्पना लिखते
जो धरा पर सप्तगंधी अन्नरंगों अल्पना लिखते
आहï! कितने सुघड़ होंगे
पात-पल्लव-अन्न साक्षी

नयन माथे से लगा लूँ
उन सृष्टा अँगुलियों को चूम लूँ ।

धानरोपाई

आज हमारे खेतों में रोपाई थी धानों की
घर में
बड़ी सुबह से हलचल मची रही काम-काज की ।
खेतों में
हुड़के की थापों पर गीतों की वर्षा बरसी ।
मूंगे-मोती की मालाओं से सजी
कामदारिनों ने लहंगों में फेंटे मारे
आँचल से कमर कसी
नाकशीर्ष से लेकर माथे तक
रोली का टीका सजा लिया ।

आषाढ़ी बादल से बैलों के जोड़े
उतरे खेतों पर
धरती की परतें खोलीं
भीगी पूँछों से हलवाहों का अभिषेक किया ।
सिंचित खेतों में
विवरों से अन्नचोर चूहे निकले
मेढ़ों पर बैठे बच्चों ने किलकारी मारी
दौड़-भूँक कर झबरा पस्त हुआ ।

बेहन की कालीनों से उठकर
शिशु पादप सीढ़ी-दर-सीढ़ी फैले ।
विस्थापन की पीड़ा से किंचित पियराए
माटी का रस पीकर
कल ये फिर हरे-भरे झूमेंगे
मंजरित बालियाँ इठलाएँगी, नाचेंगी
सौंधी बयार मह-मह महकेगी ।

जब घिरी सांझ
विदा की बेला आई
बचुवा की बेटी ने अन्तिम जोड़ सुनाए :
धरती माँ है
देगी, पालेगी, पोसेगी उनही को,
जो इसकी सेवा में जांगर धन्य करेंगे ।
ऋतुएँ पलटेंगी
घाम-ताप, वर्षा-बूँदी, हिम-तुषार
अपनी गति से आएँगे-जाएँगे
रहना सुख से, रहो जहां भी
होगी सबसे भेंट पुन:
जीवित यदि अगले वर्ष रही ।

मुज़फ़्फ़रनगर 94

(सन्दर्भ : उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन)

जुलूस से लौटकर आई वह औरत
माचिस माँगने गई है पड़ोसन के पास ।
दरवाज़े पर खड़ी-खड़ी
बतिया रही हैं दोनों
नहीं सुनाई देती उनकी आवाज़
नहीं स्पष्ट होता आशय
पर लगता है
चूल्हे-चौके से हटकर
कुछ और ही मुद्दा है बातों का ।

फटी आँखों, रोम-रोम उद्वेलित है श्रोता
न जाने क्या-क्या कह रही हैं :
नाचती अँगुलियाँ
तनी हुई भवें
जलती आँखें
और मटियाये कपड़ों की गन्ध

न जाने क्या कुछ कह रहे हैं
चेहरे के दाग
फड़कते नथुने
सूखे आँसुओं के निशान
आहत मर्म
और रौंदी हुई देह ।

नहीं सुनाई देती उनकी आवाज़
नहीं स्पष्ट होता आशय
दरवाज़े पर खड़ी-खड़ी
बतियाती हैं दोनों ।

माचिस लेने गई थी औरत
आग दे आई है ।

कारख़ाना 

अभी आठ की घण्टी बजते
भूखा शिशु-सा चीख़ उठा था
मिल का सायरन !
और सड़क पर उसे मनाने
नर्स सरीखी दौड़ पड़ी थी
श्रमिक-जनों की पाँत
यंत्रवत, यंत्रवेग से ।

वहीं गेट पर बड़े रौब से
घूम रहा है फ़ोरमैन भी
कल्लू की वह सूखी काया
शीश नवाती उसे यंत्रवत

आवश्यक है यह अभिवादन
सविनय हो या अभिनय केवल
क्योंकि यंत्रक्रम से चलता श्रम
गुरुयंत्रों की रगड़-ज्वाल से
तप जाएँ न यंत्र लघुत्तम
है विनय-चाटुता तैल अत्युत्तम ।

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