श्रीप्रकाश मिश्र की रचनाएँ

पानी-1

जो पत्ते की नोक से सरककर
कंकड़ में छेद करता है
खो जाता है रेत में

रेत के गर्भ में पड़ा
वह प्रतीक्षा करता है
कभी-कभी तो अनन्त काल तक
एक सूक्ष्मतम सूराख़ के निर्माण की
जिसके सहारे निकल कर चीर दे
चट्टान की छाती
पर्वत का माथ
और जाने कितनी बाधाओं को पारकर
पहुँच जाए सागर में
मिल जाए पानी के साथ
जीवन देने के लिए

बिना किसी अपने निजी अस्तित्व के
अपनी मसृणता में कठोर संघर्ष की घृति
पानी का विनय है
निर्मिति का कठोर दायित्व निभाने के लिए
पानी कभी मरता नहीं
पानी जो खो जाता है रेत में

पानी-2 

पानी का गीत मैंने सुना था
जब वह धीरे-धीरे बह रहा था
कड़ी ज़मीन पर
अपनी ही तरंगों से टकराकर
गा रहा था

उसी गीत को मैंने सुना था
जब वह पर्वतमाथ से कूदकर
घाटी में भर रहा था
एक सहास उठ रही थी
सन्नाटे को मार रही थी
हो सकता है
किसी को उससे डर लगे
मुझे तो एक उपस्थिति का संज्ञान दे रही थी

उसी गीत को मैंने तब भी सुना था
जब उसकी मसृणता
साठ खम्भे वाले पुल की कठोरता से टकरा रही थी
न तो उसे छेद पा रही थी
न उसे तोड़ पा रही थी
फिर भी अगल-बगल से बह ज़रूर जा रही थी
उसी गीत को मैंने फिर सुना
जब वह धीरे से डेल्टा को पार कर
अथाह समुद्र में गिर रहा था
बिना अपना अस्तित्व खोए
हज़ार मील तक
नदी की तरह
संयुक्त पानी में भी
भीतर-भीतर बह रहा था

पानी की यह जिजीविषा कितनी कमनीय थी!

पानी-3 

पानी शहर से गायब हो रहा था
और पूरा शहर देख रहा था
पानी पड़ोसी से मांग रहा था
और पड़ोसी के चेहरे से
पानी ग़ायब हो रहा था

मैं देख रहा था
राजनीति करने का यही वह मौक़ा है
जिसे मैं जाने कब से खोज रहा था
मैंने पानी की ओर से कहा :
तीसरा महायुद्ध पानी पर होगा

हवा मेरी बात सुन रही थी
बोली : हम पर क्यों नहीं
आख़िर पानी मेरे चेहरे पर भी होता है

मैंने कहा : तुम्हारे चेहरे के पानी से
ज़्यादा ज़रूरी है
पानी पर तुम्हारा रूख़
तुम आजकल पानी को हवा दे रही हो
मेरी बात पर पानी ने चुपचाप कुछ कहा
और हवा हो गया

है कोई माई का लाल
जो पानी की बात को समझे
और पानी-पानी हो जाए
इक्कीसवीं सदी में।

पानी-4

जब मैं पानी की ताक़त पर बात कर रहा था
मुझे अचानक याद आया चट्टान का सामर्थ्य

उसे मैंने पूर्वी घाट पर देखा था
हज़ारों मील के जल में घिरा
अकेला
तमाम चट्टानों से सैकड़ों मील दूर
निरन्तर सागर के उद्वेलन को चौतरफ़ा पीछे ढकेलता
अनादि काल से

अकिंचन में अडिग सामर्थ्य
के मुक़ाबिले अनन्त पानी में
बस इतना सामर्थ्य था
कि उसे चिकना कर लौट जाए।

अबूझमाड़-1 

अबूझमाड़ के जंगलों में
हम अकेले नहीं चलते
लोगों के साथ चलते हैं
गोल बाँधकर एक बराबर से नहीं
आगे पीछे
पीछे से आगे वाले को देखते हुए
कोई धमाका हुआ
कोई सुरंग फटी
आगे वाला उड़ गया
तो बदल देंगे हम अपनी राह
सकुशल चलता गया
तो हम चलते जाएँगे
उसके पीछे-पीछे
गंतव्य तक
अबूझमाड़ के जंगलों में
लिबरेटेड ज़ोन में
हमारा पथ-निदेशक
किसी की निर्दोष जान होती है ।

अबूझमाड़-2

मेरी ओर देखो
कहता है बेलिक
देखो मेरी परछाई
बारह हाथ लम्बी है
और बढ़ती जा रही है

मेरी प्रेमिका को देखो
फूलता ही जा रहा है पेट
सोमारी, मंगरू, बुधई के बाद भी
हर हफ़्ते सात पुत्र
कितना विचित्र है
उसका उर्वर होना

ठीक भी है
आज बुधई गया दलम में
कल बिफई गया था सल्वा जुडुम
सुमई गया जंगल मधु काढ़ने
सनीचरी को उठा ले गया तेलुगुआ सांढ़
इतवरिया भगई उतार कर घिस रही है
पोखर पर पीठ
सोमारी राकेट है
मंगली आतिश का अनार

इनमें से कोई नहीं लौटेगा
भील कोंडा अबूझमाड़
हम तीसो दिन का रखेंगे
अलग-अलग नाम
पैदा करेंगे उनके नाम पर संतान
रोकेंगे अपनी वंशबेली का विनाश

अबूझमाड़-3

मैं अपनी इन्हीं आँखों से देख रहा हूँ
अपने धान खेतों को
एक-एक कर बदल जाते हुए
खदानों, कारख़ानों, मिलों में
जिनके मालिक हम नहीं हैं

हमारे हरे-भरे पहाड़
एक-एक कर होते जा रहे हैं
भूरे वीरान
कुछ के अस्तित्व का पता ही नहीं चलता

हमारी नदियाँ सूख गई हैं
उनमें कभी चमककर तैरने वाली मछलियाँ
ग़ायब हो गई हैं
ग़ायब हो गई है नदी की रेती

मैं अपनी इन्हीं आँखों से
देख नहीं पा रहा हूँ
कि इनके मालिक
कौन लोग बनते जा रहे हैं ।

कोई अक्स नहीं बनता

कोई अक्स नहीं बनता
कोई पदचाप नहीं उभरती
कोई दरवाज़ा खटखटाता है
वहाँ कोई नहीं
सिर्फ़ हवा है कोई

आप दरवाज़ा खोलेंगे
तो भीतर आएगी
पकड़ेगी कोई पत्ता
पत्ता उसमें उड़ेगा
हर ताल पर नाचेगा

नहीं खोलेंगे
तो लौट जाएगी
हालाँकि वह कोई नदी नहीं है
अँधेरे में रोशनी की बहुत बारीक
रेख की तरह बहेगी
जो उसके साथ बढ़ेगा
पहाड़ चढ़ जाएगा
खिलाफ़ चलेगा
तो उड़ जाएगा
सम्बन्धों की गरमाहट की तरह

एक चिड़िया

एक चिड़िया
आइने पर निरन्तर चोंच मार रही है

एक दुश्मन पर निरन्तर आघात कर रही है
जो शीशे के उस पार है

नहीं
अपने आप से लड़ रही है
कि अपना प्रतिबिम्ब ही
अपना सबसे बड़ा दुश्मन होता है

ना रे ना
अपने ही जैसे एक पंछी को
क़ैद पा रही है
और उसे मुक्त कराने के लिए
निरन्तर लड़ रही है

उहुंक
वह जानती है
क़ैद पक्षी वह खुद है
एक शीशे की क़ैद से
मुक्त होने के लिए
वह तड़प-तड़प कर चोंच मार रही है.

खिला है जो गुलाब

खिला है जो गुलाब
हँस रही है उसमें किसी की आत्मा
उड़ी जा रही है जो गंध
वह किसी की स्मृति है

रंगों में दहकता जा रहा है जो ओज
वह किन पुरुषों की इतिहास-व्यथा है
उसका हिलना कुछ पूछना है

कि बहती है हमारी आँखों में जो सूखी
वह चिरनिद्रा क्यों है
पँखुड़ी में गड़ा शूल
निकलकर क्यों नहीं गड़ता
हमारी आँख रूपी आँख में

हमारे समय में

हमारे समय में
जिनके पास कविता थी
उनके पास सपने नहीं थे

जिनके पास सपने थे
उनके पास समय नहीं था
कविता भी नहीं थी

समय से सपना ख़ारिज था
क्योंकि सबके पास एक ही सपना था
वही सबकी कविता में था

उसे उतारने की बातें कही गई
और उसे ही कविता कहा गया

लेकिन उसमें कविता नहीं थी
क्योंकि उसमें सपना नहीं था
वह सिर्फ़ समय थी

समय कविता नहीं होता
कविता समय के पार होती है
ऐसा मैं नहीं
वह आलोचक कह रहा था
जिसकी तूती बोलती थी

हमारे समय में
यानी हमारे समय में
कविता के नाम पर जिसकी तूती बोलती थी
वह आलोचक था
कवि नहीं

इसलिए कविता में कविता नहीं थी

मैं जब भी धूप चाहता हूँ 

मैं जब भी धूप चाहता हूँ
सूरज थोड़ा खिसक जाता है

तुम कहते हो
मैं झूठ बोलता हूँ
सूरज नहीं
पृथ्वी खिसकती है

पृथ्वी खिसके
या सूरज

धूप
मुझे ही तो नहीं मिलती
मैं जब भी चाहता हूँ ।

वे कवि हैं 

वे कवि हैं
वसन्त का मौसम
उन्हें काट खाता है

वे परिवर्तन के कवि हैं
पतझर उन्हें सटीक लगता है

बरसात भले ही साथ देती हो
नवांकुरों का
वह रस की याद दिलाती है
जो गुज़रे ज़माने की बात है

और शीत तो पाट देती है
चमकीले जलदानों से चराचर
इतने सौन्दर्य की जगह
अब कहाँ कविता में

वे कवि हैं परिवर्तन के
उन्हें चाहिए तेज़ बयार
जो पात-पात झार दे
ब्रह्माण्ड
उन्हें सब तरह से
और सब तरफ़ से
सिर्फ़ नया करना है
ठूँठ पर ठूँठ पर ठूँठ

एक स्त्री

एक स्त्री
सिर के बल खड़ी है
सृजन क्रिया में
कोई हज़ार वर्षों से

रेत की तरह उड़ा ले गई है हवा
उसके वक्ष को
भुजाओं को तोड़ दिया है
किसी आततायी के मुग्दर ने
नितम्ब की संधियों में
चीटियों ने बना लिया है अपना मकान
पाँवों पर दिख रहे हैं
पानी के दाग

एक स्त्री
हज़ार वर्षों से सूख रही है
सिर के बल
और उसके सिर में
दर्द भी नहीं हो रहा है

उसके चेहरे पर दिपदिपाते
सृजन-तप को देखकर लगता है
कि यूँ ही पत्थर नहीं बोलने लगता है
कविता

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