संध्या रिआज़ की रचनाएँ

भूख 

भूख क्यों लगती है आदमी को भी
या भूख ही क्यों लगती है आदमी को
बहुत सारी अपनी परायी
आकांक्षायें-इच्छायें
और एहसास खाकर भी
बराबर पीड़ित प्रताड़ित करती रहती
उफनती रहती है हरदम

आदमी कोल्हू के बैल सा
बहुत सी अच्छाइयों-सच्चाइयों से
आंखें मूंदता
चाही-अनचाही बुराइयों में सनता
पट्टी बांधे आंखों पर
बिलकुल कोल्हू के बैल सा
घूमता रहता है
इस कायाकल्प मायायुक्त कोठरी में
जीवन के खूंटे से बंधा
चलता रहता है चलता रहता है
पर भूख तब भी नहीं मिटती
भूख को नहीं खत्म कर पाता आदमी
पर एक दिन भूख
खा लेती है आदमी को
विलीन होने के बाद भी
आत्मा भूखी रहती है
हाय! क्या यही नियती है
भूख!
क्यों लगती है आदमी को भी
या भूख ही क्यों लगती है आदमी को

एक छोटा लड़का

सड़क पर बोरा लिए
कागज़ बटोरता हुआ एक लड़का
अपने बचपन को छिपाने की चेष्टा करता
अपने मन को मार आंखों को ज़मीन पर टिकाता
इधर -उधर ज़मीन पर नज़र दौड़ाता
चला जा रहा था
सड़क पर सामने से आते हुए
उसके जैसे हमउम्र बच्चे
बचपन से भरे हंसते -खिलखिलाते
साफ सुथरे उनके कपड़े
और कपड़ों के जैसे उनके साफ खिले चेहरे
झुण्ड में स्कूल के लिये निकल रहे थे
लड़का उन्हें देख सकुचाता है
खुद को बोरे के पीछे छिपाता है
और पसीने से भीगा चेहरा पोंछ
आगे बढ़ जाता है
आगे खूबसूरत बाग रंग बिरंगे फूल
खिलौनों की दुकानें और दुकानों पर
अपना खिलौना चुनते बच्चे
मां-बाबा से अपना खिलौना लेने की ज़िद कर रहे थे
लेकिन इस लड़के को कुछ भी नहीं दिख रहा था
या वो देखना नहीं चाहता था
सिवाय कागज़ के टुकडे़ के
उसने कभी कोषिष भी नहीं की
कुछ भी देखने की
ष्षायद मालूम होगा उसे
चाहना और पाना दो अलग-अलग बातें हैं
अपनी उम्र से भी बड़ा बना दिया था उसे
इन रास्तों और बिखरे हुए कागज़ों ने
वो जानने लगा था षायद
उसकी चाह सड़कों और कागज़ों तक ही सीमित है
ये चलते फिरते सपने और सपने जैसे रंग भरे
बच्चे बनना उसकी कल्पना से भी बाहर था
ष्षाम होने से पहले इस बोरे को कागज़ से भरता है
बिकने पर बीस रुपये कमाता है
उससे दो रोटी और एक चाय खरीद
भूखे पेट को भरके सो जाता है
सुबह होते ही अपना बोरा लेके
फिर सड़कांे पर आ जाता है
एक नई आस के साथ
काष! उसका बोरा आज जल्दी भर जाए
और रोटी खाके वो जल्दी सो जाए
देखेगा सपने
सपने जैसे साफ-साफ बच्चों के
जहां वो उनमें से एक होगा
हाथ में बोरा नहीं बस्ता होगा
और बस्ते में मां का दिया खाने का डिब्बा होगा
जिसमें पेट भर खाने को खाना होगा…………..
तभी एक डंडा उसकी पीठ पर पड़ता है
हवलदार उसे जगाकर फुटपाथ से भगाता है-
कब तक सोयेगा हीरो! काम पे नहीं जाना है!!!

अनजान षहर

अनजान षहर में घर बसाने का डर
बहुत गहरा होता है
बसते हैं घर नयी-नयी बस्तियों में
नये-नये षहरों में बेगानों के घर के आस-पास
दिन की टिकटिकी दुपहरी में
अकेले कमरे में
सांय-सांय आती हवा और
हवा के साथ आती आवाजें़
अजीब-अजीब अनचाहे चेहरों की
खुद को और भी अकेला उस घेरे में बंद कर जाती हैं
हवा भी कोई अपना सा ठिकाना ढूंढती
खिड़की से कूदकर भाग जाती है
हर षाम भीड़ के सैलाब में बहता ये षहर
यहां से वहां और वहां से यहां उमड़ता
रात होते-होते ठहर जाता है
टुकड़ों में बंटकर लंगरों में बंध जाता है
घुट जाता है सीमेंट की मोटी-मोटी चादरों के बीच

तब कहीं एक षख्स ढूंढकर ठिकाना
ठहर जाता है
खुद के बनाये ताबूत में बंद हो जाता है
अकेले लावारिस सो जाता है
लेकिन दिल उसका अब भी चाहता है पाना
कोई अपना सा अजी़ज़ साथी पुराना
जिससे सोते-सोते दो-एक बात कर सके
उसका हाथ पकड़ कंधे पे सर रख
थोड़ा सा रो सके
और फिर निष्चिंत हो बंद कर आंखें
डूब जाये रात के आगोष में
पर जब खुलती हैं आंख
बाहर कोई रोता है
जागा हुआ षहर-भागता हुआ षख्स
आवाजों़ का घेरा दौड़ता है

उफ!
ये अनजान षहर
कभी नहीं सोता है
और न कभी किसी का
अपना सा होता है

ज़िंदगी की रफ्तार बंद 

कुछ दिनों से ऐसा लगता है
कि कई साल बिता दिये बेवजह जीते-जीते
बहुत कुछ किया पर क्या था वो
कहां गया कुछ पता नहीं
सुबह से षाम और षाम से सुबह तक
सालों जीते रहे हैं
कोल्हू के बैल से आंखों में पट्टी बांध
हम भी घूमते रहे हैं

एक ही धुरी पे घूमते-घूमते
सोच हो गई बंद
सेच बंद तो एहसास बंद
ज़िन्दगी की रफ्तार बंद

कुछ ही समय बाकी है
सूरज के ढलने में
अब कोई षिकवा नहीं षिकायत नहीं
रूठना और मनाना नहीं

अब न दुःख न दिल दुखाने वाली बातें होगी
न हम होंगे न हमारी यादें होंगी ……..
भूल जायेंगे सब धीरे-धीरे
पाकर खोते-खोकर पाते
कहां से कहां पहुंचे हम जीते जीते
कुछ दिन यादों के संग आयेंगे हम
सालोें बीते तो कुछ याद न आयेगा
मालूम है हमें जो हम गए
हमारा नाम भी मिट जाएगा

माँ तुम मेरी हो

दूर तक फैला आसमान
यूं लगा जैसे बांहें खोले हुए
मां का आंचल देता है यकीन
कि मत डरो आगे बढ़ो
कुछ होगा तो हम हैं
कि हम हैं तुम्हें संभालने को
तुम न गिरोगे न ठोंकरें खाओगे

दूर-दूर तक दिखती ज़मीं भी
यही देती है यकीं
कि दौड़ जाओ,आगे बढ़ो,मुड़ो न कभी
मां की बांहों सी फैली ये ज़मीं
जो देती है एहसास
कि कोई है जो हम पर ममता भरी आंखों से
दिन रात जागकर रखता है नज़र
कि ना हो जायें हम ओझल
क्योंकि हम हैं अंष उसका ही
जे अलग होकर भी
होता नहीं कभी भी अलग

ज़िन्दगी के हर मोड़ पर
अलग-अलग रूप मंे
बाहें फैलाये मां मिलती है
हमसे दूर जाने के बाद भी
दूर कहीं जाती नहीं
क्योंकि हम असल में हम नहीं हैं
हम उसी मां का हिस्सा हैं
जो अलग होके भी उसी से जुड़ा है

इस बंधन को बांधने के लिए
कोई डोर नहीं होती
ये जुड़ा है ठीक है वैसे
जैसे जुड़ा है आसमान धरती से
यहां से वहां तक,वहां से यहां तक
जन्म से मृत्यु तक,मृत्यु से जन्म तक
मां मुझे पता है तुम अब भी हो यहीं कहीं
धरती और आसमान के बीच हर जगह
लेकिन मेरे बहुत ही पास
इतना कि मैं गिरुं तो तुम थाम लो
मैं भटकूं तो तुम सही राह दो
मैं सोउं तो तेरी लोरी कानों में गुनगुना उठे
मैं जागूं तो अपने सपने याद रहें
तुम मुझमें ही कहीं हो मां
ऐ मां तुम मेरी हो…………

वक़्त के मानिंद

गुज़रते वक्त के मानिंद
कतरा- कतरा पिघलती ज़िन्दगी के साथ
कुछ ख्वाहिषों को पाने की खातिर
कुछ ग़मों को भूलने की कोषिष के साथ
किसी अपनों के हाथों को थाम
भीड़ में कभी अकेले गुम होकर भी
अकेले-अकेले चलकर सालों बिता दिये
किस-किस से किस-किस की बात कहें हम

कई रातों में बहे आंसुओं ने देखा है हमें
कई राहों ने भटकते देखा है हमें
दिन-रात पहर दो-पहर पल -दो -पल
सब जानते हैं
जिं़न्दगी आसान न थी जो जी चके हैं हम

ज़िन्दगी आसान होगी या नहीं कौन बता पायेगा
लोग हाथों के लकीरों के नक्षे दिखाकर
रास्ता पूछते हैं
कौन अपने रास्तों को
लकीरों में बदलने का हुनर देगा हमें

नज़र बदलने लगी पैर भी डगमगाने लगे
न जाने ये रास्ते कब खत्म होंगे
जो मंज़िल पे पहुंचा पायेंगे हमें
खामखां भागते-भागते सारी जद्दोज़हद के बाद भी
हम खाली हैं झोली खाली है
अपने भी अपने कहां हो पाते हैं
उनकी अपनी ज़िन्दगी की बेचारगी है
एक छोर पर पहुंच चुके हैं अब
आगे जाने का दिल नहीं
सांसे भी दिल से खफा हो चली हैं
लगता है कोई आया है लेने

दर्द सारे छू होने लगे सांसें परायी होने लगीं ़
ये सुकून कहां था अब तक जिसके लिये
उम्रभर ज़िन्दगी को हम रुलाते रहे
अब ठीक नहीं है
दुःख नहीं,दर्द नहीं,मंज़िल नहीं,राहें नहीं
आंखें बंद होते ही सारे बवालों से बच गये
सांस रुकते ही अनजानी थकन से बच गये
मौत क्या इसे कहते हैं तो यही बेहतर है
न हम हैं न हमारे हैं न दुनिया के झंझट हैं
एक रौषनी की मानिंद,एक वक्त की मानिंद
हम गुज़रते गये
षायद कुछ लम्हे ही थे वो
जो हमें अपने साथ ले गये और कितने जाहिल थे हम
उम्र भर जो न साथ जाना था उसके लिये लड़ते रहे
खैर अब सुकून है,कुछ ठण्ड है रवां रवां
कहां हैं? कहां जाना है? इसका कोई ग़म नहीं
ज़िन्दगी नहीं तो हम नहीं

एक घटना 

अचानक एक दिन
घट गई एक घटना
पल रहा था जो अन्दर मेरे
धीरे धीरे हौले हौले
देता था खुषी लेता था ग़म
गुज़रते गये इसी तरह कुछ महीने कुछ दिन
चहकता था मन पाकर एहसास उसका

अचानक उस षाम जाने क्या हो गया
अस्तित्व उसका पिघलने लगा
षरीर उसका मरने लगा
दिल मेरा भी डूबता गया मरता गया साथ उसके
जैसे धीमी-धीमी धूप को खाने लगी हो घटा कोई
ऐसे ही खाने लगा उसका खोना
मेरी खुषी के हर कोने को
और फिर धीरे-धीरे हो गया सब खत्म

जो पल रहा था ले रहा था सांस
धीरे धीरे हौले हौले
एक ही झटके में छोड़ गया संबन्ध
बस छोड़ गया एक एहसास
कि कभी कुछ महीने
बिना जान पहचान के
था बहुत अटूट संबन्ध उसका और मेरा
हां मुझसे मुझ तक ही
पर अब बिखर गया,खो गया,टूट गया
बिना पुकारे,बिना मिले मुझसे
हाय!
मेरा प्यारा नन्हा सा हिस्सा
खो गया हमेषा हमेषा के लिये

पगडंडी

धीरे-धीरे फिर उसी सूखी पगडंडी पर
उगने लगी है हरी हरी ऊनी घांस
छोड़ दिया था जिसको सबने
अकेला लावारिस बेसहारा सा
आज उसी सूखी पगडण्डी पर
कुछ नन्हे नन्हों ने फेरा था हाथ
उनके पैरों तले उसी घास ने गुदगुदा कर
किलकारियों से भर ली थी सूनी डगर

सबकी भूली-बिसरी या छोड़ दी गई ये राह
फिर एक बार जाग कर नयी हरी पोषाक पहन
खेल रही थी नन्हीं-नन्ही मासूम कलियों के साथ

सूखी पगडण्डी खो गई थी अब कहीं
उसने अपने सूखेपन को भी भुला दिया था
अब खिले हुए सतरंगे फूलों से सजी
वो ज़मीन पर लहराता इन्द्रधनुष बन गई थी
ठीक उस बेसहारा बेटी की तरह जिसे
अब प्यार करने वाली मां मिल गई हो

बहुत पुरानी बात है

बहुत पुरानी बात है
जब आता था हंसाना मुझे हर बात पर
और हर चीज़ लगती थी सुंदर
इधर-उधर घूमते बादलों के झुण्ड में
मिल जाते हैं कई आकार,कई सूरतें
दौड़ भागती सोती जागती

सालों पुरानी बात हो गई
जब रूठना अच्छा लगता था
और माफी मंगवाने के बाद मान जाना भी
छोटे से मेले में जाकर झूला झूलना
फिर मिट्टी के सेठ-सेठानी घर लाना
कितना सुखद होता था
हफ्तों पहले और महीनों बाद तक
मन खिला-खिला रहता था

रात के अंधेरे में आंगन में सो कर
ऊपर बिखरे तारों को गिनना
और बार-बार गिनना अच्छा लगता था
अब तो ऐसा नहीं है
समय बदल गया,उम्र भी बढ़ गई
और
बदल गया समय के साथ-साथ
बादलों का घूमना,मेलों का रंग
और अंधेरे में तारों का चमकना
सब कुछ बदल गया धीरे-धीरे
अब नन्हीं किलकारियां बादल नहीं तकतीं
ना रूठ कर मनाये जाने का इंतज़ार करती हैं
ना मेले से लाती हैं मिट्टी के खिलौने
और न फुर्सत है उन्हें तारे गिनने की
सब कुछ पुरान हो गया है अब तो
एक पिछली रात का सपना सा
जिसके सच होने की चाह होती है
पर सपने कहां होते हैं सच
बहुत पुरानी बात हो गई अब तो
जब सपने सच होते थे।

सालों बीत गये 

वक्त के साथ सब बदलता है, सच है
लेकिन ये भी सच है कि
वक्त का इंतज़ार करते -करते सालों बीत जाते हैं
बढ़ती उम्र के साथ वक्त भी बदल जाता है
पर तब तक ख्वाहिषों की षक्ल बदल जाती है
इंसानों की षक्ल के साथ-साथ
संकुचित मापदंड आपसी टकराव
सालों बर्बाद कर देते हैं हमारा
ख्वाहिषें बदल जाती हैं और
ज़रूरतें ख्वाहिषों की जगह लेकर
हमें हमारी उम्र से भी बूढ़ा बना देती हैं
अब दिल और दिमाग एक साथ नहीं होता
न झरने देखने की चाह होती है
न बर्फ की ज़मीं पर चलने की
न दोस्तों की हुड़दंग के साथ त्यौहार मनाने की
न नई बारिष में मिट्टी की खुष्बू भाती है
न साथ चाहता है दिल किसी खास का
वक्त तेज़ी से हमें खींचता ऐसी जगह ले जाता है
जहां सब ठहर सा जाता है
ग़म बर्दाष्त करने की ताकत होती है
खुषी में न खुष होने की सलाहियत आ जाती है
सब कुछ सीधा सा,सहमा सा बिना उतार चढ़ाव के
चल पड़ता है और तब लगता है
आधी उम्र खत्म हो गयी
आधी है या नहीं पता नहीं
जो है वो धीरे-धीरे रेत के खिलौनों सी
रिसती-रिसती खत्म हो जायेगी
रेत खत्म खेल खत्म और उम्र भी खत्म
बस एक आह रह जायेगी लाष के किसी हिस्से में
वक्त के साथ क्यों नहीं
होतीं ख्वाहिषें पूरी……….

फूल

फूल किस पेड़ से उपजा है कौन पूछता है
पूछो बस इतना कि कौन सा
फूल कितने दिन किस रंग में
कितनी खुष्बू देता है
पेड़ किस काम आएगा काट के किसी दिन
किसी लाष के साथ जला दिया जायेगा
फूल जब तक खिला है रंगीन है खुष्बू देता है
हमेषा पूछा और पूजा जाता है
फूल को याद है पेड़
और पेड़ भी चाहता है फूलों को
पर ये भी सच है कि दोनों का साथ रहना
नियती नहीं है
कोई तोड़ लेता है
कोई टूट जाता है और कोई
मुरझा के नीचे गिर किसी के पैरों तले
कुचला जाता है

फूलों के अलग रंग होते हैं
अलग खुष्बू होती है और
और अलग आकार होता है
पर इंसान हर फूल की खासियत
एक फूल में संजोकर
अपने घर में सजाना चाहता है
फूलों ने भी किसी हद तक
समझौता कर लिया है
एक फूल कई रंगों में पैदा होने लगता है
खुष्बू भी बदलने की कोषिष करता है
आकार भी थोड़ा बहुत बदल लेता है
पर पूर्ण होना तो संभव नहीं
तो दो-चार दिन साख पाकर मुस्कराता है
मुरझाते ही किसी डिब्बे या तालाब में
फेंका जाता है
तब फूल को पेड़ बहुत याद आता है
काष! फूल फिर पेड़ जा लगता
ये पेड़ भी सोचता है और फूल भी।

बहुत सी बातें

बहुत पहले बहुत सी बातें
छूती थीं दिल रूलाती थीं आंखें

मोहल्ले के उस छोर पर पीपल के नीचे
अक्सर बैठती उस बुढ़िया का निधन
मोहल्ले में सनसनी फैलाता
महीनों टिकी दोपहरी की गर्म हवा सा
घरों के अन्दर बाहर घूमता रहता था
छूता था दिल रुलाता था आंखें

दादी की लंबी कहानी की यादें
उड़ते घोड़ों और रोते राजा की बातें
अब भी उन्हें सपने में वापस बुलाती हैं
हाय! उनकी पोपली बोलों की चाषनी ललचाती है
पढ़ाई के नाम पर एक काली पाती और गोरी माटी
दुनियां के गणित भाषा और भूगोल बताती है
ष्षाम होते ही चिड़ियों का घेरा सा
बच्चों का डेरा सा
देर रात हो हो और हल्ला मचाता
दादा और दादी की मीठी डांट खाता
अम्मा की गोद में छिप के सो जाता
पर सुबह की भोर के संग आंख जो खुलती
पाया हुआ सब कुछ ओझल हो जाता
और रात का सपना बन आंखों में खो जाता
लेकिन फिर भी दूर जाके भी दूर न जाता
सच है बहुत पहले बहुत सी बातें
छूती थीं दिल रुलाती थीं आंखें

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