श्रीकान्त जोशी की रचनाएँ

बाल कविताएँ

गीत

एक गीत मेरा भी गा दो

एक गीत मेरा भी गा दो।

स्वर की गलियों के बंजारे
मेरे छंद करो उजियारे
किरन-किरन में बाँध लुटा दो।

एक गीत मेरा भी गा दो।

स्वर बाला के राजदुलारे
उठा गीत-नग नेक चुरा रे
स्वर की सुषमा से चमका दो।

एक गीत मेरा भी गा दो।

स्वर मधुबन के कुँवर कन्हैया
मेरा गीत एक ग्वालनिया
लय की बाँहों से लिपटा दो।

एक गीत मेरा भी गा दो।

मेघ-गीत

पहली बरखा का सौंधापन
महक उठा मेरा वातायन।

सूने आकाशों को छूकर ख़ाली-ख़ाली लौटी आँखें
अब पूरे बादल भरती है जामुनिया जिनकी पोशाकें
कैसे तोड़ रही है धरती
अपने से अपना अनुशासन!

ऋतुओं की ऋतु आने पर कौन नहीं जो फिर से गाता
मैं गाता तो कौन गज़ब है पूरा विंध्याचल चिल्लाता
क्षितिज-क्षितिज से दिशा-दिशा से
सप्त स्वरांबुधि के अभिवादन।

अंतरिक्ष में नाद मूर्त है, धरती पर अँखुओं का नर्तन
मैदानों में रंग-शक्तियाँ करती गुप्त क्षणों का अंकन
प्रकृति-पुरुष के अश्व-वेग में
महाकाम के व्यक्तोन्मादन।

पहली बरखा का सौंधापन
महक उठा मेरा वातायन।

हर क्षण को गीत किया

हर क्षण को गीत किया
सुनते हो मीत पिया!

यादें मुँहज़ोर सखी
बनकर जब छेड़े थीं
सूरज को रोक रहीं
बादल की मेड़ें थीं
अपने में बँध-बँध कर
अनमन ही सध-सध कर
मैंने सौ बार तुम्हें
हेरा और टेर लिया।

दिन बौराया मन
रातों ने सपनों की
जब-जब आ बात कही
पलकों ने अपनों की
नींदों से उकता कर
सरहाने कुछ गाकर
काजल के आँसू की
माला को बोर लिया।

हौले से रात गई
तेज़-तेज़ उमर नई
मुट्ठी में बालू-सी
कब थी, कब रीत गई
कैसी अनरीत हुई
वंशी में गीत नहीं
अब है जो बीत रहा
तब जो था बीत लिया।

नयन अबोले

इक पल मूँदे इक पल खोले
बोल गए दो नयन अबोले।

बात सहज थी अरथ अबूझे
वह पागल जो इनसे जूझे
जिसका मन हो फूल सुबह का
वह सब जाने उसको सूझे
इक पल बैठे युग दे बैठे
हम ऐसे अनजाने भोले।

जल गहरा था तट बहरा था
फिर भी मन यह रुका न रोके
जिस पर कभी नहीं पहरा था
मगन हुआ वह बंदी होके
दो नयनों पर जनम अनगिने
मिली तराज़ू हमने तौले।

इक पल मूँदे इक पल खोले
बोल गए दो नयन अबोले।

गीत अधर पर

गीत अधर पर सुधि सिरहाने
फिर से जागे दर्द पुराने।

ऊपर उड़ती घटा जामुनी
छोड़ चली सब ठौर-ठिकाने
नीचे ठगिनी हवा कहारन
लगी बहकने, लगी छकाने
बिजली ठुमके देकर ताने।

गरब किए बैठा सूनापन
खुला हुआ मेरा वातायन
बंद नहीं कर पाऊँ उठकर
ऐसा बोझ किए मन धारण
संज्ञा ही से हैं अनजाने।

खुली-खुली पलकों के जोड़े
सपनों में हैं थोड़े-थोड़े
मौसम भिगो गया है इनका
बग़ैर शब्द की जड़ता तोड़े
कोलाहल बैठा सुस्ताने।

गीत अधर पर सुधि सिरहाने
फिर से जागे दर्द पुराने।

फिर किरन ने द्वार खोले

फिर किरन ने द्वार खोले
रश्मियों ने रंग ढाले
डालियों ने गीत बोले

फिर किरन ने द्वार खोले।

फिर हुए उत्सव, हुए फिर पूर्वजा के हाथ पीले
फिर तिमिर मात खाई, मुस्कराए पुष्प गीले
फिर सिरजने के सपन को
ढूँढ़ लाई दृष्टि श्रम की
पंक ने पंकज खिलाए, फ़सल बनकर बीज डोले।

यह सुबह फिर आ गई, ले, उठ कि तू मस्तक झुका ले
रश्मि के स्नेहिल करों की, स्पर्श ले, चंदन लगा ले
कौन डूबा है अभी तक
विगत की तन्हाइयों में
टेर पूरब की सुने फिर भी रहे अनसुने-अडोले?

रश्मियों ने रंग ढाले, डालियों ने गीत बोले
फिर किरन ने द्वार खोले।

रागिनी बीन हो गई

प्रकृति पुरुष में लीन हो गई
स्वयं रागिनी बीन हो गई।

कैसी थी उद्दाम नर्तकी
घर-घर झूमी, दर-दर भटकी
जिधर दृष्टि फिर गई उधर ही
अजय पिपासा, तृष्णा भभकी
विश्व रीझ कर जिस पर रीता
वह ही जल बिन मीन हो गई।

बाँहों के दो कूल कि जिसमें
कैसी शांत हुई है धारा
मुक्त चंचला मुग्ध हो गई
पाकर भुजबंधों की कारा
कैसी थी बरज़ोर जवानी
अब वह कैसी दीन हो गई।

प्रकृति पुरुष में लीन हो गई
स्वयं रागिनी बीन हो गई।

कविताएँ

अन्तरादेश 

इन दिनों जब समस्त अवयव दुरुस्त हैं प्रकृति की तरह
उन्हें विनयावनत दान की तरह दे दो।
ये तुम्हारी जायदाद है
ये तुम्हारी स्वतंत्रता हैं
तुम्हारे व्यक्तित्व की अर्हता हैं
इन्हें कर्ण-कुण्डलों की तरह धारण करो।
ये, निश्चय ही कल सुरक्षा हैं
आकांक्षाओं के अनेक मुकाम इन्हीं में हैं
आसमानों और समुद्रों के विज्ञान इन्हीं के मोहताज हैं
बावजूद इस सबके
इन्हें ज़रूरतों तक पहुँचने दो
इन्हें सहेजो, सहेजते रहो।
निश्चय ही कल तुम्हें घमासानों के कोलाहल सुनाई देंगे
उस वक़्त चूक मत करना
जहाँ पैरों की ज़रूरतें सुनो वहाँ
दे देना अपने पाँव
कहना, मेरे नहीं ये तुम्हारे भी हैं।
जहाँ भुजाओं के आवाहन हों
वहाँ पहुँच जाना लेकर दिशान्त-स्पर्शी फैलाव,
जहाँ दृष्टियाँ अंधकार भी न पहचानती हों
वहाँ पहुँच जाना सुबह से बेहतर सुबह की तरह,
इन दिनों जब कुछ सामथ्र्य है
चलो यह अनादि अस्तित्व लेकर
और प्रकृति का श्रेष्ठतम अवदान और
मनुष्य की पहचान की तरह दे दो।
जब समस्त अवयव दुरुस्त हैं प्रकृति की तरह
उन्हें, विनयावनत दान की तरह दे दो।

कभी-कभार

जो
उच्चारण की दहलीज़ लाँघ कर
बन जाते हैं कर्म
वे मंत्र होते हैं,
संजो लेते हैं शताब्दियों तक
घायल मनुजता का मर्म।
बिना वर्तुल हुए रेखाओं के
तुलता नहीं है सौन्दर्य-फलक पर
समूचा शून्य गूँजने लगता है
कुछ अनाम किरणों की झलक पर।
कभी-कभार लिखे शब्दों से
न लिखों में बड़ा बल होता है
जिस जगह ज़मीन चुकती है
वहाँ जल होता है।
बेवजह नहीं, सिर
शरीर के अवयवों से ऊपर बना
यह झुकता है, दर्द होता है
जैसे बन गया हो घुटना
भय भी हमारी संस्कृति है
कभी-कभी
आदमी बेहिसाब
आदमीयत ख़्वाब
बग़ैर चेहरे के घूमता है नक़ाब

आदमी आदमी रहे
ऐसा इंतज़ाम हो
पैरों में रास्ता हो
हाथों में काम हो।

कहाँ आ गए

हम प्रकाश-यात्री, समय-सारथी
कहाँ आ गए
इधर सुपरिचित अंधियारे में?
सूरज सिर पर क्षितिज अनावृत
फिर भी हम सब भटक गए हैं गलियारे में!
अपने ही आकाशदीप थे
जलयानों को चट्टानों से रहे बचाते
अपने ही तट के प्रवाल थे
जिनकी ख़ातिर दसों दिशाओं, दूर समुद्रों के जन आते।
अपना ही है पोत हमारा अपना ही है
अपने ही आकाश-दीप से टकराया है
निर्णय के इतिहास-क्षणों में मल्लाहों को
दिशा-विमर्च्छित
पाखण्डी
अकसर पाया है।
हम भी तो औरों-जैसे ही उलझ गए वारे-न्यारे में।
चिन्तन के ऊँचे शिखरों के
निकट ढूह हैं खड़े कर्म के
सत्ता के प्रत्यक्षवाद से
ध्रुव कँपते हैं प्रजा-धर्म के
एक अनिश्चय हमें दूसरे
अति-निश्चय तक पहुँचाता है
थोड़े नहीं, करोड़ों का संकल्प विकल्पित हो जाता है।
कुछ ही हैं पर शब्द-बीज मैं
अपने बल पर फेंक रहा हूँ
तूती की आवाज़ भले ही नक्कारे में!
कहाँ आ गए इधर सुपरिचित अंधियारे में?

नया राष्ट्रगीत

रोटी रोटी रोटी
बड़ी उम्र होती है जिसकी ख़ातिर छोटी-छोटी
रोटी रोटी रोटी।
जिनके हाथों में झण्डे हैं उनकी नीयत खोटी
रोटी रोटी रोटी।

अपने घर में रखें करोड़ों बाहर दिखें भिखारी
सहसा नहीं समझ में आती ऐसों की मक्कारी
उधर करोड़ों जुटा न पाते तन पर एक लंगोटी
रोटी रोटी रोटी।

शोर बहुत है जन या हरिजन सब मरते हैं उनसे
महाजनियों की छुपी हुक़ूमत में सब झुलसे-झुलसे
चेहरे पर तह बेशरमी की कितनी मोटी-मोटी!
रोटी रोटी रोटी।

पैसों के बल टिका हुआ है प्रजातंत्र का खंबा
बिका हुआ ईश्वर रच सकता यह मनहूस अचंभा
जमा रहे हैं बेटा-बेटी, दौलत सत्ता-गोटी
रोटी रोटी रोटी।

बर्फ़ हिमालय की चोटी की मुझको दिखती काली
काली का खप्पर ख़ाली है नाच रही दे ताली
मैं देता हूँ, वो ले आकर, मेरी बोटी-बोटी
रोटी रोटी रोटी।
बड़ी उम्र होती है जिसकी ख़ातिर छोटी-छोटी
जिनके हाथों में झण्डे हैं उनकी नीयत खोटी
रोटी रोटी रोटी।

वे शब्द बजाते हैं

समझ में आता हूँ
भाषा की नक़ली सुबह के अन्धेरे में
यह ख़तरा उठाता हूँ
वे शब्द बजाते हैं
अर्थ की बाघनखी अंगुलियाँ
शब्द-ग्रीवा में धँसती हैं
धँसती चली जाती हैं ख़ून रिसने तक
नियुक्त जन तालियाँ बजाते हैं
और कर भी क्या सकते हैं नियुक्तियाँ सब ओर हैं
आदेशाक्रान्त भाषा अकड़ कर खड़ी होती है —
ताली बजाओ (तालियाँ तुरंत बजती हैं)
चिल्लाओ, जैसे ख़ुशी मिली हो
(सब ऐसा ही करते हैं पर कुछ की
हरकत रोने-जैसी हो जाती है)
समीक्षक! (अरे कोई है)
जी हुज़ूर
इधर आओ, इनकी अर्थहीनता का उत्सव मनाओ
ख़र्च की परवाह मत करो
सरकस से बेहतर होता है
यह अभ्यास-सिद्ध अनुपालन।
स-पारिश्रमिक तालियाँ बराबर बजती हैं
जगहें बदलती हैं पर ये नहीं बदलतीं
मैं बिरादरी से बाहर का आदमी
फेंक गए आदेशों पर
अपना चमरौधा रख कर खड़ा हूँ
शिखर की ठंडी, वहशी, निर्मूलक
दहशतभरी, बन्द
मुस्कराहट में कौंधती हुई जुगुप्सा से
निहत्था टकराता हूँ
भाषा की नक़ली सुबह के अन्धेरे में
यह ख़तरा उठाता हूँ
समझ में आता हूँ।

संकेत 

दिशाएँ संज्ञाहीन होने को हैं
संकेत जग रहे हैं।
एक होगी हर दिशा की नियति
बन्दूकें ज़मीन से सूर्य तक
सन्नाटों की खेती करेंगी।
शब्द
उच्चारण से पहले तहख़ानों में होंगे
सच, ज़लील कुत्ते-सा
दुम हिलाता दिखाई देगा
झूठ की ड्योढ़ी पर
भूख, समस्या नहीं होगी समाधान
आदमख़ोरों के लिए
ठहरकर देखो
इरादे, भट्टियों में सुलग रहे हैं
दिशाएँ संज्ञाहीन होने को हैं
संकेत जग रहे हैं!

वह

समुद्र के किनारे की चमकती-दमकती नेकलेस-सी सड़क
कुनकुनी धूप और हलके शीत से खु़शगवार मौसम
अच्छा लग रहा है पैदल चलना।
वह मिला
हाथ में बड़ी मोटी और खुरदरी रस्सी के साथ
सिर पर गलफन्दा बांधता हुआ, फेंकता हुआ
खींचता हुआ
उत्तेजित, उद्दीप्त मगर आश्वस्त
पकड़ में कुछ न आ पा रहा था
पर उसकी शक़्ल से
और उसके हाव-भाव से लगता था
वह कोई बहुत बड़ी और ज़बरदस्त वस्तु खींच रहा है
बार-बार खींचने और जूझने का श्रम छुपता न था
मनुष्य की संकल्पवान देह में —
वह जीवित विचार था
कि विचार ने ही वह ऊर्जस्वित-देह धारण की थी
पसीने से लथपथ-लथपथ था वह
साँसों में तेज़ी और ऊष्णा थी।
क्या कर रहे हो बंधु? मैंने पूछा —
‘देख नहीं रहे’ — क्षोभ और घृणा से बोला वह
कितनी बड़ी, आँखों को थकाने वाली इमारतें हैं?
लोग ऊपर से नीचे देख रहे हैं
हमें नगण्य करते हुए
स्वर्ण से अधिक महंगे कपड़ों में
कितने बेशर्म और जाहिल लगते हैं!
इन गलफन्दों में ये इमारतें फँस रही हैं
हिल रही हैं
और धूज-धूज कर गिर रही हैं।
आवाज़ नहीं सुनाई देती तुम्हें भूकंपों-सी?
नहीं सुनाई देती होंगी शायद
तुम अभी तक भविष्य नहीं सुन सकते
कब तक नहीं सुनोगे
भविष्य सदा भविष्य ही रहेगा?
सब ज़मीन पर आ जाएंगे
वक़्त की बात है …. देखना।
फिर?
फिर क्या सब पैदल चलेंगे
हँसी-ठिठोली करेंगे
और आँसुओं के क्षणों में अकेले नहीं रहेंगे।
सबकी नज़र नीचे से ऊपर की तरफ़ उठेंगी
निर्बाध और निःसंकोच
चन्द्रमा की तरफ़
आकाश की तरफ़
आकाश के बाद के आकाश की तरफ़
वह चलता जा रहा था
उसे फ़ुर्सत न थी
गलफन्दे बाँधता, फेंकता, खींचता, जूझता
पसीने से शराबोर होता
उत्तेजित, उद्दीप्त
उथल-पुथल के भव्य खण्ड-चित्र-सा
सजीव, रोमांचक, गतिशील और भयानक।

आवाहन: नवागत को

मैंने यह कहा था, कहता भी रहूंगा
सीढ़ियों के न होने पर
शिखरयात्रा में असुविधा हो तो
मेरे मस्तक पर पैर रख कर बढ़ जाना
यह कब कहा था
इस्तेमाल की गई सीढ़ी की तरह
धकिया देना वंचना से?
तुमने देखा, चह मस्तक अडिग रहा
उम्र के बावजूद।
मेरा मस्तक मेरा आवाहन
केवल तुम्हारी शिखरयात्रा के लिए थोड़े ही था,
और भी यात्री हैं
प्रतिभा में अप्रतिम
पर वे अपने नमन मैले नहीं होने देते
जानते हैं
यह ठहर जाने वाला यात्री नहीं है
यह तो हर तरह से सहयात्री है
यह भी जानते हैं
यह सीढ़ी मात्र नहीं एक चुनौती भी है,
इसे छल से, पाखंड से नहीं
मस्तिष्क की और हृदय की शक्तियों से
परास्त किया जा सकता है।
यह आवाहन भी है
ओ नवागत! परास्त करो इसे
दलों के दलदल में मत उचकते रहो
यह यात्री अनवरत आवाहन है।

काश 

काश
दुनिया के तमाम मुल्क़
क़ायम रख पाते अपनी ताक़तें
अपनी अस्मतें
रहते अपने दायरों में,
अपनी-अपनी ज़मीनों पर ठहरते
ज़ोरों से कमज़ोरों पर ठहरते
ज़ोरों से कमज़ोरों के ज़ोर बनते
सूर्य-दिशा के देश
सूर्यास्तों के शिकार न होते।
निराशाओं की कोश से जन्मे
ईश्वरों की तलाश में न रोते
न अपने अन्दरूनी मनुष्य से बिछुड़ते
न अपनी मृत्यु पर
अपने ही आँसुओं में
अपने ही चेहरों को भिगोते!

मुझे ठहरना है: एक जून 

आज मेरे जन्मदिन को सौंपने वाले
माह की शुरुआत है
मैं उम्र के एक और दशक का नागरिक बन गया हूँ
इस दौर के दिन नहीं थाम पाते
जीने की इच्छाएँ,
इसलिए महसूस होता है
इन्हीं दिनों में अहमियत है जीवन की।
कुछ मुसीबतें ऐसी होती हैं
जिन्हें इसी दौर में चुनौती दी जा सकती है
ये अभिनव चुनौतियों के वर्ष मेरे ख़ाते में हैं।
मैं एक विजय हूँ विगत के लिए
और एक मार्ग नवागतों को।
मुसीबतों की चुभन सहते-सहते
अब चुभने लगा हूँ मुसीबतों को।
वे डरने लगी हैं
और मैं सोचता हूँ
समय हो या सत्ता
व्यक्ति हो या प्रकृति
यदि इनमें कहीं कोई कठोर चुभन है
अस्तित्व को
तो मुझे ठहरना है।
सर पर धधकता हुआ मार्तण्ड
पाँवों में परिक्रमा देते बवंडर
इन्हीं में मुझे जीवित रखना है
कुछ मधुरतम गीत
कुछ भुजाओं की तरह थाम लेने वाले स्वर!

तुम्हें देखने के लिए

मैंने तुम्हें देखने के लिए
पुस्तकें हाथ में लीं और रखीं
मैंने तुम्हें देखने के लिए
अनेक अधबनी कविताएँ चखीं।

मैंने तुम्हें देखने के लिए
खिड़कियों के अधपट ढुलकाए
मित्रों को अनसुना किया
वायदों में झूठ बिखराए!

तुमने यह कुछ न किया
केवल अँगुलियों में लिपटते हुए
आँचल के कोने
कुतर खाए!!

न होने के वक़्त की तरह

नहीं होने के बाद जिस तरह होता है आदमी
नहीं होता उस तरह होने के वक़्त।
खुल जाता है जाने कितने बंधों और जोड़ों से
और जोड़ देता है परिचितों को परिजनों को
ज़रूरत-बेज़रूरत के
मोहों और मोड़ों से।
होने के मौसम में
नहीं होने की तरह
देख सकना
वास्तविक देखना है,
अपनी रोटियाँ सब तोड़ते हैं
सब बखानते हैं शेखियाँ अपनी समय-असमय
कम-अधिक हम सब
मामूली क़िस्म के होते हैं
पर ज़िन्दगी में इतनी ग़ैरज़िम्मेदारी किस काम की?
किसी को पहचान सकना और
छूकर देख पाना अपने जिस्म की तरह
किसी की हक़ीक़त का करना बयान
कभी बन कर सुबह का गान
कभी प्रयाण किसी शाम का
वास्तविक ज़िन्दगी की है शुरुआत।
किसी का कर्ज़ लौटा देने की तरह है
यह असाधारण-सी साधारण बात।
नहीं
भले किसी छोटे-मोटे इतिहास में भी न लिखे
मगर कोई लिखे तो इतिहास ख़ुद रहेगा अहसानमंद
होने के वक़्त जो करता रहा आदमी को
न होने के वक़्त की तरह पसन्द।

अब नहीं 

पहले सोचा करता था मृत्यु बड़ी बात है
बड़ी और असहनीय
अब नहीं।
मृत्यु की अनेक छायाएँ मैंने विवशताओं के भीतर धँसकर
बर्दाश्त की हैं
एक अनाकांक्षित जीवन जीते हुए
मैंने विकल्पहीन रास्तों का अनुगमन किया है।
परिस्थितियों के चक्रव्यूहों की घुटन में
मरण बेहद आरामदेह होता।
पर नहीं, यह नहीं
यह तो कोई बड़ी बात न होती।
और अब जब उस दौर के इस तरफ़ आ गया हूँ
और वह सब करने को स्वतंत्र हूँ जो न कर सका
तो सोचता हूँ ठीक किया उस आरामदेह अंधकार को
अस्वीकार देकर।
झुक जाता वक़्त से डर
तो ठहर गया होता किसी अतीतोन्मुख क्षण-बिंदु पर
अ-रचित, अ-पठित, सु-विस्मृत और समाप्त।
एक अंधी सुरंग से बचकर
जीवन के आलोक-छोर को स्पर्श कर
अब मैं हूँ अस्तित्व।
मैं वह सब रद्द करता हूँ जो मैंने ढोया, जिया नहीं
मैं जीवन-देह के उस कैंसर को स्वयं
काट कर फेंक चुका हूँ
और अब स्वयं अपना चिकित्सक हूँ
मैं अपनी प्रकृति से मोक्ष प्राप्त करूँगा
विकृतियों की कुटिलता से नहीं।
अपने अनुभवों के शिखर से आगाह करता चला जाऊँगा
सुनो शेषजन! सुनो,
मार्ग वह नहीं, यह है इस तरफ़
अब विगत के अपूर्ण और अपक्व क्षण
शेष की पूर्णता और पक्वता बनेंगे
सच, बख़ूबी जान गया
मर जाना बड़ी बात नहीं एक सुविधा है, विलास है
जीवन ही पुरुष है
और मरणातिक्रमण… पुरुषार्थ!

शिखर से

शिखर सुनो!
तुम्हारे कलंकों और कारनामों से
इस भूखण्ड के करोड़-करोड़ जन
हज़ार-हज़ार सत्तासीन मन
बे-ईमान हो उठे हैं
विभागों, संस्थाओं, सेनाओं और सेवाओं के अधिपति
सामान्य भृत्य
सड़क-सड़क सहमते हुए जीवन
अपने उजले-उजले दामनों के बावजूद
आत्महीन, संशयाक्रान्त और बे-गुमान हो उठे हैं।
सोचते हैं भाल में खोदते हुए सलवटें
जिस सागरमाथा की तरह हिमोज्ज्वल होना था
वह ही काले अंधकारों से बदतर, बदबूदार है
हम ही क्यों रहें धवल-नवल
क्यों न लें उत्कोच
क्यों न दें साथ उस आतंकजन का
जो शराफ़त के साथ खूँखार है?
यहाँ तो सुन रहे हो न शिखर?
धधक रही है घर-घर
शताब्दियों से बुभुक्षा
जो मिटाई न जा सकी स्वाधीनता की जय से।
हमें हक़ है बे-ईमान होने का
तुम्हारी वजह से।
पर नहीं, हरगिज़ नहीं
टूक-टूक होकर भी टुकड़ों पर नहीं टूटेंगे हम
हटा कर रहेंगे तुम्हें और तुम्हारी गंदगी
कोई राष्ट्र कभी नहीं कर सकता तुम्हारी बंदगी।
हम खड़े रहेंगे अपने पैरों
अपने अभय से,
स्वच्छ करके रहेंगे
विक्रमादित्य का आसन
अपनी आदमीयत
अपने ईमान
यानी
अपने संकल्पों की जय से।
शिखर सुनो!

फ़र्क़ और फ़र्क़

क्या फ़र्क़ है
बूढ़े और बालक में?
ख़ास नहीं,
दोनों को नैपकिन की ज़रूरत है।

क्या फ़र्क़ है
बूढ़े और बालक में?
फ़र्क़ ही फ़र्क़ है,
यह भी कोई प्रश्न है!

बूढ़ा उठता भी है तो गिरते-गिरते
बालक गिरता भी है तो उठते-उठते
एक में जिस जगह भविष्य का समापन है
दूसरे में उसी जगह शुभागमन।

अवबोध

जीवन एक और अखण्ड उपस्थिति है
पर मृत्यु-खंडित है आदमी।
उसने जब-जब चुनौती दी मृत्यु को
वह आदमीयत के पक्ष में खड़ा हो गया।
आदमी मरता रहता है
आदमीयत चलती रहती है
समय को शताब्दियों तक महकाती
काल-देह पर चलाती
अलक्ष्य दराँती।

बाल कविताएँ

अश्शु भइया 

अश्शु भइया राजा है,
अश्शु भइया शेर!

जब हँसता है तो हँसता है
अपने सच्चे मन से,
जो कहता है, सो कहता है
बेहद अपनेपन से।
काम तुरत कर लेता अपना
कभी न करता देर!

अश्शु भइया राजा है,
अश्शु भइया शेर!

अश्शु भइया जब पढ़ता है
डरता नहीं जिरह से,
बात समझ में उसके आती
अक्सर इसी वजह से।
इसीलिए कक्षा में रहता
सदा सवाया सेर!

अश्शु भइया राजा है,
अश्शु भइया शेर!

रोज पहनता अपने कपड़े
अपने ही हाथों से,
और साफ रखता है उनको
स्याही के दागों से।
संग सभी के मिल कर रहता
करता ना मुठभेड़!

अश्शु भइया राजा है,
अश्शु भइया शेर!

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